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मेरी माँ कामिनी -18


मेरी माँ कामिनी - 18

घर में पसरा वह गहरा सन्नाटा कामिनी को काट खाने को दौड़ रहा था। रमेश ऑफिस जा चुका था और बच्चे स्कूल। रसोई में बर्तनों की खनक के बीच कामिनी का दिल किसी ढोल की तरह बज रहा था। उसकी जांघों के बीच की वह 'मीठी टीस' उसे बार-बार कल रात के उस अंधेरे कमरे में खींच ले जा रही थी।

वह मन ही मन डर रही थी— 'अगर रघु को कुछ याद रहा तो? अगर उसने रमेश से कुछ कह दिया तो?'
टिंग टोंग.... घर के दरवाजे की घंटी बज उठी.
कामिनी ने दरवाजा खोला, उसका डर उसके सामने हलवे की खाली कटोरी लिए खड़ा था.

कामिनी की सांसें गले में ही अटक गईं। सामने रघु खड़ा था। उसकी आँखें झुकी हुई थीं और चेहरा उतरा हुआ। कामिनी को लगा जैसे अभी कोई धमाका होने वाला है।

"म-मेमसाब..." रघु की आवाज़ में एक थरथराहट थी।
कामिनी ने कसकर दरवाजे के हैंडल को पकड़ लिया, उसके पाप का घड़ा जैसे फूटने को था, दिल बैठा जा रहा था, उसका शरीर पत्थर जैसा हो गया।
उसे याकायाक अफ़सोस होने लगा की उसने कल रात ऐसा कैसे कर दिया?
वह कुछ कहती, इससे पहले ही रघु उसके पैरों के पास घुटनों के बल बैठ गया।

"मुझे माफ़ कर देना मैडम जी... मैं बड़ा नीच हूँ, लालची हो गया था।" रघु गिड़गिड़ाने लगा। 
"आपने कल गाजर लाने के लिए पैसे दिए थे, लेकिन रस्ते में दुकान खुली देखी तो नीयत डोल गई। मैं शराब पीने बैठ गया... फिर पुराने दोस्त मिल गए और जाम पर जाम चलता गया। मैं नशे में इतना धुत्त था कि मुझे कुछ होश ही नहीं रहा।"

हमफ्फ्फ्फफ्फ्फ़....  कामिनी ने एक लंबी, गहरी सांस ली। उसके सीने पर रखा हुआ वह भारी पत्थर जैसे पल भर में गायब हो गया। माथे की सिल्वटे वापस से खूबसूरती मे बदलने लगी, 

रघु आगे बोलता गया, "आप बहुत बड़ी और दयालु हैं मैडम जी... आपने कल रात मेरे लिए गाजर का हलवा तक रख दिया था। मैंने उसे कब खाया, मुझे तो पता भी नहीं चला। उसका स्वाद तो अभी भी मेरे मुँह में है।"

कामिनी के होंठों पर एक कुटिल और विजयी मुस्कान रेंग गई। वह समझ गई कि रघु को कुछ याद नहीं। उसके लिए वह 'वहशी रात' सिर्फ़ एक शराबी का सपना बनकर रह गई थी।
कामिनी का आत्मविश्वास अचानक से लौट आया। जो औरत दो मिनट पहले अपराधी महसूस कर रही थी, वह पल भर में "चोर से साहूकार" बन गई। 

उसने अपनी साड़ी का पल्लू संभाला और कड़क आवाज़ में बोली:
"तुमने गलती तो बहुत बड़ी की है रघु। तुम्हें पता है न, अगर ये बात साहब को मालूम पड़ जाती तो तुम्हारा क्या हाल होता? इसी वक्त धक्के मारकर बाहर निकाल देते तुम्हें!"
रघु ने हाथ जोड़ लिए, उसकी आँखों में डर साफ़ था। उसे इस घर में छत और खाना मिला था, जिसे वह खोना नहीं चाहता था। 

"माफ़ कर दो मैडम जी, अब से ऐसी गलती नहीं होगी। आप जैसा बोलोगी मैं वैसा करूँगा, बस साहब को मत बताना।"
कामिनी ने उसे माफ़ करने का नाटक किया। उसकी जीत सफल हुई थी। उसे एक अजीब सी सत्ता (Power) का अहसास होने लगा—एक ऐसा राज जो सिर्फ़ उसे पता था।
"ठीक है, माफ़ किया। लेकिन अब से ध्यान रखना," कामिनी ने रोब झाड़ते हुए कहा।
"कोई काम हो तो बतायें मेमसाब, मैं अभी कर देता हूँ।" रघु ने विनती की।

