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मेरी माँ कामिनी -21

मेरी माँ कामिनी - भाग 21



रात का सन्नाटा गहरा चुका था। घर का मुख्य दरवाज़ा भेड़का कर, कामिनी ने अपने कांपते कदमों को स्टोर रूम की तरफ बढ़ाया। उसके हाथों में स्टील की थाली थी, जिसमें रघु के लिए खाना था। लेकिन उसकी चाल बता रही थी कि वह सिर्फ़ खाना देने नहीं, बल्कि अपनी उस "मीठी खुजली" का इलाज करवाने जा रही है जो रवि के अधूरे स्पर्श ने छोड़ दी थी।

स्टोर रूम का दरवाज़ा हल्का सा खुला था। अंदर पीले बल्ब की मद्धम और मैली रोशनी जल रही थी।
कामिनी अंदर दाखिल हुई।
हवा में देशी शराब, बीड़ी के धुएं और सीलन की वही चिर-परिचित गंध थी। खटिया पर रघु बेसुध पड़ा था। उसका मुंह खुला था और वह भारी सांसें ले रहा था। उसकी लुंगी अभी भी बेतरतीब थी, और उसका काला बदन पसीने में चमक रहा था।

कामिनी खटिया के पास खड़ी हो गई।
उसकी जांघों के बीच अभी भी गीलापन था। वह रघु को देखती रही।
'ये तो सोया पड़ा है... जानवर कहीं का," हालांकि कामिनी के चेहरे पे एक कुटिल मुस्कान भी आ गई, क्यूंकि वो उस रात की तरह रघु के मुँह पर बैठ कर अपनी मनमानी कर सकती थी.
लेकिन दूसरे ही पल, उसके अंदर की संस्कारी घरेलु औरत ने उसे दुत्कारा 
"तु तो फिर आ गई एक शराबी का फायदा उठाने"

दुविधा ने उसके पैर जकड़ लिए।
"'नहीं... मुझे चले जाना चाहिए। यह पागलपन है।, मै सुनयना नहीं हूँ, मै एक घरेलु औरत हूँ"

उसने थाली को पास पड़े स्टूल पर रखा और वापस मुड़ने लगी।
लेकिन जैसे ही वह पलटी...
पीछे से एक भारी, नशे में डूबी और लड़खड़ाती आवाज़ आई।
"आ गई तू सुगना...?"
कामिनी के कदम वहीं जम गए।

"मैं जानता था तू आएगी... खाना लाई है मेरे लिए?"
कामिनी का दिल गले में आ गया। वह धीरे से पलटी।
रघु ने अपनी लाल, नशीली आँखें खोल दी थीं। वह कामिनी को नहीं देख रहा था, वह नशे के धुंधलके में अपनी मरी हुई बीवी 'सुगना' को देख रहा था।

कामिनी को एक अजीब सी राहत महसूस हुई, जैसे किसी गवाह से भरी अदलात मे उसे पहचानने से मना कर दिया हो.

"हां... खा लो..." कामिनी ने धीरे से कहा।
लेकिन रघु को खाना नहीं चाहिए था।
अचानक, रघु का हाथ बिजली की रफ़्तार से आगे बढ़ा।
उसने कामिनी की कलाई को अपने लोहे जैसे सख्त पंजों में जकड़ लिया।

"ह्ह्क...आअह्ह्ह..." कामिनी की चीख निकलते-निकलते रह गई।
रघु की पकड़ में वहशियत थी।
"कहाँ जा रही है? मुझे छोड़ के मत जा..."
रघु ने एक झटका दिया।
कामिनी संभल नहीं पाई।
उसका संतुलन बिगड़ा। वह रघु के ऊपर गिरने ही वाली थी कि रघु ने दूसरा हाथ बढ़ाकर कामिनी की साड़ी का पल्लू पकड़ लिया।

चर्रर्रर्रर्र.......... !
सन्नाटे में कपड़ा फटने की तीखी आवाज़ गूंज गई।
रघु ने इतनी जोर से खींचा था कि कामिनी की काली शिफॉन की साड़ी उसके बदन से उधड़ती चली गई। पल्लू कंधे से हटकर कमर तक आ गिरा।

"आह्ह्ह... रघु..."
कामिनी अब सिर्फ़ अपने टाइट ब्लाउज और पेटीकोट में खड़ी थी। पीली रोशनी में उसका गोरा, भरा हुआ जिस्म सोने की तरह दमक रहा था। उसके ब्लाउज से बाहर छलकते हुए स्तन और गहरी नाभि रघु की आँखों के सामने थे।

"कितनी सुंदर लग रही है तू सुगना... हिच... हिचह्ह्हब...." रघु की आँखों में हवस की आग जल उठी।
"आजा मेरे पास..."
उसने कामिनी की नंगी कमर को पकड़ा और एक ही झटके में उसे खटिया पर खींच लिया।
धड़ाम!
खटिया चरमरा उठी। कामिनी सीधे रघु के ऊपर आ गिरी।
उसका नरम, भारी जिस्म रघु के सख्त, पसीने से भीगे सीने से टकराया।
इससे पहले कि कामिनी संभल पाती, रघु ने उसे दबोच लिया।
उसने कामिनी को अपने नीचे दबा लिया (Overpowered) और उसके ऊपर चढ़ बैठा।

रघु के दोनों हाथ कामिनी के भारी स्तनों पर कस गए।
ब्लाउज के कपड़े के ऊपर से ही उसने कामिनी के वक्षों को किसी आटा गूंथने वाले की तरह भींचना शुरू कर दिया।

"उफ्फ्फ्फ.... आअह्ह्ह.... मर गई...."
कामिनी दर्द से बिलबिला उठी।
रवि का स्पर्श कोमल था, लेकिन रघु? रघु कसाई था।
वह स्तनों को मसल नहीं रहा था, उन्हें कुचल रहा था। उसकी खुरदरी उंगलियां कामिनी के कोमल मांस में धंस रही थीं।
"दबाने दे... बहुत दिन हो गए... हिच... तेरे ये आम नहीं चूसे..."
रघु नशे में बड़बड़ा रहा था और पागलों की तरह कामिनी के स्तनों को मरोड़ रहा था।
कामिनी को दर्द हो रहा था, लेकिन यह दर्द उसकी चूत में आग लगा रहा था। उसे यही चाहिए था—यह जानवरपन, यह अधिकार, यह वहशियत।

