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मेरी माँ कामिनी -29


मेरी माँ कामिनी - भाग 29

रात का गहरा सन्नाटा था।
शमशेर की जीप रमेश के घर के पिछवाड़े वाले गेट पर आकर रुकी। हेडलाइट्स बंद थीं, ताकि किसी पड़ोसी का ध्यान न जाए।
जीप से तीन परछाइयां उतरीं—डरा हुआ रमेश, अकड़ा हुआ शमशेर, और पेटी छाती से चिपकाए कादर खान।
वे चोरों की तरह दबे पांव पिछवाड़े से स्टोर रूम की तरफ बढ़े।
स्टोर रूम का दरवाज़ा हल्का सा खुला था। अंदर एक मद्धम बल्ब जल रहा था।
रघु अपनी खटिया पर लेटा बीड़ी पी रहा था। दिन मे कामिनी की मालिश फिर गार्डन की घाँस कटाई के बाद वह सुस्ता रहा था।

अचानक तीन लोगों को अंदर आते देख वह चौंककर उठ बैठा।
"अरे... मालिक? आप?" रमेश को देख सकपका गया, लेकिन जैसे ही रघु की नज़र कादर खान पर गई। "और ये..."
इससे पहले कि रघु कुछ बोलता, शमशेर ने आगे बढ़कर रघु का गिरेबान पकड़ लिया।
"अबे ओये बेवड़े! आवाज़ नीचे!" शमशेर गुर्राया। "कान खोलकर सुन ले। यह कादर खान है, मेरा पुराना पट्ठा, यह कुछ दिन यहीं रहेगा, इसी कोठरी में तेरे साथ।"
शमशेर ने अपनी लाल आँखें रघु के चेहरे के पास कीं।

"और सुन... मालकिन (कामिनी) को भनक भी नहीं लगनी चाहिए कि यह कौन है और यहाँ क्यों है। अगर किसी ने पूछा, तो बोल देना तेरे गांव का कोई रिश्तेदार है, इलाज करवाने आया है। समझ गया?"
रमेश, जो पीछे खड़ा पसीना पोंछ रहा था, उसने अपनी जेब से बटुआ निकाला।
उसने एक 200 का नोट निकाला और रघु की तरफ बढ़ा दिया।
"ये रख... ठर्रा लगा लेना," रमेश ने कांपती आवाज़ में कहा। "और जो शमशेर भाई ने कहा, वही करना। जुबान बंद रखना।"
रघु ने वो नोट ले लिया और अपनी बनियान की जेब में ठूंस लिया। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था, बस एक आज्ञाकारी नौकर का मुखौटा था।
"जी मालिक... जैसा आप कहें।"
शमशेर ने राहत की सांस ली। "ठीक है रमेश, मैं निकलता हूँ। मैं थाने जाकर देखता हूँ कि ये विक्रम का क्या मामला है।"

शमशेर अपनी जीप लेकर अंधेरे में गायब हो गया।
रमेश ने एक बार नफरत और डर से उस पेटी को देखा, फिर अपने घर के पिछले दरवाज़े से अंदर चला गया।अपने बेडरूम में...
रमेश अपने आलीशान बेडरूम में आया और धम्म से सोफे पर गिर पड़ा।
उसने टाई खींचकर फेंकी और बार कैबिनेट से व्हिस्की की बोतल निकाल ली।
गिलास में शराब उड़ेलते हुए वह बड़बड़ाया।

"साला दिन ही पनौती है! न वहां सुनैना को जी भरकर देख पाया, न ढंग से वो विदेशी दारू पी पाया... और न ही कादर के ढाबे का मटन नसीब हुआ। ऊपर से ये पुलिस और ड्रग्स का लफड़ा।"
रमेश ने एक बड़ा घूंट भरा। शराब गले को जलाती हुई नीचे उतरी।
उसे बहुत छोटा और लाचार महसूस हो रहा था। उसे लगा कि वह सिर्फ़ भाग रहा है, लेकिन मिल कुछ नहीं रहा.

