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मेरी माँ कामिनी -22

मेरी माँ कामिनी - भाग 22


रात का सन्नाटा गहरा था, लेकिन कामिनी के मन में जो तूफ़ान चल रहा था, वह किसी भी शोर से ज्यादा भयानक था। वह अपने जवान बेटे के सामने, घर के आंगन में, पूरी तरह निर्वस्त्र खड़ी थी। उसके हाथ में बंटी का दिया हुआ वह गाउन था, लेकिन उसके हाथ इतने कांप रहे थे कि वह उसे पहन नहीं पा रही थी।

उसका गोरा बदन, जो अभी कुछ पल पहले हवस की आग में तप रहा था, अब शर्म और डर के मारे बर्फ जैसा ठंडा पड़ गया था। उसके स्तनों पर रघु के दांतों के लाल-नीले निशान चाँदनी रात में साफ़ चमक रहे थे। 

उसकी जांघों पर वीर्य और काम-रस की सूखी हुई लकीरें गवाही दे रही थीं कि वह किस 'नर्क' से होकर आई है।
बंटी ने देखा कि उसकी माँ बुत बनी खड़ी है।
उसने कोई शब्द नहीं कहा। उसने धीरे से कामिनी के हाथों से वह गाउन ले लिया।
बंटी एक कदम आगे बढ़ा।
कामिनी की सांसें अटक गईं। उसे लगा बंटी उसे धिक्कारेगा, शायद थप्पड़ मारेगा या चीखकर सबको इकट्ठा कर लेगा।

लेकिन नहीं, बंटी ने ऐसा कुछ नहीं किया।
उसने बड़े ही सलीके और सम्मान से उस गाउन को खोला और कामिनी के नंगे कंधों पर डाल दिया।
जैसे कोई रक्षक किसी अबला को ढक रहा हो।

बंटी के हाथ कामिनी के नंगे बाज़ुओं से छू गए। वह स्पर्श गर्म था, जीवित था।
"हाथ डालो माँ..." बंटी ने बहुत ही धीमी और शांत आवाज़ में कहा।
कामिनी ने मशीनी अंदाज़ में (Mechanically) अपनी बाहें गाउन की आस्तीन में डाल दीं।
बंटी ने उसे पलटाया नहीं, वह उसके सामने खड़ा रहा।
गाउन अभी भी आगे से खुला था।
बंटी की नज़रें कामिनी के खुले हुए सीने पर थीं, जहाँ रघु ने वहशियत से काटा था। उन निशानों को देखकर बंटी की आँखों में एक पल के लिए अंधेरा छाया, लेकिन फिर एक समझदारी भरी चमक आ गई।

उसने अपने हाथों से गाउन के बटन लगाने शुरू किए।
उसकी उंगलियां कामिनी की छाती के पास हरकत कर रही थीं।
पहला बटन... दूसरा बटन...
जब वह बीच के बटन लगा रहा था, तो उसकी उंगलियां कामिनी के स्तनों के बीच की घाटी (Cleavage) से रगड़ खा गईं, जहाँ रघु का थूक अब सूखकर पपड़ी बन चुका था।

कामिनी सिहर उठी। उसने अपनी नज़रें झुका लीं।
"ब-बंटी... मैं..." उसका गला रुंध गया। वह बोलना चाहती थी, सफाई देना चाहती थी।
"शश्श्श..." बंटी ने उसके होंठों पर उंगली रख दी।
"कुछ मत बोलो माँ। चलो अंदर चलते है, ठण्ड बहुत है ।"
बंटी ने उसका हाथ पकड़ा। एक बेटे की तरह नहीं, एक मर्द की तरह—मज़बूत और अधिकार भरा।
वह उसे पिछले दरवाज़े से, अंधेरे गलियारे से होते हुए, सीधे उसके बेडरूम में ले आया।

कमरे में एसी की ठंडक थी, लेकिन माहौल भारी था।
बंटी ने कामिनी को बिस्तर के किनारे बिठाया। कामिनी सिर झुकाए बैठी थी, आंसू उसकी आँखों से टपक कर उसकी गोद में गिर रहे थे।

बंटी उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया।
उसने कामिनी के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए।
"रो क्यों रही हो माँ?" बंटी ने पूछा।

"म-मैंने... मैंने पाप किया है बंटी... मैं बहुत गंदी हूँ... मुझे मर जाना चाहिए..." कामिनी सिसकते हुए फूट पड़ी। "अपने बेटे के सामने... उफ्फ्फ..."
बंटी ने उसके हाथों को कसकर दबाया।

