मेरी माँ कामिनी 2.0 - अध्याय 21



हैंडपंप से गिरता बर्फ़ जैसा ठंडा पानी कामिनी के दहकते हुए तप्त जिस्म से टकराकर लगातार भाप बनकर उड़ रहा था। मद्धम अँधेरे में कामिनी अपनी आँखें फाड़े सामने विशाल परछाईं को देखे जा रही थी। उसका पूरा वजूद पसीने और पानी की दोहरी मार से थरथरा रहा था। वो पागलों की तरह अपने ही गोरे अंगों को रगड़ रही थी, जैसे पूरे बदन में रेंगती हुई अदृश्य चींटियों को हटाने की कोशिश कर रही हो।
"बहुत गर्मी है ना बहुरानी..."
वह गहरी, भारी और जानी-पहचानी आवाज़ एक बार फिर रात के सन्नाटे को चीरती हुई गूँजी। वह भारी साया धीरे-धीरे कामिनी की तरफ़ आगे बढ़ा। जैसे-जैसे उसकी दूरी कम हो रही थी, उसकी शारीरिक बनावट कामिनी की आँखों के सामने साफ़ होने लगी। कामिनी के होश उड़ते चले गए। दिमाग के किसी कोने में उसने जिस सुलेमान की फौलादी छवि की कल्पना की थी, वही साया अब एक दूसरे ही रूप में ढलने लगा था।
जैसे ही वह शख़्स दो कदम और आगे बढ़ा, आसमान में चमकते चाँद की दूधिया किरणें सीधे उसके चेहरे पर आकर पड़ीं।

"बहू रानी... गर्मी बहुत है, मैं भी यहाँ नहाने चला आया था।"
वह चेहरा देखते ही कामिनी का गला पल भर में पूरी तरह सूख गया। उसके काँपते हुए हाथ अपने ही जिस्म पर जहाँ थे, वहीं पत्थर की तरह जम गए। सामने कोई पराया मर्द सुलेमान नहीं, बल्कि ख़ुद ताऊजी खड़े थे!

 साठ साल से ऊपर की उम्र होने के बावजूद गाँव की आबो-हवा में पला उनका शरीर किसी मज़बूत दरख़्त की तरह लग रहा था। वह सिर्फ़ एक ढीली सूती धोती में थे, धोती के कपड़े को फाड़कर बाहर आने के लिए उनका मर्दाना हथियार पूरी तरह से तना हुआ था।
"त.. त... त... ताऊजी... आप...?" कामिनी के हलक से एक बेहद कमज़ोर, डरी हुई और मरी हुई आवाज़ निकली।
"हाँ बहू रानी... तेरी तरह मेरा भी हाल है। मेरी भी अंदरूनी गर्मी बाहर नहीं निकलती," एक वहशी और अधिकार भरी मुस्कान के साथ कहते हुए ताऊजी ने अपनी कमर से धोती को एक ही झटके में खोलकर अलग कर दिया।
कामिनी के ठीक चेहरे के सामने, महज़ कुछ इंच की दूरी पर ताऊजी का भारी, माँसल और काला लंड किसी फनफनाते नाग की तरह मचल रहा था। साठ की उम्र के पार भी उनके फौलादी पौरुष में एक ऐसी आदिम ताक़त थी जो रमेश जैसे नामर्द के पास कभी नहीं हो सकती थी। 

सुलेमान का ख़याल एक झटके में कामिनी के दिमाग़ से धुंधला पड़ गया। 'लंड तो लंड ही होता है, बस उसे संभालने वाली मर्दानगी असली होनी चाहिए' कामिनी का अतृप्त अंतर्मन हवस के खौफ़नाक सैलाब में चीख उठा।
 ताऊजी के भारी हथियार और उसके नीचे अमरूद के आकार के भारी अंडकोषों को देखकर कामिनी कि चुत ने बेतहाशा कामरस की नई धार छोड़ दी। उसकी जाँघों के बीच का लावा और ज़्यादा उबलने लगा।

"बहू रानी... जो सुख तूने उस दिन मुझे अनजाने में दिया था, वैसा सुख मुझे अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी नहीं मिला," ताऊजी ने अपनी भारी आवाज़ में वासना का ज़हर घोलते हुए कहा। उन्होंने अपने एक हाथ से उस भारी मूसल को सहलाया और कामिनी के और क़रीब आ गए।
अब ताऊजी के उस तपते हुए मर्दाना हथियार और कामिनी के भीगे, रसीले होंठों के बीच मात्र 2 इंच का फासला बचा था!
इस मामूली सी दूरी को सिर्फ़ और सिर्फ़ कामिनी की सुलगती हुई चाहत ही मिटा सकती थी। और कामिनी भला पीछे हटती भी क्यों? जिस आदिम अहसास के लिए उसकी चुत सुबह से भट्टी की तरह सुलग रही थी, वो मुकम्मल मर्द आज रात उसके ठीक सामने नंगा खड़ा था। हकीम की दवा का दोगुना डोज़ उसके चरित्र की रही-सही दीवार को ढहा चुका था।

"शन्निफ़्फ़्फ़... शन्निफ़्फ़्फ़... ताऊजी..." कामिनी ने अपने मुँह से एक बेहद ज़ोरदार, काँपती हुई गर्म साँस खींची और ताऊजी के कड़क पौरुष से उठने वाली पसीने की तीखी गंध को अपने नथुनों के रास्ते सीधे फेफड़ों में उतार लिया। उस महक ने उसके दिमाग़ के बचे-खुचे होश को भी सुन्न कर दिया। कामिनी ने अपनी नशीली आँखें ऊपर उठाईं, ताऊजी की लाल वहशी आँखों में देखा और बिना किसी शर्म या संकोच के, अपने रसीले होंठों को खोलकर उस 2 इंच की दूरी को मिटाने के लिए आगे बढ़ गई.
***************

कामिनी के दिमाग़ से दुनिया, रिश्ते और मर्यादाओं का हर एक पर्दा उठ चुका था। वो किसी हवस की मारी, भूखी कुतिया की तरह अपने घुटनों के बल थोड़ा और झुकी और ताऊजी के कड़क, भारी लंड से उठने वाली कसैली, मर्दाना और पसीने की गंध को अपने नथुनों में भरने लगी।
'शन्निफ़्फ़्फ़... शन्निफ़्फ़्फ़....'

आदिम और जंगली महक ने उसके जिस्म की रही-सही नसों को भी झकझोर कर रख दिया। उसके रसीले, काँपते होंठ ख़ुद-ब-ख़ुद हल्के से खुल गए। उसे इस मर्दाना हथियार के पौरुष को सिर्फ़ सूँघना नहीं था, बल्कि उसे इसका नमकीन स्वाद अंदर तक चखना था, उसे अपने हलक में निगल लेना था। इसी कशमकश और बेतहाशा तड़प में कामिनी का चेहरा और आगे बढ़ा। उसके खुले हुए होंठों के बीच थूक और लार (Saliva) की एक महीन, चमकती हुई लकीर खिंच गई। उसका एकमात्र लक्ष्य ताऊजी के लंड का मोटा, फनफनाता हुआ सुपाडा (सिरा ) था।

कामिनी ने चरम मादक अहसास में डूबने के लिए अपनी आँखें बंद कीं और अपना मुँह पूरी तरह खोलकर आगे किया ही था कि...
"यहाँ नहीं बहू रानी..."

अचानक ताऊजी की कड़क आवाज़ गूँजी और अगले ही पल भारी साया पीछे की तरफ़ हट गया। ताऊजी के क़दम पीछे हटे, उन्होंने मुड़कर एक बार भी कामिनी की तड़पती हुई हालत को नहीं देखा, और बिना कुछ बोले वो आगे अँधेरे की तरफ़ बढ़ गए।
कामिनी वहीं घुटनों के बल सन्न रह गई!
ये क्या हुआ? वो फौलादी लंड बस उसके होंठों को छूने ही वाला था, उसके जलते मुँह मे लोहे का गरम लंड जाने ही वाला था.. और ताऊजी उसे इसी सुलगती हुई हालत में छोड़कर चल दिए? कामिनी का पूरा नंगा जिस्म काँप कर रह गया। हवस की जिस चरम सीमा पर वो खड़ी थी, वहाँ से यूँ अचानक पीछे धकेले जाने पर उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके सुलगते और तपते हुए जिस्म पर बर्फ़ का ठंडा पानी फेंक दिया हो। एक तड़प सी उठी उसके सीने में।

"ईईस्स्स...." एक दर्द भरी सिसकी उसके होंठों से निकली। उसने आँखें खोलकर देखा तो ताऊजी खेतों के बीच से गुज़रती हुई कच्ची, ऊबड़-खाबड़ पगडंडी पर आगे बढ़ रहे थे।
कामिनी का दिमाग़ अब पूरी तरह से हवस और अधूरे रह गए स्पर्श के सम्मोहन (Hypnosis) में क़ैद था। वो मंत्रमुग्ध सी खड़ी हुई। उसके क़दम ख़ुद-ब-ख़ुद, बिना किसी सोच-विचार के, ताऊजी के भारी क़दमों के पीछे-पीछे उस कच्ची पगडंडी पर चल पड़े।

रात का वो नज़ारा किसी तिलिस्म से कम नहीं था। चाँदनी दूधिया रौशनी में 38 साल की एक भरी-पूरी, गदराई हुई औरत... एक इज़्ज़तदार हवेली की बहू, एक माँ, एक पत्नी और एक संस्कारी घरेलू औरत...संपूर्ण नंगी  होकर एक साठ साल के बूढ़े आदमी के पीछे-पीछे खेतों के बीच चल रही थी।

उसे किसी ने मजबूर नहीं किया था, ना ही किसी ने उसके गले पर चाकू रखा था। वो अपनी ख़ुद की मर्ज़ी से जा रही थी। उसके अपने ही सुलगते जिस्म और हवस  के नशे ने उसे मजबूर कर दिया था। उस पर हवस का एक ऐसा काला और गहरा नशा चढ़ा हुआ था, जिसमें उसे अपने नंगेपन की कोई शर्म नहीं थी।

खेतों की ऊबड़-खाबड़ और कच्ची ज़मीन पर नंगे पैर चलते हुए कामिनी की चाल में एक गज़ब की बेबाक और मादकता आ गई थी। उसके हर क़दम पर उसके भारी और आज़ाद स्तन हवा में बेतहाशा उछल रहे थे।

