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कामिनी 2.0, भाग -18

मेरी माँ कामिनी 2.0 - अध्याय- 18
 
शहर के एक सरकारी अस्पताल के जनरल वार्ड में फिनाइल और दवाइयों की मिली-जुली बदबू तैर रही थी। उसी वार्ड के कोने वाले बेड पर लकी और बिट्टू पट्टियों में लिपटे, किसी अधमरी लाश की तरह पड़े कराह रहे थे। कादर के खौफ़नाक हाथों ने इनकी एक-एक हड्डी का जो भुर्ता बनाया था, उसकी टीस अब होश आने के बाद दिमाग़ फाड़ रही थी।

"हाय रे... उईई माँ... इतना मारा है साले ने कि जिस्म की एक-एक नस चीख रही है," लकी अपना सूजा हुआ मुँह खोलकर कराह रहा था।
इन दोनों को बस थोड़ी देर पहले ही होश आया था।
"सालों निक्कमो ! रोना बंद करो... और शुक्र मनाओ कि बेहोश होने से पहले तूने मुझे फ़ोन कर दिया था," एक बेहद भारी, फटी हुई और खौफ़नाक आवाज़ वार्ड के सन्नाटे में गूँजी।

सामने बेड के पास 'सुलेमान' खड़ा था, "बड़ा भाई" का सबसे खूँखार आदमी। करीब 6.5 फ़ीट का वो चलता-फिरता दानव था। रंग कोयले जैसा काला था, चेहरे पर एक लंबी, खुरदरी दाढ़ी और मोटे, काले होंठों के बीच एक सुलगती हुई बीड़ी दबी हुई थी।
 उसने एक ढीला-ढाला सफ़ेद कुर्ता-पाजामा पहना हुआ था, जिसमें से उसकी चौड़ी, बालों से भरी छाती और लोहे जैसी मज़बूत बाजुएँ साफ़ झाँक रही थीं। अस्पताल में बीड़ी पीना मना था, लेकिन किसी की हिम्मत नहीं थी कि उस यमराज को टोक सके।

"वो... वो... सुलेमान भाई... आईडिया मेरा ही था आपको फ़ोन करने का," लकी ने दर्द के बीच भी ख़ुद क्रेडिट लेने की चापलूसी की।

"चुप हरामखोरो!" सुलेमान ने एक ज़ोरदार, दबी हुई डाँट लगाई, जिससे लकी की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई, "सालों, अच्छा है कि मार खाने के बाद सरकते हुए झाड़ियों में छुप गए थे। वरना अगर कादर की नज़र पड़ जाती, तो अभी तुम्हारी लाशों को हवेली के बाहर कुत्ते नोच-नोच कर खा रहे होते!"
सुलेमान उन दोनों पर बुरी तरह बरस रहा था। लेकिन लकी और बिट्टू की भी दाद देनी पड़ेगी कि वो कादर खान जैसे यमराज के हाथों से भी किसी तरह बचकर फिर से ज़िंदा लौट आए थे।

दोनों ने अपनी जान बख्शवाते हुए सुलेमान को सारी कहानी हू-ब-हू सुना दी। कादर कहाँ है, कैसे उसने मारा, और सबसे बड़ी बात... वो औरत, जो कादर के साथ उस हवेली में है।
लकी और बिट्टू अभी भी 'कामिनी' का नाम नहीं जानते थे, इसलिए उन्होंने सुलेमान को सिर्फ़ उसका हुलिया बताया।

"सुलेमान भाई..." बिट्टू दर्द से कराहते हुए बोला, लेकिन उस दर्द के बीच भी उसकी आँखों में एक हवस भरी चमक आ गई, "उस पूरे गाँव में, उस हवेली में एक ही औरत है... एकदम चमकती-धमकती! गोरा चिट्टा, गदराया हुआ बदन... कसम से भाई, ऐसी मादक माल है कि देखते ही मुर्दे का भी लंड खड़ा हो जाए!"
कामिनी के भरे-पूरे, मांसल जिस्म को याद करते ही बिट्टू की ठरक इस कदर जाग उठी कि वो अपने दूसरे हाथ से पैंट के ऊपर से ही अपना लंड सहलाने लगा।

"हट मादरचोद! हाथ टूट कर गले में लटक गया है, लेकिन साले तेरी ठरक नहीं गई!"
'छत्ताक्क्...!'
सुलेमान ने अपनी भारी, लोहे जैसी हथेली सीधा बिट्टू के  प्लास्टर बँधे, टूटे हुए हाथ पर दे मारी।
"आआआआह्ह्ह्ह.... भाई... उईईईई... आप...!" बिट्टू दर्द से बुरी तरह बिलबिला उठा।
"आप... आप मान नहीं रहे सुलेमान भाई," बिट्टू ने दर्द से सिसकते हुए, दाँत पीस कर कहा, "आप ख़ुद जाकर देख लो उसे... उसे देखकर आपकी ख़ुद की उसकी चुत चाटने की इच्छा ना कर जाए तो कहना...!"
बिट्टू की इस बात ने कमरे का माहौल एकदम से बदल दिया।
सुलेमान का खौफ़नाक, काला चेहरा अब पत्थर की तरह कठोर होता चला गया। उसने अपनी बीड़ी का एक आख़िरी, गहरा कश खींचा और धुआँ हवा में छोड़ते हुए उसके होंठ कुछ बुदबुदाए।

"हूँ... जाना ही पड़ेगा..." सुलेमान की आँखों में अब एक खूँखार शैतान जाग चुका था, "उस कादर की मौत आई है मेरे हाथों... कादर मरेगा, और उसकी खूबसूरत औरत...  मेरी रांड बनेगी!"
"उस औरत के लिए बड़ा भाई से दगाबाज़ी कर गया "

सुलेमान ने अधजली बीड़ी को फर्श पर फेंका और अपने भारी जूते के नीचे कुचल दिया। वो पलटा और तेज़, भारी कदमों से वॉर्ड के बाहर की तरफ़ चल पड़ा।
'ठाक... ठाक... ठाक...'
अस्पताल के ठंडे गलियारे में सुलेमान के भारी जूतों की वो गूँज, हवेली की तरफ़ बढ़ने वाले एक नए और ख़तरनाक तूफ़ान का ऐलान कर रही थी।

**********************

शाम के 5 बज चुके थे। हकीम लकड़द्दीन के दवाखाने के बाहर गाँव की संकरी गली में हल्की-हल्की शाम की लालिमा फैलने लगी थी। बाहर वो पुराना खटखटाता हुआ ऑटो खड़ा था, जो अब सामान से पूरी तरह भर चुका था। उसके ठीक पीछे एक लोडिंग ऑटो (छोटा हाथी) भी खड़ा था, जिस पर कल के मृत्युभोज के लिए टेंट का भारी सामान लदा हुआ था।

'चररर...' दवाखाने का लकड़ी का दरवाज़ा खुला और कामिनी बाहर आई।
उसे बाहर आते देख ताऊजी की आँखें फटी की फटी रह गईं। कामिनी का चेहरा पहले से कहीं ज़्यादा खिला हुआ और लाल था। उसके चेहरे पर पसीने की एक हल्की सी चमक थी, जो उसे और भी मादक बना रही थी। लेकिन सबसे बड़ा बदलाव उसकी चाल में था। सुबह जो औरत दर्द से कराहते हुए, पैर घसीट कर चल रही थी... अब उसकी चाल में कोई अकड़न नहीं थी, बल्कि एक नागिन जैसी लचक थी। चलते वक़्त उसकी भारी, चौड़ी गांड साड़ी के अंदर किसी रबर के गोले की तरह मदमस्त होकर लहरा रही थी।

"अब कैसा लग रहा है बहू?" ताऊजी ऑटो से बाहर उतरे और अपनी भूखी नज़रों को कामिनी की मटकाई हुई गांड पर गड़ाते हुए उसे अंदर बैठने का इशारा किया।