तभी रघु ने अपना चेहरा नीचे झुकाया।
कामिनी की नाक में सड़ी हुई शराब, बीड़ी के धुएं और बासी पसीने की एक भयंकर बदबू का भभका लगा।
उसे उबकाई आने लगी। उसने अपना चेहरा फेरने की कोशिश की।

"नहीं... हटो... बदबू आ रही है..." कामिनी का 'इज़्ज़तदार' मन जागने की कोशिश कर रहा था।
लेकिन रघु सुनने के मूड में नहीं था।
उसने अपने एक हाथ से कामिनी के जबड़े को कसकर पकड़ लिया और उसका चेहरा अपनी तरफ सीधा कर दिया।
और फिर...
उसने अपने मोटे, काले और बदबूदार होंठ कामिनी के गुलाबी, मखमली होंठों पर थोप दिए।
गप... म्च्च्च.... स्लर्रर्रप....
यह कोई फिल्मी किस नहीं था। यह एक हमला था।
रघु उसके मुंह को चूस नहीं रहा था, वह उसे खा रहा था।
कामिनी घुट रही थी। वह छटपटा रही थी। वह रघु की छाती पर मुक्के मार रही थी।

"मम्मम्म.... छोड़... उम्मम्म्म..."
रघु की जीभ—मोटी, खुरदरी और शराब से सनी हुई—जबरदस्ती कामिनी के बंद होंठों को खोलकर अंदर घुस गई।
कामिनी के मुंह में रघु की लार का स्वाद फैल गया।
कड़वा। कसैला। गंदा।
शराब और थूक का वह मिश्रण कामिनी के हलक में उतरने लगा।
कामिनी को लगा वह उल्टी कर देगी।

लेकिन...
जैसे ही वह शराब मिली लार (Saliva) उसके पेट में गई... एक चमत्कार हुआ।
उस कड़वाहट में एक अजीब सा नशा था।
वह 'गंदगी' कामिनी के दिमाग पर चढ़ने लगी, एक नशा सा छाने लगा, 
रघु उसे इतनी बेदर्दी से चूम रहा था, उसके बालों को नोच रहा था, उसके स्तनों को मसल रहा था कि कामिनी का विरोध पिघलने लगा।
सर हल्का सा घूम रहा था, रघु का बदबूदार गन्दा थूक उसे अब अच्छा लग रहा था.

उसकी छटपटाहट बंद हो गई।
उसके हाथ, जो रघु को धक्का दे रहे थे, धीरे-धीरे रघु की गर्दन के पीछे चले गए।

कामिनी ने अपनी नाक बंद कर ली और उस बदबू को 'मर्द की खुशबू' मानकर स्वीकार कर लिया।

उसने अपना मुंह पूरा खोल दिया। 27542041
रघु की जीभ उसके मुंह के अंदर तांडव कर रही थी।

कामिनी का चरित्र आज पूरी तरह गिर चुका था। वह एक शराबी नौकर के मुंह की गंदगी को अमृत समझकर पी रही थी।
कामिनी ने अपनी जीभ बाहर निकाली। दोनों की जीभ एक दूसरे से भीड़ गई, एक दूसरे से जितने की कोशिश करने लगी, 
उसने अपनी जीभ को रघु के मुंह के अंदर धकेल दिया।
अब दोनों की जीभें एक-दूसरे से लड़ रही थीं।
लप-लप... चप-चप...
कामिनी रघु के दांतों को चाट रही थी, उसके मसूड़ों को चूस रही थी। वह उस शराब के हर कतरे को अपने अंदर ले लेना चाहती थी।

"हाँ रघु... चूस मुझे... खा जा मुझे..." कामिनी के गले से एक दबी हुई, कामुक घुरघुराहट निकली।
उसका शरीर रघु के नीचे मचलने लगा। वह अपनी जांघों को रघु की जांघों से रगड़ने लगी।
घृणा अब हवस बन चुकी थी। गंदगी अब नशा बन चुकी थी।

रघु इतना मदहोश था कि उसे अपने मुंह पर काबू नहीं था। उसके मुंह में लार (Saliva) की बाढ़ आई हुई थी।
 वह कामिनी को पागलों की तरह चूम रहा था, रघु के मुंह से निकलती हुई गाढ़ी, चिपचिपी और बदबूदार लार कामिनी के मुंह के किनारों से बह निकली। sloppy-kissing

"स्लर्रर्रर्रप.... पिच-पिच...."
वह लार कामिनी की गोरी ठुड्डी से होती हुई, उसकी सुराहीदार गर्दन पर फिसलने लगी।
वह थूक ठंडा नहीं था, वह रघु की शराब वाली गर्मी से उबल रहा था।
वह गाढ़ा, लिसलिसा थूक कामिनी की गर्दन से नीचे सरका, तो कामिनी को लगा जैसे किसी ने उसके बदन पर पिघला हुआ 'लावा' डाल दिया हो।

कामिनी का ब्लाउज पूरी तरह से कसा हुआ था, स्तन उत्तेजना मे गर्व से फूल गए रहे, लगभग 70% हिस्सा ब्लाउज के बहार से झाँक रहा था, 
रघु का मुंह कामिनी के मुंह पर चिपका था, और उसकी लार की एक मोटी धार (String of saliva) कामिनी की ठुड्डी से टपककर सीधे नीचे गिरी। 26288563
"टप... टप..."
वह गंदा, नशीला थूक सीधा कामिनी के नंगे, गोरे स्तनों के बीच बनी उस गहरी घाटी (Cleavage) में जा गिरा।
कामिनी सिहर उठी।