 पीछे से उसकी विशाल और मदमस्त गांड उन गड्ढों की वजह से ऐसे हिचकोले खा रही थी, जैसे कोई भारी पेंडुलम झूल रहा हो। उसके भारी और चौड़े गांड के दोनों पाट हर क़दम के साथ आपस में चिपकते और फिर एक-दूसरे से पूरी ताक़त से घिसते हुए खुलते। उस घर्षण से कामिनी के पूरे बदन में बिजली सी दौड़ रही थी।

उसकी सूजी हुई चुत से अब बेहिसाब कामरस बह रहा था, जो उसकी जाँघों से रिसता हुआ खेतों की सूखी मिट्टी पर टपक रहा था। उसकी साँसें धौंकनी की तरह चल रही थीं और दिल की धड़कनें 'धड़... धड़... धड़...' करके उसके कानों में बज रही थीं।

वो पूरी तरह से एक सम्मोहन में थी। ऐसा ख़ौफ़नाक और बेशर्म क़दम भला कोई संस्कारी औरत उठा सकती है? लेकिन आज कामिनी के अंदर की वो 'औरत' मर चुकी थी, और उसकी जगह एक प्यासी कुतिया जन्म ले चुकी थी।

"लो बहू रानी... आ गई मेरी झोपड़ी।"
कुछ दूर चलने के बाद, ताऊजी के क़दम रुके। सामने ही खेतों के बीचों-बीच वो जानी-पहचानी, पुरानी और एकांत झोपड़ी चाँदनी में नहा रही थी।
ये वही झोपड़ी थी, जहाँ कुछ दिन पहले कामिनी ने मदहोशी में ताऊजी के लंड को अपने होंठों के बीच दबाकर चूसा था। और आज... वो एक बार फिर अपनी पूरी नंगता और हवस के साथ उसी 'काम-झोपड़ी' के दरवाज़े पर खड़ी थी।

"आओ बहू रानी... अंदर," ताऊजी ने एक शातिर और वहशी मुस्कान के साथ कहा और वो झोपड़ी के अँधेरे में घुस गए।
झोपड़ी की चौखट पर कामिनी के काँपते पैर एक पल के लिए ठिठके। क्या उसके अंदर अभी भी अपनी इज़्ज़त, परिवार या समाज की रत्ती भर भी शर्म बाकी थी? क्या वो इस अँधेरे कुएँ में कूदने से पहले एक बार सोच रही थी?

लेकिन नहीं... अगले ही माइक्रोसेकंड में कामिनी के अंदर उबल रहे लावे ने उसके दिमाग़ की बची-खुची डोर भी काट दी। शर्म, हया, लज्जा... सब कुछ उस चौखट के बाहर ही राख हो चुका था।
उसने एक लंबी, सुलगती हुई साँस ली और अपना गोरा, भारी और कमरस से लथपथ पैर झोपड़ी के अँधेरे में बढ़ा दिया। 
असल मे वो अपनी ही जिस्म कि हवस, उत्तेजना के अँधेरे तालाब मे उतर रही थी.

कामिनी ने जैसे ही उस झोपड़ी की चौखट पार की, बाहर की दूधिया चाँदनी और खुली हवा पीछे ही छूट गई। अंदर एक अजीब सा, भारी और घुटन भरा अँधेरा था। सूखी घास, कच्ची मिट्टी और एक अजीब सी भारी गंध ने उस छोटी सी जगह को भर रखा था। कामिनी की आँखें इस अचानक आए अँधेरे की आदी नहीं थीं, लेकिन उसके कान ताऊजी की भारी साँसों को साफ़ सुन सकते थे।
"आ गई आख़िरकार..." अँधेरे के एक कोने से ताऊजी की खुरदरी और गूँजती हुई आवाज़ आई।
कामिनी वहीं दरवाज़े के पास बुत बनी खड़ी रही। उसका जिस्म काँप रहा था। बाहर से आने वाली हवा का एक हल्का सा झोंका उसके बदन को छूकर निकल गया, जिससे उसे एक अजीब सी सिहरन हुई। इस अँधेरे और एकांत ने उसके मनोवैज्ञानिक दबाव को कई गुना बढ़ा दिया था।
ताऊजी ने पास ही रखी माचिस उठाई और कोने में टँगी एक पुरानी लालटेन जला दी।
 पीली, मद्धम रोशनी में झोपड़ी का अंदरूनी हिस्सा साफ़ हुआ। बीच में एक पुरानी, मजबूत चारपाई बिछी थी। ताऊजी उसी चारपाई के किनारे बैठे थे। उनकी लाल आँखों में एक ऐसा गुरूर और वहशीपन था, जैसे किसी पुराने शिकारी ने बरसों के इंतज़ार के बाद अपने सबसे बड़े शिकार को जाल में फँसा लिया हो।

"खड़ी क्यों है बहू रानी? यहाँ तक अपने क़दमों से चलकर आई है, तो अब इस चौखट पर ठिठकने का क्या फ़ायदा?" ताऊजी ने अपनी जगह से हिले बिना, एक भारी और सम्मोहित करने वाले लहज़े में कहा।
कामिनी के पैर जैसे ज़मीन से बँध गए थे। उसके अंदर का उबलता हुआ लावा उसे आगे धकेल रहा था, लेकिन अपने ससुर समान आदमी के सामने नंगा एकांत में खड़े होने का बोझ बहुत भारी था। आज उसके सारे रिश्ते, सारी मर्यादाएँ इस लालटेन की पीली रौशनी में पिघल रही थीं।

कामिनी से अब और खड़ा नहीं रहा जा रहा था। हकीम की दवा, दिन भर की थकान और इस सम्मोहन ने उसके घुटनों की ताक़त छीन ली थी। वो धीरे-धीरे, लड़खड़ाते क़दमों से चारपाई की तरफ़ बढ़ी। उसकी आँखों में एक अजीब सी ख़ुमारी, बेबसी और एक गहरी तलब थी।
"नीचे बैठ जा..." ताऊजी ने अपनी भारी आवाज़ में हुक्म देते हुए ज़मीन की तरफ़ इशारा किया।

ताऊजी की खुरदरी, गुरूर से भरी आवाज़ गूँजी थी। उन्हें लगा था कि ये बेबस और डरी हुई बहू अब उनके क़दमों में गिर पड़ेगी। उनके दिमाग़ में ये तय था कि वो आज शहरी खूबसूरत औरत को अपनी मर्जी से रौंदेंगे।

लेकिन हवस की भयंकर आँच, अंदर की सुलगती हवस ने कामिनी के अंदर के हर डर, हर लिहाज़ को जलाकर खाक कर दिया था। वो दबे क़दमों से आगे बढ़ी, उसकी आँखें लालटेन की रोशनी में किसी जंगली बिल्ली की तरह चमक रही थीं। और घुटने टेकने के बजाय, उसने अपने पसीने से भीगे हाथों से ताऊजी के चौड़े सीने पर पूरी ताक़त से धक्का दे दिया।
"अरे...!"

धक्का इतना अचानक और ज़ोरदार था कि ताऊजी का भारी-भरकम शरीर अपना संतुलन खो बैठा और वो सीधे पीछे पुरानी चारपाई पर चित्त जा गिरे। चारपाई की रस्सियाँ चरमरा उठीं।
ताऊजी का दिमाग़ सुन्न हो गया। आज तक किसी मर्द ने उनकी आँखों में आँखें डालने की जुर्रत नहीं की थी, और आज... एक औरत ने उन्हें पछाड़ दिया था! वो कुछ समझ पाते, उससे पहले ही कामिनी एक झटके में चारपाई पर चढ़ गई।
अब नज़ारा पूरी तरह से बदल चुका था।
ताऊजी चारपाई पर बेबस लेटे थे और कामिनी... वो उनके सीने के ठीक ऊपर, अपने दोनों पैर उनके शरीर के दोनों तरफ़ रखकर एक प्यासी शेरनी की तरह तन कर खड़ी थी। लालटेन की रोशनी नीचे से ऊपर की तरफ़ आ रही थी, जिससे कामिनी का पसीने से भीगा, सुलगता हुआ वजूद ताऊजी की आँखों के सामने किसी विशाल और सम्मोहित करने वाले तिलिस्म की तरह छा गया।

"आअह्ह्ह.... बहू... ये क्या है?" ताऊजी हड़बड़ाए। उनकी भारी और रौबदार आवाज़ अचानक कमज़ोर पड़ गई थी।
कामिनी कुछ ना बोली। उसकी साँसें धौंकनी की तरह चल रही थीं और उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी। यहाँ बोलने का कोई मतलब था भी नहीं। 
असल मे शब्द बने ही नहीं है ऐसे वक़्त के लिए

कामिनी ने कोई जल्दबाज़ी नहीं की। वो इस पल को, इस नई ताक़त को पूरी तरह महसूस कर रही थी। उसने ताऊजी की आँखों में आँखें डालीं, जहाँ अब खौफ़ और वासना का एक अजीब सा मिश्रण था।
टप... टप... ठीक ताऊजी के सर पर खड़ी कामिनी कि चुत उत्तेजना मे भंभना है, दो बून्द पानी सीधा ताऊजी के होंठो पर गिर.
ईईस्स्स्स..... चप... चट... अमृत खुद ताऊजी के मुँह पर गिरा था.
कामिनी ने तुरंत हाथ बड़ा अपनी चुत पर चिपका लिया, जैसे उस बून्द को गिरने से रोकना चाह रही हो.

 धीरे-धीरे... कामिनी के घुटने मुड़ने लगे।
वो एक-एक इंच करके नीचे की तरफ़ झुकने लगी। जांघो के बीच कि दरार फैलने लगी, अँधेरी घाटी मे लालटेन कि पिली रौशनी उतर कर स्वर्ग का दरवाजा दिखाने लगी.

झोपड़ी की बासी हवा कामिनी के बदन से उठने वाली कसैली, मादक और पसीने की गंध से भारी होने लगी। ताऊजी की साँसें उनके गले में ही अटक गई थीं। वो चाह कर भी अपनी जगह से हिल नहीं पा रहे थे। साठ साल के बुज़ुर्ग मर्द का सारा गुरूर, सारी अकड़, कामिनी के इस हावी होते हुए हुस्न के दबाव में पिघल रही थी।

कामिनी ने धीरे-धीरे अपनी भारी, गदराई हुई गांड को ताऊजी के चेहरे के ऊपर ले आई, ताऊजी के सामने जन्नत का दरवाजा खुला हुआ रहा.
उसकी सूजी हुई, रस से टपकती चुत उनकी नाक से टकरा गई, 
आअह्ह्ह.....  इससससस   बाबू...
इफ्फ... इस्स्स... ताऊजी" ताऊजी के गर्म भरी सांस जैसे ही कामिनी कि गीली लकीर से टकराई उसकी सांसे आह मे बदल गई.