"बहुत अच्छा लग रहा है ताऊजी..." कामिनी की आवाज़ में इस बार कोई शर्म, कोई झिझक या हया का पर्दा नहीं था। वो एकदम चहकती हुई और आत्मविश्वास से भरी आवाज़ में बोली। हकीम की 'अंदरूनी मालिश' ने उसका सारा डर और संकोच निचोड़ कर बाहर फेंक दिया था।

"हूँ... हकीम लकड़द्दीन के पास सच में कोई जादू है..." ताऊजी ने अपने गंदे दाँत पीसते हुए, कामिनी के उभरे हुए सीने को देखकर मन ही मन बुदबुदाया, "बस साला... मेरी बीमारी का ही कोई इलाज नहीं है इसके पास।"

कामिनी ऑटो में चढ़ने के लिए मुड़ी। साड़ी में कसी हुई उसकी चौड़ी और खिली हुई गांड ताऊजी की आँखों के ठीक सामने थी। ताऊजी बिना पलक झपकाए उस गदराए उभार को घूर रहे थे।
बंटी ऑटो में आगे ड्राइवर के पास बैठा था। ऑटो के साइड शीशे (Mirror) से उसकी पारखी नज़रें भी अपनी माँ के चेहरे और उसकी चाल में आए इस अचानक बदलाव को बहुत गहराई से पढ़ रही थीं। कामिनी के जिस्म से उठती  मादक महक बंटी की नाक तक भी पहुँच रही थी।

'भुर्रर्रर्र...' ऑटो चालू हुआ और हवेली की तरफ़ चल पड़ा।
रास्ता वही सुबह वाला ऊबड़-खाबड़ और गड्ढों से भरा था। लेकिन इस बार का सफर कामिनी के लिए बिल्कुल अलग था। सुबह जो हिचकोले उसे दर्द दे रहे थे, इस बार वही ऑटो के धक्के उसे परेशान नहीं कर रहे थे... बल्कि उसके जिस्म में एक मीठी सी मादकता घोल रहे थे।

 जब भी ऑटो किसी गहरे गड्ढे में उछलता, कामिनी को अपनी गांड के छेद में गहराई तक फँसी हुई अर्क में भीगी 'रुई' का तीखा अहसास होता। एक झटके से रुई अंदर चुभती, और दूसरे झटके से वो अपनी जगह से हटकर एक नशीली गुदगुदी कर जाती। ये अजीब सी छुअन कामिनी की शांत हो चुकी चुत में फिर से एक मीठी सी खुजली पैदा कर रही थी।

"आपकी कौन सी बीमारी ताऊजी?" ऑटो के शोर के बीच कामिनी ने अचानक ताऊजी से सवाल कर दिया।
शायद कामिनी ने उनकी वो बुदबुदाहट सुन ली थी।
ताऊजी का दिल धक से रह गया।
"वव... वो... वो बहू... वो बहुत पुरानी बीमारी है। छोड़ो... बताऊँगा कभी," ताऊजी ने बुरी तरह सकपकाते हुए अपना पल्ला झाड़ा।

ये वक़्त सही नहीं था और वैसे भी उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि कामिनी इतनी बेबाक होकर सीधा सवाल दाग देगी।
ऑटो अपनी रफ़्तार से उछलता-कूदता आगे बढ़ रहा था। आगे से बंटी पीछे मुड़-मुड़ कर बता रहा था कि उसने टेंट वाले से क्या-क्या सामान लिया है, खाने-पीने का क्या इंतज़ाम है।
"हाँ... हाँ... ठीक है बिटवा," ताऊजी बंटी की बातों में हाँ में हाँ मिला रहे थे। लेकिन उनका सारा ध्यान तो कहीं और ही था।
ऑटो के हर हिचकोले के साथ कामिनी के भारी, गदराए स्तन बुरी तरह उछल रहे थे, और उसका भरा-पूरा जिस्म झटके खा रहा था। ताऊजी अपनी ठरकी नज़रों से कामिनी के उछलते और काँपते हुए जिस्म को घूरते हुए, मन ही मन ठंडी आहें भर रहे थे।
****************

हवेली पहुँचने के बाद कामिनी सीधे गुसलखाने (बाथरूम) में गई और ठंडे पानी से जी भर कर नहाई। हकीम लकड़द्दीन के चिपचिपे लाल तेल, पसीने और हवस की गाढ़ी गंध को पानी ने धो दिया, लेकिन जिस्म के अंदर जो रूहानी सुकून और निखार वो बूढ़ा दे गया था, वो अब कामिनी के चेहरे से साफ़ छलक रहा था।

नहा-धोकर, एक साफ़-सुथरी और हल्की सूती साड़ी पहनकर जब कामिनी हवेली के आँगन में आई, तो मानो चाँद ज़मीन पर उतर आया हो। उसका गदराया बदन एकदम तरोताज़ा और खिला-खिला सा लग रहा था।
शाम ढल रही थी। आँगन में एक बड़ी सी चटाई पर गाँव की कुछ औरतें बैठी बतिया रही थीं, जिनमें कमला और प्रमिला भी शामिल थीं। कल के मृत्युभोज की तैयारियों को लेकर हवेली में चहल-पहल थी, लेकिन औरतों की इस मंडली का मुख्य केंद्र सिर्फ़ और सिर्फ़ 'कामिनी' ही थी।
"अरे बहू रानी, आज तो चेहरा एकदम गुलाब की तरह खिल रहा है! क्या बात है, शहर का निखार गाँव की आबोहवा में और भी चमकने लगा है," कमला ने अपनी पान चबाती हुई लाल बत्तीसी दिखाते हुए कहा।
"सच में जीजी! गोरा रंग तो देखो... नसें तक नीली-नीली झाँकती हैं। शहर की औरतें सच में बहुत नाज़ुक और खूबसूरत होती हैं," गांव कि एक औरत ने कामिनी की गोरी बाँहों को देखते हुए हाँ में हाँ मिलाई।

कामिनी उनके बीच बैठी बस एक हल्की सी, बनावटी मुस्कान ओढ़े सब सुन रही थी।
तभी एक दूसरी अधेड़ औरत ने आँख मारते हुए मज़ाक किया, "अरे निखार क्यों ना आए? जवाँ और खूबसूरत लुगाई को देखकर हमारे रमेश बाबू तो रात में उन्हें एक पल के लिए भी छोड़ते नहीं होंगे... क्यों बहू रानी?"

यह सुनते ही सारी औरतें 'खिलखिला' कर हँस पड़ीं।
कामिनी ने हया का नाटक करते हुए अपना पल्लू थोड़ा और खींच लिया और अपनी नज़रें झुका लीं। लेकिन अंदर ही अंदर उसका दिमाग़ चीख रहा था।
"क्या बताऊँ इन गँवार औरतों को?" कामिनी सिर्फ मुस्कुरा कर रह गई.

धीरे-धीरे सूरज पूरी तरह डूब गया और गाँव पर रात का गहरा, काला अँधेरा छाने लगा।

इधर कामिनी हवेली में औरतों के बीच फँसी थी, और उधर दूसरी तरफ़... फ़ौजा सिंह की हवेली  में शराब की महफ़िल सज चुकी थी। जुर्म, लालच और माफ़िया का गठजोड़ चल रहा था।

काँच के गिलासों के टकराने की आवाज़ और महँगी शराब की गंध कमरे में फैली हुई थी।
"फ़ौजा सिंह जी, 'बड़ा भाई' के आदमियों का यहाँ आना... मतलब मुसीबत का सीधा-सीधा सबब है," शमशेर ने व्हिस्की का एक कड़क पेग बनाते हुए, माथे पर सिलवटें डालकर कहा।

"क्या मुसीबत?" फ़ौजा सिंह ने अपने पेग का एक बड़ा घूँट हलक के नीचे उतारा। उसके सिर पर सफ़ेद पट्टी अभी भी बँधी हुई थी, जो कल रात के हादसे का सबूत थी, लेकिन उसकी आँखों में खौफ़ नहीं, ग़ुरूर था।