कामिनी को याद आया कि घर के भारी परदे और चादरें काफी दिनों से गंदे पड़े थे। "ठीक है, कुछ पर्दे और चादरे है उसे गार्डन वाले नल पर ले जाकर धो दो।"

वह अंदर गई और भारी चादरों का ढेर ले आई। आते-आते वह बाथरूम की तरफ मुड़ी जहाँ रमेश और बंटी के कुछ गंदे कपड़े पड़े थे। कामिनी का दिमाग अभी भी कल रात की उत्तेजना और आज की राहत के बीच झूल रहा था। 

उसने बिना सोचे-समझे बाल्टी में रखे रमेश के कुर्ते और बंटी की टी-शर्ट के साथ अपनी वह सफ़ेद रेशमी कच्छी (Panty) भी उठा ली, जिसे उसने कल शाम रवि की मुलाक़ात के बाद उतार फेंका था, कामिनी की ये कच्छी पूरी तरह से उसके चुत रस मे सनी हुई थी,


अनजाने में, कल शाम की मदहोशी का वह गीला गवाह अब उन कपड़ों के ढेर के बीच छिपकर टब में आ गया था।
कामिनी वह कपड़ों से भरा भारी टब उठाकर गार्डन की तरफ ले आई, जहाँ एक तरफ दीवार के पास नल लगा था।
धप...
उसने टब रघु के सामने रख दिया। "लो, इन्हें अच्छी तरह धो दो। मैं तब तक रसोई में खाना बना लेती हूँ।"
धूप तेज़ थी। बंटी कभी भी घर आ सकता था, लंच भी तैयार करना था, वो अंदर रसोई की तरफ बढ़ चली, बेफिक्र....उसे पता नहीं था कि वह अनजाने में रघु को अपनी आबरू का वह सबसे निजी हिस्सा सौंप चुकी है।


रसोई की गर्मी और चूल्हे पर चढ़ी दाल की खुशबू के बीच कामिनी का शरीर किसी और ही आग में सुलग रहा था। वह कड़छी चला रही थी, लेकिन उसकी आँखें बार-बार खिड़की के बाहर गार्डन की ओर खिंच रही थीं। बाहर धूप तेज़ थी और रघु नल के नीचे बैठा जोर-जोर से चादरें रगड़ रहा था। उसने कुर्ता खोल साइड रख दिया था, लुंगी गीली हो कर उसकी जांघो से चिपकी हुई थी.

कामिनी अपनी ही सोच में डूबी थी। पिछले कुछ दिनों में उसका जीवन कितना बदल गया था। वह संस्कारी बहू, पत्नी जो कभी ऊँची आवाज़ में बात नहीं करती थी, 
कल एक नौकर के मुँह पर अपनी हवस का 'हलवा' परोस कर आई थी। वह इन्हीं ख्यालों में थी कि अचानक उसकी नज़र बाहर पड़ी और उसके हाथ से कड़छी छूटते-छूटते बची।
उसकी नजर अनायास ही खिड़की से बहार पड़ी.. धाकम... धक... से उसका दिल पूरी स्पीड मे धड़क उठा. 20240603-122407
रघु के हाथों में चादर नहीं थी। उसने टब के नीचे से कामिनी की वही नन्हीं सी गुलाबी कच्छी निकाली थी। रघु उसे दोनों हाथों से फैलाकर ऐसे देख रहा था जैसे किसी ने उसके हाथ में कोई अजूबा थमा दिया हो।

 रघु के चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी जो कामिनी ने पहले कभी नहीं देखी थी, ऐसी मुस्कान जैसे वो कच्छी देख उसे पहनने वाली के अंग का अंदाजा लगा रहा हो.

रघु उस रेशमी कपड़े की छोटी सी बनावट को देख रहा था और शायद वही सोच रहा था जो कामिनी ने डरते हुए महसूस किया— "इतनी नन्हीं सी चड्डी में मेमसाब की इतनी भारी और मांसल गांड कैसे समा जाती होगी?"

