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मेरी माँ कामिनी -23

मेरी माँ कामिनी, भाग -23



कामिनी ने रास्ते से दो जोड़ी नये t shirt और पाजामे ले लिए थे रघु के लिए.
घर पहुंचते हुए 4बज गए थे 
 ऑटो में पूरे रास्ते कामिनी चुप रही, लेकिन उसका दिमाग शोर मचा रहा था।
हॉस्पिटल के उस वार्ड में, जहाँ उसे रघु की चिंता होनी चाहिए थी, वहाँ उसके जेहन में कादर खान का चेहरा घूम रहा था।
उसका वो मैला-कुचैला कुर्ता, जिस पर शायद खून के छींटे थे (शायद वह कसाई का काम करता था)। उसके मुंह से आती सड़ी हुई शराब और तीखे पान की गंध। और सबसे बढ़कर... उसकी वो बेबाक, नंगी नज़रें।
​कामिनी ने घर के सोफे पर बैठते हुए अपनी साड़ी के पल्लू को कसकर पकड़ा।
उसे याद आया कि कैसे कादर की नज़रें सीधे उसके ब्लाउज के अंदर झांक रही थीं। उसने कोई शर्म नहीं की थी, कोई लिहाज़ नहीं किया था। रघु तो फिर भी "मालकिन" बोलकर डरता था, लेकिन कादर? उसकी आँखों में तो जैसे कामिनी को वहीं नंगा कर देने की हवस थी।
"छी... कितना गंदा आदमी था," कामिनी ने बुदबुदाते हुए खुद को समझाने की कोशिश की।

लेकिन...
उसकी जांघों के बीच एक अजीब सी 'मीठी टीस' उठी।
उस "छी" के पीछे एक "आह" छुपी थी।
कामिनी को हैरानी हुई कि उसे घिन आने के बजाय, अपने निप्पल खड़े होते महसूस हो रहे थे।
'मैं कैसी औरत बन गई हूँ? पहले नौकर रघु, और अब वो मवाली जैसा कादर... मुझे ये गंदे मर्द ही क्यों अच्छे लग रहे हैं?'

​बंटी, जो किचन से पानी पीकर आया, उसने कामिनी को ख्यालों में खोया देखा।

"क्या सोच रही हो माँ? रघु आ जाएगा," बंटी ने सहजता से कहा।

कामिनी हड़बड़ा गई। "नहीं... मैं तो बस... वो आदमी कितना अजीब था ना बंटी? कैसे घूर रहा था मुझे।"
बंटी ने पानी का गिलास रखा और कामिनी के पास सोफे के हत्थे पर बैठ गया।

"मर्द है माँ... और तुम इतनी खूबसूरत हो। कोई अंधा ही होगा जो तुम्हें नहीं घूरेगा।"
बंटी ने कामिनी के कंधे पर हाथ रखा।
"और सच बताऊँ माँ? मुझे लगा तुम्हें उसका घूरना बुरा नहीं लगा।"
​कामिनी का चेहरा लाल हो गया। बंटी फिर से उसकी चोरी पकड़ रहा था।
"बकवास मत कर..." कामिनी ने नज़रें चुराईं।
"अच्छा?" बंटी हँसा। "तो फिर तुम्हारे ये..." उसने अपनी नज़रें कामिनी के ब्लाउज पर गड़ा दीं, जहाँ उसके निप्पल ब्लाउज के अंदर से ही तने हुए दिख रहे थे। "...ये गवाही क्यों दे रहे हैं?"

​कामिनी ने झट से पल्लू से अपना सीना ढक लिया।
"जा अपने कमरे में... बड़ा आया जासूस," कामिनी ने डांटने का नाटक किया।
बंटी मुस्कुराते हुए अपने कमरे की तरफ चल दिया। " 

बंटी के कमरे में जाने के बाद, हॉल में फिर से सन्नाटा छा गया। कामिनी ने एक गहरी सांस ली और अपनी नज़रें फिर से अपने सीने पर झुका लीं।
बंटी सही कह रहा था।
उसकी साड़ी के रेशमी कपड़े के नीचे, उसके ब्लाउज की कैद में, उसके निप्पल (Nipples) सचमुच पत्थर की तरह सख्त हो चुके थे। वे कपड़े को भेदकर बाहर आने के लिए मचल रहे थे।
कामिनी ने कांपते हाथों से अपने ब्लाउज के ऊपर से ही अपने स्तन को मुट्ठी में भरा।