धममम... धप्प... कामिनी ने बिल्कुल समय नहीं गावाया पूरी तरह से ताऊजी के चेहरे पर बैठ गई। 

 उसकी अपनी सांसे उसकी छाती को ऊपर-नीचे कर रही थीं, जिससे उसके भारी स्तन हवा मे हिल रहे थे।
कामिनी ने अपनी आँखें बंद कर लीं। वह जल्दबाज़ी में नहीं थी। आज उसने सब कुछ दाँव पर लगा दिया था।

उसने बहुत धीरे से, बहुत इत्मीनान से अपनी कमर को ऊपर उठाया। ताऊजी के चेहरे से हटने के बजाय, उसने अपनी जाँघों को और चौड़ा कर लिया। ताऊजी की लाल आँखें कामिनी की भीगी हुई, सुलगती हुई घाटी पर टिकी थीं। उन्हें अपनी नाक पर कामिनी के बदन की सौंधी और मादक गंध महसूस हो रही थी, जो उन्हें किसी नशे की तरह अपने वश में कर रही थी।

कामिनी ने अपनी कमर को एक मद्धम गति से घुमाना शुरू किया। यह कोई आम हरकत नहीं थी यह एक गहरा सम्मोहन था। उसने अपनी चुत को ताऊजी के होंठों पर रगड़ना शुरू किया बहुत धीमे, जैसे किसी अनमोल चीज़ को चखने की तैयारी की जा रही हो।
स्लर्प...

ताऊजी की जीभ का पहला स्पर्श कामिनी की भीगी हुई लकीर पर पड़ा। वह अहसास इतना तीव्र था कि कामिनी के पैरों के पंजे चारपाई की रस्सी में गड़ गए। उसे लगा जैसे उसकी रीढ़ की हड्डी में बिजली की एक लकीर सी दौड़ गई हो।
"आहह... ताऊजी..."
उसकी आवाज़ झोपड़ी के सन्नाटे में किसी कटी हुई बिल्ली की म्याऊँ जैसी धीमी और तड़प भरी थी। ताऊजी ने अपना मुँह पूरी तरह खोला और अपनी खुरदरी जीभ को कामिनी की चुत की बाहरी फाँकों पर फेरना शुरू किया। वे जल्दबाज़ी नहीं कर रहे थे। वे एक-एक हिस्से को अपनी जीभ के स्पर्श से नाप रहे थे।

कामिनी ने अपने दोनों हाथ पीछे किए और चारपाई के किनारों को मजबूती से पकड़ लिया। उसकी कमर की गति धीमी हो गई, लेकिन हर रगड़ में एक गहरी भूख थी। जब ताऊजी ने जीभ को बारीक लकीर के अंदर तक धकेला, तो कामिनी का गला सूख गया।
चट्... लप्... चट्...

वह आवाज़ झोपड़ी के सन्नाटे में और भी स्पष्ट सुनाई दे रही थी। कामिनी के बदन की हर नस तन गई थी। उसके निप्पल अब पत्थरों की तरह सख्त होकर दर्द करने लगे थे, वह अपनी कमर को ताऊजी के मुँह पर ऐसे मटका रही थी जैसे कोई प्यासी औरत अमृत की तलाश कर रही हो। 

ताऊजी भी अब खो चुके थे; उन्होंने अपने हाथों से कामिनी की भारी नितंबों (buttocks) को थाम लिया और उसे और जोर से अपने चेहरे की ओर खींचने लगे।
ताऊजी के मुँह की गर्मी और उनकी जीभ का गीलापन कामिनी के अंदर की जलन को और भड़का रहा था।

 कामिनी के रोंगटे खड़े हो गए। उसे लगा जैसे उसका जिस्म फट जाएगा। वह अपनी कमर को ऊपर उठाती और फिर ताऊजी के चेहरे पर पूरी ताकत से दबाती, ताकि उनकी जीभ उसकी चुत के बिल्कुल अंदर तक पहुँच सके।
"हाँ... हाँ... ऐसे ही ताऊजी... चूस लो इसे... पूरा पी जाओ मुझे..."
कामिनी का चेहरा आसमान की तरफ उठ गया, उसकी गर्दन की नसें उभर आई थीं। पसीने की बूंदें उसके माथे से गिरकर ताऊजी के चेहरे पर और फिर उनकी दाढ़ी में समा रही थीं। उस झोपड़ी में अब सिर्फ दो ही आवाज़ें थीं—एक तो कामिनी की रुक-रुक कर निकलती सिसकियाँ और दूसरी, ताऊजी की जीभ का वो भूखा, गीलापन लिए हुए शोर।
चप... चप.... सर्रार्लोल्पप्प..
चट...
समय जैसे ठहर गया था। उस पल में कोई मर्यादा नहीं थी, कोई ताऊजी नहीं थे, कोई बहू नहीं थी। सिर्फ़ दो प्यासे जिस्म थे जो हवस के गहरे सागर में एक-दूसरे को डुबोने की कोशिश कर रहे थे।

 कामिनी की चुत से निकलने वाला रस ताऊजी के पूरे चेहरे पर फैल चुका था, जिससे वह पूरा खेल और भी ज़्यादा फिसलन भरा और मादक हो गया था।
ताऊजी की जीभ अब उसके सबसे संवेदनशील हिस्से (clitoris) पर ठहर गई थी। वे उसे गोल-गोल घुमा रहे थे, और कामिनी का शरीर उस एक स्पर्श से झटके खा-खा कर काँप रहा था। उसे लगा जैसे उसके जिस्म का हर हिस्सा ताऊजी की जीभ के साथ ही धड़क रहा हो।
वह धीमी गति अब धीरे-धीरे एक तूफ़ान में बदलने लगी थी। कामिनी की सांसें अब धौंकनी की तरह चलने लगी थीं। हवस का वह नशा, जो दवा और इस माहौल ने मिलकर पैदा किया था, अब अपने चरम (peak) की ओर बढ़ रहा था।


झोपड़ी के भीतर का वातावरण अब चरम हवस की उस धुंध में लिपटा था, जहाँ होश और बेहोशी के बीच का फ़ासला खत्म हो चुका था। ताऊजी की खुरदरी जीभ जब कामिनी के सबसे संवेदनशील हिस्से पर एक लय में नाच रही थी, तो कामिनी का शरीर किसी डोर से बंधी कठपुतली की तरह झटके खा रहा था। वह कभी अपने भारी स्तनों को उंगलियों से ज़ोर-ज़ोर से मसलती, तो कभी अपने ही बालों को मुट्ठियों में जकड़ कर नोचने लगती।
उसके अंदर हवस का एक ऐसा ज्वालामुखी उमड़ रहा था, जिसका लावा बाहर आने को बेताब था, लेकिन वह बस अंदर ही अंदर सुलग रहा था। यह अधूरी तृप्ति उसे पागलों की तरह तड़पा रही थी। 

उसी तड़प के बीच, जब उसका हाथ अनजाने में पीछे की ओर गया, तो उसकी उंगलियाँ ताऊजी के जिस्म से टकराईं। वहां, ताऊजी का लंड पूरी तरह से फनफनाया हुआ, नसों से भरा, पत्थर सा सख्त और धड़कता हुआ महसूस हुआ। उसके नीचे लटके विशाल, माँसल अंडकोष ताऊजी की पौरुष भरी मर्दानगी की गवाही दे रहे थे।
 उस गर्म, मांस के लोथड़े को छूते ही कामिनी की रीढ़ में एक सिहरन दौड़ गई। उसने पलटी मार कर पीछे देखा—लालटेन की मद्धम पीली रोशनी में वह फौलादी पौरुष किसी साक्षात नाग की तरह लपलपा रहा था।
कामिनी ने एक लंबी, कांपती हुई सांस खींची। उसके भीतर का सब्र टूट चुका था।

 उसने झटके से अपना शरीर उठाया और ताऊजी के मुँह पर फिर से बैठ गई। अब स्थिति बदल चुकी थी। कामिनी के भारी, गदराए हुए नितंब ताऊजी के चेहरे के ठीक सामने थे, और ताऊजी का वह धड़कता हुआ स्तंभ कामिनी के चेहरे के पास, उसकी साँसों की गर्मी में सराबोर हो रहा था।

दोनों एक-दूसरे के सम्मोहन में पूरी तरह कैद थे। ताऊजी ने कामिनी की गांड के बीच से उठती पसीने और कामरस की तीखी, मादक गंध को अपनी नाक के ज़रिए सीधे अपने फेफड़ों में भर लिया। उधर कामिनी का रोम-रोम ताऊजी के लंड से उठने वाली कसैली, मर्दाना गंध से झनझना उठा। वह गंध किसी नशीली दवा की तरह उसके दिमाग पर छा गई।

बिना किसी शब्द के, जैसे कोई पुरानी सहमति हो, दोनों ने अपनी जीभ बाहर निकाली। ताऊजी ने अपनी जीभ कामिनी की पसीने से भीगी हुई, रसीली घाटी के केंद्र मतलब गांड के छेद पर टिका दी, 
आअह्ह्ह.... इस्स्स.... ताऊजी
ताऊजी कि जीभ ने कामिनी के मुँह को पूरा खोल दिया, झटके से उसने अपनी गांड को सिकोड लिया.

 उसी क्षण कामिनी ने अपने होंठों को खोलकर ताऊजी के फनफनाते लंड के सुपाड़े (सिरे) को अपनी जीभ की नोक से सहलाया।

"आअह्ह्ह.... ताऊजी..." कामिनी की आवाज़ झोपड़ी की दीवारों से टकराकर एक लंबी सिसकी में बदल गई।
"आअह्ह्ह.... बहू..." ताऊजी के गले से भी एक गहरी, दबी हुई गुर्राहट निकली।

ताऊजी हैरान थे शहर कि औरतों को ऐसी कला भी आती है, कामिनी के सामने उनके वर्षों पुराने अनुभव भी फीके पड़ रहे थे। कामिनी की हर हरकत में एक आदिम भूख थी।
लेकिन ये बूढ़ा औरतों के चरित्र से अनजान था, उसे क्या पता कामवासना मे डूबी औरत को कुछ सिखाने कि जरुरत नहीं होती.

