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मेरी माँ कामिनी -17

मेरी माँ कामिनी -17


कामिनी का चेहरा और जिस्म उत्तेजना और अभी अभी की गई हरकत से लाल था, उसकी धड़कन अभी भी एज़ चल रही थी, 

कमरे में एक भारी खामोशी थी, जिसमें सिर्फ़ रघु की भारी सांसें और कामिनी के दिल की धड़कनें सुनाई दे रही थीं।
उसने अभी-अभी एक ऐसा कृत्य किया था, जिसके बारे में सोचना भी किसी सभ्य समाज में अपराध था। उसने एक शराबी नौकर के मुंह में अपना पेशाब त्याग दिया था।
शारीरिक रूप से, उसका मूत्राशय (Bladder) खाली हो चुका था। वह दबाव, वह फटने वाला दर्द अब शांत था।
लेकिन... कामुक रूप से?
वह अभी भी प्यासी थी। बल्कि, उस 'त्याग' ने उसकी प्यास को और भड़का दिया था।
उसकी चूत के अंदर की नसों में अभी भी फड़फड़ाहट हो रही थी। उसे घर्षण (Friction) चाहिए था। उसे रगड़ चाहिए थी। उसे एक ऐसे चरम सुख (Orgasm) की तलाश थी जो उसे तोड़ दे।
वह पलटने ही वाली थी कि उसकी नज़र पास पड़े स्टूल पर रखी हलवे की कटोरी पर पड़ी।
स्टील की कटोरी में रखा वह गाजर का लाल हलवा, बल्ब की पीली रोशनी में चमक रहा था।
उसमें पड़ा देसी घी जमने लगा था, लेकिन उसकी महक अभी भी हवा में थी।
कामिनी के दिमाग में रघु की आवाज़ गूंजी— "गरम गाजर का हलवा...तो मुझे भी बहुत पसंद है, मलाई... दाल के खाने मे आनंद आता है...उफ्फ्फ!"

ना जाने क्यों कामिनी के होठों पर एक कुटिल मुस्कान रेंग गई।
एक अजीब सा विचार, जो किसी विषैले सांप की तरह उसके दिमाग में कुंडली मारकर बैठा था, अब फन फैला रहा था।
'रघु को हलवा पसंद है, भूखा भी होगा सुबह से " कामिनी के मन मे दया के साथ साथ एक अजीब सा वहसी विचार भी कोंध रहा था.
आज बरसाती रात मे खड़ी ये कामिनी अलग थी, बरसो रमेश की मार, अपमान, आवेहलाना झेल झेल कर कामिनी के अंदर भी एक रमेश पैदा हो गया था, जिसका उसे खुद नहीं पता था.
जुल्म सहने सहते इंसान खुद जुल्मी भी बन जाता है.

एक अजीब से विचार ने कामिनी के शरीर में एक सिहरन पैदा कर दी, यह सिर्फ़ सेक्स नहीं था, यह भोजन का अपमान और मर्यादा का चीरहरण था। और यही बात उसे सबसे ज्यादा उत्तेजित कर रही थी।

कामिनी खटिया के पास वापस आई।
उसने कटोरी उठाई। हलवा अब गुनगुना भी नहीं रहा, वह ठंडा हो चुका था।
उसने अपनी लंबी, पतली उंगलियों को कटोरी में डाला।
उसने एक बड़ा हिस्सा—जिसमें गाजर के कद्दूकस किए हुए रेशे और जमा हुआ घी था—अपनी उंगलियों पर उठाया।
हलवा उसकी उंगलियों पर चिपचिपा और भारी महसूस हुआ।
कामिनी ने अपना गाउन फिर से ऊपर किया।
उसने अपनी टांगें चौड़ी कीं।
उसकी चूत अभी भी पेशाब और काम-रस से गीली थी।
कामिनी ने वह हलवा अपनी योनि के मुहाने पर रखना शुरू किया।
चप...चप। थप...
हलवे का ठंडा और चिपचिपा स्पर्श उसकी संवेदनशील त्वचा पर लगा।
"सीईईईई.... इस्स्स्स.... आअह्ह्ह...." कामिनी की लाल आँखों मे वहशीपन साफ दिख रहा था.
कामिनी ने आंखें बंद कर लीं।
उसने अपनी उंगलियों से उस हलवे को किसी मरहम की तरह अपनी चूत पर पोतना शुरू किया।

गाजर के छोटे-छोटे दाने (Grains) उसकी क्लिटोरिस (सुपारी) पर रगड़ खाने लगे। घी की चिकनाई उसकी योनि के होठों (Labia) पर एक लेप की तरह चढ़ गई।

