अपडेट - 13, मेरी माँ कामिनी
सुबह के 8 बज रहे थे।
कमरे की खिड़की से धूप की एक तीखी किरण कामिनी के चेहरे पर पड़ी। वह हड़बड़ा कर उठी।
सिर भारी था, जैसे कोई पत्थर रखा हो।
जैसे ही उसे होश आया, उसे अपने मुंह के अंदर एक अजीब सा कसैला और बासी स्वाद महसूस हुआ।
याददाश्त का एक झोंका आया—कल रात... स्टोर रूम... रघु का वीर्य... और उसका निगलना।
"उबक..."
कामिनी को एक ज़बरदस्त उबकाई आई। उसे लगा वह उल्टी कर देगी। उसे तुरंत अपना मुंह साफ़ करना था, उस 'गंदगी' को खुरच कर बाहर निकालना था।
उसने बाथरूम की तरफ देखा, लेकिन अंदर से पानी गिरने की आवाज़ आ रही थी। रमेश अंदर था।
कामिनी के पास इंतज़ार करने का वक़्त नहीं था। उसका पेट मचल रहा था।
वह बिस्तर से उठी और भागते हुए कमरे से बाहर निकली।
वह सीधे हॉल में बने कॉमन बाथरूम की तरफ दौड़ी।
हड़बड़ाहट और उबकाई के मारे उसने यह चेक भी नहीं किया कि अंदर कोई है या नहीं। उसे लगा बंटी और रवि तो स्कूल चले गये होंगे,
उसने झटके से बाथरूम का दरवाज़ा धकेला।
कुंडी शायद ठीक से नहीं लगी थी या खुली थी, दरवाज़ा एक बार में ही खुल गया।
और सामने का दृश्य देखकर कामिनी के कदम वहीं फ्रीज़ हो गए। उसकी आंखे फटी की फटी रह गई,
सामने शावर के नीचे रवि खड़ा था।
बिल्कुल नंगा।
पानी की बूंदें उसके कसते हुए, गोरे और जवान बदन से फिसल रही थीं।
दरवाज़ा खुलने की आवाज़ सुनकर रवि चौंक गया। वह मुड़ा।
उसकी आँखों में हैरानी थी, उसके सामने अप्सरा खड़ी थी मुँह पर हाथ रखे, रवि खुद हक्का बक्का था, उसने कभी ऐसी परिस्थिति की कल्पना भी नहीं की थी.
उसने अपना बदन छुपाने की कोशिश नहीं की।
सामने उसके दोस्त की माँ, कामिनी खड़ी थी—बिखरे बाल, अस्त-व्यस्त साड़ी और चेहरे पर हवाईयां।
कामिनी को तुरंत भाग जाना चाहिए था। उसे चीखना चाहिए था या माफ़ी मांगकर दरवाज़ा बंद कर देना चाहिए था।
लेकिन... उसे सांप सूंघ गया।
उसकी नज़रें रवि के चेहरे से फिसलकर, उसके चौड़े सीने, सपाट पेट से होते हुए सीधे नीचे चली गईं।
और वहां जाकर चिपक गईं।
कामिनी ने अब तक अपने जीवन में सिर्फ़ दो तरह के लंड देखे थे (पति के अलावा)—रघु का और शमशेर का।
दोनों काले थे। भद्दे थे। घने, काले और जंगली बालों से घिरे हुए। उनमें एक 'जानवर' जैसा खुरदरापन था।
लेकिन रवि?
