मेरी माँ कामिनी 2.0 - अध्याय -9


बंटी बहुत खुश मिजाज हवेली के अंदर पहुँचा था। फागुन के साथ हुई उस मीठी नोकझोंक ने उसके खून में एक नई रवानगी भर दी थी। हवेली में अजीब सा सन्नाटा पसरा था। बंटी सीधे कामिनी के कमरे की तरफ बढ़ा।
"माँ... कहाँ हो?" बंटी ने धीरे से पुकारा, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। उसने हाथ बढ़ाकर दरवाज़ा धकेला तो वो खुला था।

अंदर का नज़ारा देखते ही बंटी के कदम वहीं ठिठक गए। कमरे में चाँद की नीली रोशनी खिड़की से छनकर आ रही थी। बिस्तर के किनारे कामिनी शून्य में खोई हुई बैठी थी, पूरी तरह नग्न। उसकी पीठ बंटी की तरफ थी, जो दूधिया रोशनी में संगमरमर की तरह चमक रही थी। कमर पर वो गीला पेटीकोट सिमटा पड़ा था और बिस्तर का गद्दा पानी से तर था।

"क्या हुआ माँ?" बंटी घबराकर भागता हुआ कामिनी के सामने पहुँचा।
कामिनी के गीले बाल उसके कंधों और भारी स्तनों पर बेतरतीब बिखरे थे। आँखों में ठहरे आँसू गालों पर लुढ़कने को तैयार थे। बंटी को अपने सामने देख कामिनी का बांध टूट गया। उसने बिना कुछ सोचे बंटी को अपनी बाहों में भर लिया। कामिनी बैठी थी और बंटी उसके सामने खड़ा था। कामिनी ने अपनी गोरी बाहें बंटी की कमर पर लपेट दीं और अपना सिर उसके पेट से सटा दिया।

उस स्पर्श ने बंटी के शरीर में एक करंट सा दौड़ा दिया। कामिनी के वो विशाल और पसीने से भीगे नंगे स्तन बंटी की जांघों से जा चिपके। बंटी को अपनी माँ की सिसकियों में एक ऐसी बेबसी सुनाई दी, जिसे वो बचपन से पहचानता था।

"सिसक... सुबुक..." कामिनी बंटी के पेट में अपना मुँह छुपाए रो रही थी। इस दुनिया में बंटी ही उसका इकलौता हमराज़ था, जिससे उसने कभी अपनी कोई हवस, कोई चोट या कोई राज़ नहीं छुपाया था। दोनों के बीच की पारदर्शिता ही उनके रिश्ते की सबसे बड़ी ताक़त और सबसे बड़ी कमज़ोरी थी।

बंटी को शक होने लगा था। उसने धीरे से कामिनी के गीले बालों को हटाया। बालों के हटते ही कामिनी के वो उन्नत, सुडौल और विशाल स्तन बंटी की नज़रों के सामने उजागर हो गए। लेकिन उन गोरे गोलों पर कुछ गहरे लाल निशान और उंगलियों की नीली छाप साफ़ दिख रही थी।

"पापा ने किया ये सब?" बंटी ने दाँत पीसते हुए पूछा। उसकी मुट्ठियाँ भिंच गईं।
कामिनी ने सिसकते हुए बस 'हाँ' में सिर हिलाया और बंटी से और भी ज़ोर से जा लिपटी। इस खिंचाव में कामिनी के स्तन बंटी के लंड पर और भी मज़बूती से चुभने लगे।

 बंटी, जो सुबह से फागुन के हुस्न और प्रमिला की बातों से गर्म था, उसका जिस्म अब बागी होने लगा। उसके लंड ने अनजाने में ही अपनी माँ के नरम जिस्म के खिलाफ एक सख्त अंगड़ाई ले ली।

कामिनी, जो पहले से ही हवस और अधूरी प्यास की आग में जल रही थी, उसे अपने सीने पर उस 'सख्त चीज़' का स्पर्श महसूस हुआ। उसने उसे नकारा नहीं, बल्कि उस चुभन को और गहराई से महसूस करने के लिए खुद को बंटी से और सटा लिया। बंटी के हाथ अब अपनी माँ की नंगी, चिकनी पीठ पर रेंगने लगे थे।