कामिनी रसोई की चौखट पकड़ कर खड़ी हो गई। उसकी सांसें तेज़ चलने लगीं। वह बाहर जाकर उसे डांटना चाहती थी, पर उसका शरीर जैसे लकवाग्रस्त हो गया था।

तभी रघु ने वह किया जिसकी उम्मीद कामिनी को नहीं थी। रघु ने इधर-उधर देखा और फिर बड़ी बेबाकी से उस कच्छी को अपनी नाक के पास ले गया।
"स्निफ़फ़फ़फ़.... उउउउफ्फ्फ़!"
रघु ने एक लम्बी और गहरी सांस ली। उस रेशमी कपड़े में रची-बसी कामिनी के जिस्म की सोंधी खुशबू और कल रात के काम-रस की महक ने रघु के दिमाग में धमाका कर दिया। 

रघु को वह स्वाद याद आ गया जो कल रात उसे 'सपने' में मिला था। 
उसकी आँखों के सामने कुछ धुंधला सा उभरने लगा, ये खुसबू उसे पहले दिन खिड़की से फ़ेंकी गई गाजर मे भी मिली थी, और कल रात हलवे मे भी यही गंध समाई हुई थी, 
उसने कन्फर्म करने के लिए... शनिफ्फ्फ्फफ्फ्फ़ग.... इसस्स.... शनिफ्फग्ग.... एक बार फिर कच्छी के उस हिस्से को सुंघा जहाँ कामिनी की चुत टिकी होती थी.

खिड़की के पीछे खड़ी कामिनी का बुरा हाल था। उसकी चूत ने जैसे ही यह देखा, वह पानी छोड़ने लगी। उसकी जांघों के बीच एक गीलापन महसूस हुआ जो बढ़ता ही जा रहा था। उसका जिस्म किसी दहकते हुए कोयले की तरह जलने लगा।

रघु अब पूरी तरह वहशी हो चुका था। उसे परवाह नहीं थी की कामिनी देख लेगी, या कोई आ जायेगा, उसका लंड इस खुसबू को पा कर झटके मार रहा था। 

उसने अपनी लुंगी की गांठ को धीरे से ढीला किया। उसकी जांघों के बीच से उसका काला, मोटा और पत्थर जैसा खड़ा लंड आधा बाहर झांकने लगा।
धूप की तेज़ रोशनी में रघु के लंड का ऊपरी हिस्सा (मुंड) लालिमा लिए चमक रहा था। रघु ने कामिनी की कच्छी को अपने हाथ में लपेटा और उसे सीधा अपने खड़े हुए लंड की टोपी पर घिसने लगा।

सप-सप... चप-चप...
वह रेशमी कपड़ा रघु के गरम और सख्त अंग पर आगे-पीछे हो रहा था। कामिनी यह देख कर पागल होने लगी। एक नौकर उसकी पहनी हुई कच्छी को अपने लंड पर रगड़ रहा था और वह उसे रोकने के बजाय अपनी जांघें आपस में भींच रही थी। उसे याद आया कि कैसे यही अंग कल रात उसके मुँह के पास था और कैसे रघु की जीभ ने उसकी चूत को मरहम लगाया था।

कामिनी का हाथ खुद-ब-खुद अपनी साड़ी के नीचे चला गया। वह अपनी गीली चूत को मसलने लगी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह बाहर जाकर रघु को तमाचा मारे या खुद बाहर जाकर उस खड़े हुए लंड पर बैठ जाए।

कामिनी की रूह कांप उठी, और उसकी जांघों के बीच से काम-रस का एक और सैलाब बह निकला।
****************


गार्डन की वह दोपहर अब किसी तंदूर की तरह तप रही थी। बाहर रघु अपनी ही दुनिया में मदमस्त था, कामिनी की उस नन्हीं सी कच्छी को अपने पत्थर जैसे लंड पर रगड़ते हुए वह किसी भूखे जानवर की तरह बड़बड़ा रहा था। खिड़की के पीछे खड़ी कामिनी की हालत बेकाबू हो चुकी थी।

वह अपनी जांघों को आपस में ज़ोर-ज़ोर से भींच रही थी। उसका हाथ साड़ी के ऊपर से ही अपनी चूत को तेज़ी से मसल रहा था। उसे अहसास था कि अगर उसने अपनी उंगली साड़ी के अंदर डाल दी, तो वह वहीं फर्श पर ढेर हो जाएगी। 

