Ad Code

कामिनी 2.0, भाग -6

मेरी माँ कामिनी 2.0 - अध्याय -6


दोपहर के 2 बज चुके थे। सूरज जैसे आग उगल रहा था और गाँव की वो खुशनुमा सुबह अब एक तपती हुई, झुलसाने वाली दोपहर में बदल चुकी थी। हवा में एक भारीपन सा आ गया था।

ताऊजी उस हकीम लकड़द्दीन को वापस छोड़ने गाँव की तरफ जा चुका था। हवेली के अंदर का माहौल एकदम शांत था। कामिनी अपने कमरे में लेटी हुई थी। हकीम की उस लाल तेल की मालिश से आई वो अजीब सी गर्माहट और दर्द के बीच, कामिनी का दिमाग अतीत की अंधेरी गलियों में भटक रहा था। वो आग, वो टीस और शहर में कादर, रघु और शमशेर के साथ बिताए वो उत्तेजित और हवस भरे पल... सब उसकी आँखों के सामने एक धुंधली फिल्म की तरह घूम रहे थे। उसका शरीर अभी भी उस अजीब से मानसिक द्वंद्व (Psychological conflict) से गुज़र रहा था।



बाहर आँगन में, फागुन एक पीतल की बाल्टी में कुछ मैले कपड़े लिए हवेली के पिछले हिस्से की तरफ जा रही थी।
"अरे फागुन... कहाँ जा रही हो इतनी धूप में?" बंटी ने उसे टोकते हुए पूछा।

"वो छोटे बाबू... दिन चढ़ गया है, कुछ कपड़े बचे थे धोने को, सोचा कर लेती हूँ," फागुन बिना रुके आगे बढ़ने लगी।

"रुक... मुझे भी नहाना है यार! कल से ऐसा ही बिना नहाए पड़ा हुआ हूँ इस गर्मी में," बंटी अपनी टी-शर्ट उतार कर कंधे पर रखते हुए बोला।

फागुन ठिठक गई। उसने मुड़कर बड़ी हैरानी से बंटी को देखा, "आप... आप वहाँ कैसे नहा सकते हैं?"
"वहाँ का क्या मतलब है? कहाँ जाना है?" बंटी ने पास आते हुए पूछा।

"मेरा मतलब... आप तो अपने शहर के उन बड़े-बड़े बाथरूम में नहाते होंगे ना... वो ऊपर से गिरने वाले फव्वारे (Shower) से। यहाँ गाँव में वो सब कहाँ मिलेगा आपको?" फागुन की मासूमियत उसके चेहरे से छलक रही थी।

बंटी हँस पड़ा। "एक तो तुम सबसे पहले ये 'शहर-गाँव' करना बंद करो। और रही बात नहाने की... तो नहाने के लिए सिर्फ पानी लगता है, फव्वारा नहीं। पानी है ना वहाँ जहाँ तुम जा रही हो?" बंटी बिना फागुन के जवाब का इंतज़ार किए उसके साथ हो लिया।


दोनों हवेली के ठीक पीछे वाली पगडंडी पर चल दिए। ये वही ढलान थी जहाँ बीती रात कामिनी पेशाब करने बैठी थी, लेकिन दिन के उजाले में ये जगह एकदम अलग लग रही थी। 

ढलान के बाद से दोनों तरफ लहलहाती हुई हरी फसलें हवा के हल्के झोंकों के साथ झूम रही थीं। सूरज की तेज़ किरणों में वो हरियाली और भी चमक रही थी।

"हाँ छोटे बाबू... यहाँ गाँव में पानी की क्या कमी है," फागुन ने अपनी सुरीली आवाज़ में कहा।
बंटी अचानक रुका और फागुन के ठीक सामने आकर खड़ा हो गया।
"और हाँ... मेरा नाम बंटी है, 'छोटा बाबू' नहीं। ये देख... कितना बड़ा हूँ मैं!" बंटी ने मज़ाक करते हुए अपने दोनों हाथों को हवा में ऐसे फैलाया जैसे कोई बॉडीबिल्डर अपनी बॉडी दिखा रहा हो।

फागुन की वो सहमी हुई देहाती हिचकिचाहट टूट गई और वो खिलखिला कर हँस पड़ी।
"हेहेहे... जी... बंटी जी!"
"सिर्फ बंटी।"
"ठीक है... सिर्फ बंटी! हेहेहेहे..." फागुन की वो बेपरवाह हँसी बंटी के दिल में किसी मीठे संगीत की तरह बज रही थी। वो फागुन की उस सादगी पर अनजाने में ही फिदा हो रहा था।


कोई 200 मीटर ही चले होंगे कि सामने का नज़ारा एकदम बदलने लगा। कानों में एक भारी और जानी-पहचानी आवाज़ गूंजने लगी— 'थाड... थाड... थाड...'।
सामने एक बड़ी सी मोटर (समर वेल / ट्यूबवेल) चल रही थी, जिसके मोटे पाइप से पानी की एक बहुत तेज़ और मोटी धार निकल कर एक बड़ी सी पक्की हौद (कुंड) में इकट्ठा हो रही थी । पानी के गिरने की आवाज़ और उसकी ठंडक ने आस-पास की गर्मी को एकदम से सोख लिया था।

"अरे वाह! स्विमिंग पूल!!" बंटी की आँखें चमक उठीं और वो एक छोटे बच्चे की तरह उस कुंड की तरफ दौड़ पड़ा।
फागुन बाल्टी पकड़े हैरान खड़ी रह गई, "कक्क... क्या? कौन सा पूल?"

