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कामिनी 2.0, भाग -7

मेरी माँ कामिनी 2.0 - भाग -7

रात का अँधेरा अब हवेली को पूरी तरह अपनी गिरफ्त में ले चुका था। आँगन में जलती लालटेन की पीली रौशनी में अजीब सी परछाइयाँ नाच रही थीं। तभी हवेली के बाहर कच्ची सड़क पर एक टैक्सी के रुकने की आवाज़ आई।

आवाज़ सुनकर फागुन रसोई से हाथ पोंछते हुए बाहर आँगन में आई। सामने लोहे के भारी गेट से रमेश अंदर दाखिल हो रहा था। उसके कदम लड़खड़ा रहे थे।

"कहाँ थे दिन भर से आप बड़े बाबू?" फागुन ने पास आते ही बहुत ही फिक्र भरे लहज़े में पूछा।

"कक... काम... था कुछ," रमेश ने लड़खड़ाती ज़बान में जवाब दिया। उसने अपनी लाल और नशे में डूबी आँखों से फागुन को ऊपर से नीचे तक एक नज़र देखा, और फिर बिना कुछ और कहे आगे दालान की तरफ बढ़ गया। 

उसके हाथ में एक मैला सा कपड़े का थैला था, जिसके अंदर से काँच की बोतलों के टकराने की 'खनक' साफ़ बता रही थी कि उसमें देसी या विदेशी दारू की बोतलें पड़ी हैं।

"आप बैठिए, मैं पानी लाती हूँ," फागुन दौड़कर अंदर रसोई की तरफ गई।
रमेश दालान में बिछी एक पुरानी चारपाई पर धड़ाम से बैठ गया। वो नशे में ज़रूर था, लेकिन पूरी तरह से आउट नहीं था। 

उसके दिमाग में आज दिनभर की घटनाये घूम रही थी, "साले शमशेर ने कहाँ उलझा दिया है मुझे?। लेकिन मोटा माल बनाने का तरीका अच्छा है " रमेश मन ही मन बुदबूदा रहा था.

"पानी पी लीजिए बड़े बाबू," फागुन पीतल के गिलास में ठंडा पानी लिए वापस आई और गिलास पकड़ाने के लिए रमेश के सामने थोड़ा आगे की ओर झुकी।

फागुन के झुकते ही उसके उस सादे से कुर्ते का गला थोड़ा ढीला हुआ और उसके वो गदराए, उन्नत और भारी स्तनों का पूरा उभार रमेश की नज़रों के ठीक सामने आ गया। 
रमेश,  एक नंबर का अय्याश, लीचड़ और नीच इंसान था, उसकी लाल और नशे में डूबी आँखें फागुन की उस गहरी और गोरी घाटी (cleavage) पर जाकर किसी जोंक की तरह चिपक गईं।

रमेश के लिए औरत सिर्फ और सिर्फ अपनी हवस मिटाने और बिस्तर पर बिछाने की एक चीज़ थी। रिश्ते-नाते, अपनापन या उम्र से उसे कभी कोई फर्क नहीं पड़ता था। फागुन की उस कुदरती, अल्हड़ और बेखबर जवानी को इतने करीब से देखकर रमेश के अंदर एक गंदी और वहशी भावना उमड़ने लगी। उसके नसों में दौड़ती शराब ने उसकी नीयत को और भी काला कर दिया। उसका जी ललचाने लगा कि इस ताज़े और अनछुए 'शिकार' को कब दबोच ले।

"गट... गटक..." रमेश एक ही साँस में पूरा गिलास पानी पी गया, लेकिन उसकी नज़रें एक सेकंड के लिए भी फागुन के सीने से नहीं हटीं। उसने पानी का गिलास वापस करते हुए अपनी गंदी नीयत को छुपाने की कोशिश की और पूछा, "कामिनी कहाँ है? दिखाई नहीं दे रही।"

फागुन ने उसे सारी बात तफ्सील से बता दी कि कैसे कामिनी का पैर गड्ढे में पड़कर मुड़ गया, गहरी मोच आई है, और वो अंदर कमरे में लेटी है।

"साली को चलने की तमीज़ भी नहीं है! नखरे करवा लो बस..." कामिनी का ज़िक्र आते ही रमेश का मन एकदम हिकारत और नफरत से भर उठा।

"छी... बड़े बाबू! ये कैसी भाषा बोल रहे हैं आप अपनी पत्नी के लिए?" फागुन ने तुरंत टोकते हुए एक हल्की सी झिड़की दी।
रमेश अंदर ही अंदर मुस्कुरा दिया। फागुन की इस झिड़की से उसे कोई शर्मिंदगी नहीं हुई, बल्कि फागुन का वो तेवर देखकर रमेश की हवस और भड़क गई।

 "साली तीखी मिर्ची है... इसे बिस्तर पर तोड़ने में बहुत मज़ा आएगा," रमेश ने मन ही मन अपनी जीभ होंठों पर फेरी।
"अच्छा... सुन, ताऊजी और बंटी को बुला ला ज़रा," रमेश ने बात पलटते हुए अपनी गंदी नज़रों को हटाया।
"वो... तो... कहीं बाहर..." फागुन कुछ कहने ही वाली थी कि सामने से ताऊजी और बंटी हवेली के गेट से अंदर आते हुए दिखाई दिए। वो दोनों गाँव का चक्कर लगाकर ही लौट रहे थे।

"आ गया बिटवा!" ताऊजी रमेश को देखकर अपनी चापलूसी भरी मुस्कान के साथ पास आ बैठे। बंटी भी एक कुर्सी खींचकर चुपचाप बैठ गया।

"अच्छा ताऊजी, ध्यान से सुनो। वो कल तीसरा (तीये की बैठक) है ताईजी का...। उसकी पूरी व्यवस्था करनी है," रमेश ने बहुत ही कड़क आवाज़ में हुक्म दिया।
 
"और खाने पीने का प्रोग्राम भी पांचवे छटे दिन मे निपटा देना है "

"लल्ल... लेकिन बाबू, तीसरे पर तो सिर्फ घर के लोग... खाना तो 12वें दिन..." ताऊजी ने गाँव के रीति-रिवाज़ों का हवाला देते हुए कुछ कहना चाहा।

"इतना समय नहीं है मेरे पास कि यहीं इस गाँव में बैठा रहूँ! शहर में बहुत काम है मेरे पास," रमेश यकायक गुस्से से भड़क उठा। उसकी आवाज़ पूरे आँगन में गूंज गई।

 "जो मर गया सो मर गया! अब इन फालतू की फॉर्मेलिटी में उलझा रहूँ क्या? शहर भी लौटना है मुझे।"

बंटी ये सब चुपचाप सुन रहा था। 
"ठीक है बाबू... जैसा आप ठीक समझो। मैं अभी गाँव जाकर हलवाई को बुक कर लेता हूँ," ताऊजी ने डरते हुए सिर हिला दिया।

आँगन में अभी ये बातचीत चल ही रही थी... 
कि तभी!!