उसने हलवे को सिर्फ़ बाहर नहीं लगाया, बल्कि अपनी उंगलियों से थोड़ा अंदर धकेल दिया।
अब उसकी पूरी निजता, उसका पूरा स्त्रीत्व, गाजर के हलवे और घी की एक मोटी परत से ढक चुका था।
वह एक स्वादिष्ट और गंदी डिश बन चुकी थी।


कामिनी फिर से रघु के चेहरे के ऊपर आई।
रघु अभी भी उसी मुद्रा में लेटा था, मुंह खुला हुआ, जिसमें अभी भी कामिनी के पेशाब का स्वाद बाकी था।
कामिनी ने सोचा— "ऐसा हलवा तूने कभी नहीं खाया होगा "
धप...
कामिनी ने अपनी हलवे से सनी हुई चूत को पूरी ताकत से रघु के मुंह पर जमा दिया।
इस बार संपर्क (Contact) गीला और फिसलन भरा था।
हलवे की परत ने रघु के होंठों और कामिनी की चूत के बीच एक कुशन का काम किया।
जैसे ही रघु की जीभ को मिठास मिली, उसके नशे में डूबे दिमाग ने करवट ली।
कड़वी शराब और नमकीन पेशाब के बाद... अचानक यह मिठास?
रघु के अवचेतन मन ने इसे 'खाना' समझा।
उसकी जीभ, जो अब तक शांत थी, सक्रिय हो गई।
लप... लप... चप... चप...
उसने चाटना शुरू किया।
लेकिन इस बार यह सिर्फ़ चाटना नहीं था।
कामिनी के लिए यह एक अनुभव था।
जब रघु की जीभ हलवे को चाटने के लिए बाहर निकलती, तो वह गाजर के रेशों को कामिनी की क्लिटोरिस पर रगड़ देती। Facesitting GIF Kendra Lust femdom facesitting

गाजर के वो छोटे-छोटे टुकड़े किसी हज़ारों नन्हे ब्रश की तरह कामिनी की चूत को रगड़ रहे थे।

"आह्ह्ह्ह.... माँ..... रघु.... हाँ....इस्स्स....  उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़......"
कामिनी ने रघु के बालों को पकड़ लिया।
रघु हलवा खाने की कोशिश कर रहा था। वह अपनी जीभ को घुमा-घुमाकर कामिनी की दरारों में फंसा हुआ हलवा निकाल रहा था।

सुड़प-सुड़प-चप...
कमरे में अजीब सी आवाज़ें गूंजने लगीं।
घी की वजह से रघु की जीभ बहुत आसानी से फिसल रही थी, और गाजर की वजह से वह आवश्यक घर्षण (Friction) पैदा कर रही थी।

कामिनी ने अपनी कमर को एक लय (Rhythm) में हिलाना शुरू किया।
वह अपनी गांड को रघु के मुंह पर गोल-गोल (Grinding) मथने लगी।

जैसे चक्की में दाने पीसे जाते हैं, वैसे ही वह रघु के मुंह और अपनी चूत के बीच उस हलवे को पीस रही थी। 76f2f2eaa7cd1c29a0a69e71b41a2b7a
हलवा, पेशाब, काम-रस और रघु की लार—सब मिलकर एक सफेद-लाल झाग बन गए थे।

यह एक घिनौना मिश्रण था, लेकिन रघु के लिए यह अमृत था। एयर अमृत पिलाने वाली अप्सरा कामिनी.

रघु की जीभ अब उसकी योनि के अंदर तक जाने की कोशिश कर रही थी, वहां छुपी हुई मिठास को खोजने के लिए।
कामिनी की सांसें उखड़ने लगीं।
"खा जा.... पूरा साफ़ कर....... मेरा हलवा खा.... चाट मेरी चुत को... उफ्फ.... आअह्ह्ह.... आउच.."
वह पागलों की तरह बड़बड़ा रही थी। 
रघु के दाँत बार बार हलवा चबाने मे कामिनी की चुत की पंखुडियो को काटबडे रहे थे, उसके दाने पर काटव के निशान उभर आये थे.
रघु की जीभ उसके दाँत कामिनी को यौन उत्तेजना का कामुकता अहसास करवा रहे थे, 
वो खुद से अपने स्तनों को मसल रही थी, मदमस्त हिरणी पागलो की तरह उछल रही थी, अपने जिस्म की आग को टटोल रही थी.

