मेरी माँ कामिनी -19
उसे आज कोई शर्मिंदगी नहीं हो रही थी, रघु का गन्दा लंड चूस के हिकारात नहीं महसूस हो रही थी.
यहाँ तक की उसने बाथरूम मे आ कर ना कुल्ला किया, ना ही पानी से मुँह धोया... वो अपने मुँह का स्वाद बरकरार रखना चाह रही थी.
गजब का परिवर्तन आया था कामिनी ने या फिर वो रघु की तरफ से पूरी तरह निश्चिन्त थी.
उसने टेबल पर रखा फोन उठाया और रमेश को डायल किया।
"सुनो, आज शाम जल्दी आ जाना। रवि और उसकी माँ सुनयना को मैंने खाने पर बुलाया है।"
फोन के दूसरी तरफ रमेश की जैसे लॉटरी लग गई हो। इसका मन सुनयना को सोच कर झूम उठा "काम तो बहुत है, लेकिन ठीक है मै आ जाऊंगा।"
कामिनी फोन रख बड़बड़ाई " जैसे मुझे पता नहीं, मेरे एक बार कहने पर जल्दी आ जाओगे "
कामिनी के चेहरे से जलन साफ महसूस हो रही थी,
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छत के उस वहशी मंजर के बाद कामिनी अपने कमरे में दाखिल हुई। कमरे का सन्नाटा उसे डरा नहीं रहा था, बल्कि उसे किसी पुरानी याद की तरह लग रहा था। उसने दरवाज़ा बंद किया और सीधा आईने के सामने खड़ी हो गई।
आईने में जो औरत उसे दिख रही थी, वह 'बंटी की मम्मी' या 'रमेश की पत्नी' नहीं थी। उसकी आँखें नशीली और चढ़ी हुई थीं, चेहरा उत्तेजना और धूप की तपिश से तमतमाया हुआ था। कामिनी ने अपने होंठों पर अपनी उंगली फेरी—वह कड़वा, खारा और तीखा स्वाद अभी भी वहां मौजूद था। उसने बाथरूम की ओर देखा, पर उसके पैर नहीं बढ़े। उसने तय कर लिया था कि वह रघु की उस 'मर्दानगी' को अपने मुँह से साफ़ नहीं करेगी। वह स्वाद उसे याद दिला रहा था कि उसने एक नौकर की हस्ती को अपने मुँह के अंदर कुचल दिया था।
"वो डर कर भाग गया... शराबी कहीं का, " कामिनी बुदबुदाई। रघु की वह दहशत, उसका वीर्य छोड़ते ही कांपना और फिर 200 रुपये लेकर वहाँ से खिसक लेना, कामिनी को एक अजीब सी जीत का अहसास करा गया।
कामिनी ने अपनी अस्त-व्यस्त साड़ी और ब्लाउज को बदन से अलग कर दिया। दोपहर की सुनहरी धूप खिड़की से छनकर उसके दुधिया बदन पर पड़ रही थी। उसने अपनी नग्नता को आईने में बारीकी से निहारा।
उसके गोरे स्तनों पर उसके खुद के हाथो की छाप पड़ी हुई थी, उसने उत्तेजना मे कस के अपने स्तनो को भींचा था, ये निशान किसी अनमोल जेवर की तरह उभर आए थे।
उसकी जांघों पर खरोंचें थीं, जो की कल रात का सबूत थी, की उसने किस वहसी तरीके स रघु को हलवा खिलाया था, चुत का ऊपरी हिस्सा गर्म पूड़ी जैसा फूल के बहार को आ गया था, जिसे छूने की हिम्मत भी नहीं कर पा रही थी.
