मेरी माँ कामिनी - भाग 28
लिविंग रूम में बैठने की व्यवस्था हो रही थी। सोफे मखमली और आरामदायक थे।
तभी रमेश की जेब में पड़े फोन ने अपनी कर्कश रिंगटोन से माहौल में खलल डाला।
स्क्रीन पर नाम चमक रहा था— 'शमशेर'।
रमेश हड़बड़ा गया। कमिश्नर साहब के सामने वह शमशेर जैसे 'टुच्चे' पुलिसवाले से बात नहीं करना चाहता था।
"एक मिनट... ज़रूरी कॉल है," रमेश ने खीसें निपोरते हुए कहा और बालकनी की तरफ बढ़ गया।
फोन उठाते ही उधर से शमशेर की गालियों भरी आवाज़ आई।
"अबे साले! कहाँ रह गया? दारू का टाइम निकल रहा है और तू गायब है?"
रमेश ने आवाज़ धीमी की।
"अरे भाई, आज नहीं आ पाऊँगा। मैं... वो... विक्रम सर के घर आया हूँ। डिनर पे।"
"विक्रम सर? एक्साइज कमिश्नर?" शमशेर की आवाज़ में ईर्ष्या और झटका दोनों था। "साले, इतनी ऊंची पहुँच बना ली? और मुझे बताया तक नहीं? दोस्त से गद्दारी कर रहा है?"
"अबे साले जिस सुनैना को तूने चोदा था, वो इस विक्रम की ही पत्नी है ,"। तू रख, मैं बाद में बात करता हूँ।"
रमेश ने जैसे-तैसे फोन काटा। उसे लगा बला टली।
जब रमेश वापस अंदर आया, तो नज़ारा बदल चुका था।
सेंटर टेबल पर विदेशी शराब (Imported Scotch) की एक बोतल रखी थी, जिसका लेबल चमक रहा था। रमेश ने ऐसी शराब सिर्फ़ फिल्मों में देखी थी या बड़े ठेकेदारों की पार्टियों में दूर से।
बंटी, जो पास ही खड़ा था, अपने स्कूटर की चाबी घुमा रहा था, इस उम्मीद में कि पापा पूछेंगे।
"पापा, स्कूटर..." बंटी ने कोशिश की।
लेकिन रमेश ने उसे देखा तक नहीं। उसकी आँखें तो सुनैना के मॉडर्न गाउन और उस टेबल पर रखी महंगी बोतल पर फिक्स थीं।
"हाँ-हाँ, बाद में..." रमेश ने हाथ के इशारे से बंटी को मक्खी की तरह हटा दिया। बंटी का चेहरा उतर गया, और वह कोने में जाकर बैठ गया।
विक्रम ने रमेश को सोफे पर बैठने का इशारा किया।
"आइये रमेश जी, शुरू करते हैं," विक्रम ने बोतल उठाई।
रमेश संकोच में था। "सर, ये तो बहुत महंगी होगी..."
विक्रम हंसा। उसकी हंसी में एक भारीपन था। "महंगी-सस्ती क्या होती है रमेश जी? शौक़ बड़ी चीज़ है। और आपके जैसे 'खास' मेहमान के लिए तो यह भी कम है।"
विक्रम ने दो क्रिस्टल के गिलासों में शराब उंडेली। महक ही बता रही थी कि नशा कितना शानदार होगा।
रमेश ने गिलास उठाया, लेकिन विक्रम के सामने वह बहुत छोटा (Inferior) महसूस कर रहा था।
विक्रम का रुतबा, उसका घर, उसकी शराब—सब कुछ रमेश की औकात से बाहर था।
तभी विक्रम ने माहौल बदला। उसने रमेश की आँखों में देखा।
"वैसे रमेश जी, मैंने आपके कारनामे बहुत सुने हैं," विक्रम ने संजीदगी से कहा।
रमेश का गिलास होठों तक जाते-जाते रुक गया। वह अंदर से डर गया।
'कारनामे? कहीं रिश्वत और घपले की बात तो नहीं कर रहे?'