वह थूक वहां रुका नहीं। वह उसकी छाती की गर्मी पाकर और पतला हो गया और तेल की तरह फिसलते हुए उसके दोनों स्तनों की गोलाई पर फैल गया।
रघु की गंदगी अब कामिनी के स्तनों को 'पॉलिश' कर रही थी।
उसके गोरे स्तन ब्लाउज मे रघु के थूक से सनकर चमक रहे थे। वह लिसलिसा पदार्थ उसके निप्पलों के पास जमा हो रहा था, उन्हें और भी गीला और उत्तेजक बना रहा था।

​कामिनी को अपनी छाती पर वह गीलापन महसूस हो रहा था। उसे पता था कि यह रघु का थूक है, एक शराबी नौकर की गंदगी है।
लेकिन उसे पोंछने के बजाय, कामिनी ने अपनी छाती को और ऊपर उठा दिया। जैसे वो अपने स्तनों को इस गंदगी मे पूरी तरह भीगा लेना चाहती हो, 

उसे मज़ा आ रहा था। उसे लग रहा था जैसे रघु अपने थूक से उस पर अपनी 'मोहर' लगा रहा है।
वह गर्म थूक उसकी त्वचा के रोमछिद्रों में समा रहा था, उसे जला रहा था, उसे और भी ज्यादा कामुक बना रहा था।

"उम्मम्म.... रघु.... चूस.... पूरा गंदा कर दे मुझे...." कामिनी के मुंह से दबी हुई आवाज़ निकली, क्योंकि रघु ने उसके होंठों को छोड़ने से मना कर दिया था।
रघु की जीभ अब कामिनी के मुंह के अंदर उसके तालू (Palate) को चाट रही थी।
कामिनी ने भी अपनी सारी हदें पार कर दीं।
उसने अपनी जीभ बाहर निकाली और रघु के मुंह से टपकते हुए उस थूक को चाट लिया जो उसके होंठों के कोने पर जमा था।
उसने रघु की खुरदरी जीभ को अपने मुंह में चूसना शुरू कर दिया।
वह रघु की लार को पी रही थी।

"गटक... गटक..."
शराब और थूक का वह मिश्रण उसके गले से नीचे उतर रहा था, और साथ ही उसकी छाती पर बहता हुआ थूक उसके स्तनों के बीच की खाई को भर रहा था।
उस गंदगी में, उस बदबू में, और उस थूक की चिकनाई में कामिनी को वो 'कच्चापन ' (Rawness), वो उत्तेजना मिल रही थी, जो उसे किसी महंगे बिस्तर पर नहीं मिला।

यह शुद्ध मिलावट रहित हवस थी—गीली, चिपचिपी और बदबूदार।
​कामिनी ने अपनी जांघों को रघु की कमर से रगड़ना तेज़ कर दिया।
उसकी चूत अब उतनी ही गीली थी जितना उसका थूक से सना हुआ चेहरा और छाती।
"और थूक मुझपे.... नहला दे मुझे अपनी गंदगी से..." कामिनी का मन चीख रहा था।

तभी रघु को कामिनी के बेचैनी महसूस हुई, उसकी भूखी नज़रें नीचे सरक गई थीं, जहाँ कामिनी के भरे-पूरे वक्षस्थल ब्लाउज की कैद दोनों के थूक से सने हुए फड़फड़ा रहे थे।

रघु को उन हुक और बटनों को खोलने का धैर्य नहीं था। वह एक जानवर बन चुका था जिसे सिर्फ़ मांस चाहिए था।
उसने अपने दोनों काले, खुरदरे हाथों से कामिनी के ब्लाउज के गले को पकड़ा।
"तड़ाक.... चर्रर्रर्रर्र............!"
सन्नाटे को चीरती हुई कपड़ा फटने की आवाज़ गूंज उठी।
रघु ने एक ही झटके में कामिनी के टाइट ब्लाउज को बीच से फाड़कर दो टुकड़े कर दिया।
ब्लाउज के फटते ही, कामिनी के विशाल, दूधिया और भारी-भरकम स्तन किसी बाढ़ के पानी की तरह आज़ाद होकर बाहर छलक पड़े।
कामिनी ने अंदर ब्रा नहीं पहनी थी, लिहाज़ा, ब्लाउज हटते ही उसकी नंगी जवानी रघु की आँखों के सामने उछलकर आ गई।

उस पीली रोशनी में कामिनी के स्तन किसी संगमरमर के तराशे हुए कलश (Pitcher) जैसे लग रहे थे। 36 इंच का वह घेरा, एकदम गोल, भरा हुआ और गुरुत्वाकर्षण (Gravity) को चुनौती देता हुआ तना खड़ा था।
उस गोरे मांसल पहाड़ के बीचो-बीच, उसके निप्पल (Nipples) किसी ज्वालामुखी के मुहाने की तरह उभरे हुए थे।
अत्यधिक कामवासना और डर के मिश्रण से उसके एरिओला (Areola) सिकुड़ गए थे और निप्पल बेर (Berry) की तरह सख्त, डार्क कत्थई और नुकीले हो गए थे। वे इतने कड़े थे कि लग रहा था छूने पर उंगली कट जाएगी।
स्तनों पर नीली नसें साफ़ झलक रही थीं, जो बता रही थीं कि उनमें कितना रक्त-प्रवाह और गर्मी दौड़ रही है।
सबसे कामुक नजारा कामिनी के सम्पूर्ण स्तन लिसलिसे गीले थूक से सने हुए थे, ये थूक कामिनी और रघु के मिलन से पैदा हुआ था.