कामिनी को अपनी जांघों के बीच एक तीखी और रसीली जलन महसूस हो रही थी। रघु का वह खुरदरापन उसके नाजुक अंगों को छील चुका था। हर बार जब वह अपनी जांघें हिलाती, तो उसे एक 'करंट' सा लगता। यह जलन उसे दर्द नहीं दे रही थी, बल्कि उसे और भी ज़्यादा कामपिपासु (Sexually Hungry) बना रही थी। उसकी चूत अभी भी पानी छोड़ रही थी, जैसे रघु की वह वहशत उसे तृप्त करने के बजाय और ज़्यादा भूखा छोड़ गई हो।
उसने अलमारी खोली और अपनी सबसे महँगी और पारदर्शी काली शिफॉन की साड़ी निकाली। आज वह कुछ भी 'साधारण' नहीं पहनना चाहती थी।
उसने अपनी नग्न देह पर सिर्फ़ वह काला झीना कपड़ा लपेटा। उसने जानबूझकर ब्लाउज के नीचे ब्रा नहीं पहनी। वह चाहती थी कि उसके स्तनों का वह भारीपन, स्तनो पर उभरी नीली नसे साड़ी के पतले कपड़े से साफ़ झलकें।
उसने अपनी कमर पर साड़ी को इतना नीचे बांधा कि उसकी गहरी नाभि और कमर का गोरा घेरा, उसकी ढलान जो सीधा चुत रुपी खाई मे गिर जाती थी,
साफ देखी जा सकती थी.
उसने अपने बालों को खुला छोड़ दिया। आँखों में गहरा काजल लगाया और माथे पर एक बड़ी लाल बिंदी सजाई। आईने में अब वह एक अप्सरा या यूँ कहिये प्यासी अप्सरा सी दिख रही थी।
काली साड़ी ने उसके गोरे बदन को ऐसे जकड़ रखा था जैसे कोई काला साया चाँद को अपनी आगोश में ले ले।
आज एक नयी कामिनी का उदय हुआ था.
उसने अपनी गर्दन पर इत्र लगाया और खुद से कहा—
घरेलु हूँ तो क्या हुआ, मै किसी से कम हूँ क्या? मै आज भी सुन्दर हूँ।"
खुद को घरेलु कहने से मतलब सजायाद सुनायाना का मॉर्डन होना था, औरतों की बात ही अलग है, वो दूसरी औरत का खूबसूरत होना बर्दाश्त नहीं कर सकती.
जबकि मर्द चाहता है की दुनिया की सभी औरते खूबसूरत हो...
अजब गजब नियति है.
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शाम 6 बज गए थे, कामिनी जब आंगन मे आई तो बंटी भी अपनी माँ को देख चौंक गया,
"क्या बात है माँ आज मस्त लग रही हो" बंटी बेबाक बोल गया.
जबकि वो ही एकमात्र राजदार था अपनी माँ का.
"वो सुनयना जी और रवि आने वाले है तो सोचा पहन लेती हूँ, मुझे कहाँ मौका मिलता है नये कपडे पहनने का " कामिनी के मन मे वो हताशा थी जो एक घरेलु औरत ही समझ सकती है, कहने को वो आज़ाद होती है लेकिन उसकी कैद उसका ये घर ही होता है, जिम्मेदारी की छत उसे दबाये रखती है
"आप हमेशा ऐसे ही रहा करो, अच्छी लगती हो, कोई तारीफ करे या नहीं मै तो हूँ ना " बंटी अपनी माँ का दर्द समझता था
कामिनी बंटी के बड्डपन पर हैरान रह गई, उसने कभी बंटी की तरफ ध्यान ही नहीं दिया था की वो भी बड़ा हो चूका है, जवान हो रहा है, और मेरी फ़िक्र करता है.
"थैंक्स यू बेटा " कामिनी की एक आंख बह निकली.
उसे इसी प्यार, इसी परवाह की तो तलाश थी, जो की उसके पास ही था लेकिन ये अभागान बाहरी दुनिया मे प्यार ढूंढ़ रही थी.
ना जाने कामिनी को क्या हुआ उसने आगे बढ़ बंटी को गले लगा लिया.
कामिनी के स्तन बंटी के सीने मे जा धसे....
