शोक सभा का भारीपन धीरे-धीरे हवेली से कम हो रहा था। दिन के 3 बज चुके थे और गाँव की ज़्यादातर भीड़ अब अपने-अपने घरों की तरफ लौट चुकी थी। हवेली के आँगन में अब बस सफेद चादरें और बिखरे हुए फूल ही उस मातम की गवाही दे रहे थे। ताऊजी और बंटी, जो सुबह से मेहमानों को चाय-पानी पिलाने में व्यस्त थे, अब जाकर फुर्सत में आए थे।
हवेली के अंदर कामिनी, कमला काकी और गाँव की एक-दो बुजुर्ग औरतें अभी भी बैठी कुछ रस्मों की बातें कर रही थीं। फागुन और प्रमिला जूठे बर्तन और फैला हुआ सामान समेटने में लगी थीं।
बंटी को अब इस घुटन भरे माहौल में रहने की कोई इच्छा नहीं थी। सुबह की धूप और लोगों की भीड़ ने उसे थका दिया था। उसने दालान से अपना तौलिया उठाया और चुपचाप हवेली के पिछले हिस्से की तरफ बढ़ गया, जहाँ वो पुराना और गहरा 'देसी स्विमिंग पूल' (हौद) था।
"यहाँ फालतू में माथा खपाने से अच्छा है कि थोड़े गोते लगा लूँ," बंटी ने मन ही मन सोचा।
फागुन, जो आँगन की झाड़ू लगा रही थी, उसकी तीखी नज़रों ने बंटी को हवेली के पीछे उस कच्चे रास्ते पर जाते हुए देख लिया। जैसे ही बंटी की पीठ ओझल हुई, फागुन के ज़हन में कल रात वाले बंटी के वो 'बेशर्म' शब्द बिजली की तरह कौंध गए
"दिखाने का मन हो... तो कल आ जाना उसी स्विमिंग पूल में! हाहाहाहा!"
"छी.... जाए मेरी चप्पल! कैसा निर्लज्ज लड़का है," फागुन मन ही मन बुदबुदाई और झटके से अपनी झाड़ू चलाने लगी। लेकिन कहने को तो उसने उसे गाली दी थी, पर उसके चेहरे पर आई वो लाली और दिल की बढ़ती धड़कन कुछ और ही कह रही थी।
अचानक, फागुन को अपने जिस्म में एक अजीब सी लहर महसूस हुई। दोपहर की उस तपती हवा में भी उसे एक सिहरन हुई। बंटी की उस 'मादक चुनौती' ने फागुन के अंदर की सोई हुई औरत को जैसे झकझोर दिया.
उसने अनजाने में ही अपनी ओढ़नी (दुपट्टे) को अपने सीने पर कसा, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
बंटी के उन शब्दों की याद मात्र से, फागुन के वो कुंवारे और अनछुए निप्पल ना जाने क्यों पत्थर की तरह सख्त होकर उसके कुर्ते के पार उभर आए थे। वो उन उभरे हुए निप्पलों को अपनी हथेलियों से दबाना चाहती थी,
लेकिन शर्म और डर ने उसे रोक दिया। उसका पूरा बदन पसीने से भीगने लगा और उसकी जाँघों के बीच एक अनजानी सी नमी रिसने लगी।
फागुन ने एक नज़र प्रमिला की तरफ देखा, जो काम में मगन थी। फिर उसने अपनी नज़रें उस रास्ते की तरफ घुमाईं जहाँ बंटी गया था। उसके पैर खुद-ब-खुद उस तरफ बढ़ने के लिए मचल रहे थे।
"क्या वाकई जाऊँ? क्या वो सच में इंतज़ार कर रहा होगा?" फागुन के मन में युद्ध छिड़ गया था। एक तरफ उसकी गाँव की मर्यादा थी और दूसरी तरफ वो शहरी छोरा, जो उसे अपनी आँखों से पी जाने की ताक़त रखता था।
हवेली के दालान में बर्तनों के टकराने और औरतों की धीमी कानाफूसी के बीच, फागुन ने मौका ताड़ा। उसने चुपके से कमरे के कोने से अपने साफ कपड़े उठाए और उन्हें सीने से सटाकर ऐसे दबा लिया जैसे वो कोई चोरी का माल हो। सबकी नज़र बचाकर वो दबे पाँव पिछवाड़े के दरवाज़े से बाहर निकल आई।
पगडंडी पर कदम रखते ही फागुन का दिल 'धाड़-धाड़' करके ऐसे बजने लगा जैसे सीने के अंदर कोई ढोल पीट रहा हो। दोपहर की चिलचिलाती धूप में भी उसे रह-रहकर ठंडी कंपकंपी छूट रही थी।
"मैं ये क्या कर रही हूँ? फागुन... तू पागल तो नहीं हो गई?" उसने खुद को मन ही मन झिड़का।
उसके पैर कांप रहे थे। पगडंडी की धूल उसके तलवों को जला रही थी, लेकिन उसके अंदर जो आग बंटी के उन शब्दों ने लगाई थी, वो इस तपती धूप से कहीं ज़्यादा तेज़ थी।
उसकी मनोदशा इस वक्त एक ऐसे युद्ध जैसी थी जहाँ एक तरफ उसकी 'गाँव की लाज' और 'संस्कार' की दीवार थी, और दूसरी तरफ वो 'अनोखी प्यास' जिसने उसे पहली बार अपनी देह के प्रति सचेत किया था।
