मेरी माँ कामिनी 3.0 - अध्याय 8
जमील और शंकर की हालत खराब थी। दोनों की साँसें हलक में अटक गई थीं। दिल जोर-जोर से धड़क रहे थे। लग रहा था जैसे मौत बालकनी के दरवाजे पर खड़ी है। रमेश की परछाई परदे के दूसरी तरफ साफ नजर आ रही थी—भारी, लड़खड़ाती हुई।
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चाट….. चरररररररर....
हैंडल घूमा और बालकनी का दरवाज़ा धीरे से खुल गया।
बस... खेल ख़त्म।
कामिनी कि ज़िंदगी, इज़्ज़त, संस्कार उसका घरेलू जीवन सब कुछ इसी एक पल में मौत के मुहाने पर आ खड़ा हुआ था। रमेश अब ठीक सामने, बालकनी की चौखट पर खड़ा था।
कामिनी तो जैसे ठंड और खौफ़ से जमकर बर्फ़ बन चुकी थी। उसके कपड़े अस्त-व्यस्त थे, और उसने महज़ साड़ी के लाल पल्लू से अपने खुले हुए सीने को ढकने की नाकाम कोशिश की थी, लेकिन उस पतले कपड़े के पार उसका हाँफता हुआ जिस्म साफ़ झलक रहा था।
उसके ठीक पीछे, अँधेरे में जमील और शंकर अपनी साँसें रोके बुत (statue) बने खड़े थे। दोनों की सिट्टी-पिट्टी गुम थी, उन्हें साक्षात् अपनी मौत दिखाई दे रही थी।
रमेश की आँखें आधी बंद और आधी खुली थीं। नशे के कारण उसकी लाल आँखें बुरी तरह सूजी हुई थीं और जिस्म में इतनी ताकत भी नहीं थी कि वो सीधा खड़ा रह सके।
"वो... वो... मैडम, थोड़ा पानी मिल जाता तो..."
सन्नाटे को चीरती हुई रमेश की लड़खड़ाती आवाज़ गूँजी।
एक पल के लिए तो किसी को समझ ही नहीं आया कि रमेश ने क्या कहा।
साला शराबी... भयंकर नशे में धुत्त रमेश अपनी ही बीवी को पहचान नहीं सका! उसकी आँखों के सामने सब कुछ धुंधला था, और उसे इस बात का ज़रा भी होश नहीं था कि वो इस वक़्त कहाँ है और किसके सामने खड़ा है।
उफ़्फ़...
कामिनी के हलक से एक बेहद गहरी और गर्म साँस छूटी। वो लाइन सुनते ही उसका सारा खौफ़ और कंपा देने वाला डर, पलक झपकते ही काफूर (ग़ायब) हो गया। उसे अचानक याद आया कि रमेश को दारू पीने के बाद अगले दिन कुछ भी याद नहीं रहता। चोरी पकड़े जाने के खौफ़ और मादक उत्तेजना में वो ये सबसे अहम बात भूल ही गई थी।
"ह-हाँ... हाँ, देती हूँ," कामिनी की साँसें अभी भी तेज़ थीं। उसने थूक निगलकर अपने सूखे गले को तर किया और फिर तुरंत अपनी आवाज़ में एक मालकिन वाला रौब ले आई।
"शंकर, साहब को थोड़ा पानी दो," कामिनी ने बड़ी ही चालाकी और ठंडे दिमाग़ से हुक्म चलाया।
शंकर और जमील अभी भी उल्लू की तरह आँखें फाड़े खड़े थे। उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि मौत के मुँह से वापस कैसे लौट आए।
कामिनी ने पीछे अँधेरे में खड़े शंकर को घूरकर इशारा किया "जाओ...!"
शंकर की जान में जान आई। वो फ़ौरन अँधेरे से बाहर निकला और लड़खड़ाते रमेश को अपने मज़बूत हाथों से थाम लिया।
"थैंक यू... थैंक यू भाईसाहब... थोड़ा पानी..." रमेश नशे में बुदबुदाता हुआ शंकर के सहारे वापस कमरे के अंदर चला गया।
पीछे बालकनी में सिर्फ़ सन्नाटा रह गया।
कामिनी एक बार फिर पीछे मुड़ी। अँधेरे कोने में खड़ा जमील अभी भी हैरत से कामिनी को ही घूर रहा था। वो इस औरत के शातिर दिमाग़ और निडरता को देखकर अंदर तक हिल चुका था।
कामिनी खुद नहीं जानती थी उसमे ये चालाकी कहाँ से आ गई, जिस्म कि गर्मी औरत को बहुत कुछ सीखा देती है.