रघु की जीभ कामिनी की योनि को चाट रही थी, लेकिन कामिनी का मन अब कहीं और भटकने लगा था।
उसकी चूत गीली थी, संतुष्ट हो रही थी, लेकिन उसके शरीर का पिछला हिस्सा—उसकी भारी, चौड़ी गांड—अभी भी अछूती थी।
अचानक, उसके दिमाग में एक आवाज़ कौंधी। यह रवि की कोमल आवाज़ नहीं थी, यह एक भारी, मर्दानी और रौबीली आवाज़ थी।
शमशेर।
रमेश के दोस्त शमशेर की वह खूंखार नज़र उसे याद आ गई।
कामिनी ने कल्पना की— अगर शमशेर यहाँ होता, तो वह मेरी चूत नहीं चाटता... वह मुझे पलट देता। वह मेरी गांड के दोनों पट्टों को पकड़कर फैला देता और कहता— "साली, इतनी बड़ी गांड पाल रखी है... मार-मार के लाल कर दूंगा और छेद खोल दूंगा तेरा।"
इस हिंसक कल्पना ने कामिनी के अंदर एक बिजली दौड़ा दी।
उसे अपनी गांड के छेद (Anus) में एक अजीब सी फड़कन महसूस हुई। एक मीठा दर्द, एक खालीपन जो भरने के लिए चीख रहा था।
उसे अहसास हुआ कि उसे सिर्फ़ आगे का मज़ा नहीं चाहिए, उसे अपनी गांड भी चटवानी है। उसे वह अपमान, वह गंदगी महसूस करनी है।
उसने नीचे देखा। रघु का मुंह अभी भी खुला था, जीभ बाहर थी। रघु कामिनी की चुत मे लिपटा और फंसा हुआ गाजर का हलवा खोद खोद कर खा चूका था.
उसकी जीभ और की उम्मीद मे लापलपा रही थी.

कामिनी की आँखों में एक शैतानी चमक आ गई।
'तुझे और हलवा खाना है ना? रूक खिलाती हूँ, शराबी इंसान...'
कामिनी जिस्म कांप रहा था, रमेश के प्रति नफरत उसके चेहरे से साफ झलक रही थी, उसका कृत्य ही सबूत था की रमेश का रखा अंश उसमे भी कहीं बस गया है.


कामिनी रघु के चेहरे से उठी।
उसने फिर से स्टूल पर रखी कटोरी की तरफ हाथ बढ़ाया।
हलवा अब पूरी तरह ठंडा और सख्त हो चुका था। घी जम गया था।
कामिनी ने अपनी पूरी हथेली भरकर हलवा निकाला।
उसने अपनी कमर मोड़ी और अपनी बाएं हाथ से अपने बाएं नितम्ब (Buttock) को खींचकर गांड की दरार खोल दी। 20210916-224313
उसका गुलाबी, सिकुड़ा हुआ गांड का छेद (Anal Sphincter) बल्ब की रोशनी में 'आँख मिचोली' खेल रहा था।
कामिनी ने वह हलवे का लोथड़ा सीधा अपनी गांड के छेद पर थोप दिया।
चप... छापक....
ठंडा हलवा और जमा हुआ घी उसकी गरम गांड की दरार में भर गया।
लेकिन कामिनी इतने पर ही नहीं रुकी।
उसने अपनी उंगली से गाजर के रेशों को अपनी गांड के अंदर ठूंसना शुरू कर दिया।
"आह्ह्ह.... उफ्फ्फ...आउच.... " कामिनी की ये करतूत कोई देख लेता तो उसे हैवान समझता, चुड़ैल ही मान बैठता.
लेकिन देखने वाला क्या जाने, कामपिपासु औरत ऐसी ही होती है, वो औरत जिसे प्यास सम्भोग के बदले सिर्फ मार और अपमान ही मिला हो.

गाजर के टुकड़े और घी की चिकनाई उसकी तंग गुदा के अंदर घुस गई।
अब उसकी गांड सिर्फ़ एक अंग नहीं, बल्कि एक "मीठी गुफा" बन चुकी थी जो चाटे जाने के लिए तैयार थी।

कामिनी फिर से रघु के ऊपर आई।
लेकिन इस बार उसने अपनी दिशा बदल दी। उसका चेहरा रघु के पैरो की तरफ था, सामने रघु का सोया लंड जांघो पर लुड़का पड़ा था.

उसने अपनी भारी गांड को रघु के चेहरे की तरफ किया और धीरे-धीरे नीचे बैठने लगी। m-ldpwiqacxt-E-Ai-mh-9-Q-i-Es-y-UDd-C0e-Xl-41074091b
उसने निशाना साधा—सीधा रघु के मुंह पर।
धप...
कामिनी की भारी गांड रघु के चेहरे पर आ गिरी।
उसका हलवे से सना हुआ गांड का छेद ठीक रघु के होंठों और जीभ के ऊपर टिक गया।
जैसे ही रघु की जीभ को गांड की गर्मी और हलवे की मिठास मिली, उसने अपना काम शुरू कर दिया।
लप... लप... लपाक...

