मेरी माँ कामिनी - भाग 32
कामिनी ने बाथरूम का दरवाज़ा अंदर से बंद किया और अपनी पीठ उससे टिका दी।
उसकी सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं। "हमफ़्फ़्फ़... हमफ़्फ़्फ़... हमफ़्फ़्फ़........"
उसका पूरा शरीर पसीने से तर-बतर था, लेकिन यह पसीना गर्मी का नहीं, चरम उत्तेजना का था।
एक चोर चोरी कर के भागा था.
कामिनी लड़खड़ाते कदमों से वॉशबेसिन के पास गई और आईने में अपनी शक्ल देखी।
उसका चेहरा... वह पहचान नहीं पा रही थी कि यह वही 'कामिनी' है।
उसकी आँखें चढ़ी हुई थीं, पुतलियां फैली हुई थीं, और गाल टमाटर की तरह लाल थे।
लेकिन सबसे बुरी हालत उसके होंठों की थी।
कादर के उस खुरदरे, मोटे और विशाल लंड को इतनी देर तक चूसने की वजह से उसके होंठ सूजकर मोटे हो गए थे। वे कांप रहे थे।
कामिनी ने अपनी उंगली अपने निचले होंठ पर फेरी।
उसे वहां अभी भी कादर के लंड की गरमाहट और उस मसालेदार सूप का कसैला स्वाद महसूस हो रहा था।
"कादर..." कामिनी के मुंह से एक आह निकली।
उसकी नज़र अपनी छाती पर गई।
उसका ब्लाउज़ पसीने से चिपक गया था।
अंदर, उसके भारी स्तन फूलकर सख्त हो गए थे।
उत्तेजना के कारण उसके स्तनों पर नीली नसें उभर आई थीं, जो उसकी गोरी त्वचा के नीचे साफ़ चमक रही थीं।
निप्पल इतने सख्त हो गए थे कि ब्लाउज़ के कपड़े में चुभ रहे थे।
उसे अपने स्तनों में एक मीठा-मीठा दर्द हो रहा था, जैसे वे किसी के मज़बूत हाथों का इंतज़ार कर रहे हों। वो मर्दाने हाथ जो कस कस के उसके स्तनों को भींचे उसका सारा दर्द निकाल दे.
और नीचे... उसकी योनि?
वह तो रो रही थी।
कामिनी की जांघों के बीच एक अजीब सी फड़कन (Throbbing) हो रही थी।
उसकी योनि की दीवारें बार-बार सिकुड़ रही थीं और फैल रही थीं— "धक्-धक्... धक्-धक्..."
वह अधूरी रह गई थी। वह उस मुकाम पर थी जहाँ से लौटना नामुमकिन होता है।
उसकी योनि चीख-चीख कर "लंड" मांग रही थी—मोटा, सख्त और भरने वाला।
कामिनी ने ठंडा पानी अपने चेहरे पर मारा, लेकिन अंदर का ज्वालामुखी शांत होने का नाम नहीं ले रहा था। वह हताश होकर आईने को घूरने लगी।
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उधर बाहर हॉल में, रमेश अपनी ही धुन में था।
रमेश को रत्ती भर भी परवाह नहीं थी कि उसकी बीवी कहाँ गायब हो गई। उसे बस अपनी दारू और मटन की पड़ी थी। उसने एक बार भी नहीं पूछा— "कामिनी कहाँ है? ठीक तो है?
बंटी ने दरवाजा खोला था,
उसकी नज़रें मोबाइल स्क्रीन पर गड़ी थीं, उंगलियां तेज़ी से गेम खेल रही थीं।
"अरे सुन.. वो... बहार... कुर्सी...." रमेश के शब्द मुँह मे ही बंद हो गए.
बंटी ने अपने बाप को देखा तक नहीं, और बिना कुछ बोले पलटकर वापस अपने कमरे की तरफ चल दिया।
उसे अपने बाप, उसके शराबी दोस्त, या अपनी माँ की 'हरकतों' से कोई मतलब नहीं दिख रहा था—या शायद वह सब जानकर भी अनजान बना हुआ था।
रमेश बड़बड़ाया, "साला... आजकल की औलाद..." और खुद ही कुर्सी उठाने लगा। शमशेर ने भी हाथ बटाया.