"वो ऐसे ही हैं..." कामिनी के लाल होंठों पर एक बहुत ही शैतानी और बेबाक मुस्कान तैर गई, "दारू पीने के बाद उन्हें कुछ याद नहीं रहता... यहाँ तक कि अपनी बीवी को भी नहीं पहचानते।"
यह कहकर कामिनी ने अपनी साड़ी का पल्लू झटके से कंधे पर डाला और अपनी मादक चाल में कमरे की तरफ़ चल दी।
पच... पच... कि एक धीमी आवाज़ बालकनी से होती अंदर तक चली गई.
जमील उल्लू का चरखा औरत के इस रूप को देखता ही रह गया.
अंदर शंकर टेबल से पानी का गिलास भरकर रमेश को पिलाने की जद्दोजहद कर रहा था। लेकिन कामिनी का लक्ष्य अब वो दोनों मर्द नहीं थे, उसका लक्ष्य बाथरूम था। वो बिना किसी को कुछ कहे, सीधे बाथरूम में घुस गई.
बाथरूम का दरवाजा बंद होते ही कामिनी ने पीछे से कुंडी लगा दी। ठंडी टाइल्स पर उसके नंगे पैर पड़े। सामने बड़े आईने में उसका अक्स साफ दिख रहा था।
लाल आँखें। बिखरे गीले बाल। सूजे हुए होंठ। गले पर हल्के लाल निशान। साड़ी का पल्लू अभी भी ठीक से नहीं लपटा था। ब्लाउज के बटन टूटे हुए थे, कपड़ा कंधों से लगभग सरक चुका था।
उसने धीरे से साड़ी का पल्लू हटाया। फिर ब्लाउज के बचे-खुचे हिस्से को कंधों से नीचे सरका दिया। कपड़ा फर्श पर गिर गया।
कामिनी पूरी तरह नंगी खड़ी थी।
आईने में उसके भारी स्तन साफ दिख रहे थे। जगह-जगह दाँतों और उंगलियों के निशान छपे हुए थे, लाल, हल्के बैंगनी। निप्पल अभी भी सख्त और काले-गुलाबी थे। शंकर के मुँह और हाथों की याद ताजा थी।
उसकी नजर नीचे गई।
जाँघों के बीच… चुत कचौड़ी की तरह फूल गई थी। सूजी हुई, लाल, और अभी भी खुली हुई। जमील का गाढ़ा सफेद वीर्य धीरे-धीरे रिस-रिसकर उसकी जाँघों के अंदरूनी हिस्से पर चमकदार धार बना रहा था। ठंडी हवा ने उस गीली जगह को छुआ तो एक सिहरन पूरे जिस्म में दौड़ गई।
इस्स्स्स..... ठंडी सिस्कारी बाथरूम मे गूंज उठी.
कामिनी ने आईने में खुद को देखा और उसके अंदर की आग फिर से भड़क उठी।
कामिनी खुद के ही नंगे जिस्म को देख उत्तेजित हो रही थी, होती भी क्यों ना उसका गिरा जिस्म सुर्ख लाल हो कर चमक रहा था, अंग अंग खील उठा था.
उसने शावर ऑन कर दिया।
गुनगुने पानी की तेज धार उसके तपते जिस्म पर गिरने लगी।
पानी सिर से लेकर पैरों तक बहने लगा। बाल चिपक गए। स्तनों पर पानी की धाराएँ फिसलने लगीं। जाँघों के बीच चुत कि सिकाई करता हुआ पानी फर्श चाटने लगा.
पानी सिर से लेकर पैरों तक बहने लगा। बाल चिपक गए। स्तनों पर पानी की धाराएँ फिसलने लगीं। जाँघों के बीच चुत कि सिकाई करता हुआ पानी फर्श चाटने लगा.उन्माद, अजीब सी राहत ने कमीनी को आँखें बंद करने पर मजबूर कर दिया.
आँखों का बंद होना था कि अंधेरे में जमील का लंबा काला लंड और शंकर का मोटा गोरा लंड नाचने लगे। एक उसके मुँह में था, एक उसकी चुत में जाने ही वाला था… और बीच में रमेश आ गया। शंकर के साथ नाइंसाफी हो गई थी। उसका लंड सिर्फ छूकर रह गया था। अंदर तक नहीं पहुँच पाया था।
यह ख्याल आते ही कामिनी की चुत फिर से फड़कने लगी। शंकर का लंड ना लेने का अधूरापन उसे खलने लगा.