"तु बड़ा हो गया है बेटा " कामिनी का गला रुंध आया.
"क्या माँ.... आप तो हमेशा से सुन्दर हो, मेरी कितनी परवाह करती हो, आप जो हो जैसी हो, मेरी माँ हो और हमेशा रहोगी, मुझे आप हर रूप मे अच्छी लगती हो "
बंटी के हाथ कामिनी की कमर पर कसते चले गए, एक मीठी सोंधी, स्त्री की सुलभ खुसबू बंटी के नाक मे घुसने लगी, उसे अपनी माँ की खुसबू अच्छी लगी.
ये पहला मौका था जब वो इस कद्र अपनी माँ से गले लगा था, वो जो महसूस कर रहा था उसे बताने के किये शब्द नहीं थे.
शायद बंटी और कुछ भी कहता, लेकिन क्या कहता? क्यों कहता? उसे खुद नहीं पता था? वो तो बस अपनी माँ के साथ साथ खुद भी सीख रहा था.
कामिनी की आँखों से सिर्फ आंसू बह रहे थे, शायद उसके पाप को समझने वाला उसे मिल गया था, उसने जाना वो पाप है ही नहीं, बस ये भावना आंसू का ही रूप होती है.
"बड़ी बाते करनी आ गई है तुझे " कामिनी ने और कस के बंटी को अपने आगोश मे भींच लिया.
ये शुद्ध माँ बेटे का प्यार था, उनकी आपसी समझ थी.
जिसे सिर्फ महसूस किया जाता है, ये सब बताने के लिए कोई भाषा, कोई शब्द बने ही नहीं है.
पो... पो...पी... पी... धड... धड... धड.....
तभी बहार से बुलेट बाइक के धडधड़ाने उसके हॉर्न की आवाज़आई.
कामिनी जैसे अपनी नर्क सी जिंदगी मे लौटी हो...
"तेरे पापा आ गए शायद, दरवाजा खोल दे "
कामिनी किचन मे चल दी, बंटी दरवाजा खोलने...
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रात के गहराते साये और घर के अंदर जलते मध्यम बल्बों की रोशनी ने माहौल को किसी भारी नशे की तरह बोझिल बना दिया था।
कामिनी अपनी काली शिफॉन की साड़ी में रसोई से बाहर आई। "नमस्ते शमशेर जी " कामिनी ने रमेश की तरफ देखा तक नहीं, उसकी चाल में वह पुराना संकोच नहीं था, बल्कि एक ऐसी मादकता थी जो सीधे पुरुषों के दिमाग पर वार कर रही थी।
शमशेर हॉल में सोफे पर पसरा हुआ था, कामिनी ने उसे पानी का गिलास दिया, लेकिन आज उसने कोई शर्म नहीं थी, वो आगे को झुकी लेकिन उसने अपने जिस्म को बेबाकी से दिखाया, उसे ढकने की कोई कोशिश नहीं की.
शमशेर पानी पीता कामिनी के एक-एक घुमाव को अपनी खूंखार नज़रों से टटोल रहा था। कामिनी के बिना ब्रा वाले स्तनों की भारी गोलाई काली साड़ी के झीने कपड़े को फाड़कर बाहर आने को बेताब दिख रही थी।
तभी दरवाजे की घंटी बजी— टिंग टोंग!