'पों... पों...'
बाहर हवेली के भारी लोहे के गेट पर एक तेज़ और कर्कश जीप के हॉर्न की आवाज़ गूंज उठी।
सबकी नज़रें गेट की तरफ घूम गईं। अँधेरे को चीरते हुए जीप की पीली हेडलाइट्स आँगन में पड़ीं।

"अअअ.ममम..... मियाँ,  बड़ी ही वाहियात मोटर चलाते हो,!" गेट के पास से वही खरखराती और पीक भरी आवाज़ गूंजी। हकीम लकड़द्दीन अपनी वो 30 डिग्री झुकी हुई कमर, सिर पर जालीदार टोपी और हाथ में अपना वो पुराना चमड़े का बैग लिए आँगन में चला आ रहा था।
"आप चले हम आते है " लकी बिट्टू ने जीप घूम ली...लकड़द्दिन को कुछ समझ नहीं आया.

"आइये हकीम मियाँ " ताऊजी कुर्सी से उठ कर पास पहुंचे और बेग को थाम लिया.
"वो जीप किसकी थी " ताऊजी ने पूछा.
"अम्मा... मियाँ हमें किया पता, मिल गए रास्ते मे तो छोड़ते गए "

ताऊजी ने रमेश से उसका परिचय करवाया.
"खाकसार को मियाँ हकीम लकड़द्दिन कहते है, सभी मर्ज़ की दवा इस झोली मे है " हकीम मे बकरा दाढ़ी खुजाते हुए कहाँ.
रमेश ने कोई जवाब नहीं दिया, और दारू का थैला उठा कर छत पर चल दिया " ताऊजी पानी लेते आना आते वक़्त "
"बड़ा ही बगैरत इंसान है " हकीम गुस्से से कुर्सी पर बैठ गया.


वही अंदर कमरे मे कामिनी किसी जल बिन मछली की तरह तड़प रही थी.

हकीम की उस शैतानी दवा ने कामिनी के जिस्म में ऐसा कहर बरपाया था कि अब उसका खुद पर कोई ज़ोर नहीं रहा था। पूरा कमरा जैसे किसी भट्टी की तरह तप रहा था। कामिनी का गोरा जिस्म पूरी तरह से पसीने से लथपथ हो चुका था। 

उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे, कैसे इस भयंकर गर्मी और अपनी ही नसों में दौड़ते इस 'मीठे ज़हर' को शांत करे।

बेचैनी और उस घुटन के मारे कामिनी ने बिस्तर पर करवटें बदलते हुए अपनी साड़ी को लगभग पूरी तरह से अपने जिस्म से हटा दिया था। साड़ी अब सिर्फ उसकी कमर के नीचे अस्त-व्यस्त हालत में लिपटी हुई थी।
पसीने की वजह से उसका हल्का गुलाबी ब्लाउज़ पूरी तरह भीग कर उसके जिस्म से एक दूसरी खाल की तरह चिपक गया था। 

उस गीलेपन के कारण ब्लाउज़ के आर-पार उसके उन भारी और उन्नत स्तनों का आकार बिल्कुल साफ़ और निर्लज्ज तरीके से छप गया था। दवा की तेज़ उत्तेजना से उसके निप्पल इतने सख़्त हो गए थे कि वो कपड़े को फाड़कर बाहर आने को मचल रहे थे।

उसके जिस्म का हर एक कपड़ा, हर एक धागा इस वक़्त उसे काँटों की तरह चुभ रहा था। शरीर का तापमान इतना बढ़ गया था कि उसकी पैंटी पसीने और एक अजीब सी नमी से पूरी तरह गीले हो चुकी थी,

 वो चिपचिपापन और वो कसक उसे पागल कर रही थी। कामिनी से अब ये घुटन और बर्दाश्त नहीं हुई।
उसने कांपते हाथों से अपनी उस बंदिश को आज़ाद करने की ठान ली, कामिनी ने साड़ी जांघो तक सरका ली, उसके दोनों हाथ साड़ी के अंदर दाखिल हुए और उस मुसीबत की जड़ को पकड़ लिया, उसकी गीली कच्छी की इलास्टिक उसके अंगूठे मे जा फसी, और.. Ssssssrrrrrrr........ करती उसकी पैंटी दूसरे ही पल उसके घुटनो पर किसी सांप की तरफ लिपटी हुई थी.

 उस कसकते हुए कपड़े के हटते ही, खिड़की से आती रात की एक ठंडी हवा के झोंके ने कामिनी के उस दहकते हुए और सुन्न पड़ते जिस्म को एक पल के लिए छू लिया।

"ईईस्स्स्स..... आआहहहह..... माँ..." ठंडी हवा का झोका सीधा उसकी फूली हुई गीली चुत से टकरा गया, उस स्पर्श ने एक अजीब सी, तड़पा देने वाली राहत दी और कामिनी के होंठों से एक बहुत ही गहरी, मादक और बेकाबू सिसकी निकल गई। 

नाभि के नीचे का वो भारीपन अब अपने चरम पर था। दवा ने उसके दिमाग के हर उस हिस्से को सुन्न कर दिया था जो उसे सही और गलत का फर्क बताता था। वो अपने कांपते हाथों से खुद को उस आग से राहत दिलाने की कोशिश करने ही वाली थी, उसने फैसला कर लिया था खुद अपनी उंगलियों से इस जलते लावे को बहार निकाल फेंकेगी.

कि तभी...!!
कमरे की खामोशी और कामिनी की उन भारी साँसों के बीच, कमरे की चौखट पर एक बहुत ही भारी और मनहूस आहट हुई।

"खट... खट..." दरवाज़े को हल्के से धकेल कर किसी ने आधा खोला। बाहर लालटेन की पीली रौशनी में एक झुका हुआ साया चौखट पर खड़ा था।

"अंम्म्म्म... इजाज़त है मोहतरमा... अंदर आ जाएँ?" पान चबाने की उस घिनौनी आवाज़ और उस पीक भरे, खरखराते हुए लहज़े ने कामिनी के रोंगटे खड़े कर दिए। वो हकीम लकड़द्दीन था!

कामिनी ने घबराकर दरवाज़े की तरफ देखा। हकीम की वो लालची, भूखी और दरिंदों वाली आँखें सीधे कामिनी के उस पसीने से तर, आधे नंगे और उत्तेजना से हाँफते हुए जिस्म पर गड़ी थीं। लकड़द्दीन वो नज़ारा देख रहा था, जिसे देखते ही ऐसा बूढ़ा आदमी प्राण छोड़ दे.
हकीम की टांगे एक पल को कांप गई.
सामने सुंदर गोरी अप्सरा तड़प रही थी.

हकीम ने अपने पुराने चमड़े के बैग को मज़बूती से पकड़ा और अपनी बकरा दाढ़ी खुजाते हुए एक शैतानी मुस्कान के साथ कमरे के अंदर कदम रख दिया... और अपने पीछे दरवाज़े को धीरे से सटा दिया।
कामिनी सकपाकती हुई बिस्तर पर ऊपर की तरफ सरक गई.
पीछे सिरहाने पर टेक लगा दी, बिस्तर पर पड़ी कच्छी को एक झटका सा मारा, कच्छी जमीन चाटने लगी.