"पाप?" बंटी की आवाज़ में एक कड़वी हंसी थी। "पाप तो इस घर में रोज़ होता है माँ, बस देखने वाला कोई नहीं था।"
कामिनी ने चौंककर सिर उठाया। बंटी की आँखों में एक अजीब सी परिपक्वता (Maturity) थी, जो उसकी उम्र से कहीं ज्यादा थी।

"तुम्हें क्या लगता है माँ? मुझे कुछ पता नहीं है?" बंटी ने बोलना शुरू किया, और उसके हर शब्द के साथ कामिनी की रूह कांपती गई।

"मैं बच्चा था जब मैंने पहली बार पापा को तुम्हें बेल्ट से मारते हुए देखा था। मैं तब डर गया था, रजाई में छुपकर रोता था। लेकिन जैसे-जैसे मैं बड़ा हुआ... मैंने सिर्फ़ मार नहीं देखी माँ, मैंने तुम्हारी वो 'घुटन' देखी है।"
बंटी की आवाज़ भारी हो गई।

"मैंने देखा है तुम्हें... कैसे तुम रसोई में काम करते-करते अपनी कमर पकड़कर खड़ी हो जाती हो। कैसे तुम पापा के ऑफिस जाने के बाद घंटों आईने के सामने अपने खालीपन को घूरती हो। मैंने तुम्हारी आँखों में वो प्यास देखी है माँ... जो पापा कभी बुझा नहीं पाए।"
कामिनी सन्न रह गई। उसका बेटा उसे इतना गौर से देखता था?

"पापा... वो तो तुम्हें सिर्फ़ एक 'चीज़' समझते हैं। दिन में नौकरानी, और रात को..." बंटी रुका, फिर कड़वाहट से बोला, "रात को अपनी हवस मिटाने का ज़रिया। वो तुम्हें प्यार नहीं करते माँ, वो तुम्हें इस्तेमाल करते हैं। और जब उनका मन भर जाता है, तो वो तुम्हें ऐसे छोड़ देते हैं जैसे कोई निचोड़ा हुआ नींबू हो।"

कामिनी की आँखों से आंसुओं की धार बह निकली। यह सच था। कड़वा सच।
बंटी ने कामिनी के घुटनों पर हाथ रखा।
जब से रघु घर मे आया है, आपको जीने की उम्मीद दिखी, मैंने आपको बदलता देखा, आपके चेहरे का नूर वापस लौटने लगा है माँ.
मुझे नहीं पता रघु आपको कैसा लगता है, वो गन्दा है या अच्छा मुझे नहीं पता, मै औरत नहीं हूँ, शायद आप की नजर मे मर्द रघु होता है, एयर मर्द सिर्फ चेहरे से सुंदर हो जरुरी नहीं"

"और आज... आज मैंने तुम्हें छत पर रवि के साथ देखा।"
कामिनी का दिल धक से रह गया।
"घबराओ मत," बंटी ने तुरंत कहा। "मैंने देखा कि तुम खुश थी। सालों बाद मैंने तुम्हारे चेहरे पर वो चमक देखी थी। तुम रवि के साथ 'जिंदा' लग रही थी माँ।"
बंटी ने कामिनी की आँखों में गहराई से झांका।
"और अभी... रघु के पास..."
बंटी ने कामिनी के गाउन के ऊपर से, उसके स्तन पर लगे उस नीले निशान को हल्के से छुआ।

"ये निशान... ये दर्द नहीं है माँ। ये तुम्हारी आज़ादी का सबूत है। तुम्हें ये चाहिए था ना? वो वहशीपन? वो पागलपन? पापा सिर्फ दर्द देते है आपको, दर्द के साथ जो प्यार सुकून चाहिए शायद वो आपको रघु से मिला"

कामिनी कांप उठी। उसका बेटा उसके जिस्म की सबसे गहरी और गंदी ज़रूरत को पढ़ रहा था। वो हैरान थी की इसका अपना बेटा बंटी उसे कितनी अच्छी तरह से जनता है, वो तो कभी खुद को अवस्था को किसी को बतला भी नहीं पाती, इन सब के लिए शब्द ही कहाँ होते है.