रवि का लंड... खूबसूरती की एक मूरत था।
वह गोरा-चिट्टा था। बिल्कुल साफ़-सुथरा।
रवि ने अपनी जांघों के बीच के बाल पूरी तरह साफ़ कर रखे थे। वहां एक भी बाल नहीं था, सिर्फ़ चिकनी, गोरी चमड़ी थी।
और उस चिकनी जगह के बीचो-बीच... उसका लंड शान से लटक रहा था।
वह इस उम्र (20 साल )में भी काफी बड़ा और मोटा था, लेकिन उसमें एक सुडौलपन था।
उसका रंग बाकी शरीर की तरह ही हल्का सांवला-गोरा था, लेकिन उसका सुपारी, वह बिल्कुल गुलाबी (Pink) था।
ताज़े खिले हुए गुलाब की तरह।
कामिनी की आँखें फटी रह गईं।
उसने कभी सोचा भी नहीं था कि एक मर्द का अंग इतना सुंदर भी हो सकता है।
रघु और शमशेर के लंड 'हथियार' लगते थे, डरावने लगते थे।
लेकिन रवि का लंड एक 'फल' जैसा लग रहा था—रसीला, साफ़ और ताज़ा।
शावर का पानी उस गुलाबी सुपारी पर गिर रहा था और फिसलकर नीचे जा रहा था।
ना जाने क्यों कामिनी के दिमाग में तुलना चलने लगी। जिस्म पर चीटिया सी रेंगने लगी.
'इतना चिकना... इतना गोरा... रघु का तो काला नाग था... और यह? यह तो किसी राजकुमार जैसा है।'
रवि वहीं खड़ा था, पानी में भीगता हुआ।
उसका लंड, जो पहले शांत था, कामिनी की उन भूखी, ताड़ती हुई नज़रों को महसूस करके हल्का सा हिलने लगा।
उसमें हरकत हुई। वह धीरे-धीरे ऊपर उठने लगा, जैसे सलामी दे रहा हो।
उस गुलाबी सुपारी का फूलना कामिनी को साफ़ दिखाई दे रहा था।
कामिनी एक भयंकर दुविधा में फंसी थी।
उसका दिमाग चीख रहा था— 'भाग कामिनी... यह तेरे बेटे का दोस्त है... यह पाप है।'
लेकिन उसका जिस्म?
उसका जिस्म उस 'खूबसूरत नज़ारे' के सम्मोहन में जकड़ गया था।
वह उस चिकनेपन को छूना चाहती थी। वह देखना चाहती थी कि वह 'गुलाबी हिस्सा' कितना नरम होगा।
उसकी चूत, जो सुबह उठते ही शांत थी, इस नज़ारे को देखकर फिर से गीली हो गई।
एक गर्म धारा उसकी पैंटी में रिस गई।
कल रात उसने 'काले और खुरदरे, रघु के लंड का स्वाद चखा था, वो इस हादसे से बहार निकली भी नहीं थी की, आज सुबह सुबह ही उसके सामने खूबसूरत अजूबा था, उसे लुभा रहा था.
कामिनी की सांसें फूलने लगीं। वह दरवाज़े के हैंडल को पकड़े, बस उस गुलाबी लंड को घूरे जा रही थी, जैसे किसी ने उस पर काला जादू कर दिया हो।
***************
कामिनी हक्की-बक्की थी। उसका दिमाग सुन्न हो चुका था।
बाथरूम के दरवाजे पर उसके पैर जैसे फेविकोल से चिपक गए थे। न वह अंदर जा पा रही थी, न बाहर आ पा रही थी। उसकी आँखें रवि के उस 'खूबसूरत' अंग पर टंगी हुई थीं।
तभी...
रवि के उस खड़े लंड ने एक हल्का सा झटका लिया।
वह मांसल गुलाबी सुपारी हवा में फड़फड़ाया।
इस एक मामूली से झटके ने कामिनी को सपनों की दुनिया से खींचकर धरातल पर पटक दिया।
उसे होश आया कि वह क्या कर रही है।
वह घबराकर एक कदम पीछे हटी।
उसने हड़बड़ाहट में बाथरूम का दरवाज़ा अपनी तरफ खींचा और बंद कर दिया।
धप्प...
