स्टोर रूम के उस घुटन भरे अँधेरे से निकलकर कामिनी लगभग भागते हुए सीधे हवेली के गुसलखाने (बाथरूम) में घुसी और झट से अंदर की कुंडी लगा दी।
उसकी हालत बहुत ख़राब थी। उसका पूरा गोरा जिस्म पसीने से नहा चुका था। साँसें धौंकनी की तरह चल रही थीं और छाती बेतहाशा ऊपर-नीचे हो रही थी। कामिनी बेसिन के पास खड़ी हुई और नल खोलकर अपने सुलगते हुए चेहरे पर ठंडे पानी की ज़ोरदार बौछारें मारने लगी।
'छप... छप... छपाक्क्....'
पानी बर्फ़ जैसा ठंडा था, लेकिन कामिनी का चेहरा इतनी बुरी तरह जल रहा था कि वो पानी भी उसे राहत नहीं दे पा रहा था। चेहरा क्या... सुलेमान कि छुवन ने उसके पूरे जिस्म को किसी धधकती हुई भट्टी में बदल दिया था, जो सिर्फ़ आग उगल रही थी।
कामिनी ने अपने काँपते हुए हाथों को देखा। उसकी हथेलियों और उँगलियों में एक अजीब सी झनझनाहट हो रही थी। उसे अभी भी बिल्कुल वैसा ही महसूस हो रहा था जैसे सुलेमान का विशाल, मोटा और नरम हथियार अभी भी उसकी मुट्ठी में क़ैद है। माँस की गर्मी और उसकी गोलाई का अहसास कामिनी की नसों में बिजली दौड़ा रहा था।
और नीचे का हाल तो सबसे ज़्यादा ख़राब था। उसकी बिना पैंटी वाली चुत से कामरस इस तरह टपक रहा था जैसे बरसात के मौसम में किसी ग़रीब की झोपड़ी टपकती हो। उसकी दोनों भारी जाँघें गाढ़े पानी से पूरी तरह भीग कर चिपचिपी हो चुकी थीं।
"उफ्फफ्फ्फ़.... क्या था ये? हे भगवान, क्या हुआ था अभी?"
कामिनी ने बेसिन के ऊपर लगे छोटे से शीशे (कांच) में अपनी लाल आँखों और अस्त-व्यस्त रूप को देखते हुए ख़ुद से बड़बड़ाई।
उसे ख़ुद पर यक़ीन नहीं हो रहा था कि वो एक अनजान, देहाती मज़दूर के लंड को अपनी मुट्ठी में भींच रही थी और उसके मुँह पर अपनी गांड रगड़ रही थी।
लेकिन सोचने का समय नहीं था। बाहर मृत्युभोज का बड़ा काम चल रहा था और वो ज़्यादा देर अंदर बाथरूम में नहीं छुप सकती थी।
उसने एक लंबी साँस ली, अपने पल्लू से चेहरा पोंछा और साड़ी को ठीक किया। अपनी उबलती हुई हवस को किसी तरह अंदर दबाकर उसने गुसलखाने का दरवाज़ा खोला और बाहर आँगन की तरफ़ चल दी।
लेकिन जैसे ही उसने चलना शुरू किया...
'पच... पच... पच्च...'
उसके चलने से दोनों चिपचिपी जाँघों के आपस में टकराने के कारण एक बेहद महीन, गीली और मादक सी आवाज़ उत्पन्न होने लगी। कामिनी की चुत का पानी उसकी जाँघों पर इस कदर फैल गया था कि हर कदम पर वो माँस आपस में चिपकता और फिर 'पच' की आवाज़ के साथ खुलता।
कामिनी अंदर तक सिहर उठी। अगर आस-पास से गुज़रता हुआ कोई भी इंसान ज़रा सा ग़ौर करता, तो वो एक औरत के पैरों के बीच से आती ये मादक आवाज़ आसानी से सुन लेता। कामिनी डर और हवस के उसी मिले-जुले ख़ौफ़नाक रोमांच के साथ, अपनी जाँघों को हल्का सा चौड़ा करके, अपनी भारी गांड मटकाती हुई आँगन की तरफ़ बढ़ गई।
उधर पीछे हलवाइयों की भट्टी के पास... सुलेमान की हालत भी कोई बहुत ठीक नहीं थी।
अंडरवर्ल्ड माफिया, जिसके नाम से लोग काँपते थे, आज एक औरत के हुस्न के आगे बेबस महसूस कर रहा था। स्टोर रूम में कामिनी के जिस्म से उठी कसैली, मादक गंध सुलेमान की नाक से होती हुई सीधे उसके दिमाग़ और जिस्म में उतर गई थी।
सुलेमान ख़ुद को दिमाग़ी तौर पर सँभालने की पूरी कोशिश कर रहा था।
"साले सुलेमान... क्या करने आया है तू यहाँ? अपनी औकात और अपना मक़सद भूल गया क्या?" वो बार-बार ख़ुद को झकझोर रहा था, लेकिन जैसे ही वो आँखें झपकाता, उसके सामने साड़ी के अंदर कामिनी की भारी, बिना पैंटी की मटकती हुई गांड और उसके पसीने से भीगे स्तन नाचने लगते। उसका लंड पाजामे के अंदर नाचने के इरादे से बार बार अंगड़ाई लेने कि कोशिश कर रहा था.
"अगर वाकई ये औरत कादर खान के साथ मिली हुई है... तो आज रात भोज मे कादर ज़रूर आएगा,"
सुलेमान ने अपने शातिर दिमाग़ के घोड़े दौड़ाए। "लेकिन साला... इस औरत की भोली शक्ल और इसका ये हाल देखकर लगता तो नहीं कि वो कुछ जानती है या कादर के किसी भी धंधे से उसका कोई लेना-देना है। पर अगर लेना-देना नहीं है... तो शहर की ये औरत इस गाँव में क्या कर रही है?"
सुलेमान इसी भारी उलझन और कामिनी की हवस में अंधा होकर उन दोनों विशाल भगोनों को उठाए चला जा रहा था। उसे आस-पास का कोई होश नहीं था।
"ऐ भाई! भगोना नीचे रख भी दो अब... या पूरे दिन सर पर ही लेकर खड़ा रहेगा?"
अचानक मुख्य हलवाई की कड़क आवाज़ ने सुलेमान का ध्यान तोड़ा और उसे ख्यालों की दुनिया से बाहर खींच लाया।
सुलेमान चौंका। उसने देखा कि वो कब चलते-चलते हलवाई की भट्टी के बिल्कुल पास पहुँच गया था, उसे ख़ुद ही पता नहीं चला।
'धममम... झन्नाक्क्...!'