पानी के नीचे खड़े-खड़े उसने दोनों हाथों से अपने स्तनों को सहलाना शुरू किया।
निशानों पर उंगलियाँ फेरते हुए। फिर नीचे गई। जाँघों को रगड़ा। चुत पर हथेली रखी। सूजी हुई पंखुड़ियों को हल्के से मसला।
निशानों पर उंगलियाँ फेरते हुए। फिर नीचे गई। जाँघों को रगड़ा। चुत पर हथेली रखी। सूजी हुई पंखुड़ियों को हल्के से मसला। आआहहहह...... भीना भीना लेकिन एक मादक दर्द से कामिनी का जिस्म सिहर उठा.
जमील का वीर्य उसकी उंगलियों से चिपक रहा था। उसने दो उंगलियाँ अंदर डालीं और धीरे-धीरे घुमाया साफ करने के बहाने, लेकिन असल में उस खाली जगह को फिर से महसूस करने कि चाह थी।
“आअह्ह्ह…” हल्की सिसकी कि आवाज बाथरूम कि दीवारों से टकरा कर कहीं खो गई।
पानी उसके जिस्म को धो रहा था, लेकिन अंदर की आग नहीं बुझ रही थी। चुत अभी भी सुलग रही थी, फड़क रही थी। शंकर के मोटे लंड का अहसास याद आ रहा था, जो बस मुहाने पर टिका था और अंदर जाते-जाते रह गया था।
कामिनी ने आँखें खोलीं। आईने में उसका गीला, नंगा जिस्म चमक रहा था। स्तन, जाँघें, फूलती चुत सब पानी से भीगे हुए थे
वह मुस्कुराई। शावर बंद हो चूका था
कामिनी के हाथ बाथरूम की चिटकनी की तरफ़ बढ़े, लेकिन अचानक रुक गए। उसके दिमाग़ में एक खौफ़नाक कशमकश चल रही थी। वो आज एक ऐसा कदम उठाने जा रही थी, जिसकी उसने कभी सपने में भी कल्पना नहीं की थी। वो दो सड़कछाप, मवाली टाइप मर्दों के सामने अपनी संपूर्ण नग्न अवस्था में जाने का सोच रही थी। यह जानते हुए भी कि उसी कमरे में उसका पति रमेश मौजूद है।
'वो सोया होगा या नहीं? अगर जाग गया तो?' इस ख़याल से कामिनी के हाथ ठिठक गए। शायद उसके अंदर अभी भी किसी कोने में कुछ शर्म या पकड़े जाने का डर बाकी था।
लेकिन तभी... शंकर के वो शब्द उसके कानों में गूँज उठे "यार, मैडम के सामने तो महँगी से महँगी रंडी भी फ़ैल है।"
यह वाक्य किसी ख़तरनाक नशे की तरह उसके दिमाग़ पर चढ़ गया। कामिनी अब वाक़ई ख़ुद को किसी भी रंडी से बड़ा साबित करने पर आमादा थी.
खट... चरररर...
बाथरूम की चिटकनी आख़िरकार खुल ही गई। दरवाज़ा हल्का सा खुला। बाहर कमरे की ठंडी हवा जैसे ही कामिनी के गर्म और सुलगते जिस्म से टकराई, उसके बदन का रोम-रोम फिर से सिहर उठा।
'रमेश जाग भी रहा होगा तो क्या? कल सुबह उसे क्या ही याद रहेगा?'
बस, इसी एक ख़याल ने कामिनी के अंदर वो बेहयाई भरा विश्वास पैदा कर दिया। आख़िरकार, जब कोई औरत एक बार घर की दहलीज़ और संस्कारों की सीमा लाँघने का फ़ैसला कर लेती है, तो वो अपने हर गुनाह के लिए ऐसे बहाने ढूँढ ही लेती है।
दरवाज़ा पूरा खुला और कामिनी अपने उसी नंगे, गीले रूप में बाहर आ गई।
बाथरूम का दरवाज़ा खुलने की हल्की सी आवाज़ सुनकर कमरे में बैठे शंकर और जमील की नज़रें एक झटके में उस तरफ़ घूमीं... और फिर वो नज़रें वहीं पत्थर की तरह जम गईं।
"माशाल्लाह..."
"हे भगवान..."