एक बिजली सी उसके बदन में दौड़ गई।
"उफ्फ्फ्फ..."
यह उत्तेजना सामान्य नहीं थी। यह रघू की वहशीयत वाली उत्तेजना नहीं थी। यह कुछ और था... उस से भी 'गंदा'।

कामिनी ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
अंधेरे में उसे रघू का चेहरा नहीं, बल्कि कादर खान का चेहरा दिखाई दिया।
वह पान से रंगे लाल होंठ... वह गंदी हंसी... कुर्ते पर लगे वो खून के धब्बे... और उसके शरीर से आती वह तीखी, मर्दाना बदबू।
सामान्य तौर पर किसी भी सभ्य औरत को उबकाई आ जाती।
लेकिन कामिनी? कामिनी सामान्य औरत रही ही कहाँ थी, वो तो कुछ ओर ही हो चुकी थी.
कामिनी को अपनी जांघों के बीच नमी महसूस होने लगी।
'क्या हो गया है मुझे?' उसने मन ही मन खुद से सवाल किया।

कामिनी को याद आया कि कादर ने उसे 'मालकिन' नहीं, बल्कि एक 'औरत' की तरह देखा था। उसकी नज़रों में कोई इज़्ज़त नहीं थी, सिर्फ़ नंगा कर देने वाली हवस थी।
और यही बात... यही "अपमानित होने का डर" और "भोग की वस्तु समझे जाने का रोमांच" कामिनी को अंदर ही अंदर पिघला रहा था।

बरसों तक वह रमेश की 'ट्रॉफी वाइफ' बनकर रही, साफ़-सुथरी, महकती हुई गुड़िया।
लेकिन रघू के साथ उस स्टोर रूम की गंदगी में लोटने के बाद, उसके अंदर की 'जानवर' जाग चुकी थी।

उसे अब एहसास हो रहा था कि उसे सिर्फ़ प्यार नहीं चाहिए... उसे रौंदा जाना है। उसे वहशीपन चाहिए।
और कादर खान उस 'वहशीपन' का जीता-जागता पुतला था।
कामिनी का हाथ अनजाने में सरककर उसकी साड़ी के अंदर, उसकी जांघों के बीच चला गया।
पैंटी गीली हो चुकी थी।
उसने अपनी उंगली से उस गीलेपन को छुआ।

"हाँ..आअह्ह्ह... इस्स्स....." कामिनी ने खाली कमरे में अपनी ही सिसकी सुनी। "बंटी सच कह रहा था... मुझे वो गंदा आदमी पसंद आया। मुझे उसका घूरना पसंद आया।"

एक अजीब सी थरथराहट उसके जिस्म में दौड़ गई।
कामिनी ने झटके से अपना हाथ बाहर निकाला। उसे खुद पर शर्म भी आ रही थी और गर्व भी।
उसने रघू के लिए लाए गए कपड़ों (टी-शर्ट और पाजामा) के थैले को देखा जो पास ही पड़ा था।
उसका ध्यान वापस से रघु की तरफ चला गया, अभी तक आया नहीं.
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शाम गहरा चुकी थी। घर के लैंडलाइन फ़ोन की घंटी बजी, जिससे ख्यालों में खोई कामिनी चौंक उठी।
फ़ोन रमेश का था।
"हेलो... सुनो, आज मुझे आने में देर हो जाएगी। शमशेर के साथ हूँ, कुछ काम है। तुम और बंटी खाना खाकर सो जाना।"
रमेश की आवाज़ में जो लड़खड़ाहट थी, वह साफ़ बता रही थी कि 'काम' नहीं, बल्कि 'जाम' चल रहा है।
"जी ठीक है," कामिनी ने छोटी सी बात कहकर फ़ोन रख दिया।
फ़ोन रखते ही उसने राहत की एक गहरी सांस ली। उसके चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान तैर गई। 

करीब 8 बजे के आसपास, पीछे के गेट से आहट हुई।
रघु घर आ गया था।
कामिनी ने किचन की खिड़की से झांककर देखा। आज रघु की चाल में वो शराबी वाली लड़खड़ाहट नहीं थी। उसके कदम ज़मीन पर मज़बूती से पड़ रहे थे। 

