हकीम लकड़द्दीन ने दवा कि शीशी का ढक्कन खोला और टेबल पर रखी एक छोटी सी पीतल की कटोरी में उस लाल दवा को उँडेलने लगा। वो दवा बिल्कुल लाल, गाढ़ी और चिपचिपी सी थी, जैसे कोई खून से सना हुआ शहद हो।
"बीवी जी... बुरा ना मानें तो, ये साड़ी उतार दीजिए। महँगी साड़ी होगी, इस तेल के दाग से बिल्कुल बेकार हो जाएगी," लकड़द्दीन ने अपने गंदे, पान से रंगे दाँत चियारते हुए एक बेहद शातिर मुस्कान के साथ कहा।
यह बोलते हुए उसने टेबल के नीचे से एक पुराना, छोटा सा मिट्टी के तेल का स्टोव निकाला और कटोरी को उस पर रख कर गर्म होने के लिए छोड़ दिया। उसने इस बात की रत्ती भर भी परवाह नहीं की कि वो एक घरेलू औरत को दिन-दहाड़े, एक बंद कमरे में सीधे-सीधे साड़ी उतारने को बोल रहा है।
इधर कामिनी ये सुनकर सन्न रह गई। उसका पूरा जिस्म किसी बिजली के झटके की तरह झनझना सा गया।
"ससस..... साड़ी... क्या उतारना ज़रूरी है?" कामिनी की आवाज़ थरथरा रही थी। उसके गले में जैसे काँटे चुभ रहे थे।
"बीवी जी, ये लाल तेल अगर कपड़ों में चिपक जाता है तो फिर कभी छूटता नहीं है। और जब तक बीच में कपड़ों की ये दीवार रहेगी, तो तेल आपके जिस्म के अंदर, आपकी उन जाम नसों में समाएगा कैसे?" हकीम ने स्टोव की आँच सेट करते हुए बहुत ही सहजता से जवाब दिया,
"और वैसे भी बीवी जी... मैं ठहरा एक बूढ़ा आदमी। मेरी तो उम्र ढल चुकी है, पैर क़ब्र में लटके हैं। मुझ जैसे बुज़ुर्ग से क्या शर्माना?"
कामिनी ने भारी साँस छोड़ते हुए धीरे से 'हाँ' में सिर हिलाया।
सच तो ये था कि वो ख़ुद भी इस कसी हुई साड़ी से अब आज़ाद होना चाहती थी। दोपहर की उमस भरी गर्मी, दवा के नशे और हवस से तपते हुए जिस्म ने वैसे ही उसकी हालत ख़राब कर रखी थी। साड़ी का एक-एक धागा उसे अपने जिस्म पर बोझ लग रहा था।
कामिनी टेबल से नीचे उतरी और अपने काँपते पैरों के सहारे फर्श पर खड़ी हो गई।
उसकी नज़रें कनखियों से अभी भी हकीम पर ही टिकी थीं। लेकिन हकीम ऐसे अनजान और शरीफ़ बना हुआ कटोरी में तेल गर्म कर रहा था, जैसे पीछे खड़ी उस औरत के कपड़े उतारने से उसे कोई फर्क ही ना पड़ता हो। हकीम की इस बेरुखी और शांति ने कामिनी की अंदरूनी हिचकिचाहट को थोड़ा कम कर दिया, लेकिन उसके सुलगते हुए जिस्म को और ज़्यादा भड़का दिया।
कामिनी ने अपने काँपते हाथों से अपनी कमर पर बंधी साड़ी की खोंसनी (Tuck) को ढीला किया ही था कि तभी...
"और क्या है ना बीवी जी..." हकीम की भारी और खुरदरी आवाज़ कमरे के सन्नाटे में गूँजी।
हकीम ने स्टोव से कटोरी उतारी और उसमें से उठते हुए लाल, मादक धुएँ के बीच से कामिनी की आँखों में बिल्कुल सीधे झाँकते हुए कहा, "हकीम और वैद्य से कभी कोई बात छुपानी नहीं चाहिए... और सच कहूँ तो झूठ बोलने का कोई फायदा भी नहीं होता। क्योंकि एक तजुर्बेकार हकीम... अपने मरीज़ के जिस्म को देख कर ही उसका असली 'मर्ज़' पहचान लेता है।"
हकीम ने ये बात इतनी गहराई और शातिर तरीके से कही कि कामिनी के पूरे बदन पर रोंगटे खड़े हो गए। हकीम की पारखी और मुस्कुराती हुई आँखें कामिनी के चेहरे पर सब कुछ पढ़ चुकी थीं।
कामिनी का दिल धक से रह गया।
"मरीज़ देख के मर्ज़ पहचान लेता हूँ " इन शब्दों ने कामिनी के दिमाग़ में एक भयानक कामुक विस्फोट कर दिया। उसे लगा जैसे उस बूढ़े ने अपनी पारखी नज़रों से उसके कपड़ों के आर-पार देखकर, उसकी पैंटी के अंदर रिसते हुए गीलेपन को साफ़-साफ़ देख लिया है।
ये एहसास कि उसका पर्दा फाश हो चुका है, उसके अंदर की हया को तोड़कर एक अंधी हवस को हवा दे रहा था।
कमरे के भारी सन्नाटे में कामिनी के काँपते हाथों ने अपनी कमर पर बंधी साड़ी की खोंसनी और पेटीकोट का नाड़ा खोल दिया।
'सर्रर्र... सर्रर्र...'
रेशमी और सूती कपड़े के खिसकने की आवाज़ शांत कमरे में किसी संगीत की तरह गूँजी। भारी साड़ी कामिनी के कंधों से होती हुई, उसके गदराए जिस्म से फिसलकर सीधा उसके पैरों के पास फर्श पर एक ढेर में तब्दील हो गई।
कपड़ों के भारी खोल से बाहर आते ही कामिनी के जिस्म का भभकता हुआ, मादक भूगोल पूरी तरह बेपर्दा हो गया।
अब वो कमरे के बीचों-बीच सिर्फ अपने पसीने से भीगे, कसे हुए लाल ब्लाउज़ और एक सफ़ेद सूती पैंटी में खड़ी थी।
हकीम लकड़द्दीन के हाथों में पकड़ी गर्म तेल की कटोरी वहीं हवा में जम गई। उसकी बूढ़ी, धुँधली आँखें फटी की फटी रह गईं। 70 साल की उम्र... अपने जीवन के सात दशकों में इस बूढ़े वैद्य ने जाने कितनी औरतों की नब्ज़ टटोली थी, लेकिन ऐसा क़यामत ढाने वाला, भरा-पूरा और सुलगता हुआ हुस्न उसने अपनी पूरी ज़िंदगी में नहीं देखा था।
कामिनी का चौड़ा, गदराया हुआ पेट... जो किसी कुँवारी लड़की की तरह सपाट नहीं, बल्कि एक परिपक्व (Mature) औरत की तरह हल्का सा भरा हुआ था। गोरे माँस पर उभरती दो हल्की-हल्की सिलवटें उसे और भी कामुक बना रही थीं। पेट के बिल्कुल बीचों-बीच उसकी गहरी और गोल नाभि (Navel) किसी अँधेरे, रहस्यमयी कुएँ की तरह मँडरा रही थी, जिसे देखकर ही किसी भी मर्द का मन उसमें डूब जाने को मचल उठे।
और उसके नीचे... कामिनी की चिकनी, सुडौल और भारी-भरकम गोरी जाँघें। रात भर की वहशत और रगड़ से वो जाँघें हल्की गुलाबी और लाल पड़ गई थीं। वो इतनी मांसल और गदराई हुई थीं कि खड़े होने पर उनके बीच रत्ती भर का भी फासला नहीं था, वो आपस में पूरी तरह चिपकी हुई थीं।
हकीम का सूखा हुआ हलक एक पल के लिए काँटा हो गया। उसने एक भारी घूँट निगला। उसे लगा जैसे उसकी ज़िंदगी के 70 साल सिर्फ और सिर्फ आज के इस मंज़र को देखने के लिए ही बीते थे।
इधर कामिनी की हालत ख़राब थी। एक बूढ़े और गैर मर्द के सामने इस तरह सिर्फ अंतर्वस्त्रों (Undergarments) में खड़े होने का ख़याल उसे शर्म से पानी-पानी कर रहा था, लेकिन हवस... हवस उस शर्म पर पूरी तरह हावी हो चुकी थी।
कामिनी का चेहरा टमाटर की तरह लाल हो गया। उसने अपनी हया और अपने नंगेपन को छुपाने की एक नाक़ाम कोशिश करते हुए अपने दोनों हाथ अपने गदराए पेट और पैंटी के हिस्से पर रख लिए। लेकिन उसके वो नाज़ुक हाथ उस भारी-भरकम जिस्म की मादकता को छुपाने के लिए बहुत छोटे थे।
दवा के नशे, बेतहाशा उत्तेजना और बूढ़े हकीम की 'घूरती हुई नज़रों' के दबाव में कामिनी की साँसें धौंकनी की तरह चलने लगीं।
एक अजीब सी बेकरारी और मदहोशी में कामिनी की भारी, चिकनी जाँघें अपने आप आपस में रगड़ खाने लगीं।
'सर्र... सर्र... चप...!'
गोरे मांस के आपस में रगड़ खाने की हल्की, कामुक आवाज़ कमरे में साफ़ सुनाई दे रही थी। कामिनी जितनी कोशिश अपने नंगेपन को छुपाने की कर रही थी, उसकी जाँघों का वो घर्षण उसकी बंद चुत के मुहाने पर उतनी ही मीठी खुजली पैदा कर रहा था।
कामिनी ने अपनी जाँघों को और कसकर आपस में भींच लिया। उसकी आँखें आधी बंद हो गई थीं और होंठ हल्के से खुल गए थे। वो अपने ही जिस्म की गर्मी और बूढ़े हकीम की भूखी नज़रों के सामने पूरी तरह पिघल चुकी थी। उसकी सफ़ेद सूती पैंटी का बीच का हिस्सा अब अंदर से रिसते हुए कामरस के कारण तेज़ी से नम होने लगा था।
"बहुत... बहुत दर्द है नसों में..." कामिनी के मुँह से अनजाने में ही एक मदहोश कर देने वाली, काँपती हुई सिसकी निकल गई।
हकीम लकड़द्दीन के झुर्रियों वाले चेहरे पर एक भयानक, शैतानी और ठरकी मुस्कान आ गई।
"आ जाइए बीवी जी... टेबल पर उल्टा लेट जाइए... आज आपकी सारी अकड़, सारी गर्मी... गहराई से निकाल दूँगा।" हकीम ने कटोरी से उठते लाल तेल के धुएँ के बीच से कामिनी को देखते हुए कहा।
कामिनी के काँपते कदम अब उस लकड़ी की 'एग्जामिनेशन टेबल' की तरफ़ बढ़े। उसके जिस्म पर सिर्फ़ पसीने से भीगा लाल ब्लाउज़ और एक सूती सफ़ेद पैंटी थी। शर्म और हवस के उस भयानक द्वंद्व में झिझकती हुई कामिनी ने टेबल का किनारा पकड़ा और धीरे से उस पर पेट के बल (उल्टा) लेट गई।
लेटते ही उसके शरीर का सारा भार टेबल पर आ गया। उसके भारी, गदराए स्तन नीचे गद्दे में गहराई तक दब गए। और पीछे... पीछे का नज़ारा तो हकीम लकड़द्दीन के होश उड़ाने के लिए काफ़ी था।
टेबल पर उल्टा लेटते ही कामिनी की भारी, मांसल और चौड़ी जाँघें जो अब तक आपस में चिपकी हुई थीं, वो अपने पूरे आकार में टेबल पर फैल गईं। उसकी गोल, मटकाई हुई गांड का उभार सफ़ेद पैंटी से छलक कर बाहर आने को बेताब था। जाँघों के फैलने से उसकी पैंटी के किनारे और उसकी गांड की गहरी दरार का मुहाना बिल्कुल बेपर्दा होकर हकीम की आँखों के ठीक सामने आ गया था।
कमरे की उमस और अंदरूनी उत्तेजना से कामिनी का रोम-रोम पसीने से भीग चुका था। उसकी गोरी जाँघों और कमर के निचले हिस्से पर पसीने की बारीक बूँदें किसी मोती की तरह चमक रही थीं।
छत पर लटकता हुआ बाबा आदम के ज़माने का वो पुराना पंखा 'चररर... चररर...' की धीमी आवाज़ करता हुआ घूम रहा था। पंखे की मद्धम, हल्की हवा जब कामिनी की पसीने से भीगी, नंगी और तपती हुई जाँघों से टकराती... तो ऐसा लगता जैसे कोई अदृश्य हाथ उसकी जाँघों को सहला रहा हो। हर एक हवा का झोंका कामिनी के नंगे जिस्म में एक मीठी सी सिहरन दौड़ा रहा था।
कामिनी ने अपना मुँह तकिए में गड़ा लिया और आने वाले पलों के लिए अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं। उसका पूरा बदन एक अनजानी, मर्दाना छुअन के इंतज़ार में किसी कसी हुई कमान की तरह तन गया था।
लेकिन हकीम लकड़द्दीन को कोई जल्दी नहीं थी। वो कामिनी के फैले हुए हुस्न के ठीक पीछे खड़ा था। उसके एक हाथ में वो पीतल की कटोरी थी, जिसमें वो लाल दवा खौल रही थी।
कामिनी आँखें बंद किए बस हकीम के हाथों के स्पर्श का इंतज़ार कर रही थी... लेकिन छुअन की जगह...