वह रघु को देख रही थी—कैसे एक मर्द उसकी मामूली सी कच्छी को सूंघकर, उसे अपने अंग पर घिसकर चरम सुख के करीब पहुँच चुका था।
रघु का चेहरा पसीने से तर-बतर था और उसकी आँखें कामिनी की तलाश में खिड़की की ओर टिकी थीं। रघु झड़ने ही वाला था कि तभी...
"चरररररर......"
मुख्य गेट के भारी लोहे के दरवाज़े के खुलने की कर्कश आवाज़ ने सन्नाटे को चीर दिया। यह आवाज़ किसी धमाके की तरह कामिनी के कानों में गूंजी। रघु के हाथ जैसे वहीं जम गए और कामिनी का हाथ अपनी चूत से झटके से हट गया।
दोनों के वजूद पर जैसे किसी ने बर्फीला पानी डाल दिया हो। 

कामिनी ने कांपती नज़रों से गेट से अंदर आते रास्ते की तरफ देखा।

बंटी स्कूल बैग कंधे पर टांगे, पसीने में लथपथ अंदर चला आ रहा था। कामिनी का कलेजा हलक में आ गया। वह तुरंत खिड़की से पीछे हटी और अपनी बिखरी हुई साड़ी और उखड़ी हुई सांसों को संभालने लगी। उसका चेहरा लाल था और शरीर कांप रहा था।
उसने तुरंत घर का दरवाजा खोला...
"आ... आ गया मेरा बेटा? तू... तू हाथ-मुँह धो ले बंटी, मैं बस खाना लगाती हूँ," कामिनी ने अपनी आवाज़ को जितना हो सके सामान्य रखने की कोशिश की, लेकिन उसकी धड़कनें अभी भी बेकाबू थीं।

बंटी बाथरूम की तरफ बढ़ा, तो कामिनी की नज़र अनायास ही फिर से खिड़की के बाहर रघु पर गई।
रघु ने बिजली की फुर्ती दिखाई थी। उसने पलक झपकते ही अपनी लुंगी की गांठ कसी और कामिनी की उस कच्छी को पानी के टब में डुबो दिया। जब कामिनी ने उसे देखा, तो रघु पत्थर पर उसी कच्छी को रखकर पूरी ताकत से साबुन लगाकर घिस रहा था।

धप... धप.... घिसड़... घिसड़.....
रघु के हाथ पत्थर पर तेज़ी से चल रहे थे। वह उस नन्हे से रेशमी कपड़े को इतनी बेरहमी से रगड़ रहा था जैसे सारा मैल निकाल देना चाहता हो। लेकिन कामिनी के लिए यह सिर्फ़ कपड़ा नहीं था।
रसोई की स्लैब को पकड़े हुए कामिनी को महसूस हुआ कि रघु उस पत्थर पर कच्छी को नहीं, बल्कि कामिनी की चूत को घिस रहा है।

 हर बार जब रघु का हाथ पत्थर पर जोर से पड़ता, कामिनी के बदन में एक सिहरन दौड़ जाती।
उसे लगा जैसे वह पत्थर पर लेटी हो और रघु अपनी खुरदरी उंगलियों से उसकी निजता को रगड़ रहा हो।

 वह 'घिसड़-घिसड़' की आवाज़ कामिनी के दिमाग की नसों में हथौड़े की तरह बज रही थी। उसे याद आया कि अभी कुछ पल पहले यही कच्छी रघु के खड़े हुए लंड पर रगड़ खा रही थी, और अब वही हाथ इसे साफ़ कर रहे हैं।
कामिनी की जांघों के बीच से पानी का एक आखिरी कतरा फिर से रिस गया। 20220314-112624 उसने अपनी आँखें बंद कर लीं। बंटी अंदर था, रमेश ऑफिस में था, लेकिन कामिनी का मन अभी भी उस गार्डन वाले नल के पास, रघु के उन 'खुरदरे हाथों' में फंसा हुआ था।
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बंटी खाना खाकर अपने कमरे में जा चुका था। घर के अंदर एक भारी सन्नाटा पसरा था, जिसे सिर्फ़ छत के ऊपर घूमते पंखे की आवाज़ काट रही थी। रसोई में खड़ी कामिनी का दिल अभी भी तेज़ धड़क रहा था,
तभी आंगन में रघु की भारी परछाईं उभरी। वह गीले कपड़ों से भरा हुआ टब लिए खड़ा था।

उसका जिस्म पसीने और पानी से तर-बतर था, भीगी हुई लुंगी उसकी जांघों के साथ ऐसे चिपकी थी जैसे उसकी दूसरी खाल हो। आंगन की हवा में साबुन, पानी और एक मर्द के पसीने की सोंधी और तीखी गंध फैल गई थी, जो कामिनी के नथुनों को बेचैन कर रही थी।