वो दो कदम आगे बढ़ती और फिर अचानक ठिठक कर रुक जाती। "नहीं... वापस लौट जाती हूँ। अगर किसी ने देख लिया तो क्या मुँह दिखाऊँगी?" वो पीछे मुड़कर हवेली की ऊँची दीवारों को देखती, जहाँ मर्यादा का पहरा था। लेकिन जैसे ही उसे बंटी का वो शरारती चेहरा और वो चुनौती "दिखाने का मन हो तो आ जाना" याद आती, उसके कदम खुद-ब-खुद फिर से आगे की ओर चल पड़ते।
फागुन की साँसें फूल रही थीं। उसके कुर्ते के अंदर उसके वो सख्त हो चुके निप्पल कपड़े से रगड़ खाकर उसे उत्तेजित कर रहे थे। उसे खुद पर शर्म आ रही थी कि वो एक लड़के के कहने पर इस तरह खिंची चली जा रही है, लेकिन उसी शर्म के पीछे एक बहुत ही गहरा रोमांच (Thrills) भी छिपा था। वो महसूस कर पा रही थी कि उसका कुंवारा जिस्म आज बगावत पर उतारू है।
"सिर्फ नहाने ही तो जा रही हूँ... इसमें गलत क्या है?" उसने खुद को झूठी तसल्ली दी। लेकिन झूठ तो झूठ ही होता है, वो ज्यादा देर अपना वजूद कायम नहीं रख पाता।
पगडंडी के मुड़ते ही सामने वो पुरानी चिनाई वाला 'हौद' (स्विमिंग पूल) दिखने लगा, जहाँ से पानी के गिरने की 'कल-कल' और बंटी के तैरने की आवाज़ें आ रही थीं। फागुन ने ज़ोर से अपनी आँखें बंद कीं, एक गहरी साँस ली और अपने दुपट्टे को कसकर लपेटते हुए उस अंतिम मोड़ की तरफ बढ़ गई। उसका जिस्म पसीने से भीग चुका था और मन में अब सिर्फ एक ही धुन थी बंटी से सामना।
हौद के पास पहुँचते ही फागुन की धड़कनें बेकाबू हो गईं। पानी की ठंडी फुहारें हवा में उड़ रही थीं, लेकिन फागुन का चेहरा धूप और शर्म की तपिश से दहक रहा था। जैसे ही उसने हौद के किनारे कदम रखा, बंटी ने पानी के बीचों-बीच से अपना सिर ऊपर उठाया। उसके भीगे बाल माथे पर चिपके थे और बदन पर पानी की बूंदें सूरज की रोशनी में मोती की तरह चमक रही थीं।
बंटी ने फागुन को देखते ही एक कातिलाना मुस्कान के साथ उसे 'आँख' मार दी।
"मुझे पता था तुम आओगी," बंटी की आवाज़ में एक अजीब सा आत्मविश्वास और शरारत थी।
फागुन ने झटके से अपनी नज़रें चुराईं, लेकिन उसका दिल तेज़ धड़कने लगा। "मेरी जगह है, मेरी मर्ज़ी... मैं हमेशा यहीं आती हूँ। तुमने ही कब्ज़ा कर रखा है मेरी जगह पर," फागुन ने अपनी उखड़ती साँसों को जैसे-तैसे काबू में करते हुए जवाब दिया।
उसकी आवाज़ में कड़वाहट नहीं थी, बल्कि एक अनजानी सी नरमी थी।
"अच्छा! तुम्हारी कैसे हो गई? जो पहले आया, जगह उसकी हुई," बंटी ने 'छप' से पानी के अंदर गोता लगाया और फिर से बाहर आया। ठंडे पानी के मजे लेते हुए उसने अपने भीगे बदन को झटक दिया, जिससे पानी की कुछ बूंदें फागुन के चेहरे पर जा गिरीं।
"शहरी लोग ऐसे ही होते हैं क्या? हम जैसे भोले-भाले गाँव वालों की जगह पर कब्ज़ा जमा लेते हैं," फागुन हौद के बिल्कुल किनारे पर आ गई। उसका मन कह रहा था कि भाग जाए, लेकिन उसके पैर ज़मीन में गड़ गए।
"तुम जैसी लड़की हो, तो कब्ज़ा करने में क्या समस्या है?" बंटी अब पूरी तरह 'फुल फॉर्म' में था। फागुन का यहाँ आना उसकी जीत का सबसे बड़ा सबूत था। उसने फागुन के कांपते हुए वजूद को अपनी नज़रों से जैसे टटोलना शुरू कर दिया।
फागुन एक पल के लिए बंटी का गोरा, कसा हुआ और पानी से भीगा हुआ मर्दाना जिस्म देख कर पूरी तरह सकपका गई। उसने आज से पहले किसी मर्द को इतने करीब से और इस तरह नहीं देखा था। उसके जिस्म की नसों में एक बिजली सी दौड़ने लगी। उसने एक गहरी साँस ली और अपना बनावटी गुस्सा बरकरार रखते हुए बोली
"नहाने आई हूँ, तुम्हारे कहने से नहीं आई।"
"तो नहाओ! रोका किसने है? पानी तुम्हारा है, मर्जी तुम्हारी है," बंटी ने एक और डुबकी लगाई और वहीं किनारे की तरफ तैरने लगा।
फागुन ने अपने साथ लाए हुए साफ़ कपड़े एक तरफ पत्थर पर रखे। उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि वो बंटी के सामने उस गहरे हौद में उतरे। उसने वहीं किनारे पर रखी बाल्टी को हौद में डाला और पानी भरकर बाहर निकाल लिया और उकड़ूँ (घुटनों के बल) बैठ गई,
मग्गा भरकर खुद पर डालने ही वाली थी कि...