'टप्प... टप्प... टप्प...'
अचानक कामिनी की नंगी, अकड़ी हुई जाँघों पर कुछ बेहद गर्म, खौलता हुआ तरल पदार्थ गिरा।
हकीम ने बिना छुए, उस गर्म और गुनगुने तेल की कुछ बूँदें सीधे कटोरी से कामिनी की जाँघों के पिछले हिस्से पर टपका दी थीं।
"आआआह्ह्ह.... उईईई माँ... जल गया!" कामिनी दर्द और तेज़ गर्माहट से टेबल पर तड़प उठी।
वो तेल सच में किसी पिघलती हुई गर्म मोम (Hot wax) की तरह कामिनी की नाज़ुक त्वचा पर गिरा था। उस भभकती हुई गर्माहट ने कामिनी की नसों में आग लगा दी। वो लगभग चिल्लाते हुए टेबल से उठने ही वाली थी कि...
"बस बीवी जी... बस!"
इससे पहले कि कामिनी कुछ और कहती या अपना जिस्म उठाती, हकीम लकड़द्दीन के दोनों भारी, खुरदरे और सख़्त हाथ कामिनी की तेल पड़ी जाँघों पर 'धप्प' से आ गिरे।
हकीम की सूखी, खुरदरी उँगलियों ने उस खौलते हुए लाल तेल को कामिनी की चौड़ी जाँघों पर पूरी ताक़त से मलना (Rub) शुरू कर दिया।
और तभी... एक अजीब सा चमत्कार हुआ।
गर्म मोम की तरह जलता हुआ वो तेल... हकीम की खुरदरी उँगलियों का घर्षण (Friction) पाते ही... अचानक से बर्फ जैसा ठंडा हो गया!
कामिनी की जो त्वचा कुछ सेकंड पहले आग की तरह जल रही थी, वो अब एक बेहद सुकून देने वाली, जादुई ठंडक में डूब गई। वो 'लाल दवा' जड़ी-बूटियों का कोई ऐसा मायावी अर्क थी, जो गर्म होकर शरीर पर गिरती थी, लेकिन माँस में रगड़ खाते ही नसों को बर्फ सी ठंडक और आराम देती थी।
"आआआह्ह्ह... उउउम्मम्म्म..." कामिनी के मुँह से दर्द की चीख की जगह, अब एक बेहद गहरी, रूह को कंपा देने वाली मादक सिसकी निकल गई।
उस ठंडे तेल की चिकनाहट और हकीम के कड़क, तजुर्बेकार हाथों का दबाव... कामिनी की अकड़ी हुई जाँघों के माँस में गहरे तक समा रहा था। हकीम अपनी हथेलियों से कामिनी की जाँघों को नीचे से ऊपर की तरफ, ठीक उसकी पैंटी के किनारों तक धकेलता और फिर उँगलियों से माँस को दबाते हुए वापस नीचे ले जाता।
कामिनी का तड़पता हुआ जिस्म अब मेज़ पर पूरी तरह से पिघलने लगा था। वो दर्द, वो अकड़न सब गायब हो रहे थे, और उनकी जगह ले रही थी... एक मीठी, सुन्न कर देने वाली मदहोशी!
"कहाँ जल गया बीवी जी... ये लकड़द्दीन का हाथ है, और पक्कड़द्दीन का तेल... ये जलाता नहीं, सिर्फ अंदर की दबी हुई 'आग' को बुझाता है..." हकीम ने कामिनी की जाँघों को एक और बार कसकर दबाते हुए, अपनी भारी और हवस भरी आवाज़ में कहा।
हकीम लकड़द्दीन के खुरदरे हाथों ने अब लाल, चिपचिपे तेल के साथ एक लय पकड़ ली थी। मालिश का वो तरीका बेहद अजीब और जंगली था। जब हकीम अपने दोनों हाथों का पूरा वज़न डालकर कामिनी की जाँघों के गदराए माँस को कसकर भींचता, तो दर्द की एक तेज़ लहर उठती...
"आआआह्ह्ह... हकीम जी... उईई," कामिनी दर्द से चीत्कार उठती, उसकी उँगलियाँ टेबल की चादर को खुरच देतीं।
लेकिन... जैसे ही हकीम अपनी उँगलियों का दबाव छोड़ता और अपने हाथों को फिसलते हुए नीचे की तरफ़ लाता, तो वो दर्द एक ऐसे जादुई, रूहानी सुकूँ में बदल जाता जिसका कोई मोल ही नहीं था। कामिनी की वो भारी-भरकम, सूजी हुई जाँघें पल भर के लिए रुई जैसी हल्की महसूस होने लगतीं। दर्द और राहत के इस लुका-छिपी वाले खेल ने कामिनी के दिमाग़ को पूरी तरह सुन्न कर दिया था।
धीरे-धीरे... हकीम के तजुर्बेकार हाथ अपनी हदें पार करने लगे। मालिश का दायरा अब जाँघों से खिसक कर ऊपर, कामिनी के विशाल, फैले हुए कुल्हों तक पहुँच गया था।
'चप... चपाक... सर्रर्र... चप...!'
लाल दवा सच में किसी शहद की तरह गाढ़ी और चिपचिपी थी। उस चिपचिपे तेल से कामिनी की पूरी गांड सन चुकी थी। कमरे की मद्धम रोशनी में उसकी विशाल गोलाई तेल की वजह से शीशे की तरह चमक रही थी।
हकीम की हथेलियाँ अब बिना किसी रोक-टोक के कामिनी के भारी कुल्हों को मसल रही थीं। और हर बार जब हकीम के हाथ कुल्हों की गोलाई से होते हुए नीचे जाँघों के बीच की अँधेरी घाटी की तरफ़ जाते "उस जगह जहाँ से कामिनी की गांड की दरार शुरू होती थी और जहाँ उसकी सूजी हुई चुत के बाहरी होंठ थे"
कामिनी की साँसें अटक जातीं।
हकीम की उँगलियाँ जानबूझकर सूती कच्छी के ऊपर से ही, गांड की गहरी दरार के मुहाने पर दबाव डालतीं। वो उँगलियाँ मानो उस दरार को हल्का सा छेदतीं और फिर वापस लौट आतीं।
"उउउम्मम्म्म... सस्स्स... आआह्ह्ह," कामिनी का चेहरा तकिए में धँसा था और उसके मुँह से लगातार एक मादक, अनियंत्रित सिसकी निकल रही थी।
तेल की चिपचिपाहट और हकीम का बार-बार गांड की दरार पर रगड़ खाना... कामिनी की सफ़ेद सूती पैंटी अब पूरी तरह से सिकुड़ कर एक पतली डोरी जैसी बन गई थी और उसकी गांड की दो भारी फाँकों के बिल्कुल बीचों-बीच, गहराई में जाकर धँस (Wedgie) गई थी।
वहाँ नीचे इतना गीलापन हो गया था कि अब ये बता पाना नामुमकिन था कि वो गीलापन लाल, चिपचिपे तेल का है... या फिर कामिनी की सुलगती हुई चुत से रिस कर बह रहे गाढ़े, लसलसे कामरस का! हकीम की उँगलियाँ अब भीगी हुई पैंटी के ऊपर से बिना किसी रुकावट के सरक रही थीं।
कामिनी उस छुअन की इतनी आदी हो चुकी थी, हवस के समंदर में इतनी गहराई तक डूब चुकी थी कि वो चाहती थी हकीम के ये खुरदरे हाथ कभी ना रुकें। उसकी चुत जो कल रात से ही कुलबुला रही थी, वो अब इस मालिश की रगड़ से पूरी तरह बौरा गई थी।
लेकिन तभी...
एकदम से सब कुछ रुक गया।
हकीम लकड़द्दीन ने अचानक अपने तेल से सने दोनों हाथ कामिनी के जिस्म से हटा लिए।
"चरम सुख" की सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते कामिनी को अचानक जैसे किसी ने खाई में धकेल दिया हो। वो मीठा दर्द, वो गर्माहट, वो रगड़... पल भर में सब ख़त्म हो गया। कामिनी का सुलगता हुआ जिस्म हवा में किसी प्यासी मछली की तरह तड़प उठा।
"ये... ये क्या... रुक क्यों गए?" कामिनी की अनकही तड़प उसके काँपते जिस्म से साफ़ छलक रही थी।
हकीम अपनी कुर्सी से उठा और एक गहरी, शातिर साँस लेते हुए बोला, "बीवी जी... आपकी ये कच्छी तो पूरी ख़राब हो गई। तेल और पसीने से बिल्कुल लथपथ हो गई हैंगी... और ये बीच में फँस भी रही है, मालिश अंदर तक नहीं जा पा रही। इसे उतारना पड़ेगा"
लकड़द्दिन ने कोई रिक्वेस्ट नहीं कि उसने कहाँ "उतारना पड़ेगा " मतलब ये जरुरी है इसके बिना कोई काम नहीं हो सकता अब.
हकीम के इन शब्दों ने कमरे के सन्नाटे को चीर कर रख दिया।
कामिनी सन्न रह गई। उसे उस छुअन की बेतहाशा ज़रूरत थी, उसका शरीर उस रगड़ के लिए भीख माँग रहा था, लेकिन... पूरी तरह नंगा होना? अपनी पैंटी उतारना?
एक भयानक मानसिक जद्दोजहद शुरू हो गई। कामिनी ने अपनी भारी साँसों को काबू करते हुए, टेबल पर लेटे-लेटे ही अपनी गर्दन घुमाकर पीछे हकीम की तरफ देखा। उसकी आँखों में हवस की लाल खुमारी साफ़ छलक रही थी।
वो एक खानदानी, इज़्ज़तदार घरेलू औरत थी। बड़े घर कि औरत, बड़े बाबू कि औरत, एक जमींदार कि बहु। लेकिन इस वक़्त, लकड़ी की टेबल पर, सिर्फ़ एक पयासी काम उत्तेजना के चरम पर निढाल पड़ी एक औरत थी. उसका मादक जिस्म सिर्फ एक ब्लाउज़ में, पसीने और तेल से लथपथ पड़ा हुआ था, उसका वजूद किसी भी हया से बहुत दूर जा चुका था।
वो ये पैंटी ख़ुद कैसे उतार दे? लेकिन अगर नहीं उतारी... तो ये बूढ़ा मालिश नहीं करेगा। और अगर मालिश नहीं हुई... तो उसकी ये सुलगती हुई चुत और ये अकड़ी हुई नसें आज उसे पागल कर देंगी।
कामिनी के होंठ काँपे। उसने अपनी आधी खुली, नशीली आँखों से उस बूढ़े हकीम की आँखों में देखा और एक ऐसी बात कह दी, जिसने उसकी रही-सही शराफत का आख़िरी कतरा भी जला कर राख कर दिया।
"आप... आप ही उतार दीजिए..."