रघु सीधा अपने स्टोर रूम की तरफ बढ़ा।
जैसे ही उसने स्टोर रूम का दरवाज़ा खोला और बत्ती जलाई, उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
हमेशा कबाड़खाने जैसा दिखने वाला उसका कमरा आज बदला हुआ था।
उसकी पुरानी, चरमर करती खटिया पर एक साफ़-सुथरी, सफ़ेद चादर करीने से बिछी हुई थी। और खटिया के सिरहाने, एक थैले में दो नई टी-शर्ट और पाजामे रखे थे।
रघु का दिल भर आया। वह समझ गया कि यह सब मालकिन ने किया है।
उसने उन कपड़ों को हाथ में लिया, उन्हें अपनी नाक से लगाकर सूंघा। उनमें से कामिनी की महक आ रही थी।

"मालकिन..." रघु बुदबुदाया। उसके मन में कामिनी के लिए जो हवस थी, उसमें अब एक गहरा 'एहसान' और 'कर्तव्य' (Duty) भी जुड़ गया। उसने तुरंत अपने मैले कपड़े उतारे और कामिनी के लाए हुए नए कपड़े पहन लिए।

उधर शहर के बाहर, एक ढाबे पर:
हाईवे के किनारे बने एक छोटे ढाबे के बाहर धूल उड़ाती हुई पुलिस की जीप आकर रुकी।
जीप के बोनट पर 'पुलिस' लिखा था और अंदर रमेश और शमशेर बैठे थे, जो पहले से ही फुल टुन्न थे।

"यहाँ का मटन शानदार होता है भाई, कल की कसरत के बाद ये खाना ज़रूरी है," शमशेर ने जीप से उतरते हुए अपनी बेल्ट ठीक की। उसकी आँखों में कल रात सुनैना के साथ बिताए पलों की चमक थी।
रमेश भी लड़खड़ाते हुए उतरा।
"अबे कितना जलाएगा मुझे? साला मैं जोश-जोश में ज्यादा पी गया, वरना मैं भी पेल लेता उस रंडी को," रमेश ने कुंठा में अपने ढीले-ढाले लंड को पैंट के ऊपर से ही टटोला। उसे अभी भी मलाल था कि सुनयना जैसी औरत उसके हाथ से निकल गई।

"हाहाहाहा.... कहाँ जाएगी?" शमशेर ने रमेश के कंधे पर ज़ जोर से हाथ मारा। "अब तो वो फंस गई समझ। हम दोनों से कोई बचा है आखिर?"
दोनों ने एक वहशी ठहाका लगाया और ढाबे की एक खाली खटिया की तरफ बढ़ गए।

"हाँ भाई कादर... लगा दे दो स्पेशल थाली!" शमशेर ने अपनी रौबदार आवाज़ में आर्डर दिया।
आवाज़ सुनते ही, ढाबे के अंदर से कादर खान मुँह में पान चबाते हुए भागता हुआ आया।
"अरे आइये साब... आज बड़े दिन बाद दिखे!" कादर ने झुककर सलाम ठोका।
"काम था बे," शमशेर ने अकड़ दिखाई। "ये रमेश साब हैं, खास दोस्त मेरे। इनको अपना वो 'स्पेशल मटन पाया सूप' पिला... ऐसा कि जवानी फिर से भड़क जाए। इनका इंजन ठंडा पड़ा है।"

रमेश ने कादर को देखा। यह वही शख्स था जो आज दोपहर कामिनी को हॉस्पिटल में मिला था। उसका हुलिया अब भी वैसा ही था—कुर्ते पर खून और मसालों के दाग, और पान की लाली।
कादर की यहाँ कसाई की दुकान भी थी और पीछे यह ढाबा भी।
"फिक्र मत करो साब," कादर ने रमेश को घूरते हुए एक गंदी हंसी हंसी। "ऐसा मटन खिलाऊंगा कि मुर्दे में भी जान आ जाए। सुबह तक आपका तंबू खड़ा रहेगा।"

"छोटू... जल्दी लगा थाली!" कादर ने अपने नौकर को चिल्लाया।
"और कोई दिक्कत?" शमशेर ने अपने बाजु (Side pocket) से व्हिस्की का एक क्वार्टर निकालकर स्टील के गिलास में डाला।

"आपके रहते क्या मुसीबत मालिक," कादर ने हाथ जोड़े।
दरअसल, कादर सिर्फ़ मटन नहीं बेचता था। कसाई के धंधे की आड़ में वह ड्रग्स (गांजा-अफीम) की पुड़िया भी सप्लाई करता था, और शमशेर उसे पुलिस से बचाकर रखता था। यह उनका पुराना धंधा था।