"जी... कौन से कारनामे सर?" रमेश ने डरते हुए पूछा।
विक्रम मुस्कुराया। "अरे वही... वो किशनगंज वाला रोड प्रोजेक्ट। सुना है वहां सालों से लफड़ा चल रहा था, कोई इंजीनियर हाथ डालने को तैयार नहीं था। और आपने? मात्र एक हफ्ते में पूरा मामला क्लियर करवा दिया।"
रमेश हैरान रह गया।
सच्चाई यह थी कि रमेश ने वहां के लोकल गुंडों को पैसे खिलाकर और शमशेर की मदद से डरा-धमकाकर काम करवाया था। वह उसका सबसे 'करप्ट' (Corrupt) काम था।
लेकिन विक्रम उसे 'काबिलियत' बता रहा था।
"जी... वो तो..." रमेश फूला नहीं समाया। "बस सर, थोड़ा मैनेजमेंट करना पड़ता है। काम निकलवाना आना चाहिए।"
"यही तो कला है!" विक्रम ने रमेश के घुटने पर हाथ मारा। "आजकल किताब पढ़ने वाले इंजीनियर बहुत हैं, लेकिन 'ग्राउंड' पर काम कराने वाले जिगरे वाले मर्द कम हैं। ऐसा कारनामा करने वाला कोई पैदा नहीं हुआ आज तक।"
अपनी झूठी तारीफ सुनकर रमेश चने के झाड़ पर चढ़ने लगा। उसका डर गायब हो गया और उसकी जगह अहंकार ने ले ली।
उसने एक बड़ा घूँट भरा। विदेशी शराब गले से नीचे उतरते ही उसे लगा कि वह विक्रम के बराबर का है।
"सच कहूँ रमेश जी," विक्रम ने गिलास घुमाते हुए कहा, "मैं तो इस कुर्सी पर बंध गया हूँ। असली पॉवर तो आपके पास है। कोई जवाबदेही नहीं, अपनी मर्जी के मालिक।"
फिर विक्रम ने अपनी आवाज़ धीमी की और कनखियों से कामिनी (जो सुनैना के साथ बात कर रही थी) की तरफ देखा।
"और ऊपर से... कामिनी जी जैसी बीवी। सादगी और खूबसूरती की मूरत। सच में... मान गए गुरु। बहुत लकी हैं आप।"
रमेश का सीना 56 इंच का हो गया।
उसे लगा कि कमिश्नर साहब उससे जल रहे हैं। उसे अपनी बीवी और अपनी नौकरी दोनों पर गुमान होने लगा (जिनकी वह कल तक कद्र नहीं करता था)।
"अरे सर, बस आप लोगों की दुआ है," रमेश ने दूसरा पेग भी गटक लिया।
नशा चढ़ने लगा था।
माहौल जम ही रहा था कि तभी विक्रम का सिक्योर फ़ोन बजा।
उसने स्क्रीन देखी और उसके चेहरे के भाव बदल गए। प्रेमी और मेज़बान का चेहरा गायब हो गया, और एक सख्त पुलिस कमिश्नर का चेहरा सामने आ गया।
"सॉरी," विक्रम ने खड़े होते हुए कहा। "अर्जेंट कॉल है। शहर के बाहर एक बड़े ड्रग रैकेट की सूचना मिली है। मुझे अभी निकलना होगा।"
कामिनी का चेहरा उतर गया। वह विक्रम की तरफ खिंच रही थी, लेकिन विक्रम के लिए वर्दी पहले थी।
विक्रम ने अपना जैकेट ठीक किया और कामिनी की आँखों में देखा।
"माफ़ कीजियेगा कामिनी जी," विक्रम ने अपनी गहरी आवाज़ में कहा। "मन तो नहीं है जाने का... पर ड्यूटी। आपसे फिर मुलाक़ात होगी, तसल्ली से।"
उसकी आँखों में वादा था। वह मुड़ा और तेज़ कदमों से बाहर निकल गया।
इधर, विक्रम के जाते ही रमेश को खुजली होने लगी।
शमशेर के लगातार फ़ोन आ रहे थे। और सबसे बड़ी बात... विक्रम की वो विदेशी शराब रमेश की 'प्यास' नहीं बुझा पा रही थी।
उसे तो सस्ती दारू और वाहियात दोस्त शमशेर का साथ चाहिए था, ऊपर से कल रात कादर खान के ढाबे का मटन का चस्का लगा था, क्यूंकि उसके हिसाब से उसे वो ताकत मिल गई थी जिसने कामिनी की हालात भी ख़राब कर दी थी.
