मेरी माँ कामिनी - भाग 30
अगली सुबह का सूरज निकला, लेकिन रमेश के घर के ऊपर काले बादल मंडरा रहे थे।
रमेश की आँखें लाल थीं, चेहरा सूजा हुआ था। रात की घटना और घर मे ड्रग के डर ने उसे तोड़ दिया था।
वह तैयार होकर ऑफिस के लिए निकलने लगा। जाते-जाते वह स्टोर रूम की तरफ गया।
उसने जेब से कुछ और नोट निकाले और रघु के हाथ पर रख दिए।
"रघु... ध्यान रखना," रमेश ने फुसफुसाते हुए कहा। "किसी को भनक न लगे। और कादर भाई..."
रमेश ने कोने में बैठे कादर को देखा। "भाई, बाहर मत निकलना जब तक शमशेर का फ़ोन न आये। मामला गरम है।"
कादर ने लापरवाही से हाथ हिला दिया। "जाओ रमेश बाबू, अपनी कुर्सी संभालो। हम यहाँ पड़े हैं।"
रमेश भारी कदमों से चला गया।
थोड़ी देर बाद बंटी भी स्कूल के लिए निकल गया।
अब घर में सिर्फ़ कामिनी थी। और पिछवाड़े के स्टोर रूम में दो मर्द।
कामिनी अपने बेडरूम में तैयार हो रही थी।
उसने आज एक हल्की गुलाबी रंग की कॉटन साड़ी पहनी थी। बाल गीले थे और खुले छोड़े हुए थे। चेहरे पर रात की वो 'कामुक थकान' और 'ताज़गी' दोनों का मिश्रण था।
लेकिन उसके मन में एक ही सवाल था— 'वह गुंडा मेरे घर में क्या कर रहा है? रघु कहाँ है दिखा नहीं कल रात से ही?'
कामिनी ने पल्लू कमर में खोंसा और दृढ़ कदमों से स्टोर रूम की तरफ बढ़ी।
दरवाज़ा खुला। कामिनी अंदर दाखिल हुई।
रघु, जो अपनी खटिया पर बैठा बीड़ी सुलगा रहा था, मालकिन को देखते ही हड़बड़ाकर खड़ा हो गया और बीड़ी नीचे जमीन लार फेंक दी।
"नमस्ते मैडम ..." रघु ने सिर झुकाया।
लेकिन कादर खान... वह अपनी जगह से नहीं हिला।
वह ज़मीन पर एक बोरी बिछाकर बैठा था, पीठ दीवार से टिकाए। उसने कामिनी को ऊपर से नीचे तक घूरा।
रात के t-shirt उसके जिस्म पर कसे हुए थे, कादर का लिंग पाजामे मे साफ झलक रहा था, कामिनी ने एक नजर कादर को देखा, एक झुरझुरी सी हुई.
कादर की नज़रों में न तो डर था, न शर्म। वो बेबाक कामिनी की खूबसूरती को निहार रहा था.
"तुम यहाँ क्या कर रहे हो?" कामिनी ने खुद को संभाल कड़क आवाज़ में पूछा। चेहरे पे गुस्से के भाव ले आई, जैसे उसे कादर का यहाँ होना पसंद ना आया हो
रघु कुछ बोलने के लिए आगे बढ़ा, "मैडम वो कक... कल रात ..."
"तू चुप रह रघु!" कादर ने रघु को रोका। कादर पहले से ही कुछ टेंशन मे दिख रहा था.
कामिनी का गुस्से मे पूछना उसे हजम नहीं हुआ.
कादर ने अपनी गहरी आँखों से कामिनी को देखा और मुस्कुराया।
"मै बताता हूँ ना, सच सुनने का शौक है, झूठ क्यों बोलना?"
कादर ने सीधा कामिनी की आँखों में देखा।
"पुलिस पड़ी है मेरे पीछे मैडम। 50 लाख का 'माल' (ड्रग्स) अभी इसी वक़्त मौजूद है मेरे पास और मुझे यहाँ लाने वाला कोई और नहीं, आपका पति रमेश बाबू है।"
कामिनी को झटका लगा। "रमेश? 50 लाख का माल? तुम... तुम नशा बेचते हो?"
कामिनी की आँखों में घृणा उतर आई।
"तुम्हें शर्म नहीं आती?" कामिनी चिल्लाई।
"तुम समाज को बर्बाद कर रहे हो! उन बच्चों को ज़हर दे रहे हो? तुम जैसे लोग नासूर हैं इस दुनिया के लिए!"
कादर खान हंसा। एक ठंडी, व्यंग्यात्मक हंसी।
"अरे मैडम... किस समाज की बात कर रही हैं आप?" कादर ने थूकने के अंदाज़ में कहा।
वह धीरे से खड़ा हुआ। उसका विशाल साया कामिनी पर पड़ने लगा।
"वही समाज जो शाम को दारू पीकर नालियों में लोटता है? क्यों? क्योंकि दारू पर सरकार का ठप्पा है, तो वो 'अमृत' हो गई? और मेरा पाउडर 'ज़हर' हो गया?"
कादर ने एक कदम आगे बढ़ाया। कामिनी अपनी जगह खड़ी रही, लेकिन अंदर से सहम गई।
"ये जो कानून और समाज की दुहाई दे रही हैं ना आप... ये सब अमीरों के चोचले हैं। वो शमशेर... जो वर्दी पहनता है, वो मुझसे हर महीने हफ्ता लेता है। आपका पति रमेश... बड़ा रसूखदार बाबू है, रोज़ नशे मे टुल हो कर मेरे ही ढाबे पर आकर मटन चबाता है।"
कादर की आवाज़ ऊंची हो गई।
"यहाँ सब चोर हैं मैडम! सब के सब! बस फर्क इतना है कि जो पकड़ा गया वो 'चोर', और जो बच गया वो 'साहूकार'।"
कामिनी ने जवाब देना चाहा, लेकिन शब्द गले में अटक गए।
कादर ने रघु की तरफ इशारा किया।
"इस रघु को देखिये... इसने क्या बिगाड़ा था समाज का? एक गरीब किसान था। पुलिस वाले और एक सरकारी अफ़सर ने मिलकर इसकी ज़मीन हड़प ली, इसकी बीवी के साथ गलत किया, उसे मार दिया। और इसे? सालों तक जेल में सड़ने को छोड़ दिया।"
रघु ने सिर झुका लिया। उसकी पुरानी चोटें हरी हो गईं।
"कहाँ था आपका समाज तब?" कादर की आवाज़ में दर्द और गुस्सा दोनों था। "किसने दिया इसे इन्साफ? क्या आप देंगी?"
