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मेरी माँ कामिनी -20

मेरी माँ कामिनी -20


कामिनी के कदम सीढ़ियों पर भारी पड़ रहे थे। हर पायदान चढ़ते हुए उसका दिल कह रहा था— "वापस लौट जा कामिनी, यह रास्ता तबाही की ओर जाता है।" लेकिन उसका प्यासा जिस्म उसे ऊपर खींच रहा था। उसे रवि से बात करनी थी... नहीं, उसे रवि को 'महसूस' करना था।
काली शिफॉन की साड़ी हवा में सरसरा रही थी। उसके बिना ब्रा वाले स्तनों के निप्पल ठंडक और उत्तेजना से पत्थर की तरह कड़े हो चुके थे।
वह छत पर पहुंची। रात का सन्नाटा पसरा हुआ था। ठंडी हवा के थपेड़े कामिनी कर जिस्म को जला रहे थे, हवा मे गीली मिट्टी की महक थी। कामिनी का दिल धाड़ धाड़ कर बज रहा था.

कामिनी की नज़रें अंधेरे में रवि को तलाश रही थीं।
"रवि...?" उसने धीरे से पुकारा।
कोई जवाब नहीं मिला।
तभी... छत के कोने में बने उस छोटे कमरे (जहाँ शाम को रमेश और शमशेर पी रहे थे) से एक अजीब सी आवाज़ आई।
चप... चप... सुड़प... फच... फचम...
आवाज़ गीली थी, लिसलिसी थी। जैसे कोई दलदल में चल रहा हो, या कोई जानवर पानी पी रहा हो।
कामिनी ठिठक गई।

यह आवाज़ जानी-पहचानी थी। आज दिन मे उसने ये आवाज़ सुनी थी वो भी खुद के मुँह से ह, जब वह रघु का लंड चूस रही थी, तब ठीक ऐसी ही आवाज़ें गूंज रही थीं।

"ये... ये यहाँ कौन है?"
एक अनजाना डर और उससे भी बड़ी जिज्ञासा (Curiosity) उसे उस कमरे की ओर खींच ले गई।
कमरे की खिड़की का एक पल्ला हल्का सा खुला था और पर्दा हवा में उड़ रहा था। अंदर की पीली रोशनी बाहर छनकर आ रही थी।
कामिनी ने अपनी सांसें रोक लीं। वह दबे पांव खिड़की के पास गई और अंदर झांका।
और जो नज़ारा उसने देखा, उसने उसकी रूह को झकझोर कर रख दिया। उसके पैरों तले से ज़मीन खिसक गई।
कमरे के अंदर...
बिस्तर पर रमेश बेसुध पड़ा था। शराब के नशे में वह दुनिया-जहान से बेखबर होकर मुंह खोले सो रहा था।

लेकिन असली 'खेल' बिस्तर के नीचे फर्श पर चल रहा था।
शमशेर खड़ा था। उसकी खाकी वर्दी की पैंट घुटनों तक नीचे लटकी हुई थी और बेल्ट ज़मीन चाट रही थी।
उसकी टांगें चौड़ी थीं और उनके बीच से उसका विशाल, काला और नसों वाला खूंखार लंड किसी मुगदर की तरह तना हुआ था।
और उस लंड के सामने...
सुनयना—रवि की वो 'हाई-फाई', मॉडर्न और अमीर माँ—ज़मीन पर उकड़ू (Squatting) बैठी थी।
उसकी लाल जालीदार साड़ी पूरी तरह से अस्त-व्यस्त थी। उसका पल्लू गिरकर फ़र्श पर पड़ा था, जिससे उसके भारी-भरकम, गोरे और विशाल स्तन पूरी तरह से आज़ाद होकर लटक रहे थे।
वह किसी भूखी कुतिया की तरह शमशेर के लंड पर टूटी हुई थी।
"स्लर्रर्ररप.... गप... गप.... चप... चप..."
सुनयना के दोनों हाथ शमशेर की जांघों पर थे। उसने अपना मुंह पूरा खोल रखा था और शमशेर के उस मोटे मुसल्ल को जड़ तक निगल रही थी।
कामिनी की आँखें फटी की फटी रह गईं।

यह वही औरत थी जो शाम को 'मैनर्स' और 'स्टेटस' की बातें कर रही थी?
यह वही औरत थी जिसके सामने कामिनी खुद को 'गंवार' और 'छोटा' महसूस कर रही थी?
आज वह औरत एक पुलिसवाले के लंड के सामने अपने घुटने टेककर, अपनी इज़्ज़त का जनाज़ा निकाल रही थी।
कामिनी ने देखा कि सुनयना की तकनीक (Technique) कितनी सधी हुई थी। एक लय मे इत्मीनान से शमशेर के बड़े भरी लंड को पूरा मुँह मे के कर बहार उगल दे रही थी, 
वह कामिनी की तरह अनाड़ी नहीं थी।

सुनयना अपनी जीभ को शमशेर के लंड के सुपारी पर लट्टू की तरह घुमा रही थी। उसके गाल पिचक गए थे। वह इतनी शिद्दत से चूस रही थी कि शमशेर का पूरा लंड उसकी लार से चमक रहा था। cum-deep-in-her-throat-001
"आह्ह्ह... साली कुत्तिया... क्या चूसती है..." शमशेर ऊपर से गुर्रा रहा था।
वह अपने भारी हाथ से सुनयना के सिर को पकड़कर उसे अपने लंड पर ठूंस रहा था।