 "हम कोई चूड़ियाँ पहन के बैठे हैं क्या जो किसी से भी डर जाएँगे? बड़ा भाई होगा अपने इलाके का, यहाँ तो फ़ौजा सिंह का ही सिक्का चलता है।"
इसी महफ़िल में एक कोने की कुर्सी पर रमेश भी बैठा था। उसके हाथ में शराब का गिलास था, लेकिन उसका चेहरा डरा हुआ था। वो बिल्कुल चुतियों की तरह आँखें फाड़े कभी फ़ौजा को, तो कभी शमशेर को देख रहा था।

"साला... मुझे तो समझ ही नहीं आ रहा कि ये सब चल क्या रहा है? ये 'बड़ा भाई' कौन है और उसके आदमी हमारे पीछे क्यों पड़े हैं?" रमेश ने अपनी घबराहट ज़ाहिर की।
शमशेर ने अपनी बड़ी-बड़ी मूँछें मरोड़ते हुए एक गहरी साँस ली और सामने बैठे कादर खान की तरफ़ देखा।
"अरे भाई, सीधी सी बात है। कादर पहले 'बड़ा भाई' के लिए ड्रग्स की सप्लाई करता था। अब कादर फ़ौजा सिंह के लिए ड्रग्स सप्लाई कर रहा है... हमारा काम सँभाल रहा है। तो उसका भड़कना तो लाज़िमी है ना!"

रमेश के चेहरे पर अब डर और भी साफ़ दिखने लगा। रमेश लालची ज़रूर था, लेकिन अंदर से अव्वल दर्जे का डरपोक था। उसे बिना मेहनत और ख़तरे के पैसे चाहिए थे।
"यार... मुझे तो ये सब बहुत ख़तरनाक लगता है। गोलियाँ चल रही हैं, मार-काट मच रही है..." रमेश ने अपना गिलास टेबल पर रखते हुए कहा।

"अच्छा?" शमशेर ने तुरंत चुटकी ली और एक ज़हरीली मुस्कान के साथ बोला, "जब बिना कुछ किए लाखों रुपए बटोरते वक़्त तिजोरी भरते हो, तब तो कुछ ख़तरनाक नहीं लगता रमेश बाबू?"
रमेश इस ताने पर झेंप कर चुप हो गया।
वहीं पास की कुर्सी पर कादर खान खामोश बैठा था। उसके हाथ में गिलास था, पर वो पी नहीं रहा था। उसका दिमाग़ किसी बहुत ही गहरी उलझन में था।

"कहाँ मैं शहर छोड़ कर यहाँ आ गया ..." कादर ने मन ही मन सोचा। "कामिनी से मिलने के बाद, मैंने सोचा था कि अब से ये माफ़िया, ये मौत का धंधा सब छोड़ दूँगा। एक नई ज़िंदगी शुरू करूँगा... लेकिन ये जुर्म की दुनिया इंसान को कभी आज़ाद नहीं करती। साला... कुएँ से निकल कर सीधा खाई में कूद गया हूँ मैं!"

"क्या भाई कादर... क्या सोच रहे हो इतनी गहराई में?" फ़ौजा सिंह की भारी आवाज़ ने कादर के ख्यालों का सिलसिला तोड़ दिया।
"कक्क... कुछ नहीं," कादर अपने विचारों से झटके से बाहर आया और उसने गिलास मुँह से लगा लिया।
कादर दारू नहीं पीता था उसकी ग्लास मे कोला थी.

"खैर छोड़ो इन सब बातों को," फ़ौजा सिंह ने बात का रुख़ बदलते हुए रमेश की तरफ़ देखा, "रमेश बाबू, कल की तैयारी हो गई सारी? गाँव वालों को कोई कमी नहीं होनी चाहिए।"

"हाँ... हाँ फ़ौजा सिंह जी," रमेश ने तुरंत हामी भरी, "सब सामान आ गया है। टेंट लग रहा है और कल सुबह तड़के से ही हलवाई खाना बनाने बैठ जाएँगे। मृत्युभोज में कोई कसर नहीं छूटेगी।"

****************


रात के 9 बज चुके थे। हवेली में अब एक अजीब सा, भारी सन्नाटा पसरने लगा था। शाम का खाना कमला काकी के यहाँ से आ गया था, और फागुन और बंटी वहीं कमला के घर ही खाना खाने चले गए थे। इक्का-दुक्का जो गाँव की औरतें आँगन में बैठी बतिया रही थीं, वो भी कोई पाँच मिनट पहले ही अपने-अपने घर लौट चुकी थीं।
हवेली में अब सिर्फ़ कामिनी और दालान में अपनी खटिया पर लेटे ताऊजी ही बचे थे।
तभी... हवेली के भारी लोहे के दरवाज़े पर किसी के लड़खड़ाते कदमों की आहट हुई।
'धड़... धड़...'
रमेश नशे में पूरी तरह धुत्त, अपने ही पैरों में उलझता हुआ हवेली के दरवाज़े पर आ पहुँचा। वो इतना पिए हुए था कि उससे सीधा खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था।
ताऊजी ने उसे देखते ही अपनी खटिया छोड़ी और लपक कर उसे सँभालने दौड़े।
"अरे... अरे... ठीक तो है ना रमेश बिटवा?" ताऊजी ने रमेश को अपने कंधों का सहारा देते हुए पुकारा।
फिर आँगन की तरफ़ मुँह करके ताऊजी ने ज़ोर से आवाज़ लगाई, "अरे बहू... ओ बहू! जल्दी आ, रमेश बिटवा आ गए।"

आवाज़ सुनते ही कामिनी भागती हुई आँगन में आई। रमेश को ताऊजी के कंधों पर झूलते देख, कामिनी को बिल्कुल भी हैरानी नहीं हुई। उसे जिस बात की उम्मीद थी, रमेश की बिल्कुल वही हालत थी।
"आइए... अंदर कमरे में चलिए, मैं खाना लगा देती हूँ," कामिनी ने आगे बढ़कर रमेश को सँभालना चाहा।
लेकिन रमेश ने झटके से कामिनी का हाथ झटक दिया। उसकी आँखें शराब के नशे से खून की तरह लाल हो रही थीं और साँसों से शराब की भभक आ रही थी।
"ताऊ... तू जा अब यहाँ से!" रमेश ने ताऊजी की तरफ़ बिना देखे, एक भारी और बदतमीज़ लहज़े में हुक्म दिया।
ताऊजी का खुरदरा चेहरा एक पल के लिए तना, लेकिन वो बिना कुछ बोले चुपचाप वापस दालान की तरफ़ खिसक गए। लेकिन उनकी नज़रें लगातार रमेश और कामिनी के कमरे की तरफ़ ही टिकी रहीं।

रमेश लड़खड़ाता हुआ, दीवारों का सहारा लेता हुआ हवेली के अंदरुनी हिस्से में अपने कमरे की तरफ़ बढ़ा। कामिनी एक डरी हुई, आज्ञाकारी पत्नी की तरह सिर झुकाए उसके पीछे-पीछे कमरे में दाखिल हुई।
कमरे में घुसते ही रमेश अचानक पलटा।

"दरवाज़ा बंद कर!" रमेश ने फुफकारते हुए, एक खौफ़नाक आवाज़ में ऑर्डर दिया।
कामिनी का सीना 'धक' से रह गया। वो रमेश की इन लाल आँखों और इस दरिंदगी भरी आवाज़ का मतलब बहुत अच्छी तरह समझती थी। 

कामिनी के हाथ काँपने लगे। उसने उन काँपते हाथों से कमरे की भारी कुंडी चढ़ा दी।
'खटाक्क...!'