सुलेमान ने झटके से वो दोनों भारी पीतल के भगोने ज़मीन पर भट्टी के पास पटक दिए।
***************
हवेली के आँगन में बैठी औरतों ने आख़िरकार चावल बीन कर साफ़ कर दिए थे। कुछ औरतें अपने कमर सीधी करते हुए सुस्ता रही थीं। हवेली की बहू होने के नाते कामिनी को सारी तैयारियों का जायज़ा लेना था, लेकिन उसका मन किसी भी काम में लग ही नहीं रहा था। वो तो बस अपनी ही दुनिया में कहीं खोई हुई थी।
मौसम में अब उतनी गर्मी नहीं थी, लेकिन फिर भी कामिनी का क्रीम रंग का सूती ब्लाउज़ पसीने से पूरी तरह भीग कर उसके स्तनों से चिपका हुआ था। ये गर्मी मौसम की नहीं, बल्कि उसके अंदर सुलगते हुए ज्वालामुखी की थी।
"बहू रानी... ये चावल धुलवा कर पीछे हलवाई तक पहुँचा दो, पुलाव चढ़ाना है," अचानक आँगन में पैर रखते हुए ताऊजी की खुरदरी आवाज़ गूँजी।
"जज... जी ताऊजी," कामिनी एक झटके से जैसे होश में आई। उसकी उखड़ती साँसें और लाल चेहरा देखकर कोई भी समझ जाता कि वो बीमार है या फिर... किसी गहरी 'तलब' में है।
"वो कहाँ गया सुलेमान?" कमला काकी ने अपनी थकान मिटाते हुए मुँह बनाकर पूछा। "उसे बोलो कि ये भारी टोकरी उठाकर पीछे हैंडपंप तक ले चले... मैं आकर धुलती हूँ इन्हें।"
"यहीं हूँ... कामचोर नहीं हूँ।"
ताऊजी के ठीक पीछे से एक बेहद कड़क और भारी मर्दाना आवाज़ गूँजी। सबने मुड़कर देखा। सुलेमान अपने उसी खूँखार और विशाल रूप में सीना ताने खड़ा था।
उसकी गूँजती हुई आवाज़ कानों में पड़ते ही कामिनी का गोरा जिस्म एक बार फिर बुरी तरह पसीज गया। उसकी जाँघों के बीच की 'पच-पच' वाली नमी अचानक और बढ़ गई। उस दैत्याकार मर्द को अपने इतने क़रीब देखकर कामिनी की नसों में फिर से बिजली दौड़ने लगी।
कमला काकी ने सुलेमान को देखकर हिकारत से अपना मुँह बना लिया। उसे सुलेमान की ये अकड़ और आँखों की निडरता बिल्कुल पसंद नहीं आ रही थी। एक मज़दूर को सिर झुका कर बात करनी चाहिए, लेकिन सुलेमान आँखों में आँखें डालकर बात करता था।
कमला काकी चावल धोने उठने ही वाली थी कि अचानक कामिनी के मुँह से बेसाख़्ता निकल गया
"त... त... तुम... तुम ये चावल लेकर चलो सुलेमान... मैं... मैं आती हूँ धोने।"
आँगन में सब कामिनी की तरफ़ देखने लगे। लेकिन कामिनी को ख़ुद नहीं पता था कि उसने ये क्यों कहा। ना जाने वो क्यों ख़ुद सुलेमान के साथ जाना चाहती थी। सच तो ये था कि उसे इस फौलादी और अनजान मर्द का साथ बहुत अच्छा लग रहा था। उसकी मर्दाना गंध उसे अपनी तरफ़ खींच रही थी।
बिना कुछ बोले, सुलेमान आगे बढ़ा और उसने झुक कर चावल से भरी भारी टोकरी को अपने एक ही हाथ से उठा लिया। टोकरी उठाते ही उसके काले कुरते के अंदर उसकी बाज़ुओं की नसें तन गईं और कुरते का कपड़ा उसके बाइसेप्स (Biceps) पर बुरी तरह कस गया।
कामिनी की नशीली और सरसरी निगाहें सुलेमान की फौलाद जैसी मज़बूत, पसीने से भीगी और कसी हुई बाज़ुओं पर दौड़ गईं। उस ताक़त को देखकर कामिनी का गला सूखने लगा।
"आइए... का...का... मतलब मैडम," सुलेमान के मुँह से कामिनी का नाम निकलते-निकलते रह गया। उसने बड़ी चालाकी से बात सँभाली और अपना रुख पीछे की तरफ़ कर लिया।
सुलेमान टोकरी कंधे पर रखे आँगन से नीचे उतरा और हवेली के पिछले हिस्से की तरफ़ चल दिया, जहाँ हलवाई का पूरा तामझाम और कड़ाहियाँ चढ़ी हुई थीं। कामिनी भी अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसते हुए, अपनी भारी गांड मटकाती हुई उसके ठीक पीछे-पीछे चल दी।
हलवाइयों की भट्टी से थोड़ा ही आगे, कुछ घने पेड़ों की आड़ और सन्नाटे में वो पुराना हैंडपंप (Handpump) लगा हुआ था।
ये कोई आम हैंडपंप नहीं था। ये बिल्कुल वही जगह थी, वही हैंडपंप था जहाँ कुछ रात पहले... कामिनी ने आधी रात के अँधेरे में स्नान किया था। इसी हैंडपंप के ठंडे पानी से उसने अपने तपते हुए जिस्म की आग बुझाई थी, और आज... उसी एकांत जगह पर वो सुलेमान जैसे सुलगते हुए ज्वालामुखी के साथ जा रही थी।
'घच-पच... घचम.. पच....'
हैंडपंप का हत्था ऊपर-नीचे हो रहा था और पानी की ठंडी धार टोकरी में गिरकर उछल रही थी। सुलेमान के मज़बूत बाज़ू और उसके कंधे की नसें उस मेहनत से तन गई थीं। कामिनी उकड़ू बैठी चावल धो रही थी, लेकिन उसकी स्थिति ऐसी थी कि साड़ी उसकी गांड के उभार पर पूरी तरह कस चुकी थी। वो एक सुडौल मूर्ति की तरह लग रही थी, उसके घुटनों के दबाव से उभरे हुए स्तन पसीने और पानी की वजह से ब्लाउज के अंदर और भी ज़्यादा नुकीले और सख्त नज़र आ रहे थे।
सुलेमान की नज़रें उस पूरे मंज़र को पी रही थीं। उसके हाथों की पकड़ पंप के हत्थे पर लोहे जैसी मज़बूत थी, लेकिन उसकी हवस का पारा चढ़ता जा रहा था। कामिनी ने आज अपनी नंगता या अपने जिस्म को छुपाने की ज़रा भी कोशिश नहीं की थी।
"तुम यहाँ कब से हो... कामिनी?" सुलेमान ने अचानक उस चुप्पी को तोड़ा। उसने ताऊजी या काकी की तरह 'बहू रानी' नहीं कहा, सीधा उसके नाम पर आया।
कामिनी ने सर उठाया। सूरज की रौशनी में सुलेमान की चौड़ी छाती के बाल और पसीने से चमकता हुआ उसका फौलादी जिस्म कामिनी की आँखों को चौंधिया रहा था।
"कुछ दिन ही हुए... रमेश की ताईजी यहाँ रहती थीं, वो गुज़र गईं, इसलिए आना हुआ," कामिनी ने जवाब दिया और फिर से चावल धोने में मसरूफ हो गई।
‘मतलब ये इस कादर के साथ यहाँ नहीं आई है... ये बेचारी तो मोहरे जैसी है,’ सुलेमान ने अपनी गणित पक्की की।
टोकरी का पानी भर चुका था। कामिनी के नाजुक हाथ चावलों के बीच उलझ रहे थे। सुलेमान से बर्दाश्त नहीं हुआ। वो हैंडपंप छोड़कर ठीक कामिनी के सामने उकड़ू बैठ गया। उसने अपने भारी-भरकम, मोटे हाथ सीधे उस ठंडे पानी के टोकरे में डाल दिए।
जैसे ही सुलेमान के उन मज़बूत, खुरदरे हाथों ने कामिनी की कोमल और नाज़ुक उंगलियों को छुआ, ठंडे पानी के बीच भी एक बिजली सा करंट दौड़ा। कामिनी का शरीर झटके से काँप गया।
"तुम सच में मज़दूर हो?" कामिनी ने वापस वही सवाल दागा। उसे सुलेमान की आँखों में मज़दूर की लाचारी नहीं, बल्कि एक रौब नज़र आ रहा था।
"हहहम.... हाँ... कामिनी," सुलेमान ने उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा। उसकी आवाज़ में एक भारीपन था जो सीधा कामिनी के अंतर्मन को छू रहा था।
"तुम्हें देख के... लगता नहीं," कामिनी फुसफुसाई।
"मज़बूरी होती है... वरना कौन मज़दूर बनना चाहता है," सुलेमान ने बात काटते हुए, टोकरी के अंदर कामिनी के हाथों को अपने बड़े हाथों में लिया और चावलों के साथ उन उंगलियों को रगड़ना शुरू किया।
वो चावल साफ़ नहीं कर रहा था, वो तो कामिनी के जिस्म की गर्मी को अपनी उंगलियों से महसूस कर रहा था।
"आउच...!" कामिनी अचानक झटके से आगे को सरकी। उसका बैलेंस बिगड़ा और साड़ी का पल्लू जो अब तक उसके सीने को ढके हुए था, वो पूरी तरह से हट गया। उसके पसीने से भीगे हुए भारी स्तन ब्लाउज के अंदर से बाहर को झाँकने लगे।
"क्या कर रहे हो... आराम से! तुम्हारी तरह सांड नहीं हूँ मैं," कामिनी हड़बड़ा कर बोली। उसकी आवाज़ में गुस्सा कम और तड़प ज़्यादा थी।
सुलेमान की लाल आँखें कामिनी के स्तनों पर गड़ गई, उसने दबी हुई मुस्कान के साथ कहा, "भरी-पूरी गाय हो... दिख रहा है।"
कामिनी को अपनी नंगता का अहसास हुआ। वो झट से टोकरी से हाथ निकालकर अपने पल्लू को संभालने गई। लेकिन उसके हाथ गीले थे और उन पर चावल के दाने लगे हुए थे। जैसे ही उसने अपने गीले हाथों को ब्लाउज पर रखा, चावल के वो दाने उसके स्तनों की घाटी (Cleavage) में जाकर समा गए।
ब्लाउज पहले ही पसीने से गीला था, और अब उन चावल के दानों की खुरदरी चुभन सीधा उसके निप्पल (Nipples) पर होने लगी। चावल की उस चुभन से कामिनी के निप्पल ब्लाउज के अंदर बिजली की तरह कड़क और सख्त हो गए, जो साफ़ दिखाई दे रहे थे।
सुलेमान का लंड उसके पाजामे के अंदर पागलों की तरह उछलने लगा।
"ये क्या किया तुमने?" कामिनी हांफते हुए बोली, अपने स्तनों को छुए बिना पल्लू सही करने की नाकाम कोशिश कर रही थी।
सुलेमान उसकी आँखों में देखते हुए बोला, "मैंने क्या किया? मैंने तो हाथ भी नहीं लगाया.
