मेरी माँ कामिनी, भाग -24
"पूँ... पूँ... पूँ...!"
हॉर्न की कर्कश आवाज़ लगातार बज रही थी।
कामिनी और बंटी एक झटके में हकीकत में लौटे।
"पापा आ गए," बंटी ने कड़े स्वर में कहा।
कामिनी ने हड़बड़ाकर अपनी साड़ी ठीक की और अपने आंसुओं को पोंछा। "चल बंटी, देख तो..."
दोनों माँ-बेटे स्टोर रूम से निकलकर तेज़ कदमों से आंगन पार करते हुए पोर्च की तरफ भागे।
लोहे का बड़ा गेट खुला हुआ था और शमशेर की पुलिस जीप हेडलाइट जलाए अंदर घुस रही थी।
जीप पोर्च में आकर एक झटके के साथ रुकी।
बंटी और कामिनी पास पहुंचे ही थे कि पैसेंजर सीट का दरवाज़ा खुला और...
"धड़ाम...!"
रमेश किसी बोरी की तरह लुढ़कता हुआ जीप से बाहर निकला और ज़मीन पर गिरने ही वाला था कि उसने दरवाज़ा पकड़ लिया। वह नशे में इतना धुत था कि अपने पैरों पर खड़ा भी नहीं हो पा रहा था।
"उफ्फ्फ... रमेश..." कामिनी दौड़कर आगे बढ़ी और रमेश का एक हाथ अपने कंधे पर रखकर उसे संभालने की कोशिश की। रमेश का पूरा भार कामिनी के नाजुक कंधों पर आ गया।
"बंटी... आ ना, मदद कर... गिर जाएंगे ये," कामिनी ने पलटकर बंटी को आवाज़ दी।
लेकिन बंटी अपनी जगह से एक इंच भी नहीं हिला।
उसकी आँखों में अपने बाप के लिए घृणा का ज्वालामुखी धधक रहा था।
अभी कुछ पल पहले उसने सुना था कि एक इंजीनियर और पुलिस वाले ने कैसे रघु की ज़िंदगी बर्बाद की थी। उसे अपने बाप के हाथों में खून नज़र आ रहा था।
"मैं हाथ नहीं लगाऊंगा इस आदमी को," बंटी ने धीरे से अपने आप मे गुर्राया,
बंटी ने एक बार शमशेर को घूरा, जिसने वर्दी पहन रखी थी (वही वर्दी जिसे रघु ने 'राक्षस' कहा था), और फिर पैर पटकता हुआ गुस्से में घर के अंदर चला गया।
इधर शमशेर, जो खुद भी नशे में झूम रहा था, ड्राइविंग सीट से उतरा।
"अरे... छोड़ो उस लौंडे को भाभीजी... इस उम्र मे लड़के अपने बाप को कहाँ कुछ समझते है," शमशेर ने अपनी बेल्ट ठीक करते हुए एक कुटिल मुस्कान दी।
"चल मैं चलता हूँ अब," शमशेर ने लड़खड़ाते हुए कहा।
"इन्हे अंदर तक तो ले चलो " कामिनी ने निरीह आवाज़ मे कहाँ, उसे अब भी अपना पत्नी होने का इल्म था.