"ले... पूरा ले अंदर... गले तक उतार ले..."
सुनयना की आँखों से पानी बह रहा था (गैग रिफ्लेक्स की वजह से), उसका काजल फ़ैल गया था, लेकिन वह रुकी नहीं।
उसने अपनी गर्दन ऊपर उठाकर शमशेर को देखा। 20211009-204636 उसकी आँखों में एक अजीब सी 'हवस' और 'समर्पण' था।
उसने अपना मुंह लंड से हटाया।
"पॉप..." एक गीली आवाज़ आई। लंड और होंठों के बीच लार का एक लंबा तार खिंच गया।
सुनयना ने अपनी जीभ से उस लार को चाटा और शमशेर की तरफ एक कामुक मुस्कान फेंकी।

"कैसा लग रहा है शमशेर जी? मेरी 'सेवा' पसंद आ रही है?" सुनयना ने अपनी खनकती, वेश्याओं वाली अदा में पूछा।
"साली... तुझे देख के कौन कह सकता है तु बड़े अधिकारी की बीवी है, ऐसा तो आज तक किसी रंडी ने भी नहीं चूसा मेरा आअह्ह्ह... इस्स्स. स...."

 शमशेर ने उसके लटकते हुए विशाल स्तनों को एक हाथ से कसकर दबोच लिया।
"आह्ह्ह... धीरे... दबा के मार दोगे क्या?" सुनयना मचल गई, लेकिन उसने शमशेर का हाथ नहीं हटाया।

"तुम्हारे जैसा मर्द मिले तो रंडी बनने में क्या बुराई है?" सुनयना ने बेशर्मी से कहा और दोबारा उस काले लंड को अपने मुंह में भर लिया।

"ग्लक... ग्लक... ग्लक..."
खिड़की के बाहर खड़ी कामिनी का जिस्म थर-थर कांप रहा था।
उसका गला सूख गया था, लेकिन उसकी जांघों के बीच बाढ़ आ गई थी।
यह नज़ारा उसके लिए सिर्फ़ 'शॉकिंग' नहीं था, यह उसके लिए एक 'परमिशन' (अनुमति) जैसा था।
कामिनी का अंतर्मन, जो अब तक उसे 'पापी' और 'गिरा हुआ' महसूस करा रहा था, अचानक शांत हो गया।

लेकिन कहीं ना कहीं ईर्ष्या की भावना भी पनपने लगी, ना जाने क्यों? कामिनी को महसूस हो था था जैसे शमशेर पर उसका हक़ है लेकिन सुनयना पहले बाजी मार गई.
औरत भी अजीब होती है, अभी जिस आदमी से भाग रही थी, अब उसे दूसरे के साथ देख जलन भी महसूस हो रही है.

कामिनी की नज़रें सुनयना के नंगे, लटकते हुए स्तनों पर थीं, जो उसके चूसने की रफ़्तार के साथ हिल रहे थे।
फिर उसकी नज़र अपने पति रमेश पर गई, जो पास ही बिस्तर पर मरे हुए जानवर की तरह पड़ा था।
कामिनी के अंदर नफरत और हवस का एक ज्वालामूखी फट पड़ा।
'सब नंगे हैं यहाँ... सब हवसी हैं। सिर्फ़ मैं ही क्यों मर्यादा की बेड़ियाँ पहनकर मरूँ?'
उसकी काली साड़ी के नीचे, उसकी चूत फड़फड़ाने लगी।
सुनयना को लंड चूसते देख, कामिनी को अपने मुंह में रघु के लंड का वह कसैला स्वाद फिर से याद आ गया।
उसका हाथ अनजाने में अपनी साड़ी के ऊपर से ही अपनी चूत पर चला गया।
वह खिड़की की ग्रिल को दूसरे हाथ से कसकर पकड़े हुए, सुनयना का वो 'नंगा नाच' देखती रही और अपनी चूत को मसलती रही।
'हाँ... चूस साली... और जोर से चूस...' कामिनी मन ही मन सुनयना को बढ़ावा दे रही थी।
उसे लग रहा था कि सुनयना नहीं, वह खुद वहां बैठी है।
कामिनी भूल गई थी वो यहाँ क्या करने आई है? क्यों आई है?
वो जैसे अंदर चलते खूबसूरत नज़ारे मे खो गई थी, कामवासना ने उसे अपने आगोश मे जकड लिया था, उसकी उंगलियां अपनी जांघो के बीच कुछ टटोल रही थी.