"हाँ..." कामिनी के मुंह से अनजाने में निकल गया। "हाँ बंटी... मैं थक गई थी... घुट-घुट कर..., जब से रघु आया, मैंने उसके... उसके... कामिनी कुछ कहना चाहती थी 
"लंड को देखा " बंटी ने बड़ी ही बेबाकी से कामिनी के गले मे फसे शब्द को पूरा किया.
"अअअ... हाँ... गड़ब.... उस दिन से मेरे जिस्म मे कुछ होने लगा, एक आग सी जलने लगी, वो शराबी है, गन्दा है लेकिन पता नहीं क्यों मुझे आकर्षक लगा, पता नहीं मै कैसी औरत हूँ " कामिनी ने आंख उठा बंटी को देखा उसकी आँखों मे आंसू थे.

"इसमें रोना कैसा माँ?, आप अच्छी माँ हो मेरे लिए बस इतना ही काफ़ी है " बंटी खड़ा हो गया।

 उसने कामिनी के चेहरे को अपने हाथों में ले लिया और उसके आंसू पोंछे।
"तुम सिर्फ़ एक 'माँ' नहीं हो। तुम एक औरत भी हो। हाड़-मांस की बनी एक औरत, जिसकी अपनी जरूरतें हैं, अपनी भूख है। अगर पापा वो भूख नहीं मिटा सकते, और तुम बाहर उसका इलाज ढूंढ रही हो... तो इसमें कोई पाप नहीं है माँ।"
बंटी के ये शब्द कामिनी के ज़ख्मों पर मरहम की तरह लगे।

उसे लगा था कि उसका बेटा उसे 'कुलटा' कहेगा, उसे घर से निकाल देगा, रमेश को सब बता देगा, लेकिन यहाँ तो उसका बेटा उसका वकील बन गया था। वह उसे समझ रहा था।

कामिनी की आँखों में जो आंसू थे, अब वे शर्म के नहीं, बल्कि एक अजीब सी 'राहत' के थे। उसे लगा जैसे उसका कोई अपना है, जो उसे उसके 'काले सच' के साथ भी स्वीकार कर रहा है।

"बंटी..." कामिनी का गला भर आया।
वह बिस्तर से उठी और बंटी के गले लग गई।
उसने अपने बेटे को कसकर भींच लिया।
उसका गाउन अभी भी पतला था, और उसके नीचे उसका बदन नंगा और गीला था।
जब उसने बंटी को गले लगाया, तो उसके भारी, आज़ाद स्तन बंटी की छाती में दब गए।
रघु की लार और कामिनी का पसीना बंटी की टी-शर्ट में समाने लगा।
लेकिन न बंटी पीछे हटा, न कामिनी।

"तू... तू इतना बड़ा कब हो गया रे?" कामिनी बंटी को अपने सीने मे दबा रोने लगी। "तूने अपनी माँ को पहचान लिया..."
बंटी ने अपने हाथ कामिनी की पीठ पर फेरे।
"मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ माँ," बंटी ने उसके कान में फुसफुसाया। "चाहे तुम कुछ भी करो... चाहे तुम किसी के भी साथ रहो। अगर तुम्हें खुशी मिलती है, तो मुझे मंजूर है।"

कामिनी को एक अजीब सा सुकून मिला। माँ बेटे के बीच समझादरी का रिश्ता पनप चूका था, 

बंटी ने कामिनी को अलग किया।
कामिनी ने अपने अस्त-व्यस्त बालों और कपड़ो को ठीक किया, उसके स्तन गाउन से बहार सरक आये थे, जिसे जल्दी से ठीक करना चाहा.
"मै तो देख ही चूका हूँ माँ, मुझसे क्या छुपाना " बंटी ने चुटकी लेते हुए कहाँ.
"हट बदमाश... माँ पर बुरी नजर रखता है " कामिनी ने बंटी के कान पकड़ लिए.
"स... Sorry... माँ लेकिन आप जैसी सुंदरी हो तो देखने मे क्या बुराई है "
"बिगड़ गया है तु बहुत " कामिनी ने कान ऐंठ दिए, लेकिन गाउन को ठीक नहीं किया, उसके स्तन बंटी के सामने ही झूल थे, 

"अच्छा.. अच्छा...अब जाओ... नहा लो," बंटी ने उसकी नाक को प्यार से छुआ। "बहुत गंदी हो रही हो। रघु की बदबू आ रही है तुमसे।"
उसकी आवाज़ में कोई घिन नहीं थी, बल्कि एक अजीब सा 'रोमांच' था।
"मैं... मैं अभी नहाती हूँ," कामिनी ने सिर हिलाया।
वह बाथरूम की तरफ मुड़ी। 

