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मेरी माँ कमीनी -14

मेरी माँ कामिनी, भाग -14


छत से कपड़े सुखाकर कामिनी नीचे आई।
घर में सन्नाटा था, लेकिन उसके दिमाग में शोर था।
रवि की फरमाइश—गाजर का हलवा—पूरी करनी थी। लेकिन घर में गाजर नहीं थी।
अब समस्या यह थी कि गाजर लाए कौन?
रवि और बंटी स्कूल जा चुके थे। रमेश ऑफिस में था।
बचा सिर्फ़ एक ही शख्स—रघु।
कामिनी की नज़र स्टोर रूम की तरफ गई।

उसका दिल ज़ोर से धड़का। कल रात की उस जंगली घटना के बाद, रघु का सामना करने की उसकी रत्ती भर भी हिम्मत नहीं थी।

'कैसे जाऊं उसके सामने? क्या सोच रहा होगा वो मेरे बारे में? कहीं उसे मेरा वहाँ होने का अहसास तो नहीं हो गया होगा?"
"नहीं... नहीं.... रघु तो नशे में धुत्त था। उसने उसे 'सुगना' बोला था। शायद उसे कुछ याद न हो। शायद उसे सपना लगा होगा"
कामिनी खुद को बचाने की दलील खुद को ही दे रही थी, वो किसी मझे हुए वकील की तरह, खुद का केस लड़ रही थी अपने अंतर्मन मे.
दुविधा मे फसा इंसान दलिले अच्छी देता है.

इस उम्मीद के सहारे कामिनी ने मुट्ठी भींची और स्टोर रूम की तरफ कदम बढ़ा दिए, 
स्टोर रूम का दरवाज़ा खुला था।
अंदर रघु काम में लगा हुआ था। वह पुराने बक्से हटा रहा था।
उसका बदन पसीने से भीगा हुआ था। वही सांवला, गठीला शरीर, वही पसीने की गंध... कामिनी के नथुनों में कल रात की याद ताज़ा हो गई।
कामिनी की आहट सुनकर रघु मुड़ा।
सामने अपनी 'मेमसाब' को देखकर उसने तुरंत काम छोड़ा और हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।
"नमस्ते मेमसाब..."

उसकी आवाज़ में वही पुराना सम्मान और डर था। उसकी आँखों में कोई शरारत या 'मालिक' वाला भाव नहीं था। वह अभी भी भ्रम में था कि कल रात जो हुआ, वह हकीकत थी या शराब का नशा।

रघु का यह रवैया देखकर कामिनी की जान में जान आई।
'शुक्र है... इसे कुछ याद नहीं है। यह सपना ही समझ रहा है,' कामिनी ने राहत की सांस ली।

"वो... वो रघु..." कामिनी ने नज़रें चुराते हुए कहा, "बाज़ार से कुछ सामान लाना था। गाजर लानी थी।"

रघु ने सिर हिलाया। "जी मेमसाब, ले आऊंगा। पैसे दे दीजिये।"
कामिनी ने पल्लू में बंधे नोट निकाले और रघु की तरफ बढ़ाए। हाथ बढ़ाते वक़्त उसकी उंगलियां कांप रही थीं, डर था कि कहीं रघु का हाथ छू न जाए।
औरत भी कमाल होती है, रात मे जिस आदमी का लंड चूसा था, उजाले मे उसी शख्श का हाथ तक ना छू जाये इसकी परवाह थी.