बंटी ने पलट कर मुस्कुराते हुए कहा, "ये सामने... स्विमिंग पूल ही तो है! थोड़ा अलग है... लेकिन है तो वही।"

फागुन भी मुस्कुराते हुए पास आ गई। "यहाँ से खेतों में पानी जाता है बंटी। मैं अक्सर यहीं नहाती हूँ। यहाँ बहुत शांति मिलती है। ताईजी और मेरे अलावा यहाँ किसी को भी आने की इजाज़त नहीं थी।"

"मैं अक्सर यहीं नहाती हूँ..." फागुन के मुँह से निकले ये चंद शब्द बंटी के दिमाग में किसी बिजली की तरह कौंध गए। भागता हुआ बंटी वहीं हौदी के किनारे रुक गया। उसने पीछे मुड़कर फागुन को देखा।

फागुन ने एक सादा सा सूती सूट पहना था, हवा से उसके बाल उड़ रहे थे, सूट पूरी तरह से उसके कामुक जिस्म पर चिपक के उसके यौवन पर चार चाँद लगा रहा था, चेहरे पर पसीने की हल्की बूँदें मोतियों की तरह चमक रही थीं। 

बंटी की आँखों के सामने अचानक एक बेहद मादक और हसीन कल्पना तैर गई, फागुन... इस हौदी के ठंडे पानी में भीगी हुई... पानी उसके बालों से टपकता हुआ उसके चेहरे पर आ रहा है, और उसका वो गदराया हुआ, कुदरती जिस्म गीले, पारदर्शी कपड़ों के आर-पार झांक रहा है... बंटी का गला सूख गया। 

वो अपनी ज़िंदगी में पहली बार किसी लड़की की इस तरह, इतनी गहराई और बेकरारी से कल्पना कर रहा था। शहर की उन मॉडर्न लड़कियों में वो बात कहाँ, जो इस अल्हड़ देहाती यौवन में थी!

"कककक... क्या हुआ?" फागुन उसे ऐसे बुत बने घूरता देख चौंक गई।
बंटी अपनी ही कल्पनाओं के उस भंवर से झटके से बाहर आया। उसने फागुन को एक बहुत ही शरारती, लेकिन प्यार भरी नज़र से देखा, "कुछ नहीं... बस सोच रहा था कि अब से मैं भी यहीं नहाऊंगा!"

"हाहाहाहा..." फागुन खिलखिला कर हँसी।

"छपाक..... छप...!" बंटी दौड़ता हुआ गया और बिना कुछ सोचे-समझे, अपनी पैंट पहने हुए ही उस पूरी तरह से भरी हुई हौदी (समर वेल) में कूद पड़ा।

"वाह... उउउफ्फ्फ्फ़...!" पानी में जाते ही बंटी के मुँह से एक सुकून भरी आह निकल गई।
क्या गज़ब का सुकून था इस पानी में! एकदम शुद्ध, शीशे की तरह साफ़ और बर्फ जैसा ठंडा। शहर की वो सारी थकान, हवेली का वो भारीपन, यहाँ आने का मक़सद, और बदन की वो सारी गर्मी... इस एक छलांग में और फागुन की उस हँसी में जैसे धुल गई। पानी की छीटें फागुन के चेहरे पर भी पड़ीं, और दोनों की हँसी उस सुनसान खेत में गूंज उठी। 


बंटी उस ठंडे पानी के मज़े ले रहा था। शहर की वो सारी घुटन और गर्मी उस पानी में उतर चुकी थी। वो हौदी के बीचों-बीच तैरते हुए बार-बार फागुन की तरफ देख रहा था और अपनी शहर वाली बातें किये जा रहा था।
फागुन हौदी के किनारे एक पत्थर पर उकड़ूँ बैठी बाल्टी से कपड़े निकाल धो रही थी। काम की वजह से उसे गर्मी लग रही थी, इसलिए उसने अपनी चुन्नी उतार कर पास के एक साफ़ पत्थर पर रख दी थी।

बंटी तैरते-तैरते अचानक हौदी के किनारे की तरफ आया और फागुन को देखने लगा।
झुकने और उकड़ूँ बैठने की वजह से फागुन के उस सादे से कुर्ते में भी उसकी भरपूर जवानी अंगड़ाई ले रही थी। फागुन का झुका हुआ जिस्म और उसके उन्नत, भरे हुए स्तन उसके घुटनों को लग कर लगभग बाहर को कूद पड़े थे।

बंटी की नज़रें फागुन के उस मादक और भरपूर उभार पर जाकर जम गईं। वो बुरी तरह सकपका गया। बंटी ने कई मॉडर्न लड़कियों को देखा था, अपनी माँ को देखा था, लेकिन फागुन की इस कुदरती, बेखबर और भरपूर जवानी ने बंटी के होश उड़ा दिए। 

वाकई, फागुन अपनी भरपूर जवानी की दहलीज़ पर खड़ी थी।
बंटी पानी के अंदर से ही उस मासूम लेकिन जानलेवा हुस्न को टकटकी लगाए निहार रहा था। फागुन का वो मासूम, पसीने से भीगा चेहरा, उस हल्के सूती कुर्ते के गहरे गले से झांकता वो उन्नत यौवन, और उसकी कमर का वो कातिलाना कटाव, बंटी का गला सूख गया।
उकड़ूँ बैठने की वजह से फागुन की भारी और सुडौल गांड का उभार कुर्ते के पर्दे में भी साफ़ पता चल रहा था,