दरवाज़ा बंद होते ही कामिनी उसी दरवाजे से अपनी पीठ टिकाकर खड़ी हो गई।
उसकी छाती धौंकनी की तरह चल रही थी।
तभी अंदर से शावर के पानी के शोर के बीच रवि की मखमली आवाज़ आई—
"Sorry आंटी... मैं जल्दी में दरवाज़ा बंद करना भूल गया था।"
उसकी आवाज़ में शर्मिंदगी कम और एक अजीब सी 'शरारत' ज्यादा थी।
कामिनी का गला सूख रहा था। उसके मुंह में अभी भी रघु के वीर्य का वह कसैला और बासी स्वाद भरा हुआ था, जिसकी वजह से उसे उबकाई आ रही थी।
लेकिन रवि की आवाज़ और उस 'गुलाबी लंड' की छवि ने उसके दिमाग पर ऐसा असर किया कि उसने अनजाने में ही...
गटक...
उसने अपने मुंह में जमा थूक (और उस कसैले स्वाद) को निगल लिया।
हैरान कर देने वाली बात यह थी कि जैसे ही वह कड़वा घूंट उसके गले से नीचे उतरा... उसकी उबकाई गायब हो गई।
पेट की वह मरोड़, वह उल्टी आने का अहसास... सब उस 'जवान नज़ारे' के नशे में दब गया।
उसने अभी-अभी एक जवान लड़के का साफ़-सुथरा, गुलाबी और खूबसूरत लंड देखा था। उस दृश्य ने उसके दिमाग से 'गंदगी' का ख्याल ही मिटा दिया।
"क... ककक... कोई बात नहीं..." कामिनी ने दरवाजे के बाहर से हकलाते हुए जवाब दिया।
और फिर वह वहां से भागी।
जैसे कोई भूत उसके पीछे लगा हो। नंगे पैर वह हॉल पार करते हुए सीधे अपने बेडरूम में जा पहुंची।
बेडरूम में रमेश तैयार खड़ा था। वह नहा चुका था (कमरे वाले बाथरूम में) और कपड़े पहन रहा था।
कामिनी हांफते हुए अंदर आई।
उसका चेहरा पसीने से भीगा था और हवाइयां उड़ रही थीं।
रमेश ने मुड़कर उसे देखा। उसके चेहरे पर कल रात वाली हैवानियत का नामो-निशान नहीं था।
"अरे, आज कितना देर सोती रही तुम?" रमेश ने बड़े प्यार से, सामान्य लहजे में पूछा।
जैसे उसे कल रात का कुछ याद ही न हो। जैसे उसने कल अपनी बीवी को 'रंडी' नहीं बोला था, जैसे उसने उसे शमशेर के हवाले नहीं किया था।
यह उसका 'ब्लैकआउट' था या नाटक, कहना मुश्किल था।
"वो... वक... वो..." कामिनी कुछ बोलना चाहती थी, लेकिन शब्द उसके गले में फंस गए। वह क्या बताती? कि वह अभी-अभी उसके दोस्त के बेटे का नंगा लंड देखकर आ रही है? या यह कि उसके मुंह में अभी भी रघु का स्वाद है?
रमेश ने घड़ी देखी।
"अच्छा सुनो, मैं निकल रहा हूँ। बहुत लेट हो रहा है। नाश्ता बाहर ही कर लूँगा।"
रमेश ने अपनी फाइल उठाई और कामिनी के पास से गुज़र गया।
उसने एक बार भी नहीं पूछा कि— तुम कांप क्यों रही हो? पसीने में क्यों हो? तुम्हारी आँखें लाल क्यों हैं?