वही स्टोर रूम में...
दरवाज़ा बंद हो चुका था।
स्टोर रूम में अब सिर्फ़ दो लोग थे— रघु और कादर खान।
पेटी कोने में पड़ी थी।
रघु ने कादर को ऊपर से नीचे तक देखा। कादर की हालत ख़राब थी, कपड़े कीचड़ में सने थे और चेहरे पर डर था।
"अबे ये सब क्या है?" रघु ने अपनी बीड़ी का कश लेते हुए पूछा। "तू यहाँ कैसे? और मालिक तुझे ऐसे चोरों की तरह क्यों लाए?"
कादर खान ने एक गहरी सांस छोड़ी और खटिया पर बैठ गया।
"क्या बताऊँ रघु भाई..." कादर ने सारी बात सच-सच उगल दी। पुलिस की रेड, 50 लाख का माल, और रमेश का डर।
सुनते-सुनते रघु के चेहरे पर एक व्यंग्यात्मक मुस्कान आ गई।
"कुदरत का निज़ाम देख कादर..." रघु हंसा। "एक वक़्त था जब मैं तेरे ढाबे पर पड़ा रहता था, तेरे रहमों करम पर था, तेरे ढाबे पर काम करता था। मेरा कोई ठिकाना नहीं था।"
रघु ने कादर के कंधे पर हाथ रखा।
"और आज? आज तू मेरे ठिकाने पर छुपा हुआ है। आज तू बेघर है और मैं तेरा सहारा हूँ। किस्मत बहुत अजीब चीज़ है भाई..."
कादर खान भी फीका सा हंसा। "सही कह रहा है यार। वक़्त का पहिया घूम गया।"
फिर कादर की नज़र छत की तरफ गई। उसकी आँखों में एक अलग ही चमक आ गई।
"वैसे रघु..." कादर ने कुटिलता से पूछा, "तेरी मालकिन... जो हॉस्पिटल मे मिली थी... यहीं रहती हैं ना?"
रघु ने कादर की टोन पकड़ ली।

"हाँ..." रघु ने बीड़ी बुझाई। "क्यों?"
"कुछ नहीं..." कादर ने अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा। "उस दिन से इच्छा थी तेरी मैडम को जी भर मे देखने की, किस्मत देख आज मै उसी के घर आ गया।"

स्टोर रूम में दोनों के ठहाके गूंजने लगे। 
*****************

रात के 11:30 बज रहे थे।
सन्नाटे को चीरती हुई एक स्कूटर की आवाज़ आई।
"भ्रर्रर्र...!!"
रमेश, जो अभी दूसरा पेग बना ही रहा था, खिड़की के पास गया और पर्दा हटाकर बहार झांका।
बंटी अपना नया स्कूटर गेट के अंदर ला रहा था।
और पीछे बैठी थी— कामिनी।
हवा से कामिनी के बाल बिखरे हुए थे। उसका चेहरा स्ट्रीट लाइट की रोशनी में दमक रहा था। सुनैना के घर की 'शाम' उसके साथ बिताये 'पल'... उन सबने कामिनी के चेहरे पर एक अजीब सा निखार (Glow) ला दिया था।

कामिनी स्कूटर से उतरी, अपनी साड़ी ठीक की और बंटी के साथ अंदर आई।
जैसे ही वह बेडरूम में दाखिल हुई, उसने देखा रमेश हाथ में गिलास लिए, उदास और परेशान सा सोफे पर बैठा है।
कामिनी की चाल में एक मस्ती थी।
"अरे?" कामिनी ने अपना पर्स टेबल पर रखा और रमेश को एक तीखी नज़र से देखा।
"जल्दी आ गए आप? साइट का काम इतनी जल्दी निपट गया?"
उसकी आवाज़ में एक व्यंग्य था, जिसे रमेश अपने नशे और डर के कारण समझ नहीं पाया।
रमेश ने गिलास टेबल पर रखा। "हाँ... बस हो गया काम। तुम बताओ, कैसी रही पार्टी?"
कामिनी मुस्कुराई। एक ऐसी मुस्कान जिसमें कई राज़ छिपे थे।

बेडरूम में रात की रानी का इत्र महक रहा था, लेकिन हवा में एक अजीब सा भारीपन था।
कामिनी ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़ी थी। शीशे में अपनी परछाई को देखते हुए, उसने अपने कान की बालियां (Earrings) उतारना शुरू किया।
उसकी गर्दन मुड़ी हुई थी, जिससे उसकी सुराहीदार गर्दन और उस पर बने वो नीले निशान शीशे में साफ़ चमक रहे थे।
तभी, रमेश सोफे से उठा और लड़खड़ाते हुए कामिनी के पीछे आया।
उसने अपने दोनों हाथ कामिनी की कमर पर रख दिए और अपना चेहरा उसकी गर्दन में छुपाने की कोशिश की।
"कामिनी..." रमेश ने नशे में भारी आवाज़ में पुकारा।
कामिनी का शरीर एक पल के लिए stiff (सख्त) हो गया।
उसे रमेश का स्पर्श बेजान लगा।
कल रात रघु की पकड़ में जो लोहे जैसी सख्ती थी... उसके मुकाबले रमेश का स्पर्श किसी मरे हुए जानवर जैसा ठंडा और ढीला था।