बगीचे में, उसी चूल्हे और आग के पास, जहाँ थोड़ी देर पहले 'रासलीला' हुई थी, अब महफ़िल जम रही थी।
रमेश और शमशेर ने प्लास्टिक की कुर्सियां आग के पास लगा ली थीं।
शमशेर ने गर्मी और 'माहौल' बनाने के लिए अपनी पुलिस की वर्दी उतार दी थी।
वह अब सिर्फ़ अपनी सफ़ेद बनियान और खाकी पैंट में बैठा था।
उसका गठीला, कसरती बदन और चौड़ा सीना बनियान में साफ़ दिख रहा था। उसके डोले (Biceps) रमेश के थुलथुले शरीर के सामने लोहे जैसे लग रहे थे।
शमशेर ने व्हिस्की की बोतल खोली और दो गिलास बनाए।
और कादर खान?
कादर की हालत 'सांप-छछूंदर' जैसी थी।
उसने कामिनी का दिया हुआ सफ़ेद दुपट्टा जल्दी से खोलकर एक कोने में छुपा दिया था, क्योंकि अगर वह दुपट्टा रमेश देख लेता तो सवाल खड़े हो जाते।
लेकिन अब समस्या यह थी कि उसका पाजामा तो अभी भी फटा हुआ था।
और उसका लंड... वह अभी भी पूरी तरह शांत नहीं हुआ था। वह अर्ध-जागृत (Semi-hard) अवस्था में था और फटे हुए कपड़े से बाहर झांकने को बेताब था।
कादर ने एक हाथ में मटन का भगोना पकड़ा हुआ था, और दूसरे हाथ से अपनी पाजामे को जांघों के बीच भींचकर पकड़ रखा था।
वह अपनी टांगें सिकोड़कर, छोटे-छोटे कदम बढ़ाता हुआ चल रहा था, ताकि उसका 'खुला हुआ राज़' किसी को न दिखे।
"अरे कादर भाई! लाओ लाओ..." रमेश ने आवाज़ दी। "खुशबू से ही नशा हो रहा है।"
कादर धीरे से आया और टेबल की आड़ लेकर खड़ा हो गया, ताकि उसका निचला हिस्सा टेबल के पीछे छुप जाए।
उसने मटन का भगोना टेबल पर रखा।
उसकी नज़र शमशेर पर पड़ी।
शमशेर बनियान में बैठा सिगरेट फूंक रहा था। उसकी नज़रें कादर पर नहीं, बल्कि घर के दरवाज़े पर थी, शायद कमीनी की तलाश मे था.
एक तरफ कादर अपनी फटी हुई इज़्ज़त (पाजामा) बचा रहा था, दूसरी तरफ कामिनी बाथरूम में अपनी आग बुझाने का विचार कर रही थी, जिस्म मे फट पड़ने को बेताब ज्वालामुखी को दबा रही थी.
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बाहर बगीचे में आग जल रही थी।
रमेश ने मटन सूप का कटोरा मुंह से लगाया।
"सुऊऊऊप्प... सुड़पपप्पाप्प्पप...."
उसने एक बड़ा घूंट भरा। गरम, मसालेदार और रसीला शोरबा उसके गले से नीचे उतरा।
रमेश की आँखें फैल गईं।
"वाह! वाह भाई वाह!" रमेश चिल्लाया। "कादर... क्या जादू है तेरे हाथों में यार! कसम से, ऐसा स्वाद आज तक नहीं आया। एकदम... एकदम अलग ही नशा है इसमें, तुझे घर पर छुपा के रखने का अच्छा ईनाम दिया तूने"
"शुक्रिया साब " कादर, जो टेबल की आड़ में अपनी फटी हुई इज़्ज़त (पाजामा) छुपाए खड़ा था, फीका सा मुस्कुराया।
उसने दबी हुई आवाज़ में कहा, "साब वो कुछ खबर लगी? छापा क्यों पड़ा था, किसने खबर दी "
कादर ने शमशेर की तरफ उत्सुकता से पूछा, जैसे जानना चाहता था उसके पास कितना वक़्त है.
तभी पीछे से आहट हुई।
कामिनी सामने दरवाज़े से बाहर चली आ रही थी, बलखाती कमर मटकाती, पीछे से आती दूधिया रौशनी मे उसका कामुक जिस्म साफ झलक रहा था,
रमेश की पीठ उसकी तरफ थी लेकिन शमशेर और कादर इस अद्भुत नज़ारे का लुत्फ़ उठाया रहे थे.