रघु की जीभ ने कामिनी के गांड के छेद (Rim) को चाटा।
"ओह्ह्ह्ह्ह्ह माँ.... ईईईईई.....ससससद... आउच"
कामिनी का पूरा शरीर हवा में उछल गया।
यह अहसास... यह बिल्कुल नया था।
आज तक किसी ने उसकी गांड को छुआ तक नहीं था, और आज एक शराबी नौकर की जीभ उसके उस वर्जित अंग को कुरेद रही थी। blonde-pornstar-with-big-ass-eated

रघु की जीभ हलवा खाने के चक्कर में उसकी गांड की सिलवटों को खोल रही थी।
वह अपनी नोकदार जीभ से गांड के छेद के अंदर फंसे गाजर के टुकड़ों को निकालने की कोशिश कर रहा था।
जब उसकी जीभ छेद के अंदर घुसने (Probing) की कोशिश करती, तो कामिनी को लगता जैसे उसकी रीढ़ की हड्डी में करंट दौड़ गया हो। a61f939106f22741069a8d8013032af3

यह सुख नहीं था, यह पागलपन था।
कामिनी अपने दोनों हाथों से खटिया के पायों को जकड़कर चीखने लगी (दबी आवाज़ में)।

रघु को हलवा खाने में दिक्कत हो रही थी क्योंकि वह गांड की दरार में गहराई तक चिपका था।
नशे और भूख में झुंझलाकर, रघु ने सिर्फ़ जीभ का नहीं, बल्कि अपने दाँतों का इस्तेमाल शुरू कर दिया।
उसने हलवे को खुरचने के लिए अपने दाँत गड़ा दिए।
कच... कच्चाक...

रघु के दाँत कामिनी की गांड के मुहाने और नीचे लटकती हुई चूत के दानों से रगड़ खा गए।

"आह्ह्ह्ह्ह्ह..... मार डाला..... उउउउफ्फ्फ.... माँ.... आअह्ह्ह......"
कामिनी दर्द से तड़प उठी, लेकिन वह हटी नहीं।
उसे उस दर्द में मज़ा आ रहा था।
रघु के दाँत उसकी कोमल त्वचा को काट रहे थे, चबा रहे थे, हलवे के साथ-साथ उसकी चमड़ी को भी नोच रहे थे।
गाजर के रेशे रघु के दाँतों और कामिनी की गांड के बीच रेगमाल (Sandpaper) का काम कर रहे थे।

यह खुरदरापन कामिनी को शमशेर की याद दिला रहा था।
उसे लगा जैसे शमशेर उसे नोच रहा है।
कामिनी ने अपनी गांड को और ज़ोर से रघु के मुंह पर दबा दिया।
"खा जा.... काट ले.... नोच ले मेरी गांड को.... हरामखोर खा जा...."
वह बार-बार उठती, अपनी उंगलियों से और हलवा अपनी गांड और चूत के अंदर ठूंसती, और फिर धप से रघु के मुंह पर बैठ जाती।

वह रघु के मुंह को टॉयलेट और डाइनिंग टेबल दोनों की तरह इस्तेमाल कर रही थी।
रघु का पूरा चेहरा, नाक, आँखें कामिनी की गांड के बीच दबकर रह गए थे। वह सांस लेने के लिए संघर्ष कर रहा था और इसी संघर्ष में वह और ज़ोर-जोर से चाट और काट रहा था।


अब कामिनी उस मुकाम पर थी जहाँ वापसी का कोई रास्ता नहीं था।
रघु की जीभ उसकी गांड के छेद में लगभग आधी घुस चुकी थी, और उसके दाँत उसकी चूत के दाने (Clitoris) को कुचल रहे थे।
दर्द + अपमान + हवस + गुदा मैथुन का सुख।
यह सब मिलकर एक ज्वालामुखी बन गया।
कामिनी का रोम-रोम सिहर उठा।
उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया।
"रघघघघघुउउउउ........ उफ्फ्फ्फ्फ्फ..... मर गईईईईई......"
एक भयानक, रूह कंपा देने वाला ऑर्गस्म (Orgasm) उसे हुआ।
यह सामान्य झड़ना नहीं था।
ऐसा लगा जैसे किसी ने उसकी आत्मा को निचोड़ दिया हो।
उसकी गांड का छेद बार-बार सिकुड़ने और खुलने लगा (Throbbing), रघु की जीभ को अपने अंदर जकड़ने लगा।
उसकी चूत से पानी की एक और बाढ़ आई, जिसने रघु के पूरे चेहरे को नहला दिया।
कामिनी का शरीर अकड़ गया, उसके पैर हवा में कांपने लगे।