रमेश ने अपने शरीर को कामिनी के पिछवाड़े से सटाया, लेकिन उसे खुद महसूस हुआ कि नीचे कुछ नहीं हो रहा।
उसका औज़ार सुस्त पड़ा था।
रमेश के दिमाग में घंटी बजी— 'धत् तेरी की! आज कादर का मटन सूप नहीं पिया ना... इसलिए करंट नहीं आ रहा।'
रमेश को यह भ्रम (Delusion) था कि उसकी मर्दानगी उसके अंदर नहीं, बल्कि कादर खान के उस जादुई सूप और शराब में है। आज वो 'ईंधन' नहीं मिला, तो इंजन स्टार्ट ही नहीं हो रहा था।

उसने कोशिश की, कामिनी की खुशबू ली, लेकिन उसका शरीर साथ नहीं दे रहा था। वह अंदर से खोखला महसूस कर रहा था।
हताश होकर, रमेश ने अपना सिर कामिनी के कंधे पर रख दिया।
"सॉरी कामिनी..." रमेश ने धीमी, अपराधी आवाज़ में कहा। "वो... कल रात के लिए।"
कामिनी ने अपनी बाली टेबल पर रखी और शीशे में रमेश को देखा। "किसलिए?"

"वो... कल रात मैंने कुछ ज्यादा ही कर दिया था ना..." रमेश ने झिझकते हुए कहा, उस 'तूफ़ान' का क्रेडिट लेते हुए जो असल में रघु ने बरपाया था। "तुम्हें दर्द दिया... जानवर बन गया था मैं। माफ़ कर देना, वो नशे मे थोड़ा ज्यादा हो गया..."
"कल रात..."
रमेश के मुंह से यह शब्द सुनते ही कामिनी के बदन में आग लग गई।
उसके दिमाग में फ़्लैशबैक चल गया—रघु का वो पसीने से लतपत बदन, वो धक्के, वो दर्द, और अंत में वो चरम सुख।
रमेश की वो 'झूठी माफ़ी' कामिनी के लिए 'असली उत्तेजना' का काम कर गई।

उसकी योनि, जो आज शाम सुनैना के स्पर्श से पहले ही गीली थी, अब रघु की याद से निचुड़ने लगी।
रमेश को लगा कामिनी चुप है क्योंकि वह नाराज़ है।
"अब सो जाते हैं... बहुत थकान है," रमेश ने अपनी इज़्ज़त बचाई और कामिनी से दूर हो गया। 
वह जाकर बेड पर धम्म से गिर गया और चादर तान ली। कुछ ही पलों में उसके नशे वाले खर्राटे गूंजने लगे।
कामिनी वहीं खड़ी रही।

अब कमरे में सिर्फ़ वो जाग रही थी... और उसकी जागी हुई प्यास।
उसने अपनी साड़ी खोली। रेशमी साड़ी जब उसके बदन से सरक कर नीचे गिरी, तो उसे लगा जैसे सुनैना के हाथ उसके शरीर से नीचे सरक रहे हों।
आज शाम... सुनैना के होंठ...
कामिनी ने अपनी उंगलियां अपने होंठों पर फेरीं।
उसे अभी भी वहां वाइन का स्वाद और सुनैना की कोमलता महसूस हो रही थी।
उसने अपना पेटीकोट और ब्लाउज़ उतारा और एक हल्का साटन का गाउन पहन लिया।
गाउन पहनते वक़्त उसका हाथ अपने स्तनों से टकराया।
उसे एक अजीब सी सिहरन हुई।
'यह क्या हो रहा है मुझे?' कामिनी ने खुद को आईने में देखा। उसकी आँखें नशीली हो रही थीं, गाल तमतमा रहे थे।
'रघु के बारे में सोचती हूँ तो आग लगती है... लेकिन सुनैना के बारे में सोचती हूँ तो... बर्फ जैसी मीठी पिघलन होती है।'

कामिनी हैरान थी।
वह एक औरत होकर एक औरत के स्पर्श के लिए मचल रही थी।
सुनैना ने कहा था— "हम औरतें एक-दूसरे को बेहतर समझती हैं।"
कामिनी को अब उस बात का मतलब समझ आ रहा था। उसके अंदर की दबी हुई कामुकता अब हर दिशा से बाहर निकल रही थी—चाहे वो मर्द हो या औरत (सुनैना)।
वह धीरे से जाकर रमेश के बगल में लेट गई, लेकिन उसका मुंह दूसरी तरफ था।
उसकी जांघें आपस में रगड़ खा रही थीं।

***************

स्टोर रूम में...