कादर कामिनी के बिल्कुल करीब आ गया।
"आप मुझे गलत नहीं कह सकतीं मैडम। आपके पास हक़ नहीं है। आप उस महल में रहती हैं जो शायद रमेश बाबू ने रिश्वत के पैसों से बनाया है। हम तो बस... ज़िंदा रहने का टैक्स भर रहे हैं।"
कामिनी सुन हो गई।
कादर का हर एक शब्द किसी चाबुक की तरह पड़ रहा था।
वह अपनी बगले झांकने लगी।
'क्या मैं सच्ची हूँ?' कामिनी का अंतर्मन उसे कोसने लगा। 'मैं जो कल रात खिड़की से इस नंगे आदमी को घूर रही थी... मैं जो सुनैना के साथ... मैं जो रघु के साथ... क्या मैं पवित्र हूँ?'
कादर सही कह रहा था। हमाम में सब नंगे हैं।
"सही और गलत अमीरों के चोचले हैं मैडम," कादर ने अपनी बात ख़त्म की। "जिसके पास पैसा है, उसका सच 'सच' है। गरीब का सच तो बस 'बकवास' है।"
कामिनी का चेहरा मुरझा गया। उसका नैतिक अहंकार (Moral Ego) चकनाचूर हो गया था।
वह अब कादर की आँखों में नहीं देख पा रही थी।
रघु को अब बर्दाश्त नहीं हुआ। वह कादर के सामने आ गया।
"बस कर कादर भाई! क्या कह रहा है?" रघु ने उसे रोका। "वो मालकिन हैं... उन्होंने मुझ जैसे लावारिस पर दया की। मुझे रहने को छत दी, खाना दिया। वो बाकियों जैसी नहीं हैं।"
"रहने दो रघु..." कामिनी की आवाज़ भर्रा गई। उसकी आँखों में आंसू तैरने लगे।
उसे अपनी हार महसूस हो रही थी। वह इस 'गंदगी' का हिस्सा नहीं बनना चाहती थी, लेकिन उसे एहसास हो गया था कि वह भी इसी कीचड़ में खड़ी है।
कामिनी पलटी और तेज़ कदमों से, बिना कुछ कहे, स्टोर रूम से बाहर निकल गई।
स्टोर रूम मे सन्नाटा छा गया,
कादर अभी भी गुस्से में सांस ले रहा था।
"सब अमीर लोग ऐसे ही होते हैं रघु," कादर ने ज़मीन पर थूक दिया। "दोगले। खुद पाप करेंगे तो 'शौक', हम करें तो 'अपराध'। हम जैसे लोग इन्हें खटकते हैं।"
कादर भरा बैठा था, इसे जरा भी बर्दाश्त नहीं था की कोई उस से ऊँची आवाज़ मे बात करे.
रघु ने अपनी खटिया पर बैठते हुए सिर हिलाया।
"नहीं भाई... तू गलत समझ रहा है," रघु ने भावुक होकर कहा। "मैडम वैसी नहीं हैं। तू नहीं जानता वो किस नर्क में जी रही हैं।"
कादर ने रघु को देखा। "मतलब?"
"उनका पति... वो रमेश..." रघु की मुट्ठी भिंच गई। "वो जानवर है। दारू पीकर रोज़ मारता है उन्हें, गालियां देता है। उनका दम घुटता है उस बड़े घर में। लेकिन उन्होंने कभी 'उफ़' तक नहीं की।"
रघु की आँखों में कामिनी के लिए एक अजीब सी भक्ति और प्रेम था।
"उन्होंने मुझे उस दिन बचाया जब मैं बुखार से मर रहा था। मेरे लिए नये कपड़े लाये (वही जो तूने पहने हैं), मेरे हाथ से खाना खाया... और..."
रघु एकदम से रुक गया।
"और..."
उसकी जुबान पर उस रात की चुदाई आने वाली थी।
"और... बस, बहुत अच्छी हैं वो," रघु ने बात संभाल ली।
कादर खान हैरान होकर रघु को देख रहा था।
उसे उम्मीद नहीं थी कि उस 'रानी' जैसी दिखने वाली औरत की ज़िंदगी में इतना दर्द होगा।
"मैडम बहुत दयालु हैं कादर भाई..." रघु ने कादर के कंधे पर हाथ रखा। "तूने अपनी भड़ास गलत जगह उतार दी। वो भी हमारी तरह ही... सताई हुई हैं।"
कादर चुप हो गया।
उसके दिमाग में कामिनी का वो रोता हुआ चेहरा और रघु की बातें घूमने लगीं।
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दोपहर ढल रही थी। घड़ी में 4:30 बज रहे थे।
कामिनी अपने बेडरूम में बैठी खिड़की से बाहर देख रही थी। सुबह कादर खान की वो कड़वी बातें— "गरीब का सच बकवास है" —अभी भी उसके कानों में गूंज रही थीं। उसे अपनी परवरिश और अपनी 'अमीरी' पर पहली बार शर्मिंदगी महसूस हो रही थी।
तभी रमेश का फ़ोन आया।
"हेलो कामिनी..." रमेश की आवाज़ में सुबह वाला डर कम और शाम के नशे की तलब ज्यादा थी। "शमशेर ने बताया है कि आज शाम को मटन सूप का प्रोग्राम है। अब कादर भाई घर में हैं ही, और रघु कह रहा था कि वो मटन बहुत शानदार बनाता है। तो क्यों न मौके का फायदा उठाया जाए?"