रघु ने पैसे लिए और पूछा, "कितनी लाऊं मेमसाब?"
"दो किलो ले आना... हलवा बनाना है," कामिनी ने कहा।
रघु ने गमछे से अपना पसीना पोंछा और एक व्यावहारिक सलाह दी, जो कामिनी के लिए किसी बम से कम नहीं थी।

"मेमसाब... गाजर एकदम मोटी और लम्बी वाली ही लाऊंगा। पतली वाली में वो बात नहीं होती।"
उसने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा,
"जितनी मोटी और लम्बी गाजर होती है... हलवे में उतना ही मज़ा आता है। अच्छे से घिस जाता है,"

रघु तो सिर्फ़ सब्जी की बात कर रहा था, लेकिन कामिनी का दिमाग कल रात के दृश्य पर चला गया।
मोटी... लम्बी... और मज़ेदार?
उसकी आँखों के सामने रघु का वह विशाल, काला लंड आ गया जो उसने कल रात अपने मुंह में भरा था।
उसकी सरसरी नजर ना जाने क्यों रघु के कमर के निचले हिस्से लार फिसल गई, 
वहाँ अभी भी मोटा सा कुछ लटका हुआ था।

कामिनी का चेहरा शर्म से लाल हो गया। उसके कान गर्म हो गए।
रघु की यह सीधी-सादी बात उसे अश्लील लग रही थी।
"ह... हाँ... देख लेना, अच्छी लाना," कामिनी हड़बड़ा कर बोली।
रघु ने एक और बात जोड़ दी।
"गाजर का हलवा तो मुझे भी बहुत पसंद है मेमसाब... गांव में खूब खाता था। गरम-गरम हलवा, ऊपर से मलाई डाल कर....उफ्फ्फ, क्या स्वाद होता है।"

कामिनी की हालत खराब हो गई।
'गरम हलवा... मलाई...'
उसे याद आया कि कल रात उसने रघु की 'मलाई' (वीर्य) का स्वाद चखा था।
उसे फिर से हल्की सी उबकाई महसूस हुई, लेकिन साथ ही पेट के निचले हिस्से में एक मीठी सी टीस भी उठी।

"ठीक है... जाओ अब जल्दी," कामिनी ने उसे वहां से भगाना ही बेहतर समझा।
रघु सिर झुकाकर वहां से निकल गया।

रघु के हाथ मे पुरे 200 rs थे,
रघु बाज़ार की तरफ पैदल चल दिया, 
रास्ते भर वह सोचता रहा।
'कल रात... वो सपना कितना सच लग रहा था। सुगना आई थी... उसने... उसने मेरा चूसा था। आह्ह्ह...'
रघु ने अपनी जांघों के बीच हाथ फेरा। वहां अभी भी हल्का दर्द था जो ज्यादा मुठ मारने या चूसने के बाद होता है।
वह कन्फ्यूज था।
तभी रास्ते मे उसे एक दुकान दिखी, उसकी फेवरेट दुकान...
"देसी शराब का ठेका "

उसने मुट्ठी मे बंद 200के नोट को देखा, फिर ठेके के अंदर कांच की सीसी मे बंद उसकी महबूबा को देखा.
"नहीं... नहीं... पहले गाजर ले लेता हूँ " रघु ने मन मे आते विचारों को एक पल मे झटक दिया.
उसने दो कदम बढ़ाये ही थे की...

"मेमसाब ने पैसे तो ज्यादा दिए हैं... एक 'पव्वा' तो आ ही जाएगा," रघु ने सोचा।
"बस एक ढक्कन मारूँगा... थकान मिटाने के लिए।" " रघु पलटा और मयखाने मे जा बैठा.
शराबी आदमी शराब से कभी जीत ही नहीं सकता, इतिहास गवाह है, बड़े बड़े राजा महराजा सब हार बैठे इस शराब के आगे, रघु क्या चीज हुआ भला.

****************

दोपहर के 2 बज गए थे।
कामिनी बार-बार घड़ी देख रही थी और स्टोर रूम की तरफ झांक रही थी।
रघु का कोई अता-पता नहीं था।
"नालायक कहीं का... पैसे लेकर भाग गया शायद। दारू पीने बैठ गया होगा," कामिनी ने गुस्से में बड़बड़ाया।

छोटे लोगो का यही है, पैसे मिले नहीं की सब काम भूल जाते है " कामिनी गुस्से मे भुंभुना रही थी.