बंटी ने अपनी ज़िंदगी में पहली बार इतनी गहराई से महसूस किया कि उन ढीले-ढाले और साधारण देहाती कपड़ों के पीछे कितना जानलेवा, कोमल और मादक जिस्म छुपा हुआ है। फागुन के उस भरे हुए यौवन ने बंटी के दिल और दिमाग में एक अजीब सी बिजली दौड़ा दी थी। वो फागुन के उस 'खजाने' को अपने सीने से लगा लेने के लिए बेताब होने लगा था। उसके अंगों को महसूस करने की चाह अंगड़ाई लेने लगी.
बंटी के लंड ने झटका महसूस किया, खून का दबाव उसके लंड को फुलाने लगा.

फागुन अपने काम में मग्न थी, वो बंटी की इन प्यासी नज़रों से बिल्कुल बेखबर थी। बंटी को चुप पा कर उसने सामने नजर उठाई, बंटी उसे ही देखे जा रहा था.
 कपड़ा निचोड़ते हुए मुस्कुराई, "क्या हुआ बंटी? और बताओ ना शहर के बारे मे?"

बंटी ने एक गहरी साँस ली, पानी के अंदर से उसने अपनी नज़रों को फागुन के जिस्म से हटाया, "कुछ नहीं फागुन... बस सोच रहा था कि गाँव की धूप में भी तुम इतनी 'खूबसूरत' कैसे लग लेती हो!"

फागुन खिलखिला कर हँस पड़ी। उसकी हँसी ने उस एरोटिक तनाव (sensual tension) को एक बहुत ही प्यारे और रोमांटिक मोड़ पर ला खड़ा किया।
"मै तुम्हे कहाँ से सुंदर लगती हूँ?" फागुन का दिल तेज़ धड़क उठाया आज तक उसने अपने लिए ऐसे शब्द नहीं सुने थे.
हालांकि ताऊजी, आस पास के लोग, बाजार मे लोग उसे घूरते थे, लेकिन उस घूरने मे सिर्फ हवास होती थी, जैसे उसके जिस्म को नोचना चाहते हो.
सुंदर किसी ने नहीं कहाँ था उसे.
फागुन के हाथ वही थम गए.


"मैं तुम्हें कहाँ से सुंदर लगती हूँ?" फागुन के होंठ हल्के से कांपे। उसके हाथ, जो कपड़े निचोड़ रहे थे, वो वहीं हौदी के किनारे थम गए।
बंटी पानी चीरता हुआ हौदी के बिल्कुल किनारे आ गया। अब फागुन और बंटी के बीच सिर्फ कुछ इंच का फासला था। बंटी का आधा जिस्म पानी के अंदर था और फागुन ऊपर उकड़ूँ बैठी थी। बंटी ने पानी से अपना एक भीगा हुआ हाथ बाहर निकाला और बहुत ही नरमी से फागुन के उस कांपते हुए हाथ पर रख दिया जो अभी भी गीले कपड़े को पकड़े हुए था।

बंटी के उस ठंडे और भीगे हाथ का स्पर्श मिलते ही फागुन के पूरे बदन में एक मीठी सी सिहरन दौड़ गई।
"तुम सच में बहुत सुंदर हो फागुन... गाँव की इस मिट्टी जैसी एकदम सच्ची और कोमल," बंटी की आवाज़ में एक अजीब सा नशा था। उसकी नज़रें सीधे फागुन की उन बड़ी-बड़ी, भोली आँखों में झांक रही थीं।

बंटी के इस तरह छूने और आँखों में देखने से फागुन की साँसें भारी होने लगीं। उसका दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि बंटी उसे साफ़ महसूस कर सकता था।

"ब... बंटी..." फागुन ने घबराकर पीछे हटने की कोशिश की, लेकिन उकड़ूँ बैठे होने की वजह से उसका बैलेंस बिगड़ गया।
इससे पहले कि फागुन पीछे मिट्टी में गिरती, बंटी ने फुर्ती से उसका हाथ अपनी तरफ खींच लिया।
"छपाااااक....!!"

एक ज़ोरदार आवाज़ हुई और फागुन पानी के उस ठंडे कुंड में बंटी के ठीक ऊपर आ गिरी। पानी के तेज़ छींटे चारों तरफ उड़ गए।

"अअअअ... उफ्फ्फ!" फागुन पानी के अंदर गई और अगले ही सेकंड हाँफती हुई बाहर निकली। ठंडे पानी ने अचानक उसके जिस्म को सुन्न कर दिया था। उसने घबराकर खुद को सँभालने के लिए सामने जो चीज़ मिली, उसे कसकर जकड़ लिया... और वो चीज़ बंटी का चौड़ा, नंगा सीना और उसके मज़बूत कंधे थे।

बंटी ने भी उसे डूबने से बचाने के लिए अपनी दोनों बाहें फागुन की पतली कमर के इर्द-गिर्द कस दी थीं।
अब नज़ारा पूरी तरह बदल चुका था।