उन दोनों मर्दों के मुँह से बेसाख्ता अपने-अपने भगवान का नाम निकल गया। एक पल के लिए उन्हें लगा कि शायद रमेश ने उन्हें मार दिया है और वो सीधे जन्नत में आ गए हैं, जहाँ उनके सामने स्वर्ग की कोई अप्सरा खड़ी है।
कामिनी उनके सामने संपूर्ण नंगी खड़ी थी अपने बेदाग़ गोरे, गदराए हुए जिस्म और भारी काठ के साथ। उसके भीगे बालों से पानी की बूँदें मोतियों की तरह फिसलकर उसके पूरे जिस्म पर गिर रही थीं।
कामिनी बिल्कुल खामोश, पूरे गुरूर के साथ खड़ी उन दोनों की फटी हुई और प्यासी आँखों को देख रही थी। जैसा उसने सोचा था, अंदर का नज़ारा बिल्कुल वैसा ही था। रमेश बिस्तर पर बेसुध पड़ा भारी खर्राटे भर रहा था,
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कामिनी कमरे के बीचों-बीच खड़ी थी।
पूरी नंगी।
बाथरूम से निकली, अभी भी गीली थी । बालों से पानी की बूँदें मोतियों की तरह फिसल-फिसलकर उसके भारी स्तनों पर गिरती फिर नीचे जाँघों की ओर बह कर फर्श गिला कर देती,
सामने जमील और शंकर पत्थर की तरह जड़ हो गए थे। मुँह खुले के खुले। आँखें फटी हुई।
दोनों ने अपनी जिंदगी में बहुत औरतें देखी थीं, लेकिन ऐसी… ऐसी नंगी, ऐसी बेखौफ, ऐसी गदराई हुई औरत शायद पहली बार देख रहे थे।
एक पल के लिए कामिनी के दिल में एक हल्की सी धचक हुई।
‘क्या मैंने गलती कर दी? इतनी जल्दी… इतनी बेहयाई से नंगी होकर बाहर आ जाना सही था?’
लेकिन अगले ही पल वो ख्याल हवा हो गया।
वक्त गुजर चुका था। सोचने का समय अब बचा ही कहाँ था।
कामिनी ने धीरे-धीरे कदम बढ़ाए।
एक… दो… तीन…
अब वो ठीक रमेश के बगल में खड़ी थी।
बिस्तर पर उसका पति बेसुध पड़ा खर्राटे भर रहा था। मुँह खुला हुआ, लार टपक रही थी।
कामिनी के गीले बालों से टपकती पानी की कुछ बूँदें रमेश के बाजू और सीने पर गिर गईं। लेकिन रमेश टस से मस नहीं हुआ।
कामिनी की आँखों में अब कोई डर नहीं था। कोई शर्म नहीं थी।
अधूरी प्यास, हकीम लकड़द्दीन कि दवा ने उसके अंदर बहुत कुछ बदल दिया था, वो बागी हो गई थी, उसका जिस्म कड़क हो चूका था, एक अंजानी सी चाह, एक लावा हर वक़्त उसके जिस्म मे दौड़ता ही रहता.
अब वो कोई संस्कारी बहू नहीं रह गई थी।
वो एक बेहया, सुलगती हुई रंडी बन चुकी थी।
उसने दोनों मर्दों की तरफ देखा और बहुत धीमी, काँपती हुई आवाज़ में फुसफुसाया
“क्या… औरत नहीं देखी कभी?”
जमील की आँखों में एक चमक आ गई। उसने पान की पीक निगली और अपनी भारी, कर्कश आवाज़ में बोला
“बहुत देखी… लेकिन तेरी जैसी रंडी नहीं देखी।”
ईईस्स्स…
‘रंडी’ शब्द कामिनी के कानों में गूँजा और सीधा उसकी चुत तक पहुँच गया।
एक मीठी, गंदी लहर उसके पूरे जिस्म में दौड़ गई।
उसने महसूस किया कि सिर्फ इस एक गाली ने उसकी जाँघों के बीच फिर से गीलापन बढ़ा दिया है।
जमील ने तुरंत आगे बढ़कर कामिनी का हाथ पकड़ लिया और जोर से अपनी तरफ खींचा।
कामिनी का बैलेंस बिगड़ गया।
वो लड़खड़ाई… और सीधा रमेश के बगल में, पीठ के बल बिस्तर पर आ गिरी।
गिरते ही उसके दोनों पैर अपने-आप खुल गए।
कमरे की हल्की रोशनी में जो नजारा दिखा… वो जानलेवा था।
कामिनी की गीली, सफेद, बिल्कुल साफ और फूलती हुई चुत पूरी तरह खुलकर शंकर और जमील के सामने आ गई।
जमील का गाढ़ा सफेद वीर्य का अब वहाँ कोई नामोनिशान नहीं था, चुत जरूर खुली हुई थी, अंदर का गुलाबी हिस्सा दिख रहा था, जमील कि मेहनत रंग लाई, उसने इस चुत को खोल दिया था. जाँघों के अंदरूनी हिस्से चमक रहे थे।
ठंडी हवा जैसे ही उस खुली, संवेदनशील जगह पर लगी…
“आअह्ह्ह… आराम से… भागी तो नहीं जा रही…”
कामिनी की सिसकी निकली।
उसकी चुत ठंडी हवा से सिहर उठी। दोनों पंखुड़ियाँ हल्के-हल्के सिकुड़ कर फिर से खुल जाती.