धड़ाम...
वह अपना संतुलन खो बैठी।
वह रघु के मुंह से लुढ़ककर साइड में खटिया से होती ठंडी जमीन पर गिर गई।
वह बुरी तरह हांफ रही थी। उसका सीना धौंकनी की तरह चल रहा था।
उसकी आँखें पथरा गई थीं, मुंह खुला था, लार टपक रही थी।
वह पूरी तरह टूट चुकी थी और बिखर चुकी थी।

हंफ... हमफ्फ्फ्फफ्फ्फ़... उउफ्फ्फ... हमफ़्फ़्फ़...कामिनी नीचे जमीन पड़ी थी, बेसुध सी हांफ रही थी, रघु को एक टक देखे जा रही थी, 
लेकिन रघु?
रघु अभी भी नशे में था। उसे पता ही नहीं चला कि कामिनी हट गई है।
उसका मुंह अभी भी चल रहा था।
उसकी जीभ हवा में लपलपा रही थी।
लप-लप-लप...
वह अभी भी उस स्वाद— गाजर का हलवा, घी, पेशाब, काम-रस और गांड का पसीना—को अपनी जीभ और होंठों से चाट रहा था।
कामिनी ने अपनी धुंधली आँखों से देखा।
रघु के मुंह के चारों तरफ लाल हलवा और सफ़ेद तरल लगा था। वह किसी भूखे जानवर जैसा लग रहा था जो शिकार के बाद भी तृप्त नहीं हुआ।
कामिनी की जांघों के बीच से अभी भी पानी रिस रहा था।
कामिनी पूर्णरूप से तृप्त थी, उसकी आंखे बंद होने की कगार पर थी.
लेकिन... नहीं... नहीं... यहाँ नहीं.
जैसे तैसे उसने खुद को संभाला, खड़ा किया, पास पड़ी छतरी उठाई और लड़खड़ाते कदमो से अपने बैडरूम की ओर चल दी.
वो उन्माद मे ये भी ना देख सकी की हलवे की खाली कटोरी रघु के सीने पर सान से पड़ी हुई है.

क्रमशः.....


****************

सुबह की पहली किरण जब स्टोर रूम की टूटी हुई खिड़की से छनकर अंदर आई, तो धूल के कण नाचते हुए दिखाई दे रहे थे। बाहर परिंदों की चहचहाहट थी, जो रात के उस भयानक और वहशी सन्नाटे को चीर रही थी।
रघु की आँखें भारी थीं। उसका सिर ऐसे फट रहा था जैसे किसी ने अंदर हथौड़े चलाए हों। कल रात की देसी शराब का असर अभी भी उसके ज़हन पर हावी था। उसने करवट लेनी चाही, लेकिन तभी उसे अपने सीने पर किसी ठंडी और सख्त चीज़ का अहसास हुआ।
उसने झटके से आँखें खोलीं और अपनी धुंधली नज़रों को नीचे टिकाया।
उसके नंगे, बालों वाले सीने पर स्टील की एक खाली कटोरी रखी थी।
"हईं... ये कहाँ से आई?" वह बुदबुदाया। उसकी आवाज़ फटी हुई थी।
जैसे-जैसे होश लौटा, उसे अपने चेहरे पर एक अजीब सी जकड़न (Stiffness) महसूस हुई। उसकी दाढ़ी के बाल आपस में चिपके हुए थे, जैसे उन पर कोई गोंद सूख गई हो। उसके होंठों पर एक पपड़ी सी जमी थी।
रघु ने अपनी जीभ बाहर निकाली और अपने होंठों को चाटा।
स्वाद...
वह स्वाद बड़ा ही अजीब था। उसमें गाजर के हलवे की मिठास थी, घी की चिकनाई थी, लेकिन साथ ही एक तीखा, कसैला और नमकीन अहसास भी था जो सीधा उसके दिमाग की नसों को झनझना गया।
अचानक... कल रात की धुंधली यादें उसके दिमाग में बिजली की तरह कौंधने लगीं।
बारिश... अँधेरा... कोई साया... वो खुशबू...
उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था, जैसे कोई सपना देखा हो, लेकिन कैसा सपना, हलवे की कटोरी तो उसके सामने थी.
उसने कटोरी उठाई। उसमें हलवे के कुछ लाल रेशे और घी की परत अभी भी लगी थी।

"मेमसाब..." उसके गले से एक घुरघुराहट निकली।
 *************

इधर घर के अंदर 

रात का वह स्याह तूफ़ान अब थम चुका था, लेकिन कामिनी के वजूद के अंदर एक ऐसा जलजला आया था जिसने उसकी आत्मा की नींव हिला दी थी। सुबह जब उसकी आँख खुली, तो सबसे पहले उसे अपनी जांघों के बीच एक तीखी, मीठी जलन महसूस हुई।