जैसे ही दरवाज़ा खुला, हॉल की हवा में एक तेज़ और मादक इत्र की खुशबू घुल गई। सामने सुनयना और रवि खड़े थे।
सुनयना ने आज अपनी 'मर्यादा' को पूरी तरह ताक पर रख दिया था। उसने गहरे लाल रंग की एक ऐसी नेट (जालीदार) साड़ी पहनी थी जो साड़ी कम और जिस्म पर लिपटा एक पारदर्शी साया ज्यादा लग रही थी।
साड़ी का पल्लू इतना बारीक था कि उसके विशाल स्तनों का गोरापन, उनकी गहरी घाटी (Cleavage) और उनके मुहाने का उभार साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा था।
उसका ब्लाउज सिर्फ़ नाम मात्र का था—पीछे से सिर्फ़ दो डोरियों पर टिका हुआ और आगे से इतना गहरा कि उसकी सांसों के साथ उसके अंगों का हिलना किसी को भी पागल कर दे।
रमेश, जो पहले से हलके नशे मे था, सुनयना को देखते ही जड़ हो गया। उसके हाथ से पानी का गिलास छूटते-छूटते बचा। उसकी आँखें सुनयना की कमर के उस खुले हिस्से और उसकी भारी जांघों पर जाकर चिपक गईं जो साड़ी के कट से रह-रह कर झाँक रही थीं।
असली हालत तो शमशेर की थी। वह किसी भूखे सांड की तरह कभी कामिनी के काले शिफॉन के पार झाँकते उन 'नीली उभरी नसो' को देखता, तो कभी सुनयना की लाल जालीदार साड़ी से छलछलाते उस 'गोश्त' को।
शमशेर के लिए यह किसी 'जन्नत' से कम नहीं था.
कामिनी: एक दबी हुई आग, जिसका स्वाद उसने अभी तक नहीं चखा था, लेकिन जिसकी 'काली शिफॉन' ने उसे बेकाबू कर दिया था।
सुनयना: एक खुली हुई किताब, जिसका हर पन्ना हवस से लिखा गया था। उसकी बेबाकी और उसके अंगों की नुमाइश शमशेर के खून की गर्दिश बढ़ा रही थी।
शमशेर का लंड झटके लेने लगा,
"नमस्ते रमेश जी "
"आइये आइये... सुनयाना जी, कामिनी ने बताया आप डिनर पर आने वाली है " रमेश ने दाँत निपोरते हुए उसे अपने सामने सोफे पर बैठे को कहाँ.
सुनयना ने अंदर आते ही अपनी नशीली नज़रों से पूरे कमरे का मुआयना किया। उसकी नज़र जब कामिनी पर पड़ी, तो उसने एक कुटिल मुस्कान दी।
कामिनी को इस रूप मे देख के वो भी हैरान थी, उसका गोरा जिस्म किसी भी मायने मे उस से कम नहीं था.
"नमस्ते कामिनी जी! सुबह आप अलग रही थी... और अभी तो.....," सुनयना ने अपनी खनकती आवाज़ में कहा और जानबूझकर अपना पल्लू कंधे से थोड़ा और सरका दिया।
रमेश तो जैसे अपनी सुध-बुध खो चुका था। वह हकलाते हुए बोला, "आ... आइये सुनयना जी, बैठिये ना।"
"सुनयना शमशेर के सामने वाले सोफे पर बैठे को हुई, उसकी नजर शमशेर पर पड़ी, रोबदार चेहरा, चौड़ी छाती, चोड़े कंधे....
सुनयना की आंखे शमशेर से मिली.
"ये.. ये... मेरा खास दोस्त शमशेर, पुलिस मे है " रमेश ने परिचय दिया...
"जी नमस्ते शमशेर जी " सुनयाना ने झुक के नमस्ते किया...
नमस्ते क्या थी, यहाँ तो शमशेर के जिस्म मे आग लग गई, सुनायाना के बड़े भरी स्तन खुल के शमशेर के सामने आ गिरे, जिसे उसने छुपाने की कोई कोशिश नहीं की,
"नमस्ते सुनायाना जी..... "
शमशेर के रोबदार आवाज़ और उसके वजूद से सुनायाना प्रभावित होती दिखी.
रवि बंटी के साथ उसके कमरे मे जा चूका था.
रमेश का घर काम वासना का अड्डा बनता जा रहा था..