बंटी की नज़रें अपनी माँ के गाउन के नीचे से हिलती हुई गांड पर टिक गईं, और हाथ पैंट मे बने उभार को सहलाने लगा.
बंटी दुनियादारी की बात तो कर गया, लेकिन अभी भावना खुल के नहीं बता सका.
बंटी खुद के सर पर टल्ली मार के हस पड़ा, उसे अपने दिल मे एक अजीब सी ठंडक महसूस हुई, अब उसे चोरी छिपे अपनी माँ को देखने की जहमत नहीं उठानी होगी.
बंटी बिस्तर के आगोश मे समा गया.
*******************


सुबह के 10 बज चुके थे। रमेश और शमशेर नाश्ता करके अपने-अपने काम पर निकल गए थे। घर में अब सिर्फ़ कामिनी और बंटी थे।
कामिनी आज सचमुच दमक रही थी। लाल साड़ी और स्लीवलेस ब्लाउज मे कामिनी कामदेवी लग रही थी, 
कल रात की थकान के बावजूद, उसके चेहरे पर एक अजीब सा निखार था। यह निखार शायद इसलिए था क्योंकि बरसों बाद घर में कोई ऐसा था—उसका अपना बेटा बंटी—जो उसकी फ़िक्र करता था, जो उसे जज नहीं कर रहा था।
कामिनी रसोई में काम कर रही थी, लेकिन उसका ध्यान बार-बार खिड़की से बाहर स्टोर रूम की तरफ जा रहा था।

दरवाज़ा अभी भी बंद था। रघु बाहर नहीं आया था।
कामिनी के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं। 'इतनी देर तो कभी नहीं सोता वो... कहीं कल रात ज्यादा...'
उसने चाय का कप ट्रे में रखा और हॉल में बैठे बंटी को आवाज़ दी।
"बंटी... अरे बंटी... सुन तो।"
बंटी टीवी देख रहा था, उसने मुड़कर देखा।
"क्या हुआ माँ?"
"वो रघु... अब तक उठा नहीं। देख तो ज़रा, घर पर है भी या नहीं? यह चाय उसे दे आ।"
बंटी ने बिना कोई सवाल किए ट्रे उठाई और स्टोर रूम की तरफ चल दिया।
कामिनी उसे जाता देखती रही।
बंटी स्टोर रूम के पास पहुंचा। दरवाज़ा हल्का सा खुला था (जो कामिनी ने रात को छोड़ा था)।
उसने पैर से दरवाज़ा धकेला और अंदर कदम रखा।
लेकिन जैसे ही उसकी नज़र अंदर के नज़ारे पर पड़ी...
"छनन्न....!!"
उसके हाथ से चाय का कप छूटकर ज़मीन पर गिर गया। गरम चाय और कांच के टुकड़े फर्श पर बिखर गए।
स्टोर रूम का नज़ारा किसी क्राइम सीन से कम नहीं था।
ज़मीन पर कामिनी की काली साड़ी के टुकड़े, फटा हुआ ब्लाउज और पेटीकोट के चीथड़े बिखरे पड़े थे—कल रात की वहशियत के सबूत।

लेकिन बंटी को जिस चीज़ ने चौंकाया, वह यह नहीं था।
उसने देखा कि रघु... वह हट्टा-कट्टा इंसान... अभी भी उसी जगह, खटिया के नीचे नंगा फ़र्श पर ओंधे मुंह पड़ा था।
बिल्कुल वैसे ही जैसे रात को गिरा था।
उसके शरीर में कोई हरकत नहीं थी।
बंटी का दिल ज़ोर से धड़का। वह तुरंत पीछे मुड़ा और घर की तरफ भागा।

"माँ... माँ...!"
कामिनी रसोई से दौड़कर बाहर आई। "क्या हुआ? क्यों चिल्ला रहा है?"
"माँ... वो... वो रघु..." बंटी की सांस फूल रही थी।
 "वो उठ नहीं रहा। बिल्कुल हिल भी नहीं रहा।"
कामिनी का दिल धक से बैठ गया।