फागुन का वो सादा सा सूती सूट पानी में पूरी तरह भीग कर पारदर्शी (transparent) हो चुका था। पानी उसके बालों से टपकता हुआ उसके चेहरे और गर्दन से फिसल रहा था। भीगा हुआ कपड़ा फागुन के उस गदराए हुए जिस्म से दूसरी त्वचा (second skin) की तरह चिपक गया था।

बंटी की नज़रें फागुन के सीने पर पड़ीं। बिना किसी अंदरूनी कपड़े (बिना ब्रा) के पहने हुए उस सूती कुर्ते के आर-पार फागुन के उन उन्नत और भारी स्तनो का आकार साफ छप गया था। ठंडे पानी की वजह से उस यौवन का कसाब और भी बढ़ गया था। निप्पल तन के बहार उभर आये थे.
बंटी हैरान था बिना ब्रा के भी उसके स्तन एकदम तने हुए थे, लेश मात्र भी झुकाव नहीं था उसमे.

पानी के अंदर, फागुन की वो भारी और सुडौल जांघें बंटी के पैरों से रगड़ खा रही थीं। बंटी का खड़ा लंड पानी के अंदर फागुन के जिस्म की नरमाई को साफ़ महसूस कर रहा था।  उसकी जांघो कर बीच दस्तक दे रहा था, फागुन का वो कोमल, रुई जैसा गरम बदन बंटी के मज़बूत सीने से पूरी तरह चिपक गया।

फागुन याकायाक उत्तेजना महसूस करने लगी, मर्दाने अहसास ने उसे बहका दिया था, वो खुद बंटी के आगोश मे सामना चाहती थी.
ऐसा शानदार अहसास इस से पहले नहीं मिला था.

दोनों की साँसें तेज़ थीं। सूरज की उस तपती दोपहर में, उस ठंडे पानी के अंदर दो जवान जिस्मों की वो टकराहट एक भयानक गर्मी पैदा कर रही थी। फागुन की वो मासूम आँखें अब डर से नहीं, बल्कि एक अनजाने से नशे और मदहोशी से झुकने लगी। बंटी के चेहरे से टपकता पानी फागुन के लाल होंठों पर गिर रहा था, और बंटी का चेहरा धीरे-धीरे फागुन के उन कांपते होंठों के करीब जाने लगा....
फागुन ने अतिउत्तेजना मे आंखे बंद कर ली, होंठ कांप रहे थे उसके.

की.. तभी.....

"ओ फागुन! अरे कहाँ मर गई तू? कहाँ-कहाँ नहीं ढूँढा तुझे!" दूर पगडंडी से आती प्रमिला की उस तेज़ आवाज़ ने जैसे पानी पर गिरे उस जादुई सन्नाटे और मादक मदहोशी को एक ही झटके में चकनाचूर कर दिया।

फागुन जैसे किसी गहरे नशे से झटके से होश में आई। वो बंटी के सीने से ऐसे अलग हुई जैसे किसी ने जलता हुआ कोयला उसके बदन पर रख दिया हो। डर और हड़बड़ाहट में वो हाँफते हुए जल्दी से पानी से बाहर निकली और अपने गीले, पारदर्शी कपड़ों को समेटते हुए कपड़े धोने वाले पत्थर के पास जाकर बैठ गई।

उसका पूरा जिस्म अभी भी उस ठंडे पानी के बावजूद एक अनजानी तपिश से कांप रहा था। पानी के अंदर बंटी के उस मज़बूत और सख्त स्पर्श ने उसके अंदर एक ऐसा तूफ़ान ला दिया था जो उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था। 

उसका शरीर पहले भी खेतों में काम करते हुए, प्रमिला की कहानियाँ सुनते हुए कई बार गर्म हुआ था, लेकिन आज की बात कुछ और ही थी। उसे अपनी चुत मे एक अजीब सी, गर्म नमी और एक मीठे से भारीपन का एहसास हो रहा था, जो सिर्फ पानी के भीगने का नतीजा नहीं था। वो अंदर से पूरी तरह पिघल चुकी थी।

तभी प्रमिला अपना घाघरा थोड़ा ऊपर उठाए, पगडंडी से नीचे उतरती हुई चली आई।
प्रमिला बिल्कुल अपनी माँ कमला काकी पर गई थी। उसका रंग फागुन जैसा गोरा या खिला हुआ नहीं था, बल्कि एक गहरा साँवलापन लिए हुए था। लेकिन उस साँवले जिस्म में एक गज़ब की कसावट और भारीपन था। फागुन की छरहरी और मासूम जवानी के सामने प्रमिला का जिस्म एक पकी हुई फसल जैसा था। 

होता भी क्यों ना गांव के कई लड़के उसे चोद चोद कर पका चुके थे, उसकी तंग चोली में उसका भरा हुआ सीना और लहंगे के ऊपर दिखती उसकी मांसल कमर की सिलवटें किसी का भी ईमान डगमगाने के लिए काफी थीं।

प्रमिला की नज़र जब पानी में आधे डूबे बंटी और बाहर गीली, घबराई हुई फागुन पर पड़ी, तो उसकी आँखों में एक शरारती चमक आ गई।

"अच्छा... तो यहाँ 'छोटे बाबू' के साथ नहाया जा रहा है?" प्रमिला ने फागुन को आँख मारते हुए बहुत ही सधी हुई चुटकी ली।

"सससस... चुप कर! हट, क्या कुछ भी बक रही है तू? अपने जैसा समझा है क्या ?" फागुन बुरी तरह झेंप गई।