तभी गेट खुलने की आवाज़ आई।
रवि और बंटी स्कूल से वापस आ गए थे।
"मम्मी, भूख लगी है," बंटी ने बैग सोफे पर पटकते हुए कहा।
लेकिन कामिनी की नज़र रवि पर थी।
रवि के हाथ में एक थैला था, जिसमें से ताज़ी, लाल गाजरें झांक रही थीं।
"आंटी..." रवि ने अपनी मनमोहक मुस्कान के साथ कहा, "आते वक़्त दिखा तो ले आया। मुझे याद था कि आज हलवा बनना है।"

कामिनी का गुस्सा पिघल गया।
जहाँ रघु, एक शराबी को उसने काम बोला था, वो नदारद था, वहीं रवि बिना कहे उसकी ज़रूरत पूरी कर रहा था।

"थैंक यू बेटा..." कामिनी ने थैला लिया।
******************

किचन का दृश्य (शाम 4 बजे):
उसी वक़्त रमेश का फोन आया।
"हेलो कामिनी... मैं आज रात घर नहीं आ पाऊंगा।"
"क्यों? क्या हुआ?" कामिनी ने पूछा।

"कुछ अर्जेंट काम है, साइट पर जाना पड़ रहा है... किशनगढ़," रमेश ने जल्दी में कहा और फोन काट दिया।
कामिनी ने फोन रखा और गाजर धोने लगी।
रवि किचन में आ गया। उसने कपड़े बदल लिए थे—एक स्लीवलेस टी-शर्ट और शॉर्ट्स पहने थे। उसका चिकना, गोरा बदन चमक रहा था।

"लाओ आंटी, मैं घिसवा देता हूँ," रवि ने कद्दूकस (Grater) उठा लिया।
वह गाजर घिसने लगा।

घिस... घिस... घिस...
"आंटी, गाजरें काफी अच्छी मिली हैं ना?" रवि ने गाजर को कसकर पकड़ते हुए कहा, "एकदम लंबी और मोटी। ऐसी गाजर घिसने में बड़ा मज़ा आता है, हाथ में ग्रिप (Grip) अच्छी बनती है।"
रवि की बात सीधी थी, लेकिन कामिनी की नज़रों में 'चोर' था।
'मोटी और लम्बी' सुनकर उसे सुबह रघु की बात और रवि का 'गुलाबी लंड' याद आ गया।
वह रवि से नज़रें नहीं मिला पा रही थी। उसका चेहरा लाल हो गया।

"ह... हाँ... अच्छी हैं," वह बस इतना ही बोल पाई।
"और सुबह के लिए sorry आंटी, मुझे दरवाजा अच्छे से बंद करना चाहिए था " रवि ने जैसे कामिनी को कर्रेंट छुवा दिया हो.
"कककम.... कोई बात नहीं,"
उसके चेहरे पे लाल मुस्कान तैर गई. हाथो मे मोटा गाजर लिए घिसे जा रही थी, 

हॉल में बैठा बंटी टीवी देख रहा था, लेकिन उसके कान खड़े थे।
जब कामिनी ने बताया कि— "पापा आज नहीं आएंगे, किशनगढ़ गए हैं"—तो बंटी का माथा ठनका।
'किशनगढ़?'
उसने यह नाम पहले भी सुना था। रघु के मुँह से, जब वो पहले दिन घर आया था, तब माँ से बातचीत मे उसने इस कस्बे का जिक्र किया था, और बचपन मे दादा जी के मुँह से भी ये नाम सुना था.

'पापा और रघु का कनेक्शन? रघु भी वहीं का है क्या?'
बंटी चुप रहा, लेकिन उसके दिमाग में शक का कीड़ा रेंगने लगा.