कामिनी ने जैसे ही काँपते हाथों से दरवाज़े की कुंडी चढ़ाई और पलटी... रमेश सामने लड़खड़ाता हुआ खड़ा था, और अपनी लाल, नशे में धुत आँखों से कामिनी को ऐसे घूर रहा था जैसे कोई कसाई अपने शिकार को देखता है।
"साली, मैं देख रहा हूँ जब से तू यहाँ गाँव आई है, बहुत ज़्यादा खिल गई है... बता, किस से चुदवा रही है?" रमेश ग़ुस्से में अपनी औकात पर आ गया था। नशे में उसका यही रवैया होता था—ज़लील करना, गालियाँ बकना और अपनी नामर्दी का गुस्सा उतारना।

'चुदवाने' की बात सुनते ही कामिनी सन्न रह गई। एक पल को तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। क्या रमेश को सब पता चल गया? कहीं फ़ौजा सिंह या उस बूढ़े हकीम ने कुछ बता तो नहीं दिया? कामिनी के दिल की धड़कनें मानो रुक सी गईं। उसे लगा कि आज तो उसकी मौत पक्की है।

"ये... ये... ये क्या कह रहे हैं आप? होश में आइए..." कामिनी ने जैसे-तैसे ख़ुद को सँभालते हुए कहा। उसकी आवाज़ बुरी तरह काँप रही थी।

"तो बता ना... इतना कैसे खील गई तू? तेरी गांड चलते वक़्त इतनी क्यों लचक रही है? साली गांड मरवा के आई है कहीं से... मुझे तो आज तक गांड नहीं दी तूने!" रमेश ने एक कदम आगे बढ़ाते हुए फुफकारा।

कामिनी को काटो तो ख़ून नहीं। उसका गुलाबी जिस्म डर के मारे सफ़ेद पड़ने लगा। अब उसे पूरा यक़ीन होने लगा था कि हकीम के साथ हुई 'अंदरूनी मालिश' की बात रमेश तक पहुँच चुकी है।
"कक्क... क्या बोल रहे हैं? मैं... मैं कहाँ जाऊँगी?" कामिनी ख़ुद को बचाने की आख़िरी कोशिश कर रही थी। "वो... वो आज गर्मी बहुत थी, तो मैंने पैंटी नहीं पहनी... इसलिए साड़ी में चाल वैसी लग रही होगी..."
चोर की हालत ऐसी ही होती है, उसे हमेशा पकड़े जाने का डर सताता है। कामिनी सफाई दे रही थी, पर उसकी साँसें अटकी हुई थीं।

"हाँ साली... सही कह रही है तू! तू कहाँ गांड मराने जाएगी... तू तो एक नंबर की 'ठंडी औरत' है! मर्द को कैसे ख़ुश करते हैं, ये तो तुझे पता ही नहीं है।" रमेश लड़खड़ाता हुआ कामिनी के बिल्कुल क़रीब आ गया।
"बताओ... तुझे ये भी नहीं पता कि चड्डी कब और कैसे पहनते हैं!"
यह कहते हुए रमेश ने कामिनी की साड़ी का किनारा पकड़ा और एक झटके में पूरी ताक़त से खींच दिया।

'सर्रर्र...' कामिनी का पल्लू झटके से नीचे गिर गया।
लाल कसी हुई ब्लाउज़ में कामिनी के भारी, गदराए स्तन एकदम से उभर कर सामने आ गए। डर और उमस के कारण उसके गोरे सीने और गहरी दरार के बीच पसीने की बूँदें मोतियों की तरह चमक रही थीं और धीरे-धीरे नीचे की तरफ़ बह रही थीं।

"तुझसे अच्छी तो इस गाँव की गँवार औरतें हैं! कम से कम दिन भर खेतों में मेहनत करने के बाद रात को अपने मर्दों को ख़ुश तो करती हैं। एक तू है... दिन भर घर में महारानी की तरह पड़ी रहती है, फिर भी मुझे ख़ुश नहीं कर सकती!" रमेश नशे में कामिनी को बुरी तरह बेइज़्ज़त कर रहा था।

उस अभागे नामर्द को क्या पता था कि यहाँ सिर्फ़ एक वही इंसान है जो अपनी ही बीवी की सुलगती हुई हवस और कामुकता को कभी देख ही नहीं सका। और अगर देख भी लेता तो क्या कर लेता? इस 'आग' को बुझाने की औकात तो उसमें वैसे भी नहीं थी।

"अअअअअआआआह्ह्ह्ह..... धीरे!" कामिनी के मुँह से बेसाख़्ता एक सिसकी निकल गई।
रमेश ने बातों ही बातों में अपने सख़्त, खुरदरे हाथों से कामिनी के ब्लाउज़ में कसे हुए स्तनों को पूरी ताक़त से भींच दिया था। उसका दबाव इतना जालिमाना था कि कामिनी का नरम माँस दब कर बुरी तरह दुखने लगा।

लेकिन... यहीं पर कामिनी का एक दूसरा, बेहद खौफ़नाक और मादक चेहरा सामने आया।
इस दर्द, इस अपमान और रमेश की इन भद्दी गालियों ने कामिनी को रुलाया नहीं, बल्कि उसके जिस्म में एक अजीब सी 'उत्तेजना' की लहर दौड़ा दी। उसे ज़लील होने में, रंडी कहलाने में और इस शारीरिक दर्द में एक अलग ही मज़ा आने लगा था।

उसने रमेश के हाथ को हटाया नहीं, उसे झिड़का नहीं... बल्कि अपनी भारी साँसों और काँपते होंठों के बीच सिर्फ़ इतना कहा "आआह्ह... धीरे..."

ये लफ़्ज़ किसी विरोध के नहीं थे, बल्कि उस दर्द को और गहराई से महसूस करने की एक कामुक दावत थे। कामिनी की दोनों जाँघें अपने आप कस गईं और उसकी वो बिना पैंटी की नंगी चुत इस अपमानजनक दर्द के बीच एक बार फिर से गीली होने लगी थी।

"साली रंडी, नाटक करती है! इतने बड़े-बड़े दूध ले के घूमती है और बोलती है दर्द होता है!"
रमेश नशे में पूरी तरह अंधा हो चुका था। वो मुँह से गंदी-गंदी गालियाँ बक रहा था, बार-बार 'रंडी' बोल रहा था और अपने खुरदरे हाथों से कामिनी के भारी स्तनों को ब्लाउज़ के ऊपर से ही कस-कस कर भींच रहा था।

कामिनी की हालत ख़राब थी। वो दर्द से हाँफ रही थी, लेकिन उसकी बढ़ती हवस, उसके जिस्म कि गर्मी ने दिमाग़ में एक ऐसा मादक ज़हर घोल दिया था कि उसे रमेश का ये जानवर बनना... ये बेदर्दी... अंदर ही अंदर बहुत अच्छा लग रहा था। दर्द में उसे एक अजीब सा सुकूँ मिल रहा था।

कामिनी के काँपते हाथ ख़ुद ही उठकर रमेश के सख़्त हाथों पर जा टिके। लेकिन उसने रमेश के हाथों को हटाया नहीं, बल्कि उन्हें अपने स्तनों पर और गहराई से दबाने के लिए एक सही दिशा दे दी।
"आआआह्ह्ह..... हाँ... कस के... ज़ोर से..." कामिनी के होंठों से एक नशीली कराह निकल गई।
'चटाक्क्... चटाक्क्...!'

"साली... मुझे सिखाएगी तू?" रमेश ने अपना हाथ उठाया और पूरी ताक़त से दो ज़ोरदार थप्पड़ कामिनी के उन गदराए स्तनों पर जड़ दिए।

"आआआआह्ह्ह्ह... उईई माँ...!" कामिनी दर्द से बिलबिला उठी। थप्पड़ की उस भयानक झनझनाहट, अपमान और काम-उत्तेजना के मिले-जुले असर से कामिनी की नंगी चुत अचानक कामरस से चूने लगी।

 उसका पूरा जिस्म किसी कमान की तरह ऐंठ गया।
रमेश की हैवानियत अब सातवें आसमान पर थी। उसने झटके से कामिनी के लाल ब्लाउज़ को आगे से, ठीक कॉलर के पास से अपनी मुट्ठी में जकड़ा और एक ही भयानक झटके में अपनी तरफ़ खींच दिया।
'चररर... फटाक्क्... तड़... तड़...!'