उसे वो मटन सूप चाहिए था जो उसे अंदर से जानवर बना दे। यहाँ इस 'सभ्य' माहौल में उसका दम घुट रहा था।
"वो... सुनैना जी," रमेश ने हड़बड़ाते हुए बहाना बनाया। "मुझे भी निकलना पड़ेगा। साइट पर कुछ लफड़ा हो गया है। लेबर गिर गई है।"
कामिनी समझ गई कि रमेश झूठ बोल रहा है। वह जानती थी कि वह कहाँ जा रहा है—उसी गटर में।
"जाओ..." कामिनी ने मन ही मन कहा। "अच्छा है, घर खाली रहेगा।"
रमेश ने आव देखा न ताव, 5 मिनट में वहाँ से रफूचक्कर हो गया। बाहर शमशेर अपनी जीप स्टार्ट किये खड़ा था।
अब घर में सन्नाटा था।
ड्राइंग रूम में चार लोग बचे थे।
दो खूबसूरत, अधेड़ उम्र की औरतें— कामिनी और सुनैना।
बंटी रवि भी गार्डन की तरफ चल दिए, लड़को को भी स्पेस चाहिए होता है.
हालांकि यहाँ दो खूबसूरत यौवन से भरपूर औरते बैठी थी, लेकिन एक झिझक भी थी.
सुनैना ने दरवाज़े की तरफ देखा और फिर एक गहरी सांस छोड़ी।
"चलो, बोरिंग लोग गए," सुनैना ने मुस्कुराते हुए कहा। उसने अपना वाइन का गिलास उठाया।"
"रवि आपसे बहुत लगाव रखता है कामिनी जी, आप को देख के ही ख़ुश ही जाता है"
सुनैना ने कामिनी के कंधे पर हाथ रख कहाँ.
कामिनी सकपका गई उसकी बातो से.
सुनैना की बात सुनकर कामिनी सकपका गई।
"ल... लगाव?" कामिनी ने हकलाते हुए पूछा।
सुनैना ने अपनी वाइन का एक घूंट भरा और एक कातिलाना मुस्कान दी।
"हाँ... लगाव," सुनैना ने अपनी आँखों को नचाते हुए कहा। "मेरा बेटा रवि बहुत शर्मीला है, लेकिन आपकी बातें बहुत करता है। कहता है कामिनी आंटी बहुत 'सिंपल और स्वीट' हैं। आज के ज़माने में ऐसी औरतें कहाँ मिलती हैं?"
"वो... वो... थैंक्स यू " कामिनी बुरी तरह सकपका गई.
एक अजीब सी ठंडी शांति छा गई, जैसे दोनों औरते मन ही मन एक दूसरे को समझ रही हो, एक दूसरे की सुंदरता की तारीफ कर रही हो.
ड्राइंग रूम के उस ठंडे, मखमली माहौल में अब सिर्फ़ दो औरतें थीं।
कामिनी और सुनैना।
सुनैना ने अपना आधा खाली वाइन का गिलास टेबल पर रख दिया। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी—नशे की और हवस की।
वह सोफे पर खिसकते हुए कामिनी के बिल्कुल करीब
आ गई। इतना करीब कि उनकी जांघें आपस में सट गईं।
सुनैना का हाथ, जो कामिनी की जांघ पर रखा था, अब धीरे-धीरे ऊपर की ओर, उसकी साड़ी की सिलवटों को सहलाने लगा।
"कामिनी जी..." सुनैना ने फुसफुसाते हुए कहा। उसकी आवाज़ में एक सम्मोहन था। "आप इतनी हसीन हैं, फिर भी आप अपनी इच्छाओं को दबाकर क्यों रखती हैं?"
कामिनी का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
उसकी योनि में, जहाँ रघु ने कल रात आग लगाई थी, आज सुबह से एक 'खालीपन' था। वह तड़प रही थी। और सुनैना का यह रेशमी स्पर्श उस तड़प को और बढ़ा रहा था।
"स... सुनैना जी..." कामिनी की आवाज़ कांप रही थी। "ये... ये क्या कर रही है आप?." कामिनी का जिस्म पसीना छोड़ने लगा, ऐसा अजीब अनुभव उसने कभी नहीं किया था.