कामिनी धीमे-धीमे अपनी कमर को गोल-गोल घुमाने लगी। आगे पीछे करने लगी, अपनी गांड को ताऊजी के मुँह पर धकेलने लगी, उसका हर एक घुमाव ताऊजी की जीभ को उसकी चुत और गांड कि लकीर के बीच घुमा रहा था,  ताऊजी की जीभ का हर स्पर्श उसके अंदर बिजली की तरह दौड़ जाता। दोनों एक-दूसरे को चख रहे थे, एक-दूसरे के रस को पी रहे थे।

  झोपड़ी में अब सिर्फ चप-चप की आवाज़ें और दोनों की गहरी, हवस से भरी सिसकियाँ ही सुनाई दे रही थीं। कामिनी का शरीर ताऊजी के मुँह के ऊपर ऐसे झूल रहा था जैसे कोई प्यासी कली हो, जो अब पूरी तरह खिलने के लिए बेताब थी। हर रगड़ के साथ दोनों की कामुकता का स्तर और ऊपर चढ़ता जा रहा था, और झोपड़ी की उस तंग जगह में हवस का वो गुबार अब फटने के करीब था।

झोपड़ी के भीतर का सन्नाटा अब दो इंसानों की भारी और बेतहाशा साँसों से टूट रहा था। लालटेन की पीली, कांपती रोशनी में यह दृश्य किसी आदिम और अनैतिक अनुष्ठान जैसा लग रहा था।
ताऊजी, जो अपनी उम्र और रुतबे के बोझ तले दबे थे, आज उस सब को भुलाकर एक प्यासे शिकारी की तरह कामिनी के शरीर पर हावी थे। उनकी मूंछें, जो कठोर और खुरदरी थीं, कामिनी की कोमल जांघों और गांड के हिस्सों पर एक अजीब सी रगड़ और सिहरन पैदा कर रही थीं। हर बार जब ताऊजी का चेहरा कामिनी के जिस्म में धंसता, मूंछों की चुभन कामिनी की नस-नस में बिजली सा दौड़ा देती।

कामिनी अब वह संस्कारी बहू नहीं रही थी; उसके होंठ पूरी तरह खुल चुके थे और वह ताऊजी के फौलादी लंड को अपने गले तक उतारने की जद्दोजहद में थी। उसके चेहरे पर पसीना, आंखों से बहता मदहोश पानी और होंठों के कोनों से रिसती लार मिलकर ताऊजी के लंड को पूरी तरह चिकना और लसदार बना चुके थे।
पच... पचम्म. लप... लप... कि आवाज़ के साथ कामिनी लंड को खा रही थी, आइसक्रीम जैसे चूस रही थी.
ताऊजी का गन्दा काला लंड कामिनी के थूक से साफ हो कर चमक रहा था, थूक और लार टट्टो पर इक्कठा हो गई थी.

"आअह्ह्ह.... ताऊजी... और गहराई से... मुझे पूरा पी जाना चाहते हो तो चूसो इसे..." कामिनी की आवाज़ गले के भीतर से घुटती हुई निकल रही थी। 
पूर्ण समर्पण मे ताऊजी को उकसा रही थी, अपनी गांड को उनके मुँह पर पटक रही थी.

ताऊजी के मोटे भारी टट्टे देख उसे रुका नहीं गया, ठीक उसकी आँखों के सामने तो ग्रेनेड चमक रहे थे, जिसमे वीर्य रूपी बारूद भरा हुआ था.
कामिनी के दिल मे एक अनचाही सी चाह सांस लेने लगी,
"ये इतने बड़े क्यों है? क्या भरा है इसमें " 
उसके हाथ खुद ही फिसलते हुए अपने उत्तर को खोजने के लिए आगे बढ़ गए.

वह ताऊजी के भारी अंडकोषों को अपनी मुट्ठियों में भरकर ऐसे मसल रही थी जैसे उन्हें निचोड़कर उनका सारा रस निकाल लेना चाहती हो।
आअह्ह्हह्म.... बहु मार डालेगी क्या आज " ताऊजी के लंड मे आज ऐसी सरसराहत हो रही थी जैसे सुप्त ज्वालामुखी फटने को आमादा हैं

ताऊजी ने कामिनी कि गांड को अपने मज़बूत हाथों से पकड़कर पूरी तरह फैला दिया। उनकी जीभ किसी नाग की तरह कामिनी की चुत की गहराई में उतर रही थी। जब भी वे अपनी जीभ को उसकी क्लिटोरिस (clitoris) पर टिकाते, कामिनी का शरीर किसी मछली की तरह चारपाई पर छटपटाने लगता।

"ये... ताऊजी... आपके ये टट्टे इतने भारी क्यों हैं? क्या भरा है इनमें ?" कामिनी का सवाल उसकी बिगड़ती हुई मानसिकता की पराकाष्ठा थी। वह एक ऐसी 'रंडी' की तरह बात कर रही थी जिसे अब न कुल का डर था, न मर्यादा का।

ताऊजी ने अपनी जीभ को वहीं थाम लिया और एक भारी, दर्दभरी हवस के साथ बोले, "जो भरा है, वो तेरी प्यास बुझाने के लिए ही है बहू... चाट जा खा ले पूरा, बरसो के दर्द से मुक्त कर दे मुझे.
आअह्ह्हम्म्म्म.... बहु... तू सच मे कामदेवी है... आअह्ह्ह.... उउउफ्फ्फ्फ़...
ताऊजी कामिनी के जीभ के हर स्पर्श के साथ बिलबिला रहे थे, रत्ती रत्ती कर उन्हें अहसास हो रहा था जैसे उनके लंड और टट्टो के बीच जो रास्ता बंद है वो खुलने कि कोशिश कर रहा है.

कामिनी अब पूरी तरह से ताऊजी के लंड के सम्मोहन में थी। 'वेक... वेक...' की आवाज़ें झोपड़ी में गूँज रही थीं। वह अपने गले के हर इंच को ताऊजी के लंड के हवाले कर चुकी थी। 
वेक... वेकम्म... पच... पच.... दोनों एक दूसरे के कामुक अंगों को नोंचने पे उतारू हो चुके थे, खा लेना चाहते थे.
तभी ताऊजी ने अपना वहशी रूप दिखाया। उन्होंने कामिनी के चरम बिंदु (clitoris) को अपने दांतों के बीच दबाकर एक झटका दिया।
वह झटका कामिनी के शरीर की आखिरी दीवार को ढहाने के लिए काफी था।

"आअह्ह्ह... ताऊजी... मैं गई... ओफ्फ... मैं मर गई!"
कामिनी की चीख एक लंबी और धीमी सिसकी में बदल गई। उसके अंदर का बांध टूट गया।
 उसकी चुत ने हवस के लावा के साथ-साथ उत्तेजना की एक तेज धार छोड़ दी। ताऊजी, जो इस पल का इंतज़ार कर रहे थे, उन्होंने अपना मुँह और खोल दिया। वे एक-एक बूँद को अपनी जीभ पर लेने लगे। कामिनी का शरीर पूरी तरह से ढीला पड़ गया। उसकी मांसपेशियां तड़पकर शांत होने लगीं।

उसका सिर ताऊजी की जांघों के बीच जा धंसा। ताऊजी के लटकते हुए भारी अंडकोष अब कामिनी के चेहरे पर दबाव बना रहे थे। झोपड़ी में अब सिर्फ एक ही आवाज़ थी—कामिनी के भारी जिस्म के थककर गिर जाने की आवाज़। उस मद्धम रोशनी में, कामिनी का नंगा जिस्म ताऊजी के चरणों में निढाल पड़ा था, जैसे हवस के उस महासागर में उसने अपना सब कुछ समर्पित कर दिया हो।


झोपड़ी का माहौल अब एक अजीब सी शांत और भारी स्तब्धता में डूब चुका था। कामिनी की छाती अब भी धौंकनी की तरह चल रही थी, उसकी नज़रें छत की पुरानी कड़ियों को देख रही थीं, मानो वो अपनी ही रूह को अपने शरीर से अलग होते हुए देख रही हो।
कामिनी के निढाल जिस्म से, उसकी सूजी हुई और गहरी गुलाबी पड़ चुकी चुत से, अभी भी कामरस और पेशाब की गर्म बूंदें एक लय में रिस रही थीं। ताऊजी, जो अब हवस के उस चरम पर थे जहाँ इंसान अपनी इंसानियत भूल जाता है, उस बहते हुए तरल को किसी पवित्र प्रसाद की तरह चाट रहे थे। उनके चेहरे पर कामिनी का वो अंश लगा था, जो उनकी सालों की दमित हवस को तृप्त कर रहा था।

"बहू... कसम से, ऐसी चुत नहीं चखी आज तक। तू तो साक्षात कामदेवी का रूप निकली," ताऊजी की आवाज़ में एक वहशीपन था, जो अब और भी गहरा हो चुका था। उनके होठों पर कामिनी का स्वाद था और आँखों में एक ऐसी भूख, जो अभी भी शांत नहीं हुई थी।

उन्होंने कामिनी को चारपाई के एक तरफ धकेल दिया। कामिनी की देह, जो अब तक पसीने, थूक और कामरस से पूरी तरह सराबोर थी, चारपाई पर किसी थकी हुई योद्धा की तरह फैल गई। उसके उभरे हुए, भारी स्तन पसीने की चमक से गीले होकर हिल रहे थे, और उसके बदन से उठती तीखी मर्दाना और स्त्रीत्व की मिली-जुली गंध पूरी झोपड़ी में एक नशा घोल रही थी।

ताऊजी पीछे हटे और खुद को सहारा देकर खड़े हुए। मद्धम पीली लालटेन की रोशनी में उनका नंगा, फौलादी लंड कामिनी के धुंधलाए हुए नज़रों के सामने उभर आया। वह अभी भी पूरी तरह से तना हुआ था, मानो उस दृश्य ने उसे और भी ज्यादा उग्र बना दिया हो। नसों से भरा लंड अब कामिनी के चेहरे के पास हवा में फनफना रहा था।

कामिनी ने अपनी आँखें खोलीं, उसकी पुतलियाँ फैली हुई थीं। उसने ताऊजी के लंड को देखा, और फिर अपनी नज़रें हटाकर शून्य में ताकने लगी। उसके अंदर का लावा कुछ देर के लिए शांत हुआ था, लेकिन बाहर की ठंडी हवा के झोंकों के साथ उसे अपने बदन की नग्नता और उस बूढ़े आदमी के सामने उसकी बेबसी का एक गहरा अहसास हो रहा था।

वो अब कोई हवेली की मालकिन नहीं थी, वो सिर्फ एक मांस का टुकड़ा थी, जिसने आज अपनी आखिरी मर्यादा भी उस झोपड़ी की मिट्टी में दफन कर देनी थी। उसके शरीर पर पड़ी पसीने की बूंदें लालटेन की रोशनी में मोती की तरह चमक रही थीं, लेकिन उसकी रूह अब भी उसी शून्य में कहीं खोई थी, जहाँ अब सिर्फ ताऊजी की वहशी निगाहें और आने वाले पलों का खौफनाक इंतज़ार बचा था।

"देख बहू..." ताऊजी ने झुककर उसके कान के पास फुसफुसाते हुए कहा, " तू मेरा इलाज कर सकती है बहु, मैंने तुझे उस दिन कमरे मे देखा था, रमेश के साथ, तू किस तरह एक रंडी बन कर पलंग के खुटे पर अपनी चुत पटक रही थी, वो बेजान खुटा भी जीवित हो गया होगा तेरी चुत पा कर.