कमरे का दरवाज़ा पीछे से सटाने के बाद, हकीम लकड़द्दीन ने कुंडी (लटकन) को धीरे से चढ़ा दिया। अब वो कमरा बाहर की दुनिया से पूरी तरह कट चुका था।
"वो.. वो... कामिनी जैसे कुछ कहना चाहती थी, लेकिन बोल ना सकी, उसने साड़ी को घुटने से नीचे सरका दिया, और दोनों जांघो को एक दूसरे से चिपका लिया.
जैसे हकीम की नजर को वहाँ घुसता महसूस कर रही हो.

हकीम की लालची आँखें बिस्तर पर किसी घायल हिरणी की तरह तड़पती हुई कामिनी पर गड़ी थीं। कामिनी की वो बिखरी हुई साड़ी, पसीने से पारदर्शी हो चुका वो चिपका हुआ ब्लाउज़, और उसकी भारी साँसों के साथ ऊपर-नीचे होता उसका गोरा भरा हुआ सीना लकड़द्दीन के मुँह में पानी ला रहा था।

"बहुत... बहुत पसीना आ रिया है मोहतरमा... लगता है दर्द अंदर तक जड़ पकड़ चुका है," हकीम ने अपनी पीक भरी मुस्कान के साथ कहा और अपना फटा बैग चारपाई के किनारे रख दिया।

कामिनी का दिमाग चीख रहा था कि इस बुड्ढे को अभी कमरे से बाहर निकाल दे, लेकिन हकीम की पिलाई हुई उस दवा ने उसके जिस्म को लकवा मार दिया था। उसकी ज़बान सूख गई थी। वो बस अपनी आधी बंद, नशीली आँखों से हकीम को अपनी तरफ बढ़ते हुए देख रही थी।

"दद... दर्द... नहीं... गर्मी... मुझे बहुत गर्मी..." कामिनी के होंठ कांपे। उसके हलक से शब्द नहीं, बस सिसकियाँ निकल रही थीं।

"गर्मी तो निकलेगी बीवी जी... जब नसें खुलेंगी तो गर्मी तो निकलेगी ही," हकीम ने एक शैतानी हँसी के साथ अपने बैग से वही लाल रंग के तेल की शीशी निकाली।

उसने अपनी खुरदरी और झुर्रियों वाली हथेलियों पर वो गाढ़ा तेल रगड़ा। पूरे कमरे में उस अजीब सी, नशीली जड़ी-बूटियों वाली तीखी महक फैल गई।
लाइए बीवी जी दर्द और गर्मी अभी निकाले देता हूँ.

हकीम बिस्तर के किनारे आकर बैठ गया। उसने कामिनी के मुड़े हुए पैर को धीरे से पकड़ा। कामिनी की उस तपती हुई, गोरी त्वचा पर जैसे ही हकीम के उन ठंडे और खुरदरे हाथों का स्पर्श हुआ... कामिनी के पूरे बदन में एक तेज़ बिजली सी दौड़ गई।

"आआह्ह्ह...." एक तड़पती हुई सिसकी कामिनी के मुँह से छूट गई।

ये स्पर्श उसे घिनौना लग रहा था, लेकिन दवा के असर से खौल रहे उसके जिस्म को ये रगड़ एक अजीब सा, जानलेवा सुकून भी दे रही थी। 
कामिनी तो वैसे ही आम तौर पर उत्तेजित रहती थी, यहाँ तो उबाल आ चूका था, कैसे रोकती... नहीं रोका.

हकीम बहुत पुराना और मंझा हुआ खिलाड़ी था। वो औरतों के जिस्म की हर कमज़ोर नस पहचानता था।

उसके अंगूठे कामिनी की सूजी हुई एड़ी से होते हुए, उसकी चिकनी पिंडलियों (calves) को दबाने लगे। वो तेल जैसे-जैसे कामिनी की त्वचा में उतर रहा था, वो नाभि के नीचे वाले उस दहकते 'ज्वालामुखी' की आग को और भड़का रहा था। कामिनी को अपनी चुत से रस बहता हुआ महसूस हो था था जो सीधा नीचे बिस्तर मे समा रहा था, 
कामिनी ने बेकाबू होकर अपने हाथों से बिस्तर की चादर को कसकर भींच लिया।

"आराम से... बिल्कुल ढीला छोड़ दो बदन को," हकीम फुसफुसाया।

अब लकड़द्दीन के हाथ सिर्फ पिंडलियों तक सीमित नहीं थे। वो मालिश करने के बहाने कामिनी की जांघों की तरफ बढ़ने लगा।  उसके हाथ घुटने तक जा कर वापस आ जा रहे थे, 
कामिनी सिर्फ उसके चलते हाथो को देख रही थी.
आगे हाथ बढ़ाना मुश्किल था, 
"बीवी जी थोड़ा आगे आइये, हाथ ठीक से जा नहीं रहा " हकीम ने कामिनी के उस नंगे, गोरे पैर को अपनी तरफ खींचा और सुबह की तरह ही अपनी दोनों जांघों के बीच फंसा लिया।

कामिनी की साड़ी जो पहले ही सिर्फ घुटने तक थी, इस खिंचाव से और भी ऊपर सरक गई। उसकी गोरी, सुडौल और पसीने से चमकती हुई जांघें अब पूरी तरह से उस हकीम की भूखी नज़रों के सामने थीं।

"तौबा.... तौबा..... हकीम बुदबूदा उठा
"कक्क... क्या हुआ " कामिनी चौंक गई.
"कक... कुछ नहीं वो बीवी जी ऐसा चटक रंग आज तक नहीं देखा, लानत है नसीब पर मेरे " लकड़द्दिन के दिल की बात जबान पर आ गई.
कामिनी सिर्फ मुस्कुरा दी, एक बूढ़ा आदमी उत्तेजित हो रहा था इस अहसास ने उसे और भी उत्तेजित कर दिया.

हकीम की उँगलियों का दबाव अब कामिनी के घुटनों से ऊपर, उसकी जांघों की नर्म त्वचा पर रेंगने लगा। उस 70 साल के बूढ़े के गंदे हाथ जिस बेबाकी से कामिनी की जांघों को सहला रहे थे, वो किसी भी औरत के लिए बर्दाश्त के बाहर था। 

लेकिन कामिनी का अपना ही शरीर उसकी उस 'प्यास' से लड़ रहा था। हकीम के हाथों की हर रगड़, हर दबाव कामिनी की नाज़ुक और गीली चुत में एक भयानक करंट पैदा कर रहा था।

कामिनी को उसका हाथ हटा देना चाहिए था, लेकिन हकीम के तेल से भीगे हाथ जाँघ तक जा कर एड़ी तक फिसल आते, ये चढाई और उतराई कामिनी की सांस के साथ ही चढ़ उतर रही थी.