"अरे बहुरानी... चावल धुले नहीं क्या?"
अचानक एक तीखी और कर्कश आवाज़ ने उस जादुई सन्नाटे को तार-तार कर दिया। कमला काकी हैंडपंप के पास वाले पेड़ों की आड़ से निकल कर वहाँ प्रकट हो गई थीं।
एक पल को कामिनी की साँसें गले में अटक गईं। उसकी हालत बेहद ख़राब थी। उसके स्तनों की घाटी में चावल के दाने चिपके हुए थे, उसका ब्लाउज पसीने और पानी से बुरी तरह भीगा हुआ था, और उसकी आँखों में जो नशा था, वो किसी भी समझदार औरत की पकड़ में आ सकता था।
कामिनी सकपका गई, "वो... काकी... बस... बस अभी कर ही रहे थे..."
कमला काकी ने अपनी तीखी नज़रों से कामिनी को ऊपर से नीचे तक घूरा। उसे कुछ अजीब लगा, लेकिन वो समझ नहीं पाई कि असल में यहाँ क्या चल रहा था।
"मैंने तो पहले ही कहा था कि ये सब काम तुम्हारे लायक नहीं हैं, तुम जाओ... साड़ी बदल लो, देखो ये कितनी गीली हो गई है," कमला काकी ने हुक्म के अंदाज़ में कहा। वाकई, कामिनी की क्रीम रंग की साड़ी पानी और चावल धोने की छींटों से जगह-जगह से चिपचिपी और गीली हो चुकी थी।
कामिनी, जो अब तक पौरुष की महक और सुलेमान की नज़रों में खोई हुई थी, उसने झट से अपना पल्लू सँभाला, अपनी हथेलियों को झाड़ा और अपने स्तनों पर चिपके चावलों को छुपाने की कोशिश की।
"ऐ... तुम क्या देख रहे हो? चलाओ हैंडपंप, खड़े क्या हो?"
कमला ने ऑर्डर चलाया,
सुलेमान का सारा जोश एक पल में ठंडा हो गया। उसके मन में जो ज्वाला भभक रही थी, वो कमला काकी की मौजूदगी ने बुझा दी थी। वह अपना मन मसोस कर रह गया।
"साला, अभी जन्नत की परी बैठी थी मेरे सामने, और अब ये काली-कलूटी, मोटी, भद्दी औरत आकर खड़ी हो गई!" सुलेमान ने मन ही मन कमला काकी को हज़ार गालियाँ दीं। उसका तो पूरा मूड ही ख़राब हो गया.
सुलेमान ने बुझे हुए मन से, बेरुखी के साथ हैंडपंप का हत्था फिर से पकड़ लिया।
घच... पच... घच... पच...'
हैंडपंप का शोर फिर से शुरू हो गया, लेकिन अब नज़ारा बदल चुका था। कामिनी को मजबूरी में वहाँ से उठकर हवेली की तरफ़ क़दम बढ़ाने पड़े। जाते-जाते उसने एक बार पीछे मुड़कर सुलेमान को देखा, जो अब चिढ़ कर पानी चला रहा था।
************
सूरज ढल चुका था और रात की कालिमा के साथ ही हवेली में एक मेले जैसा माहौल बन गया था। आस-पास के गाँवों से भी लोग पंगत में शामिल होने आने लगे थे, क्योंकि गाँव के लोग चाहे जो छोड़ दें, पर ऐसा खुला खाने का निमंत्रण कभी नहीं छोड़ते।
हवेली का बड़ा सा आँगन अब पूरी तरह ग्रामीणों से खचाखच भर चुका था। जनरेटर (Generator) स्टार्ट हो गया था और उसकी 'भक-भक-भक' की तेज़ आवाज़ के साथ पूरा आँगन बड़े-बड़े पीले बल्बों की तेज़ रोशनी से जगमगा उठा था।
आँगन के एक कोने में सजे हुए तख़्त पर गाँव के रसूखदार लोग मठाधीशों की तरह जमे हुए थे। फ़ौजा सिंह, हकीम लकड़द्दीन और पंचायत के कुछ और बड़े चेहरे वहाँ बैठे हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। हुक्के का गाढ़ा धुआँ और पंगत में बँटती हुई गर्मागर्म सब्ज़ी-पूड़ी की महक पूरे माहौल में रची-बसी थी। ताऊजी एक हाथ में लाठी लिए पूरे रौब से पंगत की व्यवस्था सँभालने में लगे थे, जबकि सुलेमान, काला, कांडी और बाकी के मज़दूर पसीने से लथपथ होकर खाने के भारी-भारी टोकरे ढो रहे थे। यहाँ किसी को एक पल के लिए भी साँस लेने की फ़ुर्सत नहीं थी।
लेकिन इस पूरी गहमा-गहमी के बीच... कामिनी दोपहर के बाद से किसी को दिखाई नहीं दी थी।
वो हवेली के पिछले हिस्से में, जहाँ हलवाइयों की बड़ी-बड़ी कड़ाहियाँ और भट्टियाँ धधक रही थीं, वहीं गाँव की औरतों के साथ बैठी पूड़ियाँ तलने और बेलने में व्यस्त थी। फागुन भी उसी के पास बैठी पूड़ियाँ निकाल रही थी।
कामिनी की हालत अब तक ख़राब... बल्कि बहुत ही ज़्यादा ख़राब हो चुकी थी! उसने दोपहर वाली वो गीली साड़ी बदलकर हल्के आसमानी रंग की एक बेहद पतली और सादी सूती साड़ी पहन ली थी। लेकिन उसके जिस्म के अंदर जो हकीम की 'पीली दवा' का लावा उबल रहा था, उसका कोई इलाज उसके पास नहीं था।
एक तो उसके अपने ही जिस्म की वो भड़कती हुई कामुक गर्मी, ऊपर से भट्टी की झुलसाने वाली आँच और चारों तरफ़ की ये भयानक भीड़-भाड़... ये सब मिलकर आज कामिनी के सब्र और उसके चरित्र की सबसे कठिन परीक्षा ले रहे थे।
गर्मी अब कामिनी की बर्दाश्त से बिल्कुल बाहर हो चुकी थी। उसका नया सूती ब्लाउज़ भी पसीने से पूरी तरह तरबतर होकर उसके भारी स्तनों से चिपक गया था। पसीने से उसकी काँखें (Armpits) बिल्कुल चिपचिपी हो गई थीं। साड़ी के अंदर बिना पैंटी वाली उसकी चुत कामरस से इतनी ज़्यादा लबालब हो चुकी थी कि जाँघों के बीच एक असहज सी गीली रगड़ पैदा हो रही थी।
कामिनी का बार-बार मन कर रहा था कि वो ये सब कुछ छोड़-छाड़ कर किसी अँधेरे कोने में चली जाए, अपनी उँगलियों से अपने सुलगते हुए जिस्म को सहला ले, और अपनी जाँघों के बीच मचलती हुई आग को किसी भी तरह शांत कर ले। लेकिन इस भीड़ में ये मुमकिन नहीं था।
ख़ुद के दिमाग़ को और अपने मचलते हुए हाथों को बिज़ी रखने के लिए, कामिनी ने ज़ोर-ज़ोर से पूड़ियाँ बेलना शुरू कर दिया।
लेकिन ये कोशिश भी उस पर भारी पड़ रही थी। बेलन चलाते वक़्त कामिनी के हाथ जितनी तेज़ी से आगे-पीछे होते, उसके भारी और आज़ाद स्तन ब्लाउज़ के अंदर उतनी ही बेदर्दी से उछलते। उसकी हर हरकत पर उसका यौवन छलक रहा था।
इन्हीं सब के बीच सुलेमान, अपने विशाल और पसीने से चमकते फौलादी जिस्म के साथ बार-बार वहाँ आता, गर्मागर्म पूड़ियों का भारी टोकरा उठाता और वापस पंगत की तरफ़ दौड़ जाता। समय इतना तेज़ भाग रहा था कि किसी के पास इतना वक़्त ही नहीं था कि कोई किसी को मुड़कर देखे, या उन दोनों के बीच पनप रही मूक हवस को महसूस करे। बस जब भी सुलेमान टोकरा उठाने झुकता, कामिनी की नशीली और भूखी आँखें एक पल के लिए उसके भारी मर्दाने जिस्म पर जाकर टिक जातीं।
उधर सामने जगमगाते आँगन में...