रघु की लाल आँखें उन नंगे, तने हुए निप्पलों को देखकर चौंधिया गईं।
"ह्ह्क... सुगना... तेरे आम..." रघु के मुंह से लार टपक पड़ी।
वह खुद को रोक नहीं सका। वह किसी भूखे भेड़िये की तरह उन पर टूट पड़ा।
उसने अपना पूरा चेहरा कामिनी के दाहिने स्तन में गाड़ दिया।
"स्लर्रर्रप... चप... गप..."
उसने कामिनी के पूरे स्तन को अपने बड़े मुंह में भरने की कोशिश की, जैसे कोई बच्चा माँ का दूध पीता है, लेकिन यह बच्चा नहीं, एक राक्षस था।
उसने स्तन को चूसा नहीं, बल्कि दबोच लिया।
और फिर...
"कच्च्च....!"
रघु ने कामिनी के उस पत्थर जैसे तने हुए निप्पल को अपने पीले, गंदे दांतों के बीच दबा दिया और जोर से काट लिया।
"आआईईईईईई......... माअअअअअ..... उफ्फ्फ्फ..... मर गई....."
कामिनी का शरीर खटिया पर कमान की तरह मुड़ गया। उसकी पीठ हवा में उठ गई।
एक असहनीय पीड़ा की लहर उसके स्तन से होती हुई सीधे उसकी बच्चेदानी तक पहुंच गई।
दर्द तीखा था। रघु के दाँत उसकी कोमल त्वचा को छील रहे थे।
लेकिन...
यही तो वह दर्द था जिसके लिए वह तरस रही थी।
जैसे ही रघु ने काटा, कामिनी की चूत ने जवाब दिया।
पच... पचक....
उसकी योनि के अंदर के स्नायु (Muscles) सिकुड़ गए और वहां से चिकने पानी की एक तेज़ धार छूट पड़ी।

दर्द ने उसे गीला कर दिया था। वह जन्नत में थी। उसे लगा जैसे उसकी आत्मा उस दर्द में मोक्ष पा रही है।
रघु रुक नहीं रहा था। वह पागल हो गया था।
वह कभी दायें स्तन को चूसता, तो कभी बाएं स्तन को अपने खुरदरे, काले हाथों में लेकर आटे की लोई की तरह मसल देता।
उसके काले हाथ कामिनी के गोरे, मलाईदार स्तनों पर ऐसे लग रहे थे जैसे चाँद पर ग्रहण लगा हो। वह गोरे मांस को इतनी जोर से भींच रहा था कि उसकी उंगलियों के लाल निशान कामिनी की त्वचा पर छपते जा रहे थे।
रघु का मुंह लार और शराब से भरा था।
वह चाट रहा था, थूक रहा था, चूस रहा था।

"सुड़प... लप... लप..."
कामिनी का गला, उसकी गर्दन (Neckline), उसके दोनों स्तनों की घाटी (Cleavage) और उसके निप्पल... सब रघु के उस बदबूदार, चिपचिपे और लिसलिसे थूक से सन गए थे।
कामिनी का गोरा बदन अब रघु की लार से चमक रहा था।
उस बदबू से कामिनी का दम घुट रहा था, लेकिन वह नशा... वहशीपन का नशा उसे चढ़ता जा रहा था।
कामिनी ने अपने हाथ रघु के पसीने से भरे, गंदे बालों में डाल दिए।
उसने उसे धक्का देने के बजाय, उसका सिर अपने सीने पर और जोर से दबा दिया।

"हाँ... और जोर से... काट ले मुझे... नोच ले... जानवर बन जा..." कामिनी सिसक रही थी, "पी ले मेरा खून... आह्ह्ह..."
वह अपनी कमर को खटिया पर रगड़ रही थी। पेटीकोट के अंदर उसकी जांघें आपस में घर्षण कर रही थीं।
रघु का एक हाथ नीचे फिसला।
उसका हाथ कामिनी के पेट पर आया।
कामिनी का पेट सपाट था, लेकिन हल्का सा मांसल और बेहद नरम।
उसकी साड़ी फटने और ब्लाउज के चिथड़े उड़ने के बाद, अब उसकी गहरी नाभि (Navel) पूरी तरह उजागर थी।
वह नाभि किसी गहरे कुएं जैसी थी, गोल और रहस्यमयी। कामिनी की सांसों के साथ उसका पेट ऊपर-नीचे हो रहा था, जिससे वह नाभि किसी भंवर की तरह डोल रही थी।
रघु ने अपनी उंगली उस नाभि में घुसा दी और उसे बेरहमी से कुरेदने लगा।
"उह्ह्ह्ह... गुदगुदी हो रही है... मत कर... आह्ह्ह..." कामिनी मचल उठी।
ऊपर वह निप्पल काट रहा था, बीच में नाभि को रौंद रहा था।
रघु का जंगलीपन अपनी चरम सीमा पर था।
उसने कामिनी के स्तन को मुंह से छोड़ा।
"पॉप..."
निप्पल उसके मुंह से आज़ाद हुआ, लेकिन वह अब लाल-सुर्ख हो चुका था और उस पर दांतों के गहरे निशान थे। वह थूक से लथपथ था।
रघु ने अपनी जीभ से कामिनी की छाती पर गिरे अपने ही थूक को चाटा और फिर अपनी लाल आँखें कामिनी की आँखों में गड़ा दीं।
"मज़ा आ रहा है सुगना? अभी तो और मज़ा आएगा..."
उसने अपना हाथ नीचे, कामिनी के पेटीकोट के नाड़े की तरफ बढ़ाया।
कामिनी की सांसें अटक गईं।
उसका जिस्म थूक से सना हुआ था, स्तनों में टीस थी, और चूत पानी-पानी थी। 