 उसका चेहरा शर्म से टमाटर की तरह लाल हो गया। "मैं तो यहाँ कपड़े धो रही थी... वो तो बंटी जी अचानक कूद पड़े पानी में।" दोनों सहेलियों में ऐसे बेबाक मज़ाक अक्सर चलते ही रहते थे।

प्रमिला बस हँसती रही। "मेरा जैसा होने मे क्या बुरा है, जवानी बार बार थोड़ी ना आती है "
उसकी नज़रों ने पानी में बंटी के उस गोरे, चौड़े सीने और मज़बूत कन्धों का मुआयना किया। शहर के इस लड़के का गठीला बदन देखकर प्रमिला भी अंदर से मोहित हुए जा रही थी। 
गांव के पतले दुबले काले बेढंगे लड़को से जैसे उब गई हो.
प्रमिला कभी दिल फेंक किस्म की लड़की थी, आश्चर्य था वो और फागुन दोस्त कैसे है.
रंग रूप, चरित्र, व्यवहार सब मे एक दूसरे के विपरीत.
इस बात को बंटी भी महसूस कर रहा था.

वो फागुन के पास ही हौदी के किनारे बैठ गई और अपने लहंगे को थोड़ा और ऊपर खिसका कर अपने दोनों साँवले पैर घुटनों तक पानी में डाल कर छप-छप करने लगी।
"छोटे बाबू... अगर बुरा ना मानें, तो हम भी नहा लें क्या आपके साथ?" प्रमिला ने बहुत ही मादक और ललचाई हुई आवाज़ में बंटी को छेड़ा। और साथ ही आगे को झुकी जिस वजह से उसके भारी स्तन बहार को लुढ़क आये.

बंटी, जो अभी भी अपनी उस अधूरी उत्तेजना के नशे में था, उसने मुस्कुराते हुए प्रमिला को देखा। फागुन बस अपना सिर झुकाए मुस्कुरा दी, लेकिन उसका दिल अभी भी बंटी के उस स्पर्श को याद करके 'धाड़-धाड़' धड़क रहा था।

"अच्छा छोटे बाबू... वहाँ शहर में तो नहाने के लिए बड़े-बड़े तालाब होते हैं ना? वो क्या कहते हैं उसे... कोई सा फूल?" प्रमिला ने अपने पैर पानी में हिलाते हुए मासूमियत से पूछा।

"स्विमिंग पूल," बंटी ने जवाब दिया।
"हाँ, वही!" प्रमिला चहकी।
बंटी ने पानी के अंदर अपने आपको थोड़ा और रिलैक्स किया। उसने अपनी नज़रों को प्रमिला से हटाया और वापस फागुन के उस भीगे हुए, कातिलाना हुस्न पर टिका दिया, जो उस पारदर्शी कुर्ते में से अभी भी साफ़ छलक रहा था।

फागुन की आँखों में सीधा देखते हुए, बंटी ने बहुत ही गहरे अंदाज़ में कहा, "शहर के स्विमिंग पूल में वो बात कहाँ प्रमिला... जो सुकून, जो 'ठंडक' और जो कुदरती 'सुंदरता' इस गाँव की हौदी में है... वो दुनिया में और कहीं नहीं मिलती।"

बंटी के इन लफ़्ज़ों का इशारा उस हौदी के पानी की तरफ कम, और फागुन के उस भीगे हुए, गदराए जिस्म की तरफ ज़्यादा था। फागुन बंटी की इन प्यासी नज़रों और बातों का मतलब बहुत अच्छे से समझ गई और शर्म से उसने अपनी नज़रें फिर से झुका लीं और चुपचाप अपने कपड़े धोने की रफ़्तार बढ़ा दी।

 प्रमिला सब समझ रही थी, बंटी उस से जरा भी प्रभावित नहीं दिख रहा था, वो इस मज़ाक को और आगे ना बढ़ाते हुए बस हौदी के किनारे बैठकर मुस्कुराती रही।

कुछ देर की और हँसी-ठिठोली के बाद, जब फागुन के कपड़े धुल गए, तो बंटी भी पानी से बाहर निकल आया। उसके चौड़े और गठीले बदन से टपकती पानी की बूंदें सूरज की रौशनी में चमक रही थीं।

 फागुन और प्रमिला दोनों ही कनखियों से उसके उस जवान और शहरी जिस्म को निहार रही थीं, लेकिन बंटी की नज़रों में अब सिर्फ फागुन का ही नशा चढ़ा हुआ था।

फागुन ने अपनी बाल्टी उठाई, प्रमिला ने अपना घाघरा झाड़ा और बंटी ने अपनी टी-शर्ट वापस कंधे पर डाल ली। तीनों उस तपती दोपहर की शांति में पगडंडी पकड़कर वापस हवेली की तरफ लौट पड़े। रास्ते भर कोई कुछ खास नहीं बोला, लेकिन उस खामोशी में भी फागुन और बंटी के बीच एक अनकहा, मादक और बेहद गहरा खिंचाव अब पूरी तरह से जन्म ले चुका था।