मज़बूत सूती कपड़ा एक ही झटके में बीच से चीरता हुआ खुल गया। ब्लाउज़ के सारे बटन टूट कर हवा में उछले और 'छन्न-छन्न' करते हुए ज़मीन पर बिखर गए। 24860374

कामिनी ने अंदर ब्रा नहीं पहनी थी। ब्लाउज़ के उस आख़िरी बंधन के टूटते ही, उसके दूधिया, भारी और गदराए हुए स्तन आज़ाद होकर हवा में नाचने लगे। थप्पड़ की मार और हवस की आग से उसके स्तन बिल्कुल लाल पड़ गए थे और उनके बीच मौजूद काले निप्पल किसी लोहे की कील की तरह तन कर बिल्कुल कड़क हो चुके थे।

रमेश उन उन्नत, फैले हुए स्तनों को देखकर ख़ुद को रोक ना सका। उसने झट से अपने दोनों हाथों की उँगलियों से कामिनी के तने हुए निप्पलों को पकड़ा और उन्हें बेदर्दी से खींचने लगा... वो उन्हें इस कदर मरोड़ कर बाहर की तरफ़ खींच रहा था जैसे उन्हें नोंच कर जिस्म से अलग ही कर देगा।
"आआआआह्ह्ह्ह...... ईईईस्स्स्स... माऽऽऽ... मर गई...!"  कामिनी दर्द की इंतहा से सिहर उठी। उसकी साँसें अटक गईं।
"साली रंडी... छिनार! ये इतने बड़े-बड़े दूध सिर्फ़ दिखाने को रखे हैं क्या? बंटी को पिलाती नहीं थी क्या, जो अभी भी इतने कड़क और तने हुए हैं?" रमेश ने अपनी कुंठा में अपनी ही बीवी को ज़लील करते हुए बकवास की।
'चटाक्क्... चटाक्क्...!'

गाली देने के साथ ही रमेश ने फिर से दो ज़ोरदार थप्पड़ कामिनी के दोनों नंगे स्तनों पर दे मारे। 6773536
"आआआह्ह्ह... आउचम... उउउम्मम्म्म!"
थप्पड़ की गूँज और दर्द के बीच, रमेश के मुँह से निकले एक नाम ने कामिनी के दिमाग़ में एक भयानक कामुक विस्फोट कर दिया।
"प... प... पिलाया है... बंटी ने पिया है मेरा दूध..." कामिनी दर्द से हाँफते हुए, सिसकते हुए बोल तो गई... लेकिन 'बंटी' का ज़िक्र आते ही उसके जिस्म में एक खौफ़नाक बिजली दौड़ गई।

बंटी का नाम सुनते ही उसके निप्पल जो पहले से ही कील बने हुए थे, वो और भी ज़्यादा कड़क, तने हुए और कठोर हो गए। हवस के गहरे अँधेरे में कामिनी के दिमाग़ में ना जाने कहाँ से एक बेहद अश्लील और विरोधी (Taboo) ख़याल आ गया "क्या बंटी... इतने साल बाद... अब इतना बड़ा होने के बाद... क्या वो अभी भी इनमें से दूध पी सकता है? अगर बंटी का मुँह यहाँ लग जाए तो...?"

अपने जवान बेटे के लिए ऐसा 'पाप' भरा विचार दिमाग़ में आते ही कामिनी की फूली हुई चुत बुरी तरह फड़कने लगी। उसके अंदर कामरस का एक नया सैलाब कुलबुलाने लगा।

"फिर ऐसा क्या करती है रांड कि तेरे दूध इतने तने हुए हैं? मुझे पिला साली!"
रमेश ने गंदी गालियाँ बकते हुए अपना शराबी, बदबूदार मुँह कामिनी के भारी स्तनों की गहरी घाटी में धँसा दिया। वो किसी जंगली कुत्ते की तरह कामिनी के स्तनों के नरम माँस को नोचने लगा। उन कड़क निप्पलों को अपने दाँतों से काट रहा था, उन्हें बेरहमी से चूस रहा था और अपने खुरदरे हाथों से माँस को कस-कस कर दबा रहा था।

"आआआआह्ह्ह्ह... उईईई... आआह्ह्ह...!" कामिनी दर्द से बिलबिला रही थी, दिवार से सटी छटपटा रही थी। उसके स्तन रमेश के दाँतों से कट कर लाल हो रहे थे।
लेकिन... यही तो नियति का सबसे खौफ़नाक बदलाव था। इतना सब होने के बावजूद कामिनी ने रमेश को धक्का नहीं दिया। उसने उसे रोका नहीं, बल्कि उसे अपनी मनमानी करने दी। उस ज़ुल्म, उस दर्द और बंटी के 'पाप भरे ख़याल' के बीच कामिनी को एक राक्षसी, अकल्पनीय आनंद मिल रहा था।

वासना के और दिमाग़ी तड़प के कई अलग-अलग प्रकार होते हैं... और दर्द में सुख ढूँढने वाली ये आग, उन्हीं में से एक थी।


"चल साली रंडी! आज तेरे इस पूरे जिस्म को ढीला करता हूँ। बड़ी अकड़ के चलती है ना? पूरा गाँव तेरी गांड देखता होगा... तेरे ये बड़े-बड़े दूध पीने का सोचता होगा! लेकिन तू कर भी क्या सकती है? तेरी चुत में वो आग ही नहीं है जो किसी मर्द के लंड का पानी निकाल सके... उसे निचोड़ सके!"
रमेश के मुँह से शराब की बदबू और गालियों का गंदा सैलाब बह रहा था।
"आउच... आअह्ह्हम... छोड़ो!"
रमेश ने गालियाँ बकते हुए पूरी ताक़त से कामिनी के बाल पकड़े और उसे पलंग पर ज़ोरदार धक्का दे दिया। कामिनी लड़खड़ाई और बिस्तर पर औंधे मुँह जा गिरी। थप्पड़ों की मार और रमेश की बेदर्दी से उसके नंगे स्तन पूरी तरह से लाल हो चुके थे।

लेकिन रमेश की वो बात "पूरा गाँव तेरी गांड देखता होगा... तेरी चुत मारने की सोचता होगा" ये शब्द कामिनी के ज़हन में किसी हथौड़े की तरह गूँजने लगे।
एक इज़्ज़तदार औरत के लिए ये शब्द किसी मौत से कम नहीं थे, लेकिन राक्षसी आनंद और हवस के भयंकर तूफ़ान में, कामिनी ख़ुद को वाकई एक 'रंडी' महसूस कर रही थी। 

उसका दिमाग़ पलंग पर गिरे-गिरे एक खौफ़नाक और मादक कल्पना (Fantasy) में डूब गया। उसे ऐसा अहसास होने लगा जैसे वो हवेली के बंद कमरे में नहीं, बल्कि गाँव के बिल्कुल बीचों-बीच वाले चौक में पूरी तरह नंगी, 'कुतिया' बनी हुई खड़ी है। पूरा गाँव उसे नंगा देख रहा है, उसकी उस विशाल गांड और लटकते हुए भारी स्तनों को घूर रहा है... हर आदमी उसे नोंचने का सोच रहा है और गाँव के सारे मर्द आपस में लड़ रहे हैं कि हवेली की इस गोरी रांड को सबसे पहले कौन चोदेगा!
इस भयंकर मादक और वर्जित (Taboo) कल्पना ने कामिनी की चुत को अंदर तक निचोड़ कर रख दिया।
"उउउफ्फ्फ्फ़... हम्म... फ़फ़फ़फ़..."
हवस से उबलती हुई कामिनी भारी साँसें छोड़ते हुए पलटी और पीठ के बल लेट गई।
लेकिन... जैसे ही वो पलटी, उसकी वो मादक कल्पना एक ही झटके में चकनाचूर हो गई।