कामिनी का रोया रोया हवस, उत्तेजना कि आग मे जल रहा था.
शंकर अब और बर्दाश्त नहीं कर पाया।
वो बिस्तर के किनारे तक आ गया। उसने अपनी आँखें कामिनी की खुली हुई चुत पर जमा दी।
तभी जमील ने कामिनी के घुटनों को और फैला दिया।
“देख शंकर… हरामी ऐसी चुत देखी है तूने कभी जीवन मे? कितनी साफ… कितनी गरम…”
जमील दिल से तारीफ़ कर रहा था कामिनी के जिस्म कि.
कहाँ इन गरीब फटीचरों कि किश्मत मे थी ऐसी चीज,
"हाँ भाई.. ना जाने हमने कौन सा ऐसा नेक काम किया था कि ये मैडम मिल गई " शंकर लगभग हाकलता हुआ बोला, उसके मुँह से शब्द नहीं निकल पा रहे थे, मुँह मे पानी आ रहा था.
कामिनी की साँसें तेज हो गईं। उसने आंखे बंद कर ली, होंठ आपस मे भींच गए, उसने अपने जिस्म को उन दोनों के हवाले कर दिया था, अब उनकी मर्ज़ी थी वो क्या करते है, कैसे रोंदते है इस गद्दाराये जिस्म को.
हालांकि कामिनी ने भी कभी नहीं सोचा था कि उसके नीरस जीवन मे ऐसा मौका आएगा कि दो मर्दो जे सामने वो बेशर्म रंडी कि तरह पैर फैला कर लेटी होंगी.
रमेश ठीक उसके बगल में खर्राटे ले रहा था।
और वो… पूरी नंगी, पैर फैलाए, दो अनजान मर्दों के सामने अपनी सबसे निजी जगह दिखाए पड़ी थी।
उसके होंठ काँपे।
एक बहुत ही धीमी, बेहया सी फुसफुसाहट निकली—
“अब… अब क्या देख रहे हो……इस्स्स.... देखते ही रहोगे...”
अभी थोड़ी देर पहले तक दोनों के लंड डर से मुरझा गए थे, वो एकाएक फड़फड़ाने लगे, सामने का नजारा देख कर.
जमील ने तुरंत पैंट उतारी... और फिर से चुत मे उतरने कि तैयारी करने ही वाला था कि....
"हट मादरचोद.... तू ही घुसेगा क्या साला हर बार, औरत से कैसे पेश आते है पता भी है तुझे, बस चुत देखी नहीं कि लंड घुसेड़ने कि सोचता है, ऐसी चुत रोज़ नहीं मिलती, इसकी पूजा करनी पडती है पहले,"
शंकर ने एक झटके से जमील को साइड कर दिया.
कामिनी उन दोनों कि बहस देख मंद ही मंद मुस्कुरा दी, किसी औरत के लिए इस से ज्यादा गर्व कि क्या बात होंगी कि दो मर्द उसकी चुत को भोगने के लिए आपस मे लड़ रहे है.
कामिनी ने सर उठा कर देखा, उसकी जांघो के बीच शंकर का सर दिख रहा था, चुत पर गर्म गर्म सांसे महसूस हो रही थी.
शंकर बिस्तर के किनारे घुटनों के बल बैठ गया।
उसकी गर्म साँसें कामिनी की खुली हुई चुत पर पड़ रही थीं।
कामिनी की दोनों टाँगें फैली हुई थीं। रमेश ठीक बगल में खर्राटे ले रहा था। उसका एक घुटना रमेश कि कमर को छू कर अलग हो जाता, लेकिन अब इस उन्माद के खेल मे किसको परवाह थी उस शराबी कि.
शंकर ने दोनों हाथों से कामिनी की गोरी जाँघों को पकड़ा और धीरे से और फैला दिया। उसकी गर्दन उस सुलगती दरार को महसूस करने के लिए आगे को झुक गई।
आआहहहह.... एक गर्म सांस का भभका कामिनी कि चुत से टकराया, लूरि तरह गीली चुत अंदर तक सिहर उठी.... उउउफ्फ्फम... कामिनी ने अपने हाथ ऊपर कर बिस्तर के सिरहाने को पकड़ लिया...