आवाज़ बहुत धीमी थी, पर उसमें छुपी हुई बेशर्मी और आमंत्रण इतना गहरा था कि किसी भी मर्द का पसीना छूट जाए।
बोलने के बाद कामिनी ने तुरंत अपना मुँह वापस तकिए में छुपा लिया। उसके अपने ही कान सुन्न हो गए थे।
"क्या कहा मैंने? एक रंडी की तरह... मैंने ख़ुद एक गैर मर्द को अपनी पैंटी उतारने की दावत दे दी?"
एक घरेलू औरत के मुँह से निकले ये शब्द शोभा नहीं देते थे। लेकिन हवस, दर्द और बेकाबू काम-उत्तेजना में फँसी एक औरत और कर भी क्या सकती थी? उस एक वाक्य के साथ कामिनी ने सिर्फ अपनी पैंटी उतारने की इज़ाज़त नहीं दी थी... बल्कि उसने अपने जिस्म, अपनी हया और अपनी रूह का पूरा कब्ज़ा उस 70 साल के बूढ़े ठरकी हकीम के हाथों में सौंप दिया था।
पीछे खड़े हकीम लकड़द्दीन के गंदे दाँत एक भयानक, विजयी मुस्कान के साथ बाहर आ गए। उसने अपने काँपते, तेल से सने हाथों को आगे बढ़ाया...
हकीम लकड़द्दीन के काँपते, लेकिन सधे हुए हाथ कामिनी की कमर के नीचे, सफ़ेद और तेल से भीगी पैंटी के किनारों तक पहुँच गए। कामिनी ने अपनी आँखें कसकर भींच लीं। उसने अपने होंठों को दाँतों तले दबा लिया, वो ख़ुद को आने वाले 'नंगेपन' के लिए तैयार कर रही हो।
हकीम ने अपनी उँगलियों से सूती कपड़े को दोनों तरफ़ से पकड़ा और बेहद धीमी गति से उसे कामिनी की गोरी जाँघों पर से नीचे की तरफ़ खिसकाने लगा।
'सर्रर्र... चप... सर्रर्र...'
पैंटी जैसे-जैसे नीचे सरक रही थी, वो कामिनी के तेल से सने गदराए माँस से रगड़ खा रही थी। वो सूती कपड़ा अब बिल्कुल भारी और चिपचिपा हो चुका था। वो धीरे-धीरे कामिनी की चौड़ी जाँघों से रेंगता हुआ, उसके घुटनों तक आया और फिर उसकी एड़ियों के सहारे फिसलकर पूरी तरह बाहर हो गया।
पैंटी के बाहर आते ही एक बेहद तेज़, अजीब सी मादक और नशीली गंध उस छोटे से कमरे में फैल गई। ये गंध जड़ी-बूटियों वाले लाल तेल और कामिनी की सुलगती हुई चुत से निकले गाढ़े, लसलसे 'कामरस' (Vaginal juices) का मादक मिश्रण थी।
हकीम ने कामिनी की नज़र बचाकर, उस भीगी हुई पैंटी को अपने चेहरे के करीब लाया और एक गहरी साँस खींचकर उसे सूँघ लिया।
'सूँ... आह्ह्ह!'
वो गंध किसी बिजली के झटके की तरह हकीम के दिमाग़ में कौंध गई। एक पल के लिए बूढ़े हकीम का पूरा जिस्म जैसे फिर से जवान हो गया। उसकी सूखी नसों में हवस का वो ख़ून उबलने लगा, जो बरसों से जमा हुआ था।
इधर मेज़ पर... कामिनी अब कमर के नीचे पूरी तरह से नंगी हो चुकी थी।
कच्छी के आख़िरी बंधन से आज़ाद होते ही कामिनी की गांड के दोनों विशाल, मांसल पाट (Cheeks) अपने प्राकृतिक आकार में बाहर की तरफ़ फैल गए। उन भारी कुल्हों के फैलते ही, उनके बिल्कुल बीचों-बीच मौजूद गहरी, अँधेरी और रहस्यमयी दरार पूरी तरह से खुल गई। और उस दरार की गहराई में... कामिनी का नाज़ुक गुदा छिद्र (Anus) साफ़-साफ़ नज़र आने लगा, जो लाल तेल और कामरस की वजह से शीशे की तरह चमक रहा था।
छत पर चलते पंखे की धीमी हवा अब सीधे उस बेपर्दा हुई दरार और नाज़ुक छिद्र से टकरा रही थी। हवा के ठंडे स्पर्श से कामिनी का पूरा नंगा जिस्म एक अनियंत्रित उत्तेजना में काँप उठा। उसके रोंगटे खड़े हो गए।
कामिनी अभी अपने इस नंगेपन के अहसास को समझ ही रही थी, कुछ सोच ही पाती कि...
'टप्प... टप्प... टप्प...'
"आआआआह्ह्ह्ह.... माऽऽऽ.... मर गईईई!"
कामिनी का पूरा वजूद एक झटके में हिल गया। वो लकड़ी की मेज़ पर मछली की तरह तड़प उठी।
हकीम ने बिल्कुल सटीक निशाना लगाते हुए, खौलते हुए लाल तेल की कुछ बुँदे सीधे कामिनी के नाज़ुक 'गुदा छिद्र' पर टपका दी थीं!
वो गर्माहट किसी ज्वालामुखी के लावे जैसी थी। नाज़ुक और अति-संवेदनशील जगह पर गर्म तेल की बूँद गिरते ही, कामिनी की गांड से 'करंट' की एक भयानक लहर उठी, जो सीधे उसकी रीढ़ की हड्डी से होती हुई उसके दिमाग़ और नीचे एड़ियों तक दौड़ गई। उसका पूरा जिस्म किसी कमान की तरह ऐंठ गया।
ये कोई आम दर्द नहीं था... ये एक ऐसा मादक, जंगली और पागल कर देने वाला अहसास था, जो कामिनी ने अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी महसूस नहीं किया था।
कामिनी की इस तड़प और करंट से ऐंठते जिस्म को देखकर हकीम लकड़द्दीन के चेहरे पर एक वहशी मुस्कान आ गई। उसने वक़्त बर्बाद नहीं किया।
इससे पहले कि कामिनी सँभल पाती, हकीम ने तेल से सनी अपनी बीच की लंबी उँगली (Middle finger) कामिनी की गांड की गहरी दरार में खिसका दी। उसकी खुरदरी उँगली सीधे गर्म तेल से सने गुदा छिद्र के मुहाने पर पहुँची और उसके चारों ओर गोल-गोल घूमने लगी।
"आअह्ह्ह.... ससससस.... उईई.... हकीम काका... वहाँ नहीं... आआह्ह," कामिनी ने हाँफते, तड़पते हुए विरोध किया। वो अपनी हया को समेटने की आख़िरी कोशिश कर रही थी।
"सारी नसें यहीं होती हैं बीवी जी..." हकीम की आवाज़ में एक सम्मोहन था, "यहाँ की मालिश सबसे ज़्यादा ज़रूरी है... पूरे जिस्म की नसें, नाड़ियाँ और सारा तनाव यहीं आकर मिलता है। इसे नहीं खोला... तो दर्द कभी नहीं जाएगा।"
यह कहते हुए हकीम ने अपनी उँगली का दबाव कामिनी के गुदा छिद्र पर हल्का सा बढ़ा दिया।
अचानक उस जगह पर दबाव पड़ते ही, स्वाभाविक (Natural reflex) रूप से कामिनी का जिस्म एकदम 'टाइट' हो गया। उसने अपनी गांड के दोनों पाटों को कस लिया और अपने गुदा छिद्र को पूरी ताक़त से भींच लिया। ये इंसान के जिस्म की फ़ितरत है, गांड का वो हिस्सा किसी भी बाहरी चीज़ को अंदर आने से रोकने के लिए अपने आप सिकुड़ जाता है।
लेकिन हकीम तो जैसे इसी पल का इंतज़ार कर रहा था।
"बीवी जी... ढीला छोड़िए। ख़ुद को इतना मत कसिए," हकीम हवस से भरी, फुसफुसाती हुई आवाज़ में बोला, "सोचना बंद कर दीजिए... ये दिमाग़ ही सारी समस्या की जड़ है। ख़ुद को मेरे हाथों में सौंप दीजिए..."
हकीम का एक-एक शब्द, उसका वो गहरा तज़ुर्बा कामिनी के कानों में किसी मीठे शहद की तरह घुल रहा था।
लाल, चिपचिपा तेल कामिनी की पूरी गांड की दरार में किसी नदी की तरह तैर रहा था।
'पच... पच... ओचक... पच्च...'
भारी सन्नाटे वाले कमरे में अब सिर्फ हकीम की उँगली के तेल भरी दरार में फिसलने की मादक , गीली 'पच-पच' की आवाज़ गूँज रही थी।
तेल से फिसलती उँगली की लगातार गोल-गोल रगड़ ने कामिनी के कसे हुए छेद की सारी अकड़न तोड़ दी। उसने हार मान ली। उसने अपने दिमाग़ से हर तरह की हया, हर तरह की सोच को निकाल फेंका और अपनी गांड को पूरी तरह 'ढीला' छोड़ दिया।
सिकुड़न ख़त्म होते ही हकीम की तेल से सनी उँगली छेद के मुहाने पर और गहराई से रगड़ खाने लगी।
"उउउउफ्फ्फ्फ.... आआआआह्ह्ह्ह्ह....."
कामिनी मानो किसी अलग ही दुनिया में पहुँच गई। ऐसा सुकून... ऐसी नसों को फाड़ देने वाली राहत... उसके पास इस अहसास को बयान करने के लिए कोई शब्द नहीं बचे थे। हवस और चरम सुख की उस अंधी घाटी में गिरते हुए, कामिनी की आधी खुली आँखें अब ऊपर की तरफ़ पलटने लगी थीं।
हकीम लकड़द्दीन के खुरदरे होंठ कामिनी की पीठ के करीब फुसफुसा रहे थे। उसकी तेल से सनी उँगली नाज़ुक गुदा छिद्र (Anus) के गोल घेरे पर एक मादक लय में घूम रही थी।
"बीवी जी... ये जो कसी हुई रिंग है ना... ये जो दरवाज़ा है... बस इसे पार कर के अंदर से मालिश करनी होगी..." हकीम की आवाज़ में किसी सँपेरे जैसी सम्मोहन शक्ति थी, "बाहर से तो मैंने नसें नरम कर दी हैं, पर असली जकड़न तो अंदर होती है..."
बोलते-बोलते हकीम ने अपनी बीच की उँगली का सिरा सिकुड़े हुए छेद पर टिकाया और एक हल्का सा दबाव देकर उसे थोड़ा सा अंदर खिसका दिया।
उँगली के अंदर जाते ही हकीम का बूढ़ा जिस्म काँप गया। उसे ऐसा लगा जैसे उसने अपना हाथ किसी खौलती हुई भट्टी में डाल दिया हो! कामिनी की गांड अंदर से सच में आग उगल रही थी। हवस और उत्तेजना ने उसके जिस्म के अंदरूनी तापमान को भयानक हद तक बढ़ा दिया था।
अचानक हुए इस अतिक्रमण (Invasion) से एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया (Reflex) के तहत कामिनी के गुदा की माँसपेशियों ने झटके से हकीम की उँगली को किसी लोहे के चिमटे की तरह कसकर जकड़ लिया।
"बीवी जी... ढीला छोड़िए। इतना कसेंगी तो उँगली टूट जाएगी मेरी," हकीम ने एक ठरकी मुस्कान के साथ कहा, "ऐसे कैसे मालिश होगी? दादा पक्कड़द्दीन के तेल को अंदर तक जाने दीजिए ना... गहराई में रमेगा, तभी तो नसों को जड़ से राहत मिलेगी।"
हकीम का ये तर्क और उसकी वो आवाज़ कामिनी के कानों में शहद की तरह घुल रही थी। उसका दिमाग़ अब पूरी तरह उस जादुई छुअन का ग़ुलाम हो चुका था।
कामिनी ने बात मान ली।हम्मफ्फ्फ्फफ्फ्फ़.... उसने एक गहरी, काँपती हुई साँस छोड़ी और अपने जिस्म की सारी अकड़न ख़त्म कर दी। ख़ुद को ढीला छोड़ने के साथ-साथ, उसने अपनी भारी जाँघों को मेज़ पर हल्का सा और चौड़ा कर दिया (V-shape में)।
जाँघों के इस तरह फैलते ही, उसकी गांड की गहरी दरार अब पूरी तरह से खिंच कर चौड़ी हो गई। वो गुलाबी, नाज़ुक छेद अब बिना किसी रोक-टोक के हकीम की आँखों और उँगलियों के सामने पूरी तरह निमंत्रण दे रहा था।
हकीम ने अपनी कटोरी उठाई।
'टप्प... टप्प... टप्प....'