कामिनी का सिर पीछे तकिये पर लुढ़क गया। उसकी पीठ एक चाप (arch) की तरह हवा में तन गई और उसके ब्लाउज़ में कसे हुए वो उभार एकदम तन कर सीधे हो गए।

"ईईस्स्स्स्स.... काका... रुक... रुक जाइये..." कामिनी ने बेहद कमज़ोर और मदहोश आवाज़ में विरोध करने की कोशिश की। वो अपनी जांघों को सिकोड़ना चाहती थी, लेकिन उस नशीले तेल की रगड़ और हकीम के कड़े हाथों ने उसे जकड़ रखा था।

"रुक गए ... तो ये गर्मी अंदर ही मार डालेगी मोहतरमा... इसे बाहर आने दो..."
हकीम ने अपनी आँखें कामिनी के सीने पर गड़ाते हुए, अपने हाथों को उसकी जांघों पर और भी ऊपर, जांघो के जोड़ के बिल्कुल करीब तक खिसका दिया।  हकीम को ऐसा महसूस हुआ जैसे बगल मे कोई भट्टी सुलग रही है, 
कामिनी का शरीर उस नज़दीकी स्पर्श से एक झटके के साथ कांप उठा और उसके होंठों से एक लंबी, उत्तेजक और बेबस कराह निकल गई...
ईईस्स्स्स..... आआहहहह.....
हकीम मंद ही मंद मुस्कुरा रहा था.


कमरे में उस लाल तेल की नशीली महक और कामिनी की भारी साँसों की आवाज़ गूंज रही थी।

हकीम लकड़द्दीन के तेल से सने खुरदरे हाथ एक बहुत ही सधी हुई, लेकिन दरिंदगी भरी लय (rhythm) में कामिनी की टांगों पर चल रहे थे। 

कामिनी का नंगा पैर अभी भी हकीम की दोनों जांघों के बीच फंसा हुआ था।
हकीम के हाथ जैसे-जैसे कामिनी की गोरी पिंडलियों से होते हुए जांघों की तरफ ऊपर चढ़ते, हकीम का पूरा शरीर आगे की तरफ झुकता। इस झुकाव के साथ ही कामिनी को अपने तलवों और पंजों पर एक बेहद अजीब, 'सख्त और खौलती हुई गर्माहट' का एहसास होने लगा।

वो कोई आम गर्माहट नहीं थी। हकीम की दोनों जांघों के बीच एक बहुत ही कठोर और मोटा 'उभार' बन चुका था, जो उस ढीले पजामे के आर-पार कामिनी के तलवों से सीधी रगड़ खा रहा था।

आम दिनों में कामिनी शायद इस घिनौने स्पर्श पर हकीम के मुँह पर लात मार देती, लेकिन आज हालात दूसरे थे।

 लकड़द्दिन की मालिश उसकी दवा के नशे ने कामिनी के सोचने-समझने और शर्म की सारी हदें तोड़ दी थीं। उसे वो 'सख्त और बेलनाकार एहसास' घिनौना लगने के बजाय, अंदर ही अंदर एक अजीब सी तलब दे रहा था।

 उसके सुन्न पड़ते दिमाग में एक पागलपन सी इच्छा कुलबुलाने लगी कि वो उस हिस्से को और ज़्यादा महसूस करे, उसे देखे।
उसे अपने जीवन के वो सुखमय पल याद आने लगे जब उसने पहली बार रघु के लंड को देखा था, महसूस किया था, उसे सहलाया था.
कामिनी कर जहन मे एक फ़िल्म सी चलने लगी.
फ़िल्म के hero बदल जाते, कभी रघु, कादर, रवि तो कभी शमशेर... बस एक चीज एक जैसी थी " मर्दो के खड़े, नसो से भरे लंड "
कामिनी का पैर अनजाने मे ही हकीम के लंड को दबाने लगा, उसे तलवो के नीचे मसलने को बैताब होने लगा.


"बूढ़े का कैसा होता होगा " कामिनी के जहन मे एक विचार कोंध गया.
वो तुलना करना चाहती थी उन सब से इस हकीम की.
उउउफ्फ्फ....कामवासना मे फसी औरत क्या क्या नहीं सोचती.

लकड़द्दिन के हाथ भी अब जांघो की जड़ मे धसने लगे थे, इतने करीब की बस 2सेंटीमीटर की दुरी से चुत को छुवे बिना लौट जाते.
बस यही वो कमी थी... कामिनी अपनी कमर को हल्का सा आगे करती, लेकिन कभी हकीम की उंगलियों को छू ना पाती.


"आआह्ह्ह... उफ्फ्फ..." कामिनी का पूरा जिस्म उस दबाव से हवा में तन जाता और उसकी गीलीचुत से रस की एक और धार छूट जाती।

और फिर जब हकीम के हाथ वापस एड़ी की तरफ नीचे आते... तो वो दबाव हल्का हो जाता। ऊपर जाना... और नीचे आना... ये एक ऐसा मादक झूला बन गया था जिसने कामिनी की नसों में आग लगा दी थी।

कामिनी से अब ये तड़प बर्दाश्त नहीं हो रही थी। उसने अपनी आँखें बंद कीं और अपनी सारी शर्म को ताक पर रखते हुए... जब हकीम दोबारा आगे की तरफ झुका, तो कामिनी ने जानबूझकर अपने पैर के अँगूठे और तलवे को उसके लंड पर रख कर उसे जोर से दबा दिया।

"आअह्ह्ह..... बीवी जी आराम से " कामिनी की इस हरकत ने हकीम के बूढ़े जिस्म में दर्द की एक लकीर दौड़ा दी, हकीम की साँसें अटक गईं, उसके हाथ कामिनी की जांघो के जोड़ पर अटक गए.

"ईईस्स्स्स....." कामिनी के होंठों से एक लंबी सिसकी निकली।
अब एक अजीब सा चमत्कार हो रहा था। जिस एड़ी के दर्द से कामिनी सुबह से तड़प रही थी, वो दर्द अब पूरी तरह से गायब हो चुका था। वहाँ रत्ती भर भी दर्द नहीं बचा था।

कामिनी के तलवे और अंगूठे ने जब जानबूझकर हकीम के सख्त लंड को दबाया, तो हकीम के पूरे बूढ़े जिस्म में एक मीठे दर्द और करंट की लहर दौड़ गई। 70 साल के ठरकी हकीम को बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी कि शहर की ये संस्कारी और गोरी औरत, इस दवा के असर में इतनी खूंखार और बेबाक निकलेगी। कामिनी का पैर अब बेशर्मी से उसकी गोद में मचल रहा था।

हकीम की साँसें भारी हो गईं। इस भयंकर उत्तेजना को सँभालने के लिए हकीम चारपाई के किनारे पर थोड़ा खिसका।

 उसने अपना बैलेंस बनाने के लिए अपनी एक टांग को आगे की तरफ फैला लिया...बिल्कुल कामिनी की दोनों कांपती हुई गोरी जांघों के बीच!