उसने अपना चेहरा धो लिया था, बाल ठीक कर लिए थे, लेकिन साड़ी का पल्लू अभी भी सरका ही हुआ था, या यूँ कहिये उसने इसे ठीक करने की जरुरत ही नहीं समझी।
हाथ में पानी की बोतल और सलाद की प्लेट थी।
रमेश ने कामिनी को देखा।
"अरे कामिनी! आ भई... देख क्या चीज़ बनाई है कादर ने। अमृत है अमृत! तू भी ले एक कटोरी।"
कामिनी की सांस अटक गई।
उस सूप को पीना तो दूर, उसे देखकर ही कामिनी को अपनी जांघों के बीच गीलापन महसूस होने लगा। उसे याद आ गया कि कैसे वह सूप कादर के लाल टोप पर बह रहा था।
"न... नहीं," कामिनी हकलायी। "म... मैंने चख लिया था। आप लोग खाओ।" कामिनी ने जिस तरीके से इस सूप को चखा था शायद ही और किसी औरत ने चखा हो.
कामिनी आगे बढ़ी और टेबल पर सलाद रखने लगी।
तभी उसे एक तीखी नज़र का अहसास हुआ।
सामने शमशेर बैठा था।
उसने अपनी वर्दी उतार दी थी। वह सिर्फ़ सफ़ेद बनियान में था।
आग की रौशनी में शमशेर का चौड़ा सीना, उसके बांहों के कसे हुए डोले और उसकी मोटी गर्दन साफ़ दिख रही थी। रमेश का शरीर ढीला-ढाला था, लेकिन शमशेर का शरीर कसा हुआ (Tight) और ताकतवर था।
शमशेर के हाथ में व्हिस्की का गिलास था, लेकिन उसकी नज़रें गिलास पर नहीं, कामिनी पर थीं।
उसकी बाज़ जैसी नज़रें कामिनी के चेहरे पर गड़ गईं।
उसने देखा...
वो कामिनी के हुस्न को बारीकी से निहार रहा था.
उसकी फूली हुई सांसें...
और सबसे अहम्... उसके सूजे हुए, लाल और कांपते होंठ।
शमशेर, जो एक पुराना पुलिस वाला था, औरतों की 'बॉडी लैंग्वेज' पढ़ना बखूबी जानता था।
"भाभी जी..." शमशेर की आवाज़ भारी और गहरी थी। "आज आप बहुत थकी हुई लग रही हैं। होंठ भी सूज गए हैं... क्या मटन ज्यादा तीखा था?"
शमशेर के इस सवाल में एक चिंगारी थी।
कामिनी का दिल धक से रह गया। उसे लगा शायद शमशेर ने उसे वहाँ से भाग कर जाता देख लिया है।
"व... वो... बस गर्मी बहुत है," कामिनी ने नज़रें चुरा लीं।
शमशेर मुस्कुराया।
जवाब मे कामिनी भी काँखियो से कादर की तरफ देख शमशेर को देख मुस्कुरा दी.
कादर अभी भी जाँघे दबाये खड़ा था.
"सुनिए आपके पुराने कपडे इसे दे दूँ क्या?" कामिनी ने रमेश के कंधे पर हाथ रख पूछा.
"मेरे कपडे कादर को कहाँ से आएंगे, देख उसे एक बार, साला राक्षस जैसा है " रमेश हस पड़ा.
कामिनी जाने को ही थी की.
"अच्छा सुन वो एक दो पुरानी लुंगी होंगी वो दे दे, क्यों भाई कादर काम चला अभी कल देखते है तेरे लिए कोई कपडे "
रमेश ने बेपरवाही से कहाँ.
उसने कादर को देखा तक नहीं, वो दारू और मटन सूप पीने में मगन था।
"आओ मै देती हूँ " कामिनी आगे बढ़ चली पीछे पीछे कादर कामिनी की मादक गांड को निहारता चल पड़ा, चल क्या पड़ा जैसे उसकी गांड ने खिंच लिया हो.
तभी शमशेर ने रमेश के गिलास में और शराब डाल दी—बिना पानी के। "ले.भाई.... आज जी भर के पी। साला घर मे ऐसा मजा फिर कब मिलेगा,
शमशेर की कुटिल, चालक पोलीसिया नजरें कामिनी और कादर को अलग ही नजर से देख रही थी.
रमेश ने वह कड़क पेग एक सांस में गटक लिया।
शराब और कबाब का दौर चलने लगा.