"तुम्हारे यहाँ कपड़े पहनकर ही नहाते हैं क्या?" बंटी पानी से आधा बाहर निकलकर बिल्कुल उस किनारे पर आ लगा, जहाँ फागुन उकड़ूँ बैठी थी।
बंटी के ये शब्द फागुन के कानों में गरम सीसे की तरह उतरे। फागुन जिस अंदाज़ में बैठी थी, उसके घुटने उसके सीने से सटे हुए थे, जिससे उसका वो सादा कुर्ता और भी ज़्यादा खिंच गया। उकड़ूँ बैठने की वजह से उसके 'मुलायम दूध जैसे सफेद' और उन्नत स्तन पूरी तरह से बाहर की ओर उभर आए थे।
कुर्ते के गले से स्तनों का भारी उभार और गोरी घाटी बंटी की आँखों के ठीक सामने थी।
बंटी की प्यासी नज़रें अब फागुन के मासूम लेकिन उत्तेजक उभारों पर जाकर जम गई। फागुन ने मग्गा तो उठा रखा था, लेकिन वो उसे अपने ऊपर डालना भूल गई।
वो बस बंटी की आँखों की गहराई में डूबती जा रही थी, जो उसके जिस्म को बिना छुए ही सहला रही थीं।
फागुन के चेहरे पर एक ऐसी चमक थी जो शायद उसने खुद भी पहले कभी महसूस नहीं की थी।
"मैं यहाँ अकेली ही नहाती थी आज तक... अपनी मर्ज़ी से, पूरी आज़ादी से," फागुन चहक उठी। उसकी आवाज़ में आज़ादी की खनक थी जिसे वो सबकी नजरों से, बंदिशों से दूर यहाँ महसूस किया करती थी,
"तो अब किसने रोका है? अब भी नहाओ अपनी उसी आज़ादी से," बंटी ने उसे और करीब से देखते हुए उकसाया। उसकी आवाज़ में एक ऐसी खनक थी जो फागुन के मन के दरवाज़े खोल रही थी।
"वो... वो.. अक.... बंटी..." फागुन कसमसा रही थी। उसके हाथ अपने कुर्ते के किनारों को मरोड़ रहे थे। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो इस शहरी छोरे की बातों में बह रही है या अपनी ही दबी हुई इच्छाओं के पीछे जा रही है।
"बताओ ना फागुन... कैसे नहाती हो तुम यहाँ?" बंटी ने बड़े मासूम अंदाज़ में पूछा, जैसे वो सच में कुछ नहीं जानता।
"जैसे... जैसे सब नहाते हैं... नंगे... कपड़े खोल कर..." ईस्स्स्स....! इतना बोलते ही फागुन को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने झटके से अपने दाँतों तले होंठ दबा लिए। उसका चेहरा उस दोपहर की धूप से भी ज़्यादा लाल हो गया था।
बंटी ने एक गहरी साँस ली और उसे समझाते हुए बोला, "फागुन, अपनी आज़ादी को कभी किसी के लिए कुर्बान नहीं करना चाहिए। जो तुम हो, वैसे ही रहो। मैं आ गया तो क्या तुम अपनी फितरत, अपनी आज़ादी भूल जाओगी? क्या मेरा यहाँ होने से तुम्हारी आज़ादी ख़त्म हो गई?"
बंटी इस वक्त फागुन के दिमाग से खेल रहा था। वो जानता था कि फागुन के अंदर की औरत अब बाहर आने को बेताब है।
"लल्ल... लेकिन तुम... तुम्हारे सामने?" फागुन ने कांपती आवाज़ में पूछा।
"अरे... अच्छा! ये लो, मैं पलट जाता हूँ। तुम अपने कपड़े उतार कर चुपचाप पानी के अंदर आ जाना। मुझे भला क्या दिखने वाला है? और वैसे भी, अगर कुछ दिख गया तो अपनी आँखें फोड़ लूँगा ना," बंटी ने हंसते हुए अपनी पीठ फागुन की तरफ कर ली।
फागुन खिलखिलाकर हँस पड़ी। ऐसा मज़ाक, ऐसी शरारत, ऐसा बचपना उसने अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी नहीं जिया था।
आज से पहले उस से ऐसी बात करने वाला था ही कौन?
बंटी की बातें उसे मदहोश कर रही थीं, उसे वो सब करने के लिए उकसा रही थीं जो उसने कभी सपनों में भी नहीं सोचा था। बंटी की वो 'आँखें फोड़ लेने' वाली बात ने उसे एक ऐसी सुरक्षा का अहसास दिया जिसने उसकी बची-खुची झिझक भी खत्म कर दी।
"अच्छा बाबा! आती हूँ... रुको..." फागुन ने एक गहरी साँस ली और बंटी की तरफ पीठ करके खड़ी हो गई।
सन्नाटे के बीच केवल पानी के गिरने की आवाज़ आ रही थी।
फागुन के कांपते हाथों ने अपने कुर्ते के निचले हिस्से को पकड़ा और उसे धीरे-धीरे ऊपर की तरफ उठाना शुरू किया। जैसे ही कुर्ते का घेरा उसकी कमर से ऊपर चढ़ा, उसकी मखमली और चिकनी कमर चाँदनी जैसी चमकने लगी।
फागुन ने एक झटके में कुर्ता अपने गले के रास्ते बाहर निकाल दिया।
उउउफ्फफ्फ्फ़....!
बंटी ने अपनी गर्दन नहीं घुमाई थी, लेकिन उसकी कल्पना शक्ति फागुन के नग्न बदन की तस्वीर उसके दिमाग़ में उतार रही थी। फागुन की दूध जैसी चमकती, बेदाग़ और चिकनी पीठ तपती धूप के सामने बेपर्दा थी। उसकी रीढ़ की हड्डी का हल्का सा घुमाव और कमर की ढलान किसी नक्काशीदार मूरत जैसी लग रही थी।
हवा का एक झोंका फागुन की नंगी पीठ से टकराया, तो उसके रोंगटे खड़े हो गए। उसने अपने कांपते हाथों से अपने दोनों स्तनों को धक लिया,
बंटी का लंड उसके हाफ-पैंट के अंदर इस कदर तन चुका था कि उसे अपना पैंट फटने जैसा महसूस हो रहा था, लेकिन वो उस 'बारीक रेखा' का इंतज़ार कर रहा था जिसे फागुन अब बस लांघने ही वाली थी।
'चप... छप...छपाक...' की आवाज़ उस सन्नाटे में किसी संगीत की तरह गूँजी। फागुन हौद की सीढ़ियों से उतरकर ठंडे पानी के अंदर समा चुकी थी। पानी के बर्फीले स्पर्श ने उसके दहकते हुए जिस्म में एक ज़ोरदार सिहरन पैदा कर दी। उसके गुलाबी होंठ ठंड और अनजानी घबराहट के मारे कांप रहे थे।
फागुन ने पानी के अंदर जाते ही फुर्ती दिखाई और जल्दी से घुटनों के बल बैठ गई, ताकि पानी का घेरा उसकी छाती से ऊपर तक आ जाए। उसने पानी के भीतर ही अपने दोनों हाथों से अपने उन कुंवारे और कोमल स्तनों को कसकर ढक लिया था, जैसे वो अब भी अपनी लाज को पारदर्शी पानी से बचाने की नाकाम कोशिश कर रही हो।
"बंटी.... आ... आ गई मैं," फागुन की आवाज़ में एक अजीब सी उत्तेजना और थरथराहट थी। उसकी आवाज़ उस हौद की दीवारों से टकराकर गूँज उठी।
आज फागुन ने अपने जीवन की उस दूसरी सीढ़ी पर पैर रख दिया था, वो जवानी की सीढ़ी, जिस पर अगर एक बार कदम पड़ जाए, तो वापस उतरना नामुमकिन होता है। औरत बनने कि तरफ पहला कदम.