दिमाग में बुरे ख्यालों का तूफ़ान आ गया।
'कहीं... कहीं वो मर तो नहीं गया? कल रात की शराब... या फिर मेरे साथ जो हुआ...'
उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया। "क्या बोल रहा है?"
बिना एक पल गंवाए, दोनों माँ-बेटे नंगे पैर स्टोर रूम की तरफ भागे।
कामिनी सबसे पहले अंदर घुसी।
उसने बिखरे हुए कपड़ों पर ध्यान नहीं दिया, वह सीधे रघु के पास घुटनों के बल बैठ गई।
रघु बेहोश पड़ा था। उसका विशाल शरीर पसीने में लथपथ था।
कामिनी ने कांपते हाथों से रघु के माथे को छुआ।
"ह्ह्क...!"
कामिनी ने झटके से हाथ पीछे खींच लिया।
"हे भगवान... बंटी... इसका जिस्म तो तवे की तरह तप रहा है! इसे तो बहुत तेज़ बुखार है।"
रघु की सांसें तेज़ चल रही थीं। वह कोमा जैसी हालत में था, लेकिन उसका दिमाग अभी भी कहीं और ही अटका था।
वह बुखार की तपिश में बड़बड़ा रहा था।
"सुगना... पानी... सुगना... मत जा... सुगना..."
उसकी आवाज़ फटी हुई और दर्दनाक थी। वह अभी भी अपनी मरी हुई बीवी को पुकार रहा था, या शायद कामिनी को, जिसे उसने रात भर 'सुगना' समझा था।

कामिनी की आँखों में आंसू आ गए। एक अजीब सी ममता और डर उसके दिल में उमड़ आया। यह आदमी, जिसने कल रात उसे जानवरों की तरह नोचा था, आज एक बेबस बच्चे की तरह पड़ा था।
"माँ... क्या करें?" बंटी भी घबरा गया था। "पापा को फोन करें?"

"नहीं!" कामिनी ने लगभग चीखते हुए कहा। "पापा को क्या बोलेंगे, उल्टा इसे बहार फेंक देंगे, उनमे दया नाम की चीज होती तो ये सब थोड़ी ना होता!"

कामिनी ने एक पल सोचा। उसे एक फैसला लेना था।
"बंटी... जल्दी जा," कामिनी ने आदेश दिया। "बाहर से ऑटो बुलाकर ला। हम इसे हॉस्पिटल लेकर चलेंगे।"

"लेकिन माँ... पापा?"
"पापा की चिंता मत कर, मैं देख लूंगी। तू बस ऑटो ला... जल्दी!"

कामिनी की आवाज़ में एक नई ताकत थी—एक मालकिन की नहीं, एक ऐसी औरत की जो अपने 'मर्द' (भले ही वो नौकर हो) को मरते हुए नहीं देख सकती थी।

बंटी सिर हिलाकर गेट की तरफ दौड़ पड़ा।
कामिनी ने मुड़कर रघु को देखा। उसने अपना हाथ फिर से रघु के तपते हुए माथे पर रखा और उसके पसीने से भीगे बालों को सहलाया।
"कुछ नहीं होगा तुझे... मैं हूँ ना," वह धीरे से फुसफुसायी।
रघु ने उसकी ठंडी हथेली महसूस की और नींद में ही अपना गाल कामिनी के हाथ पर रगड़ दिया।
"सुगना..."
****************


दोपहर के 12:15 हो रहे थे। अस्पताल के जनरल वार्ड में हल्की खामोशी थी, बस पंखे की चरमराहट और मशीनों की "बीप-बीप" की आवाज़ आ रही थी।
रघु के बिस्तर के पास लोहे के स्टैंड पर ग्लूकोज़ की बोतल टंगी थी, जिससे बूंद-बूंद करके दवा उसकी नसों में उतर रही थी।

बिस्तर के एक तरफ कामिनी स्टूल पर बैठी थी, और दूसरी तरफ बंटी खड़ा था। दोनों के चेहरों पर थकान थी, लेकिन सुकून भी था कि रघु खतरे से बाहर है।

करीब एक घंटे बाद, रघु के शरीर में हरकत हुई।
उसकी पलकें भारी थीं, जैसे अभी भी नींद का नशा बाकी हो। उसने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं।
उसे सबसे पहले अस्पताल की सफ़ेद छत दिखाई दी, फिर दवाइयों की तीखी गंध नाक में गई।
रघु का दिमाग सुन्न था। 'मैं कहाँ हूँ? क्या हुआ था?'
उसने अपना सिर घुमाया।
और जैसे ही उसकी धुंधली नज़र साफ़ हुई, उसने अपने बगल में कामिनी और बंटी को देखा।
कामिनी... उसकी मालकिन... जो किसी देवी की तरह उसके सिरहाने बैठी थी। उसकी आँखों में चिंता थी।
और बंटी... छोटा मालिक... जो संजीदगी से उसे देख रहा था।
रघु की आँखों में एकदम से पानी भर आया।
एक गरीब नौकर के लिए यह बहुत बड़ी बात थी। मालिक लोग तो नौकरों के मरने पर भी नहीं आते, और यहाँ ये दोनों उसे अस्पताल लेकर आए, उसके सिरहाने बैठे रहे।
रघु का गला भर आया। उसे अपनी औकात और उनका अहसान दोनों याद आ गए।
वह उठने की कोशिश करने लगा।
"म-मालकिन... छोटे मालिक..." उसकी आवाज़ फटी हुई और कमज़ोर थी।
उसने हाथ जोड़ने की कोशिश की, लेकिन उसके हाथ में कैनुला (दवा की सुई) लगी थी।
"अरे... अरे... लेटे रहो," कामिनी ने तुरंत झुककर उसके कंधे पर हाथ रखा और उसे वापस लिटा दिया।
"बंटी जा थोड़ा जूस ले आ "