कामिनी का एक पैर अभी भी हकीम की गोद में उसके लंड की लम्बाई मोटाई नाप रहा था, और वहीं कामिनी का नशीला दिमाग हकीम का ये अगला गंदा इरादा बहुत अच्छे से समझ गया था।

आम औरत होती तो शायद अपनी जांघें सिकोड़ लेती, लेकिन कामिनी ने अब सारी शर्म, हया और पर्दा त्याग दिया था। उसे बस किसी भी कीमत पर अपनी जलती चुत से वो लावा निकलना था जो उसे अंदर ही अंदर जला रहा था, 

 कामिनी ने अपनी आधी खुली, नशीली आँखों से हकीम को देखा और विरोध करने के बजाय... अपनी दोनों जांघों को थोड़ा और चौड़ा कर दिया।
जांघों के इस तरह खुलते ही, हकीम की भूखी नज़रों के सामने वो नज़ारा आ गया जिसे देखकर किसी भी मर्द का ईमान डोल जाए। 
हकीम को लगने लगा कहीं उसका दिल धड़कना ना बंद कर दे.

कामिनी की उस बेहद नाज़ुक और सुलगती हुई चुत से बहते हुए रस की एक गीली, चिपचिपी और चमकदार लकीर लालटेन की रौशनी में साफ़ चमक रही थी।

 कामिनी की चुत उत्तेजना और दवा की गर्मी से बुरी तरह फूल कर कुप्पा हो चुका थी, बस किसी के स्पर्श के लिए तड़प रहा थी ।

हकीम के मुँह से लार टपकने लगी। उसने कोई मौका नहीं गँवाया। अपनी आगे फैलाई हुई टांग का इस्तेमाल करते हुए, अपने पैर के खुरदरे अंगूठे को धीरे से आगे बढ़ाया और कामिनी की उस गीली, रस से भरी 'सुलगती हुई घाटी' पर रख दिया।

"आआआअअअह्ह्ह्ह... उफ्फ्फ्फ़... माँ...!" जैसे ही हकीम के अंगूठे ने कामिनी के उस सबसे संवेदनशील हिस्से को छुआ और उस गीली दरार के बीच हल्की सी रगड़ दी... कामिनी का पूरा जिस्म बिजली के झटके की तरह हवा में उछल पड़ा।

ये कोई हाथ का स्पर्श नहीं था, एक गंदे, फटे हुए खुरदरे पैर के अंगूठे की रगड़ थी। लेकिन कामिनी की प्यास इतनी वहशी हो चुकी थी कि उसे इस बेइज़्ज़ती में भी एक पागल कर देने वाला मज़ा आ रहा था। हकीम का वो अंगूठा उस रस में लथपथ होकर धीरे-धीरे ऊपर-नीचे होने लगा।

कामिनी के मुँह से अब शब्द नहीं, बल्कि किसी जंगली बिल्ली जैसी कराहें निकल रही थीं। उसने अपने दोनों हाथों से बिस्तर की चादर को फाड़ देने की हद तक मुट्ठियों में जकड़ लिया । उसका सिर पीछे की तरफ झूल गया था और उसके तन चुके स्तन बुरी तरह ऊपर-नीचे होने लगे, 

कामिनी अब बेबसी की उस दहलीज़ को पार कर चुकी थी जहाँ से कोई वापसी नहीं थी। हवास और उत्तेजना ने उसके अंदर की सारी झिझक जलाकर राख कर दी थी।

 अब उसे भी कुछ चाहिए था, कुछ ऐसा जो उसके अंदर उबल रहे इस ज्वालामुखी को शांत कर सके।
उसने अपनी गर्दन सीधी की और अपनी आधी नशीली, आधी वहशी आँखों से हकीम लकड़द्दीन की तरफ देखा।

 वो ठरकी बूढ़ा अभी भी किसी भूखे भेड़िये की तरह कामिनी के पसीने से भीगे, उफनते हुए स्तनों को घूर रहा था। उसके होंठों के कोनों से पीक रिस रही थी और वो अपने गंदे लाल दाँत निपोर रहा था।

"गर्मी बहुत जानलेवा होती है मोहतरमा.... पच... पिच...." हकीम ने अपनी पीक भरी आवाज़ में कहा। उसके पैर का अंगूठा अभी भी कामिनी की सुलगती हुई 'घाटी' पर एक मीठी और तड़पाने वाली रगड़ दे रहा था।

कामिनी के मुँह से कोई शब्द नहीं निकला। बोलने के लिए अब बचा ही क्या था? जिस्म की भाषा अब शब्दों से कहीं ज़्यादा तेज़ और खूंखार हो चुकी थी।
कामिनी ने अपनी आँखें हकीम के चेहरे से हटाईं और नीचे की तरफ देखा। उसने अपने पैर के अंगूठे और पहली उंगली के बीच, हकीम के उस ढीले पजामे के नाड़े (डोरी) को फंसाया... और एक झटके से 'सससररर....' करके खींच दिया।

अगले ही पल, हकीम का वो मैला पजामा खिसक कर नीचे जांघो पर जा गिरा।
और पजामे के गिरते ही, जो नज़ारा कामिनी की आँखों के सामने आया, उसने कामिनी का मुँह खुला का खुला छोड़ दिया। उसने सपने में भी उम्मीद नहीं की थी कि 70 साल के इस कंकाल जैसे बूढ़े के पास ऐसा कुछ हो सकता है। हकीम की उन कमज़ोर जांघों के बीच एक बेहद भयानक, नसों से भरा हुआ, मोटा और खौफनाक 'लंड ' बिल्कुल अकड़ा हुआ खड़ा था। वो इतना सख़्त और बेकाबू था कि सीधे कमरे की छत की तरफ तन कर खड़ा था।

हकीम लकड़द्दीन की आँखों में एक गुरूर आ गया।
"हेहेहे..... मोहतरमा, आदमी का जिस्म भले ही बूढ़ा हो जाए, लेकिन उसकी ये 'मर्दानगी' हमेशा जवान ही रहती है," हकीम ने अपनी बकरा दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए कहा।

"पच...." इतना कहते ही हकीम ने कामिनी की चुत पर रखे अपने पैर के अंगूठे को थोड़ा आगे की तरफ धकेला। उसका इरादा उस अंगूठे को कामिनी की उस सुलगती हुई गहराई के अंदर तक उतार देने का था, लेकिन जगह की तंगी और कामिनी के जिस्म की ऐंठन की वजह से वो पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाया।

लेकिन कामिनी को अब कोई होशो-हवास नहीं था। उस अंगूठे के चुभन भरे दबाव ने उसकी प्यास को पागलपन में बदल दिया था। उसने अपनी दोनों गोरी जांघों को बिस्तर पर पूरी तरह से और चौड़ा कर दिया... बिल्कुल एक खुली किताब की तरह।

जैसे-जैसे उसकी जांघें खुलती गईं, उसकी गीली चुत हुई पूरी तरह से बेपर्दा हो गई। लालटेन की रौशनी में उस नाज़ुक हिस्से की वो कसकती हुई 'तितली नुमा' परतें और उत्तेजना से बाहर की तरफ तन कर उभरा हुआ मटर का दाना (clit) एकदम साफ़ दिखने लगा। कामिनी ने सच में अपना सब कुछ उस बूढ़े के सामने परोस दिया था।

कामिनी अब सिर्फ सहना नहीं चाहती थी; वो इस खेल में खुद शामिल होना चाहती थी।
उसने अपना पैर आगे बढ़ाया और हकीम के नंगे, खौलते हुए लंड पर रख दिया। कामिनी का नरम, पसीने, तेल से भीगा पैर और हकीम के सख्त लंड के बीच एक ज़बरदस्त टकराहट हुई। 