ताऊजी अपनी दिल कि बात कहे जा रहा था.
और कामिनी सिर्फ मुस्कुरा रही थी, जैसे उसे फर्क ही नहीं पड़ा हो, जैसे वो जानती थी कि उस दिन ताऊजी उसे खिड़की से देख रहे थे.
उसकी सांसे दुरुस्त हो रही थी,  कामिनी ने पलके झपका कर एक इशारा किया.
जैसा सेनापति को आक्रमण करने का अमौखिक आदेश दिया गया हो.

ताऊजी की आवाज़ में अब एक अजीब सी ठंडी सनक और गहरी बीमारी का साया था। उन्होंने कामिनी की आँखों में सीधे झाँका, उनकी लाल आँखों में कोई भयानक सच्चाई तैर रही थी।
"तुझे पता है बहू... मेरी क्या बीमारी है?" ताऊजी ने पूछा, और उनका हाथ धीरे से कामिनी की भीगी हुई जांघों पर फिसला।
कामिनी की सांसें उखड़ी हुई थीं। वह बस एक निर्जीव पुतले की तरह लेटी थी, उसकी टांगें चारपाई पर बेतहाशा फैली हुई थीं, मानो वह किसी बलि के लिए तैयार की गई हो। उसकी चुत का  गुलाबी दाना, जो उत्तेजना से सूजकर और भी ज्यादा उभर आया था, हवा के संपर्क में आकर फड़फड़ा रहा था। चुत की मांसल दीवारें, जो अब हवस के कारण पूरी तरह से अपना द्वार खोल चुकी थीं, लसदार तरल से लथपथ होकर एक गहरा, अँधेरा मुख खोल रही थीं।

"नहीं..." कामिनी के गले से एक बेहद कमज़ोर, कांपती हुई फुसफुसाहट निकली।
"अभी मालूम पड़ जाएगा..." ताऊजी ने एक शातिर मुस्कान के साथ कहा।
वे धीरे से कामिनी की फैली हुई जांघों के बीच बैठ गए। उनका भारी शरीर चारपाई पर बोझ बनकर बैठ गया था। उनके घुटने कामिनी की जांघों को और चौड़ा करने के लिए दबाव डाल रहे थे। 

ताऊजी के चेहरे के ठीक सामने कामिनी कि चुत खुली पड़ी थी, जिसे अभी अभी बुरी तरह से चूसा गया था, चुत ऐसी चीज है जिसे जितना चुसो उतना ही खील जाती है.

झोपड़ी में लालटेन की रोशनी कम पड़ रही थी, लेकिन मद्धम उजाले में भी कामिनी की चुत का दृश्य ताऊजी के लिए किसी स्वर्ग के दर्शन जैसा था। 
उन्होंने अपना एक हाथ कामिनी की कमर के नीचे रखकर उसे अपनी तरफ थोड़ा ऊपर उछाला, जिससे उसकी चुत और भी बेहतर तरीके से ताऊजी के सामने पेश हो गई।

ताऊजी ने अपनी उंगलियों को उस गीली घाटी के अंदर गहराई तक धकेल दिया। 
आआआहहहह...... उउउफ्फ्फ्फ़... ताऊजी कामिनी की आँखें फटी की फटी रह गईं, एक तीखी टीस उसके पूरे जिस्म में दौड़ गई। ताऊजी ने अपनी उंगलियों को अंदर घुमाया, जैसे वे किसी गहरे कुएँ की गहराई नाप रहे हों, और फिर एक वहशी अंदाज़ में बोले, "मेरी बीमारी का इलाज सिर्फ ये गीली मिट्टी कर सकती है, बहू... और आज तू खुद चलकर मेरे पास आई है, मेरा इलाज करने।"

कामिनी के जिस्म ने एक जोर का झटका खाया। उसकी कमर चारपाई से ऊपर उठी, और उसकी उंगलियां रस्सियों को नोचने लगीं। चारपाई कि रस्सी को उसने आपनी मुट्ठी मे भींच लिया,

 ताऊजी ने कामिनी की कमर को अपने मज़बूत हाथों में जकड़ कर उसे अपनी जांघों पर खींच लिया। जैसे ही कामिनी की सूजी हुई, रस से तर चुत ताऊजी के फौलादी, रगों से भरे लंड से टकराई, एक जबरदस्त सिहरन ने कामिनी की रीढ़ की हड्डी को झकझोर कर रख दिया।

ताऊजी का लंड, जो किसी मूसल की तरह सख्त और भारी था, कामिनी के खुले हुए द्वार के इर्द-गिर्द ऊपर-नीचे होने लगा। वह एक शिकारी की तरह जायज़ा ले रहा था, कभी उसके उभरे हुए संवेदनशील दाने (clitoris) पर घर्षण करता, तो कभी फिसलता हुआ गांड के छेद को छूकर वापस लौट आता। यह खेल कामिनी के सब्र का इम्तिहान ले रहा था। उसके शरीर में हवस की एक ऐसी आग सुलग रही थी जो अब मर्यादा के बंधनों को पूरी तरह भस्म कर चुकी थी।

कामिनी तड़प रही थी। उसकी कमर खुद-ब-खुद ताऊजी के लंड के साथ तालमेल बिठाने को मचल रही थी। वह अपनी कमर को झटके दे देकर उस फौलादी स्तंभ को अपने भीगे हुए छेद पर टिकाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन ताऊजी का इरादा कुछ और था। वे उस रगड़ के हर पल का मज़ा ले रहे थे, जैसे वे कामिनी की तड़प और उसकी बढ़ती हुई बेबसी का आनंद उठा रहे हों।

"प्लीज़... ताऊजी..." कामिनी के होंठ कांप उठे, उसकी आवाज़ में गिड़गिड़ाहट और प्यास का एक अजीब मिश्रण था। उसका गर्म, पसीने से भीगा जिस्म अब बस इस बात के लिए तरस रहा था कि वह भारी पौरुष उसके भीतर समा जाए और उसकी सारी जलन को मिटा दे।

ताऊजी के चेहरे पर एक वहशी मुस्कान तैर गई। उन्होंने कामिनी की आँखों में झाँकते हुए, भारी और दबी हुई आवाज़ में कहा, "बहु... बहुत गर्मी है ना तुझमें? मेरे अंदर भी सालों की वही आग है... मैं भी बहुत अरसे से इस पल के लिए तड़प रहा हूँ।"
और फिर, बिना किसी चेतावनी के...
धच... पचक...
ताऊजी ने अपनी पूरी ताकत से कमर को आगे की ओर झटका दे दिया और एक ही बार में अपना पूरा लंड कामिनी की चुत की गहराई में धंसा दिया।
"आआआआहहहह.... ताऊजी.... ऊफ्फफ्फ्फ़.... आअह्ह्ह.....!"
कामिनी की चीख झोपड़ी की दीवारों से टकराकर बाहर सन्नाटे में दूर तक गूँज गई। उसे लगा जैसे उसका वजूद फट गया हो। उसकी कमर झटके से ऊपर को उठी और उसने अपने हाथों से चारपाई की रस्सियों को अपनी पूरी ताकत से जकड़ लिया। यह अनुभव किसी शारीरिक मिलन का नहीं था, कामिनी को लगा जैसे किसी ने जलता हुआ सरिया उसकी चुत मे ठूस दिया हो.

गनीमत थी कि कामिनी पहले से ही पूरी तरह भीगी और रसीली थी, वरना उस भारी और मोटे लंड के एकाएक प्रवेश से अंदर के नाजुक मांस को गंभीर पीड़ा होती।
सामान्य औरत होती तो अब तक चुत खून कि उल्टी कर चुकी होती.

लंड के अंदर समाते ही, कामिनी को एक अजीब सा अहसास हुआ—उसकी पूरी चुत अंदर तक भर चुकी थी।
ताऊजी का फौलादी लंड उसके गर्भाशय के मुहाने तक जा पहुंचा था, और कामिनी को लगा जैसे उसकी आत्मा उस घर्षण और दबाव के बीच सिमट कर रह गई हो। 

कामिनी तड़प रही थी, लेकिन वो दर्द वाला तड़पना नहीं था। उसके उत्तेजित शरीर ने अब लंड के दर्द को भी मज़े में बदलना सीख लिया था। वो औरत ही क्या जो लंड का जोर बर्दाश्त न कर सके।
कामिनी की कमर धीरे-धीरे चारपाई पर टिक गई। साँसें भारी हो रही थीं।

ताऊजी ने एक इंच भी अपने लंड को हिलाया-डुलाया नहीं। वो बस अंदर ही अंदर गहराई तक धँसा हुआ था, पूरी तरह से स्थिर। जैसे इस गर्म भट्टी मे अपना भुट्टा सेंक रहे हो.