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हॉल में अब चार जवान जिस्म और चार अलग-अलग तरह के वहशी दिमाग मौजूद थे। शमशेर सोफे पर टांग पर टांग रख कर बैठा था, उसकी वर्दी की बेल्ट और उसका रौब सुनयना को अंदर तक झकझोर रहा था। वहीं रमेश, सुनयना की लाल जालीदार साड़ी के पार झाँकते हुए उसके गोश्त को अपनी नज़रों से 'पी' रहा था।
कामिनी चाय और नाश्ता लेकर आई। उसने झुककर मेज पर ट्रे रखी। जैसे ही वह झुकी, उसकी काली शिफॉन की साड़ी के ढीले पल्लू से उसके बिना ब्रा वाले स्तनों का भारी उभार शमशेर की आँखों के ठीक सामने आ गया।
शमशेर ने अपनी सांसें रोक लीं। वह साफ देख पा रहा था कि कामिनी के गोरे स्तनों पर नीली नसें उभरी हुई है,
सुनयना ने देखा कि शमशेर का ध्यान कामिनी पर है, तो उसे जलन महसूस हुई। उसने जानबूझकर अपनी आवाज़ में रस घोला और चाय का कप उठाने कर लिए शमशेर की तरफ झुकी।
"शमशेर जी, पुलिस की नौकरी तो बहुत थका देने वाली होती होगी? आप जैसे मज़बूत लोग ही इसे संभाल सकते हैं।"
शमशेर ने सुनयना की आँखों में देखा। सुनयना की लाल साड़ी का गला इतना गहरा था कि उसके विशाल स्तनों की घाटी (Cleavage) शमशेर को निमंत्रण दे रही थी। शमशेर मुस्कुराया, एक ऐसी मुस्कान जिसमें दरिंदगी और हवस का मेल था।
"काम तो थका देने वाला है सुनयना जी, लेकिन रात को जब ऐसा 'सुकून' मिले, तो सारी थकान मिट जाती है। सुदक.... सुडक...." शमशेर ने चाय सुढकते हुए कहाँ.
सुनयना का चेहरा गुलाबी हो गया। उसे अहसास हुआ कि शमशेर सिर्फ़ पुलिसवाला नहीं, बल्कि एक 'खुला सांड' है, उसके जिस्म और आवाज़ से मर्दानगी साफ झलक रही थी, सुनयना शमशेर से काफ़ी प्रभावित दिख रही थी.
शमशेर ने रमेश के कान में कुछ फुसफुसाया, जिसे सुनकर रमेश की आँखों में एक कुटिल चमक आई। "कामिनी, हम ज़रा मूड बनाकर आते हैं... तुम लोग चाय-नाश्ता करो," रमेश ने लड़खड़ाती आवाज़ में कहा।
रमेश और शमशेर सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर के कमरे में चले गए। दरवाजा बंद होते ही वहां बोतलों के खुलने और गंदी बातों का दौर शुरू हो गया।
शमशेर ने सोडा मिलाते हुए कहा, "साले रमेश... क्या माल है यार ये सुनयना! साड़ी के नीचे से जो उसका गोरापन चमक रहा है ना, उसने मेरा 'लोहा' लाल कर दिया है।"
रमेश ने एक ही घूँट में आधा गिलास खाली किया और हांफते हुए बोला, "सिर्फ़ सुनयना ही नहीं भाई... आज तो मेरी कामिनी भी किसी कयामत से कम नहीं लग रही। वो काली शिफॉन... उफ्फ! मेरा तो मन कर रहा है कि दोनों को इसी कमरे में खींच लाऊं।" रमेश अपनी बीवी के बारे मे ऐसी बात करते हुए जरा भी नहीं कतराया, जैसे वो नुमाइश की ही चीज हो.