रघु का जंगलीपन अब कपड़ों की बाधा बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। कामिनी के स्तनों को अपनी लार से नहलाने के बाद, उसका हाथ नीचे फिसला—सीधे कामिनी के पेटीकोट के नाड़े पर।
रघु की उंगलियां नशे में सुन्न थीं और कामिनी की कमर का घेरा पसीने से भीगा हुआ था। वह हड़बड़ाहट में गांठ खोलने की कोशिश करने लगा।
"खुल जा साली..." रघु गुर्राया।
लेकिन उसकी मोटी और कांपती उंगलियों ने कामिनी के सूती पेटीकोट की गीली गांठ को खोलने के बजाय और कस दिया।
उसने जोर लगाया।
"उह्ह्ह्ह...." कामिनी के मुंह से सिसकी निकली।
गांठ पत्थर की तरह टाइट हो गई और नाड़ा कामिनी की मुलायम, मांसल कमर में धंस गया। पेट की चर्बी नाड़े के ऊपर और नीचे उभर आई। दर्द हुआ, लेकिन उस कसाव ने कामिनी को एक अजीब सा सुख भी दिया।
रघु का सब्र जवाब दे गया।
"भाड़ में जा..."
उसने गांठ खोलने की कोशिश छोड़ दी।
उसने अपने दोनों लोहे जैसे मज़बूत हाथों को पेटीकोट के कमरबंद (waistband) के अंदर घुसाया। उसकी खुरदरी उंगलियों ने कामिनी की नंगी कमर की त्वचा को छील दिया।
उसने अपनी पूरी ताकत लगाई और दोनों हाथों को विपरीत दिशा में झटका दिया।
"तड़ाक..... चर्रर्रर्रर्रर्र............!"
एक जोरदार आवाज़ के साथ कामिनी का पेटीकोट ऊपर से नीचे तक फटता चला गया।
रघु ने उस फटे हुए कपड़े को किसी बेकार चीथड़े की तरह नोचकर कामिनी के बदन से उखाड़ फेंका और दूर ज़मीन पर दे मारा।
और फिर...
स्टोर रूम की उस मैली, पीली रोशनी में एक ऐसा नज़ारा उभरा जिसने वक़्त को थाम दिया।
कामिनी... उसकी मेमसाब... अब पूरी तरह, शत-प्रतिशत नंगी (Stark Naked) थी।
खटिया पर लेटी हुई कामिनी का जिस्म किसी पिघले हुए सोने की तरह चमक रहा था।
ब्लाउज फटा हुआ था, पेटीकोट जा चुका था।
उसके शरीर पर अब सिर्फ़ रघु का थूक, पसीना और उसके अपने जिस्म की चमक थी।
कामिनी की भारी, मांसल और मक्खन जैसी चिकनी जांघें (Thighs) डर और शर्म के मारे आपस में कसकर चिपकी हुई थीं।
घुटने जुड़े हुए थे।
जांघों के इस मिलन की वजह से, उसका सबसे निजी अंग—उसकी जादुई गुफा—छुपी हुई थी। जांघों के बीच सिर्फ़ एक गहरा, फुला हुआ 'त्रिभुज' (Triangle) दिख रहा था, कामिनी की चुत का ऊपरी हिस्सा चमक रहा था, वहाँ किसी भी रोये का कोई नामोनिशान नहीं था, लेकिन वह 'हवा महल' अभी बंद था। 20210802-235333

 कामिनी ने अपनी खूबसूरती को छुपाने के लिए अपने हाथ आगे नहीं किए।
वह निडर होकर लेटी रही, अपनी नग्नता को रघु की भूखी नज़रों के सामने परोसती रही। उसका सीना तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहा था, और नंगी नाभि सांसों के साथ डोल रही थी।

रघु इस दृश्य को देखकर पागल सा हो गया। उसकी आँखों में खून उतर आया।
"हे भगवान... सुगना... तू तो पूरी की पूरी मलाई है..."
वह खटिया के पायदान (Foot of the bed) की तरफ खिसका।
वह कामिनी के जुड़े हुए घुटनों और जांघों को देखकर और भी ज्यादा उत्तेजित हो गया, 
वह झुक गया।
उसने अपना मुंह कामिनी की बंद जांघों पर लगा दिया।
"स्लर्रर्रप... चप... चप..."
रघु पागलों की तरह कामिनी की चिकनी जांघों को चाटने लगा।

उसकी जीभ जांघों की उस दरार (Crevice) में घुसने की कोशिश कर रही थी जहाँ दोनों पैर जुड़े हुए थे।
जब उसे लगा कि जीभ काफी नहीं है, तो उसने थूकना शुरू किया।
"थू.... थू....!"
उसने अपना गाढ़ा, गरम थूक कामिनी की जांघों पर गिराया और उसे अपने हाथों से मलने लगा।
कामिनी की जांघें अब रघु के थूक से गीली और फिसलन भरी हो गई थीं।

"खोल इसे... मुझे देखना है... खज़ाना देखना है..." रघु बड़बड़ा रहा था।
उसने अपने दोनों मज़बूत हाथों से कामिनी के घुटनों को पकड़ा।
उसने धीरे-धीरे, लेकिन दृढ़ता से उन्हें अलग करना शुरू किया।
कामिनी की जांघें कांप रही थीं, लेकिन उसने प्रतिरोध नहीं किया। उसने अपने जिस्म को ढीला छोड़ दिया।
जैसे-जैसे रघु उसके घुटनों को फैलाता गया... नज़ारा बदलता गया।
बंद कली खिलने लगी।
गोरी, मांसल जांघें दूर होती गईं और उनके बीच का वह गहरा राज़ उजागर होता चला गया।
और आखिर में...
कामिनी की टांगें पूरी तरह चौड़ी हो गईं।
रघु की आँखों के सामने अब कोई पर्दा नहीं था। 27179799
कामिनी की 'महारानी'—उसकी चूत—अपनी पूरी भव्यता के साथ रघु का स्वागत कर रही थी।

कामिनी की गोरी जांघों के बीच एक गुलाबी, मांसल और रसीला 'गुलाब' (Rose) खिला हुआ था।
कामिनी की योनि के होंठ (Lips) सूजे हुए थे (दिन भर की उत्तेजना से), और हल्के खुले हुए थे।
वह दरार गहरी गुलाबी थी, और उसके अंदर से पारदर्शी काम-रस (Nectar) की एक बूंद मोती की तरह चमक रही थी।

वह एकदम बेदाग थी। साफ़-सुथरी। मांसल।
जैसे ही कामिनी की टांगें खुलीं और वह 'गुलाब' हवा के संपर्क में आया...
सूंघ.... ! सिंफ्फफ्फ्फ़.... शनिफगगगग....
एक तेज़, मादक और नशीली खुशबू ने पूरे स्टोर रूम पर कब्ज़ा कर लिया।
यह खुशबू किसी इत्र की नहीं थी।

यह एक उत्तेजित, प्यासी और पूर्ण रूप से तैयार औरत के "फेरोमोंस" (Pheromones) की गंध थी—कच्ची, सौंधी, और मछली जैसी हल्की सी नमकीन महक (Musky scent)।
उस गंध ने स्टोर रूम की शराब और बीड़ी की बदबू को एक पल में खत्म कर दिया।
रघु ने एक गहरी सांस ली।

"आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह..........!"
उस गंध ने उसके दिमाग की रही-सही नसें भी फाड़ दीं। वह उस खुशबू में डूब गया। सामने पड़ा वह 'मांस का फूल' उसे दावत दे रहा था।


स्टोर रूम की वह हवा, जो कामिनी के स्त्रीत्व की मादक गंध से भर चुकी थी, अब एक तूफ़ान की गवाह बनने वाली थी। रघु की लाल आँखें कामिनी की खुली हुई, गुलाबी और रसीली चूत पर टिकी थीं। वह नज़ारा किसी प्यासे के सामने रखे अमृत के कलश जैसा था।

रघु ने अब एक पल की भी देरी नहीं की।
उसने अपने दोनों मज़बूत, खुरदरे हाथों से कामिनी की मांसल नितम्बों (Buttocks) को नीचे से जकड़ लिया और उन्हें थोड़ा ऊपर उठा दिया।
और फिर... एक भूखे, जंगली जानवर की तरह उसने अपना पूरा चेहरा कामिनी की टांगों के बीच उस 'गुलाबी दरार' में दे मारा।

"धप... फच...!"
straight-005-4 रघु का मुंह सीधा कामिनी की योनि के मुहाने पर जाकर लगा। उसकी नाक कामिनी के 'दाने' (Clitoris) में धंस गई और उसकी ठुड्डी कामिनी के निचले छेद (Vaginal opening) पर जम गई।
उसने सांस ली...
"स्निफ़फ़फ़फ़.... आअह्ह्ह.... क्या महक है सुगना..."
उसने कामिनी की चूत की उस कस्तूरी गंध को अपने फेफड़ों में भरा और फिर अपनी जीभ का हमला शुरू कर दिया।


"स्लर्रर्रर्रप.... चप... चप... चप...!"
रघु ने अपनी चौड़ी, खुरदरी जीभ को फावड़े की तरह बाहर निकाला और कामिनी की चूत को नीचे से ऊपर तक एक ही बार में चाट लिया।
उसकी जीभ ने कामिनी के योनि-छिद्र से लेकर, उसके होठों की परतों को खोलते हुए, ऊपर तने हुए दाने तक का सफ़र तय किया।
कामिनी का शरीर खटिया पर उछल पड़ा।

"आईईईईई........ रघघघघुउउउउ........ !!"
रघु की दाढ़ी (Beard) के छोटे-छोटे, कड़े बाल कामिनी की नाजुक, भीगी हुई जांघों और चूत के आसपास की त्वचा को रेगमाल की तरह रगड़ रहे थे।
वह खुरदरापन कामिनी को पागल कर रहा था।

जब वह चाटने के लिए अपना सिर हिलाता, तो उसकी वह सख्त दाढ़ी कामिनी की भीगी हुई, संवेदनशील जांघों और चूत के बाहरी हिस्से पर रगड़ खाती।
"खर्रर्र... खर्रर्र..."
वह रगड़ कामिनी को एक साथ दर्द और मज़ा दे रही थी। उसकी कोमल त्वचा छिल रही थी, लाल हो रही थी, लेकिन उस जलन ने उसकी उत्तेजना को आग बना दिया था।
"आह्ह्ह.... रघघघु.... गड़ रहा है.... छिल रहा है.... और रगड़.... उफ्फ्फ्फ.... मेरी खाल उधेड़ दे...." कामिनी सिसक रही थी।
रघु चाट नहीं रहा था, वह उस चूत को 'पी' रहा था।
वह अपनी जीभ को चूत के होठों (Labia) के बीच फंसाकर उन्हें चूसने लगा।

"सुड़प... सुड़प..."
वह उन गुलाबी पंखुड़ियों को अपने मुंह में भरकर ऐसे चबा रहा था जैसे कोई रसीला फल खा रहा हो।

अचानक, रघु ने अपना निशाना बदला। उसने अपनी जीभ की नोक को सख्त किया और सीधे कामिनी के 'दाने' (Clitoris) पर हमला बोल दिया।
वह दाना, जो उत्तेजना से सूजकर एक छोटे बेर के आकार का हो गया था, nude-licking-clit-gif-4 रघु की जीभ की लपेट में आ गया।
रघु उसे चाटने लगा... गोल-गोल, तेज़ रफ़्तार में।
"लप-लप-लप-लप..."
कामिनी की रीढ़ की हड्डी में 440 वोल्ट का करंट दौड़ गया।
"आह्ह्ह.... मार डाला.... उफ्फ्फ्फ.... जानवर.... खा जा.... चबा जा उसे.... आह्ह्ह..."
कामिनी ने अपने दोनों हाथ रघु के सिर पर रख दिए। वह उसके बालों को नोच रही थी, उसका सिर अपनी चूत में और जोर से दबा रही थी। image114
रघु ने उस दाने को अपने होंठों में कैद किया और "वैक्यूम" बनाकर जोर से चूस लिया।

वह उन गुलाबी पंखुड़ियों को खोल रहा था, उनके अंदर छिपे मैल और रस को चाट रहा था। उसकी जीभ कामिनी की चूत की दीवारों (Vaginal walls) को खुरच रही थी।

कामिनी बर्दाश्त की हद पार कर गई।
रघु की जीभ की कारीगरी और उसकी दाढ़ी की रगड़ ने कामिनी के मूत्राशय (Bladder) और बच्चेदानी पर एक साथ दबाव बनाया।
"रघघघु.... मैं... मैं.... आ रही हूँ.... आह्ह्ह...."
कामिनी का पेट अंदर पिचक गया। जांघें पत्थर की तरह सख्त हो गईं।
और फिर...
"सर्रर्रर्रर्र............ !!"
कामिनी की चूत से काम-रस और पेशाब की एक मिली-जुली, गरम और तेज़ धार (Squirt) छूट पड़ी।
वह फव्वारा सीधा रघु के मुंह के अंदर गया।
रघु हटा नहीं।
उसे तो प्यास लगी थी। उसे नशा चाहिए था।
उसने अपना मुंह पूरा खोल दिया।
"गटक... गटक... गटक... !!"
कामिनी का वह गरम, नमकीन और कसैला पानी रघु के हलक में उतरने लगा।
रघु उसे ऐसे पी रहा था जैसे वह कोई सालों पुरानी महंगी शराब हो।
उसके गाल फूल गए, उसका गला चलने लगा।
कामिनी का पानी उसके मुंह से बाहर छलककर उसकी ठुड्डी और गर्दन पर बहने लगा।
"पी ले.... पूरा पी जा हरामखोर.... पी का मेरा गरम पेशाब..." कामिनी हवस में चीख रही थी।