कादर खान ने अपनी कीचड़ से सनी शर्ट को देखा और नाक सिकोड़ी।
"यार, पूरा कीचड़ से सना हुआ हूँ," कादर ने रघु की तरफ देखा जो अपनी खटिया पर आँखें मूंदे पड़ा था। "नहाने का जुगाड़ है क्या यहाँ?"
रघु ने नींद में ही, बिना आँखें खोले, हाथ से इशारा किया।
"हाँ... वो किचन के सामने गार्डन में अमरूद का पेड़ दिख रहा है ना... वहीं नीचे नल लगा है। जा नहा ले..."
इतना बोलकर रघु ने करवट ली और अगले ही पल उसके खर्राटे गूंजने लगे।

कादर खड़ा का खड़ा रह गया।
"अरे सुन बे रघु... सुन तो..." कादर ने उसे टटोला, लेकिन रघु अब 'बेहोशी' की दुनिया में था।
"साला दारू पीने वालों से इसीलिए चिढ़ है मुझे," कादर बड़बड़ाया। "होश ही नहीं रहता।"

कादर ने आस-पास नज़र दौड़ाई।
उसकी नज़र खूंटी पर टंगी एक पॉलीथिन पर पड़ी। उसने उसे खोला।
अंदर एक नया टी-शर्ट और पाजामा रखा था। वही कपड़े जो कामिनी परसो बाज़ार से रघु के लिए लाई थी, जिनमे से एक रघु ने अभी तक पहना नहीं था।

"चल, तेरा माल मेरा माल," कादर ने कपड़े निकाले और कंधे पर डाल लिए।
कादर दबे पांव स्टोर रूम से बाहर निकला।
बगीचे में रात का गहरा सन्नाटा था। दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज़ आ रही थी।
कादर अमरूद के पेड़ के पास उस नल की तरफ बढ़ा।
उसने नल घुमाया। पानी की ठंडी धार निकल पड़ी.

उसने एक प्लास्टिक की बाल्टी भरी।
फिर उसने अपने कीचड़ सने कपड़े उतारने शुरू किए।
कुर्ता... पाजामा... और अंत में अपना मैला कच्छा।
कादर खान खुले आसमान के नीचे सम्पूर्ण नंगा खड़ा था।
उसने मग्गा भरा और पानी अपने जिस्म पर डाला।
"छाप... छाप... छप्पम...!!"
पानी की आवाज़ सन्नाटे में गूंजने लगी। कादर अपने मज़बूत हाथों से अपनी छाती और जांघों को रगड़-रगड़ कर साफ़ करने लगा।

बेडरूम में...

कामिनी बिस्तर पर करवटें बदल रही थी।
रमेश के खर्राटे उसके दिमाग में हथौड़े की तरह बज रहे थे। उसकी आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं था, बस जिस्म में एक अधूरी प्यास थी।
तभी... उसे बाहर से पानी गिरने की आवाज़ सुनाई दी।
"छप... छप..."
कामिनी चौंक गई।
'इतनी रात को कौन? रघु?' कामिनी ने सोचा। 'उसे क्या हुआ? इतनी रात को गार्डन मे क्या कर रहा है?'

जिज्ञासा और दबी हुई काम-वासना ने उसे बेचैन कर दिया।
उसने रमेश की तरफ देखा, वह घोड़े बेचकर सो रहा था।

कामिनी ने अपना साटन का गाउन ठीक किया और बिल्ली की तरह दबे पांव बिस्तर से उतरी।
वह कमरे से बाहर निकली और अंधेरे गलियारे से होती हुई किचन में आ गई।
किचन में अंधेरा था, लेकिन खिड़की से गार्डन साफ़ दिखता था।
कामिनी खिड़की के पास गई और जैसे ही उसने चिक (Blinds) के पीछे से बाहर झांका...
उसके होश उड़ गए।
उसका कलेजा मुंह को आ गया और सांस हलक में अटक गई।
गार्डन में लगे पीले बल्ब की मद्धम रौशनी में... रघु नहीं था।
वहाँ कादर खान खड़ा था।
कामिनी उसे पहचानती थी—अस्पताल वाला वो गुंडा।
लेकिन इस वक़्त उसके सामने जो नज़ारा था, उसने कामिनी के दिमाग को सुन्न कर दिया।
कादर का 6 फुट का भारी-भरकम, कसरती जिस्म पानी से भीगा हुआ चमक रहा था।
वह किसी ग्रीक देवता या किसी जंगली सांड जैसा लग रहा था।