बंटी ने जैसे ही फागुन की आवाज़ सुनी, वो झटके से पलट गया।
"उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़.... Wow....
बंटी की आँखें फटी की फटी रह गईं। पानी की सतह पर फागुन का मासूम चेहरा, भीगे हुए बाल जो गालों से चिपके थे, और पानी के ठीक नीचे झलकता उसका गोरा बदन... बंटी के लिए यह नज़ारा किसी जन्नत से कम नहीं था।
धूप की किरणें पानी के अंदर छनकर फागुन की त्वचा पर पड़ रही थीं, जिससे वो और भी दूधिया और हसीन लग रही थी।
"कितनी सुंदर लग रही हो फागुन... बिल्कुल जलपरी जैसी," बंटी ने अपनी हथेलियों में पानी भरा और एक मज़ेदार फव्वारा बनाकर फागुन के चेहरे पर दे मारा।
फागुन ने अपनी आँखें सिकोड़ लीं और मुस्कुरा दी। पानी की बूंदें उसके चेहरे से फिसलकर उसके होंठों तक जा पहुँचीं।
"देखा! मैंने कहा था ना कि अपनी आज़ादी को कैद मत करो। कितना आसान था ये सब," बंटी अब धीरे-धीरे पानी के अंदर ही फागुन की तरफ बढ़ने लगा। पानी की लहरें उनके बीच एक अनकही गुदगुदी पैदा कर रही थीं।
फागुन ने महसूस किया कि बंटी के करीब आते ही पानी की गर्मी बढ़ने लगी है। वो अब भी अपने स्तनों को छुपाए हुए थी, लेकिन उसकी आँखों में अब डर नहीं, बल्कि एक गहरा आकर्षण था। बंटी का गोरा और चौड़ा सीना अब उसके बिल्कुल सामने था। बंटी ने रुककर फागुन की आँखों में झाँका और एक हाथ पानी के नीचे ले जाकर फागुन के घुटने के पास की लहरों को सहलाया।
"अब लग रहा है कि तुम वाकई आज़ाद हो गई हो," बंटी ने धीमी आवाज़ में कहा,
हौद के शांत पानी में बंटी के शब्द किसी ठहरे हुए तालाब में कंकड़ की तरह गिरे, जिसने फागुन के मन में हलचल मचा दी। बंटी की वो कल रात वाली बात
"तुम अपने दिखा देती तो ऐसी नौबत ही नहीं आती" हवा में फिर से तैरने लगी थी।
"तो... अब दिखा रही हो ना अपने ये...?" बंटी ने बड़ी ही बेशर्मी और शरारत से पानी के अंदर छिपे फागुन के उन उभारों की तरफ इशारा किया। उसकी नज़रों में एक ऐसी आग थी जो पानी की ठंडक को भी मात दे रही थी।
"क्या...? तुम... छी! अभी भी वही बात?" फागुन का चेहरा शर्म से सुर्ख लाल हो गया, लेकिन उसके लहजे में वो गुस्सा अब सिर्फ एक दिखावा था। उसका मन अब बंटी की ढिठाई का कायल होने लगा था।
"अच्छा बाबा, मत दिखाओ... वो प्रमिला तो आती ही होगी दिखाने, उसे तो बस बहाना चाहिए," बंटी ने बड़ी चतुराई से फागुन की दुखती नस, उसकी जलन, को फिर से छेड़ दिया।
प्रमिला का नाम सुनते ही फागुन के अंदर जैसे कुछ टूट गया। एक तरफ शर्म की गहरी खाई थी और दूसरी तरफ प्रमिला से आगे निकलने की वो अनकही होड़।
उसका दिल 'धाड़-धाड़' करके सीने की पसलियों से टकरा रहा था। उत्तेजना की एक ऐसी लहर दौड़ी कि पानी के भीतर भी उसके रोंगटे खड़े हो गए।
"कहा ना... देखने के बाद अपनी आँखें फोड़ लूँगा," बंटी ने बड़ा ही मासूम और रुआँसा सा मुँह बनाया, जैसे वो वाकई फागुन के हुस्न की खातिर अपनी आँखों का बलिदान देने को तैयार बैठा हो।
"बदमाश...!" फागुन खिलखिलाकर हँस पड़ी। बंटी की इस अदा ने उसकी आखिरी हिचकिचाहट भी बहा दी।
फागुन की नज़रें धीरे-धीरे झुकती गईं, लेकिन उसके पैर पानी के नीचे की ज़मीन पर मज़बूती से टिकने लगे।
उसने एक लंबी और गहरी साँस ली और धीरे-धीरे पानी में खड़ी होने लगी। जैसे-जैसे वो ऊपर उठ रही थी, पानी की परत उसकी छाती से नीचे खिसकने लगी।
बंटी की आँखें और मुँह दोनों धीरे-धीरे खुलते चले गए। वो सन्न रह गया।
सूरज की सुनहरी रोशनी जब फागुन के भीगे बदन पर पड़ी, तो नज़ारा किसी स्वर्गीय अप्सरा जैसा था। पानी की बूंदें उसके गोरे और मखमली जिस्म पर मोती की तरह फिसल रही थीं। और फिर... बंटी के सामने फागुन के वो सुडौल, कड़क और तने हुए स्तन पूरी तरह उजागर हो गए।
फागुन की जवानी अपने पूरे उफ़ान पर थी। उसके स्तन आकार में बड़े और गदराए हुए थे, जो कुँवारेपन के कसाब की वजह से बिल्कुल ऊपर की तरफ तने हुए थे। पानी की ठंडक ने अपना जादू दिखाया था, उसके निप्पल, जो किसी छोटी सुपारी की तरह सख़्त और नुकीले हो गए थे, अब उन गोरे गोलों के बीच किसी तीखी कील की तरह तन कर बंटी को चुनौती दे रहे थे।
उन स्तनों की सफेदी दूध जैसी थी और पानी की बूंदें उनके बीच की उस गहरी और तंग घाटी में जाकर सिमट रही थीं।
फागुन ने अपने दोनों हाथ खोल दिए। उसका सीना गर्व और उत्तेजना से फूल रहा था। उसके शरीर का वो बेदाग और चिकना हिस्साq कामिनी के हुस्न से अलग, एक कुँवारी ताज़गी और कसाब से भरा था।
बंटी ने ऐसा कुछ पहले कभी नहीं देखा था, इतने कड़क, इतने सुडौल और इतने निखरे हुए अंग!