लेकिन रघु रुका नहीं।
पहला पानी पीने के बाद, उसकी प्यास और भड़क गई।
वह अब और भी जंगली हो गया। उसने अपनी दो उंगलियाँ कामिनी की चूत के छेद में घुसा दीं और उन्हें अंदर-बाहर (Finger-fucking) करने लगा, जबकि उसकी जीभ अभी भी ऊपर दाने को चाट रही थी।
"पच-पच... लप-लप..."


अंदर उंगलियाँ कामिनी की दीवारों को खुरच रही थीं, और बाहर जीभ दाने को बिजली के झटके दे रही थी।
कामिनी का शरीर अभी पहले झटके से उभरा भी नहीं था कि दूसरा तूफ़ान आ गया।
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उसका बदन ऐंठने लगा।
"नहीं... नहीं... रघु... फिर से.... उईईईई माअअअअ....."
उसकी चूत ने फिर से पानी छोड़ा।
"पिच.... सर्रर्रर्र..... !!"
इस बार धार और तेज़ थी। कामिनी का पेशाब पूरी ताकत से निकला।
रघु ने अपनी जीभ बाहर निकालकर उस धार को लपक लिया।
वह चाटता रहा... पीता रहा... थूकता रहा... और फिर चाटता रहा।
स्टोर रूम में अब सिर्फ़ "सुड़प-सुड़प" और "गटक-गटक" की आवाज़ें आ रही थीं।
कामिनी की चूत अब सूजकर लाल टमाटर जैसी हो गई थी।
रघु का पूरा चेहरा कामिनी के रसों से भीगा हुआ था। उसकी पलकों पर, उसकी नाक पर, उसकी दाढ़ी में... हर जगह कामिनी का पानी चमक रहा था।
वह किसी नाली के कीड़े की तरह कामिनी की गंदगी में लोट रहा था।
कामिनी अब बेसुध होने की कगार पर थी। उसकी टांगें हवा में झूल रही थीं।
उसने हार मान ली थी।
"बस... बस.... मर जाऊंगी.... उफ्फ्फ...."
लेकिन रघु के लिए यह दावत अभी शुरू हुई थी।
उसने अपना सिर उठाया। उसका चेहरा कामिनी के पेशाब और रस से लथपथ था। उसने अपनी जीभ से अपने होंठ चाटे।
"बड़ा नशा है तेरे पानी में सुगना... साली पूरी बोतल चढ़ा दी तूने तो..." रघु नशे में हँसा।
और फिर उसने दोबारा अपना मुंह उसी गीली, बदबूदार और रसीली जगह में घुसा दिया।

 रघु का चेहरा कामिनी के पेशाब और काम-रस से पूरी तरह भीगा हुआ था, वह किसी इंसान की तरह नहीं, बल्कि एक 'पिशाच' की तरह व्यवहार कर रहा था।
उसने कामिनी की चूत से मुंह नहीं हटाया।
नशे और उत्तेजना के चरम पर, रघु ने अपने दाहिने हाथ की तीन उंगलियाँ (तर्जनी, मध्यमा और अनामिका) एक साथ कामिनी की योनि के मुहाने पर जमाईं।

कामिनी की चूत पहले से ही दो बार की बाढ़ से गीली और खुली हुई थी।
"फच...!"
रघु ने एक ही झटके में तीनों उंगलियाँ कामिनी की बच्चेदानी के मुंह तक घुसा दीं।

"आआईईईईईई............ माँअअअअ...." कामिनी की आँखें पलट गईं। उसका शरीर धनुष की तरह मुड़ गया।
रघु ने उन तीनों उंगलियों को अंदर टेढ़ा किया और बेरहमी से अंदर-बाहर (Pumping) करने लगा।
साथ ही, उसका अंगूठा कामिनी के सूजे हुए 'दाने' (Clitoris) पर जम गया। उसने उसे कुचलना और मसलना शुरू कर दिया।

मुंह से चाट, अंदर तीन उंगलियों का घर्षण और बाहर अंगूठे का दबाव।
कामिनी का दिमाग सुन्न हो गया।
"रघघघघु.... बस.... मार डालेगा.... उफ्फ्फ्फ.... रुक जा मै मर जाउंगी, ऊँगली बहार निकाल...न.... आह्ह्ह....आउच... उफ्फ..."
कामिनी का शरीर खटिया पर पागलों की तरह पटकने लगा। अपने बालो को पकड़ नोंचने लगी, 
और फिर...
"सर्रर्रर्रर्र............पप्पीस्स्स..... पीस्स्स्स.... !!"
कामिनी तीसरी बार झड़ गई। m-ldpwiqacxt-E-Ai-mh-FXo-Za8-To6-TOx7-u3-45810781b
इस बार का ऑर्गेज्म (Orgasm) इतना भयानक था कि कामिनी की आंखों के सामने अंधेरा छा गया। उसका शरीर अकड़ गया, पैरों की उंगलियां मुड़ गईं और मुंह से लार टपकने लगी। वह किसी लाश की तरह खटिया पर निढाल पड़ गई। उसकी जांघें थर-थर कांप रही थीं, जैसे उनमें जान ही न बची हो।