उसका स्पर्श...
जैसे ही कामिनी का हाथ रघु के कंधे पर लगा, रघु के दिमाग में बिजली कौंध गई।

रघु की आँखों के सामने कल दिन की घटना और रात की धुंधली तस्वीर चलने लगी.
स्टोर रूम... शराब... सुगना...
नहीं! वो सुगना नहीं थी।
रघु की नज़रें कामिनी के चेहरे पर टिक गईं।
वही खुशबू... वही मखमली त्वचा... वही भारी स्तन...
रघु का दिल जोर से धड़का।
उसे याद आया कि कल रात उसने जिसे "सुगना" समझकर बाहों में भरा था, जिसके होठों को जानवरों की तरह चूसा था, जिसके स्तनों को काटा था और जिसकी चूत का पानी पिया था...
वह कोई और नहीं, यही कामिनी मालकिन थीं!

रघु का चेहरा डर के मारे पीला पड़ गया। कृतज्ञता (Gratitude) की जगह अब दहशत ने ले ली।
'हे भगवान! मैंने मालकिन के साथ... मैंने उनका ब्लाउज फाड़ा... अपना लंड चूसने पर मजबूर किया..'

उसे लगा अब उसकी खैर नहीं। अब पुलिस आएगी, या कुछ बुरा होने वाला है.
वह कांपने लगा। उसकी आँखों से आंसू बहने लगे।
"माफ़ कर दो मालकिन... मुझसे पाप हो गया... मुझे नहीं पता था... मैं शराब और हवास के नशे में था... मुझे पुलिस को दे दो..." रघु सिसकने लगा।

कामिनी ने रघु की घबराहट को समझा।
उसने इधर-उधर देखा कि कोई सुन तो नहीं रहा। फिर उसने रघु का हाथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया।
"शांत हो जा रघु... शांत," कामिनी ने बहुत ही प्यार से कहा। उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं, बल्कि एक अजीब सा अपनापन था।

रघु ने हैरान होकर कामिनी को देखा।
कामिनी की आँखों में कोई शिकायत नहीं थी। बल्कि, एक गहरी चमक थी—वही चमक जो कल रात स्टोर रूम में थी जब वह अपनी टांगें फैलाकर लेटी थी।

"तूने कुछ गलत नहीं किया रघु," कामिनी ने धीरे से कहा, ताकि सिर्फ़ रघु और बंटी सुन सकें। "तू बीमार था... नशे में था। और कल रात... कल रात जो हुआ, वो हम दोनों की रज़ामंदी थी।"

रघु के आंसू बहे जा रहे थे, उसने ऐसा अपनापन कभी महसूस नहीं किया था, 

"अब चुपचाप आराम कर। डॉक्टर ने कहा है कमज़ोरी है। जब ड्रिप खत्म हो जाएगी, हम घर चलेंगे।"

तब तक बंटी भी जूस ले आया था, जिसे रघु एक सांस मे पी गया, जूस का पेट मे जाना था की राहत महसूस हुई.
रघु बिस्तर पर पड़ा छत को घूरने लगा।

उसकी नसों में ग्लूकोज़ के साथ-साथ अब एक नई वफादारी भी दौड़ रही थी.
उसने मन ही मन कसम खाई— 'मालकिन ने कभी जान भी मांगी , तो दे दूंगा।"
*****************


हॉस्पिटल के जनरल वार्ड में दोपहर की सुस्ती छाई हुई थी। ग्लूकोज़ की बोतल खाली हो चुकी थी और नर्स ने रघु के हाथ से सुई निकाल दी थी।
कामिनी ने राहत की सांस ली। उसने अपने पर्स से दवाइयों की पर्ची निकाली और बंटी की तरफ बढ़ाया।

"बंटी, तू डिस्चार्ज के पेपर साइन कर दे, मैं रघु को लेकर गेट पर आती हूँ," कामिनी ने कहा।
रघु अभी भी कमजोरी महसूस कर रहा था, लेकिन मालकिन का साथ पाकर उसके चेहरे पर सुकून था। वह धीरे-धीरे बिस्तर से नीचे उतर रहा था। कामिनी नीचे रखा बैग कपड़े पकड़ाने ही वाली थी कि तभी...