शाम के 6 बजते-बजते मौसम बदल गया।
काले बादल घिर आए और ठंडी हवा चलने लगी। बारिश की बूंदें टप-टप गिरने लगीं।
"अरे! कपड़े भीग जाएंगे," कामिनी हड़बड़ाई। उसे याद आया कि उसकी धुली हुई साड़ी, ब्रा और पैंटी छत पर है।
वह जाने ही वाली थी कि रवि ने उसे रोक दिया।
"आप रहने दो आंटी... आप हलवा देखो, मैं ले आता हूँ," रवि ने कहा और बिजली की रफ़्तार से सीढ़ियाँ चढ़ गया।
कामिनी उसे मना भी नहीं कर पाई।
उसका दिल धक-धक करने लगा। 'हे भगवान... मेरी पैंटी...'
दो मिनट बाद रवि नीचे आया।
वह थोड़ा भीग गया था। उसके हाथ में कपड़ों का एक ढेर था।
उसने सोफे पर साड़ी और ब्लाउज रखा।
लेकिन उसके हाथ में अभी भी दो छोटे कपड़े थे—कामिनी की सफ़ेद ब्रा और वह फिजी (Skin) कलर की पैंटी।
कामिनी का चेहरा शर्म से टमाटर हो गया।
रवि धीरे से कामिनी के पास आया।
उसने बिना किसी हिचकिचाहट के, बड़े आराम से वह पैंटी और ब्रा कामिनी की तरफ बढ़ाई।
कामिनी का हाथ कांप रहा था। उसने झपट्टा मारकर कपड़े लिए और अपनी साड़ी के पल्लू में छुपाने लगी।
वह घबरा रही थी, शर्म से गड़ी जा रही थी।
रवि ने उसकी घबराहट भांप ली।
उसने कामिनी की आँखों में झांकते हुए बहुत ही सामान्य लहजे में कहा—
"अरे, इसमें शर्माने वाली क्या बात है आंटी? अंडरगारमेंट्स ही तो हैं, सब पहनते हैं।"
उसकी आवाज़ में एक अपनापन था, एक तसल्ली थी कि 'यह कोई बड़ी बात नहीं है'।
रवि की इस बात ने कामिनी को थोड़ा सहज कर दिया।

उसे लगा कि यह लड़का कितना मैच्योर (Mature) है।
कामिनी के अंदर की 'शरारती औरत' जाग उठी। उसे सुबह का नज़ारा याद आ गया—रवि का नंगा बदन और वहां बालों का नामो-निशान न होना।
उसने अपनी शर्म को एक किनारे फेंका और रवि की आँखों में देखते हुए, एक हल्की सी मुस्कान के साथ ताना मारा—
"हाँ, सब पहनते हैं... पर तुम भी पहन लिया करो कभी-कभी। दरवाज़ा बंद करना भूल जाते हो।"
यह बोलकर कामिनी वहां रुकी नहीं, वह मुस्कुराती हुई अपने कमरे की तरफ भाग गई।

पीछे रवि खड़ा रह गया—हैरान और खुश।
उसे सिग्नल मिल गया था।
'आंटी ने सुबह सब कुछ देखा था... और उन्हें बुरा नहीं लगा।'
बाहर बारिश तेज़ हो गई थी, और घर के अंदर रोमांस की खिचड़ी पकने लगी थी।
*****************

रात के 8 बज रहे थे।
बाहर आसमान फट पड़ा था, मूसलाधार बारिश हो रही थी। बादलों की गड़गड़ाहट घर की खामोशी को चीर रही थी।
किचन में खाना तैयार था, गाजर के हलवे की मीठी महक हवा में थी।
सामने tv चल रहा था, 
लेकिन कामिनी का मन बेचैन था। वह डाइनिंग टेबल पर गुमसुम बैठी थी। उसकी नज़रें बार-बार बंद दरवाजे पर जा रही थीं।
'रघु कहाँ रह गया? इतनी तेज़ बारिश है... पैसे लेकर कहीं शराब पीने तो नहीं बैठ गया? या कोई हादसा तो नहीं हो गया?'
एक अजीब सी चिंता उसे खाए जा रही थी। आखिर रघु ही वो शख्श था, जिसने उसके जिस्म मे सालों बाद ये बेचैनी पैदा की थी,