लेकिन कामिनी ने सुनैना का हाथ हटाया नहीं। उसे वह स्पर्श अच्छा लग रहा था।
मर्दों के हाथ भारी और सख्त होते थे, जो नोचते थे। लेकिन सुनैना का हाथ पानी जैसा तरल और कोमल था, जो प्यार कर रहा था।
सुनैना कामिनी के चेहरे के और करीब आ गई।
कामिनी को सुनैना के मुंह से आती महंगी वाइन की खट्टी-मीठी खुशबू आ रही थी। यह खुशबू कामिनी के नथुनों से होकर सीधे उसके दिमाग पर असर कर रही थी। वह मदहोश हो रही थी।
सुनैना ने अपनी उंगलियां कामिनी के गालों पर फेरीं, फिर उसकी ठोड़ी (Chin) को धीरे से ऊपर उठाया।
"ठीक और गलत तो समाज तय करता है कामिनी," सुनैना ने उसकी आँखों में डूबते हुए कहा।
"लेकिन सुख... सुख तो हमारा शरीर तय करता है।"
सुनैना की सांसें कामिनी के होठों पर टकरा रही थीं।
"हमें अपनी प्यास बुझाने के लिए मर्दों के भरोसे क्यों बैठना चाहिए? क्या सिर्फ़ वो ही हमें खुश कर सकते हैं?"
सुनैना ने अपना चेहरा कामिनी की गर्दन के पास ले जाकर, वहां एक गहरी सांस ली।
"औरत अपने आप में सम्पूर्ण (Complete) है कामिनी... भला कोई मर्द एक औरत के शरीर के राज़ को समझ सकता है क्या? वो सिर्फ़ लेना जानते हैं... हम देना जानती हैं।"
कामिनी के दिमाग के सारे तर्क पिघल गए।
सुनैना सही कह रही थी। रमेश ने उसे कभी नहीं समझा।
लेकिन सुनैना... वह उसे एक इंसान, एक औरत की तरह महसूस कर रही थी।
कामिनी की आँखें अपने आप बंद हो गईं। उसके होंठ कांपने लगे। वह इंतज़ार करने लगी।
सुनैना ने कामिनी की इस मूक स्वीकृति को पढ़ लिया।
वह झुकी।
और अपने गीले, वाइन के स्वाद से भरे होंठ... कामिनी के कांपते हुए होठों पर रख दिए।
"म्मम्म....."
कामिनी के मुंह से एक दबी हुई सिसकी निकली।
यह उसके जीवन का पहला अनुभव था। उसने कभी किसी औरत को किस नहीं किया था।
सुनैना के होंठ बहुत नरम थे, मलाई जैसे।
कामिनी हैरान थी, लेकिन अगले ही पल, वह पिघल गई।
उसने विरोध नहीं किया, बल्कि उसने भी अपने होंठ खोल दिए।
दोनों की सांसें मिल गईं।
सुनैना ने धीरे से कामिनी के निचले होंठ को अपने दांतों और होठों के बीच दबाया और चूसा।
कामिनी के पूरे शरीर में बिजली दौड़ गई। उसे लगा जैसे उसके पेट में तितलियां उड़ रही हों।
यह किस (Kiss) आक्रामक नहीं था, यह मीठा और गहरा था।
कामिनी को वाइन का कड़वा स्वाद और सुनैना की लार का मीठा स्वाद एक साथ महसूस हुआ।
"उफ्फ्फ..." कामिनी ने अपना हाथ उठाया और अनजाने में ही सुनैना के कंधों पर रख दिया, उसे अपने और करीब खींचने के लिए।
वह काम-वासना में तड़प रही थी, और सुनैना उसे बूंद-बूंद करके पी रही थी।
सुनैना ने अपने होंठ अलग किए, लेकिन चेहरा अभी भी पास था। दोनों की आँखें बंद थीं, सांसें भारी थीं।
"महसूस हुआ?" सुनैना ने कामिनी के होठों पर अपनी उंगली फेरते हुए पूछा। "यह है हम औरतों की ताकत...