उसकी चौड़ी छाती पर काले, घने बालों का जंगल था, जिसमें पानी की बूंदें अटकी हुई थीं और चमक रही थीं। उसके डोले (Biceps) और कंधे लोहे की तरह मज़बूत दिख रहे थे। रमेश का थुलथुला शरीर इसके सामने किसी बच्चे जैसा था।

लेकिन कामिनी की नज़रें फिसलते हुए नीचे गईं... और वहीं अटक गईं।
कादर की दोनों मज़बूत, खंभों जैसी जांघों के बीच... उसका विशाल पौरुष लटका हुआ था।
**************

रात का सन्नाटा ऐसा था कि पत्ता भी गिरे तो शोर हो जाए।
लेकिन उस सन्नाटे को चीर रही थी—पानी गिरने की आवाज़।
"छप... छप... छपाक्...!!"
बेडरूम के अंधेरे से निकलकर कामिनी किचन में खड़ी थी।
उसका दिल पसलियां तोड़कर बाहर आने को बेताब था।
उसने कांपती उंगलियों से बांस की 'चिक' (Blind) को रत्ती भर सरकाया और अपनी एक आँख उस दरार पर जमा दी।

सामने गार्डन में लगे 100 वाट के पीले बल्ब की मद्धम और तिलिस्मी रौशनी में जो नज़ारा था, उसने कामिनी की रूह कपा दी।
वहाँ कादर खान खड़ा था।
सम्पूर्ण नंगा।
किसी आदिम युग के जानवर जैसा।
उसका 6 फुट का विशाल, काला, कसरती जिस्म पानी और पसीने में नहाया हुआ चमक रहा था।

कादर ने मग्गा भरकर पानी अपने सिर पर डाला।
पानी की धार उसके चेहरे से होती हुई, उसकी चौड़ी और गठीली छाती पर गिरी।
उसकी छाती पर काले, घने और घुंघराले बालों का एक घना जंगल था। पानी की बूंदें उन बालों में अटक-अटक कर, चमकते हुए मोतियों की तरह नीचे सरक रही थीं।
कामिनी की प्यासी नज़रें उस पानी की बूंद का पीछा करने लगीं।

वह बूंद सीने के बालों से फिसली... उसके पेट की कसी हुई मांसपेशियों (Abs) के खड्डों में रुकी... उसकी गहरी नाभि में गई... और फिर वहाँ से फिसलकर नीचे उस 'प्रतिबंधित इलाके' की तरफ बढ़ गई।

जैसे ही कामिनी की नज़रें नाभि से नीचे गईं, उसका गला सूखकर कांटा हो गया।

कादर का पूरा शरीर मर्दाना बालों से ढका था—हाथ, पैर, छाती, जांघें।
लेकिन... जांघों के बीच का वो त्रिकोण (Groin) बिल्कुल साफ़, चिकना और बाल रहित था।
काले जंगल के बीच में वो 'मैदान' उस्तरे से घिसकर इतना चिकना किया गया था कि वहां की सांवली त्वचा बल्ब की रौशनी में चमक रही थी। 042-450


यह सफाई चीख-चीख कर बता रही थी कि यह मर्द अपने 'हथियार' को हमेशा जंग के लिए तैयार रखता है।
और उस चिकने सिंहासन पर... उसका विशाल पौरुष विराजमान था।

कामिनी ने अपनी सांसें रोक लीं।
वह 'चीज़'... रमेश के औज़ार जैसी नहीं थी। वह कोई अंग नहीं, बल्कि मांस का एक भारी-भरकम हथौड़ा लग रहा था।
वह अभी पूरी तरह तना हुआ नहीं था, फिर भी उसकी लम्बाई इतनी थी कि वह कादर की जांघों के आधे हिस्से तक लटक रहा था। एक मोटा, काला और भारी अजगर जो सुस्ता रहा हो।


कामिनी की आँखें कादर के लंड के अगले हिस्से पर जाकर चिपक गईं।
आज तक उसने जितने भी देखे थे (रमेश, रघु का ) सबके लिंग के आगे एक चमड़ी (Foreskin) होती थी जो सुपारी को ढक लेती थी।
लेकिन कादर के लंड के अगले भाग पर वो चमड़ी नहीं थी, वो लाल आलू जैसा "कुछ " आज़ाद था, अपनी सुंदरता के चरम पर था.