"बताओ ना माँ, आखिर बात क्या है?" बंटी ने अपने नाखूनों से कामिनी की कमर को हल्के से कुरेदा।
भरी हुई कामिनी ने सब कुछ उगल दिया। हकीम की मालिश, बाहर हैंडपंप पर उसका नग्न होकर नहाना, गुंडों का हमला और फिर रमेश का वो आधा-अधूरा वहशीपन।

"वाह माँ... आप तो अकेले में एडवेंचर कर रही हो," बंटी ने माहौल को हल्का करने के लिए कामिनी की ठोड़ी ऊपर उठाकर शरारत से कहा।

"हट पागल... पता नहीं कौन थे वो लोग! अच्छा हुआ तेरे पापा आ गए, वरना तेरी माँ आज गई थी," कामिनी ने अपनी व्यथा सुनाकर मन का बोझ हल्का महसूस किया।

"अब आप जैसी औरत खुले में इस तरह नहाएगी, तो आदमी और क्या करेगा माँ," बंटी ने कामिनी के स्तनों पर पड़े उन लाल निशानों को अपनी उंगलियों से सहलाते हुए कहा।
"हट गंदे... माँ के दूध को ऐसे छूते हैं क्या?" कामिनी ने बनावटी गुस्से में बंटी का हाथ हटाया, लेकिन उस कोमल स्पर्श ने उसकी नाभि के नीचे एक मीठी हलचल पैदा कर दी थी।
"पापा भी ना... बस निशान छोड़ना जानते हैं, काम पूरा करना उनके बस का नहीं," बंटी ने कामिनी के लाल गाल को सहलाया।

"सच बोलूँ बंटी... आज उस दर्द में एक अलग ही नशा था, एक अजीब सा मज़ा आया," कामिनी अपनी रूह की कड़वी सच्चाई बोल गई।

"आपको समझना सच में मुश्किल है माँ," बंटी ने लंबी साँस ली। उसका लंड अब पूरी तरह तन चुका था, लेकिन उसने और कामिनी ने हमेशा उस 'बारीक रेखा' का सम्मान किया था। वो एक-दूसरे की हवस के गवाह थे, लेकिन उस हवस के भागीदार बनने की हिम्मत अब तक किसी ने नहीं की थी।

"चलो माँ, अब कपड़े पहन लो। खाना ठंडा हो जाएगा, प्रमिला ने बड़े चाव से पैक किया है," बंटी थोड़ा अलग हुआ।
"अब क्या यहीं बैठकर घूरेगा मुझे? जा बाहर," कामिनी ने अपने स्तनों को बाहों से ढकते हुए कहा।

"क्यों माँ? बाहर वालों को दिखा सकती हो, अपने बेटे को नहीं?" बंटी ने चुटकी ली।
"बहुत बदमाश हो गया है तू... जा यहाँ से!" कामिनी ने मुस्कुराते हुए उसे धक्का दिया।
बंटी कमरे से बाहर जाने लगा, तभी कामिनी के मुँह से एक धीमी सी फुसफुसाहट निकली "थैंक यू बेटा..."
बंटी रुका नहीं, बस मुस्कुरा दिया। "मैं समझ सकता हूँ माँ..."

हवेली के उस कमरे में माँ और बेटे का यह रिश्ता किसी भी सामाजिक परिभाषा से परे था। दोनों एक-दूसरे की तरफ आकर्षित थे, दोनों के बीच वासना की एक अदृश्य डोर खिंची हुई थी, लेकिन संस्कारों की बेड़ियाँ अभी भी उनके पैरों में थी। 
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रात 11:00 बजे | गाँव के बाहर का एक जर्जर ढाबा

हवेली के उस तूफ़ानी मंज़र से जान बचाकर भागे लकी और बिट्टू, अब गाँव की सरहद पर बने एक पुराने और लुटे-पिटे ढाबे पर बैठे अपनी किस्मत को कोस रहे थे।

 ढाबे की बेंच टूटी हुई थी और ऊपर एक मटमैला सा बल्ब जल-बुझ रहा था। उनके सामने पीतल की थालियों में ठंडी होती दाल और मोटी रोटियाँ पड़ी थीं।
लकी के दिमाग में अभी भी कामिनी का वो चाँदनी रात मे चमकता नंगा जिस्म घूम रहा था,