कामिनी ने उसके लंड को अपने पैर और हकीम के पेट के बीच कसकर कुचल सा दिया।

"आआआहहहह..... मोहतरमा! उउउफ्फ्फ्फ़..." इस अचानक और ज़बरदस्त दबाव से हकीम के मुँह से एक दर्द और मज़े में लिपटी हुई भारी कराह निकल गई।
कामिनी की आँखों में एक वहशी नशा तैर गया। उसके पैर अब हकीम के उस सख़्त हिस्से पर एक बहुत ही सधी हुई, मादक और तेज़ लय में ऊपर-नीचे चलने लगे,

 कमरे का सन्नाटा अब सिर्फ दोनों की भारी साँसों और मांस के टकराने की आवाज़ से टूट रहा था।

कामिनी अब किसी भी हद को पार करने के लिए तैयार थी। उसने अपने सिर को थोड़ा उठाया, हकीम की उन लालची आँखों में देखा, और अपनी कमर को थोड़ा और आगे की तरफ खिसका दिया। ये बिना कुछ कहे हकीम को अपनी दहकती हुई चुत तक का सीधा रास्ता देने का इशारा था।

शहर की इस बेदाग, गोरी और सुलगती हुई अप्सरा को इस तरह पूरी तरह से खुद को सौंपते देख, हकीम का दिमाग सुन्न हो गया था। उसकी आँखों के सामने कामिनी की मादक, रसीली चुत बेपर्दा थी।

हकीम का खुरदरा, फटा हुआ गंदा अंगूठा योनि रस में पूरी तरह सन चुका था।
"पच... पचककककक...." एक अजीब सी गीली आवाज़ के साथ, हकीम ने अपने उस खुरदरे अंगूठे को आहिस्ता से कामिनी की चुत की गहराई मे धकेल दिया।

"आआआहहहहह..... इसिस्स्स्स...." कामिनी का पूरा वजूद एक ज़ोरदार झटके के साथ सिहर उठा।
हकीम का गंदा और खुरदरा अंगूठा जैसे ही कामिनी की चुत की गहराई में रेंगने लगा, कामिनी के जिस्म की सारी नसें तन गईं। लकड़द्दिन चुत की अंदरूनी दीवारों को कुरेदने लगा,

"पच... पच... आअह्ह्ह.... फच... फचम...." कमरे के सन्नाटे में अब सिर्फ उन दो जिस्मों की टकराहट और उस गीलेपन की एक अजीब सी 'चप-चप' आवाज़ गूंज रही थी।
"ऊफ्फफ्फ्फ़..." कामिनी ने बेकाबू होकर अपना सिर पीछे तकिये पर टिका लिया। उसकी आँखें पलट गई थीं। उसका बदन अब उसके कंट्रोल में नहीं था। उसकी कमर खुद-ब-खुद उस खुरदरे अंगूठे की लय के साथ आगे-पीछे होने लगी। वो उस दर्द और मज़े के एहसास को और गहराई तक अपने अंदर उतार लेना चाहती थी।
उधर, हकीम लकड़द्दीन की तो जैसे दुनिया ही पलट गई थी।
हकीम ने अपनी 70 साल की उम्र में ऐसा वहशी और आग लगा देने वाला खेल आज से पहले कभी नहीं खेला था। वो अंदर ही अंदर हैरान था। उसने तो आज तक बस गाँव की उन खुरदरी, पसीने से बदबू मारती औरतों के घाघरे उठाए थे और अँधेरे में जल्दबाज़ी मे चुदाई की थी।
लेकिन आज का ये एहसास... बिल्कुल नया और पागल कर देने वाला था।
जैसे ही उसका अंगूठा उस मादक गहराई में गया, कामिनी की चुत से निकली भयंकर गर्माहट,  हकीम के पैर से होती हुई उसके बदन मे फ़ैल गई, 

 कामिनी के जिस्म की वो आग अब हकीम को भी जला रही थी।
हकीम ने हाँफते हुए अपनी पीक भरी आवाज़ में कहा, "आअह्ह्ह.... मोहतरमा... सच में, बहुत गर्म हैं आप!" कामिनी के पैर अपनी तारीफ सुन तेज़ी से हकीम के लंड को घिसने लगे, 
दोनों ही एक दूसरे के जिस्म से खेल रहे थे.
एक रेस शुरू हो गई थी.

"आआआह्हःम.... पच.... पचम्म.... कामिनी बेताब थी, तेज़ी से कमर चला रही थी, उसकी चुत ने पूरी तरह से हकीम के अंगूठे को निगल लिया था, जल्द से जल्द उसे अपनी प्यास बुझानी थी, 
उसके पैर हकीम के लंड को नोंचने पे उतारू थे.
ऐसा लग रहा था जैसे हकीम लकड़द्दिन कामिनी के कब्जे मे है, 
ईईस्स्स... अअअ.... मोहतरमा आराम से, ममम..। मर जाऊंगा " हकीम को अपनी मर्दानगी पर शक होने लगा.
उसका जिस्म अकड़ने लगा था.
कामिनी कहाँ मानने वाली थी अब, उसकी कमर और पैर पूरी लय मे चल रहे थे.
पच... पच... पच.... आअह्ह्ह... आअह्ह्ह

. फच... फच...
आआहह... आअह्ह्ह... बस थोड़ा और... थोड़ा और.. कामिनी बड़बड़ा रही थी, आंखे बंद थी उसे तो परवाह ही नहीं थी की सामने हकीम जिन्दा है या मर गया.

आअह्ह्ह..... तभी कामिनी को अहसास हुआ की हकीम की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आ रही है..
"आआआहहहहह..... बीवी जी " एकाएक हकीम के हलक से करहती हुई आवाज़ फुट पड़ी.
कामिनी को अपने तलवो पर कुछ गिला चिप चिपा सा महसूस हुआ.
"नहीं... अभी नहीं... " कामिनी ने झड़ से आंखे खोल दी.
हकीम गर्दन झुकाये हांफ रहा था, उसका लंड धीरे धीरे मुरझा रहा था, कामिनी के तलवो से आजाद हो रहा था.
कामिनी का जहन.... गुस्से उत्तेजना से कांप उठा.
"गन्दा बूढ़ा आदमी " कामिनी ने अपने पैर झटक लिए, अपनी कमर वापस पीछे खिंच की... पुकककक... करता चुत ने धसा अंगूठा बहार आ गया.
कामिनी के गुस्से ने उत्तेजना को धक लिया था.
"वो... वो.... माफ़ करना मोहतरमा, आप जैसे कामुक औरत से कभी पाला नहीं पड़ा "
कामिनी कुछ नहीं बोली, अपने पैर सीधे कार साड़ी नीचे कर ली.
हकीम को अब यहाँ रुकना ठीक नहीं लगा.
पाजामे का नाड़ा कसा, बेग उठाया और झुकी कमर लिए बहार को चल दिया.
"नहा लीजियेगा मोहतरमा, थोड़ी गर्मी कम हो जाएगी "
जाते जाते हकीम सुझाव दे गया.
"जाओ यहाँ से " कामिनी लगभग चीख उठी.
दरवाज़ा बंद हो गया और कमरे में कामिनी फिर से अकेली रह गई। अधूरी वासना और उत्तेजना की आग मे सुलगती हुई औरत अब कर भी क्या सकती थी... सिवाय अपने ही जिस्म की उस आग में जलने के।
***************