"जा तू... माल बढ़िया होना चाहिए," शमशेर ने इशारा किया।

वापस घर पर:
घड़ी में 9 बज रहे थे। कामिनी और बंटी अपना खाना खा चुके थे।
"आओ माँ... रघु के हाल-चाल जान लें। वो भूखा भी होगा," बंटी ने कहा।

उसने दो मोटी रोटियां और सब्ज़ी एक स्टील की थाली में रखी।
कामिनी ने अपना पल्लू ठीक किया और बंटी के साथ पीछे के आंगन में बने स्टोर रूम की तरफ चल दी।
दरवाज़ा खुला था।
अंदर रघु खटिया पर बैठा था। उसने कामिनी की दी हुई नीली टी-शर्ट और पाजामा पहन रखा था। साफ़ कपड़ों में वह अब नौकर कम और घर का सदस्य ज्यादा लग रहा था।
"क्या बात है रघु... अच्छे लग रहे हो," बंटी ने अंदर घुसते ही कहा।
रघु हड़बड़ा कर खड़ा हो गया। "जी... छोटे मालिक।"
"अब तबियत कैसी है?" कामिनी ने बड़े प्यार से पूछा। उसकी नज़रें रघु के चौड़े सीने पर थीं जो टी-शर्ट में उभर रहा था।

"दिख नहीं रहा माँ? तरोताज़ा दिख रहा है," बंटी ने रघु की बांह पर रखा थपकी दी।
 "देसी दवाई का असर है।"

रघु ने शर्म से नज़रें झुका लीं। वह कामिनी से नज़रें नहीं मिला पा रहा था।
"जी.. जी... छोटे मालिक.. वो आदत है, बिना देसी के बीमार हो जाता हूँ।"

"ये लो खाना खा लो," बंटी ने खाने की थाली रघु के हाथ में पकड़ा दी।
रघु वापस खटिया पर बैठ गया। कामिनी और बंटी सामने खड़े रहे।
रघु ने सब्ज़ी की कटोरी से एक निवाला तोड़ा।
अभी वह निवाला उसके मुंह तक पहुंचा भी नहीं था कि बंटी ने अचानक एक ऐसा सवाल दागा जिसने कमरे का माहौल बदल दिया।

"वैसे रघु... ये 'सुगना' कौन है?"
बंटी की आवाज़ शांत थी, लेकिन सवाल किसी बम धमाके से कम नहीं था।
रघु का हाथ हवा में ही जम गया।
उसके चेहरे का रंग उड़ गया। नशा, बीमारी, हवस... सब एक पल में गायब हो गए।
"खट..." उसके हाथ से रोटी का टुकड़ा छूटकर थाली में गिर पड़ा।
कामिनी भी सकते में आ गई। उसका दिल ज़ोर से धड़का।
'सुगना...?' उसे याद आया कि रघु बुखार में यही नाम बड़बड़ा रहा था। और कल रात... कल रात उसने कामिनी को भी 'सुगना' ही बुलाया था।

कामिनी ने घबराकर बंटी को देखा। 'ये क्या पूछ लिया इसने?'
लेकिन बंटी के चेहरे पर कोई घबराहट नहीं थी।
उसने कामिनी की तरफ देखा और धीरे से एक आँख झपका दी (Winked)।
बंटी धीरे से फुसफुसाया — "घबराओ मत माँ.... आखिर हमें ये तो मालूम हो जो हमारे घर मे रह रहा है "आखिर वो है कौन?"

कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया। रघु की सांसें अटक गई थीं। वह चोर की तरह कभी बंटी को तो कभी कामिनी को देख रहा था।
"ब... ब... वो... वो सुगना..." रघु हकलाने लगा.

स्टोर रूम में एक भारी सन्नाटा छा गया था। रघु के हाथ से रोटी का निवाला छूट चुका था। उसकी आँखों में वो पुराना, दबा हुआ दर्द किसी सैलाब की तरह उमड़ आया था।
उसने अपनी कांपती हुई उंगलियों को अपनी मुट्ठी में भींचा और सिर झुका लिया।
"सुगना..." रघु की आवाज़ किसी गहरे कुएं से आती हुई महसूस हुई।
"सुगना मेरी पत्नी थी, छोटे मालिक।"
कामिनी और बंटी चुपचाप खड़े रहे, रघु के अगले शब्दों का इंतज़ार करते हुए।
रघु ने अपनी गीली आँखें ऊपर उठाईं और दीवार की तरफ घूरते हुए बोलना शुरू किया।