तभी...
ईईस्स्स...... आअह्ह्ह..... एक कड़क मजबूत हाथ आ कर उसके कूल्हे पर जा चिपके. कामिनी के मुँह से आह निकली जैसे किसी गर्म तवे पर ठंडा पानी पड़ा हो.
कामिनी बुरी तरह चोंकि 

"अंदर क्या देख रही हो आंटी?"
पीछे से एक गर्म सांस उसके कान से टकराई।
कामिनी का दिल उछलकर हलक में आ गया। वह चीखने ही वाली थी कि एक मजबूत हाथ ने उसका मुंह कसकर दबा दिया।
कामिनी की पीठ एक सख्त, चौड़ी छाती से जा टकराई।
उसे पीछे मुड़ने की ज़रूरत नहीं थी। वह उस खुशबू को पहचानती थी। वह उस स्पर्श को जानती थी।
रवि।
रवि उसके ठीक पीछे खड़ा था। वह भी खिड़की से अंदर अपनी माँ का 'कांड' देख रहा था।
और अब... वह कामिनी के साथ खड़ा था।
एक हाथ कामिनी के मुंह पर, और दूसरा हाथ... कामिनी की काली शिफॉन साड़ी के ऊपर से उसकी पेट और नाभि को टटोल रहा था।
********************

छत पर रात का अंधेरा और गहरा हो गया था, लेकिन उस अंधेरे कोने में जो उजाला हो रहा था, वह कामिनी की बरसों से बंद पड़ी आँखों को खोल रहा था।
कामिनी रवि की बाहों में जकड़ी हुई थी।

 उसका शरीर उत्तेजना से तप रहा था, लेकिन उसकी आँखों में अभी भी एक सवाल था, एक गहरा आश्चर्य। वह खिड़की से अंदर देख रही थी जहाँ सुनयना—रवि की अपनी सगी माँ—एक पराये मर्द के लंड को चूस रही थी। और रवि? वह उसके पीछे खड़ा होकर बड़े इत्मीनान से यह सब देख रहा था, जैसे कोई फिल्म चल रही हो।

कामिनी का मन द्वंद्व में फंसा था। 'कैसा बेटा है ये? अपनी माँ को ऐसे देख रहा है और इसे शर्म नहीं आ रही?' वह कुछ बोलना चाहती थी, पूछना चाहती थी, लेकिन रवि ने उसके मन की उथल-पुथल को बिन बोले ही पढ़ लिया।
उसने अपने होंठ कामिनी के कान से सटा दिए और बहुत ही धीमी, मखमली आवाज़ में फुसफुसाया—
"हैरान मत होइये आंटी... मेरी माँ सिर्फ 'माँ' नहीं है, वह एक औरत भी है। एक जिन्दा, हाड़-मांस की औरत।"
कामिनी के रोंगटे खड़े हो गए।

 रवि के शब्द उसके संस्कारों की बेड़ियों पर हथौड़े की तरह बज रहे थे।
रवि ने अपनी बात जारी रखी, "मेरे पापा ने हमें सब दिया—दौलत, शोहरत, बड़ा घर, समाज में इज़्ज़त। लेकिन वो भूल गए कि एक औरत के जिस्म की भी अपनी भूख होती है। एक ऐसी ज़रूरत जिसे नोटों की गड्डियों से नहीं भरा जा सकता। मेरे पापा काम में इतना व्यस्त रहे कि माँ की रातों को ठंडा छोड़ दिया।"q
उसने कामिनी की कमर को कसकर भींचा।

"तो क्या करती मेरी माँ? घुट-घुट कर मर जाती? या अपनी जवानी को सूखने देती? नहीं आंटी... अपनी इच्छा पूरी करना कोई पाप नहीं है। यह तो कुदरत की मांग है। मैं बेटा हूँ, लेकिन मैं एक मर्द भी हूँ। मैं समझता हूँ कि जब एक औरत के शरीर मे आग लगी हो, तो उसे पानी से नहीं बुझाया जा सकता।"

रवि का यह 'काम-ज्ञान' कामिनी के कानों में पिघले हुए शहद की तरह उतर रहा था। उसके दिल का बोझ, जो 'पाप' के नाम पर बरसों से जमा था, पिघलने लगा।

उसके दिमाग़ विचारों का तूफान कोंधने लगा,— 'रमेश ने मुझे क्या दिया? सिर्फ़ रसोड़े का धुआं और बिस्तर पर अपमान। मार-पीट और गालियां। अगर सुनयना अपने हक़ के लिए बाहर जा सकती है, तो मैं क्यों घुट रही हूँ?"

रवि ने कामिनी के कान की लौ को अपने दांतों से हल्का सा काटा।
"देखिये आंटी... देखिये मेरी माँ को। कितना खुलकर जी रही है वो। वो शमशेर अंकल का लंड नहीं चूस रही, वो अपनी ज़िंदगी का रस पी रही है। क्या आपमें इतनी हिम्मत नहीं है? क्या आप अपनी खुशियों का गला घोंटती रहेंगी?"

रवि के इन शब्दों ने कामिनी को ललकार दिया,  उसकी छाती धौंकनी की तरह चलने लगी।
अंदर कमरे में दृश्य बदल रहा था।
सुनयना ने अपना मुंह शमशेर के लंड से हटाया। उसका चेहरा लाल था, आँखें चढ़ी हुई थीं।

"आह्ह्ह... शमशेर जी... अब रहा नहीं जाता," सुनयना ने मचलते हुए कहा, "जल्दी कीजिये... टाइम कम है, कोई आ जाएगा।"
उसने तुरंत अपनी साड़ी को ऊपर समेटा और बिस्तर के किनारे को पकड़कर झुक गई।
उसने अपनी भारी-भरकम, गोरी और विशाल गांड को शमशेर की तरफ कर दिया।
 उसकी कमर में इतना गहरा लचक (Arch) था कि उसकी गांड के दोनों पट्टे किसी पहाड़ की तरह अलग-अलग और तने हुए दिख रहे थे।
शमशेर, जो अब तक खड़ा था, जानवर की तरह गुर्राया।
"साली घोड़ी बन गई... रुक आज तेरी गर्मी निकालता हूँ।"
शमशेर ने अपनी पैंट को पूरी तरह उतार फेंका। बड़े ही तसल्ली बक्श तरीके से सुनयना की गोरी बड़ी गांड पर प्यार से हाथ फेरा, जैसे कोई कसाई बकरी काटने से पहले प्यार कर रहा हो,.
आअह्ह्ह.... शमशेर जी.... सुनयना सिसक उठी, उसे अब अपनी चुत मे लंड चाहिए थे, उसने एक बार अपनी गांड को हिला स्वकृति दे दी.