खेतों की वो ठंडी हवा पीछे छूट रही थी,
शाम हो आई थी ये लोग जब घर पहुंचे, कमला काकी वहाँ पहले ही मौजूद थी.
"अब कैसा लग रहा है माँ " बंटी कपडे बदल के आ चूका था.
"ठीक है दर्द कम है बस सूजन है "
"आप शहर के लोग कहाँ इस मिट्टी मे चल पाएंगे " कमला काकी ने पास पड़ी शीशी से दावा की दो बून्द गिलास मे टपका कर कामिनी की तरफ बढ़ा दिया.
वही दवाई थी जो हकीम लकड़द्दिन दे गया था.
वही दूसरे कमरे मे 
"फागुन ये छोटे बाबू कितने गोरे है, उनका वो भी गोरा होगा क्या?" प्रमिला ने कोतुहाल से पूछा.
"छी.... तूने फिर वही गंदी बाते शुरू कर दी, मार खायेगी तु मुझ से " फागुन ने बनावटी गुस्सा किया.
"क्या तु भी... गीले पाजामे मे देखा तूने बड़ा सा उभार बना हुआ था " प्रमिला ने अपने होंठो को दाँत से दबाते हुए कहाँ.
"मै नहीं देखती ये सब... तेरी ही आदत है मुँह मारने की " फागुन ने भी कपडे बदल लिए थे.
"एक बार ले के देख ये तेरा नाजुक बदन और खील जायेगा " प्रमिला ने छेड़ा.
"गांव मे लड़को के तो गंदे काले छी... वेक... " प्रमिला ने मुँह बनाया.
"हाहाहाहा.... तु नहीं सुधरेगी, बहुत गंदी है तु, चल कामिनी माँ को देख आये "

"सुधर के क्या करना है री... ऐसे लोडे के लिए तो मै कुछ भी कर सकती हूँ.... ब्ला... बल.... ब्ला..... प्रमिला बड़बड़ाती रही.

"छी.... फागुन ने कान बंद कर लिए, लेकिन जिस्म मे एक तरंग सी दौड़ रही थी, इस हादसे के बाद से.
********************

सूरज अब पूरी तरह से खेतों के पीछे छुप चुका था और गाँव में शाम का मटमैला अँधेरा उतरने लगा था। चौपालों पर लालटेन और बल्ब जलने लगे थे।
उसी धूल भरे चौराहे पर, चाय की टपरी की बेंच पर लकी और बिट्टू किसी उल्लू की तरह बैठे इधर-उधर झाँक रहे थे। दिन भर की गर्मी और भूख ने उनकी हालत किसी आवारा कुत्ते से भी बदतर कर दी थी। शहर के वो खूंखार गुंडे आज अपनी ही बेवकूफी पर सिर पीट रहे थे।

"क्या यार... हाथ से आया हुआ मौका चला गया!" बिट्टू ने अपने बालों को नोचते हुए खीज कर कहा।

"हरामखोर... तुझे क्या ज़रूरत थी उस पेड़ के नीचे कुंभकर्ण की तरह सोने की? तेरी वजह से वो कुतिया हाथ से निकल गई," लकी ने बिट्टू को घूरते हुए गालियाँ दीं।
"अबे तो तू कौन सा जाग कर पहरा दे रहा था बे? तू भी तो मेरे ऊपर मुँह फाड़ के खर्राटे मार रहा था!" बिट्टू ने भी पलटकर जवाब दिया। दोनों आपस में ही कुत्तों की तरह उलझे पड़े थे कि तभी...

"अंम्म्म्म... मियाँ... तड़का मार के एक पान लगा जल्दी, सूरज ढल रहा है!"
पास ही पान की गुमटी से एक बहुत ही खरखराती और पीक से भरी हुई आवाज़ गूंजी।
लकी और बिट्टू का ध्यान उस आवाज़ की तरफ गया। सामने पान की दुकान पर हकीम लकड़द्दीन खड़ा पान वाले पर बरस रहा था। 

वही 30 डिग्री पर झुकी हुई कमर, हाथ में वो पुराना चमड़े का फटा बैग, बदन पर ढीला-ढाला सफ़ेद कुर्ता और चौड़ा पजामा। उसकी वो लटकती हुई बकरा दाढ़ी शाम के उस मद्धम उजाले में और भी अजीब लग रही थी।
"इतनी जल्दी कहाँ जाना है हकीम साब? कोई नया मुर्गा फंसा है क्या?" पान वाले ने पान के पत्ते पर कत्था लगाते हुए मज़े लेने वाले अंदाज़ में पूछा।

"अं.मममम.... मियाँ, वो क्या है ना... अपनी वो ताईजी जिनका इंतकाल हो गिया, उनके यहाँ शहर से कुछ रिश्तेदार आए हैं। एक गोरी-चिट्टी 'मोहतरमा' का पैर गड्ढे में फिसल गया था दिन में... बस उसी का मर्ज़ जाँचने जा रिया हूँ। रात का वक़्त है, सिकाई करनी पड़ेगी," हकीम की आवाज़ में एक अजीब सी ठरक थी, जो वो पान वाले से भी नहीं छुपा पा रहा था।

"अच्छा! वैसे सुना है ताईजी खूब सारा माल और ज़मीन छोड़ के मरी हैं?" पान वाले ने सुपारी डालकर पान को बाँधना शुरू किया।
पान वाले की ये बात तो हवा में उड़ गई, लेकिन हकीम के मुँह से निकले वो शब्द "शहर से आए रिश्तेदार... मोहतरमा..." सुनकर पास बैठे लकी और बिट्टू के कान एकदम खड़े हो गए।