वार्ड के सन्नाटे को चीरती हुई एक भारी, कर्कश और मर्दाना आवाज़ गूंज उठी।
"अबे साले... क्या हो गया तुझे? आज दिन में ठेके पर नहीं आया? मैं साला पूरी दुनिया में ढूंढ रहा हूँ और तू यहाँ एसी की हवा खा रहा है?"
कामिनी और बंटी दोनों चौंक गए। उन्होंने दरवाजे की तरफ देखा।
वार्ड के दरवाजे को लगभग धकेलते हुए एक हट्टा-कट्टा, लगभग 6 फीट लंबा इंसान धड़-धड़ाता हुआ अंदर घुस आया।

उसका हुलिया किसी भी शरीफ इंसान जैसा नहीं था।
उसने एक मैला-कुचैला सफ़ेद (जो अब मटमैला हो चुका था) कुर्ता-पाजामा पहन रखा था। कुर्ते की आस्तीन ऊपर मुड़ी हुई थी, जिससे उसकी कलाई पर बंधा काला धागा और बाज़ुओं के घने बाल दिख रहे थे।

सबसे डरावनी बात यह थी कि उसके कुर्ते पर जगह-जगह ताज़े और सूखे हुए लाल छींटे (खून के धब्बे) लगे थे—जैसे वह अभी-अभी किसी बकरे को काट कर आ रहा हो।
रघु उसे देखते ही हड़बड़ा गया। उसने शर्मिंदा होकर अपनी नज़रें झुका ली।

"क-कादर भाई... तुम?"
वह शख्स, कादर खान, रघु के बिस्तर तक डग भरता हुआ आया। उसके चलने में एक अजीब सी लचक और गुंडागर्दी थी।
पास आते ही एक अजीब सी तीखी गंध ने कामिनी को घेर लिया।

यह गंध थी—कड़क तंबाकू, मीठे पान, सड़ी हुई देसी शराब और पसीने की।
कादर के मुंह में पान का बीड़ा ठुंसा हुआ था, जिससे उसके होंठ लाल हो रहे थे।
कादर ने रघु की पीठ पर एक जोरदार धौल (Thump) जमाई।

"साले... मैंने सुना बंगले वाली मैडम तुझे उठा के लाई हैं," कादर ने अपनी लाल आँखों को नचाया।
और फिर... उसकी नज़र रघु से हटकर बगल में खड़ी कामिनी पर जा टिकी।
कामिनी उस वक़्त थोड़ी झुकी हुई थी, रघु का सामान समेट रही थी। उसका पल्लू कंधे से हल्का सरका हुआ था।
कादर की नज़रें कामिनी के चेहरे से शुरू होकर सीधे नीचे फिसलीं और उसके ब्लाउज के डीप नेक (Deep Neck) पर जाकर अटक गईं।

कामिनी के गोरे, भरे हुए स्तनों की घाटी वहां से साफ़ झांक रही थी।
कादर ने पान को मुंह के एक कोने में दबाया और एक गंदी, कामुक मुस्कान दी।

"सलाम मैडम जी..."
उसकी आवाज़ में इज़्ज़त कम और हवस ज्यादा थी।
उसने कामिनी को सिर्फ़ देखा नहीं, बल्कि अपनी नज़रों से 'चाटा'। उसकी आँखें कामिनी के ब्लाउज के कपड़े को भेदकर अंदर के मांस को तौल रही थीं।
कामिनी को लगा जैसे किसी ने उस पर चिपचिपा कीचड़ फेंक दिया हो। वह सिहर उठी।

"रघु..." कादर ने कामिनी के स्तनों से नज़रें हटाए बिना कहा, "यही हैं क्या तेरी मालकिन?"