सामने रमेश खड़ा था। वो अब तक पूरी तरह नंगा हो चुका था। लेकिन जैसे ही कामिनी की नज़र रमेश की जाँघों के बीच गई, उसके सारे अरमान, सारी जंगली उत्तेजना पल भर में बुझने लगी।
रमेश का लंड बिल्कुल सिकुड़ा हुआ, बेजान और मरा हुआ था। मुश्किल से दो इंच का वो माँस का लोथड़ा... काले बालों के गुच्छे के बीच उसे ढूँढना भी मुश्किल हो रहा था।
"नहीं... नहीं...!"  कामिनी एकाएक चिल्ला सी उठी।
ये हताशा थी। उसकी चुत जो कुछ पल पहले गाँव के चौक की कल्पना में रस टपका रही थी, जल रही थी... वो अब इस मरे हुए केंचुए को देखकर तड़प उठी। उसे अब सब्र नहीं था। उसे अपनी भभकती हुई भट्टी को शांत करने के लिए एक मोटा, सख़्त लंड चाहिए था। उसकी सोच ने उसकी कामवासना को इतना भड़का दिया था कि उसका गोरा चेहरा ग़ुस्से और वासना से बिल्कुल टमाटर की तरह लाल हो गया।

रमेश अभी पलंग की तरफ़ आगे बढ़ता ही कि कामिनी झट से खड़ी हुई और बिना कुछ सोचे-समझे, रमेश के सामने घुटनों के बल नीचे बैठ गई!
रमेश हैरान रह गया। आज से पहले, अपनी पूरी शादीशुदा ज़िंदगी में कामिनी ने ऐसा कुछ नहीं किया था। ऐसी बेशर्मी और हिमाकत उसने कभी नहीं दिखाई थी।
"रंडी... क्या कर रही है ये?" रमेश ने झटके से कामिनी के बालों को पकड़ कर उसे बीच में ही रोक दिया।

"वो... वो... खड़ा... खड़ा कर रही हूँ," कामिनी ने अपनी सारी हया, सारे जज़्बातों और हिम्मत को समेट कर एक काँपती हुई आवाज़ में कहा। हवस की आग ने आज कामिनी को सच में किसी रंडी की तरह हिम्मत दे दी थी।
लेकिन रमेश की कुंठा और उसका पागलपन एक अलग ही स्तर पर था।
'चटाक्क्... चटाक्क्...!'
रमेश ने अपना हाथ उठाया और दो ज़ोरदार, खौफ़नाक थप्पड़ कामिनी के गोरे गालों पर चिपका दिए। xxx-gif-at-gspotwizard
कामिनी एक पल को सुन्न हो गई। उसके गालों पर उँगलियों के लाल निशान उभर आए।

"मैंने कहा तुझे चूसने को? क्या हुआ है मेरे लंड को... खड़ा तो है! देख... देख कैसे तेरी चुत फाड़ता हूँ आज!" रमेश नशे की अंधी दुनिया में जी रहा था जहाँ उसे अपनी नामर्दी नज़र ही नहीं आ रही थी।

कामिनी का दिमाग़ झनझना गया। उसने देखा कि रमेश नशे में अपने 2 इंच के मरे हुए, सिकुड़े लंड को ऐसे हवा में लहरा रहा था जैसे वो कोई बहुत बड़ा, लोहे जैसा कड़क मूसल हो।
"चल साली... रंडीपने का इतना ही शौक़ है ना तुझे, तो आज तुझे मौका देता हूँ," रमेश लड़खड़ाता हुआ आगे बढ़ा और बिस्तर पर जाकर पीठ के बल लेट गया।

"चल आ जा... मेरे लौड़े पर बैठ के सवारी कर ले! तू भी क्या याद रखेगी कि किसी मर्द ने चोदा है!" रमेश ने अपनी जाँघें फैलाते हुए हुक्म दिया।
कामिनी ज़मीन से उठ खड़ी हुई। जब वो पलटी, तो उसकी आँखों में आँसू थे। ये आँसू किसी शारीरिक दर्द के नहीं थे। ये आँसू थे उस भयानक अपमान के, उस बेइज़्ज़ती के... और सबसे बढ़कर, उस अधूरी हवस की तड़प के, जो उसे अंदर से जलाकर ख़ाक कर रही थी।
सामने बिस्तर पर रमेश लेटा था और उसकी जाँघों के बीच मरा हुआ, बेजान लंड जाँघ की खाल से चिपका पड़ा था।

"क्या बैठती इस पर जाकर? क्या सवारी करती वो इस मरे हुए माँस की?"  कामिनी का मन पूरी तरह बुझने लगा था। एक भयानक निराशा ने उसे घेर लिया।
लेकिन रमेश का हुक्म था, और वो एक मजबूर हवस कि मारी पतीव्रता औरत। उसने बुझे हुए मन और एक मरी हुई आत्मा के साथ अपनी कमर पर लिपटी साड़ी को खोला और ज़मीन पर फेंक दिया। काँपते हाथों से उसने अपने पेटीकोट का नाड़ा खोला।
'सर्रर्र...'
पेटीकोट नीचे पैरों में आ गिरा।
और अब... कामिनी कमरे की पीली रोशनी में संपूर्ण नग्न खड़ी थी।
उसका मादक, गदराया हुआ जिस्म किसी अजूबे की तरह चमकने लगा। ये वो काया थी, ये वो भरा-पूरा हुस्न था जिसे अगर स्वर्ग के देवता तक देख लें, तो उनका भी ईमान डोल जाए और वो कामिनी के कदमों में गिर पड़ें।

कामिनी के शरीर का एक-एक कटाव (Curve) अपनी दास्तान ख़ुद बयाँ कर रहा था। उसके भारी, लाल पड़े स्तन हवा में तने हुए थे, पेट के बीचों-बीच गहरी और गोल नाभि किसी भँवर की तरह खींच रही थी, और उसके ठीक नीचे... बिल्कुल चिकनी और कामरस से भीगी हुई फूली चुत, जो हवस की आग में धड़क रही थी।

ऐसा देवतुल्य, खौफ़नाक हुस्न... और वो भी एक मरे हुए, नामर्द शराबी के सामने परोसा जा रहा था।
"चल आ रंडी... बैठ मेरे लौड़े पर!" रमेश ने बिस्तर से अपना सिर उठाते हुए, अपनी उसी झूठी मर्दानगी की कुंठा में एक बार फिर फटकार लगाई।


कामिनी अपने काँपते, सुलगते और संपूर्ण नग्न जिस्म के साथ धीरे-धीरे आगे बढ़ी और बिस्तर के बिल्कुल पास आकर खड़ी हो गई।
उसका रोम-रोम वासना और अधूरी प्यास से थरथरा रहा था। सामने बिस्तर पर रमेश अपनी जाँघें फैलाए लेटा हुआ था और उसकी आँखें बंद थीं। कामिनी की नज़र एक बार फिर उसकी जाँघों के बीच सिकुड़े हुए, बेजान माँस के लोथड़े पर गई। कामिनी का दिमाग़ चीख रहा था, कैसे जाकर बैठती? किस चीज़ पर सवारी करती? लंड जैसा कुछ तो हो वहाँ!

कामिनी इसी भयानक हताशा और कश्मकश में खड़ी ही थी कि अचानक...
"घुर्रर्र... खर्रर्र... फुर्रर्र..."
कमरे के भारी सन्नाटे को चीरती हुई रमेश के खर्राटों की आवाज़ गूँजने लगी। कामिनी का दिल जैसे डूब गया। रही-सही कसर भी अब पूरी तरह धूमिल हो चुकी थी। रमेश नशे की अंधी खाई में गिरकर, अपनी नामर्दी का तमाशा दिखाकर अब दम तोड़ चुका था। वो गहरी नींद में मुर्दा हो गया था।

"उउउउफ्फ्फ्फ़... हे भगवान!" कामिनी के मुँह से एक हताश और टूटी हुई सिसकी निकल गई।
उसकी आँखों में आँसू सूख चुके थे, लेकिन उसकी गोरी जाँघों पर रिस-रिस कर बहता हुआ गाढ़ा कामरस इस बात की गवाही दे रहा था कि आज उसकी आँखें नहीं... बल्कि उसकी 'चुत' रो रही है। वो आग, वो तड़प, वो हवस का उफान अब कामिनी के बर्दाश्त से बाहर हो चुका था। उसके पेट के निचले हिस्से में दर्द होने लगा था।