कामिनी तेज़ कदमों से अपने बेडरूम में दाखिल हुई। उसके पीछे-पीछे कादर खान किसी साये की तरह अंदर आ गया।
कामिनी ने दरवाज़ा तो नहीं लगाया (ताकि शक न हो), लेकिन उसे हल्का सा भिड़ा दिया।
कमरे में सफ़ेद ट्यूबलाइट की दूधिया रौशनी जल रही थी।
बाहर की पीली आग की रौशनी के मुकाबले यहाँ सब कुछ साफ़, नंगा और सच दिख रहा था।
कामिनी अलमारी की तरफ लपकी और एक पुरानी चेकदार लुंगी निकाल लाई।
वह पलटी, "ये लो कादर... इसे..."
लेकिन उसके शब्द गले में ही अटक गए।
कादर ने लुंगी पकड़ने का इंतज़ार नहीं किया था।
उसने कामिनी के पलटते ही, अपने उस फटे हुए पाजामे को एक झटके में नीचे सरका दिया था।
कामिनी की नज़रें सीधे उसके पैरों के बीच गड़ गईं।
बाहर तो अँधेरा था, लेकिन यहाँ ट्यूबलाइट की रौशनी में वह 'राक्षस' और भी डरावना और लुभावना लग रहा था।
उसके लाल और नंगे टोप (सुपाड़े) पर अभी भी कहीं कहीं मटन सूप की चिकनाई और कामिनी की लार चमक रही थी। वह गीला था और फनफना रहा था।
कामिनी की सांसें अटक गईं।
उसका गला सूख गया, लेकिन जांघों के बीच सुनामी आ गई।
वह उस काले खंभे की तरफ खिंची चली गई। उसे बस उसे छूना था, अपनी मुट्ठी में भरना था।
कामिनी ने कांपते हाथों से लुंगी बेड पर फेंकी और कादर की तरफ बढ़ी।
उसका हाथ उस सलामी देते हुए टोप को पकड़ने के लिए आगे बढ़ा।
लेकिन तभी...
"खटाक!"
कादर ने हवा में ही कामिनी की कलाई थाम ली।
उसकी पकड़ लोहे जैसी मज़बूत थी।
कामिनी ने हैरान होकर कादर के चेहरे को देखा। कादर की आँखों में हवस की आग थी, लेकिन साथ ही एक जिद भी थी।
"रुको मैडम....." कादर की आवाज़ भारी और मर्दाने गुरूर से भरी थी।
"अभी नहीं... तूने मेरा चखा है, अब मेरी बारी है।"
कामिनी कुछ समझ पाती, उससे पहले ही कादर ने उसे एक झटके से अपनी तरफ खींचा और अगले ही पल...
"धप्प!!"
कादर ने कामिनी को, उसकी साड़ी समेत, पीछे बेड पर धक्का दे दिया।
कामिनी का भारी बदन गद्दे पर गिरा। स्प्रिंग चरचरा उठे।
गिरते ही कामिनी की साड़ी और पेटीकोट घुटनों से ऊपर सरक गए।
उसने पैंटी नहीं पहनी थी, वो इतनी गीली हो चुकी थी की उसे उतार देना ही कामिनी को उचित लगा था.
कामिनी ने अपनी टांगें सिकोड़नी चाहीं, लेकिन कादर ने उन्हें अपने मज़बूत हाथों से पकड़कर चौड़ा कर दिया।
बेड की सफ़ेद चादर पर कामिनी की गोरी, मांसल और भरी हुई जांघें फैल गईं।
और उन दोनों जांघों के बीच...
उसकी गुलाबी, सूजी हुई और रस टपकाती योनि कादर के सामने बेपर्दा थी।
वह पूरी तरह गीली थी।
उसके गुलाबी होठ (Labia) बाहर की तरफ उभरे हुए थे और उनमें से कामिनी का पारदर्शी पानी (Lubrication) रिसकर जांघों पर बह रहा था।
वह मंज़र देखकर कादर पागल हो गया।
"आह्ह्ह... क्या माल है..." कादर बड़बड़ाया।
"वक़्त कम है मेरी जान... लेकिन प्यास बहुत है।"
कादर ने बिना कोई चेतावनी दिए, बिना कोई तैयारी किए, अपना सिर कामिनी की दोनों जांघों के बीच घुसा दिया।
"स्स्स्लर्प......!!"
कादर ने अपनी खुरदरी और चौड़ी जीभ सीधे कामिनी की योनि के द्वार पर दे मारी।
"आआआआहहहहह.... कादर....!!"