शमशेर की हालत वैसी ही थी। उसकी एक आँख सुनयना के उस जालीदार पल्लू पर थी, तो दूसरी कामिनी की उस भीगी-भीगी और नशीली चाल पर।
दोनों शराब के नशे में उन दोनों औरतों के जिस्म को अपनी गंदी कल्पनाओं में 'नोच' रहे थे। शराब के जाम और गंदी बाते बढ़ती गई,
नीचे डाइनिंग टेबल पर दृश्य बिल्कुल अलग था। बंटी और कामिनी मेज के एक छोर पर बैठे थे, जबकि दूसरी तरफ सुनयना और रवि एक-दूसरे से चिपके हुए बैठे थे।
कामिनी यह देखकर सन्न रह गई। सुनयना का हाथ रवि की जांघ पर था और रवि का कंधा अपनी माँ के स्तनों के उभार से रगड़ खा रहा था। उन्हें देखकर कोई नहीं कह सकता था कि वे माँ-बेटा हैं; वे किसी प्रेमी जोड़े की तरह लग रहे थे। कामिनी के मन में घृणा और कौतूहल का एक साथ ज्वार उठा।
कामनी और सुनयना औपचारिक बातें कर रही थीं, लेकिन कामिनी का ध्यान बार-बार उनकी उस 'अजीब नज़दीकी' पर जा रहा था।
"कामिनी जी, चाय बहुत अच्छी बनी है," सुनयना ने अपनी आँखों को मटकाते हुए कहा।
कामिनी ने चाय का घूँट भरा ही था कि रवि ने अपनी नज़रें कामिनी की गहरी नाभि और काली साड़ी के पार झाँकते उसके बदन पर गड़ा दीं।
"उउउउफ्फ्फ्फ़.... बहुत गरम है!" रवि ने चाय का प्याला होंठों से लगाते हुए कहा, लेकिन उसकी नज़रें कामिनी के सीने पर अटकी थीं।
कामिनी का दिल धक से रह गया। वह समझ गई कि रवि का इशारा चाय की तरफ नहीं, बल्कि उसके सुलगते हुए जिस्म की तरफ है। कामिनी ने मन ही मन तय किया था कि वह आज रवि को अकेले में समझा देगी। उसे कहना था— "कल रात जो हुआ, वह महज़ एक उत्तेजना थी... एक गलती थी। अब ऐसा दोबारा नहीं होगा।"
लेकिन कामिनी की 'मर्यादा' और उसकी 'सोच' उस वक्त धरी की धरी रह गई जब मेज के नीचे रवि ने अपनी चाल चली।
कामिनी अपनी चाय का प्याला रखने ही वाली थी कि उसे अपने नंगे पैर पर एक गरम और सख्त स्पर्श महसूस हुआ। रवि ने अपने पैर का अंगूठा कामिनी की कोमल जांघों के निचले हिस्से और पैरों के बीच बड़ी बेबाकी से फंसा दिया।
कामिनी का पूरा शरीर बिजली की तरह कौंध गया। दोपहर में रघु के साथ जो हुआ था, उसकी वजह से उसके अंगों में अभी भी एक अजीब सी संवेदनशीलता और जलन बाकी थी। उसके जिस्म की अधूरी प्यास रवि के उस स्पर्श से सुलगने लगी,
रवि कामिनी की आँखों में सीधे देख रहा था, उसे अपनी माँ के पास होने का डर भी नहीं था,
सुनयना पास ही बैठी थी, बंटी सामने था, और ऊपर रमेश और शमशेर शराब पीते हुए शबाब के ख्याब देख रहे थे।
लेकिन मेज के नीचे, कामिनी की काली शिफॉन के साये में, रवि का पैर उसकी मर्यादा को धीरे-धीरे 'कुचल' रहा था।
कामिनी का हाथ कांपने लगा। उसे गुस्सा करना चाहिए था, पैर पीछे हटाना चाहिए था... लेकिन वह पत्थर बनकर वहीं बैठी रह गई। उसकी जांघों के बीच से फिर से एक गीली लहर दौड़ गई।
"माँ 9 बज गए है, भूख लगी है " बंटी की आवाज़ ने कामिनी को धरातल पर पटक दिया,
रवि ने भी सकपाकते हुए पैर पीछे खिंचा.
"हाँ कामिनी जी भूख तो लग आई है अब " सुनयना ने भी बंटी का समर्थन किया.