रमेश चला गया।
कामिनी वहीं खड़ी रह गई—हैरान, पसीने से भीगी और कांपती हुई।
उसके दिमाग में अभी भी वही रील (Reel) चल रही थी—
बाथरूम का वो शावर... वो साफ़-सुथरा बदन... और वो गुलाबी, सुडौल लंड जो उसे सलामी दे रहा था।
उसकी चूत ने उस खूबसूरत नज़ारे को याद करके, एक बार फिर अपनी 'सहमति' की मोहर लगा दी थी।
उसकी जांघों के बीच एक ताज़ा गीलापन रिस आया था।
***********
रमेश के घर से निकलते ही कामिनी ने मुख्य दरवाज़ा बंद किया और सीधे अपने बेडरूम की तरफ भागी।
उसकी चाल में एक अजीब सी हड़बड़ाहट थी। उसकी पैंटी, जो रवि के उस 'गुलाबी नज़ारे' को देखकर गीली हुई थी, अब उसकी जांघों से चिपचिपे पदार्थ की तरह चिपक रही थी। वह गीलापन उसे किसी तेज़ाब की तरह जला रहा था।
वह बाथरूम में घुस गई।
उसने अपने कपड़े उतारने शुरू किए। साड़ी, पेटीकोट, ब्लाउज... उसने सब कुछ ऐसे नोच कर फेंका जैसे वे कपड़े नहीं, बल्कि कांटे हों जो उसके जिस्म को चुभ रहे हों।
जैसे ही आखिरी कपड़ा (गीली पैंटी) उतरा, कामिनी ने राहत की सांस ली।
उसने बाथरूम के बड़े आईने में अपने नंगे जिस्म को देखा।
और देखती ही रह गई।
आज उसका बदन सिर्फ़ नंगा नहीं था, वह बोल रहा था।
उसकी त्वचा पर एक अजीब सी, मादक चमक थी—जैसे किसी ने उसे तेल से नहला दिया हो।
उसके स्तन आज पहले से कहीं ज्यादा भारी और फूले हुए लग रहे थे।
उसके निप्पल, जो अक्सर मुलायम रहते थे, आज एकदम कड़क होकर बाहर निकले हुए थे। उनका रंग गहरा कत्थई हो गया था और वे ऐसे तने हुए थे जैसे किसी के स्पर्श के लिए भीख मांग रहे हों।
कामिनी की नज़र नीचे फिसली।
उसकी नाभि गहरी थी, और उसके नीचे... उसकी चूत।
वह किसी फूली हुई, गरम कचौरी जैसी लग रही थी।
उसके होंठ सूज कर मोटे हो गए थे, बहार को उभर आये थे और हल्के खुले हुए थे।
वहां अब छोटे-छोटे, काले बाल उग आए थे, जो उस गुलाबी दरार को एक जंगली रूप दे रहे थे। वह नज़ारा इतना कामुक था कि कामिनी को खुद अपने ही जिस्म को देखकर नशा होने लगा।
उसका हाथ अनजाने में अपनी जांघों के बीच जाने के लिए उठा।
लेकिन वह बीच हवा में ही रुक गई।
उसे डर लगा।
'नहीं... अगर मैंने अभी खुद को छुआ... तो मैं यहीं गिर जाऊंगी। मैं दम तोड़ दूंगी।" उसकी जाँघे कांप रही थी, वो खुद अपने जिस्म की गर्मी से डर रही थी.
एक बेचैन, कामवासना मे तड़पती औरत भला कर भी क्या सकती है, खुद को छूना भी उसके लिए मुश्किल हो रहा था,
उसने तुरंत शावर का नॉब घुमाया।
छनन्नन्न...
ठंडा पानी उसके तपे हुए बदन पर गिरने लगा। ऐसा लगा हो जैसे ठंडा पानी पड़ने से उसके गर्म जिस्म से भाँप निकल रही हो.
जैसे-जैसे पानी उसके स्तनों और पेट से होकर नीचे बह रहा था, उसके जिस्म की गर्मी तो शांत होने लगी, लेकिन दिमाग का तूफ़ान तेज हो गया।
अचानक, उसे एक ज़बरदस्त आत्मग्लानि (Guilt) महसूस हुई।
कल रात की यादें किसी डरावनी फिल्म की तरह उसके दिमाग में चलने लगीं।
स्टोर रूम का अंधेरा... रघु का पसीने से भीगा लंड... और उसका मुंह में लेना।
"वेककक..."
कामिनी को एक ज़बरदस्त उबकाई आई। उसने अपना मुंह हाथों से ढक लिया।
'छिः कामिनी... तू इतनी गिर गई? तूने एक शराबी, गंदे मजदूर का लंड चूसा?'
उसे अपने मुंह में वही कसैला स्वाद फिर से महसूस होने लगा।
'क्या मैं सच में रंडी बन गई हूँ? रमेश सही कहता था क्या?'