कामिनी को इस तरह खोया हुआ देख, रवि ने चुप्पी तोड़ी।
"चल ना बंटी... बारिश में नहा के आते हैं, देख कितनी मस्त बारिश हो रही है," रवि ने खिड़की की तरफ इशारा करते हुए कहा।

बंटी कम्बल ओढे सोफे पर दुबका हुआ था। उसने मुंह बनाया।
"नहीं यार... बहुत ठंडा पानी है, मैं बीमार पड़ जाऊंगा। तू जा, मुझे नहीं नहाना।" बंटी ने साफ़ मना कर दिया।

रवि ने हार नहीं मानी। वह कामिनी की तरफ घूमा। उसकी आँखों में एक अलग ही चमक थी।
"आंटी... आप चलो ना। बहुत मज़ा आएगा।"
रवि के इस अचानक ऑफर से कामिनी सकपका गई। वह ख्यालों की दुनिया से धरातल पर लौटी।

"क... ककक... कौन मैं?" कामिनी ने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए कहा, "पागल हो गए हो क्या? मैं इस उम्र में बारिश में नहाउंगी?"

"तो और कौन आंटी?" रवि ने ज़िद्द की, "बारिश रोज़ थोड़ी न होती है। और उम्र का क्या है? कभी-कभी अपनी जवानी को जी लेना चाहिए। कब तक घर की चारदीवारी में कैद रहोगी?"

रवि एक ही सांस में बोल गया, लेकिन उसकी बातें कामिनी के दिल पर किसी हथौड़े की तरह लगीं।
यह एक आघात था।

'क्या मैं वाकई जीना भूल गई हूँ? मैंने आखिरी बार कब खुद के लिए कुछ किया था? कब बारिश की बूंदों को अपने चेहरे पर महसूस किया था?'

उसे याद आया, शादी से पहले अपने गांव में वह सावन की बारिश में सहेलियों के साथ घंटों नहाती थी। लेकिन इस घर में आकर, रमेश की मार और रसोड़े के धुएं ने उसकी सारी हसरतें कुचल दी थीं।
तभी बंटी ने भी रवि का साथ दिया।

"जाओ ना मम्मी... जी लो अपनी ज़िंदगी। वैसे भी आज पापा नहीं हैं घर पर, कोई रोकने-टोकने वाला नहीं है।"
बंटी ने अनजाने में ही कामिनी को सबसे बड़ी आज़ादी दे दी थी। वो अपनी माँ का दुख समझता था, बरसो से चारदीवारी मे कैद थी उसकी माँ.

बंटी का उत्साह देखकर कामिनी की झिझक टूट गई। उसके चेहरे पर एक दबी हुई मुस्कान आ गई।
"ठीक है..."
रवि तो जैसे पागल हो गया।
वह बहुत उत्साही लड़का था। उसने आव देखा न ताव, कामिनी का हाथ पकड़ लिया।

"चलो आंटी... देर मत करो..."
रवि लगभग कामिनी को घसीटता हुआ सीढ़ियों की तरफ ले गया।
कामिनी मुंह से "ना-ना" कर रही थी, लेकिन उसके पैर किसी जवान हिरणी की तरह थिरक रहे थे। वह रवि के पीछे-पीछे सीढ़ियाँ चढ़ गई। आज उसका यौवन लौट आया था।

छत पर पहुंचते ही ठंडे पानी की बौछार ने उनका स्वागत किया।
कामिनी एक पल के लिए ठिठकी, लेकिन रवि उसे खींचकर बीच छत पर ले गया।
छप-छप-छप... आउच.... कामिनी के जिस्म पर ठन्डे पानी की बौछार जैसे ही पड़ी, उसकी शर्म भी उतर गई.
"रवि पानी बहुत ठंडा है "