बिट्टू ने तुरंत लकी की बाँह पकड़ी और फुसफुसाया, "अबे लकी... शहर की औरत? कहीं ये वही तो नहीं?"
लकी की आँखों में एक खतरनाक चमक आ गई। उसने बिट्टू को चुप रहने का इशारा किया और ध्यान से सुनने लगा।

"ला... मियाँ इधर दे!" लकड़द्दीन ने पान वाले के हाथ से पान झपटा और "गप... चप...' की आवाज़ करते हुए उसे अपने मुँह में ठूँस लिया। उसने अपनी पान से लाल हो चुकी उँगलियों को अपनी ही बकरा दाढ़ी में पोंछा और अपना बैग उठाकर पगडंडी की तरफ चल दिया।

"मियाँ... देर हो गई। अँधेरे में साला दिक्कत ना हो जाए," हकीम ने अपनी आँखों को मलते हुए बड़बड़ाया। उम्र की वजह से हकीम को वैसे भी अँधेरे में कम ही दिखाई देता था, और आज तो वैसे भी उसकी आँखों पर कामिनी के उस गोरे जिस्म का नशा चढ़ा हुआ था।

हकीम अभी कच्ची सड़क पर कुछ ही कदम आगे बढ़ा था कि पीछे से एक तेज़ रोशनी और आवाज़ आई...
'पों... पों...'
हकीम ने हड़बड़ा कर पीछे मुड़कर देखा। एक पुरानी खटारा जीप उसके बिल्कुल पास आकर रुकी। जीप की हेडलाइट की रोशनी में लकड़द्दीन की आँखें चुंधिया गईं।
ड्राइविंग सीट पर लकी बैठा था। उसने जीप से बाहर गर्दन निकाली और अपने पीले दाँत निपोरते हुए एक बहुत ही झूठी और इज़्ज़तदार आवाज़ में बोला, 

"सलाम हकीम साब!"

हकीम ने अपनी आँखें सिकोड़ते हुए जीप के अंदर बैठे दोनों अजनबियों को देखा।
"सलाम मियाँ.... कौन हो भाई? आज से पहले तो कभी देखा नहीं यहाँ तुम्हें?" हकीम ने शक भरी निगाहों से पूछा।

बिट्टू ने तुरंत हाथ जोड़ते हुए एक शातिर कहानी गढ़ी, "जी हकीम साब, हम वो... ताईजी की हवेली ही जा रहे हैं। अभी-अभी पान की दुकान पर सुना कि आप भी वहीं जा रहे हैं। तो सोचा आपको साथ ही बिठा लें। अंधेरा भी हो रहा है और आपको पैदल चलने में तकलीफ भी हो रही होगी।"

हकीम का शक एकदम से दूर हो गया। शहर से आए मेहमान थे, तो हवेली ही जा रहे होंगे। और ऊपर से मुफ़्त की सवारी!
"अच्छा... अच्छा.... तो तुम भी ताईजी के रिश्तेदार हो! चलो... मियाँ... बिठा लो। नेक आदमी जान पड़ते हो तुम दोनों," हकीम ने अपनी पीक भरी मुस्कान बिखेरी और जीप का पीछे वाला दरवाज़ा खोलकर अंदर बैठ गया।
लकी और बिट्टू ने आगे बैठकर एक-दूसरे को देखकर एक बहुत ही शैतानी और खूंखार स्माइल पास की।
लकी ने गियर डाला और जीप तेज़ आवाज़ के साथ कच्ची सड़क की धूल उड़ाती हुई, उस आलीशान हवेली की तरफ दौड़ पड़ी।
*****************

उधर हवेली के उस बड़े से, कम रौशनी वाले कमरे में कामिनी बिस्तर पर अकेली लेटी हुई थी। कमला और प्रमिला काफी देर पहले ही अपने घर लौट चुकी थीं। बंटी हवेली के बाहर, ताऊजी के साथ गाँव की हवा खाने और हवेली के आस-पास का मुआयना करने के बहाने टहलने निकला था। फागुन घर के छोटे-मोटे कामों में व्यस्त थी।

कमरे में एक अजीब सा, भारी सन्नाटा था, लेकिन कामिनी के अंदर एक भयंकर तूफ़ान उठ रहा था।
जब से उसने कमला काकी के हाथों से वो हकीम लकड़द्दीन की दी हुई 'दवा' की दो बूँदें पानी में मिलाकर पी थीं, तभी से उसके जिस्म में एक अजीब और खौफनाक हलचल शुरू हो गई थी।

शुरुआत में तो दर्द कम हुआ, लेकिन जैसे-जैसे रात गहरा रही थी, कामिनी के शरीर का तापमान बढ़ने लगा था। कमरे की खिड़की खुली होने और बाहर की ठंडी हवा आने के बावजूद, कामिनी को भयानक गर्मी लग रही थी। उसका रोम-रोम जल रहा था। उसके गोरे माथे, गर्दन और स्तनों के बीच पसीने की बूँदें मोतियों की तरह चमक रही थीं। वो बिस्तर पर बेचैन होकर बार-बार करवटें बदल रही थी, लेकिन किसी भी करवट उसे सुकून नहीं मिल रहा था।

"उफ्फ्फ्फ़... ये मुझे क्या हो रहा है... इतनी गर्मी क्यों लग रही है?" कामिनी ने हाँफते हुए अपनी साड़ी का पल्लू अपने कंधे से पूरी तरह नीचे गिरा दिया।