फागुन ने नज़रें झुकाए हुए ही बंटी के चेहरे की वो हैरानी और हवस देखी, जिसने उसे एक अनूठा सुकून दिया। वो आज वाकई आज़ाद थी,
हौद का पानी अब जैसे शांत हो चुका था, लेकिन उन दोनों के जिस्मों के भीतर एक तूफ़ान सर उठा रहा था। फागुन का वो दूध जैसा धवल और कड़ा जिस्म पानी की सतह से ऊपर किसी मूरत की तरह चमक रहा था। बंटी की निगाहें उन तने हुए स्तनों पर ऐसी गड़ी थीं कि जैसे वो उन्हें अपनी नज़रों से ही पी जाना चाहता हो।
"आँखें... आँखें फोड़नी थी ना तुम्हें?" फागुन ने बहुत ही धीमी और कांपती हुई आवाज़ में कहा। उसकी पलकें झुकी हुई थीं और भारी स्तनों का उभार उसकी हर आती-जाती साँस के साथ ऊपर-नीचे हो रहा था।
"अब इन आँखों का क्या करूँ फागुन... इन्होंने जन्नत देख ली है," बंटी ने फुसफुसाते हुए कहा। वह धीरे-धीरे पानी के अंदर ही फागुन की ओर बढ़ने लगा। पानी की हल्की लहरें फागुन की कमर से टकराकर उन गोरे गोलों के निचले हिस्से को चूम रही थीं।
बंटी अब फागुन के इतना करीब था कि उन दोनों की साँसें एक-दूसरे के चेहरों पर टकरा रही थीं। फागुन का पूरा वजूद किसी सूखी टहनी की तरह कांप रहा था। बंटी ने अपने भीगे हुए हाथ पानी से बाहर निकाले।
फागुन ने डर के मारे अपनी आँखें मूँद लीं, लेकिन भागने की कोशिश नहीं की। उसे उस स्पर्श का इंतज़ार था जो उसे एक औरत होने का पूर्ण अहसास कराने वाला था।
बंटी के हाथ धीरे-धीरे दूधिया और कड़क स्तनों की ओर बढ़े। अभी उँगलियों ने जिस्म को छुआ भी नहीं था, लेकिन फागुन को बंटी के हाथों की तपिश अपने ठंडे पड़ते निप्पलों पर महसूस होने लगी। बंटी ने अपनी कांपती हुई तर्जनी उंगली (Index finger) फागुन के दाएँ स्तन के नुकीले और सख़्त हो चुके निप्पल के पास ले जाकर रोक दी।
"बंटी... उउउफ्फफ्फ़...." फागुन के मुँह से एक मदहोश सिसकी निकली।
अगले ही पल, बंटी ने बड़ी कोमलता से उस सख़्त निप्पल को अपनी दो उँगलियों के बीच लेकर हल्का सा सहला दिया।
फागुन के बदन में जैसे बिजली का एक तेज़ करंट दौड़ गया। उसके रोंगटे खड़े हो गए और उसका सिर पीछे की ओर लटक गया। बंटी का स्पर्श किसी आग की तरह था जिसने फागुन के कुंवारेपन की सारी बर्फ़ को पिघला दिया।
बंटी अपनी हथेलियों को उन भारी गोलों पर ले आया। उसने कड़क और तने हुए स्तनों को नीचे से सहारा दिया और बहुत ही नरमी से उन्हें ऊपर की ओर उठा कर हल्का सा भींचा।
"ईस्स्स्स.... अअअअअहहहह...." फागुन की जाँघें पानी के अंदर एक-दूसरे से रगड़ खाने लगीं। बंटी की हथेलियों का मर्दाना कसाब फागुन के लिए नया और बेहद सुखद था। उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे उसके सीने के अंदर कैद सारा दूध उन उँगलियों के दबाव से बाहर आ जाना चाहता हो।
बंटी ने अब अपने अंगूठे से उन दोनों सख़्त निप्पलों को एक साथ रगड़ना शुरू किया। फागुन की साँसें अब बेकाबू थीं, उसके हाथ अनजाने में ही बंटी के मज़बूत कंधों पर जा टिके और उसने बंटी को अपनी ओर खींच लिया। फागुन के कड़क और सख़्त स्तन बंटी के सीने में धँस गए,
हौद का पानी उन दोनों की जिस्मानी गर्मी से जैसे खौलने लगा था। बंटी की हथेलियों में दबे फागुन के तने हुए स्तन उसकी हर साँस के साथ और भी सख्त होते जा रहे थे। फागुन का सिर पीछे की ओर झुका हुआ था और उसकी आँखें आधी खुली, मदहोशी में डूबी थीं।
बंटी ने अपने हाथों का दबाव थोड़ा और बढ़ाया और फागुन के उन दूधिया गोलों को बेदर्दी से भींच दिया।
"आआआहहह... बंटी...!" फागुन के मुँह से एक ऐसी आह निकली जो हवा में घुल गई।
बंटी अब और सब्र नहीं कर सका। उसने फागुन की कमर को अपने एक हाथ से घेरा और उसे झटके से अपनी ओर खींच लिया। फागुन का भीगा, नग्न सीना बंटी के मज़बूत और चौड़े सीने से जा टकराया। उन दोनों के बीच अब हवा की भी जगह नहीं बची थी। बंटी ने फागुन की ठुड्डी को अपने हाथ से ऊपर उठाया। फागुन के गुलाबी होंठ कांप रहे थे, उन पर पानी की बूंदें किसी मोती की तरह चमक रही थीं।
बंटी धीरे-धीरे फागुन के करीब आया। फागुन ने डर के मारे अपनी आँखें मूँद लीं, लेकिन उसका चेहरा बंटी की तरफ ही झुका रहा। अगले ही पल, बंटी के गर्म होंठ फागुन के उन कुंवारे और नाज़ुक होंठों पर जम गए।
ईस्स्स्स.....!