कामिनी की चीख निकल गई। उसने जल्दी से अपना मुंह अपने हाथ से दबा लिया, ताकि आवाज़ बाहर न जाए।
लेकिन उसका शरीर बेड पर तड़प उठा।
कादर किसी भूखे कुत्ते की तरह उस पर टूट पड़ा था।
उसने अपने दोनों हाथों से कामिनी के कूल्हों (Buttocks) को जकड़ लिया और उन्हें ऊपर उठा दिया, ताकि उसकी योनि का दाना-दाना उसके मुंह के सामने आ जाए।
कादर की जीभ कामिनी की योनि की गहराइयों को खंगालने लगी।
वह अपनी जीभ की नोक को कामिनी के उभरे हुए दाने (Clitoris) पर फिराता, और फिर पूरी जीभ से उसकी योनि के छेद को चाटने लगता।
"फच्... फच्... चप्प... चप्प..."
पूरे कमरे में चाटने की गीली और गंदी आवाज़ें गूंजने लगीं।
कामिनी की योनि का स्वाद... नमकीन, खट्टा और कस्तूरी जैसा नशीला था।
कामिनी की हालत ख़राब थी।
उसकी कमर हवा में उठ रही थी। उसकी उंगलियां बेडशीट को नोच रही थीं।
"उफ्फ्फ्फ... कादर... मार डालोगे क्या... आह्ह्ह... ऐसे ही... और ज़ोर से..."
कामिनी का सिर दाएं-बाएं डोल रहा था।
कादर ने अपनी नाक कामिनी के दाने पर रगड़ दी। वह उसकी महक को सूंघ रहा था, चाट रहा था।
उसने अपनी एक उंगली कामिनी की फड़कती हुई योनि में घुसा दी और जीभ से ऊपर क्लिटोरिस को रगड़ने लगा।
बाहर रमेश और शमशेर शराब पी रहे थे... और यहाँ अंदर कादर कामिनी की जवानी का रस पी रहा था।
कामिनी अब बर्दाश्त की सीमा पर थी।
उसकी जांघें कादर के सिर को भींच रही थीं।
कामिनी वैसे ही वासना की दहलीज पर खड़ी थी, बस थोड़ी और मेहनत और कुएँ से शर्तिया पानी निकलना ही था.
लेकिन कामिनी की किस्मत उसकी हवास उसकी परीक्षा लेने के मूड मे थी.
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कामिनी का शरीर धनुष की तरह तन गया था।
उसकी एड़ियां बिस्तर पर रगड़ खा रही थीं।
उसकी योनि के अंदर कादर की उंगली और बाहर उसकी जीभ ने ऐसा तूफ़ान खड़ा कर दिया था कि अब वह ज्वालामुखी फटने ही वाला था।
"कादर... बस... बस आ गई... आह्ह्ह्ह... मत रुकना... !!"
कामिनी का सिर पीछे लुढ़क गया, आँखें चढ़ गईं। वह उस 'मोक्ष' के अंतिम पड़ाव पर थी।
अगले 5 सेकंड में उसका शरीर ऐंठने वाला था और सारा रस कादर के मुंह में बहने वाला था।
लेकिन ठीक उसी "नाज़ुक पल" (Crucial Moment) पर...
बाहर से एक भारी और शराबी आवाज़ ने बेडरूम के सन्नाटे को चीर दिया।
"अरे ओ कादर भाई!! कहाँ रह गए यार??"
वह शमशेर की आवाज़ थी। नशे में धुत, लेकिन तेज़।
"सूप ठंडा हो रहा है... और बोतल ख़त्म हो गई है! जल्दी आ भाई!"
वह आवाज़ किसी हथौड़े की तरह कामिनी के दिमाग पर पड़ी। ऐसा लगा ठीक उसके पीछे से, बिल्कुल पास से आवाज़ आई हो, दोनों ने चौंक कार बैडरूम की खुली खिड़की की तरफ देखा, वो खुली हुई थी.
कामिनी की सांसे थाम गई, उसने कैसे इस बात पर गौर नहीं किया, अक्सर हवास मे डूबा इंसान खुले दरवाजे, खुली खिड़की नहीं देख पाता.
कामिनी के साथ भी यही हुआ.
और उससे भी बड़ा झटका तब लगा, जब कादर ने अचानक अपना मुंह हटा लिया।
"चटाक!"