"वाह भाई रमेश! मानना पड़ेगा, व्यवस्था बिल्कुल ठीक की है तुमने। सब सही चल रहा है। खाना पूरी मात्रा में बनवाया है ना?" फ़ौजा सिंह ने अपने मुँह में पान चबाते हुए, हुक्के की नली छोड़कर रमेश की तारीफ़ की।
"अरे भरपूर बनवाया है काका! पूरा गाँव अगर दो बार भी बैठकर खा ले, तो भी कम नहीं पड़ेगा," रमेश ने सीना चौड़ा करते हुए चहक कर जवाब दिया। उसने अपनी ज़िम्मेदारी तो बख़ूबी निभाई थी और लोगों से मिल रही तारीफ़ें उसका घमंड बढ़ा रही थीं।
लेकिन अंदर ही अंदर रमेश की हालत ख़राब हो रही थी। उसे एक अजीब सी बेचैनी घेरे हुए थी। उसके पैर काँप रहे थे और हाथों की उँगलियों में एक अनियंत्रित सी कंपन (Tremors) शुरू हो गई थी। उसका गला सूख रहा था।
होती भी क्यों ना? शाम पूरी तरह से ढल चुकी थी और एक पियक्कड़ का शरीर अब अपनी ख़ुराक यानी 'दारू' माँग रहा था। रमेश को शराब की वो भयंकर तलब उठ रही थी जो किसी भी शराबी को पागल कर देती है।
लेकिन इन सब के बीच, इस सैलाब जैसी पंगत और ताऊजी की पैनी नज़रों से बचकर, एक घूँट मारने की फ़ुर्सत रमेश को कहाँ थी? वो बस किसी तरह इस भीड़ के छँटने का इंतज़ार कर रहा था ताकि वो जाकर अपनी प्यास बुझा सके।
दोनों पति पत्नी अपनी अपनी प्यास से जूझ रहे थे, ये मेला खत्म होने का इंतज़ार कर रहे थे.
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सुलेमान पंगत में पूड़ियों और सब्ज़ियों के टोकरे भले ही मज़दूरों की तरह ढो रहा था, लेकिन उसका शातिर दिमाग़ और उसकी बाज़ जैसी नज़रें लगातार हर तरफ दौड़ रही थीं। वो हवेली के दरवाज़े से अंदर आने वाले हर एक अजनबी चेहरे को गौर से तौलता, आँगन में बैठे रसूखदार लोगों के बीच किसी जाने-पहचाने चेहरे को तलाशता।
लेकिन इतनी भारी भीड़ और घंटों की मशक्कत के बाद भी... सुलेमान को वो चेहरा कहीं दिखाई नहीं दिया, जिसकी तलाश में वो शहर छोड़कर इस गँवारों के बीच मज़दूरी कर रहा था।
ये कादर खान क्यों नहीं आया अभी तक, उन हरामखोरो ने तो कहाँ था कादर इसी गांव ने है, उसे यहाँ आना तो चाहिए था," सुलेमान ने पसीने से भीगा अपना माथा पोंछते हुए मन ही मन सोचा।
धीरे-धीरे समय गुज़रने लगा। रात गहराती जा रही थी।
हवेली के आँगन से भीड़ अब थोड़ी कम होने लगी थी। दूर के गाँवों से आए मेहमान खा-पीकर अपने घरों को लौट चुके थे। अब पंगत में ज़्यादातर अपने ही गाँव वाले और कुछ ख़ास रिश्तेदार ही बचे थे। सुलेमान और बाकी मज़दूरों के कंधों से काम का वो भयानक बोझ अब कुछ हद तक कम हो गया था।
रात के लगभग 10 बज चुके थे।
हवेली के पिछले हिस्से में, जहाँ भट्टियों की आँच अब थोड़ी मद्धम पड़ गई थी, वहाँ कामिनी अभी भी यंत्र की तरह पूड़ियाँ बेले जा रही थी। उसका चेहरा पसीने और भट्टी की गर्मी से लाल टमाटर की तरह दहक रहा था।
हकीम की दवा और उसकी बढ़ती उत्तेजना का असर अब भी उसकी रगों में उबल रहा था, लेकिन लगातार काम करने की वजह से वो अपनी भयानक हवस को किसी तरह छुपाने में क़ामयाब रही थी।
तभी पास ही बैठी फागुन ने अपने पल्लू से हाथ पोंछते हुए कहा
"चलिए कामिनी माँ... आप भी अब हाथ धो लीजिए और कुछ खा लीजिए। इतनी पूड़ियाँ बहुत हैं अब। बाहर अब ज़्यादा लोग नहीं बचे हैं।"
फागुन की आवाज़ सुनकर कामिनी ने बेलन रोक दिया। उसके हाथों में दर्द हो रहा था और कमर अकड़ गई थी, लेकिन इन सबसे ज़्यादा दर्द उसकी जाँघों के बीच और उसकी छाती में हो रहा था।
हवस को दबाये रखने से उसके स्तन पहले से कहीं ज्यादा फूल गए थे, कड़क हो गए थे, एक मीठा मीठा सा दर्द होने लगा था,
ये सदा सिंपल हलके कपडे भी उसे बोझ लग रहे थे, कांटे कि तरह उसके जिस्म मे चुभ रहे थे.
"हम्म... ठीक है," कामिनी ने एक गहरी, थकी हुई साँस ली।
वो उठी, लेकिन उठते ही उसे अपनी जाँघों के बीच की भयंकर चिपचिपाहट और भारीपन महसूस हुआ। साड़ी अंदर से कामरस से इस क़दर भीग चुकी थी कि उसे चलने में भी दिक़्क़त हो रही थी।
आँगन के एक कोने में सजे तख़्त पर फ़ौजा सिंह, हकीम लकड़द्दीन और आस-पास के गाँवों के कुछ प्रमुख रसूखदार लोग बैठे हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। तभी कामिनी अपनी साड़ी का पल्लू सँभालते हुए, फागुन के साथ उनके ठीक सामने से गुज़रती हुई हवेली के अंदर की तरफ़ बढ़ी।
तख़्त पर बैठे उन तमाम लोगों में से... फ़ौजा सिंह और हकीम लकड़द्दीन वो दो लोग थे, जो कामिनी के इस गदराए हुए गोरे जिस्म को पहले ही 'भोग' चुके थे।
जैसे ही कामिनी उनके सामने से गुज़री, उन दोनों की आँखें किसी भूखे भेड़िए की तरह कामिनी की मदमस्त, लहराती हुई चाल और उसकी भारी गांड के मटकने पर गड़ गईं। दोनों मन ही मन उसके जिस्म की गर्मी को याद करके सुलग उठे।
अगर इस वक़्त हवेली में ये हज़ारों की भीड़ ना होती और उन्हें मौका मिल जाता, तो वो दोनों इसी आँगन में कामिनी को यही दबोच लेते.
और सच तो ये था कि... इस वक़्त कामिनी भी उन्हें मना नहीं करती!
उसकी जाँघों के बीच इस वक़्त कामरस का वो सैलाब बह रहा था कि अगर कोई उसे टोकता, तो वो किसी 'रंडी' की तरह पूरे गाँव के सामने निर्वस्त्र होकर चुदने के लिए तैयार हो जाती।
लेकिन, एक इज़्ज़तदार परिवार की बहू होने की लज्जा, हया और वो बचे-खुचे संस्कार ही थे, जिन्होंने कामिनी को किसी तरह बाँध रखा था। अपनी उबलती हुई हवस को अपने काँपते होंठों के बीच दबाए, कामिनी सिर झुकाए फागुन के साथ हवेली के अंदर चली गई।
हुस्न का ख़ामोश और नशीला तमाशा महज़ 5 सेकंड चला और फिर खत्म हो गया।
कामिनी के जाते ही, पास बैठे दूसरे गाँव के सरपंच रामचरण ने फ़ौजा सिंह की तरफ़ मुड़कर वो सवाल पूछ लिया, जिसने अचानक वहाँ का माहौल गंभीर कर दिया।
"फ़ौजा भाई... एक बात बताओ, ये सुगंधा ताई तो बड़ी हट्टी-कट्टी और स्वस्थ थीं ना? ना कोई बीमारी, ना कोई खटिया पकड़ी थी। फिर ये अचानक रात ही रात में क्या हुआ उन्हें?"