शमशेर ने थूक लगाकर अपना काला मुसल्ल गीला किया और निशाना साधा।
31037 पच... फच...
एक ही झटके में शमशेर ने अपना विशाल लंड सुनयना की चूत की गहराई में उतार दिया।
"आआईईईईईई............ माँअअअअ...." सुनयना ने तकिये में मुंह देकर चीख दबा ली।
शमशेर ने रहम नहीं किया। वह मशीन की तरह धक्के मारने लगा।
धप... धप... धप...
हर धक्के के साथ सुनयना की भारी गांड और उसके लटकते हुए विशाल स्तन जेली की तरह हिल रहे थे। शमशेर उसके जिस्म को मसल रहा था, उसके नितम्बों पर चांटे मार रहा था। सुनयना दर्द और मज़े में पागल होकर "और ज़ोर से... और ज़ोर से..." की रट लगाए हुए थी। m-ldpwiqacxt-E-Ai-mh-FKo2sd-Vy7p-TKKe21-27914542b

बाहर खड़ी कामिनी की हालत पतली हो गई थी।
उसकी चूत से काम-रस की ऐसी बाढ़ आई थी कि उसकी जांघों पर चिपचिपाहट महसूस हो रही थी।
रवि समझ गया कि लोहा गरम है। अब हथौड़ा मारने का वक्त आ गया था।
रवि के हाथ, जो अब तक कामिनी के पेट पर थे, नीचे फिसलते हुए उसकी साड़ी के पल्लू तक पहुंचे।
उसने धीरे-धीरे कामिनी की काली शिफॉन साड़ी को ऊपर उठाना शुरू किया।
कामिनी ने कोई विरोध नहीं किया। वह खिड़की की ग्रिल को कसकर पकड़े हुए अंदर सुनयना की चुत मे फिसलते मोटे लंड को' देख रही थी, और रवि उसे बाहर नंगा कर रहा था।
रवि ने साड़ी और पेटीकोट को एक साथ समेटकर ऊपर किया। 20210921-142004
पहले कामिनी की सुडौल पिंडलियां नंगी हुईं, फिर उसकी मलाईदार जांघें, और अंत में... उसकी पूरी गांड हवा में आज़ाद हो गई।

रवि ने कपड़े को उसकी कमर तक समेट दिया।
कामिनी खिड़की पर झुकी हुई थी, जिससे उसकी पीठ में एक गहरा मोड़ आ गया था और उसकी भारी, चिकनी गांड पूरी तरह बाहर को निकल आई थी।
रात की ठंडी हवा का एक झोंका आया और सीधे कामिनी की नंगी, गरम गांड से टकराया।
"सीईईईई....." कामिनी सिहर उठी।
उसके बदन के रोएं खड़े हो गए। एक अजीब सी आज़ादी का अहसास हुआ—भीगी चूत, खुली गांड और ठंडी हवा।
रवि की नज़रें उस नज़ारे पर जम गईं।
कामिनी की गांड... दो बड़े, गोल और एकदम चिकने मटके जैसी थी। उस पर एक भी दाग नहीं था। गोरी, बेदाग और मांसल। images-2-1
रवि ने अपना हाथ बढ़ाया।
उसने अपनी उंगलियों को कामिनी की चूत की दरार में डाला।
वहाँ बाढ़ आई हुई थी।
"उफ्फ्फ आंटी... आप तो पूरा तालाब बहा रही हैं," रवि ने कामिनी के कान के पास फुसफुसाया।
उसने अपनी बीच की उंगली को कामिनी की गीली फांकों में फिसला दिया।
पच...
"आह्ह्ह.... र-रवि...." कामिनी की गर्दन पीछे मुड़ गई।
रवि की उंगली अंदर-बाहर होने लगी। वह बहुत प्यार से, बहुत कोमलता से कर रहा था।
रघु की तरह खुरदरापन नहीं था, शमशेर की तरह वहशियत नहीं थी। रवि का स्पर्श मखमल जैसा था।
वह अपनी उंगली से कामिनी के 'दाने' (Clitoris) को गोल-गोल सहला रहा था।