तभी.... पच.... चप.... करती शंकर कि गीली जीभ की एक बहुत हल्की, नम छुअन पच्च… से कामिनी की कमर हल्के से ऊपर को उछल गई।
“आअह्ह्ह…”
शंकर ने जल्दबाजी नहीं की।
उसने जीभ को चुत की दोनों पंखुड़ियों के बीच धीरे-धीरे फेरना शुरू कर दिया। नीचे से ऊपर… ऊपर से नीचे।
हर फेर के साथ जीभ थोड़ी और गहराई तक जाती।
चुत का चाटोरा मालूम पढ़ता था, जानता था औरत क्या चाहती है,
पच्च… पच्च… श्श्श…... आअह्ह्ह....
शायद कामिनी इसी चीज को महसूस करना चाहती थी, यही वो अधूरापन था जिसने उसे ऐसा बागी बना दिया था.
कामिनी की उंगलियाँ बिस्तर की चादर में गड़ने लगीं।
उसकी साँसें तेज हो रही थीं।
शंकर की जीभ सीधे चुत के उभरे हुए, फूलते हुए दाने पर आ गई। कामिनी कि चुत का दाना बहार झाँक रहा था, बिल्कुल कड़क मादक लाल सुर्ख.
शंकर इस हसीन लम्बे को चुबलाने से कैसे वंचित रह जाता, उसने दाने को होंठों के बीच ले लिया और बहुत हल्के से चूसने लगा।
आआआहब्बब....... इस्स्स... शंकर.... उउफ्फ्फ... कामिनी ने गांड सिकोड ली, कमर ऊपर उठ गई हाथ शंकर के सर को चुत ने अंदर धकेलने लगे.
शंकर रुका नहीं उसने दाँतों से दाने को पकड़ हल्का सा दबा दिया.
“आआअह्ह्ह… ईसससस…माआआ.... उउउफड़.... मार गई...!”
कामिनी की कमर बिस्तर से उठ गई। मानो कामिनी कि आत्मा को छेड़ दिया गया हो.
शंकर रुका नहीं।
वह दाने को जीभ से गोल-गोल घुमा रहा था, कभी हल्का चबाता, कभी जोर से चूसता।
कभी पूरी जीभ चुत के अंदर धकेलकर उसकी दीवारों को चाटता।
पच्च… पच्च… पच्च…
गीली, चिपचिपी आवाजें कमरे में गूँज रही थीं।
कामिनी की आँखें बंद थीं। होंठ खुले हुए।
उसे फर्क साफ महसूस हो रहा था।
जमील हिंसक था। सीधा लंड पेलने वाला।
शंकर… शंकर सहला-सहला कर प्यार कर रहा था।
जैसे कोई कोई नाजुक चीज चख रहा हो।
“आअह्ह्ह… शंकर… और… वहाँ… हाँ… वहीं…”
कामिनी की आवाज टूट-टूटकर निकल रही थी।
उसकी जाँघें काँपने लगीं। वो शंकर के सर को पकड़ के रास्ता दिखा रही थी, बता रही थी कहाँ चूसना है, कहाँ उसकी हवस भरी हुई है.
शंकर ने दाने को फिर से मुँह में भर लिया और जोर से चूसने लगा। साथ ही दो उंगलियाँ चुत मे अंदर धकेल दीं।
कामिनी का दिमाग सुन्न पड़ने लगा।
आआआहहहह..... उउफ्फ्फ.... मर गई...
मदहोशी ने कामिनी के वजूद को पूरी तरह से ढक लिया था,
उसी मदहोशी में उसका एक हाथ बेकाबू होकर बगल में चला गया। जैसे कुछ ढूंढ रही हो.... आखिर उसे मिला भी जमील का तना हुआ, काला लंड उसकी मुट्ठी में आ गया।
कामिनी ने आँखें नहीं खोलीं।
सिर्फ हाथ से लंड को पकड़कर अपनी तरफ, अपने मुँह की ओर खींच लिया।
जमील जानता था क्या करना है,
वह तुरंत बिस्तर पर घुटनों के बल चढ़ गया।
कामिनी के सिर के पास आकर अपना लंड उसके होंठों के सामने ला दिया।
कामिनी ने तुरंत मुँह खोल दिया, यही तो चाहिए था, अब एक लंड से कहाँ काम चलने वाला था,
देखते ही देखते जमील का खुरदरा, गंदे स्वाद वाला लंड उसके गर्म मुँह में समा गया।
“उफ़्फ़… मोहतरमा…आअह्ह्ह... क्या औरत है साली ”
जमील की सिसकी निकली।
कामिनी ने कभी अपने मुँह का ऐसा इस्तेमाल नहीं किया था। बीस साल तक सिर्फ पति के लिए कभी-कभी, आधे-अधूरे मन से, वो भी रमेश कि मार पीट के डर से.