रामचरण के इस सीधे सवाल पर फ़ौजा सिंह अंदर से थोड़ा चौंका, लेकिन उसके बोलने से पहले ही पास बैठे हकीम लकड़द्दीन ने अपनी दाढ़ी खुजाते हुए जवाब दिया
"मियाँ रामचरण, यही तो हमें भी समझ नी आ रिया है! सुगंधा बीबी तो बिल्कुल खुस तबियत की मालकिन थीं। ना जाने अल्लाह को क्या मंज़ूर था, क्या हो गिया रात में अचानक।"
"हाँ... भाई रामचरण, मुझे भी कुछ समझ नहीं आया कि ये अनर्थ कैसे हो गया," फ़ौजा सिंह असमर्थता जता दी.
ठीक उसी वक़्त... ताऊजी पंगत की व्यवस्था देखते हुए उस तख़्त के बिल्कुल पास से गुज़र रहे थे।
जैसे ही ताऊजी के कानों में सरपंच रामचरण का सवाल और सुगंधा की मौत' का ज़िक्र पड़ा... उनके चलते हुए कदम एक पल के लिए ठिठके। उनका जबड़ा एकदम से सख़्त हो गया, उन्होंने अपने दाँत कस कर भींच लिए और उनके झुर्रियों भरे चेहरे पर ग़ुस्से और ख़ौफ़ की एक गहरी लकीर उभर आई। उनके दोनों हाथों की मुट्ठियाँ अपने आप कस गईं।
ताऊजी के हाव-भाव में आए इस अचानक और ख़तरनाक बदलाव को तख़्त पर बैठे लोगों ने तो नहीं देखा, लेकिन... ताऊजी के ठीक पीछे-पीछे पूड़ियों का टोकरा लिए आ रहे बंटी ने इसे बिल्कुल साफ़ महसूस कर लिया!
बंटी की जासूसी नज़रें ताऊजी की भींची हुई मुट्ठियों और उनके सख़्त होते जबड़े पर टिक गईं।
"साला... कहीं इस ठरकी बूढ़े ने ही तो ताईजी को नहीं टपका दिया?"
बंटी का वो शक, ताऊजी का ये कातिलाना चेहरा देखकर पूरी तरह से पुख़्ता होने लगा।
खेर अभी वक़्त नहीं था, बंटी तुरंत पंगत की तरफ़ आगे बढ़ गया "पूड़ी.... पूड़ी... गरम पूड़ी....."
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कमरे के अंदर का माहौल बाहर के शोर-शराबे से बिल्कुल अलग था। कामिनी बिस्तर के किनारे बैठी बेतहाशा हाँफ रही थी।
"क्या हुआ माँ जी, तबियत तो ठीक है ना आपकी?" फागुन ने कामिनी की बेचैनी, उसके दहकते लाल चेहरे और पसीने से पूरी तरह भीगे हुए जिस्म को देखकर चिंता भरे स्वर में पूछा।
"ठ.. ठ... ठीक हूँ मैं... बस गर्मी लग रही है बहुत," कामिनी ने किसी तरह अपनी उखड़ती साँसों और अपनी जाँघों के बीच की 'तलब' को छुपाते हुए बात टाली।
"हाँ माँ जी, थक तो मैं भी गई हूँ सुबह से... बस काम, काम, काम!" फागुन भी निढाल सी होकर उसी बिस्तर पर पीठ के बल गिर पड़ी। उसका कोमल बदन भी आज की इस अंधी मेहनत से टूट चुका था।
तभी दरवाज़े पर आहट हुई।
"चलो, खाना खा लो दोनों... सारी थकान उतर जाएगी," बाहर से कमला काकी हाथों में खाने की दो सजी हुई थालियाँ लिए अंदर कमरे में आ गई। थाली से उठती गर्मागर्म पूड़ियों और सब्ज़ी की महक ने कमरे की उस मादक और पसीने वाली गंध को थोड़ा दबा दिया।
"आप नहीं खाओगी काकी?" कामिनी ने थाली अपने हाथों में लेते हुए पूछा।
"अरे बहू रानी, हमारा तो रोज़ का है ये मेहनत का काम। तुम शहर की हो, थक गई हो बहुत। खाना खा लो, थकान उतर जाएगी," कमला काकी ने एक पल के लिए कामिनी के पसीने से तर-बतर और सुलगते हुए रूप को देखा और फिर सांत्वना देते हुए बोली, "खाना खा के आप आराम करो, मैं बाहर का बाकी काम देखती हूँ।"
इतना कहकर कमला काकी दरवाज़ा खुला छोड़कर वापस बाहर चली गई।
वाकई, कामिनी बुरी तरह टूट चुकी थी। एक तो इतनी भयानक गर्मी, उस पर दिन भर का कमरतोड़ काम, और सबसे ऊपर... भड़कती हुई जानलेवा उत्तेजना! इन सबने मिलकर कामिनी के शरीर की सारी ताक़त निचोड़ ली थी।
कामिनी ने अपने काँपते हाथों से पूड़ी का एक टुकड़ा तोड़ा और सब्ज़ी के साथ पहला निवाला अपने मुँह में डाला।
"उउफ्फ्फ..."
निवाला हलक से नीचे उतरते ही कामिनी के होंठों से एक सुकून भरी साँस निकली। पेट में अन्न जाते ही उसे काफ़ी अच्छा लगा। गर्मागर्म और मसालेदार खाने ने उसके खाली पेट की ऐंठन को पल भर में शांत कर दिया।
जैसे-जैसे कामिनी खाना खाती गई, उसके थके-हारे जिस्म को एक नई ऊर्जा (Energy) मिलने लगी। उत्तेजना की वजह से जो नसें दर्द कर रही थीं, उनमें एक अजीब सी राहत महसूस होने लगी। उसका जिस्म जो अब तक हवस की आग में तड़प कर काँप रहा था, उसमें धीरे-धीरे एक खुशनुमा शांति सी छाने लगी।
कामिनी को लगा उसकी गर्मी कम हो रही है, वो वापस सामान्य हो रही है। फागुन भी ख़ामोशी से अपना खाना ख़त्म कर रही थी।
लेकिन बेचारी कामिनी इस बात से बिल्कुल अनजान थी कि ये जो शांति उसे महसूस हो रही है, वो दरअसल 'तूफ़ान से पहले की शांति' है।
बाहर हवेली के आँगन में अब वीरानी छाने लगी थी। फ़ौजा सिंह, हकीम और गाँव के प्रमुख लोग खाना खाकर अपने-अपने घरों को लौट चुके थे। विशाल पंडाल अब लगभग खाली हो गया था, सिर्फ़ जूठी पत्तलें और बिखरा हुआ सामान ही उस महाभोज की गवाही दे रहे थे।
एक कोने में खड़े ताऊजी अपनी डायरी में मज़दूरों का हिसाब-किताब कर रहे थे।
"आज की दिहाड़ी ये रही... और कान खोल के सुन लो, कल सुबह भी जल्दी आ जाना, टेंट और शामियाना खुलवाने का भारी काम भी है कल," ताऊजी ने सभी मज़दूरों को पैसे देते हुए हिदायत दी।
सुलेमान ने चुपचाप अपने 400 रुपए जेब में डाले। उसका आज का पूरा दिन बेकार ही गया था। ना तो कादर खान हवेली में आया और ना ही उसे कादर का कोई सुराग़ मिला। और तो और, मादक हुस्न की मूरत कामिनी भी दोपहर के बाद से उसके हाथ नहीं लगी थी। अब यहाँ हवेली में रुकने का उसके पास कोई बहाना नहीं था।
"ठीक है साब..." सुलेमान ने कहा और बाकी मज़दूरों के साथ हवेली से बाहर पगडंडी पर निकल गया।
कुछ दूर चलने के बाद, सुलेमान ने अपने आगे चलते हुए उन दोनों नौजवानों को टोका, "सुनो बे... काला कांडी! घर कहाँ है तुम्हारा?"
"पास ही का गाँव है भाई, कोई 10 किलोमीटर दूर होगा," काला ने पीछे मुड़कर जवाब दिया।
"इतनी रात को पैदल जाओगे?"