"आअह्ह्ह... हाँ... हाँ... अपने पापा को बुला ला मै खाना लगाती हूँ " कामिनी सकपाकती सी कुर्सी से नजर चुराती सीधा रसोई मे जा घुसी.
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थोड़ी ही देर मे सभी लोग डिनर टेबल पर जमे हुए थे, जहाँ सन्नाटा सा पसरा हुआ था, लेकिन नज़रों का शोर बहुत तेज़ था।
वही शमशेर खाना खाते वक्त भी अपनी आँखों से सुनयना की लाल जालीदार साड़ी के पार झाँकते उस 'गोश्त' को नोच रहा था।
रमेश नशे में इतना धुत्त हो चुका था कि उसे अपनी थाली का होश नहीं था। खाना खत्म होते ही वह लड़खड़ाते हुए बेडरूम की ओर बढ़ गया और बिस्तर पर गिरते ही खर्राटे भरने लगा।
खाना खत्म हुआ... कामिनी जी खाना बहुत लजीज बना था, हहहहुउउउ.... शमशेर ने बेशर्मो को तरह डाकर मारते हुए कहाँ.
"जी... जी.. धन्यवाद " कामिनी ने एक नजर भर शमशेर को देखा
वाकई बलिष्ट जिस्म का मलिक था, चौड़ी छाती, रोबदार चेहरा, बड़े बड़े हाथ.
बालो से भरी छाती... वाकई मर्द था शमशेर.
एक पल को कामिनी शमशेर को अंगड़ाई लेती देखती रह गई.
"आइसक्रीम भी लीजिये ना शमशेर जी " सुनयाना ने शमशेर की तरफ आइसक्रीम का कटोरा बढ़ाया.
"मुझे गर्म चीज़े पासंफ है सुनायाना जी " शमशेर ने सुनायाना की आंख मे गहराई से झाँकते हुए अपनी जेब से सिगरेट निकालते हुए कहाँ.
और बिना पीछे मुडे छत की सीढिया चढ़ गया.
दोनों औरते शमशेर की मर्दानगी, उसकी अदा की कायल होती जा रही थी.
रात का सन्नाटा गहरा रहा था, लेकिन कामिनी के लिए यह सन्नाटा किसी भारी शोर से कम नहीं था। रसोई की पीली रोशनी में बर्तनों को समेटते हुए कामिनी का ध्यान बार-बार अपनी जांघों के बीच की उस तीखी जलन की ओर जा रहा था, जो रघु के जंगलीपन की याद दिला रही थी।
सभी लोग खाना खा चुके थे, बंटी अपने कमरे मे जा चूका था, सुनयना फ़ोन पर किसी से बात करने मे व्यस्त थी, कामिनी बर्तन समेट कर रसोई मे आ गई थी, घरेलु औरत को बहुत काम होते है.