रमेश हंसा, अपनी ही चालाकी पर। "रघु को पैसे देकर मटन मंगवा लो, और सारा ज़रूरी सामान कादर को दे देना। आज शाम की दावत घर पर ही होगी।"
कामिनी ने फ़ोन रख दिया। उसके होठों पर एक फीकी मुस्कान आ गई।
"क्या रमेश..... "
कामिनी के लिए अब स्टोर रूम की तरफ जाना मुश्किल हो रहा था।
सुबह जिस तरह वह कादर पर चिल्लाई थी, और फिर कादर ने जिस तरह उसे आईना दिखाया था... उसके बाद नज़रे मिलाना आसान नहीं था। उसे अफ़सोस था। वह आराम से भी पूछ सकती थी, लेकिन उसने अपने 'मालकिन' होने के अहंकार में उस पर गुस्सा किया था।
कामिनी ने अलमारी से पर्स निकाला और कुछ नोट लिए।
वह भारी कदमों से पिछले दरवाज़े की तरफ बढ़ी।
बगीचे में धूप कम हो गई थी।
स्टोर रूम के बाहर रघु खटिया पर बैठा अपनी कुल्हाड़ी की धार तेज़ कर रहा था।
दरवाज़ा खुला था, और अंदर के अंधेरे में कादर खान ज़मीन पर लेटा हुआ छत को घूर रहा था।
कामिनी स्टोर रूम के दरवाज़े पर जाकर रुक गई। उसने अंदर कदम नहीं रखा।
"रघु..." कामिनी ने आवाज़ दी।
रघु तुरंत खड़ा हो गया। "जी मैडम?"
अंदर लेटा कादर भी आवाज़ सुनकर उठ बैठा। उसने कामिनी की तरफ देखा। उसकी आँखों में अब कोई गुस्सा नहीं था, अपितु थोड़ी खुशी थी जो कामिनी को देख के आई थी।
कामिनी ने रघु की तरफ नोट बढ़ा दिए।
"रमेश जी का फ़ोन आया था," कामिनी ने नज़रें झुकाकर कहा, लेकिन उसकी आवाज़ कादर को सुनाने के लिए काफी थी। "आज शाम को मटन सूप बनाना है। बाज़ार से ताज़ा गोश्त ले आओ।"
फिर कामिनी ने एक पल के लिए कादर की तरफ देखा, लेकिन तुरंत नज़रें हटा लीं।
"और... इन्हें (कादर को) जो भी मसाला या बर्तन चाहिए हो, दे देना।"
कादर अपनी जगह से खड़ा हुआ। वह दरवाज़े तक आया।
उसका विशाल शरीर दरवाज़े की चौखट को घेर रहा था।
"मैडम..." कादर ने अपनी भारी आवाज़ में कुछ कहना चाहा। शायद वह सुबह की बात को हल्का करना चाहता था, या शायद वह कामिनी के चेहरे पर अफ़सोस पढ़ चुका था।
लेकिन कामिनी ने उसे बोलने का मौका नहीं दिया।
उसने रघु के हाथ में पैसे थमाए और पलट गई।
"कुछ और चाहिए हो तो आकर मांग लेना," कामिनी ने जाते-जाते कहा, बिना पीछे मुड़े।
उसकी चाल में सुबह वाली अकड़ नहीं थी, बल्कि एक विनम्रता और दूरी थी।
कादर उसे जाते हुए देखता रहा।
वह समझ गया कि कामिनी अभी भी उसकी बातों से आहत है, या शायद उसे अपनी गलती का एहसास हो गया है।
"हम्म..." कादर ने एक गहरी सांस छोड़ी और रघु की तरफ देखा। "जा भाई, ले आ गोश्त, ऐसा मटन बनाऊंगा की खाने वाला उंगलियां चाट जायेगा।"
"वाह कादर भाई आज तो मजा आ जायेगा....
रघु पैसे लेकर बाज़ार की तरफ निकल गया।
और कादर... वह स्टोर रूम की चौखट पर खड़ा, कामिनी के बेडरूम की खिड़की को देखता रहा, जहाँ पर्दा हिल रहा था।
खामोशी थी, लेकिन यह तूफ़ान से पहले की खामोशी थी।
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मुश्किल से 20 मिनट बीते होंगे कि रघु हांफता हुआ वापस आ गया। उसके हाथ में काले रंग की थैली थी, जिसमें से ताज़े कटे हुए गोश्त की महक आ रही थी।
"ये ले भाई..." रघु ने थैली कादर के हाथों में थमा दी। "जोरदार बनाना, मैडम खुश हो जानी चाहिए।"
कादर ने थैली पकड़ी। "ठीक है, अब ज़रा वो बर्तन और मसाला..."
लेकिन रघु कहाँ रुकने वाला था?
उसने अपनी बनियान की जेब से वो नोट (पैसे) निकालकर हवा में लहराए। उसकी आँखों में शाम की 'तलब' चमक रही थी।
"मैडम ने पैसे दिए हैं, मैं ज़रा अपनी 'दवाई' का इंतज़ाम करके आता हूँ। तू संभाल लेना।"
इतना बोलकर रघु ने आव देखा न ताव, स्टोर रूम से बाहर लपका और गेट की तरफ भाग गया।
"अरे... सुन... सुन तो बे..." कादर ने उसे रोकने के लिए हाथ बढ़ाया। "अकेले कैसे करूँगा सब..."
लेकिन रघु हवा हो चुका था। शाम ढलते ही एक शराबी के लिए दुनिया की हर ज़िम्मेदारी धुंधली हो जाती है।
कादर ने माथे पर हाथ मारा।
"साला... इसीलिए मुझे ये दारू पीने वाले पसंद नहीं," कादर बड़बड़ाया। "वक़्त-बेवक़्त नशा सूझता है।"
अब कादर अकेला था। हाथ में मटन की थैली और सामने काम का पहाड़।
उसने इधर-उधर देखा। उसे मटन धोना था।
उसकी नज़र बगीचे के उसी अमरूद के पेड़ के नीचे गई, जहाँ नल लगा था।
वही जगह... जहाँ कल रात उसने अपने नंगे जिस्म की नुमाइश की थी, अनजाने में ही सही।
कादर थैली लेकर नल के पास गया और उकड़ूँ (Squat) बैठ गया।
उसने थैली पलटी और लाल, ताज़ा मटन के टुकड़े बाल्टी में डाल दिए।
उसने नल चालू किया।
"छप... छप... छपाक्...!!"