कादर ने एक झटके में अपना सिर पीछे खींच लिया।
कामिनी की योनि, जो चरम सुख के लिए तैयार थी, एकदम से सन्न रह गई।
वह 'झड़ने' वाली थी, लेकिन वह करंट वहीं का वहीं नसों में जम गया।
कादर खड़ा हुआ और लगभग नंगा ही दौड़ता हुआ खिड़की के पास पंहुचा, उसने देखा शमशेर और रमेश वही स्टोर के पास बैठे गप मार रहे थे,
"आया साब..... " कादर वही से चिल्लाया।
उसके होंठ और दाढ़ी कामिनी के पानी (Juices) से सने हुए थे।
उसने अपनी कलाई से अपना मुंह पोंछा और एक गहरी सांस ली।
"मै जाता हूँ, वरना लफड़ा हो जायेगा " कादर ने कामिनी की तरफ देखा, जो बिस्तर पर अभी भी टांगें फैलाए, तड़प रही थी।
कादर ने एक पल के लिए कामिनी की उस गीली, लाल और फड़कती हुई योनि को ललचाई नज़रों से देखा।
कादर ने पास पड़ी वो चेकदार लुंगी उठाई।
उसने उसे झटका और अपनी कमर पर बांधना शुरू किया।
कामिनी की नज़रें अभी भी धुंधली थीं, लेकिन उसने देखा...
कादर ने लुंगी के नीचे कुछ नहीं पहना था।
उसका काला, विशाल लंड अभी भी लोहे की तरह खड़ा था।
जैसे ही उसने लुंगी बांधी...
लुंगी के कपड़े में आगे की तरफ एक विशाल तंबू (Tent) बन गया।
वह खड़ा लंड लुंगी को आगे की तरफ धकेल रहा था, जैसे कह रहा हो कि 'मैं अभी शांत नहीं हुआ हूँ'।
"मैं चलता हूँ..." आपकी सेवा मे फिर हाजिर होऊंगा.
कादर मुड़ा और बेडरूम से बाहर निकल गया।
कामिनी बिस्तर पर अकेली रह गई।
उसकी साड़ी उठी हुई थी, जांघें फैली हुई थीं।
उसकी योनि गीली थी, लेकिन प्यासी थी।
उस अधूरेपन ने उसे अंदर से तोड़ दिया। उसे रोना आ रहा था, और साथ ही गुस्सा भी।
गुस्सा रमेश पर, शमशेर पर..... जिसने गलत वक़्त पर आवाज़ दी।
गुस्सा कादर पर... जो उसे ऐसे छोड़ गया।
और गुस्सा खुद पर... कि वह अपनी हवस की गुलाम बन गई थी।
कामिनी ने अपनी जांघों को सिकोड़ा और करवट लेकर तकिये में मुंह छुपा लिया।
उसने अपनी मुट्ठी भींची और गद्दे पर दे मारी।
"उफ्फ्फ्फ......!!"
उसकी योनि में एक मीठा-मीठा दर्द हो रहा था। यह दर्द उसे पूरी रात सोने नहीं देने वाला था।
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कादर बेडरूम से निकला और गैलरी से होता हुआ अंधेरे बगीचे में आया।
उसकी चाल अजीब थी।
वह अपनी टांगें चौड़ी करके चल रहा था, जैसे किसी पहलवान ने अखाड़े में लंगोट बांधा हो।
वजह साफ़ थी—लुंगी के नीचे उसका 10 इंच का खंभा अभी भी पूरे उफान पर था। वह ठंडा होने का नाम नहीं ले रहा था।
लुंगी का कपड़ा आगे से बुरी तरह तना हुआ था, एक विशाल तंबू बना हुआ था जो हवा में झूल रहा था।
कादर टेबल के पास पहुंचा।
रमेश तो नशे में धुत था, उसकी गर्दन एक तरफ लुढ़की हुई थी।
लेकिन शमशेर?
शमशेर की आँखें जल रही थीं।
उसने कादर को आते हुए देखा।
उसकी नज़र सबसे पहले कादर के चेहरे पर गई।
कादर ने अपना मुंह पोंछ लिया था, लेकिन कामिनी की योनि का रस और उसकी लार की चमक अभी भी उसकी दाढ़ी और होठों पर कहीं-कहीं बाकी थी।
फिर शमशेर की नज़र नीचे गई... कादर की लुंगी पर।
शमशेर ने वो "उभार" देख लिया।
वह कोई बच्चा नहीं था। वह समझ गया कि लुंगी के नीचे क्या छुपा है और यह "हथियार" इतना तना हुआ क्यों है।
"आ गए कादर भाई..." शमशेर ने एक गहरी सांस ली और कुर्सी पर पीछे टिक गया।
उसने रमेश को कोहनी मारी। "ओए रमेश... उठ! तेरा बावर्ची आ गया।"
फिर शमशेर ने कादर की आँखों में देखा।
"बड़ा वक़्त लगाया अंदर? लुंगी ढूंढ रहे थे... या कुछ और भी कर रहे थे?"