उसने गर्म, खौलते तेल की कुछ और बूँदें सीधे खुली हुई दरार के मुहाने पर गिरा दीं।
गर्म तेल की वो धारा गांड के छेद से होती हुई, गहरी दरार के रास्ते नीचे की तरफ़ फिसली और सीधा कामिनी की भकभकाती हुई चुत तक पहुँच गई। गर्माहट का झोंका जैसे ही चुत के नाज़ुक होंठों से टकराया...
"आआआआह्ह्ह्ह... उईईई..."
कामिनी का पूरा जिस्म करंट खाकर सिहर उठा। उसकी उँगलियों ने मेज़ की चादर को कसकर भींच लिया।
हकीम ने अपनी दो उँगलियों से उस गर्म तेल को कामिनी की पूरी दरार में बेदर्दी से मसलना शुरू कर दिया।
'पच... पच... पच्च...'
कामिनी की चुत अब बेतहाशा बहने लगी थी। कामरस और लाल तेल मिलकर पूरी घाटी को एक फिसलन भरे दलदल में बदल चुके थे। कोई आम आदमी होता तो इस दलदल मे कबका डूब कर मर चूका होता, लेकिन हकीम बहुत बड़ा खिलाड़ी मालूम पड़ता था।
उसके हाथ कामिनी की सुलगती चुत के बिल्कुल पास तक जाते, कामिनी को लगता कि बस अब उँगली चुत में जाएगी... लेकिन हकीम उसे बिना छुए ही वापस लौट आता! उसका पूरा ध्यान, उसका पूरा लक्ष्य सिर्फ़ और सिर्फ़ वो गुदा छिद्र था।
ये 'लुका-छिपी' कामिनी को तड़पा-तड़पा कर पागल कर रही थी।
तभी हकीम ने देखा कि तेल और कामरस की वजह से गांड का छेद पूरी तरह चिकना और ढीला पड़ चुका है। हकीम ने मौका देखा...
उसने अपने बाएँ हाथ से कामिनी की गांड के एक भारी पाट (Cheek) को पकड़ कर बाहर की तरफ़ खींचा, जिससे वो छेद और ज़्यादा चौड़ा हो गया।
और फिर... बिना कोई मोहलत दिए...
'गच्च...!'
हकीम ने अपनी तेल से सनी, खुरदरी और लंबी बीच की उँगली (Middle finger) एक ही झटके में 'धच्च' से कामिनी के गुदा छिद्र के अंदर गहराई तक धँसा दी!
"आआआह्ह्ह..... काका.... उउउउम्मम्म्म्फ्फ्फ्फ्फ़...."
कामिनी का सीना मेज़ से ऊपर उठ गया। उसके मुँह से दर्द और चरम सुख की एक ऐसी मिली-जुली आवाज़ निकली जो सीधे दिल को चीर दे।
लेकिन इस बार एक अजूबा हुआ...
इस बार कामिनी ने अपनी गांड को बिल्कुल नहीं भींचा! दर्द के बावजूद, उसने खुरदरी उँगली को अपने जिस्म की अँधेरी गहराई में पूरी तरह स्वीकार कर लिया था। वो ख़ुद भी चाहती थी कि अंदर की इस भभकती हुई आग को कोई शांत करे।
हकीम ने एक हाथ से कामिनी की गांड को चौड़ा किए रखा और दूसरे हाथ की अंदर धँसी हुई उँगली को लयबद्ध तरीके से आगे-पीछे (In and Out) करना शुरू कर दिया।
'पच... गच... ओचक... पच... गच...'
कमरे के सन्नाटे में गीले माँस के टकराने और उँगली के अंदर-बाहर होने की वो मादक आवाज़ें (पच... गच...) गूँजने लगीं।
हकीम अपनी उँगली से कामिनी के अंदर के तने हुए माँस को सहला रहा था, उसे फैला रहा था...
हकीम की वह लंबी, खुरदरी और गर्म तेल से सनी उँगली अब कामिनी के गुदा छिद्र (Anus) के अंदर अपना पूरा कब्ज़ा जमा चुकी थी। वह सिर्फ़ सीधे अंदर-बाहर नहीं हो रही थी, बल्कि अंदर जाकर मुड़ती और गांड की भीतरी, नाज़ुक दीवारों को किसी हुक (Hook) की तरह खुरचते हुए सहला रही थी।
कामिनी का गदराया जिस्म पसीने से नहाया हुआ था। गांड की नसें अंदर से झनझना रही थीं। यह एक ऐसा अहसास था जहाँ दर्द और सुकून आपस में मिलकर एक मीठे समंदर का रूप ले चुके थे और कामिनी उस समंदर में बेसुध होकर डुबकियाँ लगा रही थी।
"बीवी जी... अंदर से मालिश करने से नसें जल्दी खुलती हेंगी और आराम फ़ौरन आता है," हकीम ने अपनी उँगली की गति को बरकरार रखते हुए बड़े ग़ुरूर से कहा, "हमारे अब्बा जान मक्कड़द्दीन भी बिल्कुल ऐसे ही मालिश किया करते थे।"
कामिनी का दिमाग़ तो हवस और उस जादुई उँगली के नशे में सुन्न हो चुका था, लेकिन फिर भी एक उलझन भरे दिमाग़ से उसने ना चाहते हुए भी पूछ ही लिया— "आआआह्ह्ह... उईई... ल... लेकिन... उनका नाम तो... आअह्ह... फक्कड़द्दीन था ना?"
कामिनी की आवाज़ कामुकता से थरथरा रही थी, वो पूरी तरह से हकीम की बातों और उँगलियों के वश में थी।
'पच... ओचम्म... पच... गच्च...'
हकीम की उँगली अंदर पूरी लय में चल रही थी।
"अरे बीवी जी, अब्बा जो थे हमारे, वो अंग्रेज़ों के ज़माने के हेंगें। वो बड़ी-बड़ी अंग्रेज़ी खातूनों (Ladies) की मालिश किया करते थे," हकीम ने हँसते हुए अपनी बात आगे बढ़ाई,
"वो मेमें अब्बा की इस 'अंदरूनी मालिश' से इतनी ख़ुश और संतुष्ट होती हेंगी कि उन्हें प्यार से (Fuckd-e-din) कहने लगीं। बस... तब से हमारे अब्बा जान 'फक्कड़द्दीन' के नाम से ही मशहूर हो गए!"
इस अतरंगी और ठरक भरी कहानी के साथ ही कामिनी ने महसूस किया कि हकीम की दूसरी उँगली (तर्जनी/Index finger) भी अब उस गर्म तेल से सने, फैले हुए गुदा छिद्र के मुहाने पर गोल-गोल घूमने लगी है।
कामिनी की साँसें गले में अटक गईं। "न... नहीं... काका... आआह्ह... दो नहीं... जगह नहीं है वहाँ..."
लेकिन हकीम लकड़द्दीन को अब कोई रहम नहीं आ रहा था। उसने लाल तेल की बेतहाशा चिकनाहट और कामिनी की ढीली पड़ चुकी गांड का फ़ायदा उठाया और बिना रुके अपनी दूसरी उँगली भी उसी अँधेरी गुफा में 'धच्च' से घुसा दी।
"आआआआह्ह्ह्ह्ह... माऽऽऽ... फट जाएगा...!" कामिनी दर्द और उत्तेजना से मेज़ पर तड़प उठी।
दोनों उँगलियों ने अंदर जाकर कैंची की तरह कामिनी की गांड को फैलाना शुरू कर दिया। गांड कि कसी हुई रिंग अब अपनी आख़िरी हद तक खिंच चुकी थी।
लेकिन वाकई उस तेल मे जादू था, बहार से जितना गर्म था मांस पर लगते ही उतनी ही ठंडक देता था, दर्द को जैसे सोख लेता था, कामिनी की अपनी कामुक नमी और तेल के कारण गुदा छिद्र का माँस फट नहीं रहा था, बल्कि एक ऐसा मादक खिंचाव पैदा कर रहा था जिसने कामिनी की नसों में सीधे आग लगा दी थी।
अब तक हकीम की उँगलियाँ सिर्फ़ गांड पर मेहरबान थीं, जबकि कामिनी की चुत बेतहाशा बहकर एक लसलसे दलदल में तब्दील हो चुकी थी। हकीम ने देखा कि शिकार अब पूरी तरह पिघल चुका है, भट्टी बिल्कुल लाल है।
उसकी दो उँगलियाँ कामिनी की गांड के अंदर पूरी ताक़त से 'गच... पच्च... गच...' कर रही थीं, और तभी... हकीम ने अपना भारी, खुरदरा अँगूठा (Thumb) उसी हाथ से थोड़ा नीचे की तरफ़ खिसकाया।
अँगूठा सीधा कामिनी की दोनों जाँघों के बीच मौजूद गीली, फूली हुई चुत की घाटी में उतरा और बिल्कुल सटीक निशाने पर, ठीक कामिनी की चुत के भकभकाते हुए, संवेदनशील 'दाने' (Clitoris) पर जाकर टिक गया!
हकीम ने अँगूठे से उस दाने को कसकर दबाया और उसे ऊपर-नीचे रगड़ना शुरू कर दिया।
"उउउउफ्फ्फ्फ... अअअअआआआआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह... ईईईस्स्स्स्स...!"
कामिनी के मुँह से जो चीख निकली, वो इंसानी कम और किसी घायल, तड़पती हुई शेरनी की ज़्यादा लग रही थी।नीचे चुत के दाने पर अँगूठे की रगड़... और ऊपर गांड में दो उँगलियों का चौड़ा करता हुआ, गहरा अतिक्रमण! इस 'दोहरी मार' (Dual Stimulation) ने कामिनी के दिमाग़ के सारे तार एक झटके में उड़ा दिए।
वो उस लकड़ी की टेबल पर किसी जल बिन मछली की तरह बेतहाशा छटपटाने लगी। उसकी भारी, गोरी जाँघें हवा में काँप रही थीं, उसके गदराए स्तन गद्दे से बुरी तरह रगड़ खा रहे थे। अब कोई हया नहीं थी, कोई पर्दा नहीं था, कोई शर्म बाकी नहीं थी।
"म... मार डालोगे क्या... उईईई... उउउम्म... काका... आआआह्ह्ह...!" कामिनी सिसक रही थी, रो रही थी, पर वो उस अँगूठे और उन उँगलियों से दूर नहीं भागना चाहती थी।
उसका पूरा वजूद, उसके संस्कार, उसका शादीशुदा होने का भाव... सब कुछ एक 70 साल के बूढ़े की उँगलियों पर नाचती एक बेबस कठपुतली बन चुका था।
कमरे का तापमान उस भभकती हुई हवस से इतना बढ़ चुका था कि हवा भी भारी लगने लगी थी। कामिनी का गदराया, मांसल जिस्म मेज़ पर किसी प्यासी मछली की तरह तड़प रहा था।
'पच... गच... ओचम्म... पच्च... गच्च...'