पानी गिरने की वही आवाज़... वही लय... सन्नाटे में गूंजने लगी।
उसी वक़्त कामिनी भी किचन में खड़ी थी, ख्यालों में खोई हुई।
अचानक, पानी गिरने की उस आवाज़ ने उसके कानों को भेदा।
उसका बदन सिहर उठा। यह आवाज़ अब उसके लिए सिर्फ़ 'पानी' की नहीं थी, यह उस 'विशाल पौरुष' और 'गीले जिस्म' का संगीत बन चुकी थी।
जिज्ञासा ने उसे फिर से खिड़की की तरफ खींच लिया।
कामिनी ने चिक (Blind) के पीछे से झांका।
इस बार कादर नंगा नहीं था, लेकिन जो उसने पहना था, वह नंगे होने से कम भी नहीं था।
रघु का वो सफ़ेद टी-शर्ट कादर के चौड़े सीने और बांहों पर किसी दूसरी त्वचा की तरह कसा हुआ था।
कादर के मज़बूत डोले (Biceps) टी-शर्ट की बांहों को फाड़ने पर उतारू थे।
पानी की छींटों से टी-शर्ट हल्की गीली हो गई थी, जिससे उसके काले, घने बालों वाला सीना कपड़े के नीचे से झांक रहा था।
लेकिन कामिनी की नज़रें, हमेशा की तरह, नीचे फिसल गईं।
कादर उकड़ूँ बैठा था। इस पोज़िशन में उसका तंग पाजामा उसकी जांघों और पेडू पर बुरी तरह खिंच गया था।
और उस खिंचाव ने... उसके विशाल लिंग की रूपरेखा (Outline) को पूरी तरह बेपर्दा कर दिया था।
पाजामे के कपड़े के नीचे, उसकी बाईं जांघ के सहारे, एक लंबा, मोटा और भारी 'अजगर' लेटा हुआ साफ़ दिख रहा था।
कामिनी को कल रात वाला वो 'लाल, नंगा और मुठा हुआ टोप' याद आ गया।
वह पाजामे के अंदर कैद होकर भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा था। वह उभार (Bulge) इतना स्पष्ट था कि कामिनी को लगा अगर वह हाथ बढ़ाए तो उस गर्माहट को महसूस कर सकती है।
कामिनी की नज़रें पीछे झाड़ियों पर गईं।
वहाँ कादर के कल रात वाले कपड़े (कुर्ता-पाजामा) सूख रहे थे। यह सबूत था कि यह वही आदमी है जिसने कल रात उसे पागल कर दिया था।
कादर मटन धो रहा था।
उसके बड़े-बड़े, खुरदरे हाथ मटन के लाल टुकड़ों को पानी में मसल रहे थे।
वह मांस के लोथड़ों को अपनी हथेलियों में भींचता, उन्हें रगड़ता और फिर नज़ाकत से निचोड़ता।
"पिच्... पिच्..."
मांस और पानी की वो आवाज़ कामिनी को उत्तेजित कर रही थी।
कामिनी ने कल्पना की... 'अगर मटन की जगह मेरा जिस्म होता? अगर वो मेरे स्तनों को ऐसे ही मसल रहा होता?'
उसका गुस्सा, उसका अफ़सोस... सब उस पानी के साथ बह गया। अब बची थी तो बस एक मीठी टीस।
कामिनी को एहसास हुआ कि कादर के पास धुला हुआ मटन रखने के लिए कोई बर्तन नहीं है।
वह मुड़ी।
उसने रैक से एक बड़ी स्टील की प्लेट (परात) उठाई।
एक गहरी सांस ली, अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया, और किचन के पिछले दरवाज़े से बाहर निकल गई।
कादर मटन धोने में मगन था।
उसे किसी के आने की आहट हुई। वह पलटा नहीं, उसे लगा रघु आ गया होगा।
"आ गया बेवड़े? ला बर्तन दे..."
लेकिन कोई जवाब नहीं आया। बस एक मीठी सी खुशबू हवा में तैर गई—इत्र और ताज़गी की खुशबू।
कादर ने सिर उठाकर देखा।
सामने कामिनी खड़ी थी।
हाथ में स्टील की बड़ी थाली लिए। शाम की ढलती रौशनी में उसका चेहरा दमक रहा था।
उसकी नज़रें कादर के चेहरे पर नहीं, बल्कि उसकी गीली टी-शर्ट और तने हुए सीने पर थीं।
कादर के हाथ रुक गए। उसके हाथों से मटन का लाल पानी टपक रहा था।
कामिनी धीरे से आगे बढ़ी।
उसने थाली कादर की तरफ बढ़ा दी।
"लो..." कामिनी की आवाज़ मद्धम और कांपती हुई थी। "इसमें रखो।"
कादर ने कामिनी की आँखों में देखा।
वहाँ अब सुबह वाला गुस्सा नहीं था। वहाँ एक समर्पण था, एक आमंत्रण था।
कादर ने अपने गीले हाथ पोंछे नहीं। उसने मटन का एक टुकड़ा थाली में रखा।
"शुक्रिया मैडम .." कादर ने मुस्कुराते हुए कहा, लेकिन उसकी नज़रें कामिनी के ब्लाउज़ के डीप नेक पर थीं।
अब दोनों के बीच सिर्फ़ एक थाली की दूरी थी।
मांस, पानी, और दो धड़कते हुए जिस्म।
कादर ने धुले हुए मटन के टुकड़ों को स्टील की बड़ी थाली में सज़ा दिया।
"अब इसे कहाँ बनाना है? " कादर ने खड़े होते हुए पूछा, उसका जिस्म पानी से भीग गया था, टाइट t-shirt पजामा बिल्कुल उसके जिस्म से चिपक गया था.
कामिनी की नजर उसके पुरे बदन पर घूम गई, गड़ब... कामिनी के सूखे गले से थूक निगला.
"अअअ.... अंदर रसोई ने और कहाँ " जैसे तैसे कामिनी के हलक से आवाज़ निकली..
ना जाने क्यों कामिनी के नाभि के बीच गुदगुदी सी हो रही थी.