फागुन के जिस्म में जैसे हज़ारों वोल्ट का करंट दौड़ गया। यह उसकी ज़िंदगी का पहला 'किस' था। बंटी के होंठों का वो मर्दाना कसाब, मर्दाना महक का मिला-जुला स्वाद फागुन के अंदर एक अजीब सा नशा घोलने लगा।
बंटी ने बड़ी कोमलता से फागुन के नीचे वाले होंठ को अपने दाँतों के बीच दबाया और उसे चूसने लगा।
फागुन पहले तो जड़ हो गई, लेकिन फिर उसकी दबी हुई वासना ने अंगड़ाई ली। उसने बंटी के गले में अपनी बाहें डाल दीं और खुद भी बंटी के होंठों का जवाब देने लगी। उसकी जीभ पहली बार किसी मर्द के मुँह के जायके से वाकिफ हो रही थी।
उधर, बंटी के हाथ रुके नहीं थे। किस के साथ-साथ उसके हाथ फागुन के भारी स्तनों को मरोड़ने में लगे थे। वो अपनी उँगलियों से उन सख़्त निप्पलों को मरोड़ता, उन्हें अपनी हथेलियों में भरता और फिर झटके से उन्हें ऊपर की ओर धकेलता।
फागुन के मुँह से निकलने वाली सिसकियाँ अब बंटी के मुँह के अंदर ही दफ़्न हो रही थीं।
पानी के नीचे उन दोनों के बदन एक-दूसरे से बुरी तरह रगड़ खा रहे थे। फागुन को महसूस हो रहा था कि बंटी का सख़्त लंड उसकी लेगी के पार उसकी जाँघों के बीच अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है। बंटी का वहशीपन और फागुन की पहली प्यास मिलकर उस हौद को एक कामुक रणभूमि बना चुके थे।
फागुन ने मदहोशी में बंटी के बालों को अपनी उँगलियों में जकड़ लिया। उसे ऐसा लग रहा था जैसे वो पिघलकर बंटी के अंदर ही समा जाएगी। उसके दूध जैसे सफ़ेद स्तन बंटी के सीने पर घिस रहे थे, जिससे फागुन की उत्तेजना अब उस मोड़ पर पहुँच गई थी जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था।
फागुन का गोरा बदन तवे की तरह तप रहा था। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि उसके साथ क्या हो रहा है। उसके पैरों के तलवों से लेकर सिर के बालों तक एक अजीब सी झनझनाहट दौड़ रही थी। जैसे-जैसे बंटी का हाथ उसके स्तनों पर अपनी पकड़ मज़बूत कर रहा था, फागुन की नाभि के नीचे एक गर्म लावा उबलने लगा। उसकी कुँवारी जाँघें पानी के अंदर एक-दूसरे को बुरी तरह भींच रही थीं।
तभी बंटी ने फागुन की आँखों में देखते हुए उसके एक सख़्त और तने हुए निप्पल को अपनी दो उँगलियों के बीच पकड़ा और उसे कस के घुमा दिया.
"आआआह्हः..... बंटी.... आआहहहह..... ईईस्स्स्स....!!"
फागुन के मुँह से एक ऐसी चीख निकली जो आधे रास्ते में ही सिसकी बन गई। यह वो लम्हा था जहाँ फागुन की अनछुए जवानी ने पूरी तरह घुटने टेक दिए। उत्तेजना का वो पहाड़, जो पिछले कई मिनटों से उसके अंदर खड़ा हो रहा था, अचानक एक झटके के साथ ढह गया।
फागुन की नसों में बिजली दौड़ गई और उसका पूरा जिस्म पानी के अंदर बुरी तरह कांपने लगा। उसकी नाज़ुक और रसीली चुत से उत्तेजना का गरम, गाढ़ा और चिपचिपा रस एक सैलाब की तरह बह निकला।
फागुन अपनी ज़िंदगी में पहली बार 'झड़' गई थी।
उसकी जाँघों के बीच से निकलता वासना का रस पानी की लहरों में मिलकर ओझल हो गया, लेकिन उसकी हरारत फागुन को अंदर तक महसूस हुई।
अगले ही पल, फागुन के शरीर की सारी ताकत जैसे खत्म हो गई। वो बंटी के मज़बूत कंधों पर लगभग झूल गई, जैसे उसके जिस्म में एक भी हड्डी ना बची हो। उसने अपनी बाहें बंटी के गले में डाल दीं और उसे इतनी शिद्दत से गले लगाया जैसे वो डूब रही हो और बंटी उसका इकलौता सहारा हो।
उसके भारी, भीगे और अभी-अभी मसले गए लाल स्तन बंटी के सीने में धँसे हुए थे और उनकी धड़कनें एक-दूसरे में समा रही थीं। फागुन की गरम साँसें बंटी की गर्दन पर लग रही थीं। कुछ देर पहले जो लड़की चहक रही थी, अब वो बेदम होकर बंटी की बाहों में अपनी पहली तृप्ति का सुकून ले रही थी।
"बंटी... ये... ये क्या हो गया मुझे?" फागुन ने बहुत ही धीमी, मरियल सी आवाज़ में बंटी के कान के पास फुसफुसाया। उसे अपनी इस नई हालत से जितनी हैरानी थी, उतना ही उसे बंटी पर प्यार आ रहा था।
ना जाने कितने समय तक दोनों ठन्डे पानी मे एक दूसरे कि बाहो मे समाये रहे.