औरते बिना मर्द के भी बहुत कुछ है "
सुनैना का ज्ञान बहुत गहरा था, औरत के वजूद पर खड़ा था.
कामिनी की आँखें खुलीं। उनमें अब शर्म नहीं थी, बल्कि एक नई भूख थी।
वह हैरान थी कि उसे एक औरत के साथ इतना अच्छा लगा, ये तो कुछ अलग ही था, ये तो उसने कभी सोचा ही नहीं था, असंभव चीज उसने अभी अभी महसूस की थी.
उसके मुँह से शब्द नहीं निकल रहे थे, वो जड़ हो गई थी, एक अजीब सी रूहानियत ने उसके जिस्म को पकड़ लिया था.
उसने अपनी जीभ से अपने गीले होठों को चाटा—वहाँ अभी भी सुनैना की वाइन का स्वाद बाकी था।
तभी बाहर गार्डन से बंटी के स्कूटर स्टार्ट करने की आवाज़ आई।
दोनों एकदम से अलग हो गईं, लेकिन आँखों का संपर्क नहीं टूटा।
सुनैना मुस्कुराई।
जवाब मे कामिनी भी मुस्कुरा दी... शायद कुछ भावनाओं के लिए शब्द नहीं होते, किसी चीज को बस यूँ ही स्वीकार कर किया जाता है, बिना बोले.
सिर्फ महसूस कर के.
कामिनी भी इसे महसूस कर रही थी, एक अनोखे, अजीब से प्यार की तरफ खिंच रही थी,
नये अध्याय की तरफ बढ़ रही थी.
"चलिए खाना खाते है " सुनैना कामिनी की जांघो को मसलती खड़ी हो गई.
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शहर के बाहर, सुनसान हाइवे के किनारे, कादर खान का ढाबा अपनी बदनामी और 'खास' मटन के लिए मशहूर था।
हवा में जलते हुए कोयले, सस्ते मटन और देसी शराब की मिली-जुली गंध थी।
एक खटिया पर रमेश और शमशेर बैठे थे।
रमेश ने प्लास्टिक के गिलास में सस्ती व्हिस्की भरी और एक ही सांस में गटक गया। विक्रम के घर की वो 'ब्लू लेबल' उसे वो किक नहीं दे पाई थी जो यहाँ की 'संतरानुमा' शराब ने दी।
शमशेर, जो पहले से टल्ली था, ने एक गंदी हंसी हंसा.
"अब बता ना साले..." शमशेर ने अपनी लाल आँखें नचाईं। "कैसी लग रही थी वो 'रंडी' (सुनैना)? मुझे बिना बताये पहुंच गया था साले.
रमेश ने गिलास मेज पर पटका। "अबे साले, चुप कर। उसका पति (विक्रम) वहीं बैठा था। तेरा बाप है वो आदमी,। मेरी तो फटी पड़ी थी वहां। घंटा कुछ कर पाता मैं।"
"अबे ऐसे कितने कमिश्नर आये और गए, और भूल मत इस कमिश्नर की बीवी को चोदा है मैंने, तु पड़ा हुआ था नशे मे हाहाहाहाहा...." शमशेर अपनी मर्दानगी पर चौड़ा हो रहा था.
"अब तो उसे चोदने का और मजा आएगा, जब जब चोदुँगा उस अड़ियल कमिश्नर विक्रम की याद आएगी मुझे हेहेहेहेहे.... गुटूक गटक.... शमशेर ने एक पेग और खींच लिया.
रमेश ने झुंझलाते हुए आवाज़ लगाई, "ओए कादर! मटन सूप ला बे! आज फिर शेर बनना है मुझे।"
रमेश को शमशेर की हसीं झेली नहीं जा रही थी.
अभी कादर खान ने "जी मालिक" कहा ही था कि...
अचानक रात के सन्नाटे को चीरते हुए सायरनों की आवाज़ गूंज उठी।
"सांय... सांय... सांय...!!"