निराशा में डूबी कामिनी ने अपनी हया को वापस समेटने के लिए ज़मीन पर पड़ी अपनी साड़ी को उठाने के लिए जैसे ही नीचे की तरफ़ झुकी... उसकी नशीली, भूखी नज़र अचानक  पलंग के पाए (Bedpost) पर जाकर टिक गई। xn-29-p
वो पुराने ज़माने का भारी सागौन की लकड़ी का पलंग था, जिसके चारों पाए गद्दे से क़रीब आधा फ़ीट ऊपर तक निकले हुए थे। कामिनी के ठीक सामने वाला पाया बिल्कुल किसी मर्द के हथियार की तरह तराशा हुआ था, या फिर हवस मे डूबी कामिनी को ऐसा दिख रहा था, ऊपर से सुपाड़े की तरह मोटा और गोल, बीच से अंदर की तरफ़ हल्का सा घुमाव (Curve) लिया हुआ, और नीचे से फिर मज़बूत और चौड़ा!
कामिनी का दिमाग़ तो वैसे ही सोचना-समझना बंद कर चुका था। सही-ग़लत, पाप-पुण्य सब हवस की भट्टी में जलकर ख़ाक हो चुके थे।

ना जाने किस भयानक आवेश और वासना के पागलपन में कामिनी का काँपता हुआ हाथ आगे बढ़ा और उसने उस लकड़ी के पाए के ऊपरी, गोल हिस्से पर अपनी हथेली रख दी। उसने उस सख़्त, ठंडी लकड़ी को ऐसे सहलाया, मानो वो लकड़ी नहीं... किसी असली मर्द का लोहे जैसा कड़क और फौलादी लंड हो। वो कड़कपन, चिकनाहट यही तो चाहिए था.

कामिनी की साँसें धौंकनी की तरह चलने लगीं। उसने साड़ी वहीं छोड़ दी। वो हल्की सी साइड में हुई और उस पलंग के पाए के ठीक ऊपर आकर खड़ी हो गई।
उसने अपनी भारी, गदराई जाँघों को धीरे-धीरे खोलना शुरू किया। जाँघों के फैलते ही, उसकी कामरस से लबालब भरी चुत की दरार पूरी तरह से चौड़ी हो गई।

 वासना और उत्तेजना के चरम स्तर पर कामिनी की वो संवेदनशील 'दाना' (Clitoris) इस कदर तन कर कठोर हो चुका था कि वो चुत के फूले हुए गुलाबी होंठों को चीरता हुआ साफ़-साफ़ बाहर झाँक रहा था... बिल्कुल किसी लाल मोती की तरह धड़क रहा था।

कामिनी अब हवस के हाथों पूरी तरह मजबूर एक 'जंगली औरत' बन चुकी थी।
उसने अपने एक हाथ से अपने भारी, लटकते हुए नंगे स्तनों को नीचे से सँभाला और उनके कड़क निप्पलों को अपनी उँगलियों से कसकर मरोड़ लिया। दूसरे हाथ से उसने पलंग के उस पाए को कसकर पकड़ा ताकि अपना बैलेंस बना सके।
और फिर... उसने अपने घुटने मोड़े और अपनी कामरस से टपकती हुई चुत के मुहाने को उस लकड़ी के मोटे पाए के बिल्कुल ठीक ऊपर सेट कर लिया। 114307-knob-polishing

लकड़ी का वो गोल और सख़्त सिरा जैसे ही कामिनी की चुत के भभकते हुए होंठों और उस तने हुए दाने (Clitoris) से रगड़ खाया... कामिनी के मुँह से एक जानलेवा सिसकी निकल गई।
"उउउम्मम्म्म... सस्स्स..."
कामिनी ने अपनी आँखें कसकर भींच लीं और एक ही झटके में अपना पूरा का पूरा भारी जिस्म, अपना सारा वज़न उस पलंग के पाए पर छोड़ दिया!
"धच्च... फचम्म...!"
"आआआआह्ह्ह्ह.... ईईईस्स्स्स... आअह्ह्ह... उईईई माँऽऽऽ!" mvwi9ugywh5a1
कामिनी की आँखें पलट कर बिल्कुल सफ़ेद हो गईं। उसकी गर्दन झटके से पीछे की तरफ़ लटक गई।
पाए का वो ऊपरी, सुपाड़े जैसा मोटा हिस्सा कामिनी की चुत की जलती हुई, लसलसी गुफा को चीरता हुआ सीधा अंदर जा धँसा। 
वो लकड़ी सख़्त थी, खुरदरी थी, लेकिन कामिनी की चुत से इतना पानी बह चुका था कि उस कामरस की चिकनाहट ने उस मोटी लकड़ी को भी किसी मक्खन की तरह अंदर फिसलने का रास्ता दे दिया।

ये कोई इंसान नहीं था, कोई माँस नहीं था... ये एक निर्जीव लकड़ी थी, लेकिन कामिनी की बेबसी और उसकी प्यास इतनी भयंकर थी कि उसे उस सख़्त लकड़ी के अंदर जाने में भी एक 'राक्षसी चरम सुख' महसूस हो रहा था।
"आअह्ह्ह... हाँ... आआह्ह्ह... फाड़ दे मुझे... उउउफ्फ्फ्फ़..."
कामिनी यहाँ नहीं रुकी। उसकी हवस ने उसे पूरी तरह अँधा कर दिया था। उसने अपने दोनों हाथों से पलंग के किनारों को कसकर जकड़ लिया और अपने जिस्म को और ज़्यादा नीचे की तरफ़, पूरी ताक़त से धकेलना शुरू कर दिया। when-this-camgirl-gets-tired-of-regular-toys-she-can-always-rely-on-her-trusty-bedpost-003
'धचम... पच... पचक... गच्च...!'
कमरे के सन्नाटे में रमेश के खर्राटों के साथ-साथ अब लकड़ी पर रगड़ खाते गीले माँस की 'पच-पच' की वो बेहद मादक आवाज़ें गूँजने लगीं।

जैसे-जैसे वो पाया गहराई में जा रहा था, कामिनी की चुत की अंदरूनी दीवारें अपनी आख़िरी हद तक फैलती जा रही थीं। वो घुमावदार लकड़ी कामिनी के 'जी-स्पॉट' (G-Spot) पर इतनी बेदर्दी से रगड़ खा रही थी कि कामिनी के मुँह से अनियंत्रित, जानवरों जैसी कराहें निकलने लगीं। चुत से पानी की धार बह-बह कर उस लकड़ी के पाए को पूरी तरह भिगो चुकी थी।
"आअह्ह्ह... उईईई... आआआह्ह्ह!"

कामिनी ऊपर-नीचे उछलने लगी। उसके भारी स्तन हवा में बुरी तरह छलाँगें मार रहे थे। एक संस्कारी, हवेली की बहु... एक नामर्द पति के बगल में उसी के पलंग के पाए पर अपनी गांड टिकाए, ख़ुद को बेरहमी से चोद रही थी।

कामिनी ने अपनी ज़िंदगी में आज से पहले ऐसा कुछ सोचा भी नहीं था। लेकिन वो हवस ही क्या, वो जिस्म की आग ही क्या... जो इंसान से ऐसे हैवानियत भरे, उल्टे-सीधे काम ना करवा दे! कामिनी अब किसी की पत्नी नहीं, किसी की माँ नहीं... वो सिर्फ़ और सिर्फ़ एक प्यासी, हवस में अंधी हो चुकी 'मादा' थी, जो अपनी आग बुझाने के लिए किसी भी हद तक गुज़रने को तैयार थी।

"आअह्ह्हम... आअह्ह्हह्ह्ह्ह... आउचम्म... उउउफ्फ्फ...!"
"चोद रमेश... चोद... हाँ... चोद अपनी रंडी बीवी को... आअह्ह्ह...!"
'पच... पच... फचम... फचम्म...'
कामिनी अब पूरी तरह से पागल हो चुकी थी। उसका दिमाग़ी संतुलन हवस, ग़ुस्से और अपमान की उस भयानक भट्टी में जलकर राख़ हो चुका था।
 वो सख़्त लकड़ी के पाए पर एक जंगली जानवर की तरह उछल रही थी और हाँफते हुए रमेश से बात कर रही थी...  रमेश से, जो उसके ठीक सामने गद्दे पर किसी मुर्दे की तरह पड़ा खर्राटे ले रहा था।

"तेरी बीवी रंडी है रमेश... तू चोद नहीं सकता तो मैं क्या करूँ? आअह्ह्ह... हाँ, मैं गांड मटका के चलती हूँ! ताकि लोग मेरी गांड मारने को मचल उठें... मेरी चुत पीने के लिए मर जाएँ!"
"पच... पच... फच... आह्हब... आअह्ह्ह....!'