कामिनी को लगा जैसे वह हवा में उड़ रही है।
तभी रवि ने अपना हाथ हटाया।
कामिनी को लगा शायद वह रुक गया। लेकिन अगले ही पल, उसे अपनी गांड पर कुछ गीला और गरम महसूस हुआ।
रवि उसके पीछे घुटनों के बल बैठ गया था।
रवि ने कामिनी की दोनों जांघों को पकड़कर थोड़ा और चौड़ा कर दिया। अब कामिनी की रसीली चूत और उसकी गांड का तंग छेद रवि के चेहरे के ठीक सामने था।
रवि ने एक गहरी सांस ली, कामिनी की खुशबू को अपने अंदर भरा, और फिर...
उसने अपना मुंह कामिनी की चूत में गाड़ दिया।
स्लर्रर्रप....
"हायययययय राम..... उफ्फ्फ्फ...." कामिनी के मुंह से एक मदहोश कर देने वाली आह निकली। My big ass girlfriend bends over for ass and pussy lick 2
रवि की जीभ किसी कलाकार की तरह चल रही थी।
उसने पहले कामिनी की चूत के बाहरी होठों को चाटा, सारा रस पिया। फिर उसने अपनी जीभ को नुकीला करके योनि के अंदर डाल दिया।
वह अंदर की दीवारों को चाट रहा था, रस को चूस रहा था।
कामिनी की टांगें कांपने लगीं। उसे खिड़की की ग्रिल का सहारा लेना पड़ा वरना वह गिर जाती।
अंदर शमशेर "धप-धप" करके सुनयना को चोद रहा था, और बाहर रवि "चप-चप" करके कामिनी को चाट रहा था।
रवि ने अपना खेल बदला।
उसकी जीभ नीचे फिसली... चूत से होती हुई, पेरिनयम (Perineum) को पार करती हुई... सीधे कामिनी की गांड के छेद (Anus) पर।
जब रवि की गरम जीभ ने कामिनी के उस 'वर्जित' छेद को छुआ, तो कामिनी को लगा जैसे उसकी रीढ़ की हड्डी में बिजली दौड़ गई हो। asshole-licking-gifs
"नहीं... रवि... वहां नहीं... गंदा है..." कामिनी ने कमजोर विरोध किया।
लेकिन रवि नहीं रुका।
उसने अपने दोनों हाथों से कामिनी की गांड के पट्टों को फैला दिया (Spread) और अपनी जीभ को उस तंग, गुलाबी छेद पर घुमाना शुरू कर दिया (Rimming)।
लप... लप... लपाक...
रवि कामिनी की गांड को ऐसे चाट रहा था जैसे वह दुनिया की सबसे स्वादिष्ट आइसक्रीम हो।
वह अपनी जीभ की नोक से गांड के छेद को कुरेद रहा था।
कामिनी के लिए यह सुख असहनीय था। उसने आज तक अपनी गांड को सिर्फ शौच के लिए इस्तेमाल किया था। उसे पता ही नहीं था कि वहां भी इतना सुख छुपा हो सकता है।
"आह्ह्ह.... र-रवि.... मार डालोगे.... उफ्फ्फ.... कितना प्यार करते हो.... आह्ह्ह..."
कामिनी का सिर हवा में झूल रहा था।
इस चाटने में एक अजीब सा प्यार और कोमलता थी।

रवि कोई जानवर नहीं था। वह एक पुजारी की तरह कामिनी के जिस्म की पूजा कर रहा था।
वह कभी उसकी गांड के छेद को चूमता, कभी उसकी चूत के दाने को चूसता।
कामिनी को लग रहा था जैसे वह बादलों पर है।
ठंडी हवा उसकी नंगी कमर और गांड पर लग रही थी, और नीचे रवि का गरम मुंह आग लगा रहा था।

अंदर शमशेर की "आह्ह्ह" और सुनयना की "उईईई माँ" की आवाज़ें आ रही थीं।
बाहर रवि की "सुड़प-सुड़प" और कामिनी की "सिसकियाँ"।
कामिनी अब पूरी तरह से रवि के वश में थी।
उसका दिमाग, उसके संस्कार, उसकी शर्म—सब उस छत पर हवा में विलीन हो चुके थे।
उसे सिर्फ़ एक चीज़ महसूस हो रही थी—रवि की जीभ और अपनी आज़ादी।
"हाँ रवि... और अंदर... मेरी जान... चाट ले मुझे... मैं तेरी हूँ... आअह्ह्ह..."
कामिनी अपनी गांड को पीछे धकेल रही थी, रवि के मुंह पर रगड़ रही थी।
वह भूल गई थी कि वह छत पर है, भूल गई थी कि अंदर उसका पति है।
आज वह सिर्फ़ एक औरत थी—तृप्त, कामुक और आज़ाद।
उसका रस बहकर रवि की ठुड्डी पर गिर रहा था, और रवि उसे अमृत समझकर पी रहा था।

हवा में काम-रस, पसीने और हवस की गंध घुली हुई थी।

रवि कामिनी के पीछे घुटनों के बल बैठा था, और उसका चेहरा कामिनी की टांगों के बीच पूरी तरह धंसा हुआ था।
"सुड़प... सुड़प... चप... चप..."
रवि की जीभ किसी भूखे बछड़े की तरह कामिनी की चूत को पी रही थी। वह सिर्फ़ चाट नहीं रहा था, बल्कि अपनी जीभ को फावड़े की तरह इस्तेमाल कर रहा था, कामिनी की चूत की गहराई से रस निकाल रहा था।
उसने अपने दोनों हाथों से कामिनी की भारी गांड के पट्टों को पकड़कर चौड़ा कर रखा था, ताकि उसकी चूत का गुलाबी, सूजा हुआ दाना (Clitoris) पूरी तरह उभर कर सामने आ जाए।
रवि ने अपने होंठों को उस 'दाने' के चारों तरफ कस लिया। उसने वैक्यूम बनाया और...
"सुउउउड़प.... !!"
उसने उस संवेदनशील दाने को अपने मुंह में भरकर जोर से चूस लिया।
"आह्ह्ह्ह्ह्ह....... र-रवि.... उउउउफ्फ्फ..... नोच ले.... खा जा मुझे.... आह्ह्ह...."
कामिनी का सिर पीछे की तरफ झूल गया। उसकी आँखों की पुतलियाँ पलट गईं।
रवि की जीभ उस दाने पर बिजली के झटके दे रही थी।
कामिनी के हाथ अब ग्रिल पर नहीं थे। वे अपने ही जिस्म पर रेंग रहे थे।
उसने अपने दोनों हाथों से अपने भारी, लटकते हुए स्तनों को साड़ी के ऊपर से ही दबोच लिया।
वह पागलों की तरह अपने स्तनों को मसल रही थी, भींच रही थी। अपनी उंगलियों को ब्लाउज के अंदर घुसाकर अपने तने हुए, कड़क निप्पलों को मरोड़ रही थी।