​उसने चादर हटाकर अपने जिस्म को देखा। उसकी जांघों पर कल रात के निशान थे—रघु के दाँतों की खरोंचें और गाजर के रेशों की रगड़ से हुई लालिमा। कामिनी को खुद से घिन आने लगी। उसे लगा जैसे वह कोई अपराधी है जिसने अपनी मर्यादा का खून किया है।

​वह आईने के सामने खड़ी हुई। चेहरा वही था, लेकिन आँखों में वह चमक नहीं थी। उसने खुद से नज़रें चुराईं। images-11
'ये मैंने क्या कर दिया? मैं इतनी कैसे गिर गई?'
​उसने तुरंत स्नान किया, गर्म पानी जब उसके जख्मों पर पड़ा तो वह सिसक उठी। वह जलन उसे बार-बार याद दिला रही थी कि कल रात उसने एक शराबी नौकर के साथ क्या 'वहशीपन' किया था। लेकिन उसका मन किसी पिंजरे में बंद पंछी की तरह फड़फड़ा रहा था।

कामिनी रसोई में थी। वह अभी-अभी नहाकर आई थी। उसने सफेद रंग की साफ़-सुथरी सूती साड़ी पहनी थी, बालों को जूड़े में बांधा था और माथे पर एक लाल बिंदी सजाई थी। ऊपर से देखने पर वह साक्षात पवित्रता की मूरत लग रही थी।
लेकिन सिर्फ़ कामिनी जानती थी कि साड़ी के नीचे उसके शरीर का क्या हाल था।
जैसे ही वह रसोई से तुलसी के पौधे को जल चढ़ाने के लिए बाहर निकली, उसके कदम लड़खड़ाए।
उसकी जांघों के बीच, उसकी योनि और गांड के मुहाने पर एक तेज़ और तीखी जलन हो रही थी। रघु के दाँतों के निशान और गाजर के रेशों की रगड़ ने उसकी कोमल त्वचा को छील दिया था। हर कदम के साथ जब उसकी जांघें आपस में रगड़ खातीं, तो उसे एक 'करंट' सा लगता।

उसने आंगन में खड़े होकर तुलसी को जल चढ़ाया। आँखें बंद कीं और हाथ जोड़े।
अजीब विडंबना थी... हाथ भगवान के सामने जुड़े थे, लेकिन मन में अभी भी वह दृश्य घूम रहा था जब वह रघु के मुंह पर अपनी गांड पटक रही थी। उसे अपनी साड़ी के अंदर से अपनी ही गंध आ रही थी।
खेर जैसे तैसे कामिनी ने खुद को संभाला 9 बजने को थे, बहार मैन गेट पर किसी की दस्तक हुई.
रमेश आ चूका था, चेहरे पे थकान साफ झलक रही थी.
"कहाँ रह गए थे आप " कामिनी ने रमेश का बेग सँभालते हुए पूछा.

रमेश घर के अंदर दाखिल हुआ, लेकिन कामिनी की रूह कांप रही थी। उसे लग रहा था कि उसकी आँखों में रात का सारा 'कीचड़' साफ़ दिख रहा होगा। रमेश थका हुआ था, उसने कामिनी की तरफ ठीक से देखा भी नहीं और सोफे पर ढह गया। कामिनी ने राहत की सांस ली, लेकिन यह राहत अस्थायी थी।

​पानी पी कर रमेश नहाने चला गया, 
​रसोई में काम करते वक्त (नाश्ता बनाते वक़्त) कामिनी का वजूद उसे धिक्कार रहा था। कल रात उसने जो कुछ किया—वह पेशाब की धार, वह गाजर का हलवा और वह गांड का रगड़ना—वह सब उसकी बंद आँखों के सामने बार-बार घूम रहा था। उसे महसूस हो रहा था कि वह एक अपराधी है जिसने अपने ही घर की मर्यादा की बलि चढ़ा दी है।
​लेकिन उसका शरीर? शरीर तो कल की वहशियत का गवाह बना बैठा था। हर कदम के साथ उसकी जांघों के बीच एक तीखा और मीठा दर्द उठता। रघु के दाँतों ने जहाँ-जहाँ उसकी चूत की पंखुड़ियों और गांड के मुहाने को काटा था, वहाँ अब नीले निशान उभर आए थे। सूती साड़ी की खुरदरी सतह जब उन जख्मों से टकराती, तो कामिनी के हलक से एक दबी हुई सिसकी निकल जाती।
थोड़ी ही देर मे रमेश नाश्ते की टेबल पर मौजूद था, 
​नाश्ते की मेज पर जब रवि और बंटी आए, तो कामिनी ने अपनी नज़रें झुका लीं। 
रवि से नजर मिला पाने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी, कल शाम तक रवि उसके लिए एक मासूम लड़का था बंटी जैसा ही था, लेकिन आज वह उसे देख कर सहम रही थी।