ये कोई आम दर्द की दवा नहीं थी। लकड़द्दीन ने उस लाल तेल की मालिश के बाद इस दवा के ज़रिए कामिनी के अंदर एक ऐसी वहशी आग लगा दी थी, जिसे बुझाना अब कामिनी के बस की बात नहीं थी।

कामिनी को अपनी नाभि के ठीक नीचे एक अजीब सा, खौलता हुआ भारीपन महसूस हो रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे उसके पेट के निचले हिस्से में कोई दहकता हुआ ज्वालामुखी उबल रहा हो और बस अब फटने ही वाला हो। 
 उसकी चुत की नसें फड़क रही थीं और एक मीठी सी, लेकिन पागल कर देने वाली खुजली उसे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी।
मन कर रहा था अभी दो ऊँगली डाल कर अंदर तक खुजला ले, नोच ले अपनी चुत को.
उउउफ्फ्फ्फ़.... ईईस्स्स.....

ये बेचैनी और तड़प इस कदर बढ़ गई थी कि कामिनी बेकाबू होकर बिस्तर पर अपनी दोनों गोरी जांघों को आपस में कसकर रगड़ने लगी। जांघों की उस रगड़ से पैदा होने वाली गर्माहट उसे एक अजीब सा, लेकिन बहुत ही मादक सुकून दे रही थी।

"आअह्ह्ह.... इस्सससस..."दर्द और एक अनजानी सी भयंकर उत्तेजना में लिपटी हुई सिसकियाँ उसके कांपते होंठों से खुद-ब-खुद आज़ाद हो रही थीं।

जिस्म की इस भयंकर तपिश और खून के तेज़ बहाव की वजह से उसके शरीर का हर अंग तन गया था। उसके उन्नत और भारी स्तनों में एक ऐसा अजीब सा और दर्द भरा कसाब आ गया था, जो उसने बरसों से महसूस नहीं किया था। उसके निप्पल इतने सख़्त और संवेदनशील हो गए कि बिना किसी छुअन के भी, उस हल्के गुलाबी सूती ब्लाउज़ के कपड़े के आर-पार उनकी नुकीली छाप एकदम साफ़ और पूरी तरह से उभर आई थी। ब्लाउज़ का कपड़ा उसे अपने ही जिस्म पर काँटों की तरह चुभ रहा था।

कामिनी का दिमाग सुन्न पड़ता जा रहा था। वो खुद हैरान थी। शहर में कादर की वो हैवानियत, शमशेर का वो पागलपन या रघु के साथ बिताए गए उन पलों में भी... उसने कभी अपनी ज़िंदगी में अपने ही शरीर में ऐसी बेलगाम, ऐसी प्यासी और ऐसी तड़पा देने वाली उत्तेजना महसूस नहीं की थी।

उस बूढ़े हकीम की उस दवा ने कामिनी के अंदर की एक ऐसी भूखी औरत को आज़ाद कर दिया था, जो अब किसी भी कीमत पर ज्वालामुखी की तरह फट पड़ना चाहती थी। 

उसे अपनी चुत से कुछ निकलता हुआ महसूस हो रहा था, लेकिन निकल नहीं रहा था यही वो तड़प थी जो उसे बेचैन कर रही थी,

वो बिस्तर की चादर को अपनी मुट्ठियों में कसकर भींच रही थी और उसकी नज़रें दरवाज़े पर टिकी थीं...
पाँव मे मोच थी वो दरवाजा भी बंद नहीं करने जा सकती थी!
अजीब दुविधा और तड़प ने कामिनी को घेर लिया था.

क्रमशः.....


नोट :- दोस्तों आपसे एक विनती है, मेरे पास आजकल समय कम है, मै सिर्फ लिख पा रहा हूँ, pics नहीं बना पा रहा.
यदि आप पाठक मे से कोई मुझे pic बना कर दे सकता है story के लिए तो अच्छा होगा.
आपकी कृपा होंगी.
आप मुझे टेलीग्राम पर msg कर सकते है.
@andypndy search कीजिये मै मिल जाऊंगा.
कहानी के अकॉर्डिंग pics मिल जाये तो मजा आ जाये








Post a Comment

3 Comments

  1. कामुक वाइनApril 10, 2026 at 6:55 AM

    दोस्तों आपसे रखा विनती है, मेरे पास आजकल समय कम है, मै सिर्फ लिख पा रहा हूँ, pics नहीं बना पा रहा.
    यदि आप पाठक मे से कोई मुझे pic बना कर दे सकता है story के लिए तो अच्छा होगा.
    आपकी कृपा होंगी.
    आप मुझे टेलीग्राम पर msg कर सकते है.
    @andypndy search कीजिये मै मिल जाऊंगा.
    कहानी के अकॉर्डिंग pics मिल जाये तो मजा आ जाये

    ReplyDelete
  2. Kamini ka kaam to tamaam ho gaya
    Hakim apne paan ki peek se kamini ko laal karne wala hai
    Ek baar lagam buddhe ke hath me aa jaye to kamini ko jaise chahe noch ke khane do
    Ye hawas ka khel itna haiwaniyat bhara ho ki kamini ki rooh se sharir chutne ka ahesaas ho
    Bas bich me tauji, Ramesh ya fagun aakar sara mood na kharab kar de

    ReplyDelete
  3. Bahot hi kamuk update
    Asha karta hu ki agle update me kamini ka nagn tandav dikh jaye

    ReplyDelete