एक नहीं, बल्कि चार-पाँच पुलिस जीपों के सायरन एक साथ बजने लगे।
ढाबे पर अफरा-तफरी मच गई। जो शराबी मटन चबा रहे थे, वो हड्डियां फेंककर भागने लगे। किसी का गिलास गिरा, किसी की खटिया पलटी।
शमशेर, जो खुद पुलिसवाला था, हड़बड़ा गया।
"ये किसकी रेड है बे? मुझे तो खबर ही नहीं थी!" शमशेर चिल्लाया।
रमेश की नशा एक पल में हिरन हो गया।
तभी ढाबे के अंदर एक हवलदार (Constable) बदहवास सा भागता हुआ आया। उसका चेहरा पसीने से तर था।
उसने शमशेर को देखा और ठिठक गया।
"अरे शमशेर साहब! आपको कितना फोन किया, लगा ही नहीं?" हवलदार की सांस फूल रही थी।
"साहब भागो! जल्दी निकलो यहाँ से! कमिश्नर विक्रम सिंह खुद लीड कर रहे हैं। ड्रग्स की टिप मिली है उन्हें।"
"विक्रम सिंह..."
यह नाम सुनते ही रमेश के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
उसका मुंह खुला का खुला रह गया।
'अरे बाप रे! वो अभी-अभी तो मेरे साथ व्हिस्की पी रहा था ... इतनी जल्दी यहाँ? मतलब वो जो फ़ोन आया था... वो इसी रेड के लिए था?'
रमेश का चेहरा पीला पड़ गया। उसकी आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा।
अगर विक्रम ने उसे यहाँ, इस गंदे ढाबे पर, शमशेर के साथ देख लिया... तो उसकी 'इज्जत' का क्या होगा?
सुनैना से रिश्ता तो दूर, वो जेल की हवा खाएगा और समाज में मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगा।
"शमशेर... भाई कुछ कर..." रमेश गिड़गिड़ाया, "मेरी नौकरी, मेरी बीवी... सब ख़त्म हो जाएगा अगर विक्रम ने मुझे देख लिया।"
शमशेर भी डरा हुआ था। "अबे चुप कर! सोचने दे!"
तभी किचन के पीछे से कादर खान एक पुरानी लोहे की पेटी (Box) सीने से चिपकाए भागता हुआ आया।
"मालिक... मालिक..." कादर का गुंडों जैसा चेहरा डर से भीगा हुआ था। "आज तो मैं गया जान से! ये पेटी..."
शमशेर ने पेटी देखी। "इसमें क्या है बे?"
"वही है जिसके लिए ये रेड पड़ी है साहब..." कादर ने हांफते हुए कहा। "असली माल (Drugs)। करीब 50 लाख का माल पड़ा हुआ है,"
"50 लाख..." रमेश की आँखें फैल गईं।
रमेश की हालत पतली हो गई। "ड्रग्स? अरे मरवाओगे क्या?"
"साब अगले सप्ताह सौदा होना था," कादर शमशेर को देख मिमियाया जैसे शमशेर की ही गलती हो.
"अबे मुझे भी नहीं पता था, इस रेड के बारे मे" शमशेर भी कंफ्यूज था, क्या करे... यहाँ मौजूद होना भी उसकी नौकरी के लिए खतरा था.
तभी उस वफादार हवलदार ने इशारा किया। "साहब, सामने से मत जाओ, पूरा घेरा है। पीछे चलिए... मैंने आपका नमक खाया है, आंच नहीं आने दूंगा।"
चारों—शमशेर, रमेश, कादर (पेटी के साथ) और हवलदार—ढाबे के पिछले हिस्से की तरफ दौड़े।
रसोड़े के महकते मटन और जमीन पर पड़े बर्तनो से होते हुए वे उस बदबूदार बाथरूम के पास पहुँचे जिसकी दीवार टूटी हुई थी।
बाहर सायरन की आवाज़ें अब कान फोड़ रही थीं।
"कूद जाओ!" हवलदार ने दीवार की तरफ इशारा किया।
"पीछे जंगल है, जीप वहां नहीं आ पाएगी।"
रमेश ने अपनी पैंट संभाली और किसी तरह दीवार फांद गया। पीछे-पीछे शमशेर और कादर खान।
वे तीनों जंगल की झाड़ियों में गिरते-पड़ते भागने लगे। कांटे चुभ रहे थे, कीचड़ उछल रहा था। रमेश का महंगा सूट और 'सभ्य' दिखावा अब कीचड़ में मिल चुका था।
थोड़ी दूर जाकर वे रुके। तीनों की सांसें धोकनी की तरह चल रही थीं।
रमेश ने कादर के हाथ में वो पेटी देखी।
"फेंक इसे!" रमेश चिल्लाया। "ये मुसीबत की जड़ है! अगर ये हमारे पास मिली तो विक्रम एनकाउंटर कर देगा!"