शमशेर ने एक पल कामिनी को देखा। रात के साये में, कामिनी की अस्त-व्यस्त साड़ी और सांस फूलने से ऊपर-नीचे होता उसका सीना शमशेर की हवस को न्योता दे रहा था।
शमशेर ने कामिनी की आँखों में झांकते हुए कहा, "रुको भाभीजी, मैं मदद करता हूँ।"
शमशेर रमेश की दूसरी तरफ आया।
अब रमेश बीच में था, एक तरफ कामिनी और दूसरी तरफ शमशेर।
"एक... दो... तीन... उठाओ," शमशेर ने इशारा किया।
दोनों ने रमेश को टांग लिया और बेडरूम की तरफ बढ़ने लगे।
गलियारा संकरा था। रमेश का भारी शरीर बीच में झूल रहा था।
चलते-चलते शमशेर ने मौके का फायदा उठाना शुरू किया।
उसने रमेश की कमर को पकड़ने के बहाने अपना मोटा, खुरदरा हाथ कामिनी की कमर के पीछे फैला दिया।
उसकी उंगलियां कामिनी के ब्लाउज के नीचे, उसकी नंगी, मुलायम कमर को छूने लगीं।
कामिनी सिहर उठी। वह जानती थी कि यह गलती से नहीं हुआ।
"उफ्फ... भारी बहुत हैं..." शमशेर ने बहाना बनाया और अपनी पकड़ मज़बूत कर दी।
उसका हाथ कामिनी की कमर को कसकर दबाने लगा। वह सिर्फ सहारा नहीं दे रहा था, वह कामिनी के मांस को 'मसल' रहा था।
जैसे-जैसे वह बेडरूम की तरफ बढ़े, शमशेर का हाथ और नीचे सरकने लगा।
कामिनी की सांसें तेज़ हो गईं।
शमशेर का हाथ उसकी कमर से फिसलता हुआ नीचे आया और...
"दब...!"
शमशेर ने चलते-चलते कामिनी के भरे हुए कूल्हे (Buttock) को अपनी हथेली में भर लिया और उसे जोर से भींच दिया।
यह स्पर्श... यह पकड़... एकदम कड़क और मर्दाना थी।
कामिनी के मुंह से एक दबी हुई आह निकल गई।
"आह्ह..."
उसे गुस्सा आना चाहिए था। उसे शमशेर का हाथ झटक देना चाहिए था।
लेकिन...
उसकी आँखों के सामने कल रात का मंज़र घूम गया।
छत पर... यही शमशेर था... और उसके सामने सुनैना घोड़ी बनी हुई थी।
कामिनी ने देखा था कि शमशेर ने कैसे सुनैना को जानवरों की तरह रौंदा था, शमशेर का भारी मोटा काला लंड कामिनी की आँखों के सामने घूमने लगा,
आज वही 'जानवर' उसे छू रहा था।
कामिनी का शरीर उस स्पर्श के विरोध में अकड़ने के बजाय ढीला पड़ गया।
शमशेर की उंगलियां उसकी साड़ी के ऊपर से उसकी गांड के मांस में धंस रही थीं।
उस पुलिस वाले की वर्दी की रफनेस, उसके पसीने और शराब की गंध...
कामिनी का दिमाग सुन्न हो गया और जिस्म जाग उठा।
उसकी जांघें आपस में रगड़ खाने लगीं।
'ये हाथ... इसी हाथ ने कल सुनैना की चूत को...' कामिनी का दिमाग गंदे ख्यालों में डूब गया।
जैसे ही वे बेडरूम के दरवाज़े तक पहुंचे, शमशेर ने एक बार फिर उसकी गांड को पूरी मुट्ठी में भरकर मसला।
इस बार कामिनी की चूत ने जवाब दे दिया।
"पच..."
उसकी योनि के अंदर एक मीठी टीस उठी और काम-रस की एक गरम धार (Pre-cum) निकलकर उसकी पैंटी को भिगो गई।
कामिनी का चेहरा लाल हो गया। वह एक पराये मर्द, अपने पति के दोस्त के स्पर्श से, अपने पति को टांगते हुए ही... गीली हो गई थी।
उन्होंने रमेश को बिस्तर पर 'धड़ाम' से पटक दिया।
रमेश तुरंत बेहोश होकर पसर गया।
कामिनी और शमशेर अब बिस्तर के दोनों तरफ खड़े थे, बीच में बेहोश रमेश था।
कामिनी की सांसें फूल रही थीं, उसका पल्लू कंधे से गिर गया था और उसका सीना तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहा था।
शमशेर की लाल, शराबी आँखें कामिनी के उभरे हुए स्तनों पर गड़ी थीं।
"बहुत थक गई हो भाभी..." शमशेर ने एक कामुक मुस्कान के साथ कहा, "सांस चढ़ गई है।"
कामिनी ने अपनी जांघों को कसकर भींच लिया, जहाँ चिपचिपापन बढ़ता जा रहा था।
"माँ दरवाजा लॉक कर देना पापा अंदर आ गयें हो तो " अचानक बंटी की आवाज़ ने कामिनी को धरातल पर पटक दिया.