"आआआह्ह्ह... बहू... क्या गरम और टाइट चुत है तेरी..." ताऊजी ने नीचे देखते हुए गुर्राया। उनकी आवाज़ में हैरानी और लालच दोनों थे।
कामिनी की चुत उनके मोटे लंड को किसी रबड़ की तरह कसकर जकड़े हुए थी। हर धड़कन के साथ उसकी दीवारें लंड को और भी भींच रही थीं।
कामिनी ने एक लंबी साँस छोड़ी। उसका पूरा शरीर अब तैयार था।
ताऊजी अनुभवी थे। उन्होंने समझ लिया कि अब क्या करना है।
धीरे-धीरे उन्होंने अपना कमर पीछे खींचा — सिर्फ़ दो इंच।
वेक्... पचम्म...
अंदर ऐसा वेक्यूम बन गया कि कामिनी को लगा जैसे उसकी बच्चेदानी भी लंड के साथ खिंचकर बाहर आने को हो रही है।
"आआआह्ह्ह्हह... ताऊजी... उउउफ्फ्फ्...!"
कामिनी सिहर उठी। उसके हाथ ताऊजी की जांघों पर कस गए, जैसे उन्हें रोकना चाह रही हो।
लेकिन ताऊजी रुके नहीं।

धचम्म्... पच्... फटाक्...
उन्होंने लंड को वापस एक जोरदार धक्का दे दिया। पूरा लंड फिर से एकदम गहराई तक चला गया। जांघ से जांघ टकराई।
"आअह्ह्ह... ताऊजी..." कामिनी कि बच्चेदानी वापस अंदर चली गई... आह्ह्ह...!"

कामिनी की चीख निकल गई। उसकी आँखें ऊपर चढ़ गईं। दर्द के साथ-साथ एक गहरा, मीठा आनंद उसके पूरे जिस्म में फैल गया।
ताऊजी अब लय पकड़ चुके थे।
धीरे-धीरे बाहर... दो इंच... फिर जोरदार धक्का अंदर।
धच्... पचम्म्म... धप्प्...पच..

हर धक्के के साथ कामिनी की चुत का रस बाहर छलक रहा था। चारपाई की रस्सियाँ चरमरा रही थीं।. चरर.. पचररर.... चररर... पचररर...
सम्भोग का संगीत आरम्भ हो गया था, इसमें चारपाई कि चरमराहट भी शामिल थी.

"हाँ बहू... ले... ले पूरा... तेरी चुत कितनी भूखी है... आह्ह्ह..." ताऊजी हाँफते हुए बोल रहे थे। उनके टट्टे हर धक्के के साथ कामिनी की गांड से टकरा रहे थे। (m ldpwiqacxt E Ai)(mh p7oyjgti PYo X4Ep K)39446661b

कामिनी की कमर अब खुद-ब-खुद ऊपर उठने लगी थी। वो ताऊजी के हर धक्के का जवाब अपनी कमर से दे रही थी। उसके भारी स्तन हर झटके के साथ उछल रहे थे। पसीना उसके बदन से टपक रहा था।
 
"साली... कितनी कसी हुई है... कितनी गर्म... सालों बाद ऐसी चुत मिली है... आज इसे रात भर चोदूँगा..." ताऊजी के होंठ बुदबूदा रहे थे.

"आअह्ह्ह...हाँ... यही चाहिए था...   आआहहहह.... मर जाउंगी मै, कामिनी बड़बड़ा रही रही, खुद के स्तनों को मसल रही थी.

ताऊजी की रफ्तार अब धीरे-धीरे बढ़ने लगी थी। झोपड़ी में धच्... धच्... पच्... पचम्म्म... की आवाज़ें और तेज़ हो रही थीं। कामिनी की सिसकियाँ अब लगातार निकल रही थीं।

"ताऊजी... जोर से... और जोर से मारो... आअह्ह्ह... फाड़ दो मुझे... उउफ्फ्...!"

ताऊजी का मोटा, काला लंड कामिनी की चुत में दनादन घुसे जा रहा था। धच... धच... पच... पच....
 कोई 15 मिनट बीत चुके थे, लेकिन ताऊजी की रफ्तार में कोई कमी नहीं आई थी। एक ही स्पीड — धीमा बाहर, जोरदार अंदर।

धच्... धच्... धचम्म्... पच्... पचम्म्म...

कामिनी अब पूरी तरह पागल हो चुकी थी। उसकी आँखें उलटी पड़ी हुई थीं, मुँह से लगातार झाग जैसा थूक निकल रहा था। उसकी चुत अब ताऊजी के लंड के काबिल हो गई थी, हर धक्के पर वो लंड को पूरा निगल लेती, फिर छोड़ देती।

"आअह्ह्हम... ताऊजी... उफ्फ्फ्फ़... ताऊजी... मैं झड़ने वाली हूँ... आअह्ह्ह... ताऊजी और अंदर... और जोर से...!"

कामिनी मदहोशी में चिल्ला रही थी। उसकी कमर बार-बार ऊपर उठकर नीचे गिर रही थी, जैसे वो खुद ताऊजी के लंड को और गहरा लेना चाहती हो।

"चोदो मुझे ताऊजी... मैं आपकी रंडी हूँ... फाड़ दो मेरी चुत को... आह्ह्ह... मारो... जोर से मारो...!"

कामिनी का जोश देखकर ताऊजी का खून और गरम हो गया। उन्होंने अपनी कमर को और कसकर हिलाना शुरू कर दिया।
"आअह्ह्ह... ले बहू... ये लंड तेरा ही है... ले पूरा... आअह्ह्ह...!"
धच्... धच्... धचम्म्... फच्... फचम्म्म...

ताऊजी ने कामिनी के दोनों भारी स्तनों को अपनी मज़बूत हथेलियों में कसकर पकड़ लिया। उन्हें नोचते हुए, दबाते हुए धक्के लगा रहे थे। कामिनी के स्तन उनकी उँगलियों के बीच से फिसल रहे थे, लाल निशान पड़ गए थे।

कामिनी की चुत अब पूरी तरह फूल चुकी थी। हर धक्के के साथ पच्... पचम्म्...चप की आवाज़ के साथ गाढ़ा कामरस बाहर छलक रहा था, दोनों की जांघों को भीगो रहा था।
"आअह्ह्ह... आअह्ह्ह... ले लंड ले मेरा उउउफ्फ्फ्...!"

कामिनी का शरीर अचानक तन गया। उसकी कमर हवा में ऊपर उठ गई, जांघें काँपने लगीं। उसकी आँखें पूरी तरह उलट गईं।
फाचक्... फचम्म्म्...

एक ज़ोरदार झटके के साथ कामिनी झड़ गई। उसकी चुत ने ताऊजी के लंड को कसकर जकड़ लिया और गाढ़े, गर्म कामरस की तेज़ धार छोड़ दी। उसका पूरा शरीर जैसे किसी झटके से काँप उठा,  एक, दो, तीन  फिर ढीला पड़ गया।

"आआआह्ह्ह्हह... मैं गई... मर गई... उउउफ्फ्फ्...!"

कामिनी की आँखें बंद हो गईं। उसका सिर एक तरफ लुढ़क गया। पूरा शरीर निढाल पड़ गया, जैसे बेहोश हो गई हो। लेकिन उसकी चुत अभी भी हल्के-हल्के सिकुड़-सिकुड़ कर ताऊजी के लंड को दबा रही थी।

लेकिन ताऊजी रुके नहीं।

वे जानवर बन चुके थे। उन्होंने कामिनी के बेहोश शरीर को अपनी जांघों पर और अच्छे से जकड़ लिया और लगातार धक्के लगाते रहे।
धच्... धच्... पच्... फचम्म्म... फाचक्...

"आअह्ह्ह... साली रंडी बहू... क्या चुत है तेरी... शहर मे ऐसा लंड कभी नहीं मिला होगा टूजी, आज फाड़ दूंगा... आज नहीं छोडूंगा... आह्ह्ह...! आज भोसड़ा बना दूंगा तेरी चुत का, आज या तो मेरा लंड फ़टेगा या फिर तू इस झोपडी से जिन्दा बहार नहीं जाएगी "
ताऊजी गुस्से और उत्तेजना मे बड़बड़ा रहा था, उसके अंदर का जानवर जाग गया था, सामान्य स्त्री होती तो वाकई अब तक दम तोड़ देती.. लेकिन ये कामिनी थी, इसका जिस्म वासना से बना था.
झड़ने के बाद भी ताऊजी के झटको को झेल रही थी.

ताऊजी के हाथ कामिनी के स्तनों को बुरी तरह नोच रहे थे। उन्हें कसकर दबाते, मरोड़ते हुए वे तेज़-तेज़ धक्के दे रहे थे। कामिनी का बेहोश शरीर हर झटके के साथ हिल रहा था,  उसके स्तन उछल रहे थे, सिर इधर-उधर लुढ़क रहा था, लेकिन वो कुछ बोल नहीं पा रही थी।

उसकी चुत अब पूरी तरह ढीली और गीली हो चुकी थी, फिर भी ताऊजी का लंड बिना रुके अंदर-बाहर हो रहा था। पच्... ओच्... पच्... फैह्म्म्म... फाच्...

साली बेहोश हो गई...उठ ना दिखा ना मुझे अपना रंडीपना, देखु शहर कि रंडी कैसी होती है,आज इसे भर दूंगा... सालों की प्यास आज पूरी करूंगा...
उठ साली रंडी उठ.... अभी तो रात बाकि हैं
पच.... पच... फच... फच.... 
ताऊजी बेतहाशा चोदे जा रहे थे, जैसे सुध बुध खो चूका हो.
चट... चटाक... चट... उठ रंडी, चुत टाइट कर अपनी.. उठ...
ताऊजी ने लगातार दो तीन थप्पड़ कामिनी के स्तनों पर जमा दिए.

कामिनी शून्य में बेजान पड़ी थी। उसका जिस्म हर धक्के में हिल रहा था, लेकिन उसकी संवेदना अब खत्म सी हो गई थी। फिर भी उसकी चुत हल्के-हल्के सिकुड़ रही थी, जैसे वो भी ताऊजी के लंड का स्वाद ले रही हो।

ताऊजी की साँसें अब और भारी हो गई थीं। उनके टट्टे कामिनी की गांड से हर बार ज़ोर से टकरा रहे थे। उनका चेहरा लाल हो चुका था, पसीना टपक रहा था।

"आअह्ह्ह... बहू... ले... ले मेरे वीर्य को... आज भर दूंगा तेरी चुत को... उउउफ्फ्फ्...!"

ताऊजी की रफ्तार और तेज़ हो गई। वे कामिनी के बेहोश शरीर को जैसे कोई खिलौना हो, इस तरह चोद रहे थे। झोपड़ी में सिर्फ़ मांस-मांस की टकराहट की आवाज़ें और ताऊजी की गुर्राहट गूंज रही थी।

ताऊजी के लगातार, बेतहाशा झटकों से कामिनी का बेहोश शरीर धीरे-धीरे हिलने लगा। उसकी पलकें फड़फड़ाईं। धुंध छँटने लगी। उसकी चेतना वापस लौट रही थी, लेकिन हवस की आग पहले से कहीं ज्यादा भड़क चुकी थी।
"आअह्ह्ह... इस्स्स्स... ऊफ्फ्फ्फ़..."