 उसे रवि पर गुस्सा भी आ रहा था कि उसी ने उसके अंदर की 'बुझी हुई आग' को हवा दी, लेकिन उसका मासूम चेहरा देख कर वह सारा दोष खुद पर मढ़ लेती। उसने सोचा था— 'आज रवि से अकेले में माफ़ी मांग लूंगी। उसे समझा दूंगी कि हम दोनों से गलती हुई है। अब सब खत्म करना होगा.
"आओ ना आंटी आप भी बैठो ना " रवि ने अपनी पास की कुर्सी की तरफ इशारा कर कहाँ.
"ममम.... मै.. ननन... नहीं..." कामिनी सकपका गई, जैसे चाबुक पड़ा हो कमर पर.
"अभी काम है... बाद मे " कामिनी बिना किसी को देखे ही किचन की तरफ भागी.


तभी चरररररर......  बाहर एक चमचमाती कार रुकी। दरवाज़ा खुलने और बंद होने की आवाज़ आई और कुछ ही क्षणों में टिंग टोंग.... घर की डोर बेल बज उठी.....
"कामिनी देखो तो कौन है?" रमेश अख़बार मे आंखे गाढ़ाये बोला.
कोई 5सेकंड मे ही दरवाजा खुला.

दरवाजा खुलते ही हॉल की साधारण हवा में एक ऐसी तेज़ और मादक खुशबू घुली, जैसे किसी ने मोगरे और महंगे विदेशी परफ्यूम का सैलाब छोड़ दिया हो। कामिनी की नज़रें दरवाजे पर टिकी थीं,  सामने उसी की हम उम्र औरत खड़ी थी।


​उसने पिस्ता रंग का एक सिल्क का सलवार-सूट पहना था, लेकिन उसे 'सूट' कहना गलत होगा—वह उसके बदन पर चढ़ी हुई एक 'दूसरी खाल' की तरह था।

"जज... जी आप?" कामिनी के चेहरे पे प्रश्न था.

"नमस्ते! आप कामिनी जी हैं ना? रवि ने आपके बारे में बताया था फोन पर.

"ओह... मै सुनयना रवि की मम्मी" सुनयना ने हाथ मिलाते हुए कहा। उसकी हथेलियाँ मक्खन जैसी कोमल थीं।
​"जी नमस्ते... आइये ना," कामिनी ने जैसे-तैसे अपनी घबराहट पर काबू पाया।

सुनयना मुस्कुराते हुए अंदर आई। उसकी आँखों में एक अजीब सा आत्मविश्वास था, जो कामिनी को दबोच रहा था।

जैसे ही सुनयना हॉल में आई, कमरे का तापमान जैसे अचानक बढ़ गया। सूट की फिटिंग इतनी 'बेरहम' थी कि उसके बदन का हर घुमाव चीख-चीख कर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा था।

सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाली चीज़ थी सुनयना की बेबाकी। उसने दुपट्टा नहीं लिया था। उसके कुर्ते का गला 'U' आकार में इतना गहरा था कि उसके विशाल और संगमरमरी स्तनों की गोलाई (Deep Cleavage) आधी से ज्यादा बाहर झाँक रही थी।

 उसके दोनों स्तनों के बीच की वह गहरी घाटी (Cleft) पसीने की एक नन्ही बूँद से चमक रही थी। कुर्ता इतना तंग था कि उसकी छाती के उभार हर सांस के साथ जैसे कपड़े को फाड़कर बाहर आने को बेताब थे। उसकी ब्रा की लेस की आउटलाइन कुर्ते के बारीक कपड़े से साफ़ झलक रही थी, जो यह बता रही थी कि अंदर का मंजर कितना भारी है।



रमेश, जो अब तक अखबार में खोया था, सुनयना को देखते ही जैसे जड़ (Stone) हो गया। चाय का कप उसके होंठों के पास ही रुक गया। उसकी आँखों में वही पुरानी, चिर-परिचित हवस की चमक लौट आई थी। वह किसी भूखे शिकारी की तरह सुनयना के उन खुले हुए स्तनों की घाटी को घूर रहा था।
​रमेश ने मन ही मन एक ठंडी आह भरी— "कहाँ ये सादगी की मूरत कामिनी, और कहाँ ये साक्षात अप्सरा!" रमेश की नज़रें सुनयना के चेहरे से फिसलकर सीधा उसके सीने पर जाकर चिपक गईं। वह एक पल के लिए भूल गया कि उसकी पत्नी और बच्चे भी वहीं मौजूद हैं।