शमशेर भी झंझना गया, क्यूंकि बंटी की आवाज़ मे वो मासूमियत नहीं थी, गुस्सा था वो चिल्ला के बोला था.
"अअअ... अच्छा भाभीजी मै चलाता हूँ रात काफ़ी हो गई है "
शमशेर ऐसे निकला जैसे उसकी शामत आने वाली हो.
कामिनी खुद की सोच पर अफ़सोस करती रमेश को बिस्तर पर पड़ा देखती रही.
कामिनी ने झुककर रमेश के जूतों को खोलना चाहा, रमेश को टटोलते ही वो नशे में बड़बड़ाने लगा,
"सुनैना... उफ्फ्फ... क्या माल है तू..."
कामिनी का खून खौल गया। पति के मुंह से दूसरी औरत का नाम सुनकर उसे घिन आई, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। जैसे-तैसे उसके जूते खोल इसे साइड किया, उसकी किस्मत ही यही थी.
कामिनी कपडे चेंज करने के लिए पलट के जाने ही वाली थी कि रमेश ने उसका हाथ पकड़ लिया। उसकी पकड़ में नशे के बावजूद एक अजीब सी ताकत थी।
"कहाँ जा रही है साली...?" रमेश ने अपनी लाल, सूजी हुई आँखों से कामिनी को घूरा।
"सो जाइये, आप नशे में हैं," कामिनी ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की। "मैं पानी लाती हूँ।"
रमेश ने उसे जोर से अपनी तरफ खींचा। कामिनी बिस्तर पर उसके ऊपर गिरते-गिरते बची।
"पानी नहीं चाहिए..." रमेश गुर्राया। "मुझे 'तू' चाहिए।
तुझे क्या लगा मै नशे मे हूँ तो तुझे छोड़ दूंगा, तुझे तो चोदुँगा आज.
रमेश बिस्तर से उठकर लड़खड़ाते हुए खड़ा हो गया। उसने बेडरूम का दरवाज़ा अंदर से लॉक कर दिया।
"खटक..."
चिटखनी की आवाज़ सुनकर कामिनी का दिल बैठ गया।
रमेश उसकी तरफ पलटा। उसकी आँखों में हवस नहीं, बल्कि एक हिंसक पागलपन था।
"कपड़े उतार..." रमेश ने आदेश दिया।
कामिनी सन्न रह गई। "क्या?"
"सुना नहीं तूने?" रमेश चिल्लाया। "साड़ी उतार अपनी... नंगी हो जा। मुझे देखना है तुझे।"
कामिनी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
शर्म के कारण नहीं, बल्कि डर के कारण।
उसे याद आया कि उसके ब्लाउज के नीचे, उसके स्तनों पर रघु के दांतों के गहरे, नीले निशान हैं। उसकी जांघों पर कल रात की खरोंचें हैं।
अगर रमेश ने वो निशान देख लिए... तो उसे पता चल जाएगा कि उसकी बीवी किसी और के साथ मुंह काला करके आई है।
कामिनी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उसने अपने पल्लू को कसकर पकड़ लिया।
"नहीं... आज नहीं," कामिनी गिड़गिड़ाई। "मेरी तबियत ठीक नहीं है। और... और बंटी जाग रहा है, आवाज़ जाएगी बाहर।"
"बंटी की ऐसी की तैसी!" रमेश ने चीखकर कहा। "मैं पति हूँ तेरा... मेरा हक़ है तुझ पर।"
कामिनी पीछे हटती गई, दीवार से जा लगी। "प्लीज़... ज़िद्द मत कीजिये। लाइट बंद कर दीजिये, ऐसे ही..." वह अंधेरे में बात को रफा-दफा करना चाहती थी।
लेकिन रमेश का पारा चढ़ गया। उसे लगा कामिनी उसे मना करके उसकी मर्दानगी को ललकार रही है।
"साली रंडी!" रमेश ने गाली दी। "इतनी हिम्मत आ गई तुझमें? मेरी बात मानने से मना कर रही है?"