हकीम लकड़द्दीन का हाथ अब एक लय में चल रहा था। उसकी दो उँगलियाँ कामिनी की गांड के फैले हुए, तेल से सने छेद के अंदर गहराई तक गोते लगा रही थीं, और उसी हाथ का खुरदरा अँगूठा नीचे उसकी चुत के उभरे हुए हुए दाने (Clitoris) पर बेरहमी से रगड़ खा रहा था।
आगे और पीछे की इस 'दोहरी मार' ने कामिनी के दिमाग़ की नसें फाड़ कर रख दी थीं। वो चरम सुख (Climax) की उस नाज़ुक कगार पर खड़ी थी, जहाँ से अब नीचे गिरना तय था। उसका पूरा जिस्म किसी कमान की तरह तन गया था। उसकी जाँघें काँप रही थीं, और उसकी उँगलियाँ तकिए के गिलाफ को फाड़ देने की हद तक भींच रही थीं।
"काका... आआआह्ह्ह... उईई... बस... बस अब... आआह्ह्ह!" कामिनी की आवाज़ टूट रही थी।
वो पानी छोड़ने ही वाली थी। उसकी चुत के अंदर से कामरस का एक भारी रेला फूटने को बेताब था। उसका जिस्म एक आख़िरी झटके के लिए तड़प रहा था।
लेकिन... हकीम लकड़द्दीन 70 सालों का तजुर्बेकार और एक बेहद नीच, ठरकी खिलाड़ी था। वो इतनी आसानी से इस शिकार को आज़ाद नहीं करने वाला था।
ठीक उसी पल, जब कामिनी चरम सुख पर पहुँच कर झड़ने (Orgasm) ही वाली थी... हकीम ने अचानक अपने हाथ रोक लिए।
उसने अपनी दोनों उँगलियाँ झटके से गांड के बाहर खींच लीं और अपना अँगूठा भी चुत के दाने से हटा लिया।
"अ... आ... ये... ये क्या...?"
कामिनी हवा में टँग गई।
कामिनी तो जैसे आसमान से सीधे ज़मीन पर आ गिरी। वो मीठा दर्द, वो गर्माहट, वो रगड़... जो उसे पागलपन की आख़िरी मंज़िल तक ले जा रही थी, वो सब एक पल में ग़ायब हो गया। ऐसा लगा जैसे किसी ने मंज़िल पर पहुँचने से ठीक पहले उसका पैर पकड़ कर उसे वापस खाई में खींच लिया हो।
"बीवी जी..." हकीम ने अपने हाथ का तेल पोंछते हुए एक गहरी और शातिर साँस ली, "मालिश ज़रा और अंदर तक करनी पड़ेगी। नसों का जो असली गुच्छा है ना, वो ज़रा ज़्यादा गहराई में होता है... और हमारी ये उँगलियाँ वहाँ तक पहुँचने के लिए छोटी पड़ रही हेंगी।"
कामिनी तो अब हवस और काम-अग्नि में बुरी तरह जल रही थी। उसका तड़पता हुआ जिस्म उस मेज़ पर मछली की तरह छटपटाने लगा। वो आग जो उस अँगूठे और उँगलियों ने भड़काई थी, वो अब बुझने की जगह कामिनी को ही अंदर से जला कर राख़ कर रही थी। उसे अब परवाह नहीं थी कि कौन है, क्या है... वो बस मर रही थी कि कोई बस उसे चोद दे... जम के मारे... चाहे उसकी चुत फाड़े या गांड, बस इस तड़प को शांत कर दे।
घरेलू संस्कारी औरत की बची-खुची हया, पतीव्रता नारी होने का भाव सब कुछ उस लाल तेल की गर्मी में जलकर ख़ाक हो चुका था।
कामिनी का तड़पता हुआ जिस्म मेज़ पर मानो सुन्न पड़ गया।
उसने अपनी भारी, पसीने से भीगी जाँघों को टेबल पर ही रगड़ा।
उसने अपनी आधी खुली, नशीली आँखों से पीछे खड़े बूढ़े हकीम को देखा। उसकी आँखे भीगी हुई थी... हवस और तड़प के आँसू छलक आये थे.
"का... काका... ऐसे मत छोड़ो... उउउम्म... मैं मर जाऊँगी... आग लगी है अंदर... बुझा दो इसे... डाल दो... डाल दो जो डालना है!" कामिनी ने एक रंडी से भी बदतर हालत में, रोते हुए उस बूढ़े के सामने अपने जिस्म की भीख माँग ली।
हकीम की बाछें खिल गईं। वो इसी पल, इसी बेशर्मी का तो इंतज़ार कर रहा था।
"बीवी जी, नसें तो मैंने बाहर से खोल दीं... पर ये जो आग है ना, ये सिर्फ़ उँगलियों से नहीं बुझेगी। अंदर की नसों को शांत करने के लिए कोई मोटा असली 'मूसल' अंदर जाना बहुत ज़रूरी है..."
यह कहते हुए हकीम ने अपने सूती पाजामे का नाड़ा खोला।
पाजामा नीचे गिरते ही कमरे के सन्नाटे में एक अजीब सी खौफ़नाक उपस्थिति महसूस हुई। कामिनी, जो अभी भी आधी पलटी हुई मेज़ पर तड़प रही थी, उसकी नज़र जैसे ही हकीम के नीचे, जांघो के बीच गई... उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। चुत और गांड के छेद बजबजाने लगे.
70 साल के दुबले-पतले, झुके हुए बूढ़े के पैरों के बीच कोई मरा हुआ या सुकड़ा हुआ अंग नहीं था। बल्कि, वहाँ एक काला, खुरदरा और मोटी-मोटी हरी नसों से भरा हुआ एक खौफ़नाक 'लंड' लोहे की रॉड की तरह तना हुआ खड़ा था। वो इतना मोटा और भद्दा था कि देखकर ही किसी को भी उल्टी आ जाए, लेकिन उस वक़्त कामिनी की भूखी और सुलगती हुई नज़रों को वो दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत चीज़ लग रहा था।
कामिनी कि कमजोरी उसके जिस्म पर हावी होने लगी, उसकी चुत कि फाँके फड़कने लगी.
कामिनी मदहोश थी, जरा भी देर होती तो कामिनी खुद हकीम के लंड को अपनी चुत मे समेट लेती इस कद्र उत्तेजित थी कामिनी.
हकीम ने अपने काले लंड को उसी कटोरी के बचे हुए लाल तेल में डुबोया। और पुरे तेल को अपने लंड पर रगड़ने लग, जैसे बकरी जीबह करने से पहले औजार को धार लगा रहा हो, कामिनी जांघो को आपस मे रगड़ती, उखड़ती साँसो से इस मादक नज़ारे को देखे जा रही थी.
यहाँ कामिनी बकरी थी तो हकीम कसाई.
हकीम का पूरा लंड चिपचिपे तेल से सन कर लाल और खौफ़नाक दिखने लगा।
वो अपने धीमे लेकिन सधे हुए कदमों से कामिनी की फैली हुई, गोरी जाँघों के ठीक बीच आकर खड़ा हो गया।
कामिनी कि जाँघे खुद से ही और ज़्यादा चौड़ी हो गई,
उसकी फूली हुई चुत और तेल से सना गांड का छेद... दोनों ही उस खौफ़नाक, नसों वाले मूसल का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे।
हकीम ने अपने दोनों हाथों से कामिनी की गांड के भारी पाटों (Cheeks) को पकड़ा और उन्हें पूरी ताक़त से बाहर की तरफ़ खींचा।
फिर कुछ सोचा जैसे वाकई कोई डॉक्टर इलाज करने से पहले जायजा ले रहा हो.
"ऐसे मेज़ पर लेटने से काम नहीं चलेगा बीवी जी," हकीम की आवाज़ में अब एक हैवानियत और हुक्म आ गया था, "नीचे फर्श पर आ जाओ... और कुतिया बन जाओ ज़मीन पर। तब गांड पूरी तरह खुलेगी... तब ये चीज अच्छे से गहराई तक अंदर जाएगी... तो मालिश भी पूरी होगी।"
कामिनी 'कुतिया' बनने का मतलब बहुत अच्छी तरह समझती थी। रमेश अक्सर शराब के नशे में उसे इसी तरह 'कुतिया' (Doggy style) बनाता था, लेकिन हमेशा सम्भोग करने में, अपनी मर्दानगी साबित करने में नाकाम रहता था। रमेश की नामर्दी की कुंठा ने कामिनी के अंदर इस पोज़ को लेकर एक अलग ही भूखी आग पैदा कर दी थी।
आज वो सच में किसी 'असली मर्द' के सामने कुतिया बनना चाहती थी।
कामिनी ने एक पल भी नहीं सोचा। हवस के हाथों मजबूर, वो झट से मेज़ से नीचे उतरी और सीधे ज़मीन पर अपने घुटनों और हाथों के बल बैठ गई।
उसने अपनी गर्दन नीचे ज़मीन की तरफ़ झुका ली, अपनी भारी-भरकम जाँघों को और चौड़ा किया और अपनी मांसल, विशाल गांड को पूरी ताक़त से हवा में ऊपर की तरफ़ उठा दिया। कमर को नीचे झुकाने और गांड को ऊपर उठाने से उसकी पीठ में एक बेहद कामुक घुमाव (Curve) आ गया।
इस पोज़ में आते ही नज़ारा ऐसा हो गया कि कोई साधु-संत इस मादक नज़ारे को देखले तो उसका भी ईमान डोल जाए।
पीछे खड़े हकीम के सामने कामिनी की पूरी विशाल गांड, उसके दोनों भारी पाट, और उनके बीच मौजूद लाल तेल से सना हुआ 'गुदा छिद्र' साफ़-साफ़ चमक रहा था। उँगलियों की मालिश से वो छेद अभी भी हल्का सा खुला हुआ था और धड़क रहा था। और उसके ठीक नीचे... उसकी फूली हुई, लाल चुत, जिसमें से कामरस बह-बह कर उसकी जाँघों से होते हुए फर्श पर टपक रहा था।
ज़मीन के ठंडे फर्श पर कामिनी के घुटने टिके थे, लेकिन उसके अंदर एक भयंकर ज्वालामुखी उबल रहा था। हवा में उठी उसकी विशाल, मांसल और गोरी गांड किसी संगमरमर के पहाड़ जैसी लग रही थी, जिसे हकीम के लाल तेल ने चमका कर बिल्कुल आईना बना दिया था।
कमरे में अब सिर्फ दो ही आवाज़ें थीं—छत के पंखे की धीमी 'चररर-चररर' और कामिनी की भारी, काँपती हुई साँसें... "हंफ... हंफ... आआह्ह्ह..."
हकीम लकड़द्दीन 'कुतिया' बनी कामिनी की फैली हुई जाँघों के ठीक पीछे आ कर खड़ा हो गया, उसका 70 साल पुराना, लेकिन नसों से भभकता हुआ, काला, खुरदरा 'लंड ' चुत कि खुसबू पा कर इधर उधर झटके खां रहा था.
हकीम ने अपने दोनों खुरदरे, सख़्त हाथों को आगे बढ़ाया और कामिनी की पतली कमर को दोनों तरफ से कसकर दबोच लिया।
"उउउम्म..."
बूढ़े लकड़द्दिन की मर्दाना और सख़्त गिरफ़्त महसूस होते ही कामिनी की पीठ में एक ज़ोरदार सिहरन दौड़ गई। उसने अपनी गांड को अनजाने में ही थोड़ा और पीछे की तरफ़ (हकीम की तरफ) धकेल दिया, मानो वो ख़ुद उस लंड को अपने अंदर लेने के लिए बुलावा दे रही हो।
"बहुत बेताबी है बीवी जी..." हकीम की ठरक भरी, फुसफुसाती आवाज़ कामिनी के कानों में पड़ी, "अंदर मालिश करने से पहले आस पास कि नसो का जायजा लेना जरुरी है बीबी जी,. पहले रास्ता नापे, कितनी जरुरत है, कितना अंदर जाना है...."