कादर ने इंकार में सिर हिलाया और एक गहरी, रसिक मुस्कान दी।
"किचन में? नहीं मैडम..." कादर ने मटन के लाल टुकड़ों को ऐसे देखा जैसे कोई कलाकार अपनी कलाकृति को देखता है।
"किचन की चारदीवारी में ये सब 'चूज़े' बेजान हो जाते हैं। असली स्वाद तब आता है जब ये खुले आसमान के नीचे पकता है। जब शाम की हवा और लकड़ी का धुआं इसमें घुलता है।"
कादर की आवाज़ में एक अजीब सा नशा था।
"मटन बनाना सिर्फ़ पकाना नहीं है मैडम, ये मोहब्बत है," कादर ने कामिनी की आँखों में झांका। "जितना धीमी आंच पर, जितना प्यार और सब्र से इसे भूनोगे... ये उतना ही रसीला बनेगा। जल्दबाजी का काम तो पेट भरना है, मन भरना नहीं।"
कामिनी कादर की बातें सुनकर मंत्रमुग्ध थी। उसने आज तक रमेश को सिर्फ़ "खाना लाओ" चिल्लाते सुना था। एक मर्द खाने के बारे में इतनी शिद्दत से बात कर सकता है, यह उसने पहली बार देखा था।
वह अनजाने में ही मुस्कुरा दी।
"तो बताओ तुम ही, अब क्या करें?" कामिनी ने हथियार डाल दिए।
"आप बस मसाले और बर्तन ले आइये," कादर ने आदेश दिया, लेकिन प्यार से। "बाकी जुगाड़ मैं करता हूँ।"
कादर ने थाली उठाई और मसालों के नाम गिना दिए, खड़े मसाले, तेल, अदरक, लहसुन।
कामिनी अंदर चली गई। कादर उसे जाते हुए देखता रहा। उसकी चाल में जो लचक थी, वह किसी भी मर्द को पागल करने के लिए काफी थी।
जैसे ही कामिनी अंदर गई, कादर ने फुर्ती दिखाई।
उसने बगीचे के कोने से कुछ ईंटें उठाईं और स्टोर रूम के बाहर, घास पर एक देसी चूल्हा बना लिया।
आस-पास पड़ी सूखी लकड़ियां और टहनियां इकट्ठी कीं और आग सुलगा दी।
"चट... पट..."
लकड़ियां जलने लगीं और एक सौंधी सी खुशबू हवा में फैल गई।
थोड़ी ही देर में कामिनी वापस आई।
उसके हाथों में मसालों के डिब्बे, तेल की बोतल और एक बड़ा भगोना था।
साथ ही, वह एक चटाई भी ले आई थी।
उसने चूल्हे के पास, हरी घास पर चटाई बिछा दी।
शाम घिरने लगी थी, और चूल्हे की आग की नारंगी रौशनी उन दोनों के चेहरों पर नाच रही थी।
कादर और कामिनी चटाई पर आमने-सामने बैठ गए।
बीच में प्याज़ और लहसुन का ढेर था।
कादर ने चाकू उठाया और प्याज़ काटना शुरू किया, जबकि कामिनी लहसुन छीलने लगी।
माहौल में एक अजीब सी अपनायत थी, जैसे वे बरसों से एक-दूसरे को जानते हों।
"मैडम..." कादर ने प्याज़ काटते हुए खामोशी तोड़ी। "सुबह के लिए माफ़ी चाहता हूँ। मेरा दिमाग ठिकाने पर नहीं था। पुलिस, ड्रग्स... सबने पागल कर दिया था।"
कामिनी ने लहसुन की कली छीली और कादर को देखा।
शाम की धुंधली रौशनी और आग की लपटों में कादर का चेहरा अब उतना डरावना नहीं लग रहा था। उसकी टी-शर्ट पसीने और पानी से हल्की गीली होकर उसके सीने से चिपकी थी, एक मादक मर्दाना खुसबू कामिनी महसूस कर सकती थी, लेकिन अब कामिनी को उसमें 'गुंडा' नहीं, बल्कि एक 'परेशान मर्द' दिख रहा था।
"कोई बात नहीं कादर," कामिनी ने नरमी से कहा। "गुस्सा तो मुझे भी नहीं करना चाहिए था।"
"वैसे तुम रघु के साथ पीने क्यों नहीं गए? तुम दोनों तो पुराने दोस्त हो?" कामिनी ने अपनी जिज्ञासा शांत करनी चाही.
कादर ने चाकू रोका और कामिनी को देखा।
"मुझे चिढ़ है शराब पीने वालों से मैडम," कादर ने संजीदगी से कहा। "साले होश में रहते ही नहीं हैं। और मेरा मानना है..."
कादर ने अपनी गहरी आँखों से कामिनी को भेदा।
"...कि बिना होश में की गई चीज़ों का कोई महत्व नहीं होता। चाहे वो खाना बनाना हो, या मोहब्बत करना। इंसान को पता होना चाहिए कि वो क्या कर रहा है, तभी असली मज़ा है।"
कामिनी के गाल लाल हो गए। वह कादर की सोच से प्रभावित हो रही थी। रमेश हमेशा पीकर उसके पास आता था, बेहोशी में उसे नोचता था। और यहाँ एक 'गुंडा' था जो होश और अहसास की बातें कर रहा था।
"लेकिन ड्रग्स बेचते हो..." कामिनी ने हिम्मत करके उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया।
"वो नशा नहीं है?"
कादर का हाथ एक पल को रुक गया। उसके चेहरे पर एक छाया पड़ गई।
"मज़बूरी थी मैडम," कादर ने एक लंबी सांस छोड़ी। "शुरू में पेट पालने के लिए यह धंधा किया था। लगा था चार पैसे कमाकर छोड़ दूंगा। लेकिन यह दलदल है... अब चाहकर भी इसे नहीं छोड़ सकता। या यूं कहिये... यह धंधा मुझे नहीं छोड़ेगा।"
कादर ने एक कड़वी मुस्कान दी।
"खैर छोड़ो मुझे... मेरे जीवन का कोई क्या भरोसा? आज हूँ, कल पुलिस की गोली या किसी दुश्मन का चाकू... कहानी ख़त्म।"
उसने बात बदली। "प्याज़ कट गए हैं, मैं भगोना चढ़ाऊं?"