रघु घबरा गया। "हहह... हाँ.. कादर भाई। मालकिन, ये कादर खान है... पुराना दोस्त है मेरा। गोश्त (Meat) का काम करता है।"

कामिनी ने कादर खान को ऊपर से नीचे तक देखा।
एक जंगली जानवर जैसा मर्द। कुर्ते पर खून के धब्बे, गले में काला ताबीज़, और वो बदबू...
कामिनी ने अपनी साड़ी का पल्लू कसकर अपने सीने पर लपेटा और अपनी नाक सिकोड़ ली।

"स... ससससस...लल्ल..... नमस्ते," कामिनी ने बहुत मुश्किल से कहा। उसे उस आदमी से घिन आ रही थी, लेकिन साथ ही उसके पेट के निचले हिस्से में एक अजीब सी गड़बड़ाहट भी हो रही थी। उसकी वो घूरती हुई आँखें कामिनी को नंगा कर रही थीं।
कादर समझ गया कि मैडम असहज हो रही हैं, और उसे इसमें मज़ा आया।

उसने रघु की तरफ देखा जो अभी भी बिस्तर पर बैठा था।
"उठ बे... क्या लेटा है मुर्दे की तरह?"
"पर भाई... डॉक्टर ने..." रघु ने विरोध करना चाहा।
"अबे हटा डॉक्टर को..." कादर ने ज़ोर से कहा, जिससे पान की कुछ बारीक छींटे उड़कर फर्श पर गिरे।

"इन अंग्रेजी दवाइयों से कुछ नहीं होगा तेरा। तू मर्द है, तुझे मर्दो वाला इलाज चाहिए।"
कादर ने रघु का हाथ पकड़ा और उसे एक ही झटके में बिस्तर से खड़ा कर दिया।

 रघु, जो अभी कमज़ोर लग रहा था, कादर की ताकत के आगे तिनके जैसा लगा।
"चल मेरे साथ... तेरा इलाज मेरे पास है," कादर ने एक आँख दबाई।
 "तुझे मटन-पाया का सूप पिलाऊंगा और अपनी वाली 'स्पेशल फ्रूटी' दूंगा। रात तक घोड़े की तरह हिनहिनाएगा तू।"

कादर ने 'घोड़े' शब्द बोलते वक़्त फिर से कामिनी की तरफ देखा, मानो कह रहा हो—'घोड़ा तैयार कर रहा हूँ तेरे लिए।'

रघु के चेहरे पर एक चमक आ गई। कादर की संगत और 'देसी इलाज' के नाम से ही उसकी आधी बीमारी गायब हो गई।

"ममम.. मै आता हूँ मालकिन..... कादर भाई के साथ जा रहा हूँ," रघु ने जल्दी-जल्दी कहा। वह भूल गया कि वह बीमार था।

"लेकिन रघु..." कामिनी कुछ कहती, उससे पहले ही कादर ने रघु के कंधे पर हाथ रखा और उसे लगभग घसीटते हुए वार्ड से बाहर ले जाने लगा।

जाते-जाते कादर खान एक बार फिर पलटा।
उसने अपने कुर्ते की जेब से एक छोटी डिब्बी निकाली, उसमें से पान का बीड़ा उठा मुंह में डाला और कामिनी को ऊपर से नीचे तक घूरते हुए बोला—
"फिक्र मत करो मैडम जी... आपका रघु रात तक एकदम 'कड़क' होकर लौटेगा। मशीन में तेल-पानी डालकर भेजूंगा।"

और एक भद्दी हंसी हंसते हुए वह रघु को लेकर बाहर निकल गया।
वार्ड में सन्नाटा छा गया।
कामिनी और बंटी एक-दूसरे को उल्लू की तरह देखते रह गए।

कामिनी का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। कादर की वो बदबू अभी भी उसकी नाक में बसी थी और उसकी वो गंदी बातें उसके कानों में गूंज रही थीं।
'मशीन में तेल-पानी...' कामिनी का चेहरा शर्म और उत्तेजना से लाल हो गया।

"इन लोगों का ऐसा ही है माँ," बंटी ने शांति से कहा, जैसे उसे सब पता हो। 

"ये लोग डॉक्टर से ज्यादा अपनी देसी दारू और खाने पीने पर भरोसा करते हैं।"

बंटी ने कामिनी के कंधे पर हाथ रखा।
"चलो घर चलें। रघु रात तक आ जाएगा।"
कामिनी ने बंटी की तरफ देखा, फिर खाली हुए बिस्तर की तरफ।
उसने अपना पर्स उठाया।
"हम्म्म... चलो," कामिनी बुदबुदाई।
लेकिन जब वह हॉस्पिटल से बाहर निकल रही थी, तो उसके दिमाग में रघु नहीं, बल्कि खून के छींटों वाला कादर खान और उसकी भूखी नज़रें घूम रही थीं।

(क्रमशः)


(क्रमशः)

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1 Comments

  1. Land fadu update bhai akhir Kamini ko pata chal gaya ke uska beta uska sach janta hai

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