यही औरत का चरित्र है पति का लंड चूसने मे उसे हिचक लगती है,
वही आज… आज वह दोनों हाथों से जमील के लंड को पकड़े हुए उसे गहराई तक निगल रही थी, जबकि नीचे शंकर उसकी चुत को चाट-चाटकर पागल किए जा रहा था।
पच्च… सुड़प… पच्च…
ऊपर मुँह की आवाजें।
नीचे चुत चाटने की गीली आवाजें।
कामिनी पूरी तरह दो मर्दों के बीच फँस चुकी थी।
और रमेश… अभी भी बगल में बेसुध पड़ा खर्राटे ले रहा था। उल्लू का चरखा इस बात से अनजान कि उसकी बीवी क्या बनती जा रही है.
गलती रमेश कि ही है, काश उसने कामिनी का ख्याल रखा होता?
खेर नियति यही चाहती थी.
कामिनी की मदहोशी अब पूरी तरह हावी हो चुकी थी।
शंकर की जीभ उसके दाने पर लगातार काम कर रही थी। कभी चूसता, कभी हल्के दाँतों से दबाता, कभी पूरी जीभ अंदर तक धकेलकर दीवारों को चाटता।
पच्च… पच्च… श्श्श…
कामिनी का मुँह जमील के काले, खुरदरे लंड से भरा हुआ था।
वह उसे गहराई तक निगल रही थी। लार की धार उसके गालों से बहकर गर्दन से होती हुई तकिये को भीगो रही थी।
जमील के हाथ कामिनी के बालों में उलझे हुए थे, लेकिन वह जोर नहीं लगा रहा था। सिर्फ महसूस कर रहा था।
“आअह्ह्ह… मोहतरमा… क्या मुँह है तेरा… साला तेरे सामने तो विदेशी रंडी भी पानी काम है आअह्ह्ह... "
जमील की आवाज़ काँप रही थी।
नीचे शंकर ने अचानक अपनी जीभ हटा ली।
कामिनी की चुत ठंडी हवा में सिहर उठी।
“नहीं… मत रोको… चाटो...”
कामिनी के मुँह से लंड निकला और एक अधूरी सिसकी फूट पड़ी।
लेकिन शंकर अब बिस्तर पर चढ़ चुका था, उसे अब इस चुत को बस भोग लेना था, कब तक पूजा करता आखिर.
उसने कामिनी की दोनों जाँघों को और ज्यादा फैला दिया, कामिनी कि चुत पूरी तरह से उभार कर सामने आ गई, बिल्कुल गीली थूक से सनी हुई.
कामिनी का घुटना रमेश कि कमर मे धसा जा रहा था.
शंकर ने अपने मोटे, गोरे लंड को पकड़कर गीली, फूलती हुई चुत के मुहाने पर टिका दिया।
गर्म सुपाड़ा जैसे ही छुआ… आआहहहह.... इसससस...
कामिनी की कमर अपने-आप ऊपर उठ गई, वो खुद उसे लेना चाहती थी, ये अजीब बात थी चुत कि खुद कि इच्छा होती है, उस पर दिमाग़ का नियंत्रण नहीं होता, कामिनी ने खुद महसूस किया इस बात को.
शंकर ने धीरे से कमर आगे बढ़ाई।
पच्च्च…
शंकर का मोटा सुपाडा अंदर समा गया.
आआआहहहह..... आउच...
कामिनी की आँखें खुल गईं। मुँह खुला रह गया।
भले चुत उसकी खुली हुई थी लेकिन शंकर का लंड कुछ ज्यादा ही मोटा था.
जमील का लंड उसके गाल से रगड़ खा रहा था।
शंकर रुका।
उसने कामिनी की आँखों में देखा।
फिर एक और धीमा धक्का दिया।
धप्प… धच....
आधा लंड अंदर चला गया।
“आआअह्ह्ह… शंकर…”
कामिनी की आवाज़ टूट गई।
शंकर ने दोनों हाथ उसकी कमर पर जमाए और धीरे-धीरे पूरा लंड अंदर धकेल दिया।
धप्प्प… पछह्ह्ह्हह्ह.... फचम्म..
जड़ तक।.. आअह्ह्ह.... ऊफ्फफ्फ्फ़... गु... गु....