"मेरी शादी को अभी सिर्फ़ 2 साल हुए थे। मैं किशनगंज नाम के एक छोटे से गाँव का रहने वाला था। तब मैं ऐसा नहीं था... मैं एक हट्टा-कट्टा, 22 साल का मेहनती गबरू जवान था। मेरे पास अच्छी-खासी पुश्तैनी ज़मीन थी, खूब खेती होती थी। मुझे किसी का डर नहीं था।"

रघु के चेहरे पर एक फीकी मुस्कान आई।
"मैं अपनी सुगना के साथ बहुत खुश था। वो बहुत खूबसूरत थी... बिल्कुल..." रघु की नज़र एक पल के लिए कामिनी पर गई और फिर झुक गई। "...बिल्कुल मालकिन जैसी भरी-पूरी। उस वक़्त वो गर्भवती थी। हमारे घर में किलकारी गूंजने वाली थी। हमारा भविष्य बहुत सुनहरा लग रहा था।"

रघु की आवाज़ भारी होने लगी।
"लेकिन फिर हमारी खुशियों को नज़र लग गई। सरकार का आर्डर आया कि हमारे गाँव से हाईवे निकलेगा। मेरी ज़मीन रोड के नक़्शे में आ गई। हमें बताया गया कि ज़मीन के बदले करोड़ों का मुआवज़ा मिलेगा।"

"कुछ दिनों बाद, नपाई-जोखाई करने के लिए शहर से एक 'सिविल इंजीनियर' आया।"
रघु की मुट्ठी कस गई, उसकी नसों में गुस्सा दौड़ने लगा।
"मुझे अपनी पुश्तैनी ज़मीन जाने का गम था, लेकिन आने वाले बच्चे और पैसे की खुशी भी थी। वो इंजीनियर कई बार मेरे घर आया। वो कागज़ात देखने के बहाने आता, लेकिन मैं... मैं मूर्ख समझ ही नहीं पाया कि उसकी गिद्ध जैसी नज़र ज़मीन पर नहीं, मेरी बीवी सुगना पर थी।"

"पूरे गाँव वालों को मुआवज़ा मिल गया, बस मेरा ही पैसा अटक गया। जब मैंने उस इंजीनियर से शिकायत की, तो वो बोला—'तेरी ज़मीन बड़ी है रघु, वक्त लगेगा'।"

रघु की आँखों से आंसू टपक कर उसकी जांघों पर गिरने लगे।
"एक काली रात... वो इंजीनियर नशे में धुत मेरे घर आ धमका। वो सीधा मेरे पास आया और बोला—'तुझे पैसे चाहिए ना? तो अपनी बीवी को एक रात के लिए मेरे पास छोड़ दे'।"

कामिनी के मुंह से एक सिसकी निकल गई। उसने अपने मुंह पर हाथ रख लिया।

रघु बोलता रहा, "वो मेरी बीवी का दीवाना था। सुगना का भरा हुआ बदन, उसके बड़े स्तन और गर्भावस्था में उभरा हुआ उसका पेट... वो राक्षस उस हालत में भी मेरी बीवी को भोगना चाहता था। मेरा खून खौल उठा। मैंने आव देखा न ताव, उस इंजीनियर के गाल पर एक ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया और उसे धक्के मारकर घर से निकाल दिया।"

"जाते-जाते वो अपनी लाल आँखों से मुझे घूरते हुए बोला—'बहुत गर्मी है तुझमें? तेरी ये गर्मी मैं निकालूंगा'।"

"मैं अगले दिन शहर जाकर बड़े अफ़सरों से शिकायत करने वाला था, लेकिन..." रघु का गला रुंध गया।

 "अगली ही रात वो वापस आ गया। इस बार वो अकेला नहीं था। उसके साथ एक बड़ी मूंछों वाला पुलिस वाला भी था।"
"उस पुलिस वाले ने आते ही मुझे दबोच लिया। उसने मुझे रस्सी से कुर्सी पर बांध दिया। मैं चीखता रहा, हाथ-पैर मारता रहा।"

"और फिर... उस इंजीनियर ने मेरे सामने... मेरी आँखों के सामने मेरी इज़्ज़त, मेरी सुगना को बालों से पकड़कर घसीटा।"
रघु अब फूट-फूट कर रो रहा था।