उसे दर्द चाहिए था। उसे वो वहशियत चाहिए थी जो अंदर चल रही थी।
खिड़की के उस पार, सुनयना की हालत और भी खराब थी।
शमशेर उस पर पूरी तरह हावी हो चुका था। वह सुनयना के पीछे खड़ा था और सुनयना बिस्तर के किनारे पर झुकी हुई थी।
"धप... धप... धप... फच... फचम..."
शमशेर का विशाल काला लंड किसी पिस्टन की तरह सुनयना की गीली चूत में अंदर-बाहर हो रहा था।
वह रहम नहीं कर रहा था। वह पूरी ताकत से जड़ तक ठूस रहा था।
बिस्तर "चर्रर्र... चर्रर्र..." करके चीख रहा था।
हर धक्के के साथ शमशेर के भारी, लटकते हुए टट्टे (Balls) सुनयना की गोरी, थुलथुली गांड और जांघों से टकरा रहे थे।
"थप... थप... थप..."
मांस से मांस के टकराने की आवाज़ें गूंज रही थीं।
सुनयना का बाल शमशेर की मुट्ठी में था। वह उसका सिर पीछे खींच रहा था।
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"आअह्ह्ह... शमशेर जी... फाड़ दो.... उफ्फ्फ.... मेरी चूत फाड़ दो.... आअह्ह्ह...." सुनयना मज़े और दर्द में चीख रही थी। वह अपनी गांड को खुद पीछे धकेल रही थी (Pushing back) ताकि लंड और गहराई तक जाए। gifcandy-20

बाहर खड़ी कामिनी यह सब देख रही थी।
रवि की कोमल जीभ उसे स्वर्ग का सुख दे रही थी, लेकिन उसकी आँखों में 'नर्क' की आग थी।
उसे सुनयना से भयानक जलन हो रही थी।
'साली कुत्तिया... कैसे मज़े ले रही है। कैसे उसका पति वही बिस्तर पर खर्राटे भर रहा है, और शमशेर उसे जानवरों की तरह चोद रहा है।'

कामिनी को रवि का प्यार कम लग रहा था। उसे शमशेर जैसी वहशियत चाहिए थी।
उसका मन कर रहा था कि कोई उसे भी ऐसे ही बालों से पकड़े, उसे भी ऐसे ही घोड़ी बनाए और उसकी चूत को फाड़कर रख दे।
"रवि... और जोर से... मुझे चूस .... चाट अंदर तक जोर से चाट ." कामिनी फुसफुसा रही थी, अपने स्तनों को नोचते हुए।

अंदर शमशेर की रफ़्तार अब तूफानी हो गई थी।
"फच-फच-फच-फच..."
सुनयना का जिस्म कांपने लगा। उसके पैर मुड़ गए।
"आअह्ह्ह.... मैं गई.... शमशेर जी.... निकालो मत. और जोर से अंदर और अंदर.. आअह्ह्ह....... मैं गई.... आआआआईईईईईई.... माँअअअअअ...."
सुनयना की एक लंबी, तीखी चीख निकली। उसका शरीर अकड़ गया। वह बुरी तरह से झड़ रही थी।
उस चीख ने बाहर बारूद में चिंगारी का काम किया।
जैसे ही रवि ने अपनी माँ की वह कामुक चीख सुनी, उसका संयम टूट गया।
उसने अपना मुंह कामिनी की चूत पर लगाए रखा और अपने दाहिने हाथ की दो उंगलियाँ (Middle & Ring finger) कामिनी की योनि के मुहाने पर जमाईं।
और एक ही झटके में...
पच...
उसने दोनों उंगलियाँ कामिनी की गीली, फड़फड़ाती चूत में जड़ तक घुसा दीं और उन्हें अंदर टेढ़ा करके (Hook motion) तेज़ी से चलाने लगा।
जीभ की चाट और उंगलियों का वो गहरा घर्षण... कामिनी बर्दाश्त नहीं कर पाई।
"आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह.......... !!"
कामिनी की रीढ़ की हड्डी में विस्फोट हुआ।
उसकी चूत के अंदर की मांसपेशियों ने रवि की उंगलियों को जकड़ लिया।
उसका पेट अंदर की तरफ पिचक गया।
और फिर...
सर्रर्रर्रर्र............ पिच.... पिच....
कामिनी की चूत से काम-रस का एक फव्वारा (Squirt) छूट पड़ा।
वह इतना तेज़ था कि उसने रवि के पूरे चेहरे को नहला दिया।
रवि की आँखें, नाक, गाल... सब कामिनी के उस गरम, नमकीन पानी से भीग गए।
रवि ने मुंह नहीं हटाया। वह उस बाढ़ को पीता रहा, चाटता रहा।