"मैडम जी, कपड़े धो दिए हैं। कहाँ सुखा दूँ?" रघु की आवाज़ में एक अजीब सी खुरदराहट थी।
कामिनी घबरा गई। उसे लगा कि अगर रघु अकेले कपड़े सुखाएगा, तो वह फिर से उसकी कच्छी के साथ वही वहशी हरकत करेगा। 

"तुम रहने दो... मैं सुखा दूँगी," उसने हड़बड़ाकर कहा।
"अरे आप रहने दें, बहुत भारी है..." रघु ने टब उठाया और सीढ़ियों की ओर बढ़ गया। 

कामिनी के पास और कोई रास्ता नहीं था, वह भी उसके पीछे-पीछे छत की ओर खिंची चली गई। उसका दिल किसी ढोल की तरह धाड़-धाड़ बज रहा था।

छत पर सूरज अपनी पूरी तेज़ रोशनी बिखेर रहा था। रघु ने एक-एक करके भारी चादरें और परदे तार पर फैला दिए। कामिनी अभी खुद को संभाल ही रही थी कि रघु के खुरदरे हाथों ने टब के नीचे से वही नन्ही सी सफ़ेद कच्छी उठा ली। 

वह उसे तार पर टांगने ही वाला था कि कामिनी की लज्जा ने आखिरी बार अंगड़ाई ली।
"अरे... उसे रहने दो!" कामिनी ने झपट्टा मारकर अपनी कच्छी का एक सिरा पकड़ लिया।
दृश्य यह था कि कच्छी का एक हिस्सा रघु के हाथ में था और दूसरा कामिनी की मुट्ठी में। दोनों के बीच सिर्फ़ वह रेशमी पट्टी थी। कामिनी शर्म और घबराहट से पसीने-पसीने हो रही थी, उसकी उंगलियां रघु के पोरों से टकरा रही थीं।

तभी रघु ने सीधे कामिनी की आँखों में झांका और वह सवाल दाग दिया जिसने कामिनी के वजूद को हिला दिया:
"आपका दर्द अब ठीक तो है ना मैडम जी?"
कामिनी की सांसें अटक गईं। "क... कैसा दर्द?"
"चूत का दर्द..." रघु बिना किसी खौफ के, पूरी नग्नता के साथ बोल गया।

'चूत' शब्द जैसे ही कामिनी के कानों में पड़ा, उसके शरीर का निचला हिस्सा जैसे पिघल गया। यह शब्द उसके लिए किसी बिजली के झटके जैसा था। उसकी जांघों के बीच से काम-रस का एक सैलाब बह निकला। 

वह उसे डांटना चाहती थी, पर उसके हलक से कोई आवाज़ नहीं निकली। वह सिर्फ़ एक असहाय 'हाँ' में सिर हिलाकर रह गई।


इसी छीना-झपटी और उत्तेजना के बीच, रघु की भीगी हुई लुंगी की गांठ अचानक ढीली होकर खुल गई। वह गीला कपड़ा सरसराता हुआ ज़मीन चाटने लगा। कामिनी की पकड़ अपनी कच्छी पर ढीली पड़ गई।

उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। सामने, दोपहर की सुनहरी और तीखी धूप में रघु का एकदम खड़ा, लोहे जैसा सख्त और काला लंड पूरी शान से तना हुआ था। वह किसी मदांध हाथी की सूँड की तरह झटके मार रहा था।

 सूरज की रोशनी उस अंग की चिकनी त्वचा और उभरी हुई नसों पर चमक रही थी। 042-450
कामिनी का हलक सूख गया। उसने अपनी पूरी ज़िंदगी में इतना खूंखार और भयानक अंग नहीं देखा था।
हालांकि उसने रघु के लंड को आज से पहले भी छुवा था, उसे मुँह मे लिया था, लेकिन तब रघु को इस बात का अहसास नहीं था. वो चोरी थी..... कामिनी के दुवारा की गई हवस की चोरी, लेकिन आज बेबाक रघु अपना लंड ताने खड़ा था.
रघु ने लुंगी उठाने की कोई कोशिश नहीं की। उसे पता था कामिनी की नजर उसके लंड पर जमीं हुई है,

रघु ने अपनी एक कुटिल मुस्कान के साथ कामिनी के हाथ से वह धूलि हुई साफ़ कच्छी पूरी तरह छीन ली। उसने उसे तार पर नहीं टांगा।