कामिनी का रस पीते-पीते रघु के शरीर ने भी जवाब दे दिया।
शराब का नशा, कामिनी का पेशाब और अत्यधिक उत्तेजना—इन सबने मिलकर रघु के दिमाग की बत्ती गुल कर दी।
वह कामिनी के ऊपर चढ़ने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसका संतुलन बिगड़ गया।
"धड़ाम...!"
वह खटिया से नीचे लुढ़क गया और ज़मीन पर ओंधे मुंह गिर पड़ा।
उसका शरीर एक बार फड़फड़ाया और फिर शांत हो गया।
वह बेहोश हो चुका था। गहरा नशा उसे अपनी आगोश में ले चुका था। अब वह सिर्फ़ मांस का एक बेजान लोथड़ा था जो ज़मीन पर पड़ा खर्राटे ले रहा था।


कमरे में सिर्फ़ कामिनी की उखड़ी हुई सांसों की आवाज़ थी।
करीब 15 मिनट तक कामिनी उसी अवस्था में खटिया पर पड़ी रही—नंगी, चिपचिपी और बेसुध।
धीरे-धीरे उसकी धड़कनें सामान्य हुईं। दिमाग से हवस का कोहरा छंटने लगा।
उसने अपनी आँखें खोलीं।
सामने पीला बल्ब जल रहा था। नीचे ज़मीन पर रघु पड़ा था।
कामिनी हड़बड़ा कर उठ बैठी।
"हे भगवान... यह मैं कहाँ हूँ? मैंने यह क्या किया?"
उसने अपने जिस्म को देखा।
वह पूरी तरह नंगी थी।
उसका महंगा ब्लाउज फटकर चिथड़े हो चुका था। उसका पेटीकोट दूर कोने में पड़ा था। उसकी साड़ी के टुकड़े ज़मीन पर बिखरे थे।
उसका गोरा बदन रघु के थूक, लार, पसीने और उसके खुद के रसों से सना हुआ था। जगह-जगह रघु के दांतों के लाल निशान थे।
अचानक, एक ठंडी सिहरन (Chill) उसकी रीढ़ की हड्डी में दौड़ गई।

"डर...!"
कामवासना उतरते ही हकीकत का खौफनाक चेहरा सामने आ गया।
'अगर कोई आ गया तो? अगर रमेश या शमशेर की नींद खुल गई और वो नीचे आ गए तो?'
'मैं घर के अंदर कैसे जाऊंगी? मेरे पास तो तन ढकने के लिए एक कपड़ा भी नहीं है।'

कामिनी का गला सूख गया। वह घबराहट में कांपने लगी। एक 'चोर' की तरह उसकी नज़रें चारों तरफ भागने लगीं।
उसने फटे हुए पेटीकोट को उठाया, लेकिन वह इतना फट चुका था कि उससे कुछ नहीं ढक सकता था।
उसकी हालत उस मुजरिम जैसी थी जो कत्ल करने के बाद लाश के पास खड़ा हो और पुलिस सायरन की आवाज़ सुन ले।

कामिनी ने खुद को संभाला। उसने सोचा कि अंधेरे का फायदा उठाकर वह दौड़कर घर के पिछले दरवाज़े से घुस जाएगी।
उसने धीरे से स्टोर रूम का दरवाज़ा खोला।
बाहर गहरा अंधेरा था और सन्नाटा पसरा हुआ था।
कामिनी ने अपना नंगा बदन सिकोड़ लिया। उसने अपने दोनों हाथों से अपने स्तनों और योनि को ढकने की नाकाम कोशिश की।
उसने एक कदम बाहर रखा।
उसकी धड़कनें कानों में हथौड़े की तरह बज रही थीं।
उसने पहला कदम बढ़ाया ही था कि...
अंधेरे में से, स्टोर रूम की खिड़की की दीवार से सटकर खड़ा एक साया उसके सामने आ गया।
कामिनी की चीख गले में ही घुट गई। उसका दिल बंद होने को हो गया।
सामने कोई खड़ा था।
चांदनी की हल्की रोशनी उस साये के चेहरे पर पड़ी।
वह बंटी था।
कामिनी का बेटा।
वह वहां कब से खड़ा था? उसने क्या देखा? उसने क्या सुना?
कामिनी के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। वह अपने ही बेटे के सामने, घर के बगीचे में, पूरी तरह नग्न (Stark Naked) खड़ी थी। उसके बाल बिखरे थे, जिस्म पर काटने के निशान थे और जांघों पर काम-रस, वीर्य और थूक की परतें चढ़ी थीं।

वह भागना चाहती थी, लेकिन उसके पैर ज़मीन में गड़ गए थे। वह मर जाना चाहती थी।
बंटी के चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं था, कोई हैरानी नहीं थी। उसका चेहरा भावहीन (Expressionless) था, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी गहराई थी।
उसने अपने हाथ आगे बढ़ाए।
उसके हाथों में कामिनी का वही सिल्की गाउन था जो कामिनी अक्सर रात को पहनती थी।
बंटी कामिनी के बिल्कुल पास आया।
उसने वह गाउन कामिनी की तरफ बढ़ाया और बहुत ही शांत, लेकिन कड़क आवाज़ में कहा—
"ये लो माँ... इसे पहन लो। ठंड लग जाएगी।"
कामिनी की रूह कांप गई।
उसका बेटा... उसके लिए कपड़े लेकर बाहर खड़ा था, जबकि वह अंदर नौकर से चुदवा रही थी। इसका मतलब साफ़ था—बंटी सब जानता था। वह खिड़की के पास खड़ा सब सुन रहा था, शायद देख भी रहा था।
कामिनी ने कांपते हाथों से वह गाउन थाम लिया। उसकी नज़रों में शर्म, डर और एक अंतहीन सवाल था।
बंटी वहीं खड़ा था, अपनी नंगी माँ को ऊपर से नीचे तक निहारता हुआ।

क्रमशः.....


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2 Comments

  1. Mast update bhai Kamini aur raghu ka jodi mast hai raghu ko banti ka dusra baap aur Kamini ka asli mard bana do

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  2. बहुत कामुक और रोचक update thaa uffff update paddke पूरे बदन में sansanaht फैल गई eayse ही update दिया karo bhout मज़ा आया दो बूंदे चासनी की tapak पडी....🥰

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