हवेली के अंदर अब एक डरावना सा सन्नाटा पसर चुका था। कामिनी के कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद था। बिस्तर पर लेटी कामिनी ने किसी तरह अपनी उन भारी और हाँफती हुई साँसों पर काबू पा लिया था, हालांकि उसके जिस्म और ज़हन में हकीम लकड़द्दिन की दी हुई उत्तेजना, अधूरी मालिश का गुस्सा और आग अभी भी सुलग रही थी।

उधर, बंटी और फागुन कुछ देर पहले ही हवेली से निकलकर प्रमिला के घर की तरफ जा चुके थे। रमेश छत पर दारू के नशे में धुत्त पड़ा था। हवेली बाहर से एकदम वीरान लग रही थी।

और इसी वीरानी का फायदा उठाने के लिए, हवेली के ठीक बाहर कंटीली झाड़ियों के पीछे दो साये घात लगाए बैठे थे।
मच्छरों से कटवाते और खुद को खुजाते हुए लकी और बिट्टू,  बड़ा भाई के वो दो 'खूंखार' गुंडे, जो खुद को जेम्स बांड की नाजायज़ औलाद समझते थे उल्लू की तरह आँखें फाड़े हवेली के गेट पर नज़र रखे हुए थे।

तभी झाड़ियों के पास कुछ हलचल हुई।
"अबे बिट्टू... वो देख!" लकी ने बिट्टू की कोहनी में अपनी कोहनी मारते हुए फुसफुसाया। "वो बूढ़ा हकीम वापस चला आ रहा है।"

बिट्टू ने अपनी आँखें सिकोड़ कर अँधेरे में देखा। सच में, हकीम लकड़द्दीन अपनी उसी 30 डिग्री झुकी हुई कमर और हाथ में बैग लिए हवेली के गेट से बाहर आ रहा था।

"हाँ बे... और वो साथ में दूसरा तगड़ा वाला बूढ़ा (ताऊजी) भी है," बिट्टू ने अपना शातिर दिमाग दौड़ाते हुए फुसफुसाया। ताऊजी हकीम को गाँव के रास्ते तक छोड़ने के लिए साथ निकले थे।

दोनों गुंडे अपनी झाड़ी में दुबके रहे जब तक कि ताऊजी और हकीम बात करते हुए उनके सामने से कच्ची सड़क पर दूर नहीं निकल गए।
"वो लड़का और लड़की तो पहले ही जा चुके हैं यहाँ से..." लकी ने अपनी ठोड़ी खुजाते हुए एक बहुत ही 'गहरा' ऑब्ज़र्वेशन दिया।

"तो इससे क्या समझा तू?" बिट्टू ने एक मास्टरमाइंड वाले अंदाज़ में लकी की तरफ देखा, जैसे वो उससे कोई बहुत बड़ा प्लान उगलवाना चाहता हो।

लकी का चेहरा खुशी से खिल उठा। "समझा ना भाई! इसका सीधा सा मतलब है कि यहाँ हवेली में अब कोई नहीं है। सन्नाटा है एकदम... तो चल, हम भी चलते हैं गाँव की तरफ। कुछ खाना-वाना खाते हैं, बड़ी ज़ोर की भूख लगी है यार!" लकी अपनी पैंट झाड़ते हुए खड़ा होने ही वाला था कि...
'चटाक.....!!'

सन्नाटे को चीरती हुई एक ज़ोरदार आवाज़ गूंजी। बिट्टू ने खींच कर एक करारा थप्पड़ लकी की खोपड़ी पर रसीद कर दिया।
"आउच... साले क्यों मारा?" लकी अपना सिर सहलाते हुए नीचे दुबक गया।
"अबे अक्ल के दुश्मन! दिमागी रूप से पैदल इंसान!" बिट्टू ने दाँत पीसते हुए गालियों की बौछार कर दी।

 "हवेली में कोई नहीं है... इसका मतलब ये नहीं कि हम ढाबे पर जाकर दाल-मखनी खाएं! इसका मतलब है कि अब हम आराम से अंदर जा सकते हैं! उस औरत को उठाएंगे, अपनी जीप में डालेंगे और चुपचाप बड़ा भाई को जाकर सौंप देंगे। अब घुसा कुछ तेरे भूसे वाले दिमाग में?"

लकी ने थप्पड़ की जलन को भुलाते हुए अपना 'जासूसी' दिमाग फिर से दौड़ाया। "समझ तो गया... लेकिन एक बात बता, तुझे कैसे पता कि अंदर वही औरत है? वही कादर की महबूबा?"

बिट्टू ने एक गहरी साँस ली, आसमान की तरफ देखा जैसे भगवान से रहम की भीख मांग रहा हो, और फिर लकी की तरफ मुड़कर...
'तड़ाक....!!' एक और ज़ोरदार जमाई। इस बार लकी के गाल पर।

"साले उल्लू के चरखे! तूने उस लड़के और लड़की को अभी कुछ देर पहले हवेली से बाहर जाते देखा था ना?" बिट्टू ने लकी का कॉलर पकड़ कर फुसफुसाते हुए पूछा।

"हाँ... देखा था ना भाई!" लकी ने अपना गाल सहलाते हुए रूँआसी आवाज़ में कहा।

"तो गधे! जब अभी देखा था, तो सुबह गाँव में भी तो उसी लड़के-लड़की को देखा था ना? मतलब ये वही लोग हैं जिनकी हमें तलाश है!" बिट्टू ने अपने लॉजिक का तीर छोड़ा।

लकी अभी भी संतुष्ट नहीं था। "वो सब तो ठीक है... लेकिन अंदर कोई दूसरी औरत भी तो हो सकती है ना? क्या पता कोई और हो?"

बिट्टू ने अपना सिर पीट लिया। "हे भगवान... किस मनहूस घड़ी में मैंने इस अनपढ़ से दोस्ती की थी! 