बड़ी बेबाकी से रघु ने उस रेशमी कच्छी को अपने उस खड़े, गरम और लोहे जैसे लंड पर टांग दिया।
कामिनी हैरानी और वहशत से फटी आँखों से यह नज़ारा देख रही थी।

 उसकी इज़्ज़त, उसकी आबरू, एक नौकर के नंगे और खड़े अंग पर झटके खा रही थी। वह सफ़ेद रेशम उस काले और सख्त अंग पर किसी पदक की तरह लटका हुआ था।

​"ये... ये क्या बदतमीज़ी है? इधर दो इसे..." कामिनी की आवाज़ कांप रही थी, पर उसके पैरों ने एक कदम भी पीछे नहीं हटाया।
​रघु ने अपनी कमर को एक हल्का सा झटका दिया, जिससे वह सफ़ेद रेशम उस काले और पत्थर जैसे सख्त लंड पर थिरकने लगा।

 "ले लीजिये ना खुद ही... मना किसने किया है? आपके सामने ही तो टंगी है आपकी चड्डी ..." रघु की आवाज़ में कोई डर नहीं था, सिर्फ़ एक वहशी चुनौती थी।


​कामिनी की आँखों के सामने जैसे खून उतर आया। उसे रघु की वह गंदगी, उसकी अनगढ़ मर्दानगी और वह सोंधी महक पागल कर रही थी। 
उसकी जांघों के बीच से काम-रस का सैलाब बहकर उसकी साड़ी को गीला कर रहा था।

​कामिनी का आत्मविश्वास पिघलकर उसकी जांघों के रास्ते बह रहा था। उसने एक बार भी इधर-उधर नहीं देखा। बंटी नीचे सो रहा था, दुनिया बाहर थी, लेकिन इस छत पर वह सिर्फ़ एक 'जिस्मानी प्यासी औरत' थी और सामने उसका 'शिकार' खड़ा था।

ना जाने क्या जादू हुआ, कामिनी के पैर आगे को बढ़ गए, जैसे उसका जिस्म उसके काबू मे ही नहीं था. जाँघे काँपने लगी, लगा जैसे उसका वजन सँभालने की क्षमता अब उसके पैरो मे नहीं है.
बिना एक शब्द बोले, कामिनी धीरे से घुटनों के बल बैठ गई। या खुद उसके घुटनो ने दम तोड़ दिया.

 रघु की आँखों में चमक बढ़ गई। उसके ठीक सामने रघु का काला लंड झटके खा रहा था, उसके लंड से निकली गंदी गंध कामिनी की नाक से होती नाभि के नीचे उतर रही थी, 
कामिनी ने अपने कांपते हाथों से रघु के उस भारी अंग पर लटकी अपनी कच्छी को हटाया। वह कच्छी अब रघु की काम-रस(pre-cum) की बूंदों से और भी गीली हो चुकी थी।


​कामिनी ने रघु के उस काले, मोटे और खुरदरे लंड को अपनी नज़रों से 'पी' लिया। उसने देखा कि रघु के लंड की टोपी (मुंड) के नीचे और उसकी नसों के बीच पसीने और मेल (Grime) की एक परत जमी थी।

कामिनी ने अपनी आँखों को बंद किया और फिर धीरे से खोला। उसे खुद पर यकीन नहीं हो रहा था कि वह क्या करने जा रही है। लेकिन उसके भीतर की वह 'भूखी औरत', जिसे वर्षों से रमेश के फीकेपन, नमर्दानगी ने मार डाला था, आज जाग चुकी थी।

 उसे रघु के बदन से आ रही पसीने, साबुन और अनगढ़ मर्दानगी की गंध पागल कर रही थी।
​उसने अपने कांपते हुए गुलाबी होंठों को रघु के उस खुरदरे अंग के करीब लाया। उसने अपनी जीभ बाहर निकाली और सबसे पहले लंड की उस गरम टोपी (मुंड) को अपनी जीभ की नोक से छुआ। 20240514-142140 वह स्पर्श कड़वा, खारा और पसीने से भरा था। कामिनी के दिमाग में एक धमाका हुआ। उसे उस गंदगी में एक अनोखा सुख महसूस हुआ।

 रघु कई दिनों से नहाया नहीं था, और कामिनी को आज उसी गंदगी में एक अनोखा आकर्षण महसूस हुआ।
 उसके हाथो ने मजबूती से रघु के लंड को अपने कब्जे मे ले लिया 20231129-101055 ,