"लगता है बहुत दिनों से 'खुराक' नहीं मिली तुझे।"
रमेश ने अपने पैंट के हुक खोले और एक झटके में अपनी चमड़े की बेल्ट खींचकर निकाल ली।
हवा में बेल्ट लहराने की आवाज़ आई— "सर्रर्र...!"
कामिनी डर के मारे कांप उठी। यह बेल्ट उसने पहले भी कई बार सही थी, लेकिन आज डर मार का नहीं, राज़ खुलने का था।
रमेश बेल्ट को अपने हाथ में लपेटते हुए आगे बढ़ा।
"उतार रही है या मैं खाल उधेड़कर उतारूँ?" उसकी आवाज़ में दरिंदगी थी..
"नहीं... नहीं... मत मारिये..." कामिनी रो पड़ी।
रमेश ने हाथ उठाया।
"सटाक.....!!"
बेल्ट हवा को चीरती हुई कामिनी की कलाई पर लगी, जिससे उसने अपना बचाव करने की कोशिश की थी।
"आह्ह्ह...!" कामिनी की चीख निकल गई।
रमेश अब रुकने वाला नहीं था। वह कामिनी को नंगा करके ही दम लेने वाला था, चाहे इसके लिए उसे मारना ही क्यों न पड़े।
उधर कामिनी सोच रही थी— 'हे भगवान! अगर इसने मेरा ब्लाउज फाड़ दिया और वो निशान देख लिए... तो आज मेरी लाश ही निकलेगी इस कमरे से।'
कमरे में फिर से चमड़े की बेल्ट हवा चीरने की आवाज़ गूंज रही थी।
"सटाक..... सटाक.....!!"
रमेश के अंदर का जानवर पूरी तरह जाग चुका था।
कामिनी डर के मारे कमरे के कोने में दुबक गई,
उसने अपनी साड़ी को अपनी छाती से कसकर भींच रखा था, लेकिन रमेश की ताकत के आगे उसकी एक न चली।
बेल्ट के वार उसकी नाजुक पीठ और नंगे कंधों पर पड़ रहे थे, जिससे वहां लाल लकीरें उभर आई थीं।
"आह्ह्ह... मत मारिये... उफ्फ्फ्फ..." कामिनी सिसक रही थी।
रमेश नशे और हवस में अंधा हो चुका था। उसने झपट्टा मारा और कामिनी की साड़ी का पल्लू पकड़कर पूरी ताकत से खींच लिया।
"चर्रर्र....."
साड़ी कामिनी के जिस्म से अलग होकर फर्श पर गिर गई। अब वह सिर्फ़ अपने पेटीकोट और ब्लाउज में थी।
"नंगी हो... साली रंडी नंगी हो!" रमेश चिल्ला रहा था।
उसने फिर बेल्ट हवा में लहराई।
"सटाक...!"