उसके मुँह से कमज़ोर सिसकियाँ निकलने लगीं। उसकी चुत अब भी ताऊजी के मोटे लंड को कसकर जकड़े हुए थी। हर धक्के के साथ उसकी दीवारें फड़क रही थीं।
ताऊजी की मेहनत रंग ला रही थी। कामिनी की हवस दोबारा जाग उठी थी और इस बार और भी भयंकर रूप में।

"आअह्ह्ह... ताऊजी... जोर से... अंदर... और जोर से..." कामिनी बुदबुदाई, उसकी आवाज़ अभी भी थकी हुई थी लेकिन भूख से भरी हुई।
जिस्म थक रहा था, लेकिन हवस बढ़ती जा रही थी.

ताऊजी के लंड में जैसे नई जान आ गई। उन्होंने एक वहशी मुस्कान के साथ कहा,
"ले साली रंडी... मुझे पता था तेरी गर्मी इतनी जल्दी निकल ही नहीं सकती..."
"चट्... चट्... थप्प्..."

ताऊजी ने कामिनी के दोनों भारी स्तनों पर दो-तीन जोरदार थप्पड़ जड़ दिए। उंगलियां लाल निशान छोड़ गई। स्तन हिलकर लाल हो गए, जैसे खून उतर आया हो।
6773536 "आआआह्ह्ह्ह...! ताऊजी...." 

कामिनी पूरी तरह होश में आ गई। उसका जिस्म पसीने में डूबा हुआ था। आँखें खुलीं, और उसकी नज़र ताऊजी के चेहरे पर पड़ी। उसमें कोई शर्म नहीं थी,  सिर्फ़ पागलपन था।

"हाँ... हाँ... ताऊजी... चोदो अपनी बहू को... भोसड़ा बना दो मेरी चुत का... आअह्ह्ह... फाड़ दो... मारो जोर से...!"

कामिनी खुद किसी बेहया रंडी की तरह चिल्ला रही थी। उसकी कमर अब खुद-ब-खुद ऊपर उठने लगी थी, ताऊजी के धक्कों का जवाब दे रही थी।
धच्... धच्... धचम्म्... पच्... पचम्म्म...

ताऊजी और भी कसकर चोदने लगे। उनके टट्टे कामिनी की गांड से हर बार ज़ोर से टकरा रहे थे।

"तुझे पता है बहू... आज तक मेरे लंड से वीर्य ही नहीं निकला... इसी वजह से मैं बेऔलाद रहा..." 
ताऊजी हाँफते हुए अपनी बात कह रहे थे, लेकिन उनके धक्के रुक नहीं रहे थे।
धच्... फच्... पचम्म्म...

"आअह्ह्ह...लेकिन . आज... तेरी चुत में... पूरा भर दूंगा... आह्ह्ह... ले... ले और ले ...!"

कामिनी के स्तन बुरी तरह लाल पड़ चुके थे। ताऊजी उन्हें कसकर भींचे हुए थे, नोच रहे थे। दर्द और मज़े का मिश्रण कामिनी को दीवाना बना रहा था।

उसके अंदर फिर से लावा उबलने लगा। ये दूसरी बार था, और इस बार बहुत तेज़ी से आ रहा था। उसकी चुत ताऊजी के लंड को और भी कसकर चूस रही थी।

"आअह्ह्ह... ताऊजी... मैं गई... फिर गई... आअह्ह्ह... जोर से... फाड़ दो... उउउफ्फ्फ्...!"

कामिनी की कमर हवा में उठ गई। उसका पूरा शरीर तन गया। आँखें उलट गईं।
फाचक्... फचम्म्म्... पच्... फेवह्ह्ह...

एक ज़ोरदार झटके के साथ कामिनी दूसरी बार झड़ गई। इस बार इतनी तेज़ी से कि उसे लगा जैसे उसकी आत्मा ही चुत के रास्ते बाहर निकल गई हो। उसकी चुत ने ताऊजी के लंड को कसकर दबाया और गाढ़े, गर्म कामरस की भारी धार छोड़ दी।
"आआआह्ह्ह्हह... मर गई... ताऊजी... मैं मर गई... उउउफ्फ्फ्...!"

कामिनी का शरीर एक बार फिर निढाल पड़ गया। लेकिन इस बार उसकी चुत और भी ज़ोर से सिकुड़-सिकुड़ कर ताऊजी के लंड को दबा रही थी, जैसे उसे अंदर ही रोकना चाहती हो।

ताऊजी अभी भी रुके नहीं थे। वे जानवर बन चुके थे। उन्होंने कामिनी के बेहोश-से शरीर को अपनी जांघों पर और मजबूती से जकड़ लिया और लगातार धक्के लगाते रहे।
धच्... धच्... पच्... फचम्म्म...

"आअह्ह्ह... बहू... क्या चुत है तेरी... आज फाड़ दूंगा... आज नहीं छोडूंगा... आह्ह्ह... ले... ले पूरा...!"

उनके धक्के रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। कामिनी की चुत पूरी तरह से फूल कार कचोरी जैसी हो गई थी, लेकिन ताऊजी का मोटा लंड बिना रुके अंदर-बाहर हो रहा था।
धच्... धच्... पचम्म्म... फच्...

कामिनी की साँसें धीरे-धीरे सामान्य होने लगीं। उसकी पलकें फड़फड़ाईं। दूसरी बार झड़ने के बाद उसका शरीर अभी भी काँप रहा था, लेकिन अंदर की आग फिर से सुलगने लगी थी।
ताऊजी ने महसूस किया कि कामिनी की चेतना वापस लौट रही है। उन्होंने एक वहशी मुस्कान के साथ अपना लंड पूरी तरह बाहर निकाला।
पच्... फाचक....

कामिनी की चुत खाली होकर फड़फड़ाई। उसमें से गाढ़ा कामरस की धार निकलकर चारपाई पर गिरने लगी।
"उठ बहू.. साली रंडी... आज तेरी सारी गर्मी निकाल दूंगा... कुतिया बना के चोदुँगा तुझे " ताऊजी ने गुर्राते हुए कहा।

उन्होंने कामिनी के नंगे, पसीने से चमकते शरीर को दोनों हाथों से पकड़ा और उसे घुटनों के बल मोड़ दिया।
कामिनी तो जैसे बेजान थी, ताऊजी के हाथो कि कठपुतली बन गई थी, 
कामिनी अब चारपाई पर कुतिया की मुद्रा में थी — दोनों हाथ आगे, घुटने फैले हुए, भारी गांड पीछे की तरफ उठी हुई। उसकी सूजी हुई चुत और गांड का छेद पूरी तरह खुला हुआ था, दोनों जगह से रस टपक रहा था।
कामिनी हैरान थी " एक बूढ़ा आदमी हार क्यों नहीं मान रहा, क्या वाकई आज कि रात उसके जीवन कि आखरी रात है"
लेकिन उसकी जिस्म कि भूख, उसके जिस्म मे दौड़ती हकीम लकड़द्दीन कि दवा का ही असर था जिसने उसे अभी तक मौत के हवाले नहीं किया था.

ताऊजी ने पीछे खड़े होकर कामिनी की कमर को दोनों हाथों से मजबूती से पकड़ लिया। उनकी उँगलियाँ उसकी नरम, गदराई चमड़ी में धंस गईं।

"आज तेरी इस मोटी गांड को अच्छे से नाप लूँगा...
चट.. चटाक.... ताऊजी ने दो जोरदार थप्पड़ कामिनी कि गांड पर जड़ दिए 
आआहहब.... ताऊजी.... कामिनी का जिस्म सिहर उठा, उसके जिस्म ने एक नयी अंगड़ाई ली, उसे यही तो चाहिए था, ये दर्द उसे सुकून देता था, रमेश ने उसे क्या से क्या बना दिया था.
उसे दर्द और बेइज़ती मे सुकून मिल रहा था.

तभी.... कामिनी इस सुकून को महसूस करती ही कि....धचम्म्...!
ताऊजी ने एक जोरदार धक्का दिया। उनका पूरा लंड कामिनी की चुत में एक ही बार में घुस गया।
"आआआह्ह्ह्ह्ह... ताऊजी...!" 

कामिनी की चीख निकल गई। इस पोजीशन में लंड और भी गहराई तक जा रहा था। उसकी बच्चेदानी तक पहुँच रहा था।
बल्कि यूँ कहिये बच्चेदानी का मुँह खोल कर अंदर समा जाने को राज़ी था.
ताऊजी ने कोई दया नहीं दिखाई...
फच... फच....
ताऊजी तुरंत ही अपनी कमर को आगे पीछे करने लगे, चुत इस कद्र गीली थी कि लंड खुद से फिसल के अंदर समा जा रहा था.

ताऊजी ने रफ्तार बढ़ा दी। अब वे पूरी ताकत से पीछे से चोद रहे थे। उनकी जांघें कामिनी की गांड से हर बार ज़ोर से टकरा रही थीं  " थप्प्... थप्प्... धच्... धचम्म्म...
साली क्या गांड है रंडी बहु कि... थाड.. थाड... ताऊजी ने बेतहाशा थप्पड़ जमा दिए.

कामिनी की भारी गांड हर धक्के पर लहरा रही थी। उसके स्तन नीचे लटककर हवा में झूल रहे थे।

"हाँ ताऊजी... जोर से... पीछे से फाड़ दो... आअह्ह्ह... मैं आपकी रंडी हूँ... चोदो अपनी बहू को... उउफ्फ्फ्...!"

कामिनी अब तक थप्पड़, गलियों से पूरी तरह होश में आ चुकी थी और पागलों की तरह चिल्ला रही थी। उसकी कमर खुद-ब-खुद पीछे की तरफ उठ रही थी, ताऊजी के हर धक्के का स्वागत कर रही थी।

ताऊजी ने एक हाथ आगे बढ़ाकर कामिनी के बालों को मुट्ठी में जकड़ लिया और उसे पीछे खींचा। दूसरे हाथ से उसकी एक गांड को थप्पड़ मारते हुए वे और तेज़ चोदने लगे।
थप्प्... धच्... फचम्म्म... पच्... पचम्म्म...

"ले साली... ले मेरी पूरी ताकत... आज तेरी चुत का भोसड़ा बना दूंगा... आह्ह्ह...!"