"सुड़प... सुड़प... गप... गपाक!"
चप... चप... चाट... कामिनी की गुलाबी जबान रघु के गंदे लंड पर रेंगने लगी, या यूँ कहिये उस गंदे हिस्से को साफ करने लगी. 20210929-142507

​वह संस्कारी बहू, पत्नी एक माँ जो हमेशा महंगे इत्र मे डूबी होती थी,  आज एक शराबी नौकर के हफ़्तों के जमे हुए मेल और पसीने को अपनी जीभ से चाटने लगी। वह रघु के मुंड के नीचे जमी उस सफेद गंदगी (Smegma) को अपनी जीभ से खुरच-खुरच कर साफ़ कर रही थी, जैसे वह कोई रसीला फल हो।

​ उसका गाढ़ा थूक रघु के लंड के उस काले मेल के साथ मिलकर एक चिपचिपे तरल में बदल गया, जो रघु के लंड से होता जांघों पर नीचे टपकने लगा। कामिनी को उस गंदगी की गंध उत्तेजना के सातवें आसमान पर ले जा रही थी।
कामिनी को रघु का लंड उत्तेजित कर रहा था, उसे और चाहिए था, और ज्यादा.... वो इस लंड को पूरी तरह से महसूस करना चाहती थी. 65573-domme-switch-wifey-adores-daddys-penis
कामिनी ने अपने मुँह को पूरा खोल दिया जितना हो सकता था उतना, उसने अपनी मर्यादा की आखिरी दीवार को भी ढहा दिया। उसने रघु के उस पूरे भारी अंग को एक ही झटके में अपने मुँह के अंधेरे और गीले हिस्से में उतार लिया।

"गप... सुड़प... चप-चप..."
​कामिनी का मुँह पूरा भर चुका था। रघु के लंड की मोटाई इतनी थी कि कामिनी के जबड़े में खिंचाव महसूस हो रहा था। 

लेकिन उसे उस दर्द में मज़ा आ रहा था। उसका गरम थूक रघु के लंड की खुरदरी त्वचा और कामिनी के मखमली होंठों के बीच एक चिकनाई पैदा कर रहा था।

​जैसे-जैसे कामिनी अपने मुँह को आगे-पीछे कर रही थी, रघु के लंड पर उभरी हुई एक-एक मोटी नस कामिनी के तालू और उसके कोमल मसूड़ों को रगड़ रही थी।

 कामिनी पागलों की तरह चूस रही थी। उसने रघु की गांड को कसकर पकड़ लिया और खुद को उस मर्दानगी में डुबो दिया। cum-deep-in-her-throat-001  

वह रघु के लंड के आखिरी हिस्से से उठती उस तीखी और गंदी गंध को अपने फेफड़ों में भर रही थी। 
उसे इस 'गिरावट' में ही अब अपनी आज़ादी दिख रही थी।
​रघु का वह अंग खुरदरा था, उस पर कुछ बाल उलझे थे, और कामिनी अपनी जीभ से एक-एक हिस्से को टटोल रही थी। 


​ उसने सिर्फ़ लंड पर ही बस नहीं किया। वह और नीचे झुकी और रघु के उन भारी और पसीने से भीगे टट्टों को अपने मुँह में भर लिया। वह उन्हें किसी रसीले फल की तरह अपनी जीभ से सहलाने लगी। unnamed रघु की जांघों के पास की वह तीखी और मर्दाना गंध कामिनी के दिमाग की नसों को फाड़ रही थी।

​कामिनी पागल हो चुकी थी। उसने आज तक रमेश का लंड भी इतनी वहशत से नहीं छुआ था। वह रघु के उस बदबूदार और सख्त अंग को ऐसे चूस रही थी जैसे उसका पूरा वजूद उसी एक अंग में समा गया हो।

​रघु ने अपने दोनों हाथों से कामिनी के बालों को कसकर जकड़ लिया और अपनी कमर को झटके मार-मार कर कामिनी के हलक तक उतारने लगा। कामिनी की आँखों से आंसू निकल रहे थे, वह हांफ रही थी, लेकिन उसने चूसना बंद नहीं किया। वह उस गंदे मेल को अपनी जीभ से खुरच-खुरच कर 'पी' रही थी। brunette-sucks-big-black-cock-deepthroat

​छत की उस सुनसान दोपहर में सिर्फ़ "चप... चप... सुड़प... सुड़प" की आवाज़ें गूँज रही थीं। एक संस्कारी माँ, एक वफादार पत्नी, आज एक नौकर के नंगे जिस्म के सामने अपनी पूरी इज़्ज़त और मर्यादा को उस थूक और मेल के साथ निगल रही थी।