"आह्ह्ह... रुकिए... रुकिए... मैं... मैं उतारती हूँ," कामिनी की हिम्मत टूट गई। उसे लगा आज अगर उसने कपड़े नहीं उतारे, तो रमेश उसकी खाल उधेड़ देगा।
कामिनी कांपते हुए खड़ी हुई। उसने दीवार की तरफ मुंह कर लिया, ताकि रमेश उसकी छाती के वो 'निशान' न देख सके।
कांपते हाथों से उसने अपने पेटीकोट का नाड़ा खोला।
रेशमी पेटीकोट सरकता हुआ उसके पैरों में गिर गया।
ट्यूबलाइट की तेज़ सफ़ेद रोशनी में, कामिनी की गोरी, मखमली और भारी गांड (Buttocks) जगमगा उठी।
उसकी कमर की ढलान और नीचे फैले हुए वो दो मांसल गोले... किसी कलाकृति से कम नहीं लग रहे थे।
सिर्फ़ एक पतली सी पैंटी थी जो को गांड की बीच की दरार मे दफ़न थी।
रमेश की आँखों में हवस की चमक आ गई। वह लार टपकाने लगा।
"उफ्फ्फ... क्या गांड है रंडी तेरी..." रमेश ने अपनी जीभ होंठों पर फेरी। "साली... आज तेरी इसी गांड को मारूंगा।"
कामिनी की रूह कांप गई।
रमेश ने आदेश दिया— " ब्लाउज भी खोल... पूरा नंगा देखना है मुझे।"
कामिनी के पास कोई चारा नहीं था। उसने पीठ पीछे हाथ ले जाकर हुक खोले। ब्लाउज ढीला होकर गिर गया।
अब उसकी पूरी पीठ नंगी थी।
"घूम साली... मेरी तरफ घूम," रमेश गुर्राया। "तेरे वो 'आम' देखने दे मुझे।"
कामिनी का दिल हलक में आ गया।
अगर वह घूमी, तो उसके स्तनों पर रघु के दांतों के वो नीले निशान साफ़ दिख जाएंगे। उसकी चोरी पकड़ी जाएगी।
"घूमती है या मारूँ?" रमेश ने बेल्ट उठाई।
कामिनी मजबूरी में धीरे-धीरे पलटी।
लेकिन उसने तुरंत अपने दोनों हाथों को क्रॉस करके अपने भारी स्तनों को ढक लिया।
वह सिकुड़कर खड़ी थी, जांघें आपस में कसकर भिंची हुई थीं, और हाथ छाती पर थे।
"हाथ हटा..." रमेश ने हुंकार भरी।
"नहीं... प्लीज..." कामिनी रो पड़ी।
"साली हटा हाथ!"
"सटाक.....!!"
रमेश ने एक बेल्ट सीधा उसके नंगे पेट पर जड़ दिया।
"आआईईईई...... !" कामिनी दर्द से दोहरी हो गई, लेकिन उसने हाथ नहीं हटाए। उसके गोरे पेट पर एक लाल निशान उभर आया।
अब रमेश पागल हो चुका था। वह आगे बढ़ा और कामिनी के हाथों को झटकने ही वाला था कि...
अचानक दरवाजे पर एक जोरदार धमाका हुआ।
"धड़ाकककक.....!!"
बेल्ट की आवाज़ और कामिनी की चीखें बाहर तक जा रही थीं।
दरवाज़े की चिटखनी दबाव नहीं झेल पाई और लकड़ी के फ्रेम से उखड़कर गिर गई। दरवाज़ा झटके से खुला।
सामने रघु खड़ा था।
उसकी आँखों में अंगारे थे। उसका चेहरा गुस्से से लाल था और मुट्ठी भिंची हुई थी।
"बस हरामी ..... बहुत हुआ!" रघु की आवाज़ में एक शेर जैसी दहाड़ थी।
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रात गहरी हो चुकी थी। बंटी, जो दिन भर की दौड़-भाग और मानसिक तनाव से चूर था, अपने कमरे का दरवाज़ा बंद करके गहरी नींद में सो चुका था। एसी की हमिंग साउंड ने बाहर की आवाज़ों को उसके कानों तक पहुँचने से रोक दिया था।
उधर आंगन में, रघु दबे पाँव रसोई की खिड़की की तरफ बढ़ा। वह अपनी खाने की खाली थाली वापस रखने आया था, ताकि सुबह मालकिन को काम न करना पड़े।
लेकिन जैसे ही वह खिड़की के पास पहुँचा, उसके कान खड़े हो गए।
अंदर से किसी के रोने की और चमड़े की बेल्ट चलने की आवाज़ आ रही थी।
"सटाक..... सटाक.....!"
"आह्ह्ह... नहीं... मत मारिये..."
यह आवाज़ कामिनी की थी।
रघु का दिल दहल गया। उसने धीरे से खिड़की की झिरी से अंदर झांका।
बेडरूम की खिड़की का दरवाज़ा शायद हवा से हल्का सा खुल गया था या ठीक से लगा नहीं था। रघु को अंदर का नज़ारा साफ़ दिखाई दिया।
उसने देखा—उसकी मालकिन, कामिनी, दीवार से सटी खड़ी थी।
वह पूरी तरह नंगी थी, बस कमर पर पैंटी की बारीक़ लाइन दिख रही थी,
उसने अपने दोनों हाथों से अपने भारी स्तनों को ढक रखा था, जैसे कोई अनमोल खज़ाना छुपा रही हो।
और सामने रमेश, हाथ में बेल्ट लिए शैतान की तरह खड़ा था।
"हाथ हटा... मुझे सब देखना है!"