"साले! पहले ही कहा था मैंने कि उठा लेते हैं... तुझे ही उसे नंगा देखना था और नखरे पालने थे!" लकी ने गुस्से में एक ज़ोरदार घूँसा बिट्टू की पीठ पर जमा दिया।

,'धम्म...!'
"खो... खो... खाऊ...!" बिट्टू का निवाला गले में अटक गया और वो बुरी तरह खाँसने लगा। "साले... मार डालेगा क्या? मुझे क्या पता था कि वो मनहूस ऐन मौके पर वहाँ टपक पड़ेगा? और तू भी तो आँखें फाड़कर देख ही रहा था ना!" बिट्टू ने हड़बड़ाहट में पानी का गिलास उठाया और गटागट पी गया।

"हाँ, तो सब पता तो होता है तुझे! मुझे उल्लू बोलता है ना? खुद बड़ा तीस मार खाँ बनता था, अब देख... हाथ आई मछली भी गई और ऊपर से गाँव वालों के डंडे पड़ते सो अलग!" लकी ने चिढ़ते हुए अपनी दाल में रोटी डुबोई।

दोनों अपनी नाकामी का ठीकरा एक-दूसरे के सिर फोड़ रहे थे और आपस में ऐसे उलझे थे जैसे अभी वहीं गुत्थमगुत्था हो जाएँगे।

 तभी पास वाली मेज़ पर बैठे एक गाँव वाले की आवाज़ उनके कानों में पड़ी, जो ढाबे के मालिक से बात कर रहा था।
"काका! कल वो हवेली वाली ताईजी की बैठक है ना? चलना है ना?" गाँव वाले ने बीड़ी सुलगाते हुए पूछा।
ढाबे के मालिक ने तौलिए से मेज़ साफ़ करते हुए जवाब दिया, "हाँ भाई... चलना ही है। ताईजी के बहुत एहसान हैं इस गाँव पर, पूरा गाँव जुटेगा कल तो।"

बैठक का नाम सुनते ही लकी और बिट्टू के कान किसी शिकारी कुत्ते की तरह खड़े हो गए। दोनों के बीच चल रही लड़ाई एक सेकंड में शांत हो गई।

बिट्टू की आँखों में एक शातिर चमक आ गई। उसने अपनी तिरछी नज़र लकी की तरफ घुमाई और लकी भी उसे देखकर एक कुटिल मुस्कान मुस्करा दिया।

"सुना तूने? कल बैठक है... पूरा गाँव जुटेगा," बिट्टू ने धीरे से फुसफुसाया।
"समझा भाई... भीड़भाड़ होगी, शोर-शराबा होगा... और सब लोग खाने-पीने और मातम में बिजी होंगे," लकी ने अपना जासूसी दिमाग फिर से चालू किया।

"बिल्कुल! कल हवेली के अंदर घुसने और उस 'आइटम' को उठाने का इससे बेहतर मौका नहीं मिलेगा।

दोनों ने अपनी ठंडी दाल और सूखी रोटियाँ अब ऐसे खानी शुरू की जैसे वो कल के 'बड़े मिशन' के लिए ताक़त जुटा रहे हों। हवेली का सन्नाटा कल भीड़ में बदलने वाला था, कामिनी के नसीब का ऊंट किस करवट बैठेगा पता नहीं.
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सुबह 10:00 बजे | हवेली का मुख्य आँगन