रघु अब बेकाबू हो चुका था। कामिनी के मुँह की गर्मी और उसकी जीभ की कलाकारी ने उसे एक जंगली जानवर बना दिया था। रघु का शरीर कांपने लगा और उसके मुँह से एक घुरघुराहट निकली। कामिनी को अहसास हुआ कि रघु अब झड़ने (Ejaculate) वाला है।
​उसने घबराकर मुँह हटाना चाहा, लेकिन रघु ने अपनी पूरी ताक़त से कामिनी के रेशमी बालों को मुट्ठी में जकड़ लिया। deep-throat-gif-10 उसने कामिनी का चेहरा अपने लंड पर इतनी जोर से दबाया कि कामिनी की नाक भी उसके अंग से चिपक गई। उसके गंदे झांट के बाल कामिनी के नाक के बालो से उलझ गए.

​फच... फचम... फच....
​गरम, गाढ़ा और सफ़ेद वीर्य (Sperm) झटके के साथ कामिनी के गले की गहराई तक उतरने लगा। कामिनी को उबकाई आ रही थी, उसकी आँखों से पानी निकल रहा था, लेकिन रघु ने उसे हटने नहीं दिया। वह अपनी मर्दानगी का आखिरी कतरा कामिनी के हलक में उतार देना चाहता था। कामिनी का मुँह, उसका गला और उसकी नाक उस तीखी और कड़वी गंध से भर गई। tumblr mmcdk3nbz71r2bqb9o1 400 उसे लगा जैसे वह रघु की सारी गंदगी को अपने अंदर निगल रही है।

​जब रघु की पकड़ ढीली हुई, कामिनी फर्श पर पीछे की ओर लुढ़क गई। दोनों हांफ रहे थे। कामिनी के होंठों से, उसकी ठुड्डी से रघु का वीर्य रिसकर फर्श पर गिर रहा था। वह बुरी तरह बिखरी हुई थी। उसकी साड़ी अस्त-व्यस्त थी, पल्लू ज़मीन पर था और उसका ब्लाउज खिंच जाने के कारण उसके सुडौल स्तनों का आधा हिस्सा बाहर झाँक रहा था।

​कामिनी और रघु एक-दूसरे को देख रहे थे। वहां कोई शर्म नहीं थी, सिर्फ़ एक ख़ालीपन था। तभी नीचे से वह आवाज़ आई जो सब कुछ खत्म कर देने के लिए काफ़ी थी।
​"मम्मी! मम्मी! कहाँ हो?"

​बंटी की आवाज़ ने कामिनी की रूह कंपा दी। वह एक झटके में उस हवस के नशे से बाहर आ गई। रघु ने फुर्ती से अपनी लुंगी उठाई और उसे कमर पर लपेट लिया। वह सीढ़ियों की तरफ भागा, लेकिन रुककर उसने एक नज़र कामिनी को देखा।

ना जाने कामिनी ने कैसे उसकी आँखों मे लिखी इबारत को पढ़ लिया, 
​कामिनी ने कांपते हाथों से अपने ब्लाउज के अंदर से 200 का नोट निकाला और रघु की ओर फेंक दिया। रघु ने उस नोट को किसी शिकारी की तरह लपका और बिना पीछे मुड़े भाग गया।

​कामिनी वहीं फर्श पर बैठी रह गई। उसने अपनी साड़ी से अपने चेहरे पर लगा वह चिपचिपा तरल साफ़ किया। 

"मर्द के वादे तभी तक है जब तक उसके लंड मे वीर्य है, वो बहार निकला की मर्द अपनी औकात पर आ जाता है. "
रघु का पैसे ले कर दारू पीने भागना कामिनी को कड़वी हक़ीक़त बता गया था.
भारी कदमो से सीढिया उतरने लगी, 
वो सफ़ेद पैंटी अभी भी छत के फर्श पर पड़ी धूल फांक रही थी.

क्रमशः......




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3 Comments

  1. Bhai jaldi apdate diya karo kahaniyan mast hoti h aapki aur adhuri bhi

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  2. Waahh bhai ye to lajawab update tha ab tak ka best mai se ek ab to raghu hosh Mai bhi Kamini ko apna land chuswa diya ab jald chod bhi dega....
    Kamini ko raghu ke pani se bhiga panty pehnao aur shamsher aur raghu jaise aur character lao jo Kamini ki pyaas aur bhadkaye aur bhujhaye

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