शमशेर की आवाज़ में एक कुटिल व्यंग्य था।
उसने अपनी उंगली से इशारा किया।
"और ये लुंगी में क्या 'तोप' छुपा लाए हो भाई? लगता है अंदर कुछ ज्यादा ही 'गर्मी' थी?"
कादर का दिल धक से रह गया।
उसे लगा पकड़ा गया।
लेकिन शमशेर के चेहरे पर गुस्सा नहीं था... बल्कि एक गंदी मुस्कान थी।
शमशेर मज़े ले रहा था।
"कुछ नहीं साब..." कादर ने नज़रें झुका लीं और टेबल की आड़ में हो गया। "वो... बस कपड़ा टाइट बांध लिया है।"
अभी कादर कुछ सफाई देता की तभी बगीचे सन्नाटे को तोड़ता रघु लड़खड़ाते कदमों से अंदर दाखिल हुआ,
रघु, जो अपनी 'दवाई' (दारू) पीकर वापस आ गया था, नशे में झूमता हुआ स्टोर रूम की तरफ बढ़ा चला आ रहा था,
"अच्छा कादर भाई आ गया तेरा दोस्त, तुम लोग दावत उड़ाओ, हम लोगो का तो हो गया " शमशेर ने रमेश को उठाया और अपने कंधे का सहारा दे घर की ओर बढ़ गया.
कादर, जो वहीं अंधेरे में लुंगी लपेटे खड़ा था, रघु को देखकर मन मसोस कर रह गया।
'साला कबाब में हड्डी...' कादर ने दांत पीसे।
रघु के आ जाने से अब कादर के लिए दोबारा घर में घुसना नामुमकिन था। उसका 'खेल' अधूरा रह गया था।
उधर, रमेश पूरी तरह नशे में धुत्त था।
उसे कादर के उस 'जादुई मटन सूप' पर इतना भरोसा था कि लड़खड़ाते हुए भी उसे लग रहा था कि आज रात वह कामिनी की चीखें निकलवा देगा।
"कामिनी... मेरी जान...देख तेरा शेर आ रहा है..." रमेश बड़बड़ा रहा था, जबकि उसके पैर ज़मीन पर टिक भी नहीं रहे थे।
शमशेर ने रमेश का हाथ अपने कंधे पर रखा और उसे सहारा देकर घर के अंदर ले जाने लगा।
शमशेर के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी। एक रहस्य था,
इन्ही सब उपक्रम मे कोई आधे घंटे बीत गए थे, शमशेर रमेश को घसीटता हुआ बेडरूम के दरवाज़े तक ले आया।
शमशेर ने बेडरूम का दरवाज़ा धकेला।
अंदर का नज़ारा देखकर शमशेर के कदम वहीं जम गए।
ट्यूबलाइट की दूधिया रौशनी में... कामिनी बिस्तर पर औंधे मुंह (पेट के बल) लेटी हुई थी।
उसका चेहरा तकिये में दबा हुआ था, शायद वह अपनी सिसकियाँ दबा रही थी।
लेकिन उसकी पोजीशन...
उसकी भारी और मांसल गांड (Buttocks) पीछे की तरफ उभरी हुई थी। साड़ी घुटनों तक ऊपर चढ़ी हुई थी, जिससे उसकी गोरी, सुडौल पिंडलियां (Calves) और जांघों का पिछला हिस्सा साफ़ चमक रहा था।
शमशेर का दिमाग यह नज़ारा देखकर सुन्न हो गया।
उसे लगा जैसे कोई "हथिनी" अपने साथी का इंतज़ार कर रही हो।
उसकी मर्दानगी ने उसकी खाकी पैंट के अंदर तुरंत सलामी दे दी।
"आओ रमेश..." शमशेर ने जानबूझकर भारी आवाज़ में कहा, अपनी नज़रें कामिनी की गांड से हटाए बिना।
शमशेर की आवाज़ सुनते ही कामिनी बिजली के करंट की तरह चौंकी।
वह ख्यालों में थी—कादर के लंड और अपनी अधूरी प्यास के ख्यालों में।
हड़बड़ाहट में उसे याद ही नहीं रहा कि उसका हुक खुला हुआ है और पल्लू गिरा हुआ है।
"उह्ह... आप..."