हकीम ने अपने कूल्हों को थोड़ा आगे बढ़ाया।
अगले ही पल, कामिनी को अपनी जाँघों के बीच एक बेहद गर्म, सख़्त और मोटी चीज़ का अहसास हुआ। जो कि हकीम का लाल तेल से सना हुआ, कठोर मुहाना (सुपाड़ा) था!
हकीम ने उसे सीधे अंदर नहीं डाला। अपितु गांड कि दरारा मे रख कर ऊपर को फिसलाने लगा, जैसे दुरी नाप रहा हो.
उसका लंड कामिनी कि रीड कि हड्डी पर किसी सांप कि तरह लौटने लगा, पूरी तरह दुरी, लम्बाई नाप लेने के बाद उसने अपने लंड के गर्म सुपाड़े को कामिनी की गांड के नीचे, उसकी बहती हुई, कामरस से लबालब भरी 'चुत' की दरार पर रख दिया।
सर्रर्र... पच... सर्रर्र...'
हकीम ने अपनी कमर हिलाई और मोटे सुपाड़े को कामिनी की चुत की लसलसी, गीली घाटी के बीचों-बीच नीचे से ऊपर तक रगड़ दिया।
हकीम का सख़्त माँस जब कामिनी की चुत के फूले हुए होंठों और सुलगते हुए 'दाने' (Clitoris) से रगड़ खाकर गुज़रा, तो कामिनी के मुँह से एक दिल चीर देने वाली सिसकी निकल गई।
"आआआआह्ह्ह्ह्ह... उईईईई... काकाऽऽऽ...!"
कामिनी को लगा कि वो लंड अब उसकी चुत को चीरता हुआ अंदर जाएगा। उसने अपनी आँखें भींच लीं। लेकिन हकीम ने उसे चुत के मुहाने से वापस ऊपर की तरफ़ खिसका लिया।
कामिनी तड़प कर रह गई, उसने गर्दन घुमा कर हकीम को देखा उसकी आँखों मे मिन्नत थी, वो कहना चाहती थी ये जुल्म ना करे, जहाँ डालना है जैसे डालना है बस डाल दे, घुसा दे.
वासना कि भाषा ही ऐसी होती है, इसे बोलना नहीं पड़ता, ये स्पर्श मात्र से समझी जाती है, और कामिनी कि इस विनती को हकीम ने समझ लिया.
हकीम का सख़्त सुपाड़ा रेंगता हुआ सीधा कामिनी की गांड के नाज़ुक, गुलाबी और फड़कते हुए 'गुदा छिद्र' (Anus) पर आकर टिक गया।
हकीम के लंड की मोटाई (Girth) इतनी भयानक थी कि सिर्फ उसका सिरा (Tip) ही कामिनी के छोटे से गुदा छिद्र को पूरी तरह ढके हुए था। कामिनी को उस दबाव से ही अंदाज़ा हो गया कि जो चीज़ उसके अंदर जाने वाली है, वो उसकी सोच से कहीं ज़्यादा बड़ी और ख़तरनाक है।
उसका दिल दहल उठा, उसने ये किस चीज कि भीख मांग ली..
"ये... ये बहुत... बड़ा है... आआह्ह्ह... फ... फट जाएगा काका..." कामिनी डर, हवस और एक मीठे दर्द की कल्पना से काँप उठी।
"फटेगा नहीं बीवी जी... खुलेगा। ये लाल तेल हर रास्ते को मोम बना देता है, हर दर्द को सोख लेता है.
आप देखते जाओ.. कैसे पुरे जिस्म कि नस नस खोल देगा ये हकीम लकड़द्दिन.
हकीम ने अपने अंगूठों से कामिनी की गांड के दोनों पाटों (Cheeks) को पूरी ताक़त से बाहर की तरफ़ खींचा। छेद अब अपनी आख़िरी हद तक फैल चुका था।
और फिर... हकीम ने अपनी कमर को हल्का सा झटका दिया और अपने लंड के सुपाड़े को कामिनी के तने हुए गुदा छिद्र के अंदर धकेल दिया!
"गच्च...!"
गांड का छेद चिकना था ढीला था पूरा सुपाडा एक बार मे समा गया.
"अअअअआआआआआआआआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह......!!!!!"
कामिनी की चीख छोटे से कमरे की दीवारों से टकरा गई। उसकी गर्दन झटके से पीछे की तरफ मुड़ गई।
वो सख़्त, खुरदरा और मोटा माँस जैसे ही कसी हुई रिंग को चीरता हुआ अंदर गया, कामिनी की गांड की नसें बुरी तरह तन गईं। उसे लगा जैसे किसी ने दहकता हुआ लोहे का गोला उसके अंदर डाल दिया हो। दर्द की एक भयानक लहर उठी, लेकिन उसी दर्द के ठीक पीछे... गर्म तेल और उस अंदरूनी दबाव ने एक ऐसा 'चरम सुख' पैदा किया कि कामिनी का पूरा दिमाग़ सुन्न हो गया।
"उउउउफ्फ्फ्फ्फ.... हंफ... हंफ... ससससस..."
कामिनी कि आंखे दर्द से भर आई, लेकिन मजाल कि उसने अपनी कमर को आगे खिसकाया हो, उसने दर्द को, हकीम के लंड को पूरी तरह स्वीकार कर लिया था।
हकीम का सुपाड़ा अब उस अँधेरी, गर्म गुफा के अंदर फँस चुका था। कामिनी की गांड अंदर से इतनी गर्म थी कि हकीम को लगा उसका लंड पिघल जाएगा। कामिनी की अंदरूनी माँसपेशियों ने उसके लंड को किसी भूखे अजगर की तरह जकड़ लिया था।
"माशाअल्लाह... क्या गर्मी है अंदर बीवी जी... ऐसा लग रिया है जैसे भट्टी में मूसल डाल दिया हो," हकीम भी अब हाँफने लगा था।
उसने अभी पूरा लंड अंदर नहीं डाला था। सिर्फ़ सुपाड़ा अंदर था और बाकी का पूरा नसों वाला खुरदरा हिस्सा बाहर हवा में तन कर कामिनी की गांड की दरार से रगड़ खा रहा था।
हकीम ने कामिनी की कमर को और कसकर पकड़ा।
"अब साँस भरिए बीवी जी... मालिश... मालिश... शुरू कर रिया हूँ ..."
यह कहते हुए हकीम लकड़द्दीन ने अपनी कमर पीछे खींची और एक ही ज़ोरदार झटके में अपना पूरा का पूरा बचा हुआ लंड, कामिनी की भीगी, कसी हुई गांड में जड़ तक (Balls deep) उतार दिया!
"धच्चच्चच्च... पल्लाक्क...!"
तेल और चुत रस से साना लंड बिना किसी रूकावट के कामिनी कि गांड मे धसता चला गया.
हकीम के सूखे हुए अंडकोष (Balls) ज़ोर से कामिनी की जाँघों और गांड से टकराए। और इसी के साथ कामिनी के मुँह से निकली एक ऐसी अनियंत्रित, जानवरों जैसी कराह... आआआहहहह..... बूढ़े हकीम....मार डाला " इस कराह ने बता दिया कि आज एक घरेलु संस्कारी औरत का वजूद एक 70 साल के बूढ़े के लंड तले पूरी तरह कुचला जा चुका है!
हकीम लकड़द्दिन के सुलेमानी लंड के जड़ तक (Balls deep) अंदर जाते ही कामिनी की साँसें जैसे उसके फेफड़ों में ही जम गईं। उसकी आँखें पूरी तरह फैल गईं और मुँह खुला का खुला रह गया, पर कोई आवाज़ बाहर नहीं आई।
हकीम लकड़द्दीन का लंड कामिनी के जिस्म की सबसे गहरी और अँधेरी गुफा को पूरी तरह चीर कर अंदर समा चुका था। उस मूसल की मोटाई ने कामिनी की गांड को अंदर से इस कदर तान (Stretch) दिया था कि उसे लग रहा था जैसे उसका पेट नीचे से फट जाएगा।
कमरे में कुछ पलों के लिए एक खौफ़नाक सन्नाटा छा गया। हकीम बिल्कुल नहीं हिला। वो अपनी कमर को कामिनी की भारी गांड से सटाए, सिर्फ़ अपनी साँसें काबू कर रहा था।
"बीवी जी... ले लीजिये लंबी साँस... इसे अंदर तक महसूस कीजिये। लकड़द्दिन का मूसल अब आपकी सारी बंद नसें खोल देगा," हकीम ने हाँफते हुए कहा।
कामिनी का सिर नीचे ज़मीन की तरफ झुका था। उसके माथे से पसीने की बूँदें टपक-टपक कर उस ठंडे फर्श पर गिर रही थीं। हकीम के खुरदरे लंड की गर्माहट और कामिनी के अंदर की सुलगती हुई भट्टी... दोनों मिलकर एक ऐसा अकल्पनीय (Unimaginable) 'चरम सुख' पैदा कर रहे थे कि कामिनी का पूरा दिमाग़ सुन्न हो चुका था। दर्द अब पूरी तरह से एक मीठी, रूह को कंपा देने वाली मादकता में बदल चुका था।
"हंफ... हंफ... काका... आआह्ह्ह... ये... बहुत... उउउम्मम्म्म..." कामिनी के होंठ काँप रहे थे।
तभी हकीम ने मालिश का दूसरा चरण शुरू किया।
उसने कामिनी की पतली कमर को अपने दोनों हाथों से कसकर जकड़ा और धीरे-धीरे... बहुत धीरे-धीरे अपनी कमर को पीछे की तरफ़ खींचना शुरू किया।
'सच्चच्च.... सर्रर्र...'
जैसे-जैसे नसों वाला मोटा लंड कामिनी की गांड से बाहर की तरफ़ खिसका, उसकी एक-एक नस कामिनी की अंदरूनी दीवारों (Internal walls) से बुरी तरह रगड़ खाने लगी। कामिनी की गांड की माँसपेशियाँ हकीम के लंड को बाहर जाने से रोकने के लिए उसे किसी रबर-बैंड की तरह कसकर जकड़ रही थीं।
हकीम ने मूसल को बस सुपाड़े (Tip) तक बाहर निकाला और फिर एक पल रुक कर... अपनी कमर को पूरी ताक़त से आगे की तरफ़ धकेल दिया!
"गच्चच्च!"
"थप्पाक्क...!"
हकीम के टट्टे और उसकी जाँघें ज़ोर से कामिनी की भारी गांड से टकराईं।
"आआआआह्ह्ह्ह्ह... उईईईई माऽऽऽ...!" कामिनी के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली चीख निकल गई।
झटका इतना ज़ोरदार था कि कामिनी के गदराए, भारी स्तन हवा में बुरी तरह उछले। उस एक झटके ने कामिनी की रीढ़ की हड्डी में वो करंट दौड़ा दिया, जिसके लिए वो सुबह से तड़प रही थी।
अब हकीम लकड़द्दीन ने एक लय (Rhythm) पकड़ ली थी।
'पच... गच... ओचम्म... थप्पाक... पच... गच...'
उस शांत कमरे में अब सिर्फ़ गीले माँस के टकराने, लाल तेल की चिपचिपाहट और 'पच-गच' की भयानक मादक आवाज़े गूँज रही थीं। हकीम का हर धक्का कामिनी के अंदर और गहराई तक जा रहा था। वो लाल तेल अब कामिनी की गांड से रिस-रिस कर नीचे उसकी लटकती हुई, सूजी हुई चुत पर गिर रहा था।
नीचे से चुत कामरस से लबालब होकर टपक रही थी, और ऊपर गांड में एक 70 साल के बूढ़े का खूँखार हथियार गदर मचा रहा था।
कामिनी अब किसी भी तरह के दर्द से आज़ाद हो चुकी थी। हया, शर्म, दर्द, संस्कार .. सब पीछे छूट गया था। अब वो एक ऐसी जंगली औरत बन चुकी थी जिसे सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने अंदर ये धक्के महसूस करने थे।
"और ज़ोर से काका... आआआह्ह्ह... उईई... हाँ... मारो मुझे... फाड़ दो मेरी .. उउउफ्फ्फ्फ़...!" कामिनी अब ख़ुद अपनी गांड को पीछे की तरफ़ धकेल कर हकीम के धक्कों का साथ देने लगी थी।
जैसे जैसे हकीम का लंड गुदा छिद्र कि अंदुरनी दीवारों से टकराता, नसो मे दबाव बनता, पूरा जिस्म मादक कर्रेंट से झंझना उठता.