"उस राक्षस ने मेरी गर्भवती बीवी के कपड़े फाड़ दिए। उसने उसे नंगा कर दिया। वो जानवर उसके जिस्म को आटे की तरह मसलने लगा। वो खुद भी नंगा हो गया।"
"लेकिन शायद भगवान का श्राप था या ज़्यादा नशा... उस नामर्द का लंड खड़ा नहीं हो रहा था।"

रघु की आवाज़ में घृणा और दर्द का तूफ़ान था।
"वो पागल हो गया था। 'साली खड़ा कर इसे... चाट... चाट इसे...' वो चिल्ला रहा था। वो मेरी सुगना को मार रहा था, उसके नाज़ुक स्तनों को दांतों से काट रहा था, उसके पेट पर घूंसे मार रहा था। सुगना दर्द से रो रही थी, गिड़गिड़ा रही थी, लेकिन उसे सुगना के आंसुओं में मज़ा आ रहा था।"

"मैं उस पुलिस वाले से दया की भीख मांगता रहा, लेकिन वो मुझे जूतों से मारता रहा।"
"जब उस इंजीनियर का लंड खड़ा नहीं हुआ, तो वो वहशीपन की सारी हदें पार कर गया। उसने गुस्से में आकर अपना पूरा हाथ... मेरी बीवी की नाज़ुक योनि के अंदर घुसा दिया।"
"धाओ... धप... धप..." रघु ने अपनी छाती पीट ली।

"वो अपना हाथ अंदर-बाहर करने लगा, पागलों की तरह उसे चाटने लगा। मेरी बीवी की चीखें आसमान चीर रही थीं, लेकिन उस शैतान का दिल नहीं पसीजा। थोड़ी देर में... बिना कुछ किए ही वो झड़ गया। उसकी वीर्य की पिचकारी बाहर ही निकल गई।"

"अपनी नामर्दी पर वो और भड़क गया। उसकी नज़र पास पड़े एक लोहे के सरिये (Iron Rod) पर गई।"
रघु की आँखें दहशत से फैल गईं, जैसे वो मंज़र अभी भी उसके सामने हो।

"वो चिल्लाया—'साली लंड भी खड़ा नहीं कर सकती! किस काम की औरत है तू!'... और..."
रघु कांपने लगा।
"और उसने वो लोहे का सरिया... मेरी फूल जैसी बीवी की योनि में पूरी ताकत से घुसा दिया।"

"आआआहहहह...... !!!"
कामिनी की चीख निकल गई। बंटी भी सिहर उठा।

"मेरी सुगना के मुंह से खून की उल्टी निकली। उसकी आँखों की पुतलियां पलट गईं। एक ही झटके में सब खत्म हो गया... मेरी बीवी... मेरा अजन्मा बच्चा... सब मार दिए गए।"
रघु ने अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया।

"मैं वो नज़ारा देख नहीं सका... मैं बेहोश हो गया।"
"जब सुबह मेरी आँख खुली... तो मेरे घर के बाहर पुलिस खड़ी थी। वही पुलिस वाला, जो रात को उस राक्षस के साथ था, मुझे कॉलर से घसीटता हुआ बाहर ले जा रहा था।"

"गाँव वाले जमा थे। पुलिस वाला चिल्ला रहा था—'साले, अपनी ही बीवी को मार डाला! ऐसा कोई करता है क्या!'"

"वो इंजीनियर भीड़ में खड़ा होकर मगरमच्छ के आंसू बहा रहा था। मुझे ही मेरी बीवी और बच्चे का हत्यारा बना दिया गया।"

"मैं जेल गया, सब कुछ बिक गया, और जब छूटा... तो यहाँ, इस शहर में एक ज़िंदा लाश बनकर आ गया।"
कमरे में मौत जैसा सन्नाटा छा गया। सिर्फ़ रघु की सिसकियाँ गूंज रही थीं।
कामिनी की आँखों से आंसू बहकर उसके गालों को भिगो रहे थे। बंटी, जो हमेशा सख्त बनने का नाटक करता था, उसकी आँखें भी नम थीं।
उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि जिस इंसान को वे सिर्फ़ एक 'नौकर' या गन्दा शराबी समझ रहे थे, उसके सीने में कितना गहरा ज़ख्म और कितना खौफनाक अतीत दफ़न था।