रघु की आँखों के सामने अंधेरा छा गया।
उसकी धुंधली मेमोरी मे यादें हिलोरे मारने लगी, फिर से वही मंज़र याद आ गया—किशनगंज की वो रात, जब इंजीनियर उसकी बीवी को ऐसे ही नंगा करके धमका रहा था।
उस दिन रघु बंधा हुआ था, बेबस था।
लेकिन आज? आज नहीं वो आज़ाद था, खोने के लिए उसके पास कुछ नहीं था.
"नहीं... आज नहीं... आज कोई और "सुगना" नहीं बनेगी," रघु की आँखों मे खून उतर आया.
रघु ने थाली वहीं छोड़ी और चीते की रफ़्तार से मुख्य दरवाज़े की तरफ भागा।
किस्मत थी की शमशेर खुला गेट छोड़ के गया था, और कामिनी उसे बंद करने जा नहीं पाई थी,
रघु तूफ़ान की तरह हॉल को पार करता हुआ बेडरूम के दरवाज़े पर पहुँचा।
अंदर रमेश फिर से बेल्ट उठाने ही वाला था।
रघु ने अपनी पूरी ताकत लगाकर दरवाज़े को टक्कर मारी।
"धड़ाम.....!!"
दरवाज़ा दीवार से जा टकराया।
रमेश चौंककर पलटा। "कौन...?"
इससे पहले कि रमेश कुछ समझ पाता, रघु ने एक सांड की तरह दौड़ते हुए अपना पूरा शरीर रमेश से भिड़ा दिया।
"भक्क.....!!"
रघु का चौड़ा सीना रमेश से टकराया। रमेश, जो पहले ही नशे में झूल रहा था, इस टक्कर को झेल नहीं पाया।
वह हवा में लहराता हुआ पीछे की तरफ गिरा और सीधा बिस्तर पर चित हो गया।
"धप्प!"
सिर के बल गिरने और अत्यधिक नशे के कारण, रमेश की आँखों के आगे अंधेरा छा गया। उसने एक बार "उ हूं..." किया और वहीं बेहोश होकर पसर गया। उसके हाथ से बेल्ट छूटकर फर्श पर गिर गई।
कमरे में अचानक शांति छा गई।
कामिनी, जो अभी भी कोने में दुबकी थी, इस अचानक हुए हमले से सन्न रह गई। उसने देखा—सामने रघु खड़ा था।
उसका सीना धौंकनी की तरह चल रहा था, आँखों में खून था, और मुट्ठी भिंची हुई थी।
वह आज नौकर नहीं, एक 'रक्षक' लग रहा था।
"रघु..." कामिनी के मुंह से सिसकी निकली।
उसने अपनी शर्म, अपनी नग्नता की परवाह नहीं की। वह दौड़कर आई और सीधे रघु के सीने से लग गई।
"थप..."
कामिनी का मखमली, नंगा बदन रघु के खुरदरे कपड़ों और सख्त जिस्म से चिपक गया।
रघु ने महसूस किया कि कामिनी के भारी, मुलायम स्तन उसके सीने में धंस गए हैं।
उसकी त्वचा की गर्मी और डर रघु के गुस्से को पिघलाने लगी।
रघु ने अपने दोनों मज़बूत हाथ कामिनी की नंगी पीठ पर रख दिए, जहाँ अभी-अभी बेल्ट के वार पड़े थे।
"शश्श्श... मैं हूँ मालकिन... मैं आ गया हूँ," रघु ने उसके बालों को सहलाया।
कामिनी बुरी तरह रो रही थी, लेकिन अब ये आंसू राहत के थे।
रघु ने कामिनी को बांहों में उठाया।
सामने बिस्तर पर रमेश बेहोश पड़ा था, खर्राटे ले रहा था।
लेकिन रघु ने परवाह नहीं की। उसने कामिनी को उसी बिस्तर पर, रमेश के ठीक बगल में लेटा दिया।
दृश्य बेहद अजीब और कामुक था।
एक तरफ पति नशे में बेहोश पड़ा था, और दूसरी तरफ उसकी पत्नी, पूरी तरह नंगी (सिर्फ़ एक गीली पैंटी पहने हुए), अपने नौकर के सामने लेटी थी।
ट्यूबलाइट की रोशनी में कामिनी का बदन चमक रहा था।
रघु बिस्तर के किनारे खड़ा होकर उसे निहारने लगा।
उसने देखा—कामिनी के पेट और जांघों पर बेल्ट के ताज़े लाल निशान थे।
लेकिन...