"पागल हो गया है क्या?" शमशेर ने रमेश का गिरेबान पकड़ लिया। "50 लाख का माल है इसमें! 50 लाख! साले गांड फट जाती है इतना रुपया कमाने मे। इसे फेंकेंगे नहीं।"
"तो अब क्या करें?" कादर खान रोने जैसा हो गया। "मेरा ढाबा गया, मेरा ठिकाना गया। अब कहाँ जाऊं इस माल को लेकर?"
शमशेर का दिमाग तेज़ी से चला। चलता भी क्यों नहीं, इन सब मे उसका कमीशन फिक्स था.
"कादर..." शमशेर ने अपनी जीप की चाबी निकाली। "तुझे छुपना होगा। 5-6 दिन के लिए अंडरग्राउंड हो जा। जब तक मैं मामला शांत नहीं करता।"
"पर जाऊं कहाँ साहब? अब तो मेरा अड्डा पुलिस जानती ही है।"
शमशेर ने रमेश की तरफ देखा। एक कुटिल मुस्कान उसके चेहरे पर आ गई।
"रमेश के घर।"
रमेश उछल पड़ा। "क्या? मेरे घर? पागल हो गए हो? कामिनी है वहां, बंटी है... और वो विक्रम का पिल्ला मेरे बेटे का दोस्त है, कभी भी घर ले टपक पड़ता है,
"अबे तो वही सबसे सेफ जगह है!" शमशेर ने तर्क दिया।
वैसे भी 5,6 दिन की बात है, यहाँ कादर के ढाबे पे कुछ मिलेगा नहीं तो कोई दिक्कत ही नहीं है ना, ये पेटी तो इसके पास है.
"कमिश्नर सपने में भी नहीं सोचेगा कि ड्रग्स उस आदमी के घर में है जिसके साथ उसने शाम को दारू पी थी। चिराग तले अंधेरा, समझे?"
"पर... कामिनी..." रमेश हिचकिचाया।
"अबे क्या औरतों की तरह डर रहा है?" शमशेर ने रमेश की 'मर्दानगी' पर चोट की। "तू घर का मालिक है या वो?
वो तेरा बिना काम का शराबी नौकर रघु भी स्टोर रूम में पड़ा ही रहता है ना, वहां रखवा दे कादर को। बोल देना रघु का दोस्त है, मुसीबत में है। रघु तो वैसे भी शराबी है, दो बोत्तल फेंक के मार देना उसके मुँह पर.
इधर रघु का नाम सुनते ही कादर खान के कान खड़े हो गए, "अबे साला मतलब ये रमेश, उस मैडम का पति है जहाँ रघु रहता है, वाह री तकदीर " कादर खान मंद ही मंद मुस्कुरा उठाया.
शमशेर की दोस्ती के आगे अब रमेश क्या कहता..
"ठीक है..." रमेश ने हार मान ली। "लेकिन सिर्फ़ कुछ दिनों के लिए।"
शमशेर की जीप जंगल के दूसरे किनारे पर, एक कच्चे रास्ते पर खड़ी थी (क्योंकि वह पुलिस की जीप थी, इसलिए वहां खड़ी होने पर किसी को शक नहीं हुआ था)।
तीनों उसमें बैठे। कादर ने पेटी को अपनी टांगों के बीच दबा लिया।
शमशेर ने एक्सीलेटर दबाया और जीप अंधेरे को चीरती हुई शहर की तरफ दौड़ पड़ी।
पीछे ढाबे पर रेड चल रही थी, लेकिन 'असली माल' और 'असली मुजरिम' पुलिस की ही जीप में बैठकर शहर के सबसे 'शरीफ' इलाके की तरफ जा रहे थे।
क्रमशः..

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