सालों से दबा हुआ ग़ुस्सा, अपनी जवानी के बर्बाद होने की टीस और जिस्म की भयंकर हवस... आज सब कुछ एक साथ ज्वालामुखी बनकर फूट रहा था। कामिनी बके जा रही थी और उस लकड़ी के मोटे पाए पर पागलों की तरह कूदे जा रही थी।

वो पाया जब भी अंदर जाते हुए सीधा कामिनी की  तनी हुई 'क्लिट' (Clitoris) से ज़ोर से टकराता, तो कामिनी करंट खाकर पागल हो उठती। वो दुगनी तेज़ी और ताक़त से उस पर कूदने लगती। दर्द और चरम सुख के ख़ौफ़नाक भँवर में, उसका एक हाथ अपने ही भारी, नंगे स्तनों को इतनी बेरहमी से मसल रहा था कि उन पर नीले निशान पड़ने लगे थे।

"पति से कुछ होगा नहीं, तो बीवी तो रंडी बनेगी ही ना साले! हरामखोर... शराबी!" कामिनी अपनी सारी भड़ास, सारा ज़हर उगल रही थी।
"आअह्ह्ह... उईईई..."
"तू मुझे चोद पाता... तो क्या मैं ऐसा करती? क्या मैं घर के बाहर दूसरों से चुदवाती? आअह्ह्ह!"
'पच... पफाच... फच... गच्च...!'

लकड़ी का पाया कामिनी की चुत की अंदरूनी दीवारों को चीर रहा था। कामरस की धार से वो सूखी लकड़ी पूरी तरह भीग कर लथपथ हो चुकी थी और उस पर कामिनी का भारी जिस्म किसी मशीन की तरह ऊपर-नीचे हो रहा था। 22930656

"साले... तूने मुझे रंडी बोल-बोल कर सही में रंडी बना दिया! देख... आँखें खोल के देख नामर्द... मैं चुद रही हूँ! तेरे ही सामने चुद रही हूँ! पूरे गाँव से चुदूँगी... सबसे बड़ी रंडी बनूँगी! यही चाहता है ना तू? बोल... बोल ना रंडी मुझे साले! बोल रंडी अब!"

कामिनी दहाड़ रही थी, सिसक रही थी, रो रही थी।
'फच.... फचम... फच.... आअह्ह्ह...!'
"आउच... उउउफ्फ्फ्फ़...."

हवस और पागलपन की इंतहा हो चुकी थी। कामिनी अपना सिर हवा में इधर-उधर पटक रही थी। उसके घने, लंबे बाल पूरी तरह उलझ कर उसके पसीने से भीगे चेहरे पर चिपक गए थे। उसकी आँखों से बेतहाशा आँसू बह रहे थे, जो ग़ुस्से के थे, अपमान के थे और उस चरम सुख के थे जो एक लकड़ी उसे दे रही थी। उसका गोरा चेहरा लाल टमाटर की तरह सुलग रहा था।

वो अपनी आख़िरी मंज़िल, अपने 'चरम' (Climax) पर पहुँच चुकी थी। उसकी चुत की नसें भयानक रूप से ऐंठने लगी थीं।
"तेरे जैसे मर्द ही... आअह्ह्ह... औरतों को रंडी बनाते हैं रमेश..."
कामिनी ने पाए पर अपना पूरा वज़न डालते हुए एक आख़िरी, सबसे गहरा झटका लिया और अपने दाँत पीसते हुए फुफकारी—
"माफ़ करना... मर्द नहीं... तेरे जैसे नामर्द!"
और इसी आख़िरी शब्द के साथ कामिनी के जिस्म का हर एक रेशा, हर एक माँसपेशी एक खौफ़नाक झटके के साथ तन गई। उसकी चुत ने एक भयंकर कसाव (Spasm) लिया और उस लकड़ी के पाए को अंदर ही जकड़ लिया।
114307-knob-polishing 'छर्रर्र... छपाक्क्...!'


कामिनी की चुत के अंदर से कामरस का जो भारी और गाढ़ा सैलाब फूटा, उसने उस लकड़ी के पाए को पूरी तरह नहला दिया। चरम सुख की वो लहर इतनी गहरी, इतनी भयानक और इतनी जंगली थी कि कामिनी के दिमाग़ की नसें सुन्न पड़ गईं। उसके पूरे शरीर ने एक ख़ौफ़नाक झटका लिया।

"अअअअआआआआआआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह...!!!"
उसकी उखड़ती हुई सिसकी कमरे के सन्नाटे में गूँजी और उसी पल, उसके काँपते हुए घुटनों ने पूरी तरह जवाब दे दिया। पैरों की ताक़त ख़त्म हो गई और कामिनी का भारी-भरकम, पसीने से लथपथ और कामुकता से सुलगता हुआ नंगा जिस्म... पलंग के पाए से फिसलकर, सीधे सामने गद्दे पर मुर्दा पड़े रमेश के ठीक ऊपर जा गिरा!
' धप्प...!'

कामिनी औंधे मुँह रमेश के सीने पर गिरी थी। वो इतनी बेसुध थी कि उसमें उठने या हिलने तक की ताक़त नहीं बची थी।
और इसी गिरने में नियति का एक बेहद खौफ़नाक और अश्लील तमाशा बन गया। कामिनी का निचला धड़, उसकी भारी, फैली हुई गांड और कामरस से लबालब भरी हुई सूजी हुई चुत... ठीक रमेश की जाँघों के ऊपर आकर टिक गई थी।

कामिनी हाँफ रही थी। उसकी साँसों की धौंकनी चल रही थी और उसके जिस्म की हर एक ऐंठती हुई नस के साथ... उसकी चुत के मुहाने से गाढ़ा, गर्म और नशीला पानी (Vaginal juice) टपक रहा था।

'टप्प... टप्प... टप्प...'

कामिनी की चुत से निकलता हुआ मादक पानी सीधा नीचे... रमेश की जाँघों के बीच पड़े दो इंच के सिकुड़े हुए, बेजान और मरे हुए लंड पर टपक रहा था।

रमेश के काले, मुर्दा माँस के लोथड़े पर कामिनी का गर्म पानी ऐसे गिर रहा था... जैसे कोई उस 'मरे हुए साँप' के मुँह में ज़िंदगी देने वाले 'अमृत' की दो बूँदें पिला रहा हो। मानो वो उबलती हुई जवानी, वो हवस का उफ़ान, उस मरे हुए साँप को फिर से ज़िंदा करने की आख़िरी कोशिश कर रहा हो।

लेकिन... सब बेकार था।
अमृत भी सिर्फ़ उसी में जान फूँक सकता है जिसके अंदर साँसें बची हों। रमेश के नपुंसक हो चुके जिस्म में अब कोई चिंगारी नहीं बची थी। कामिनी का बेशकीमती कामरस उस मरे हुए लंड पर गिरकर बस बर्बाद हो रहा था।

रमेश के खर्राटे अभी भी गूँज रहे थे। उसकी नामर्दी की कहानी सिकुड़े हुए माँस पर लिखी जा चुकी थी। कामिनी की भभकती हुई भट्टी (चुत ) की पूरी आग, उसका वो पानी... उस मरे हुए हथियार में रत्ती भर भी हरकत पैदा नहीं कर सका।
क्योंकि सच्चाई यही थी... रमेश का लंड, अब कभी खड़ा नहीं होने वाला था। **कभी नहीं!**


क्रमशः 

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