जब कामिनी ने हाथ हटाए, तो रघु ने देखा कि उसके स्तनों पर और जांघों के अंदरूनी हिस्सों में नीले निशान थे।
ये वो निशान थे जो कल रात रघु ने दिए थे।
रघु का दिल भर आया। वह समझ गया।
'मालकिन ने मार खाई... बेल्ट सही... लेकिन मेरे दिए निशानों को मालिक से छुपाए रखा। उन्होंने अपनी इज़्ज़त दांव पर लगा दी मेरे लिए।'
रघु धीरे से बिस्तर पर झुका।
उसने कामिनी के चेहरे को अपने गंदे, खुरदरे हाथों में भरा।
"माफ़ कर दो मालकिन..." रघु की आवाज़ भर्रा गई। "ये सब मेरी वजह से हुआ। मैं... मैं बहुत पापी हूँ।"
कामिनी ने उसकी गीली आँखों में देखा।
उसे रघु के शरीर से आ रही सस्ती शराब, पसीने और मटन की गंध आ रही थी।
लेकिन इस वक़्त, उसे यह गंध दुनिया की सबसे महंगी परफ्यूम से ज्यादा अच्छी लगी। यह गंध एक 'मर्द' की थी, जिसने उसे बचाया था।
कामिनी ने कुछ नहीं कहा।
उसने धीरे से अपना सिर उठाया और अपने नाज़ुक, गुलाबी होंठ रघु के रूखे, बीड़ी, शराब की बदबू से सने होंठों पर रख दिए।
"म्मम्म..."
कामिनी ने अपनी आँखें बंद कर लीं और रघु की उस 'गंदगी' को, उसके स्वाद को अपने अंदर उतारने लगी।
उसने रघु की गर्दन में बाहें डाल दीं और उसे अपनी तरफ खींच लिया, रघु के होंठ भी खुल गए, दोनों की जीभ एक दूसरे के गर्म थूक को चाटने लगी...
क्रमशः....

8 Comments
Kamini shamsher ke chune se hi garam hogayi aur sali ki chut bhi ras tapkane lagi ise thoda age badhao shamsher ko Kamini ke sath thoda aur jyada sexual hone do aur raghu ke sath bhi ab chudai ka scene dal do Kamini ka jisse bunty hi encourage kare
ReplyDeleteअब यही होने वाला है दोस्त, आप लोगो को प्रतीक्षा समाप्त होंगी.
Deleteकामिनी अब चुदेगी, वो भी जम कर 👍
Bhai bhaut mast update diya h kadar ke saath bhi kamni ka seen banao
ReplyDeleteKya kahaniya bunte ho dost aap...
ReplyDeleteमै कहानी नहीं बुनता, मेरा मानना है, ये सब कहीं सच मे हो रहा है, किसी अलग दुनिया मे, अलग यूनिवर्स मे बस इसे लिखने का माध्यम मै हूँ सिर्फ.
DeleteSunn kar acha laga bhai Kamini ki akhir chudai hone wali hai ab jald agla update do
ReplyDeleteआप लोगो के अथक प्रयास से आखिर आपकी कामिनी ने सम्भोग सुख का आनंद ले ही लिया.
DeleteLakin bhai jaldi hi update diya karo
ReplyDelete