पानी ने कामिनी को ऊपर से नीचे तक भिगो दिया।
और फिर... एक चमत्कार हुआ।
कामिनी ने अपनी सारी शर्म, सारा दुख, सारी मर्यादा बारिश के पानी में बहा दी। वह गोल-गोल घूमने लगी। उसने अपने दोनों हाथ आकाश की तरफ फैला दिए और बारिश की बूंदों को अपने मुंह पर गिरने दिया।
वह किसी जवान मोरनी की तरह नाचने लगी।

रवि, जो उसके जीवन में किसी फ़रिश्ते की तरह आया था, एक कोने में खड़ा होकर बस उसे निहार रहा था।
कामिनी आज भूल गई थी कि वह 38 साल की एक माँ है। उसे लगा वह फिर से 18 साल की अल्हड़ लड़की बन गई है।

लेकिन रवि की नज़रें सिर्फ़ उसकी खुशी पर नहीं थीं... उसकी नज़रें कामिनी के भीगे हुए, कामुक जिस्म पर जम गई थीं।
बारिश के पानी ने कामिनी की सूती साड़ी को शरीर से बुरी तरह चिपका दिया था। वह कपड़ा अब खाल की तरह उसके बदन पर मढ़ा हुआ था।
ठंडे पानी के स्पर्श से कामिनी के भारी स्तन तन गए थे।
उसका ब्लाउज भीगकर पारदर्शी हो गया था, और उसके अंदर कैद उसके निप्पल एकदम कड़क होकर, ब्लाउज के कपड़े को चीरते हुए बाहर उभर आए थे। वे दो नुकीले पत्थरों की तरह रवि को चुनौती दे रहे थे।

कामिनी जब घूम रही थी, तो उसकी भारी छाती लय में ऊपर-नीचे हो रही थी।
पानी की धार उसकी साड़ी को भारी कर रही थी। साड़ी का कपड़ा उसकी जांघों के बीच फंस गया था।
इससे उसकी टांगों के बीच का वह गुप्त 'वी' (V) आकार—उसकी चूत का तिकोना उभार—साफ़ झलक रहा था। पानी की बूंदें उस उभार से फिसलकर नीचे गिर रही थीं।

पीछे से, उसकी चौड़ी और भारी गांड का आकार पूरी तरह से नुमाया हो रहा था। साड़ी उसके नितम्बों की दरार में धंस गई थी, जिससे उसके जिस्म के हर भूगोल का नक्शा रवि के सामने खुला था।

रवि किसी प्रेमी की तरह बस उस उछलती-खेलती कामिनी को देखे जा रहा था।
उसकी आँखों में हवस थी, लेकिन एक पूजा का भाव भी था।
कामिनी ने अकेले झूमता हुआ महसूस किया, वो अकेले ही उछले जा रही है, उसने सामने देखा  रवि एकटक उसे ही देखे जा रहा था.
उसने रवि की टकटकी को महसूस कर लिया।
आम तौर पर वह अपना पल्लू ठीक करती या शर्मा जाती।
लेकिन आज?
आज उसे अच्छा लग रहा था।
उसे अच्छा लग रहा था कि एक 20 साल का जवान, खूबसूरत लड़का उसे ऐसे देख रहा है जैसे वह दुनिया की सबसे सुंदर औरत हो।
"क्या हुआ आओ ना, देख क्या रहे हो?" 
उसने जानबूझकर अपनी कमर को और लचकाया, अपनी छाती को थोड़ा और आगे किया ताकि बारिश की बूंदें उसके कड़क निप्पलों पर गिरें।
इस बारिश में कामिनी सिर्फ़ भीग नहीं रही थी... वह जल रही थी।
उसका जिस्म चीख-चीख कर कह रहा था कि वह ज़िंदा है, एक औरत है, कामुक औरत जिसका जिस्म प्यासा है, उसकी भी कुछ इच्छा है, उसका भी एक जीवन है, जो पति की मार से परे है, इसे भी हक़ है ये जीवन जीने का.
उसकी आँखों मे खुशी के आंसू थे, और उसकी आँखों मे धुंधला सा दिखता रवि का जवान जिस्म.
जो उसे ही देख रहा था....
Contd....


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