कामिनी का पूरा शरीर झटके खा रहा था। उसकी चुत अब ताऊजी के लंड को चूस रही थी, जैसे वो उसे अंदर ही रोकना चाहती हो। उसकी सिसकियाँ अब चीखों में बदल चुकी थीं।
आअह्ह्.... आअह्ह्ह... उउफ्फ्फ... उफ्फ्फ... इससससस... उफ्फ्फ..

करीब आधा घंटा बीत चुका था।
झोपड़ी के अंदर अब सिर्फ़ मांस से मांस की टकराहट, गीली चुत की चपचपाहट और दोनों की हाँफती साँसों की आवाज़ें गूंज रही थीं। ताऊजी अभी भी पीछे से कामिनी को कुत्ते की मुद्रा में चोद रहे थे। उनकी रफ्तार कम नहीं हुई थी, बल्कि और भी जानवरों वाली हो गई थी।
धच्... धच्... पचम्म्म... फच्... फचम्म्म... ओच्... पच्...

ताऊजी के टट्टे अब सिकुड़ने लगे थे। लगातार घिसने और रगड़ने से उनका लंड भी दर्द करने लगा था, लेकिन वो हार मानने को तैयार नहीं थे। उनका चेहरा पसीने से तर था, आँखें लाल, दाँत भींचे हुए।

कामिनी की हालत बेहद खराब हो चुकी थी।  
उसकी चुत अब पूरी तरह खुल गई थी, छेद बड़ा हो गया था, लाल और सूजा हुआ। ताऊजी का मोटा लंड हर बार आसानी से अंदर-बाहर हो रहा था, लेकिन चुत की दीवारें अब थक चुकी थीं। उसका पूरा जिस्म पसीने से नहाया हुआ था। बाल चिपक गए थे, कमर थरथरा रही थी, साँसें फूल गई थीं।

"आअह्ह्ह... ताऊजी... अब नहीं... बस... Plz छोड़ दो... उउफ्फ्फ्... मैं मर जाऊँगी..."

कामिनी आखिरकार चीत्कार उठी। उसकी आवाज़ में अब रोना और गिड़गिड़ाहट दोनों थी। वो इस बीच तीसरी बार झड़ चुकी थी, लेकिन ताऊजी किसी मशीन की तरह चोदे जा रहे थे।
चटाक्... चट्... थप्प्...

ताऊजी ने गुस्से और हवस में कामिनी की मोटी गांड पर जोर-जोर से थप्पड़ मार दिए। गांड लाल हो गई, उँगलियों के निशान पड़ गए।

"चुप साली रंडी! चुप्प...!"

"कहाँ ना या तो मेरा लंड फटेगा या फिर तेरी आत्मा निकलेगी आज इस झोपड़ी से बाहर..."
फच्... फैम्म्म... फच्... पच्... फचम्म्म...

ताऊजी और भी जोर से धक्के देने लगे। उनकी जांघें कामिनी की गांड से बुरी तरह टकरा रही थीं। टट्टे उसके सूजे हुए चुत के दाने को रगड़-रगड़ कर लाल कर चुके थे। हर धक्के के साथ कामिनी का पूरा शरीर आगे की तरफ लुढ़क जाता, फिर वापस खिंच आता।

कामिनी की हालत वाकई मरने लायक हो गई थी। उसकी आँखों से आँसू निकल आए थे, मुँह से लगातार सिसकियाँ और गिड़गिड़ाहट निकल रही थी।

"Plz ताऊजी... छोड़ दो... आअह्ह्ह... मैं नहीं सह सकती... उउफ्फ्फ्... बहुत हो गया..."

Kelly Divine getting destroyed by a big black cock doggystyle ताऊजी ने उसकी कमर को और कसकर पकड़ लिया और पीछे से झुककर उसके कान में गरम साँस छोड़ते हुए बोले,

"क्यों साली? मुझे अपना रंडीपन दिखा रही थी ना? अपनी गांड और चुत चटवा रही थी? भूल गई कि मर्द के पास लंड होता है? औरत कितनी भी बड़ी हो जाए, आखिरकार उसे लंड के नीचे ही आना होता है। याद रखना आज के बाद ये बात..."
धच्... धचम्म्... फच्... पच्... फेवह्ह्...

ताऊजी की बातों में जीवन का सार था, लेकिन उनकी कमर अभी भी बिना रुके चल रही थी। कामिनी की चुत अब पूरी तरह से ढीली और लाल हो चुकी थी, फिर भी ताऊजी का लंड उसे लगातार फाड़ रहा था।

कामिनी का शरीर थककर काँप रहा था। उसकी कमर अब उठने की ताकत भी नहीं बची थी। वो बस चारपाई पर मुँह रखे, गांड ऊपर किए, ताऊजी के हर धक्के को बर्दाश्त कर रही थी।
"आअह्ह्ह... ताऊजी... मैं मर जाउंगी..... Plz... बस कर दो... आह्ह्ह..."

लेकिन ताऊजी अब चरम पर थे। उनके टट्टे सिकुड़-फैल रहे थे। लंड में दर्द के साथ-साथ वीर्य निकलने की तैयारी हो रही थी। उन्होंने कामिनी की कमर को आखिरी बार और कसकर पकड़ा और अपनी पूरी शक्ति से धक्के लगाने लगे।
धच्... धच्... धचम्म्म... फच्... फाचक्..

"आअह्ह्ह... बहू... अब...बस. बस... हो रहा है..." 

ताऊजी की आवाज़ काँप रही थी। उन्होंने कामिनी की कमर को और कसकर पकड़ लिया। उनकी जांघें कामिनी की गांड से ज़ोर-ज़ोर से टकरा रही थीं।
धच्... धचम्म्म... फच्... फाचक्...

कामिनी तड़प रही थी। उसकी चुत अब पूरी तरह थक चुकी थी, लेकिन ताऊजी का लंड अभी भी उसे फाड़ रहा था।
"आअह्ह्ह... ताऊजी... बस कर दो... मैं मर जाऊँगी... उउफ्फ्फ्... Plz... आह्ह्ह..."
चटाक्... चट्...
ताऊजी ने गुस्से में कामिनी की गांड पर दो और जोरदार थप्पड़ मार दिए।

ताऊजी का लंड अचानक और भी सख्त हो गया। उनकी टट्टे पूरी तरह सिकुड़ गए। नसें खुल गईं। बरसों से रुका हुआ वीर्य अब दबाव बनाकर बाहर आने को बेताब था।
फच्... फचम्म्म... फेवह्... फाचक्...
शायद आज वाकई चमत्कार होने वाला था 

ताऊजी ने आखिरी बार अपनी पूरी ताकत से धक्का दिया।
"आअह्ह्ह... बहू... मेरी रंडी... ले... ले पूरा... आआआह्ह्ह्हह...!"
फुचक्... फुच्... फुचुचुच्... दुलुक्... दुलुक्...
आअह्ह्ह.... बहु.... मै झड़ रहा हूँ... आअह्ह्ह.... ताऊजी के चेहरे पे खुशी और आँखों मे बेहोशी साफ दिख रही थी.

ताऊजी का लंड पहली बार झड़ने लगा। गर्म, गाढ़ा, और भारी वीर्य की धार कामिनी की चुत के सबसे गहरे हिस्से में फूट पड़ी। एक... दो... तीन... चार... लंबी-लंबी धारें।

कामिनी को महसूस हुआ जैसे उसकी बच्चेदानी का मुंह खुल गया हो। ताऊजी का सुपाड़ा ठीक गर्भाशय के मुहाने पर अटक गया था और गर्म लावा सीधा उसके अंदर उड़ेला जा रहा था।

"आआआह्ह्ह्हह... ताऊजी... मै मर गई... उउउफ्फ्फ्... गर्म... बहुत गर्म है... आह्ह्ह... भर गई मेरी चुत...!"

कामिनी बुरी तरह चीख उठी। उसकी चीख सुनसान रात में दूर तक गूंज गई। उसका पूरा शरीर आखिरी बार जोर से काँपा। चौथी बार झड़ते हुए उसकी चुत ने ताऊजी के लंड को कसकर दबाया, जैसे सारा वीर्य अंदर ही रोक लेना चाहती हो।
ताऊजी ने एक आखिरी, बहुत गहरा धक्का लगाया।

धचम्म्म्...!

"आआह्ह्ह्हह...!"

ताऊजी का पूरा शरीर काँप उठा। उन्होंने कामिनी की कमर को छोड़ दिया और उसके पीठ पर पूरी तरह ढह गए। उनके टट्टे अब पूरी तरह खाली हो चुके थे। बरसों बाद पहली बार निकला वीर्य अभी भी हल्के-हल्के कामिनी की चुत से बाहर रिस रहा था।

फुक्सक्... फुचक्... दुलुक्...

कामिनी का जिस्म भी पूरी तरह ढीला पड़ गया। वो चारपाई पर मुँह के बल पसर गई, आँखें बंद, साँसें भारी। उसकी चुत से ताऊजी का गाढ़ा, सफेद वीर्य बाहर निकलकर उसकी जांघों पर फैल रहा था।
दोनों का शरीर पसीने, थूक और वीर्य से सराबोर था।

ताऊजी ने थकी हुई, लेकिन संतुष्ट आवाज़ में फुसफुसाते हुए कहा,

"कामिनी बहू... आज से ये बूढ़ा तेरा गुलाम हुआ... तूने वो कारनामा कर दिया जो बड़े से बड़ा हकीम भी ना कर सका.."
ये आखिरी शब्द थे। ताऊजी कामिनी की पीठ पर ही ढेर हो गए। आज उनका वजन हल्का हो गया था, बरसो कि एक टिस, एक फांस निकल गई थी.

झोपड़ी में अब सिर्फ़ दोनों की भारी, थकी हुई साँसें सुनाई दे रही थीं। बाहर चाँदनी रात अभी भी सन्नाटे में डूबी हुई थी।

क्रमश:




Sorry दोस्तों समय कि कमी कि वजह से मै image नहीं डाल सकता.
उम्मीद करना हूँ, आप लोग कहानी पढ़ कर अपनी इमेजिनशन कर ही लेंगे.
आगे के पार्ट लिखने है तो मै चाहता हूँ जो समय मिला है उसे image search करने और कहानी मे सही जगह लगाने मे व्यर्थ ना करू.
उम्मीद है आप मेरी मज़बूरी समझेंगे.

धन्यवाद...