कामिनी घबराकर झटके से पलटी और खड़ी होने की कोशिश की।
लेकिन इस जल्दबाज़ी में वही हुआ जिसका शमशेर को इंतज़ार था।
कामिनी का पल्लू, जो उसने बस नाम के लिए कंधे पर रखा था, सरककर नीचे ज़मीन पर आ गिरा।
और उसके साथ ही...
उसका ब्लाउज़, जिसका ऊपर का हुक कादर के लिए खोला गया था, तनाव न सह सका और फैल गया।
शमशेर की आँखों के सामने जन्नत का दरवाज़ा खुल गया।
कामिनी के विशाल, गोरे और पसीने से सने हुए स्तन लगभग पूरी तरह बेपर्दा हो गए।
वे भारी थे, और तेज़ सांसों की वजह से ऊपर-नीचे हो रहे थे।
उनकी गहरी घाटी (Cleavage) इतनी गहरी थी कि उसमें पसीने की बूंदें चमक रही थीं।
कादर के लंड को चूसने और उत्तेजना की वजह से उसके निप्पल ब्लाउज़ के कपड़े को चीरकर बाहर झांक रहे थे।
उन पर उभरी हुई नीली नसें शमशेर को साफ़ दिखाई दे रही थीं।
शमशेर किसी भूखे कुत्ते की तरह उन घाटियों को घूरे जा रहा था।
उसने रमेश को पकड़ा हुआ था, लेकिन उसकी आँखें कामिनी के 'मांस' को नोच रही थीं।
कामिनी ने शमशेर की नज़रों को अपने स्तनों पर रेंगते हुए महसूस किया।
वह शर्म से लाल हो गई, लेकिन उसने खुद को ढका नहीं।
शायद वह भी चाहती थी कि कोई उसे देखे... कोई उसे सराहे... क्योंकि कादर ने उसे 'अधूरी' छोड़ दिया था।
"थैंक्स भाई... थैंक्स..." रमेश ने लड़खड़ाते हुए कहा। उसकी आँखें बंद हो रही थीं।
"अब तू जा... और कामिनी... कामिनी तू इधर आ..."
रमेश बेहोशी में भी हुकुम चला रहा था। उसे लगा वह कामिनी को प्यार करेगा, जबकि वह खड़े होने के लायक भी नहीं था।
शमशेर ने रमेश को एक झटके में बेड पर पटक दिया।
रमेश गद्दे पर गिरते ही ढेर हो गया।
अब कमरे में सिर्फ़ दो लोग जाग रहे थे— शमशेर और कामिनी।
शमशेर कमरे से बाहर नहीं गया।
वह बेड के पास, रमेश के पैरों की तरफ खड़ा हो गया।
उसने अपनी बनियान ठीक की, जिससे उसका चौड़ा सीना और तन गया।
इस पोज़ (Pose) ने कामिनी का ध्यान शमशेर के निचले हिस्से पर खींच लिया।
शमशेर की टाइट खाकी पुलिसिया पैंट में एक विशाल उभार (Bulge) साफ़... बिल्कुल साफ़ दिख रहा था।
उसका लंड पूरा खड़ा था और पैंट की ज़िप को फाड़ने की कोशिश कर रहा था।
वह उभार कादर के लंड जितना विशाल तो नहीं था, लेकिन वह सख्त और खतरनाक लग रहा था।
शमशेर ने कामिनी की आँखों में देखा, फिर उसके खुले हुए स्तनों पर, और फिर वापस आँखों में।
"रमेश तो सो गया भाभी..." शमशेर की आवाज़ में एक गहरा नशा था।
वह एक कदम आगे बढ़ा।
"लेकिन लगता है... आपको नींद नहीं आ रही।"
कामिनी के होंठ (जो अभी भी सूजे हुए थे) कांपने लगे।
उसकी योनि ने एक बार फिर "धक्-धक्" किया।
सामने पति बेहोश पड़ा था, और उसके पैरों के पास एक 'सांड' जैसा मर्द खड़ा था जो उसे कच्चा चबाने को तैयार था।
कामिनी के पास दो रास्ते थे—चीखना, या... समर्पण करना।
क्रमशः........






2 Comments
Bhai yaar itna accha likhte ho pata hi nahi chalta ki kab update pura ho gaya aur aapne sansay mai chod diya bhai samsher bhi garam kare aisa likho jaldi dena update please bhai
ReplyDeleteथैंक्स यू दोस्त, जल्द ही आएगा अपडेट.
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