"हाँ, रोज़ का ही है हमारा तो, चले जाएँगे," कांडी ने लापरवाही से कहा।
"चलो, मैं छोड़ देता हूँ तुम दोनों को," सुलेमान ने एक सपाट लहज़े में कहा।
"त... तुम छोड़ दोगे? कैसे भाई? क्या अपने इन चौड़े कंधों पर बिठा कर ले जाओगे?" काले ने सुलेमान की मज़दूर वाली हैसियत पर ताना मारते हुए हँस कर कहा।
सुलेमान के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया। "चलो तो सही... बताता हूँ।"
सुलेमान और वो दोनों लड़के चलते हुए गाँव की सीमा से बाहर कच्ची सड़क तक आ गए। वहाँ अँधेरे में एक बड़े पेड़ के नीचे एक बेहद शानदार और महँगी काले रंग की SUV (Fortuner) खड़ी थी।
"आओ, बैठो अंदर।"
सुलेमान ने अपनी जेब से चाबी निकाली और बटन दबाया।
'पुक... पुक...!'
गाड़ी की तेज़ पीली लाइटें एक पल के लिए जलीं और दरवाज़े अनलॉक हो गए।
वो महँगी गाड़ी और उसका अलार्म सुनकर काला और कांडी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उनकी हवा पूरी तरह टाइट हो गई थी। वो दोनों फटी हुई आँखों से कभी उस चमचमाती गाड़ी को देखते तो कभी मज़दूर के कपड़ों में खड़े सुलेमान को।
"भ... भाई... आप कौन हो? ये... ये इतनी महँगी गाड़ी किसकी है?" कांडी की आवाज़ बुरी तरह काँप रही थी।
सुलेमान ने इत्मीनान से अपनी जेब से एक महँगी विदेशी सिगरेट निकाली, उसे होंठों में दबाया और सोने (Gold) के लाइटर से जलाकर एक गहरा कश खींचा।
"कहा ना... बैठो अंदर, सब बताता हूँ।"
काला और कांडी किसी खौफ़ज़दा मेमने की तरह डरते हुए गाड़ी की पिछली सीट पर बैठ गए। उन्हें अब पूरी तरह समझ आने लगा था कि जो आदमी आज दिन भर उनके साथ 400 रुपए के लिए मिट्टी खोद रहा था, वो कोई मामूली मज़दूर नहीं, बल्कि कोई बहुत बड़ा और ख़तरनाक इंसान है।
सुलेमान ने गाड़ी स्टार्ट की और एसी (AC) फुल कर दिया।
"साला... बदन तोड़ के रख दिया उस बूढ़े ने आज दिन भर काम करा-करा कर, और हाथ भी कुछ नहीं लगा," सुलेमान धुएँ का छल्ला छोड़ते हुए बड़बड़ाया।
फिर उसने शीशे से पीछे देखा, "क्यों बे... दारू-वारू पीते हो?"
"पप्पप्प... हाँ भाई, पीते हैं," काले ने थूक गटकते हुए कहा।
"लेकिन अब... अब नहीं पीनी हमें," कांडी की तो डर के मारे जान ही निकली जा रही थी।
सुलेमान उनकी हालत देखकर समझ गया। उसने एक ठंडी और ख़ौफ़नाक आवाज़ में कहा, "सुनो बे... मैं कौन हूँ, क्या हूँ, और यहाँ क्यों आया हूँ... तुम्हें उस बात से कोई मतलब नहीं होना चाहिए। मेरा एक काम कर दोगे, तो मैं तुम्हें तुम्हारी औकात और तुम्हारी सोच से भी ज़्यादा पैसा दूँगा। बोलो... करोगे?"
"कक्कक... काम... काम क्या है साब?" काले ने हिम्मत जुटा कर पूछा।
"मामूली सा काम है... इस इलाके में मुझे एक आदमी को ढूँढना है।"
"कक्क... कौनसा आदमी?"
गाड़ी अब रफ़्तार पकड़ चुकी थी और सूनसान हाईवे पर दौड़ रही थी। दूर से ही एक बेहद आलीशान और महँगे 'होटल एंड बार' का बड़ा सा नियॉन बोर्ड चमकता हुआ दिख रहा था।
"आओ... पहले दिन भर की थकान उतारते हैं... फिर अंदर बैठ कर तफ़्सील से काम बताता हूँ," सुलेमान ने गाड़ी होटल की तरफ़ मोड़ दी।
काला और कांडी के तो होश ही उड़े हुए थे। ऐसे आलीशान होटल में जाने का तो उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था।
"साला... कहीं ये हमें अंदर ले जा कर मार तो नहीं देगा?" काला कांडी के चेहरे पर खौफ़ के बारह बजे हुए थे।
इधर हवेली में... रात के लगभग 12 बज चुके थे।
पूरे गाँव और हवेली में एक मुर्दा सन्नाटा छा गया था। आँगन में इधर-उधर कुर्सियाँ और टेंट का सामान बिखरा पड़ा था।
रमेश, जिसकी शराब की तलब शाम से ही उसके दिमाग़ को पागल कर रही थी, मेहमानों के जाते ही दारू की बोतलों पर टूट पड़ा था। वो इतना बेतहाशा पी चुका था कि उसे हवेली के अंदर जाने का भी होश नहीं रहा। वो आँगन में ही बिछी एक चारपाई पर औंधे मुँह पड़ा, किसी सूअर की तरह भयंकर खर्राटे भर रहा था।
हवेली के बहार शांति थी, लेकिन कमरे मे भयानक बवंडर आया हुआ था.
कमरे के अंदर फागुन, कमला काकी और प्रमिला ज़मीन पर गद्दे बिछा कर गहरी नींद में सो रही थीं। दिन भर की थकान ने उन्हें मुर्दे की तरह सुला दिया था।
लेकिन कामिनी... वो कमरे में नंगे पैर किसी घायल, भूखी शेरनी की तरह बेचैनी से टहल रही थी।
खाना खाने के बाद तो जैसे कामिनी के जिस्म ने बारूद की तरह आग ही पकड़ ली थी! उसकी वासना और उत्तेजना पेट में अन्न जाते ही एक भयंकर ज्वालामुखी बनकर उसकी नसों में फट पड़ी थी।
कामिनी की हालत अब उसकी बर्दाश्त के बिल्कुल बाहर हो चुकी थी।
उसकी बिना पैंटी वाली चुत का तो बहुत ही बुरा हाल था। कामरस की वजह से उसकी जाँघें आपस में चिपचिप कर रही थीं और चुत के अंदर से एक ऐसी जानलेवा और मीठी खुजली उठ रही थी, जो उसे पागल कर रही थी। हवस की गर्मी से उसके भारी स्तन पूरी तरह तन कर पत्थर जैसे कड़क हो गए थे। ब्लाउज़ ने उन्हें इतनी बेरहमी से कस लिया था कि अब कामिनी को अपनी ही छाती में एक मीठा-मीठा दर्द और कसाव महसूस होने लगा था।
कामिनी का बस एक ही मन कर रहा था... कि वो इसी वक़्त अपनी साड़ी को अपनी कमर तक उठा ले, बिस्तर पर टाँगें चौड़ी करके लेट जाए और अपनी ही उँगलियों से अपनी सुलगती और पानी छोड़ती हुई चुत को तब तक बेरहमी से रौंदती रहे, जब तक कि वो चीख-चीख कर झड़ ना जाए! वो अपने ही नाख़ूनों से अपने तनते हुए स्तनों को नोचना चाहती थी।
लेकिन आज किस्मत देखिए... कामिनी की ये कैसी ख़ौफ़नाक क़ैद थी!
उसका अपना ही कमरा आज उसके लिए जेल बन गया था। ज़मीन पर काकी और फागुन सो रही थीं। कामिनी अगर अपनी उँगलियों से अपनी प्यास बुझाने की कोशिश भी करती, तो हवस के मारे उसके मुँह से निकलने वाली मादक सिसकियाँ और बिस्तर की हल्की सी भी चरमराहट उन्हें जगा सकती थी। एक 'सभ्य और इज़्ज़तदार बहू' का नकाब एक ही झटके में तार-तार हो जाता।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे... कैसे इस उबलते हुए लावे को शांत करे!
जब सब्र का बाँध टूट गया, तो कामिनी लगभग घुटन महसूस करते हुए तेज़ कदमों से कमरे के दरवाज़े से बाहर आ गई।
बाहर घुप अँधेरा और सन्नाटा था। उसने देखा कि आँगन में रमेश मुँह बाए खर्राटे ले रहा है। नामर्द और शराबी पति को देखकर कामिनी को हिकारत और घिन के सिवा कुछ महसूस नहीं हुआ।
कामिनी ने ऊपर आसमान की तरफ़ देखा। ठंडी हवा चल रही थी। उसके सुलगते हुए दिल में एक ही ख़याल आया 'हवेली के पीछे वाले हैंडपंप पर जाकर, खुले आसमान के नीचे ठंडे पानी से नहा लूँ... शायद उस बर्फ़ जैसे ठंडे पानी से इस नंगे जिस्म की आग कुछ कम हो जाए...'