उसका आगे का हिस्सा वह 'टोपा' (Glans)—पूरी तरह से नंगा, खुला और बेपर्दा था।
लिंग का तना (Shaft) काला था, जिस पर मोटी-मोटी हरी और नीली नसें सांप की तरह लिपटी हुई थीं।

लेकिन आगे का वो 'खुला हुआ सिर'... एकदम गहरा गुलाबी और जामुनी (Purple-Pink) रंग का था।
उस नंगी सुपारी का व्यास (Girth) पीछे के लिंग से भी ज्यादा चौड़ा था, बिल्कुल एक मशरूम की तरह फैला हुआ।

उस सुपारी के किनारे (Rim) उभरे हुए थे और हवा के स्पर्श से फड़फड़ा रहे थे।

वह 'लाल मुंडी' इतनी संवेदनशील और चमकदार लग रही थी कि कामिनी को लगा जैसे वह उसे घूर रही हो, बुला रही हो।
उस हिस्से पर चमड़ी न होने के कारण, वह कच्चा मांस जैसा दिख रहा था, जो रगड़ खाने के लिए ही बना हो।

उसके लिंग के ठीक नीचे, उसके अंडकोष (Testicles) लटक रहे थे।
वे रमेश की तरह सिकुड़े हुए नहीं थे।
वे विशाल, भारी और लंबोतरे थे।
चूँकि वहां बाल नहीं थे, वे एकदम साफ़ और सुडौल दिख रहे थे। पानी के भार से वे और भी नीचे लटक गए थे, और जब कादर हिलता, तो वे भारी पेंडुलम की तरह उसकी जांघों से टकराते— "थप्प... थप्प..."

वह आवाज़ कामिनी के कानों में नहीं, सीधे उसकी बच्चेदानी में गूंज रही थी।

कादर ने साबुन उठाया और खूब घिस घिस कर अपने शरीर पर घिसने लगा।
झाग भरे हाथों से उसने अपने उस काले मूसल को मुट्ठी में भरा।
कामिनी ने देखा कि कादर की मुट्ठी पूरी बंद नहीं हो पा रही थी, वो इतना मोटा था।
जैसे ही कादर ने उस नंगी, गुलाबी सुपारी पर अंगूठा फेरा... वह सोया हुआ अजगर फनफनाने लग, उसके लंड ने एक हल्का सा झटका लिया, जो की कामिनी को साफ अपनी चुत के मुहने पर महसूस हुआ.

वह पूरा खड़ा नहीं हुआ, बस हलके फुल्के तनाव मे था, 
उसमें खून का प्रवाह बढ़ा, और वह और भी मोटा होकर फूल गया। उस गुलाबी टोप पर एक पारदर्शी बूंद (Pre-cum) चमकने लगी।

खिड़की के इस पार, कामिनी की हालत ख़राब थी।
उस दृश्य की नग्नता और उस अजीब बिना चमड़ी वाले लिंग की 'अलग बनावट' ने उसे पागल कर दिया था।

उसके साटन के गाउन के अंदर, उसके स्तन के निप्पल (Nipples) पत्थर की तरह सख्त होकर तन गए थे। वे गाउन के कपड़े को चीरकर बाहर आना चाहते थे।
उसके पूरे बदन पर रोंगटे खड़े हो गए, डर से नहीं, बल्कि एक अजीब सी वासना से।
और उसकी जांघों के बीच?
वहाँ बाढ़ आ चुकी थी।
उसकी योनि से इतना गर्म और चिपचिपा पानी रिस रहा था कि उसकी जांघें अंदर से पूरी तरह लिसलिसी हो गई थीं। रस की एक धार उसकी जांघ से रपटते हुए उसके घुटने तक आ गई थी।

कामिनी का मन हुआ कि अभी... इसी वक़्त खिड़की तोड़कर बाहर कूद जाए।
उस कीचड़ और पानी में सने कादर के पास जाए... और घुटनों पर बैठकर उस विशाल, नंगे, गुलाबी टोप को अपने मुंह में भर ले।
उसे चखे, उसे प्यार करे आखिर वो दुसरो से अलग कैसे है? 
वह जानना चाहती थी कि वह 'कटा हुआ' हिस्सा जीभ पर कैसा लगता है? वह कितना गरम होता है?