कादर ने अपनी नज़रें ऊपर उठाईं।
आग की रौशनी में उसने देखा... कामिनी की आँखों में आंसू थे।
उसकी बड़ी-बड़ी, कजरारी आँखें पानी से भर आई थीं और एक बूंद उसकी गोरी गाल पर लुढ़क गई थी।
कादर का दिल पसीज गया। उसे लगा कामिनी उसकी दुखभरी दास्तां सुनकर रो रही है।
एक 'गुंडे' के लिए किसी 'शरीफ औरत' का रोना... यह कादर के लिए बहुत बड़ी बात थी।
वह बिना सोचे आगे बढ़ा।
उसने अपना बड़ा, खुरदरा हाथ बढ़ाया और अपने अंगूठे से कामिनी के गाल पर लुढ़कते उस आंसू को पोंछ दिया।
"अरे मैडम..." कादर की आवाज़ मखमली हो गई। "आप रो क्यों रही हैं? मेरी ज़िंदगी इतनी भी बुरी नहीं है कि आपकी खूबसूरत आँखों में मोती आ जाएं।"
कादर का अंगूठा कामिनी के गाल पर था।
वह स्पर्श... खुरदरा मगर बेहद कोमल।
कामिनी के पूरे बदन में एक सिहरन दौड़ गई। रमेश मरियल था लेकिन उसके स्पर्श में जानवरो वाला अहसास होता था, लेकिन कादर खुद जानवर किसी भेड़िया जैसा दिखता था लेकिन उसके स्पर्श में संवेदना (Care) थी।
कामिनी अभी भी मर्दो को समझ नहीं पा रही थी.
मर्द वाकई है क्या चीज?
वह एक पल के लिए उस मर्दाने प्यार भरे अहसास में खो गई।
फिर उसे होश आया।
वह खिलखिलाकर हंस पड़ी। आंसू अभी भी गाल पर थे, लेकिन होंठों पर हंसी थी।
"अरे बुद्धू..." कामिनी ने अपनी गीली आँखों को पल्लू से पोंछा। "यह तुम्हारी कहानी सुनकर नहीं... यह कम्बख्त प्याज़ की वजह से है। बहुत तीखे हैं।"
कादर एक पल के लिए हक्का-बक्का रह गया, फिर वह भी ज़ोर से हंस पड़ा।
"धत् तेरी की! और मैं यहाँ खुद को देवदास समझ रहा था!"
दोनों की हंसी स्टोर रूम के बाहर गूंजने लगी।
उस हंसी में जो दूरी थी, वह अब मिट चुकी थी।
कादर का हाथ अभी भी कामिनी के घुटने के पास चटाई पर था, और कामिनी का कंधा कादर की तरफ झुका हुआ था।
चूल्हे पर तेल गरम हो रहा था,
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चूल्हे की आग अब पूरी जवानी पर थी, लपटें ऊपर उठ रही थीं।
भगोने में तेल खौल रहा था।
कामिनी बिल्कुल पास बैठी थी, आँखों में एक बच्चे जैसी जिज्ञासा लिए। वह कादर के हर मूवमेंट को बारीकी से देख रही थी।
"अब क्या डाला?" कामिनी ने आगे झुकते हुए पूछा। "यह काला वाला क्या था?"
कामिनी के आगे झुकने से उसके स्तन बहार को लुढ़क आये, जिस पर कादर ने बराबर नजर फेरी, लेकिन कोई रिएक्शन नहीं दिया.
"यह बड़ी इलायची है मैडम," कादर ने एक टीचर की तरह समझाया। "यह खुशबू को कैद करती है।"
कामिनी ऐसे सिर हिला रही थी जैसे कोई शिष्या अपने गुरु से जीवन का पाठ पढ़ रही हो।
कादर मसाले डालता गया, और हर एक मसाले की खासियत को बताता गया.
ये दालचीनी है... मीठा स्वाद होता है, लेकिन तभी जब अच्छे से पकाया जाये,
मसाले का धीमी आंच पर पकना जरुरी है, तभी स्वाद आता है.
कादर की नजर कामिनी के स्तनो मे पनपी स्तनों की घाटी के बीच ही थी,
जितना धीमी आंच पर चलाओगे उतना ही रस छोड़ेंगे ये मसाले... उतना ही स्वाद आएगा खाने मे.
कामिनी समझ रही थी, उसे अपना जिस्म, उसने उठती भावनाये भागोने मे पड़े मसलो जैसी ही महसूस हो रही थी.
मसाले भुन चुके थे, प्याज़ सुनहरा हो गया था। अब बारी थी 'मटन' की।
कादर ने अपनी टी-शर्ट की बांहें ऊपर चढ़ाईं। उसकी कलाई की नसें और बांहों की मछलियां (Muscles) फड़क रही थीं।
मटन की भारी थाली कामिनी के दूसरी तरफ रखी थी।
उसे उठाने के लिए कादर को अपनी जगह से उठना पड़ा।
वह अपने पंजों के बल, उकड़ूँ (Squat Position) होकर बैठा।
उसका वह नीला पाजामा पहले ही उसकी भारी-भरकम जांघों और पेडू पर किसी गुब्बारे की तरह तना हुआ था। सिलाई का एक-एक धागा चीख रहा था।
कादर ने जैसे ही मटन उठाने के लिए अपने घुटने चौड़े किये और आगे झुका... कपड़े ने हार मान ली।
"ससससररर..... चररररर....!!"
सन्नाटे को चीरती हुई कपड़े फटने की वह आवाज़ किसी बम धमाके जैसी हुई।
पाजामा बिल्कुल बीचों-बीच (Crotch area) से, मूठ से लेकर नीचे तक फटता चला गया।
और उस फटे हुए पर्दे से...
कादर का विशाल, काला और भारी पौरुष आज़ाद होकर, एक झटके के साथ बाहर आ गिरा।
साथ में उसके विशाल और भारी अंडकोष (टट्टे ) भी लटक कर बाहर झूल गए।
कामिनी की नज़रें, जो मटन की थाली पर थीं, चुंबक की तरह खिंचकर सीधे वहां जा चिपकीं।
उसका मुंह खुला का खुला रह गया। सांस हलक में अटक गई।
कल रात उसने जो देखा था, वह दूर से और धुंधला था।
लेकिन अभी?
अभी वह 'विशाल अजगर' उसकी आँखों से मात्र 1 फ़ीट की दूरी पर था।
चूल्हे की आग की नारंगी और पीली रौशनी सीधे कादर के नंगे लंड पर पड़ रही थी, जिससे वह किसी काले सोने की तरह दमक रहा था।
वह पूरी तरह तना हुआ नहीं था, लेकिन 'सुप्त अवस्था' (Flaccid) में भी वह इतना मोटा और लंबा था कि उसका सिरा नीचे बिछि चटाई को चूम रहा था।
कामिनी की नज़रें उसकी बनावट पर अटक गईं।
उसका तना (Shaft) काला और नसों से भरा था, लेकिन उसका आगे का हिस्सा (Glans)...