***************
सूरज अब पहाड़ियों के पीछे धीरे-धीरे ओझल हो रहा था, और आसमान का रंग गहरा केसरिया और सिंदूरी हो चुका था।
बंटी और फागुन कच्ची पगडंडी पर साथ-साथ चल रहे थे। फागुन ने अपनी ओढ़नी को आज कुछ ज़्यादा ही कसकर अपने सीने पर लपेट रखा था, जैसे वो उन अनछुए और अभी-अभी महके अहसासों को दुनिया की नज़रों से छुपा लेना चाहती हो।
उसके भीगे बाल अभी भी गर्दन पर चिपके थे और उसका चेहरा शर्म की उस लाली से दहक रहा था, जो केवल पहली तृप्ति के बाद आती है। वो अपनी नज़रें ज़मीन पर गड़ाए चल रही थी, रह-रहकर अपने होंठों को दाँतों तले दबा लेती, शायद बंटी के उस पहले चुंबन का स्वाद अब भी वहीं कहीं ठहर गया था।
बंटी चुपचाप उसके बगल में चल रहा था। उसके चेहरे पर एक गहरी शांति और विजय की मुस्कान थी। उसने कुछ कहा नहीं, बस तिरछी नज़रों से फागुन के उस मासूम और अब बदले-बदले से दिख रहे चेहरे को निहारता रहा।
प्यार वाकई ऐसा ही होता है "खामोश और रूहानी"। जब रूहें एक-दूसरे से मिल लेती हैं, तो शब्दों की भारी भीड़ बेमानी लगने लगती है।
इस वक्त उन दोनों के बीच एक ऐसा अदृश्य धागा खिंच चुका था, जिसने फागुन की गाँव वाली सादगी और बंटी के शहरी अल्हड़पन को एक ही गाँठ में बाँध दिया था।
शाम की ठंडी हवा अब तेज़ होने लगी थी। वह हवा खेतों की महक लेकर आ रही थी और इन दो प्रेमियों की पहली 'मिलन बेला' की गवाह बन रही थी।
क्षितिज पर ढलता हुआ सुर्ख सूरज जैसे उनकी इस नई शुरुआत पर अपनी सुनहरी मोहर लगा रहा था। पगडंडी की धूल पर पड़ते उनके कदम अब सिर्फ घर की तरफ नहीं बढ़ रहे थे, बल्कि एक ऐसी मंज़िल की ओर जा रहे थे जहाँ जिस्म की प्यास और रूह का सुकून एक होने वाला था।
फागुन ने चलते-चलते एक बार पलटकर उस हौद की तरफ देखा जो अब धुंधलके में छिप रहा था। उसने एक लंबी साँस ली और अपनी चाल थोड़ी तेज़ कर दी। बंटी ने मुस्कुराते हुए उसका साथ दिया। उन्हें पता था कि हवेली की दहलीज लांघते ही फिर से वही बंदिशें और वही सन्नाटा होगा, लेकिन उनके भीतर अब एक ऐसी आग सुलग चुकी थी जो किसी भी तूफान से बुझने वाली नहीं थी।
मिलन की यह बेला वाकई खास थी, एक ऐसी शाम, जिसने फागुन को लड़की से औरत और बंटी को एक मुकम्मल प्रेमी बना दिया था।
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साल 1990 | मध्य रात्रि
सन्नाटे को चीरती हुई आवाज़ गूँजी धड़.. धाड़.. धाड़.....!
गाँव के दूसरे छोर पर खड़ी फौजा सिंह की हवेली का भारी दरवाज़ा कोई पागलपन की हद तक पीट रहा था।
"फौजा सिंह... धाड़.. धाड़... फौजा सिंह दरवाज़ा खोलो जल्दी!" सुगंधा (ताईजी ) की आवाज़ में मौत का खौफ और बदहवासी घुली हुई थी।
"चह्ह्ह्हरररररर.....'करता हुआ भारी दरवाज़ा खुला।
"सुगंधा! तू... इतनी रात को?" दरवाज़े पर 40 साल का जवान और कद्दावर फौजा सिंह खड़ा था। बदन पर सिर्फ एक सफ़ेद धोती, कंधे तक चौड़ा सीना, लोहे जैसी फड़कती हुई बाजुएँ और काली रोबदार मूँछें। फौजा सिंह को देखते ही सुगंधा जैसे टूट गई। वो लगभग दौड़ती हुई फौजा के मज़बूत सीने से जा लगी।
"क्या हुआ... अंदर चल," फौजा ने उसे सहारा दिया और उसकी गोद में लिपटे हुए एक नन्हे बच्चे को देखकर चौंक गया, "और ये... ये बच्चा किसका है?"
हवेली के अंदर की मद्धम रोशनी में सुगंधा ने रोते हुए वो खौफनाक दास्ताँ सुनाई।
" रमेश से बहुत बड़ी गलती हो गई। नशे, जुनून में उसने राघव और उसकी पत्नी की जान ले ली। मै जैसे तैसे इस मासूम बच्चे को लेकर भाग आई, ये राघव का बच्चा है फौजा... इसे बचा लो, सुगंधा गिड़गिड़ाई।
फौजा सिंह, जो अभी-अभी गाँव का सरपंच बना था और जिसकी धाक से पूरा इलाका कांपता था, सन्न रह गया। गाँव वाले उसे 'बाल ब्रह्मचारी' समझते थे, जो औरतों से दूर रहता था। लेकिन ये सच महज़ एक पर्दा था। फौजा सिंह का ब्रह्मचर्य तो उसी दिन धुआँ हो गया था जब सुगंधा ने पहली बार इस गाँव में कदम रखा था।
उसे याद आई वो बारिश की एक शाम, जब बिजली कड़क रही थी और हवेली की छत टपक रही थी। उस दिन सुगंधा के भीगे बदन और फौजा की दबी हुई मर्दानगी का जो मिलन हुआ, उसने रूह और जिस्म के सारे बंधन तोड़ दिए थे। वो जिस्मानी भूख अब एक अटूट, लेकिन गुप्त प्यार में बदल चुकी थी।
फ़ौजा सिंह और सुगंधा दोनों जन्मोजन्म के प्रेमी थे.
अतीत की उन यादों में खोया हुआ 60 साल का फौजा सिंह आज भी अपनी कुर्सी पर बैठा था। हाथ में दारू का गिलास लिए और आँखों में ताईजी (सुगंधा) की मौत का गहरा गम। उसकी बूढ़ी लेकिन ताकतवर आँखों में आज नमी थी।
तभी...
धाड़.... धाड़... धाड़.....!