कादर ने मग्गा भरकर पानी की एक तेज धार सीधे अपने उस अर्ध मुरछीत लंड पर मारी।
पानी उस लाल सुपारी से टकराया और बिखर गया।
कामिनी ने अपनी आँखें बंद कर लीं और खिड़की की ग्रिल पर अपना माथा टेक दिया।

"हम्मम्म... आह्ह्ह...इस्स्स्स..." कामिनी की आह निकल ही गई.
उसने अपनी एक जांघ को दूसरी जांघ से ज़ोर से मसला, ताकि उस गीलेपन और खुजली को थोड़ा सकून मिले।
लेकिन आग बुझने के बजाय और भड़क गई।

कामिनी की सांसें अटक चुकी थीं। उसकी नज़रें कादर खान के भीगे हुए जिस्म से हट ही नहीं रही थीं।
कादर ने नहाना बंद कर दिया था। उसने तौलिया उठाया और बेपरवाही से अपने बालों वाले सीने और जांघों को पोंछने लगा।
हर बार जब तौलिया उसके विशाल लिंग से टकराता, वह मांसल हथियार हल्का सा झूलता और फिर अपनी जगह वापस आ जाता।
कादर ने पास रखी थैली से कपड़े निकाले—वही सफ़ेद टी-शर्ट और नीला पाजामा, जो कामिनी खुद बाज़ार से रघु के लिए लाई थी।
लेकिन रघु, कादर के मुकाबले दुबला पतला था, और कादर एक सांड जैसा चौड़ा।
जैसे ही कादर ने वो टी-शर्ट पहनी... कपड़ा चीख उठा।
टी-शर्ट उसकी छाती और बाजुओं पर इतनी बुरी तरह कस गई (Tight) कि उसके शरीर का एक-एक कट साफ़ झलकने लगा।

उसके सीने के काले बाल टी-शर्ट के सफ़ेद कपड़े के नीचे से काले धब्बों की तरह दिख रहे थे। और सबसे उत्तेजक बात—ठंडे पानी की वजह से कादर के सीने के निप्पल पत्थर की तरह सख्त हो गए थे, जो टी-शर्ट के कपड़े को चीरकर बाहर को उभरे हुए साफ़ दिख रहे थे।

फिर उसने पाजामा पहना।
पाजामा भी उसकी भारी-भरकम जांघों पर किसी स्किन- tight लेगिंग्स की तरह चिपक गया।
कादर ने नाड़ा बांधा।
लेकिन कामिनी की नज़रें तो जांघों के बीच (Crotch) पर जमी थीं।
कादर का लिंग अभी पूरी तरह सोया नहीं था। उस ठंडे पानी और रगड़ ने उसे 'अर्ध-जागृत' कर दिया था।
तंग पाजामे के अंदर... उस विशाल और मोटे लंड का उभार (Bulge) साफ़... बिल्कुल साफ़ दिख रहा था।
वह एक तंबू की तरह कपड़े को आगे धकेल रहा था।
और उस तंग कपड़े के नीचे, कामिनी को उस मशरूम जैसे मोटे टोप (Glans) की गोलाई साफ़ महसूस हो रही थी। 
वह 'लाल मुंडी' कपड़े के अंदर कैद होकर और भी ज्यादा खतरनाक लग रही थी, जैसे कोई कोबरा फन फैलाए बैठा हो।
यह दृश्य कामिनी के लिए अंतिम प्रहार था।
उसका दिमाग सुन्न हो गया।
'यह आदमी... ये कादर.... मेरे घर में... इतनी रात को नहा रहा है, "

कामिनी अब एक पल भी वहाँ खड़ी नहीं रह सकती थी। अगर वह नहीं भागी, तो शायद वह खिड़की तोड़कर बाहर कूद जाती।
वह पलटी और लड़खड़ाते कदमों से बेडरूम की तरफ भागी।

कामिनी बेडरूम में आंधी की तरह दाखिल हुई।
रमेश अभी भी मुंह फाड़े, हाथ-पैर फैलाए बेहोश पड़ा था। उसके खर्राटे कमरे में गूंज रहे थे।
लेकिन कामिनी को अब रमेश के होने या न होने से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। उसकी दुनिया अब उसकी जांघों के बीच सिमट गई थी।
कामिनी ने लाइट ऑफ नहीं की, डिम लाइट जल रही थी।
वह बेड पर चढ़ी और रमेश से दूर, किनारे की तरफ लेट गई।
उसने रजाई अपने ऊपर खींच ली, लेकिन उसका पूरा शरीर बुखार की तरह तप रहा था।
उसने अपने साटन के गाउन को कमर तक ऊपर खींच लिया।
ठंडी हवा उसके नंगे पैरों और जांघों को छूने लगी, लेकिन अंदर ज्वालामुखी धधक रहा था।
कामिनी ने अपना कांपता हुआ हाथ अपनी पैंटी के ऊपर रखा।
इस्स्स्स.... आअह्ह्ह... कामिनी कांप उठी, जैसे किसी जलते तवे पर हाथ रख दिया हो.