रघु की वहशियत, उसका पागलपन... सब उस एक रात की देन थे।
कामिनी ने आगे बढ़कर रघु के सिर को अपनी छाती से लगा लिया।
आज उसे रघु पर वासना नहीं, बल्कि एक माँ जैसी ममता और एक औरत जैसा गहरा दुख महसूस हो रहा
 था।

वही दूसरी तरफ 
स्थान: कादर खान का ढाबा

रात के सन्नाटे में जीप का इंजन गूंजा। रमेश और शमशेर, मटन और शराब के नशे में आकंठ डूबे हुए, कादर के ढाबे से उठ खड़े हुए। उन्होंने पैसे देने की ज़हमत नहीं उठाई। कादर तो वैसे भी उनका ही पाला हुआ गुंडा था, उसकी क्या मजाल कि वह शमशेर साहब से पैसे मांगता। वह दूर खड़ा बस सलाम ठोकता रहा।
रमेश लड़खड़ाते कदमों से जीप की अगली सीट पर धंस गया। उसका नशा गहरा था, लेकिन हवस का नशा उससे भी ज्यादा था। उसका दिमाग अभी भी उस सुनैना (जिसके साथ कल छत पर कांड हुआ था) पर अटका हुआ था।
"हरामी..." रमेश ने शमशेर के कंधे पर मुक्का मारा, "तूने मुझे जगाया भी नहीं? कम से कम उसकी चूत ही चाट लेता मैं... साली हाथ से निकल गई।"
शमशेर ने जीप स्टार्ट की और एक कमीना ठहाका लगाया।
"हाहाहाहा... अबे कितना रोएगा उसके लिए?" शमशेर ने गियर बदलते हुए कहा, "तुझे वो 'सुगना' याद है? वो किशनगंज वाली?"
रमेश की धुंधली आँखों में एक चमक आ गई।
"किशनगंज...?" रमेश ने अपनी जीभ होठों पर फेरी, जैसे किसी पुराने शिकार का स्वाद याद आ गया हो। "हाँ, याद है... क्या माल थी साली। उसका तो रोना भी बड़ा सेक्सी लगता था। लेकिन उसका क्या?"
शमशेर ने स्टीयरिंग पर उंगलियां नचाईं। "तेरी एक खासियत है रमेश... तेरी नज़र एक बार जिस औरत पर पड़ गई, उसका बचना नामुमकिन है। याद है उस सुगना का क्या हश्र किया था हमने? बस समझ ले, अब ये सुनैना भी गई।"
दोनों दोस्त उस सुनसान हाइवे पर जोर-जोर से हंस पड़े। उनकी हंसी में कोई पछतावा नहीं था, सिर्फ़ शैतानी अहंकार था।
"सही कह रहा है," रमेश ने अपनी सीट पीछे की। "चुपचाप देगी तो रानी बना के रखूँगा... वरना..." उसका चेहरा सख्त हो गया, "वरना उसका भी वही हाल होगा जो उस गँवार की बीवी का हुआ था।"

जीप धूल उड़ाती हुई अंधेरे में गायब हो गई, लेकिन उनकी पाप भरी बातें हवा में ज़हर घोल गईं।

स्थान: कामिनी का घर (स्टोर रूम)

स्टोर रूम में मौत जैसा सन्नाटा पसरा था। रघु की कहानी खत्म हो चुकी थी, लेकिन उसका दर्द अभी भी कमरे की हवा में तैर रहा था।
कामिनी की आँखों से आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि जिस आदमी को वह शराबी और गिरा हुआ समझती थी, उसकी ज़िंदगी इतनी बड़ी त्रासदी है।

कामिनी ने खुद को संभाला। उसके अंदर एक गुस्सा उबलने लगा।
"रघु..." कामिनी ने भारी आवाज़ में पूछा, "तुम्हें उस इंजीनियर की शक्ल याद है? तुमने उसे ढूंढने की कोशिश नहीं की? और वो पुलिस वाला... उसका चेहरा तो याद होगा?"

कामिनी रघु के करीब आई, मानो उसे अभी इन्साफ दिला देगी।
रघु ने एक गहरी, हताश सांस ली और कामिनी के हाथों से अपना हाथ छुड़ा लिया।.