रसोई की स्लैब पर हाथ टिकाए कामिनी गहरी साँसें ले रही थी, कामिनी बर्तनों को धोने के लिए जैसे ही झुकी, उसे अपने पीछे एक आहट सुनाई दी।
वह संभलती, उससे पहले ही एक गरम और जवान जिस्म की गर्माहट उसकी पीठ से आकर सट गई। रवि उसके ठीक पीछे खड़ा था।
रवि ने कोई दूरी नहीं रखी। उसके शरीर की सोंधी महक कामिनी के नथुनों में समा गई। कामिनी का हलक सूख गया।
जब रवि ने धीरे से कहा, "आंटी, मैं हेल्प करता हूँ," तो उसकी भारी आवाज़ सीधे कामिनी की गर्दन पर टकराई। रवि की साँसें कामिनी की खुली गर्दन और उसके कान के पीछे वाले कोमल हिस्से पर आग की तरह गिर रही थीं।
कामिनी की मुट्ठियाँ कस गईं। उसने बर्तन पकड़ने की कोशिश की, लेकिन उसके हाथ कांप रहे थे।
"त-तुम रहने दो रवि... मैं कर लूंगी," उसने लड़खड़ाती आवाज़ में कहा, पर उसके पैरों ने हिलने से मना कर दिया।
कामिनी ने आज काली शिफॉन की साड़ी पहनी थी, जिसके नीचे उसने ब्रा नहीं पहनी थी। रवि के हाथ धीरे से कामिनी की कमर के उस नंगे हिस्से पर रेंगने लगे जो साड़ी के झीने कपड़े से बाहर था।
रवि की उंगलियां ठंडी नहीं थीं, वे उत्तेजना से दहक रही थीं।
जैसे ही उसने कामिनी की मखमली और गोरी कमर को छुआ, कामिनी के पूरे बदन में बिजली सी दौड़ गई। उसकी जांघों के बीच का वह 'काम-रस' फिर से रिसने लगा।
वह रघु के 'मेल और पसीने' वाले स्वाद से अभी तक उबर नहीं पाई थी कि अब रवि की कोमल लेकिन मज़बूत मर्दानगी उसे अपनी आगोश में ले रही थी।
"र-रवि... रुको... कुछ... कुछ बात करनी है तुमसे," कामिनी ने जैसे-तैसे अपनी सांसों पर काबू पाते हुए कहा।
रवि नहीं रुका। उसने अपनी नाक कामिनी के बालों में गड़ा दी और उसकी खुशबू लेते हुए फुसफुसाया, "हाँ बोलो ना आंटी... क्या बात करनी है?"
कामिनी की मनोदशा इस वक्त एक युद्ध क्षेत्र जैसी थी। उसका मन उसे धिक्कार रहा था— "यह लड़का तेरी सहेली का बेटा है, तेरे बेटे जैसा है।" लेकिन उसका शरीर, जो वर्षों से रमेश के हाथों तरसा था, आज पूरी तरह विद्रोह कर चुका था। उसे रवि का वह स्पर्श, उसकी वह बेबाकी और उसकी जवानी अपनी ओर खींच रही थी।
उसे डर था कि नीचे सुनयना या बंटी उनकी फुसफुसाहट सुन न लें। उसने रवि का हाथ अपनी कमर से हटाने की कोशिश की, जो अब उसकी नाभि के करीब पहुँच रहा था।
"तुम... तुम छत पर चलो... मैं आती हूँ 5 मिनट में। हमें बात करनी होगी," कामिनी ने एक आख़िरी कोशिश करते हुए कहा।
रवि मुस्कुराया। उसने कामिनी के कंधे पर एक छोटा सा चुंबन लिया और पीछे हट गया। "ठीक है आंटी... इंतज़ार रहेगा।"
रवि के जाने के बाद कामिनी कुछ पल तक वहीं खड़ी हांफती रही। उसने अपने चेहरे पर पानी के छींटे मारे, पर आग अंदर लगी थी जिसे पानी नहीं बुझा सकता था।
5 मिनट बाद वह दबे पाँव रसोई से बाहर आई।
बरामदे में सन्नाटा था। बंटी अपने कमरे में जा चुका था और सुनयना भी कहीं नज़र नहीं आ रही थी। कामिनी को लगा शायद वह भी आराम कर रही होगी।
कामिनी अब दबे पाँव सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। हर कदम के साथ उसकी काली शिफॉन की साड़ी उसके बदन से रगड़ खा रही थी। उसे लग रहा था कि वह सीढ़ियाँ नहीं चढ़ रही, बल्कि अपनी मर्यादा की चिता की ओर बढ़ रही है। उसे रवि से माफ़ी मांगनी थी, उसे समझाना था...
क्रमशः.....

5 Comments
Bhai yaar bhaut mast update h lakin jaldi diya karo
ReplyDeleteEk update roj diya karo
ReplyDeleteBhaut mast likhte ho
ReplyDeleteUpdate jaldi laya karo yaar
ReplyDelete1 update ke liye kitna wait karate ho
Next update kab aayega
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