उसने इधर-उधर सतर्क नज़रों से देखा। हवेली में कोई नहीं था, सब सो चुके थे।
कामिनी अपनी साड़ी का पल्लू कमर में कसते हुए, पसीने और कामरस से चिपचिपी जाँघों के साथ... आँगन से नीचे उतरी और हवेली के पिछले हिस्से के सूनसान अँधेरे की तरफ़ बढ़ गई।
और हर कदम के साथ उसकी जाँघों के बीच से वही कामुक और गीली आवाज़ रात के सन्नाटे को चीर रही थी—'पच... पच... पच्च...'
हवेली के पिछले हिस्से को पार करते हुए कामिनी आख़िरकार सूनसान हैंडपंप के पास पहुँच गई। चारों तरफ़ एक ख़ौफ़नाक और मादक सन्नाटा छाया हुआ था। आसमान में आधा चाँद आज अपनी पूरी जवानी पर था, जिसकी ठंडी और दूधिया रौशनी ज़मीन पर बिखरी हुई थी।
कामिनी से अब अपनी रगों में उबलता हुआ ये ज्वालामुखी और एक पल भी बर्दाश्त नहीं हो रहा था। गर्मी और हवस ने उसके दिमाग़ पर पूरी तरह कब्ज़ा कर लिया था।
पुरे दिन भर से उसने जैसे तैसे इस उफानते बाँध को पकड़ रखा था, लेकिन अब नहीं... अब बस बाँध टूटने के कगार पर था.
महीन साड़ी किसी कांटे कि तरह उसके जिस्म पर चुभ रही थी.
बिना एक पल गँवाए, कामिनी ने अपने काँपते हाथों से साड़ी का पल्लू खोल दिया। एक ही झटके में सूती साड़ी ज़मीन पर गिर गई। इसके हाथ पेटीकोट के नाड़े को टटोलने लगे, सररररर.... जैसे ही उसका सिरा मिला कामिनी ने उसे बेरहमी से खिंच दिया.
पेटीकोट कामिनी कि मोटी सुडोल जांघो को नंगा करता गीली जमीन चाटने लगा, और आख़िर में पसीने से भीगा ब्लाउज़ भी कामिनी का जिस्म छोड़ चूका था,
कामिनी चाँदनी रात में खुले आसमान के नीचे... संपूर्ण नंगी खड़ी थी!
उसका गदराया, गोरा और भरा-पूरा मादक जिस्म दूधिया चाँदनी में किसी संगमरमर की मूरत की तरह चमक रहा था। उसके बदन से उठने वाली वासना और पसीने की तीखी, नशीली महक आस-पास की हवा में फैल गई।
आज तो जैसे चाँद भी इस हुस्न की देवी का दीवाना हो गया था। चाँद की ठंडी किरणें उसके भारी स्तनों की गोलाई से फिसलती हुई, उसकी मज़बूत, चौड़ी कमर और सुडौल जाँघों को अपनी चाँदनी से सहला रही थीं। ऐसा लग रहा था जैसे कुदरत ख़ुद इस मदमस्त औरत के यौवन का रसपान कर रही हो।
कामिनी की असली हालत सच में बहुत ख़राब थी।
उसकी गोरी जाँघें घुटनों तक अपने ही कामरस (चुतरस) से पूरी तरह गीली और चिपचिपी हो चुकी थीं। दिन भर हवस की आग में जलते हुए उसकी चुत से इतना पानी बहा था कि वो रस जाँघों पर कई बार सूख कर पपड़ी बना था और फिर नई उत्तेजना के ताज़े पानी से दोबारा गीला हो गया था। उसकी जाँघों पर हवस के सूखने और भीगने के वो सारे निशान साफ़ दिखाई दे रहे थे।
कामिनी ने अपनी साँसों को काबू करते हुए अपनी दोनों भारी जाँघों को चौड़ा किया। उसने अपनी गर्दन नीचे झुका कर अपनी दोनों टाँगों के बीच देखा... तो वहाँ का नज़ारा देखकर वो ख़ुद भी सिहर उठी।
बहुत बुरा हाल था!
उसकी दोनों फाँकों के बीच से 'सफ़ेद चाशनी' सा गाढ़ा रस किसी टूटते हुए लचीले तार की तरह खिंच रहा था। कल रात लकड़ी के पाए की बेतहाशा रगड़ और आज दिन भर की इस गर्मी ने उसकी चुत को सूजा कर कुप्पा कर दिया था। उसके बाहरी होंठ (Labia) लाल और मोटे होकर बाहर की तरफ़ लटक आए थे। लग रहा था जैसे कोई ताज़ा पाव (ब्रेड ) जांघो के बीच जमा दिया हो.
इस नज़ारे और हवस की भयंकर तड़प ने कामिनी के हाथों को बेबस कर दिया। अनायास ही कामिनी का दायाँ हाथ नीचे गया और उसकी काँपती उँगलियों ने फूली हुई, सूजी और रस से लबालब चुत को पहली बार छुआ...
"आआआह्ह्ह.....!"
"ईईस्स्स्स..... उउउफ़्फ़्फ़्फ़.....!"
अपनी ही उँगलियों का पहला और गीला स्पर्श पाते ही कामिनी के पूरे जिस्म में कामवासना का ऐसा भयंकर संचार हुआ कि वो पैर के अँगूठे से लेकर सिर के बालों तक सिहर उठी। उसकी आँखें पलट गईं, पलकें भारी हो गईं और सिर नशे में पीछे की तरफ़ झूल गया।
उसी वक़्त, उसका दूसरा हाथ ख़ुद-ब-ख़ुद ऊपर उठा और अपने ही नंगे, आज़ाद स्तनों को टटोलने लगा।
सब कुछ जल रहा था... बिल्कुल उबलते हुए लावे की तरह गरम! उसकी चुत की दीवारें उँगलियों को गर्मी दे रही थीं और उसके स्तन हथेली को जला रहे थे।
उसके भारी स्तन, जो दिन भर कसे हुए ब्लाउज़ की क़ैद में तड़प रहे थे, अब पूरी तरह से आज़ाद होकर तन गए थे। हवस के अकल्पनीय नशे में उसके निप्पल (Nipples) बिल्कुल किसी पत्थर की तरह कड़क और नुकीले हो गए थे।
कामिनी खुले आसमान के नीचे खड़ी, अपने एक हाथ की उँगलियों को अपनी सूजी हुई चुत की दरार में बेरहमी से रगड़ रही थी और दूसरे हाथ से अपने उन कड़क निप्पलों को मरोड़ रही थी। जिस्म की भट्टी अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुकी थी,
गर्मी बढ़ती जा रही थी.
"ठंडा... कुछ ठंडा चाहिए आअह्ह्ह......" कामिनी सिसक रही थी, ना जाने हवा मे ही ठंडक कि भीख मांग रही थी.
हवस और गर्मी की भयंकर तड़प के बीच कामिनी ने अपने काँपते हाथों से हैंडपंप का भारी हत्था पकड़ा और अपनी बची-खुची ताक़त लगाकर उसे ऊपर-नीचे करने लगी।
'घच... पच... घच... पच...'
रात के ख़ौफ़नाक सन्नाटे में लोहे के रगड़ खाने की वो आवाज़ गूँज उठी। हत्था चलाने के लिए कामिनी को अपना पूरा ज़ोर लगाना पड़ रहा था, और इस मेहनत से उसका पूरा नंगा, गदराया हुआ जिस्म किसी उफनती हुई लहर की तरह हिल रहा था। उसके हाथ जितनी तेज़ी से ऊपर-नीचे होते, उसका यौवन और उसके आज़ाद हुस्न का एक-एक हिस्सा उस गति के साथ बुरी तरह मचल उठता। उसकी साँसें तेज़ चलने लगीं और पूरे बदन में एक ख़ुमारी सी छाने लगी।
कुछ ही पलों की मशक्कत के बाद, ज़मीन के गहरे सीने से बर्फ़ जैसा ठंडा पानी एक मोटी धार के रूप में बाहर फूट पड़ा। कामिनी ने तुरंत हैंडपंप का हत्था छोड़ा और घुटने जमीन पर टिका दिए, धधकते हुए जिस्म को ठंडी धार के बिल्कुल सामने कर दिया कर दिया।
छपाक्क्...!!