उसी पल, अंदर शमशेर भी अपनी हद पार कर गया। cum-shot-on-back-and-ass-001
सुनयना के झड़ने के साथ ही शमशेर ने अपना लंड बाहर खींचा।
वहशीपन में उसने अपना लंड सुनयना की नंगी, कांपती हुई गांड के ऊपर हिलाया।
पिच... पिच...
गाढ़ा, सफ़ेद वीर्य सुनयना के कूल्हों पर, उसकी पीठ पर और बिस्तर की चादर पर गिरने लगा। images-4
शमशेर "हम्म्म्म्म.... आह्ह्ह..." करके गुर्राया और वहीं सुनयना के पास ढह गया।

सब कुछ शांत हो गया।
बाहर कामिनी की हालत पतली हो चुकी थी।
उस भयानक ऑर्गेज्म (Orgasm) ने उसके पैरों की जान निकाल ली थी।
उसकी जांघें कांपना बंद नहीं कर रही थीं। घुटने मुड़ गए।
वह खुद को संभाल नहीं पाई।
धड़ाम...
वह वहीं छत के गीले फर्श पर, रवि के बगल में गिर पड़ी।
उसकी साड़ी कमर तक उठी हुई थी। उसकी नंगी, गीली चूत आसमान की तरफ खुली थी, जिससे अभी भी रस की आखिरी बूंदें टपक रही थीं।
वह बेसुध होकर आसमान को घूर रही थी। छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी।

मुंह से सिर्फ़ "हंफ... हंफ..." की आवाज़ आ रही थी।
रवि, जिसका चेहरा कामिनी के पानी से भीगा हुआ था, उसके बगल में बैठा हांफ रहा था। उसने अपनी जीभ से अपने होंठों पर लगा कामिनी का रस चाटा और एक विजयी मुस्कान दी।
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छत के उस तूफ़ान के बाद, कामिनी और रवि एक-दूसरे से नज़रें चुराते हुए, कपड़े ठीक करते हुए नीचे हॉल में आ गए। कामिनी ने जल्दी से बाथरूम में जाकर अपना चेहरा धोया और बालों को ठीक किया, ताकि कोई शक न कर सके।
दीवार घड़ी पर 11 बज रहे थे।
हॉल में सन्नाटा था, लेकिन कामिनी के अंदर शोर मचा हुआ था। वह अभी भी अपनी जांघों के बीच रवि की उंगलियों और जीभ का स्पर्श महसूस कर रही थी।
थोड़ी ही देर बाद सीढ़ियों पर आहट हुई।
सुनयना नीचे उतर रही थी।
उसकी चाल बदल चुकी थी। जो औरत शाम को किसी नर्तकी की तरह इठलाती हुई आई थी, अब वह सीढ़ियों की रेलिंग पकड़कर, पैर फैलाकर (waddling) धीरे-धीरे उतर रही थी।
उसके चलने का ढंग बता रहा था कि उसकी दोनों टांगों के बीच 'कुछ' बहुत भारी गुज़रा है। उसकी गांड के दोनों पट्टों में शायद अभी भी शमशेर के धक्कों का दर्द और वो मीठी टीस बाकी थी।

लेकिन उसका चेहरा?
चेहरा ऐसा खिला हुआ था जैसे अमावस की रात में पूनम का चाँद निकल आया हो। उसके गालों पर एक प्राकृतिक लाली थी, बाल थोड़े बिखरे थे जिन्हें उसने समेटने की कोशिश की थी, और होंठ थोड़े सूजे हुए लग रहे थे (शमशेर के लंड को चूसने की वजह से)।

उसकी आँखों में एक गहरी संतुष्टि (Satisfaction) थी। कोई माई का लाल उसे देखकर यह नहीं कह सकता था कि यह औरत अभी ऊपर एक पुलिसवाले के नीचे 'घोड़ी' बनकर और उसका लंड चूसकर आ रही है। यह एक 'तृप्त औरत' का नूर था।

सुनयना नीचे आई और अपना पर्स उठाया।
"अच्छा कामिनी जी... रात बहुत हो गई है। अब हमें चलना चाहिए," सुनयना ने अपनी उसी खनकती, लेकिन अब थोड़ी भारी और कामुक आवाज़ में कहा।

उसने ऊपर की तरफ एक नज़र डाली (जहाँ शमशेर और रमेश थे) और एक रहस्यमयी मुस्कान दी।
"आप और रमेश जी आना कभी हमारे घर... वैसे आज का 'खाना' (डिनर) बहुत अच्छा था। मज़ा आ गया।"
सुनयना ने 'खाना' शब्द पर इतना जोर दिया और अपनी जीभ को होंठों पर ऐसे फेरा कि कामिनी सब समझ गई। वह खाने की नहीं, शमशेर के 'लंड' की तारीफ कर रही थी।