सूरज की तीखी रोशनी हवेली के आँगन में बिछी सफ़ेद चादरों पर पड़ रही थी। ताईजी की 'तीये की बैठक' के लिए पूरा गाँव उमड़ पड़ा था। आँगन के बीचों-बीच एक ऊँची मेज़ पर ताईजी की तस्वीर रखी थी, जिस पर ताज़े गेंदे के फूलों का हार चढ़ा था और अगरबत्तियों का धुआँ हवा में मातम का अहसास घोल रहा था। गाँव के बुज़ुर्ग और नौजवान बारी-बारी से तस्वीर पर फूल चढ़ाकर हाथ जोड़ रहे थे।
कहने को तो यह एक शोक सभा थी, लेकिन वहाँ मौजूद हर मर्द की आँखें तस्वीर पर कम और दालान के खंभे के पास खड़ी कामिनी पर ज़्यादा टिकी थीं।
कामिनी ने आज परंपरा के अनुसार एक बहुत ही सादे, हल्के आसमानी रंग की सूती साड़ी पहनी थी। साड़ी का कपड़ा बेहद झीना और शरीर से चिपक जाने वाला था। कामिनी का वो मादक और गदराया हुआ जिस्म उस सादे पहनावे में समाने की नाकाम कोशिश कर रहा था। साड़ी के हल्के रंग ने उसके गोरे रंग को और भी ज़्यादा उभार दिया था।
कल रात रमेश की उस वहशी हरकत और अधूरी रह गई जिस्मानी आग ने कामिनी के चेहरे पर एक अजीब सी 'कामुक लाली' बिखेर दी थी। उसकी आधी झुकी हुई पलकें और भारी साँसें चीख-चीख कर उसकी उस दबी हुई तड़प की गवाही दे रही थीं। कुछ अनुभवी और मंझे हुए मर्द कामिनी की नज़रों में तैरती उस 'प्यास' को साफ़ महसूस कर पा रहे थे।

खंभे से टिक कर खड़ी कामिनी जब लंबी साँस लेती, तो उसका तंग ब्लाउज़ उसके उन विशाल और उन्नत स्तनों के भार से चरमराने लगता।
 साड़ी का पल्लू बार-बार खिसक कर उसके गोरे कन्धों की नुमाइश कर रहा था। उसकी कमर का वो गहरा घुमाव और नाभि के पास से झलकती उसकी रेशमी त्वचा वहाँ मौजूद मर्दों के सब्र का इम्तिहान ले रही थी। गाँव के जवान लड़के फूल चढ़ाने के बहाने करीब आते और कामिनी के उस भीगे-भीगे बदन की खुशबू को अपने अंदर उतारने की कोशिश करते।

वहीं दूसरी तरफ, गाँव की औरतें कामिनी को नफरत और जलन भरी नज़रों से देख रही थीं। वो आपस में कानाफूसी कर रही थीं कि "मातम के घर में भी ये शहरन अपनी जवानी की नुमाइश करने से बाज़ नहीं आ रही।"

कामिनी की मनोदशा इस वक्त बड़ी विचित्र थी। उसे ना तो ताईजी के जाने का गम सता रहा था और ना ही लोगों की नज़रों की परवाह थी। उसके दिमाग में बस बार-बार रमेश की वो नाकामी और हकीम के उस खुरदरे अंगूठे का स्पर्श घूम रहा था। उसने एक बार अपनी नज़रें घुमाईं और उसे महसूस हुआ कि पूरा आँगन उसे नहीं, बल्कि उसके अंगों को 'खा' जाने वाली नज़रों से देख रहा है।

 इस अहसास ने कामिनी के अंदर एक अजीब सा गर्व, और भी ज़्यादा उत्तेजना भर दी।
आँगन के एक कोने में बंटी खड़ा यह सब देख रहा था। वो अपनी माँ की मनोदशा को अच्छे से समझ रहा था, वाकई उसकी माँ बहुत मादक और सुंदर थी, 
अब भला ऐसी सुंदरता को कौन आँखों मे नहीं भरना चाहेगा.

उधर, भीड़ के सबसे पीछे के हिस्से में दो साये गमछा लपेटे खड़े थे, लकी और बिट्टू। उनके हाथ में फूल तो थे, लेकिन नज़रें कामिनी की उस पारदर्शी साड़ी के अंदर छिपे 'खजाने' पर गड़ी हुई थीं।
"ऐसी भीड़ मे क्या कर पाएंगे बे?" लकी फुसफुसाया.
"सब्र रख भाई, मौका आने दे " बिट्टू ने समझया.
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शोक सभा में चल रही कानाफूसी और मर्दों की ललचाई नज़रों के बीच अचानक सन्नाटा पसर गया। भीड़ के बीचों-बीच से एक ऐसा शख्स खड़ा हुआ जिसे देखते ही लोगों की गर्दनें सम्मान और डर के मारे खुद-ब-खुद झुक गईं।
60 साल की उम्र, लेकिन जिस्म किसी मंझे हुए पहलवान जैसा लोहा। साढ़े छह फिट का कद्दावर कद, सर पर खाकी रंग की भारी पगड़ी, रौबदार सफेद मूँछें जो गालों तक चढ़ी हुई थीं, और हाथ में पीतल चढ़ा हुआ मज़बूत डंडा। यह गाँव का सरपंच  'फौजा सिंह' था। 