पैंटी पूरी तरह गीली और लिसलिसी हो चुकी थी।
उसकी योनि से निकला हुआ गाढ़ा और गरम पानी (Lubrication) कपड़े के आर-पार हो चुका था।

कामिनी ने एक झटके में पैंटी उतारकर फेंक दी।
अब उसकी गोरी, मांसल और भरी हुई योनि आज़ाद थी।
उसने अपनी उंगलियां अपने 'होठों' (Labia) पर रखीं।
वहाँ इतना पानी था कि उसकी उंगलियां फिसलने लगीं।
"स्स्स्स्ह्ह्ह... उफ्फ्फ कादर..."
कामिनी के मुंह से अनजाने में कादर का नाम निकल गया।
उसने अपनी बीच की उंगली (Middle Finger) को अपनी योनि के द्वार पर रखा।
वह छेद, जो कल रात रघु ने चौड़ा किया था, आज कादर को देखकर फिर से फड़फड़ा (Pulsating) रहा था। वह मांग रहा था—कुछ मोटा, कुछ सख्त।

कामिनी ने अपनी उंगली अंदर धकेलनी शुरू की।
अंदर की दीवारें इतनी गरम थीं कि कामिनी को लगा उसकी उंगली जल जाएगी।
अंदर का मांस मखमली और सूजा हुआ था।
जैसे ही उंगली अंदर गई, एक "पिच्... पिच्..." की गीली आवाज़ आई।
कामिनी ने आँखें बंद कर लीं।
अंधेरे में उसे अपनी उंगली नहीं... बल्कि कादर का वो "काला नसों भरा लंड और उसका लाल खुला हुआ टोप" दिखाई दे रहा था।

कामिनी ने कल्पना की...
कि कादर अभी खिड़की से कूदकर अंदर आया है...
उसने कामिनी की टांगें चौड़ी की हैं...
और वो अपना 'खतने वाला नंगा टोप' कामिनी के गीले छेद पर रगड़ रहा है...
इस कल्पना मात्र से कामिनी की कमर हवा में उठ गई।
उसने अपनी उंगली तुरंत बहार निकाल ली,

उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी की वो ऊँगली को और अंदर डाल सके, वो चीख उठेगी, 
कामिनी उत्तेजना बर्दाश्त करने की हालात मे नहीं थी, उसने आज से पहले ऐसा नहीं किया था, 
उसकी पतली नाजुक उंगलियां असली मर्द की भरपाई नहीं कर सकती थी.

कामिनी ने अपनी ऊँगली को बहत खिंच लिया, उसकी ऊँगली चूतरस या यूँ कहिये चुत के मीठे शहद से सराबोर थी.

उसने अपने दूसरे हाथ से अपने स्तन (Boob) को गाउन के ऊपर से ही ज़ोर से भींच लिया। उसका निप्पल इतना सख्त हो गया था कि छूने पर दर्द हो रहा था, लेकिन वह दर्द मीठा था।
नहीं... नहीं.... मै इसे बर्बाद नहीं कर सकती. उत्तेजना और हवास मे भी कामिनी की चेतना लौट आई. grok video 2026 02 03 13 46 43
उसने अपने जिस्म को ढीला छोड़ दिया, 
ये वो सुख नहीं है.... कामिनी का जिस्म उसकी खुद की छुवन को नकार रहा था, उसे कादर या रघु जैसे मजबूत मर्द का स्पर्श चाहिए था, जो की अभी संभव नहीं था.
कामिनी ने गुस्से और उत्तेजना मे अपना सर तकिये मे घुसा दिया, और गहरी गहरी सांसे भरने लगी, जैसे खुद को समझा रही हो.

थोड़ी ही देर मे सब शांत था, बहार से आती पानी की आवाज़ और कामिनी की वासना दोनों रात के अँधेरे मे विलीन हो गए.
कामिनी मीठे सपनो के आगोश मे समा गई थी.
वही कादर दिन भर की भागदौड़ और अभी स्नान के बाद रघु के बगल मे पड़ा खर्राटे भर रहा था.

क्रमशः...

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1 Comments

  1. Bhai mast update h ab kadar se sex hoga wo bhi tagde wala

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