"थैंक यू सुनयना जी... ज़रूर आएंगे," कामिनी ने एक औपचारिक और फीकी मुस्कान दी। अंदर ही अंदर उसे सुनयना की इस बेशर्मी और किस्मत पर जलन हो रही थी।
"चलें रवि?" सुनयना ने रवि के कंधे पर हाथ रखा।
"हाँ माँ... चलो," रवि ने कहा।
जाते-जाते रवि ने दरवाजे से मुड़कर कामिनी को देखा। उसकी आँखों में एक चमक थी, एक आश्वासन था— 'फिक्र मत करो आंटी, आपका और मेरा राज़, राज़ ही रहेगा।'

कामिनी ने हल्की सी पलकें झपका कर उसे विदा किया।
सुनयना और रवि गार्डन पार करते हुए मुख्य गेट की तरफ बढ़े।
रात की हवा में ठंडक थी। सुनयना अपनी साड़ी का पल्लू कसते हुए गेट तक पहुंची। रवि ने आगे बढ़कर गेट का सिटकनी खोली।
चरररर.... चररररर...
भारी लोहे का दरवाज़ा चीखते हुए खुला।
और तभी...
सामने से शराब की एक तेज़ और सड़ी हुई बदबू का भभका आया।
"हिच.... हिचह्ह्ह्हह्म....."
अंधेरे में से एक साया लड़खड़ाता हुआ गेट के बीचो-बीच आ गया।
यह रघु था।
वह पूरी तरह नशे में टल्ली था। उसके कपड़े अस्त-व्यस्त थे, लुंगी ढीली थी और वह झूम रहा था।
सुनयना, जो महंगे इत्र में नहाई हुई थी, इस अचानक आई बदबू से तिलमिला गई।

"छी...!" सुनयना ने तुरंत अपनी नाक पर रुमाल रख लिया और पीछे हट गई। "यह कौन है? कितनी गंदी बदबू आ रही है।"
रघु को कोई होश नहीं था। वह अपनी धुन में था।
"थोड़ी सी जो पी ली है.... चोरी तो नहीं की है.... हिच... हिचम्म.."
वह गाना गाते हुए, सुनयना से लगभग टकराते-टकराते बचा और अंदर घुस गया।

रवि ने अपनी माँ को सहारा दिया।
"कोई नहीं माँ... यह यहाँ का नौकर है, रघु। रमेश अंकल ने दया करके इसे स्टोर रूम में रहने की जगह दी हुई है। शराबी है बेचारा।"
सुनयना ने घृणा से रघु को देखा।

"उफ्फ... कैसे लोग हैं। चलो रवि," सुनयना ने तेज़ कदमों से अपनी कार की तरफ रुख किया। उसे अपनी 'रईस' दुनिया में वापस लौटना था, जहाँ गंदगी छुपायी जाती है, दिखाई नहीं जाती।

"अच्छा कामिनी जी... बाय!"
कार स्टार्ट हुई और रवि और सुनयना चले गए।
बँगले में अब गहरा सन्नाटा छा गया था।
कामिनी दरवाज़े पर खड़ी थी।
उसकी नज़रें उस जाते हुए शराबी, रघु पर टिकी थीं।
रघु लड़खड़ाता हुआ, गिरता-पड़ता गार्डन के अंधेरे में बने स्टोर रूम की तरफ जा रहा था।

उसका गठीला, काला शरीर गार्डन की पिली रोशनी में चमक रहा था।
कामिनी ने अभी-अभी रवि के साथ चरम सुख (Orgasm) पाया था। रवि का स्पर्श कोमल था, प्रेमी जैसा था। उसने उसे 'देवी' की तरह पूजा था।
लेकिन....

रघु को जाते देख, कामिनी की चूत में एक अजीब सी कुलबुलाहट होने लगी।
उसे महसूस हुआ कि रवि के प्यार में 'मिठास' तो थी, लेकिन 'नमक' कम था।

उसकी चूत रवि की उंगलियों और जीभ से शांत तो हुई थी, लेकिन उसकी आत्मा?
उसकी आत्मा को शायद उस 'दर्द' की तलाश थी जो उसे रमेश देता था। रमेश की मार, उसकी गालियां, उसका जानवरों जैसा बर्ताव—कामिनी का शरीर अनजाने में उस 'कठोरता' (Roughness) का आदी हो चुका था।

रवि 'मक्खन' था, लेकिन कामिनी को अब 'खुरदरे पत्थर' की रगड़ चाहिए थी।
उसे वहशीपन चाहिए था। उसे वो चाहिए था जो शमशेर ने सुनयना को दिया था—बालों से पकड़ना, गालियां देना और जानवर की तरह चोदना।
और रघु?
रघु वही 'जानवर' था।
उसकी गंदी लुंगी, उसकी पसीने और शराब वाली बदबू, उसका काला लंड और उसका वो अनगढ़पन...
कामिनी को रवि की कोमलता के बाद अब रघु की 'गंदगी' आकर्षित कर रही थी।

रघु स्टोर रूम के अंधेरे में गायब हो गया।
"हिचहह.... हिचहहहह...."
दूर से उसकी हिचकियों की आवाज़ आ रही थी।
कामिनी ने अपनी जांघों को आपस में भींचा। वहाँ अभी भी गीलापन था।
उसने एक गहरी सांस ली, जिसमें रात की रानी की खुशबू और रघु की छोड़ी हुई शराब की बदबू मिली हुई थी।
"शायद अभी रात बाकी है..."
उसने मैंने लोहे का दरवाज़ा बंद किया। और गार्डन पार करती मुख्य घर मे चली गई.

क्रमशः....

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