हर बार जब हकीम का लंड अंदर जाता, कामिनी की आँखें पलट जातीं। हकीम की उन बेदर्दी से भरी रगड़ों ने कामिनी की अंदरूनी 'जी-स्पॉट' (G-spot) को बुरी तरह से ट्रिगर कर दिया था।
"बहुत भूखी है आपकी ये गांड बीवी जी... देखिए कैसे चूस रही है लकड़द्दीन के लंड को," हकीम गंदी-गंदी गालियाँ और ठरक भरी बातें बकते हुए अपनी कमर को मशीन की तरह चला रहा था।
बूढ़े की पान तम्बाकू से भरी साँसें, पसीने की बदबू और लाल तेल की तीखी, नशीली महक... सबने मिलकर कामिनी को पागल कर दिया था।
"हाँ काका... चूस रही हूँ... आआआह्ह्ह... और अंदर डालो... पूरा फाड़ दो मुझे... मैं तुम्हारी कुतिया हूँ काका... आआआह्ह्ह!" शहर कि संस्कारी घरेलु, दबी कुचली औरत के मुँह से ऐसे शब्द निकल रहे थे, जिन्हें सुनकर शायद ख़ुद शैतान भी शरमा जाए।
हकीम के धक्कों की रफ़्तार अब तेज़ हो गई थी।
"थप... थप... थप... थप...'
चिपचिपी गांड पर जाँघों के टकराने की गूँज कमरे से बाहर जाने को बेताब थी। कामिनी का पानी अब किसी भी पल फूटने वाला था। उसका पूरा जिस्म इस 'अंदरूनी मालिश' से गलकर पानी-पानी होने की कगार पर पहुँच चुका था।
कामिनी का दिमाग़ हवस के इस भयानक तूफ़ान में पूरी तरह सुन्न पड़ चुका था। दर्द अब मीठे नशे में बदल चुका था। वो 'कुतिया' की तरह अपने हाथों और घुटनों के बल फर्श पर टिकी थी, और हर झटके के साथ उसका गदराया जिस्म आगे की तरफ़ खिसक रहा था।
वो इस कदर उत्तेजित हो चुकी थी कि चरम सुख की इस दीवानगी में उसे ख़ुद होश नहीं रहा कि कब उसके काँपते हाथ उसके सीने तक पहुँच गए।
झटकों की भयानक रफ़्तार के बीच ही, कामिनी की उँगलियों ने अपने पसीने से भीगे हुए लाल ब्लाउज़ के बटन एक-एक करके खोल दिए।
चिट... चिट... चिट...'
बटनों के खुलते ही, कामिनी के दोनों भारी, दूधिया और गदराए हुए स्तन झटके से बाहर निकल कर हवा में लटक गए। उन पर पसीने की बूँदें मोतियों की तरह चमक रही थीं और उनके कड़क, काले निप्पल हवस की आग में सुलग कर बिल्कुल किसी जामुन की तरह तन चुके थे।
कामिनी अब पूरी तरह से एक जंगली और कामुक औरत में तब्दील हो चुकी थी।
"आआआह्ह्ह... उईई... हाँ काका... आआह्ह्ह!" कराहते हुए कामिनी ने अपने ही दोनों हाथों से अपने आज़ाद, लटकते हुए भारी स्तनों को कसकर पकड़ लिया और उन्हें पागलों की तरह मसलने लगी।
वो ख़ुद अपनी उँगलियों से अपने कड़क निप्पलों को मरोड़ रही थी। पीछे से हकीम का लंड जब भी उसकी गांड को चीरता हुआ अंदर जाता, कामिनी की उँगलियाँ अपने ही स्तनों के कोमल माँस में गहराई तक धँस जातीं।
ख़ुद को सहलाने और मरोड़ने का ये दृश्य इतना मादक था कि पीछे गांड पर चढ़े हकीम का जोश दुगना हो गया, उसकी स्पीड एयर भी ज्यादा बढ़ गई... धच... धचम... पच... फट.. फट...
"माशाअल्लाह बीवी जी... क्या दूध हेंगें आपके... अल्लाह कसम मालिश ना कर रिया होता तो पूरा दुख पी के सूखा देता, सच के रिया हूँ, हकीम अपने काम के प्रति वफादार था, हालांकि वो कामिनी को चोद रहा था फिर भी उसकी भाषा मे ये सिर्फ मालिश थी, इलाज था, कोई गलत काम नहीं.
थोड़ा और अंदर जाते हेंगें बीबी जी अब
हकीम ने कामिनी की कमर छोड़ दी। उसने अपने दोनों खुरदरे, सख़्त हाथ सीधे कामिनी के नंगे कंधों पर रखे और उन्हें पूरी ताक़त से नीचे फर्श की तरफ़ दबा दिया।
"उउउम्म... काका... ये क्या..."कामिनी अभी कुछ समझ पाती, उससे पहले ही हकीम ने उसका ऊपरी धड़ ज़मीन से चिपका दिया।
कामिनी का मुँह, उसकी छाती और उसके भारी, नंगे स्तन अब सीधे उस ठंडे फर्श पर दब गए। लेकिन हकीम ने उसकी भारी-भरकम, तेल से चमकती गांड को हवा में और भी ज़्यादा ऊपर की तरफ़ उठा दिया था।
यह 'चेस्ट डाउन, ऐस अप' (छाती नीचे, गांड ऊपर) का वो ख़तरनाक एंगल था, जिसने कामिनी की गांड के छेद को पूरी तरह से आसमान की तरफ़ खोल कर रख दिया। उसकी गांड की दरार अब अपने चरम तक फैल चुकी थी।
क्या है ना बीबी जी ऐसे अंदर का रास्ता सीधा हो जाता हेंगा, लाल तेल अंदर तक जायेगा, हकीम को अब कोई रुकावट नहीं थी।
हकीम ने अपने लंड को बाहर निकाला... और इस बार बिना किसी रहम के, एक ही ज़बरदस्त झटके में अपना मूसल उस नए, सीधे एंगल से कामिनी की गांड में जड़ तक (Balls deep) धँसा दिया!
"धच्चच्चच्च... पचक्क...!"
हकीम अब पूरी तरह से कुतिया बनी कामिनी कि गांड पर सवार था.
"अअअअआआआआआआआआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह......!!!!!"
कामिनी के मुँह से जो चीख निकली वो फर्श में ही दब कर रह गई।
इस नए एंगल की वजह से हकीम का लंड उस जगह पर जा लगा, जहाँ आज तक किसी की पहुँच नहीं थी। वो सीधे कामिनी की नाभि के ठीक पीछे, सबसे गहरे 'स्पॉट' पर जाकर टकराया।
शरीर कि सारी ऊर्जा, सारी नसे यही थी, यही वो लंड टकराया था.
कामिनी की आँखें पलट कर बिल्कुल सफ़ेद हो गईं। उसके गदराए स्तन नीचे फर्श पर दब कर चपटे हो रहे थे और पीछे से बूढ़ा हकीम जानवरों की तरह पेलने लगा।
'थप्पाक... गच... थप्पाक... गच...'
"हाँ बीवी जी... अब जा रिया है ना मूसल बिल्कुल जड़ तक.. आज आपके जिस्म कि एक एक नस आज़ाद हो जागी..!"
"आअह्ह्हम्म्म्म.... हाँ... हाँ.... उउउफ्फ्फ्फ़.... अंदर... आअह्ह्हम.." कामिनी कुछ कहना चाहती थी लेकिन बोल ना सकी, उसे बस पुरे जिस्म मे झुंझनी सी महसूस हो रही थी.
लग रहा था जैसे पेट के अंदर से कोई उसे गुदगुदी कर रहा है, नाभि पर अजीब सा दबाव बनता जा रहा था.
हकीम हर झटके के साथ अपनी पूरी ताक़त लगा रहा था। कामिनी अब चरम सुख की उस दहलीज पर खड़ी थी, जहाँ से अब बचने का कोई रास्ता नहीं था। उसका पूरा जिस्म थर-थर काँप रहा था, उसकी चुत से कामरस की पिचकारियाँ छूटने ही वाली थीं।
,थप्पाक... गचच्च... थप्पाक... गचच्च...'
हकीम लकड़द्दीन अब किसी पागल साँड की तरह पेलने पर उतर आया था। उसकी हर चोट बिल्कुल सटीक निशाने पर, कामिनी के जिस्म की सबसे गहरी और नाज़ुक नसों पर पड़ रही थी।
"आआआआह्ह्ह्ह... उउउम्मम्म्म... माऽऽऽ... काका... फाड़ दो... उईईई!" कामिनी की आवाज़ फर्श से टकराकर गूँज रही थी।
वो अपने नंगे स्तनों को ज़मीन पर रगड़ रही थी। उसकी कामुकता अब अपने चरम पर थी। लाल तेल की जादुई गर्माहट कामिनी की गांड की अंदरूनी दीवारों (Internal walls) में पूरी तरह रम चुकी थी। हकीम का खुरदरा लंड जब भी अंदर-बाहर होता, वो लाल तेल एक ऐसा भयंकर घर्षण (Friction) पैदा करता कि कामिनी को लगता जैसे उसकी रगों में खून की जगह पिघला हुआ शीशा बह रहा हो।
"क्या गांड पाई है बीवी जी... माशाअल्लाह! चूस रही है अंदर से... और गहरे झटके दूँ? निकाल दूँ सारी अकड़न?" हकीम ने कामिनी के चौड़े, पसीने से भीगे कूल्हों को अपने दोनों हाथों से कसकर जकड़ा और उन्हें अपनी तरफ़ खींचते हुए धक्कों की रफ़्तार दोगुनी कर दी।
'पच... पच... चपाक... पच्च... चपाक!'
कामिनी की आँखें पूरी तरह उलट गई। उसकी साँसें अटकने लगी थीं। नाभि के नीचे एक भयानक दबाव बनने लगा था।
वो लम्हा आ गया था। वो 'चरम सुख' का ज्वालामुखी जो ना जाने कब से उबल रहा था, अब फटने ही वाला था।
"का... काका... आआआह्ह्ह... मैं... मैं... गई... मैं गई काका... आआआह्ह्ह... झड़ रही हूँ मैं... उईईईईईई!" कामिनी बेतहाशा चीखने लगी।
उसकी उँगलियों ने फर्श को ऐसे नोचा जैसे वो पत्थर को खुरच देंगी।
और फिर... ब्लास्ट!
कामिनी के जिस्म का हर एक रेशा, हर एक नस एक भयानक झटके के साथ ऐंठ गई। उसकी गांड की अंदरूनी माँसपेशियों ने एक खौफ़नाक 'कसाव' (Spasm) लिया और हकीम के मोटे मूसल को अंदर ही किसी लोहे के शिकंजे की तरह जकड़ लिया।
उसी पल, उसकी सूजी हुई और लटकती हुई चुत का मुहाना पूरी तरह से खुल गया।
"छर्रर्र... छपाक...'
कामिनी की चुत के अंदर से कामरस (Vaginal juices) का एक भारी, गर्म और गाढ़ा सैलाब फूट पड़ा। वो पानी इतनी तेज़ी और इतनी मात्रा में निकला कि कामिनी की जाँघों को भिगोता हुआ, सीधा नीचे ठंडे फर्श पर जाकर एक छोटे से तालाब की तरह बहने लगा।
"अअअअआआआआआआआआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह......!!!!!"