"मालकिन..." रघु की आवाज़ में जीवन की कोई उम्मीद नहीं बची थी।
"मैं 10 साल जेल में रहा। कालकोठरी का अंधेरा, रोज़ की मार, पुलिस वालों की गालियां... वो सब सहते-सहते मेरा दिमाग सुन्न हो गया। मुझे अब कुछ याद नहीं। उस इंजीनियर का चेहरा, उसका नाम... सब धुंधला हो गया है। और पुलिस वाला ? पुलिस वाले तो अब मुझे सब एक जैसे ही लगते हैं—वर्दी वाले राक्षस।"

रघु ने अपनी सूजी हुई आँखों को रगड़ा।
"जेल में मुझे कादर भाई मिला था। उसका आना जाना लगा रहता था जेल मे। बस उसी ने मेरा दर्द समझा, मुझे जिन्दा रखा। जब मैं वहां से छूटा, तो मेरे पास जाने को कोई जगह नहीं थी।

 मैं इसी शहर में आ गया। कुछ दिन कादर भाई के ढाबे पर रहा, लेकिन कब तक अहसान लेता? छोटा-मोटा काम करने लगा, कबाड़ा बेचता, मजदूरी करता, फिर रात मे जहाँ जगह मिलती वहाँ थक के सो जाता, ऐसे ही आपके बँगले के बहार आ कर सोने लगा था मै" 

रघु ने दीवार की तरफ देखा, जहाँ उसका पुराना जीवन कहीं खो गया था।
"लेकिन ये ग़म... सुगना की याद... ये मुझे जीने नहीं देती थी। इसलिए ये शराब... बस यही अब मेरा सहारा है, मेरा अंतिम लक्ष्य है। अब किसी से बदला नहीं लेना मालकिन... बस मौत का इंतज़ार करना है। यही मेरी ज़िंदगी है।"

रघु के आंसू अब सुख चुके थे। उसकी आँखों में एक वीरान रेगिस्तान था। उसने अपनी बात खत्म की और सिर झुका लिया।
कामिनी का दिल पसीज गया। वह आगे बढ़ी और रघु के सिर पर हाथ फेरने लगी, उसे मूक सांत्वना देती हुई। वह रो रही थी, एक औरत होने के नाते सुगना का दर्द और एक इंसान होने के नाते रघु की तड़प उसे अंदर तक बेध गई थी।

लेकिन... कमरे के दूसरे कोने में खड़ा बंटी रो नहीं रहा था।
बंटी का दिमाग किसी कंप्यूटर की तरह तेज़ी से चल रहा था। रघु की बातों ने उसके अंदर शक की एक चिंगारी सुलगा दी थी।
"किशनगंज..."
यह शब्द बार-बार बंटी के दिमाग में हथौड़े की तरह बज रहा था।
उसे याद आया... बचपन में जब दादाजी ज़िंदा थे, तो वो अक्सर बातों-बातों में बताते थे— "तेरा बाप जब नया-नया इंजीनियर बना था, तो उसकी पहली बड़ी पोस्टिंग किशनगंज में हुई थी। हाईवे प्रोजेक्ट था।"
बंटी की मुट्ठी अपने आप भींच गई।
इंजीनियर... हाईवे प्रोजेक्ट... पुलिस वाला दोस्त (शमशेर अंकल)... और किशनगंज।
सारे तार जुड़ रहे थे।

रघु ने जिसे 'राक्षस' कहा, जिसे 'वहशी' कहा... क्या वो कोई और नहीं बल्कि उसका अपना बाप रमेश था?
और वो पुलिस वाला... क्या वो शमशेर था?

बंटी का खून जमने लगा। उसे अपने बाप की असलियत पता थी, वह जानता था कि रमेश घर में कैसा है, लेकिन क्या वह इतना गिर सकता है? क्या वह किसी की बीवी के प्राइवेट पार्ट में लोहे की रॉड डाल सकता है?

बंटी के जबड़े आपस में इतनी जोर से भिंचे कि दांतों के पीसने की आवाज़ आई।
उसने रघु को देखा—यह बदनसीब आदमी, जिसकी ज़िंदगी बर्बाद हो गई, आज उसी कातिल के घर में नौकरी कर रहा है? उसी कातिल के बेटे और बीवी के सामने रो रहा है?

बंटी की आँखों में अब आंसू नहीं, बल्कि एक ठंडी आग थी।
'मुझे पता लगाना होगा, मुझे शक को यकीन में बदलना होगा। और अगर यह सच निकला... तो पापा, आपका हिसाब अब मैं करूँगा।'

(क्रमशः)




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2 Comments

  1. Mujhe lag to raha tha shamsher aur raghu ka pehle ka hisab hoga magar ye Ramesh namard bhi shamil hai vo bhi main culprit

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