सुनयना जब अंदर की ओर बढ़ी, तो उसकी चाल में एक ऐसी लचक थी जो किसी सधी हुई नर्तकी की होती है। चूड़ीदार पायजामे में उसकी भारी और मांसल जांघें आपस में रगड़ खा रही थीं। सबसे घातक थी उसकी गांड (Hips)। उम्र के इस पड़ाव पर उसकी गांड और भी चौड़ी और भारी हो गई थी। हर कदम के साथ उसके कूल्हे एक लय में ऊपर-नीचे हो रहे थे, जो देखने वाले के दिमाग में एक हवस भरी हलचल पैदा कर रहे थे।


कामिनी के लिए यह नज़ारा किसी ज़हर के घूँट जैसा था। एक तरफ तो उसकी जांघों के बीच रघु के दाँतों के निशान जलन और दर्द दे रहे थे, और दूसरी तरफ रमेश की नज़रों का यह 'खुला भटकाव' उसके कलेजे को चीर रहा था।
​कामिनी को अपने सूती कपड़ों और साधारण लुक पर पहली बार शर्म महसूस हुई। उसे जलन हुई कि वह कभी इतनी 'खुली' और 'बेबाक' क्यों नहीं हो पाई। उसने देखा कि सुनयना को रमेश की गंदी नज़रों से कोई आपत्ति नहीं थी, बल्कि वह और ज्यादा इठलाकर चल रही थी, जिससे उसकी भारी गांड की थिरकन और ज्यादा नुमाया हो रही थी।

​"नमस्ते! माफ़ करना, बिना बताए आ गई," सुनयना ने अपनी खनकती आवाज़ में कहा और रमेश की ओर देखकर एक ऐसी मुस्कान दी, जिसने रमेश के अंदर के सोए हुए 'जानवर' को जगा दिया।
​"अरे... नहीं... आप... आपका ही घर है," रमेश हकलाते हुए बोला। 
उसकी आवाज़ में वही 'लार' टपक रही थी जो कभी-कभी कामिनी को बिस्तर पर डराती थी।

सुनयना ने बैठते समय अपनी टांग पर टांग रखी, जिससे उसकी सफ़ेद और सुडौल जांघ का हिस्सा कुर्ते के कट से हल्का सा दिखाई दिया। वह काफ़ी 'खुले विचारों' की लग रही थी। 
उसने बताया कि उसका वहाँ मन नहीं लगा और रवि की चिंता हो रही थी, इसलिए वह जल्दी आ गई।

​कामिनी ने देखा कि रवि अपनी माँ के पास ऐसे सटकर बैठा है जैसे कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका के पास बैठता है। रवि का हाथ सुनयना की कमर पर था। कामिनी के मन में एक अजीब सी हलचल हुई। उसने कभी बंटी को ऐसे गले नहीं लगाया था।
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​थोड़ी देर की औपचारिक बातचीत के बाद, रमेश भारी मन से ऑफिस के लिए निकल गया। जाते-जाते भी उसकी एक आखिरी नज़र सुनयना के स्तनों के उस गहरे उभार पर टिकी रही। कामिनी ने यह सब देखा, और उसके अंदर नफरत की एक लहर दौड़ गई।

​रमेश के जाते ही सुनयना ने बंटी और रवि को स्कूल के प्रोजेक्ट के लिए चलने को कहा। "चलो बच्चों, मैं तुम्हें ड्रॉप कर देती हूँ। 
"अच्छा कामिनी जी फुर्सत मे आती हूँ" सुनयना चलने को हुई.
"आज रात डिनर हमारे साथ ही कर लीजिये ना, " कामिनी ने रात के खाने का औपचारिक न्योता दिया.
"क्यों नहीं... बिल्कुल आपसे बात भी हो जाएगी " सुनयना ने सहज़ ही न्योता स्वीकार कर लिया.
जिसकी उम्मीद कामिनी ने नहीं की थी.

"कामिनी जी, रात को मिलते हैं फिर!"

​जब सुनयना बच्चों को लेकर बाहर निकली, तो कामिनी उसे पीछे से जाते हुए देखती रही। सुनयना का वह सुडौल जिस्म, उसकी वह आज़ादी और रमेश की वह हवस... कामिनी को लगा जैसे वह अपनी ही दुनिया में पराई हो गई है।

​अब घर में फिर से वही खामोशी थी।
रमेश ऑफिस में था, बच्चे स्कूल जा चुके थे।
और स्टोर रूम में रघु जाग चुका था।
​कामिनी अपनी रसोई की स्लैब को कसकर पकड़ लिया। उसकी चूत और गांड की वह जलन अब तेज हो रही थी। उसे लग रहा था कि वह एक तरफ रमेश के अपमान से जल रही है और दूसरी तरफ रघु की उस 'रात' की यादों से सुलग रही है।
क्रमशः......

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3 Comments

  1. Next update?????and please complete this story 🙏😭

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  2. Awesome story... Pls post next update

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  3. Next update...? 🙏🙏😭

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