चरम सुख की वो लहर इतनी लंबी और इतनी गहरी थी कि कामिनी का पूरा वजूद काँपने लगा। उसके गदराए स्तन ज़मीन पर फड़कने लगे। गांड के अंदर हो रहे भयंकर खिंचाव और चुत से बहते सैलाब ने कामिनी को ज़िंदा लाश बना दिया। वो बस बेसुध होकर काँप रही थी।
इधर हकीम लकड़द्दीन की हालत ख़राब हो गई।
जैसे ही कामिनी की गांड ने अंदर से उसके लंड को जकड़ा और निचोड़ा, बूढ़े हकीम का सारा सब्र टूट गया। वो गर्माहट, वो कसाव... हकीम के लिए बर्दाश्त के बाहर था।
"उउउफ्फ्फ्फ... बीवी जी... खा गई मेरी जान... आआह्ह्ह... ये लकड़द्दीन भी झड़ रिया है..."
हकीम ने एक आख़िरी, जानलेवा और सबसे गहरा धक्का मारा।
धच्चच्चच्च...!'
वो अपनी कमर को कामिनी की भारी गांड से पूरी ताक़त से चिपका कर वहीं रुक गया।
और अगले ही पल... 70 साल के बूढ़े लंड ने कामिनी की गांड की जलती हुई, अँधेरी गुफा के बिल्कुल आख़िरी छोर पर, अपने गाढ़े, गर्म वीर्य (Semen) की पिचकारियाँ छोड़नी शुरू कर दीं।
'पच्च... पच्च... पच्च...'
हकीम का गर्म, उबलता हुआ बीज कामिनी की गांड के अंदर लाल तेल के साथ जा मिला। कामिनी ने अपने अंदर उस मोटी, खुरदरी रॉड से निकलते हुए खौलते हुए पानी (वीर्य) की हर एक धार को महसूस किया।
हर पिचकारी के साथ कामिनी का जिस्म एक हल्का सा झटका खाता और उसकी गांड उस मूसल को और कसकर चूस लेती।
कमरे में अब एक मौत जैसा सन्नाटा छा गया था। सिर्फ़ उन दोनों की बेतहाशा, भारी साँसों की गूँज थी— "हंफ... हंफ... हंफ..."
हकीम का बूढ़ा जिस्म काँप रहा था। उसने अपना सारा वज़न कामिनी की चौड़ी, पसीने से नहाई पीठ पर डाल दिया। उसका मूसल अभी भी कामिनी की गांड के अंदर पूरी जड़ तक फँसा हुआ था, और नीचे फर्श पर... कामिनी की चुत से निकला गाढ़ा कामरस फर्श पर एक मादक लकीर बना चुका था।
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इस भयानक 'चरम सुख' के तूफ़ान को गुज़रे हुए कोई पंद्रह मिनट बीत चुके थे। ठंडे फर्श पर औंधे मुँह पड़ी कामिनी की उखड़ती हुई साँसें अब धीरे-धीरे अपनी लय में आ रही थीं।
हकीम लकड़द्दीन का खुरदरा लंड कबका बाहर आ चुका था। लेकिन कामिनी की गांड का नाज़ुक छेद, जो अब उस भारी अतिक्रमण के कारण हल्का सा खुला हुआ था, वहाँ से तेल और हकीम के गाढ़े वीर्य का मिश्रण रिस-रिस कर कामिनी की गोरी जाँघों से होता हुआ फर्श पर टपक रहा था।
कामिनी ने अपनी आँखें खोलीं। दिमाग़ अभी भी मादक खुमारी में झूम रहा था। उसने अपने काँपते हाथों का सहारा लिया और ज़मीन से उठने की कोशिश की।
"थप्पाक...!"
"रुकिए बीवी जी..."
हकीम लकड़द्दीन ने कामिनी की भारी, नंगी और लाल पड़ चुकी गांड पर अपना भारी हाथ मार कर उसे उठने से रोक दिया। उस थप्पड़ से कामिनी के कुल्हों का गदराया माँस लहरों की तरह काँप गया।
हकीम ख़ुद अपनी जगह से झट से खड़ा हुआ। उसने अपने पाजामे को अभी बाँधा नहीं था। वो सीधा कमरे के कोने में रखी एक पुरानी अलमारी के पास गया। वहाँ से उसने एक छोटी सी शीशी निकाली, जिसमें कोई तेज़ गंध वाला हरा अर्क (Liquid) था। उसने थोड़ी सी रुई ली और उसे उस अर्क में पूरी तरह भिगो लिया।
वो वापस कामिनी के पीछे आकर झुका। उसने अपने बाएँ हाथ से कामिनी की गांड के दोनों पाटों को सहलाते हुए उन्हें थोड़ा और चौड़ा किया और...
'पुक्कक्क...!'
हकीम ने अर्क में भीगी हुई पूरी की पूरी रुई कामिनी के खुले हुए 'गुदा छिद्र' के बिल्कुल अंदर गहराई तक ठूँस दी!
"आअअह्ह्हम्म... उईईई काका!" कामिनी का पूरा जिस्म करंट खाकर सिहर उठा।
अर्क के अंदर जाते ही कामिनी की गांड में एक बेहद तीखी, झनझना देने वाली जलन सी उठी।
"ये.. ये क्या डाल दिया काका?" कामिनी दर्द और हैरानी से बुदबुदाई।
"घबराइए मत बीवी जी, ये आपको बहुत आराम देगा। अंदर जो नसें खिंची हेंगी, उन्हें पकने नहीं देगा," हकीम ने तसल्ली देते हुए कहा, "इसे ख़ुद से मत निकालना। जब भी पैखाना (शौच) के लिए जाएँगी, ये ख़ुद ब ख़ुद बाहर आ जाएगा। अब आप उठिए और कपड़े पहन लीजिए, मैं ज़रा बाहर आँगन में होकर आता हूँ... पेशाब लगी है।"
यह कहकर हकीम ने अपना पाजामा उठाया और अपनी ठरकी आँखों से कामिनी के नंगे, पसरे हुए जिस्म को एक आख़िरी बार घूरता हुआ बाहर आँगन की तरफ़ निकल गया।
कमरे का दरवाज़ा बंद होते ही कामिनी ने एक गहरी साँस ली। उसने ज़मीन पर टिके अपने हाथों पर ज़ोर दिया और धीरे से खड़ी हो गई।
और... खड़ी होते ही कामिनी बिल्कुल आश्चर्यचकित रह गई!
वो हैरान थी। उसका गदराया, भारी-भरकम जिस्म जो सुबह से दर्द, अकड़न और खिंचाव से टूट रहा था... वो अब बिल्कुल रुई की तरह हल्का महसूस हो रहा था। जाँघों में, कमर में, पिंडलियों में... कहीं कोई अकड़न नहीं, कहीं कोई दर्द नहीं!
उसे ऐसा लग रहा था जैसे अगर कमरे में तेज़ हवा चले तो वो पंख की तरह उड़ जाएगी।
नंगी खड़ी कामिनी ने अपने ही जिस्म को देखा। पसीने और हवस की आग ने उसकी त्वचा में एक अजीब सा निखार ला दिया था। उसका रूप पूरी तरह खिल उठा था। उसके भारी स्तन जो कुछ देर पहले फर्श पर कुचले जा रहे थे, वो अब और भी ज़्यादा तने हुए और सुडौल लग रहे थे।
कामिनी को याद आया... जब आख़िरी बार शमशेर ने ज़बरदस्ती उसकी गांड मारी थी, तो अगले दिन तक वो ठीक से चल भी नहीं पा रही थी, परन्तु आज? हकीम का भयानक, खुरदरा लंड जो शमशेर से कहीं ज़्यादा मोटा था... जो बिल्कुल उसकी नाभि के पीछे तक जा टकराया था... इतना गहरा घुसने के बाद भी उसे रत्ती भर का भी दर्द नहीं हो रहा था।
"ये कैसा जादू है..." कामिनी मन ही मन बुदबुदाई और उस बूढ़े हकीम की दवाओं और उसके तज़ुर्बे की दाद दे बैठी।
तभी कामिनी की नज़र सामने दीवार पर टँगी पुरानी घड़ी पर गई।
"हे भगवान!" कामिनी के मुँह से अचानक निकला।
घड़ी में शाम के 5 बज रहे थे! वो दोपहर के 12 बजे इस कमरे में घुसी थी। पूरे पाँच घंटे... ये वक़्त कहाँ और कब पानी की तरह बह गया, उसे अहसास ही नहीं हुआ।
वक़्त का पता चलते ही कामिनी की हवस की खुमारी थोड़ी कम हुई और होश वापस आ गया।
उसने आनन-फानन में फर्श पर पड़ी अपनी साड़ी उठाई और उसे अपने नंगे, महकते हुए जिस्म पर लपेटने लगी।
उसकी सफ़ेद सूती पैंटी अभी भी वहीं फर्श पर एक कोने में पड़ी थी।
वो तेल, पसीने और कामिनी के कामरस से पूरी तरह सन कर अकड़ चुकी थी... बिल्कुल किसी पापड़ की तरह चिपचिपी हो गई थी। वो किसी भी हाल में अब पहनने लायक नहीं बची थी।
कामिनी साड़ी पहन कर उस पैंटी को उठाने के लिए झुकने ही वाली थी कि...
"रहने दीजिए उसे यहीं पर बीवी जी..."
पीछे से हकीम की आवाज़ आई। कामिनी ने मुड़कर देखा, हकीम दरवाज़े की चौखट पर खड़ा था।
"ये कच्छी अब बिल्कुल बेकार हो गई है आपके लिए," हकीम ने अपनी बात पूरी की।
लेकिन हकीम के शब्दों का लहज़ा और उसकी आँखों की वो ठरकी चमक साफ़ बता रही थी कि वो पैंटी कामिनी के लिए भले ही बेकार हो गई हो... लेकिन उस बूढ़े हकीम के लिए वो उसके आगे के कई रातों के 'इंतज़ाम' की एक बहुत बेशकीमती चीज़ थी। कामिनी हकीम का इशारा समझ गई।
तभी बाहर हकीम के दवाखाने के मेन दरवाज़े पर ज़ोर-ज़ोर से पीटने की आवाज़ आने लगी।
'खट... खट... खट...!'
"लगता है छोटे बाबू (बंटी) आ गए हेंगें आपको लेने," हकीम के गंदे दाँत एक बार फिर मुस्कुराए।
'बंटी' का नाम सुनते ही कामिनी शर्मा गई। उसके चेहरे पर एक सुर्खी दौड़ गई, लेकिन यह शर्म किसी अपराधबोध (Guilt) की नहीं थी... यह एक ऐसी औरत की हया थी जो अभी-अभी किसी गैर मर्द के हाथों पूरी तरह से संतुष्ट हुई थी। उसके मन में अब कोई अफ़सोस नहीं बचा था।
कामिनी अपने बालों को सँवारते हुए आगे बढ़ी ही थी कि...
"रुकिए बीवी जी... ये लेते जाइए," हकीम ने अपने कुर्ते की जेब से एक छोटी सी पीली शीशी निकाली और कामिनी के आगे बढ़ा दी।
"ये क्या है काका?"
"जब भी बदन टूटे या दर्द हो... तो ले लीजिएगा," हकीम ने शीशी कामिनी के हाथों में रखते हुए उसकी आँखों में बहुत गहराई से देखा, "वैसे... ये सिर्फ़ दर्द की दवा नहीं है। ये दवा औरतों को अंदर से सदा जवान भी रखने का काम करती है... उनकी 'आग' को कभी बुझने नहीं देती। ये ख़ास आप जैसी औरतों के लिए ही बनी है।"
हकीम की बात का दोहरा मतलब कामिनी के कानों में किसी मीठे ज़हर की तरह घुल गया।
कामिनी ने बिना कुछ कहे, बस एक नशीली मुस्कान के साथ वो पीली शीशी अपने हाथों में ली और उसे अपनी मुट्ठी में कसकर दबा लिया। उस शीशी को मुट्ठी में भींचने का मतलब था कि कामिनी ने अब हवस और उत्तेजना के इस रास्ते को हमेशा-हमेशा के लिए अपना लिया था।
वो अपने सीने को ताने, एक नई जवानी और बेबाकी के साथ बाहर दरवाज़े की तरफ़ बढ़ गई, जहाँ बंटी उसका इंतज़ार कर रहा था।
क्रमशः
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