खतने की वजह से वह 'टोप' पूरी तरह नंगा और खुला था।
आग की गर्मी और लटकने की वजह से उसमें खून का दौरा बढ़ गया था। वह गहरा लाल और जामुनी रंग का दिख रहा था।
वह सुपारी (Head) मशरूम की तरह फूली हुई थी और चमक रही थी।
उस नंगे, गीले और संवेदनशील हिस्से को इतनी पास से देखना... कामिनी को लगा जैसे उसने साक्षात किसी 'दानव' का रूप देख लिया हो।
उसके नीचे लटकते हुए टट्टे (Balls)...
साफ़, चिकने और भारी, वे कादर की जांघों के बीच एक भारी 'पेंडुलम' की तरह झूल रहे थे।
वह पूरा 'पैकेज' इतना विशाल और 'जानवर जैसा' था कि कामिनी की आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था।
कामिनी का दिल और उसकी योनि... दोनों एक साथ धड़क उठे।
"धक्... धक्... धक्..."
उसकी छाती में तूफ़ान आ गया।
और उसकी जांघों के बीच?
वहाँ बाढ़ (Flood) आ गई।
उस दृश्य ने उसके दिमाग को बाईपास (Bypass) कर दिया और सीधा उसकी कामुकता पर चोट की। उसकी पैंटी एक ही पल में गीली होकर चिपचिपी हो गई।
उसका मन हुआ कि वह हाथ बढ़ाए और उस 'झूलते हुए लाल टोप' को छूकर देखे... क्या वह वाकई इतना गरम है जितना दिख रहा है?
यह दृश्य मुश्किल से 10 सेकंड का रहा होगा, लेकिन कामिनी के लिए वक़्त थम गया था।
तभी कादर को अपनी जांघों के बीच शाम की ठंडी हवा का स्पर्श हुआ।
उसे लगा कुछ बहुत गलत हुआ है।
उसने नीचे देखा...
और उसका खून जम गया।
उसका 'हथियार'... उसकी इज़्ज़त... सरेआम बाहर लटक रही थी। और सामने बैठी 'कामिनी मैडम' उसे ऐसे घूर रही थीं जैसे कोई भूखी शेरनी जवान हिरन को देखती है।
कादर शर्म और हड़बड़ाहट से पानी-पानी हो गया।
अभी-अभी जो इज़्ज़त और दोस्ती कमाई थी, वह इस फटे पाजामे ने तार-तार कर दी।
कादर ने मटन की थाली छोड़ दी।
उसने बिजली की रफ़्तार से अपनी दोनों जांघों को आपस में चिपका लिया और अपने हाथों से उस फटे हुए हिस्से को ढकने की नाकाम कोशिश की।
उसका चेहरा शर्म से झुक गया।
"ममम... माफ़... माफ़ करना मैडम..." कादर की आवाज़ कांप रही थी। "वो... वो पाजामा टाइट था... पता नहीं कब..."
कादर तुरंत चूल्हे की तरफ पलट गया और अपनी पीठ कामिनी की तरफ कर ली, ताकि वह उसे और न देख सके।
कामिनी के सामने से वह 'हसीन और खतरनाक' दृश्य गायब हो गया।
कादर की आवाज़ सुनकर वह भी नींद से जागी।
वह खुद बुरी तरह सकपका गई। उसका चेहरा शर्म से लाल टमाटर हो गया।
लेकिन उस शर्म में डर नहीं था... उस शर्म में एक गहरा और गंदा नशा था।
"उह... मैं..." कामिनी हकलायी।
उसने अपने सूखे होंठों पर जीभ फेरी।
"रुको... मैं लाती हूँ कुछ..."
कामिनी वहाँ एक पल भी और नहीं रुक सकती थी। उसकी धड़कनें इतनी तेज़ थीं कि उसे लगा दिल फट जाएगा।
वह चटाई से उठी और तेज़ कदमों से, लगभग दौड़ते हुए घर की तरफ भागी।
उसकी सांसें "धौंकनी" की तरह चल रही थीं।
लेकिन भागते वक़्त भी... उसकी आँखों के सामने अन्धेरा नहीं था।
उसकी आँखों के सामने अभी भी आग की रौशनी में चमकता हुआ, कादर का वो 'विशाल, नंगा और लाल टोपे वाला मोटा लंड ' लहरा रहा था।
वह छविउसके दिमाग में छप चुकी थी—हमेशा के लिए।
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कामिनी दौड़ती हुई बेडरूम में आयी और अलमारी के पास जाकर सांस लेने लगी।
उसका दिल घोड़े की रफ़्तार से दौड़ रहा था।
उसने झटके से अलमारी खोली और रमेश के कपड़ों को टटोलना शुरू किया।
एक पैंट... एक लोअर...
उसने रमेश का एक लोअर उठाया, लेकिन अगले ही पल उसे फेंक दिया।
'बेकार है...' कामिनी ने मन ही मन सोचा। 'रमेश की कमर 32 है और उस... उस जानवर की कम से कम 36 होगी। रमेश के कपड़े तो उसकी जांघों पर चढ़ेंगे भी नहीं।'
कादर के जिस्म की विशालता का ख्याल आते ही कामिनी के पेट में फिर से मीठी गुदगुदी होने लगी।
उसकी नज़र अपनी साड़ियों के ढेर पर गई।
उसने एक सफ़ेद रंग का शिफॉन का दुपट्टा खींचा।
कपड़ा बेहद महीन और पारदर्शी था।
कामिनी ने उसे हाथ में लिया। 'यह उसे ढक तो नहीं पाएगा... लेकिन शायद लपेटने के काम आ जाए।'
कामिनी वापस जाने के लिए मुड़ी, लेकिन फिर आईने के सामने रुक गई।
उसने खुद को देखा।
सांसें फूलने की वजह से उसका सीना तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहा था।
गाल तमतमाए हुए थे।
उसकी योनि में एक अजीब सी 'कुलबुलाहट' थी, जैसे कोई चीज़ वहां रेंग रही हो। उसे बार-बार कादर का वो 'लाल, नंगा लटकता हुआ लंड ' याद आ रहा था।
'अगर वो सोया हुआ इतना बड़ा था... तो खड़ा होकर कैसा लगेगा?'