उसकी अंतरात्मा उसे धिक्कार रही थी। वह एक इज़्ज़तदार घर की बहू थी, एक बेटे की माँ थी। उसने यह सब कैसे किया?
और सबसे बड़ी बात— उसे यह सब आया कैसे?
उसने तो आज तक रमेश का भी ठीक से नहीं चूसा था। फिर कल रात उसने रघु के लंड को इतनी महारत से, इतनी गहराई तक (Deep Throat) कैसे लिया? जैसे वह वर्षों से यही काम करती हो।
'किसने सिखाया मुझे? मेरे अंदर यह कौन सी औरत छिपी है?'
वह पानी के नीचे खड़ी रोती रही। आंसू और पानी मिलकर उसके गालों से बहते रहे। वह अपने पापों को धोने की कोशिश कर रही थी, लेकिन वह जानती थी कि यह दाग पानी से नहीं धुलेंगे।
करीब 15 मिनट बाद वह बाहर निकली।
उसने खुद को पोंछा, लेकिन रगड़-रगड़ कर नहीं, बल्कि बहुत धीमे से। उसका जिस्म अभी भी संवेदनशील (Sensitive) था।
उसने एक सूती साड़ी पहनी और गीले बालों पर तौलिया लपेट लिया।
जब वह तैयार होकर आंगन में आई, तो रवि और बंटी स्कूल जाने के लिए तैयार खड़े थे।
कामिनी की नज़रें ज़मीन पर थीं। वह रवि का सामना नहीं करना चाहती थी।
लेकिन रवि की नज़रें उसी पर थीं।
रवि के चेहरे पर एक विजयी और शरारती मुस्कान थी। वह जानता था कि कामिनी ने उसे नंगा देखा है, लेकिन कामिनी का उस से नजर ना मिलाना क्या है?
रवि मन ही मन डर भी रहा था कहीं आंटी उस पर चिल्लाये ना.
लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ,
कामिनी उसे कनखियों से देख रही थी, लेकिन नज़रें मिला नहीं पा रही थी। उसका दिल 'चोर' की तरह धड़क रहा था।
"माँ..." बंटी ने अपनी माँ का ध्यान खींचा।
"आज प्लीज़ गाजर का हलवा बनाओ ना? रवि को बहुत पसंद है। इसने कल ही बोला था।"
कामिनी ठिठक गई।
गाजर का हलवा?
रवि को गाजर का हलवा बहुत पसंद है?
कामिनी ने धीरे से सिर उठाया और रवि को देखा।
रवि ने अपनी जीभ हल्का सा अपने होंठों पर फेरी, जैसे स्वाद ले रहा हो। यह इशारा हलवे के लिए था या कामिनी के लिए, यह समझना मुश्किल नहीं था।
"ठी... ठीक है... बेटा," कामिनी की आवाज़ लड़खड़ा गई, "बना दूंगी।"
उसने एक बहुत ही फीकी और कमज़ोर मुस्कान दी। वह न तो ना कह सकती थी, न ही इस माहौल से भाग सकती थी।
"चलो भाई, लेट हो रहा है," रवि ने बंटी के कंधे पर हाथ रखा और दोनों निकल गए।
दरवाज़ा बंद होते ही कामिनी ने एक गहरी, लंबी सांस छोड़ी।
"हम्म्म्म्म..."
उसने अपने सीने पर हाथ रखा। धड़कनें अब जाकर काबू में आ रही थीं।
लेकिन घर का सन्नाटा उसे खाने को दौड़ रहा था।
उसे याद आया कि बाथरूम में उसके 'पापों की गठरी' (गीले कपड़े) पड़ी है।
कामिनी ने बाल्टी उठाई। उसमें उसकी वह ब्रा, ब्लाउज और गीली पैंटी थी, जिसमें उसकी उत्तेजना की गंध बसी थी।
वह भारी कदमों से सीढ़ियाँ चढ़ने लगी।
छत पर कपड़े सुखाने थे।
धूप तेज़ थी, लेकिन कामिनी का मन अंधेरे में था।
(क्रमशः)

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