जैसे ही वो ज़मीन का सर्द पानी कामिनी के उबलते और दहकते हुए गोरे जिस्म पर गिरा... नज़ारा कुछ ऐसा था जैसे किसी जलते हुए लाल लोहे पर पानी डाल दिया गया हो। उसके जिस्म के अंदर गर्मी इतनी भयंकर थी कि ठंडा पानी भी उसके बदन से टकराकर जैसे भाप (Steam) बनकर हवा में उड़ने लगा।
एक गहरी, बर्फ़ीली ठंडक उसकी नसों में उतर गई और कामिनी के होंठों से एक बेकाबू, लंबी सिसकी निकल गई
"आआह्ह्ह... उउउफ़्फ़्फ़्फ़... ईईस्स्स्स..."
वो पानी की तेज़ धार के सामने बेसुध सी बैठी रही। पानी ख़त्म हुआ, कामिनी ने फिर से हत्थे को पकड़ चला दिया, आज वो कोई आम स्नान नहीं कर रही थी। आज पहली बार, वो अपने ही वजूद से, अपने ही हुस्न से पूरी तरह रूबरू हो रही थी। पानी की बूँदें उसके चेहरे, उसकी सुराहीदार गर्दन और उसके सीने की घाटियों से फिसलती हुई नीचे जा रही थीं। और कामिनी के नाज़ुक हाथ उन पानी की बूँदों के साथ-साथ अपने ही भीगे हुए जिस्म को सहलाने लगे।
उसने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसके हाथ ख़ुद-ब-ख़ुद उसकी गर्दन, उसकी गोरी बाँहों और उसकी सुडौल कमर पर फिसलने लगे। वो पानी के बहाव के साथ अपने ही हुस्न को टटोल रही थी, उससे खेल रही थी। अपनी ही छुअन से उसे एक ऐसा मादक और मीठा अहसास हो रहा था, जो उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था। पानी की ठंडक और जिस्म की भड़कती हुई आग... दोनों मिलकर एक ऐसा नशा पैदा कर रहे थे, जिसमें कामिनी पूरी तरह डूबती जा रही थी।
उसके रोम-रोम में, उसकी रग-रग में हवस की जो आग लगी थी, वो इस ठंडे पानी से बुझने के बजाय एक अजीब सी मीठी खुजली में बदल रही थी।
इस मदमस्त, एकांत और जादुई तमाशे का गवाह दुनिया में और कोई नहीं... सिर्फ़ आसमान में चमकता हुआ वो आधा चाँद था। चाँद की दूधिया और ठंडी रौशनी कामिनी के भीगे हुए, निखरे बदन पर पड़कर उसे रात के अँधेरे में किसी अप्सरा सा रूप दे रही थी।
सूनसान रात का सन्नाटा, पानी के गिरने की छप-छप, चाँद की कामुक रौशनी और अपने ही जिस्म को सहलाती कामिनी की मदहोश साँसें... सब मिलकर एक ऐसा तिलिस्म बुन रहे थे, जो किसी भी मर्द के होश उड़ाने के लिए काफ़ी था।
कामिनी जैसे ही पानी की उस ठंडी धार के नीचे अपने सुलगते जिस्म को सहलाने के लिए आँखें बंद करती... पानी की धार टूट कर ख़त्म हो जाती। वो झल्लाहट में फिर से आगे बढ़ती, अपनी पूरी ताक़त लगाकर भारी हत्था चलाती... पानी आता, और वो जैसे ही उसे महसूस करने के लिए हत्था छोड़ती, पानी फिर से बंद हो जाता!
ये सिलसिला कामिनी के लिए एक बहुत ही अजीब और पागल कर देने वाली चिढ़ बन गया था।
वो पूरी तरह बेबस थी। हवस की असहनीय आग और पानी की इस आँख-मिचौली ने उसे मानसिक रूप से तोड़ दिया था। उसका मन कर रहा था कि वो ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाए, अपने ही नाख़ूनों से अपने इस दहकते हुए जिस्म को नोच डाले, अपने भारी स्तनों को बेरहमी से मसल कर रख दे ताकि इस दर्दनाक और मीठी खुजली से उसे आज़ादी मिल सके।
इसी झुँझलाहट और तड़प के बीच... अचानक उसकी कल्पना में सुलेमान का विशाल, फौलादी और पसीने से भीगा हुआ मर्दाना जिस्म किसी जंगली जानवर की तरह दौड़ने लगा। उसकी चौड़ी छाती, उसके पाजामे मे छुपा भयानक मोटा लम्बा अंग और उसके पसीने की मर्दाना महक कामिनी के दिमाग़ पर हावी हो गई।
उस 'असली मर्द' का ख़याल आते ही...
'पचंम्म्म.... पच्च...!'
कामिनी की सूजी हुई, प्यासी चुत ने किसी उफनती हुई नदी की तरह कामरस की एक बेहद गाढ़ी और गर्म धार फेंक दी!
कामिनी बेतहाशा काँप उठी। उसने अनायास ही अपना हाथ नीचे अपनी टाँगों के बीच ले जाकर उस बहते हुए लावे को पकड़ना चाहा। लेकिन हवस का रस इतना ज़्यादा था कि कामिनी की पूरी हथेली और उँगलियाँ उस लसलसे, चिपचिपे रस से सन गईं।
"उउउफ़्फ़्फ़्फ़..... आअह्ह्ह..... हे भगवान, क्या करूँ मैं... आह्ह्ह..."
कामिनी की दशा अब सचमुच किसी हवस में पागल और विक्षिप्त औरत जैसी होने लगी थी। वो चाँदनी रात में खुले आसमान के नीचे अपने ही रस से भीगे हाथों को देखकर हाँफ रही थी।
तभी... रात के मुर्दा सन्नाटे को चीरते हुए एक बेहद भारी, गूँजती और खुरदरी आवाज़ पीछे से आई
"ऐसे काम नहीं चलेगा कामिनी... मैं हैंडपंप चला देता हूँ।"
वो आवाज़ सुनते ही कामिनी का पूरा वजूद किसी सूखे पत्ते की तरह हिल गया। उसने झटके से अपनी नशीली आँखें खोलीं और सामने देखा।
पीछे से आती हुई चाँद की दूधिया रौशनी अब पूरी तरह छुप गई थी। कामिनी के बिल्कुल सामने एक बेहद लंबा-चौड़ा, दैत्याकार साया सीना ताने खड़ा था। वो साया इतना विशाल था कि उसने चाँद की पूरी रौशनी को अपने पीछे ढँक लिया था और कामिनी उस दानव के गहरे अँधेरे में क़ैद हो गई।
कामिनी बुरी तरह सकपका गई। लेकिन... हवस की इंतहा देखिए! सामने एक गैर-मर्द खड़ा था और कामिनी संपूर्ण नंगी थी, फिर भी... उसने अपने नंगे, गदराए और रस से भीगे जिस्म को छुपाने या ढकने की रत्ती भर भी कोशिश नहीं की। वो बस अपनी काँपती हुई, चिपचिपी जाँघों के साथ बुत बनकर बैठी रही और उसकी लाल आँखें उस विशाल साए को निहारती रहीं।
उस दैत्याकार शख़्स ने आगे बढ़कर हैंडपंप का भारी हत्था अपने लोहे जैसे मज़बूत हाथों में पकड़ा और उसे बिना किसी मेहनत के ऊपर-नीचे चलाना शुरू कर दिया।
'गच... पच.... गच... पच....'
हैंडपंप से पानी का एक तेज़ और कभी ना रुकने वाला रेला फूट पड़ा!
वो बर्फ़ जैसा ठंडा पानी सीधा कामिनी के नंगे, सुलगते हुए जिस्म पर गिरने लगा। एक तरफ पानी की भयानक ठंडक... और दूसरी तरफ उस फौलादी मर्द की मौजूदगी का वो खौफ़नाक नशा!
कामिनी के बदन का एक-एक रोंगटा खड़ा हो गया। उसके तनते हुए निप्पल ठंडे पानी और उन्माद कि अधिकता से किसी पत्थर की तरह कड़क हो गए। हवस और डर... इन दोनों के ज़हरीले और मादक संगम ने कामिनी की रीढ़ की हड्डी में एक ऐसी जानलेवा झनझनाहट पैदा कर दी, जो सीधे उसके दिमाग़ की नसें फाड़ रही थी।
ये रात कामिनी का वजूद बदल देने वाली थी, उसकी हवस उसकी उत्तेजना कि चरम परीक्षा लेने वाली थी.
क्रमशः........
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