यह जिज्ञासा उसे पागल कर रही थी। उसे उस 'शक्ति' का पूरा रूप देखना था।
कामिनी ने एक गहरी सांस ली।
उसने अपने कांपते हाथों को अपने ब्लाउज़ के गले (Neckline) पर रखा।
और धीरे से...
ऊपर का एक हुक (Button) खोल दिया।
हुक खुलते ही ब्लाउज़ का गला ढीला होकर और चौड़ा हो गया।
उसके भारी, सुडौल और गोरे स्तनों की गहरी घाटी (Cleavage) अब और भी ज्यादा नुमाया हो गई। पसीने की एक बूंद उसकी गर्दन से रपटते हुए उस घाटी में समा गई।
कामिनी ने खुद को निहारा। अब वह भूखी प्यासी शेरनी लग रही थी, जो अपने संभावित शिकार की ओर बढ़ना चाहती थी.
उसने दुपट्टा उठाया और वापस बाहर की तरफ चल दी।
जब कामिनी वापस पहुंची, कादर अपनी शर्मिंदगी छुपाने के लिए मटन में व्यस्त हो गया था।
वह एक हाथ से अपने फटे हुए पाजामे को जांघों के बीच दबाए हुए था, और दूसरे हाथ से कलछी चला रहा था।
चूल्हे की आग में मटन भुन रहा था, लेकिन कादर का ध्यान कहीं और था।
कामिनी उसके पास आई।
"ये लो..." कामिनी की आवाज़ में अब एक अलग ही भारीपन था। "इसे लपेट लो। अभी बाद में रमेश के आने पर कुछ और मंगाती हूँ।"
कामिनी ने वो सफ़ेद, मखमली दुपट्टा कादर की तरफ बढ़ा दिया।
कादर ने सिर उठाकर दुपट्टे को देखा, फिर कामिनी को।
उसने दुपट्टा थाम लिया।
कपड़ा बहुत ही मुलायम और पतला था।
जैसे ही कादर ने उसे अपने हाथो मे लिया, कमर पर बांधना चाहा... उसे एक महक आई।
मोगरे का इत्र और कामिनी के बदन की मादक खुशबू।
वह दुपट्टा कामिनी की अलमारी में उसके कपड़ों के साथ रखा था, इसलिए उसमें उसकी 'महक' बसी हुई थी।
कादर ने एक पल के लिए आँखें बंद कर लीं। उस खुशबू ने उसके नथुनों को भर दिया।
उसने धीरे से उस दुपट्टे को अपनी कमर पर चारो तरफ लपेट लिया।
और फटे हुए पाजामे को कामिनी के सामने ही नीचे सरकाते हुए अपने जिस्म से अलग कर साइड मे राख दिया.
सफ़ेद, नाज़ुक दुपट्टा उस काले, खुरदरे और पसीने से सने मर्द की कमर पर लिपट गया—जैसे कामिनी खुद उससे लिपट गई हो।
कामिनी वापस अपनी जगह, चटाई पर बैठ गई।
लेकिन इस बार... उसके बैठने का अंदाज़ बदल चुका था।
वह कादर के बिल्कुल सामने बैठी थी।
उसने जानबूझकर अपनी साड़ी का पल्लू ढीला छोड़ दिया, जो उसके कंधे से सरक कर कोहनी पर आ गिरा।
और पल्लू के हटते ही...
ब्लाउज़ के उस खुले हुए बटन ने अपना काम कर दिया।
चूल्हे की आग की रौशनी सीधे कामिनी की छाती पर पड़ रही थी।
उसके स्तनों का 80% हिस्सा ब्लाउज़ से बाहर झांक रहा था।
गोरे, भरे हुए और पसीने से चमकते हुए उभार बस निप्पल ने ही कामिनी की इज़्ज़त को बचा रखा था, वो अभी भी ब्लाउज के महीन कपडे मे कैद थे, लेकिन उसकी उपस्थिति उसके कड़कपान से महसूस की जा सकता थी.
उसके स्तन सांस लेने की वजह से वे ऊपर-नीचे हो रहे थे।
उनकी गहराई... वह 'घाटी' इतनी गहरी और आमंत्रित करने वाली थी कि किसी भी मर्द का ईमान डोल जाए।
कादर, जो मटन चला रहा था, उसकी नज़र वहां अटक गई।
उसका हाथ भगोने में ही रुक गया।
उसकी आँखें कामिनी के चेहरे से हटकर, उस 'सफ़ेद मांस' (White Flesh) पर गड़ गईं।
उसके गले से 'घूँट' निगलने की आवाज़ आई।
"गटक..."
कादर को अपनी जांघों के बीच, उस दुपट्टे के नीचे, एक जबरदस्त करंट महसूस हुआ।
उसका लंड, जो शर्मिंदगी की वजह से सिकुड़ गया था... अब उस नज़ारे को देखकर फनफनाने लगा।
उसमें खून दौड़ने लगा।
कादर ने महसूस किया कि उसका 'औज़ार' दुपट्टे के नीचे खड़ा हो रहा है, उस नाज़ुक कपड़े को तान रहा है।
उसका लाल, नंगा टोप अब दुपट्टे के कपड़े से रगड़ खा रहा था।
कामिनी ने देखा कि कादर की नज़रें कहाँ हैं।
उसने अपना पल्लू ठीक नहीं किया।
बल्कि उसने अपनी कमर को थोड़ा और सीधा किया, जिससे उसका सीना और आगे को उभर आया।
उसने अपनी नशीली आँखों से कादर को देखा, कादर की नजरें तो पहले से ही कामिनी पर टिकी हुई थी.
मौसम रूहानी हो गया था, सूरज की अंतिम रौशनी भी डूब गई थी, दोनों के जिस्म आग की पिली रौशनी मे नुमाया थे..
पीछे से आती आग की रौशनी मे कादर के खड़े लंड की छाया साफ साफ दिख रही थी, वो पल प्रति पल आकर मे बड़ा हो रहा था.

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