उसकी हवेली का दरवाज़ा फिर से बेरहमी से बज उठा। फौजा सिंह चौंक गया। अतीत की आवाज़ अचानक वर्तमान की हकीकत बन गई थी।
"लगता है आ गया?" फौजा सिंह ने अपनी आवाज़ को सँभाला, जिसमें अभी भी वही पुरानी कड़वाहट और रौब था। उसने अपनी मूँछों पर ताव दिया और डंडा उठा लिया।
फौजा सिंह की हवेली का भारी दरवाज़ा खुला, तो सामने कोई बदहवास औरत नहीं, बल्कि लड़खड़ाता हुआ रमेश खड़ा था। उसके ठीक पीछे एक लम्बा-चौड़ा शख्स था, जिसने अपने मुँह को किसी औरत के दुपट्टे की तरह कपड़े से पूरी तरह ढँक रखा था।
"आओ अंदर... तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहा था," फौजा सिंह ने अपनी भारी आवाज़ में कहा और बिना पीछे मुड़े हवेली के अंदरुनी कमरे की तरफ बढ़ गया। उसके चलने में वही सरपंच वाला रौब था।
पीछे-पीछे रमेश और वो रहस्यमयी शख्स भी अंदर दाखिल हुए। कमरे में मद्धम रोशनी थी और चारों तरफ पुरानी लकड़ी और पुरानी शराब की गंध फैली थी।
"अबे! अब तो ये औरतों वाला दुपट्टा हटा ले शमशेर," रमेश ने चिढ़ते हुए और मज़ाक उड़ाते हुए अपने साथी की तरफ देखा।
शमशेर ने झटके से अपने मुँह से कपड़ा हटाया और एक गहरी साँस ली। "अबे! छुप के आना पड़ता है। कभी किसी गाँव वाले ने इस भेष में देख लिया या पहचान लिया, तो लेने के देने पड़ जाएँगे। पुलिस और प्रशासन की नज़रों में मैं इस इलाके में हूँ ही नहीं," शमशेर ने अपनी तीखी आँखों को नचाते हुए कहा।
तीनों सोफे पर बैठ गए। शमशेर ने फुर्ती से मेज़ पर रखी बोतल खोली और तीन गिलासों में शराब उड़ेलनी शुरू की। पानी की जगह सोडा मिलते ही सोडा की सनसनाहट कमरे के सन्नाटे को तोड़ने लगी।
फौजा सिंह ने झुककर सोफे के नीचे से एक काला चमड़े का बैग निकाला और उसे रमेश की तरफ खिसका दिया। "लो भाई रमेश... अब से तुम ही संभालो ये सब। सुगंधा चली गई, तो मतलब ये अब तुम्हारा हिस्सा है।"
रमेश की आँखों में शराब के नशे के बावजूद एक गजब की चमक आ गई। उसने कांपते हाथों से बैग को अपनी ओर खींचा। "कितने हैं?"
"30 लाख," फौजा सिंह ने सपाट आवाज़ में कहा। "सुगंधा ने तुम्हारे पैसों और तुम्हारी जमीन का खूब अच्छा इस्तेमाल किया रमेश। अब वो रही नहीं, तो इस सल्तनत को तुम्हें ही संभालना है।"
रमेश ने गिलास से एक लम्बा घूँट भरा और बैग की चैन खोलकर नोटों की गड्डियों को एक बार निहारा। "हम्म... शमशेर ने बताया था मुझे।"
"तो और क्या! दोस्त है तू मेरा," शमशेर ने गिलास को रमेश के गिलास से टकराते हुए कहा। "तेरे पास ज़मीन थी, ताईजी की इज़्ज़त थी और मेरे पास दिमाग। ताईजी तो वैसे भी तेरे एहसानों के तले दबी हुई थीं, वो इस काम को कैसे मना करतीं?"
असली सच अब परदे से बाहर आ रहा था। सुगंधा और फौजा सिंह सरकार से अफीम की खेती का लाइसेंस लेते, लेकिन सरकारी कोटे से कहीं ज़्यादा अफीम गुपचुप तरीके से उगाते। ताईजी गाँव की सबसे सम्मानित औरत थीं, किसी को उन पर शक होने का सवाल ही नहीं था।
इसीलिए तीन चौथाई अवैध माल ताईजी की हवेली के गुप्त तहखाने में सुरक्षित रखा जाता था। फ़ौजा सिंह का काम माल सप्लाई कर पैसा कामना था.
रमेश को ताईजी की मौत के बाद जब शमशेर ने यह सब बताया, तो एक पल के लिए वो दहल गया था। उसने शमशेर से यहाँ तक कहा था कि "कहाँ फँसा दिया यार तूने?" लेकिन जैसे ही 30 लाख का यह पहला बैग उसके सामने आया, रमेश का सारा डर कपूर की तरह उड़ गया।
"मान गए यार शमशेर तुझे! क्या दिमाग लगाया है," रमेश ने खिलखिलाते हुए कहा।
"भाई रिश्वत के पैसो से भला कोई अमीर हूँ है....चीयर्स!" तीनों ने गिलास टकराए और जाम पर जाम ढलने लगे। कमरे में अब अफीम के काले धंधे और रईसी के सपने गूँज रहे थे।
"अच्छा भाई रमेश," फौजा सिंह ने अपनी सफेद मूँछों पर हाथ फेरते हुए कहा, "कल तुम अपनी बहू (कामिनी) और बेटे (बंटी) को लेकर मेरे घर दावत पर आओ। वो शमशेर जिस आदमी को छोड़ गया था, साला मटन बड़ा अच्छा बनाता है। कल जमकर मज़ा करते हैं।"
रमेश ने बैग को अपनी छाती से चिपकाया और हाँ में सिर हिला दिया।
क्रमशः

1 Comments
Ohhh bhai kya secret ujagar kiya hai
ReplyDeleteYe kahani to thriller+ suspense+adultery hai
bunty aur Fagun ke bich aag lag chuki hai isko rokna ab mushkil hai
Ye faagun bilkul apne maa pe gayi hai
Ab to thandi hoke manegi
Sabko pata hai pichli baar jab ramesh ke ghar mutton paka tha to kamini ki dawat kisne udai thi
Mai to kabse chah raha tha kaise bhi karke kadar kamini ke pass aye
Par lucky aur bittu ke rehte kadar bahar ana mushkil tha
Aapne to sahi samaa bhandh diya
Sab log mutton ki dawat ka maza lenge aur kadar kamini ka...