"ठीक है, ठीक है... मत मार," लकी ने चिढ़ते हुए कहा।
"सब बकवास छोड़ और चुपचाप अंदर चल! देखते हैं अंदर कौन औरत है। अगर कादर वाली हुई तो बोरी में डाल कर उठा लाएंगे, और अगर कोई और हुई तो चुपचाप उल्टे पाँव बाहर आ जाएँगे। बात ख़त्म!" बिट्टू ने आख़िरी फैसला सुनाते हुए झाड़ी से बाहर कदम रखा।

"तो मैं कब से क्या कह रहा हूँ? यही तो कह रहा हूँ मैं भी... और साला उल्टा मुझे ही गधा बोलता है!" लकी बडबडाता हुआ बिट्टू के पीछे हो लिया।

दोनों 'जेम्स बांड की नाजायज़ औलादें' दबे पाँव हवेली की चारदीवारी के पास पहुँचे।
"चल, मैं नीचे झुकता हूँ, तू मेरे कंधे पर पैर रख कर दीवार फांद जा," बिट्टू ने दीवार के सहारे झुकते हुए कहा।

लकी ने थूक निगला, बड़ी मुश्किल से हाँफते-कांपते बिट्टू के कंधे पर चढ़ा और पेट के बल हवेली की उस ऊँची और खुरदरी दीवार पर झूल गया। फिर उसने ऊपर से हाथ बढ़ाकर बिट्टू को भी खींच लिया। दोनों किसी तरह हाँफते हुए हवेली के आँगन में अंदर की तरफ गिरे।

धूल झाड़ते हुए जब दोनों ने सीना चौड़ा करके अपनी इस 'बहादुरी' पर नाज़ करने के लिए पीछे पलट कर देखा... तो दोनों के तोते उड़ गए।
हवेली का वो भारी लोहे का मेन गेट... हवा के झोंके से पूरा का पूरा खुला हुआ था।

"साले... गेट तो खुला था! तो दीवार से क्यों कूदे हम?" लकी ने अपनी पैंट की धूल झाड़ते हुए बिट्टू को घूरा।
बिट्टू ने झेंपते हुए अपनी कॉलर ठीक की, "अबे थ्रिलर... सस्पेंस नाम की भी कोई चीज़ होती है! सीधे गेट से घुसते तो गुंडे और मेहमान में क्या फर्क रह जाता? चल अब चुपचाप अंदर!"

दोनों अपनी बेवकूफी को छुपाते हुए, दबे पाँव उस अँधेरी हवेली के दालान की तरफ बढ़ने लगे,
****************


हवेली के उस बड़े से कमरे में अब सिर्फ कामिनी और वो भारी सन्नाटा बचा था।
कामिनी ने बिस्तर पर पड़े-पड़े आख़िरकार अपनी उन तेज़ और भारी साँसों पर काबू पा ही लिया,  हकीम लकड़द्दीन की उत्तेजक मालिश और अपनी आग को उसने किसी तरह अपने अंदर दबा लिया। उसके गोरे तलवों पर हकीम की गंदी और वहशी हरकत का वो चिपचिपा रस अब सूख कर पापड़ी की तरह जम गया था। 

"नहा लेना ही सही रहेगा... इस पसीने, गर्मी और इस एहसास से निजात पाने का बस यही एक सबसे सरल उपाय है," कामिनी ने गहरी साँस लेते हुए सोचा।

उसने बिस्तर के पास से अपना एक साफ़ ब्लाउज़, पेटीकोट और तौलिया उठाया और कमरे से बाहर दालान में आ गई। बाहर एकदम सन्नाटा था। घर का मुख्य दरवाज़ा अंदर से बंद था। कामिनी सीधे बाथरूम की तरफ बढ़ गई।
उसने अंदर जाकर नहाने के लिए जैसे ही नल घुमाया... एक सूखी सी 'घर्ररर...' की आवाज़ आई।

"ये क्या... पानी ही नहीं है?" कामिनी का ज़हन एक ही पल में फ्रस्ट्रेशन (frustration) से भर गया।
एक तो वो अधूरी हवस का भयंकर गुस्सा और ऊपर से ये नई परेशानी! उसे इस गाँव और यहाँ की इस पिछड़ी हुई ज़िंदगी से एक भयंकर चिढ़ सी मच गई। उसने बाहर आकर देखा, हवेली में फागुन और बंटी का भी कहीं अता-पता नहीं था। 

कुछ देर उसी चिढ़ में खड़े रहने के बाद, उसके दिमाग में एक ख्याल आया। उसे याद आया कि घर के आँगन से थोड़ा नीचे उतर कर बायीं तरफ एक पुराना हैंडपंप लगा हुआ है।

"वहीं चलती हूँ... इतनी रात गए इस सन्नाटे में बाहर कौन ही देखेगा मुझे," कामिनी ने मन ही मन खुद को तसल्ली दी।

उसने दालान का वो भारी दरवाज़ा खोला और बाहर खुले आँगन में कदम रखा।
बाहर आते ही... "ईस्स्स्स...." 

एक बेहद शानदार, ठंडी और ताज़ा हवा के झोंके ने कामिनी के पसीने से भीगे, तपते हुए जिस्म को जैसे अपने आगोश में ले लिया। उस हवा में खेतों की मिट्टी और रात की वो सोंधी महक थी। उस ठंडी हवा ने कामिनी के सुलगते हुए जिस्म और भारी दिमाग में एक जादुई सुकून भर दिया।

"कितनी अच्छी और शांत जगह है ये..." पल भर में ही कामिनी के ख्यालात पूरी तरह बदल गए थे। वो जो चिढ़ कुछ पल पहले बाथरूम में थी, वो इस ठंडी हवा के साथ जैसे कहीं उड़ गई थी।

कामिनी ने एक पीतल की बाल्टी उठाई और आँगन से नीचे उस कच्ची पगडंडी की तरफ चल दी। चारों तरफ घना अँधेरा था। आसमान से छनकर आती चाँद की वो दुधिया और मादक रौशनी ही उस सन्नाटे में उसका इकलौता सहारा थी। उस चाँदनी रात में कामिनी का वो गदराया हुआ रूप और भी निखर कर सामने आ रहा था।

रात का वो सन्नाटा, चाँद की वो रुपहली रौशनी और खेतों से आती वो मदहोश कर देने वाली ठंडी हवा... कामिनी को ये जगह अब वाकई बहुत खूबसूरत और जादुई लग रही थी। उसका मन एकदम हल्का हो गया, और वो बेपरवाह होकर पगडंडी पर आगे बढ़ गई,


क्रमशः 



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4 Comments

  1. Hot update bhai ye lakduddin to kamini ke samne tik nahi paya kuch dava khakar to ajata ab dekhte hai age kya hota hai kahi ye harami lucky na utha le jaye kamini ko

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  2. Waah bhai waah
    Maan Gaye aapko
    Yahi to manze writer ki nishani hai
    Kamini ko aapne use buddhe, 30° zuke hue hakim ko nahi saupa
    Kamini ko sirf tagde mard se chudwana
    Jo uski hawas mita sake
    Line me ab tauji khade hai
    Jaldi se koi dhamaka kar do
    Rahi baat bunty ki uska bi beda paar Kara Dena.
    Fagun bhi kamini ki beti hai upar se thandi dikhti hai
    Uske andar ka josh bunty nikalega
    Pehli chudai ka maza alag hi hota hai

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  3. Bunty & Tau Ji dono se kamini aur Fagun dono ki chudai krvao khuli khet me.

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  4. Movie ke akhari scene tak wahi director bandh ke rakh sakta hai jo audience ko end tak guess karne nahi deta
    Yahi khubi lord haram bhai me hai
    Kya twist laate ho aap
    Regular reader bhi aap ki nas nahi pakad sakte
    Kahani me bilkul bhi koi fault nahi dhund sakta
    Har character ekdam satik
    Master of peak detailing 👍

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