जब फौजा सिंह के भारी जूतों की आवाज़ 'धप-धप' करती आँगन के पत्थरों पर गूँजी, तो जैसे हवा भी अपनी जगह ठहर गई।

वह धीमे लेकिन सधे हुए कदमों से चलता हुआ ताईजी की तस्वीर के पास पहुँचा। उसकी मौजूदगी इतनी प्रभावशाली थी कि खंभे के पास खड़ी कामिनी का जिस्म भी एक पल के लिए सिहर उठा।

"मैं इस गाँव का सरपंच फौजा सिंह, आप सभी गाँव वालों का स्वागत करता हूँ इस शोक सभा में," उसकी आवाज़ किसी नगाड़े की तरह भारी और गूँजने वाली थी। उसने डंडे को ज़मीन पर टिकाया और तस्वीर की ओर मुड़ गया।

"ताईजी बहुत महान महिला थीं। जब से इस गाँव में आई थीं, उन्होंने अपनी सेवा से इस मिट्टी को सींचा। गाँव की मुख्य सड़क, हैंडपंप, कुएँ... आज हम जो कुछ भी देख रहे हैं, वो सुगंधा ताईजी की ही देन है। यह गाँव उनका सदा आभारी रहेगा।"

फौजा सिंह ने एक पल का विराम लिया और कुर्सी पर बैठे हताश रमेश की ओर देखा, "रमेश जी का दुख हम समझ सकते हैं। उनकी मदद और रज़ामंदी के बिना ताईजी शायद इतना कुछ नहीं कर पातीं। मैं रमेश जी को तब से जानता हूँ जब ये पहली बार इस गाँव में नौकरी करने आए थे। ताईजी इन्हीं के साथ आई थीं और फिर यहीं की होकर रह गईं।"

फौजा सिंह ने बहुत ही सम्मान के साथ तस्वीर पर फूल अर्पित किए और रमेश के कंधे पर हाथ रखकर उसे सांत्वना दी।
वापस अपनी कुर्सी की ओर मुड़ते हुए, फौजा सिंह की निगाहें अचानक दालान में खड़ी कामिनी पर जाकर ठहर गईं।
उसने कामिनी को एक नज़र 'जी भर' कर देखा। वो नज़र कोई मामूली या छिछोरी नज़र नहीं थी, बल्कि एक पुराने शिकारी की पारखी नज़र थी। उसकी आँखों में एक अजीब सा ठहराव था, जैसे वो कामिनी के उस झीनी साड़ी में लिपटे गदराए जिस्म, उसकी आँखों की उस दबी हुई वासना और कल रात की उन 'निशानियों' को एक ही पल में पढ़ लेना चाहता हो। 

कामिनी को लगा जैसे फौजा सिंह की उन तेज़ आँखों ने उसके जिस्म से साड़ी को उतार फेंका है। फौजा सिंह के देखने मे एक अजीब सी कसमसाहट थी, एक कशिश थी।

लेकिन सरपंच एक समझदार व्यक्ति था। उसे पता था कि मातम के इस माहौल में मर्यादा की लकीर कहाँ खींचनी है। उसने समय को उचित नहीं समझा, अपनी मूँछों पर ताव दिया और भारी कदमों से वापस अपनी कुर्सी पर जाकर बैठ गया।

कामिनी का दिल ना जाने क्यों तेज़ धड़कने लगा। उसे फ़ौजा सिंह का ऐसे घूरना कुछ अजीब सा लगा, डर नहीं कह सकते,
फौजा सिंह की वो एक नज़र कामिनी की रीढ़ की हड्डी में एक ठंडी सिहरन और अनकही उत्तेजना छोड़ गई थी।

क्रमशः

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