कामिनी का पूरा जिस्म तन गया।
उसकी चुत ने शंकर के मोटे लंड को चारों तरफ से जकड़ लिया।
अंदर जमील का बचा-खुचा वीर्य और उसका अपना कामरस मिलकर एक गरम, चिपचिपा घोल बन चुका था।
शंकर कुछ पल अंदर रुका।
साँसें भारी थीं।
“मैडम… कितनी गरम… कितनी तंग…कितनी कसी चुत है तेरी? कब से तेरे पति ने नहीं चोदा तुझे... आअह्ह्ह.....”
उसकी आवाज़ में हैरानी और हवस दोनों थे।
फिर उसने कमर पीछे खींची…
पच्च…
और जोर से धकेली…
धप्प…
धीरे-धीरे रफ्तार बढ़ने लगी।
धप्प… पच्च… धप्प… पच्च…
हर धक्के के साथ कामिनी की भारी गाँड बिस्तर पर पटपटाने लगी।
स्तन जोर-जोर से हिलने लगे।
कामिनी ने फिर से जमील का लंड मुँह में ले लिया।
अब वह दोनों तरफ से भरी हुई थी।
नीचे शंकर उसकी चुत चीर रहा था, ऊपर जमील उसके मुँह को।
रमेश बगल में खर्राटे ले रहा था।
उसके कानों में सिर्फ अपनी ही साँसें गूँज रही थीं।
उसे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था।
कामिनी की आँखें फिर से बंद हो गईं।
मदहोशी पूरी तरह छा गई।
वह बस महसूस कर रही थी, शंकर का मोटा लंड अंदर-बाहर हो रहा था,
जमील का खुरदरा लंड उसके गले तक जा रहा था,
और उसके अपने जिस्म से निकलती हुई गीली, चिपचिपी आवाजें।
पच्च… धप्प… सुड़प… पच्च… धप्प…
शंकर की रफ्तार धीरे धीरे तेज होने लगी।
धप्प… धप्प… धप्प…
कामिनी की चुत पूरी तरह खुल चुकी थी।
हर धक्के के साथ उसके स्तन जोर से हिल रहे थे और जमील का लंड उसके मुँह में और गहराई तक चला जा रहा था।
थोड़ी देर बाद शंकर रुक गया।
साँसें भारी थीं।
“मैडम… जरा पलट जाओ…”
कामिनी ने आँखें खोलीं।
जमील का लंड उसके मुँह से निकला, लार की लंबी तार टूटकर उसके ठुड्डी पर गिर गई।
शंकर ने कामिनी की कमर पकड़ी और उसे धीरे से घुमा दिया।
अब कामिनी घुटनों और हाथों के बल हो गई।
चारों खाने चित।
उसकी भारी गाँड हवा में उठ गई थी।
चुत पूरी तरह खुली हुई, चमकदार, और अभी भी शंकर के लंड के आकार में फैली हुई।
शंकर ने पीछे से दोनों हाथ उसकी गाँड के दोनों हिस्सों पर रखे और फैला दिए।
फिर अपने मोटे लंड को फिर से मुहाने पर टिकाया।
एक जोरदार धक्का।
धप्प्प…
पूरा लंड एक बार में जड़ तक चला गया।
“आआअह्ह्ह…!”
कामिनी की चीख दबी हुई निकली। उसने मुँह बिस्तर की चादर में दबा लिया।
शंकर ने कमर पकड़कर जोर-जोर से चलाना शुरू कर दिया।
धप्प… धप्प… धप्प… धप्प…
हर प्रहार के साथ कामिनी की गाँड शंकर की जाँघों से पटपटाने लगी। थाड... थाड....
आवाज साफ गूँज रही थी।
जमील तुरंत कामिनी के सिर के पास आ गया।
घुटनों के बल बैठकर अपना काला लंड फिर से उसके मुँह के सामने ला दिया।
कामिनी ने बिना देर किए मुँह खोल दिया।
जमील ने बाल पकड़कर धीरे-धीरे लंड अंदर धकेलना शुरू कर दिया ।
अब पोजीशन पूरी तरह बदल चुकी थी।
कामिनी चारों खाने थी।
पीछे शंकर उसकी चुत में जोर-जोर से पेल रहा था।
आगे जमील उसके मुँह में।
धप्प… सुड़प… धप्प… पच्च… धप्प…
कामिनी का पूरा जिस्म दो मर्दों के बीच झूल रहा था।
हर धक्के के साथ वह आगे जमील के लंड पर धकेली जा रही थी, और जमील के धक्के के साथ पीछे शंकर के लंड पर।
रमेश अभी भी बगल में बेसुध पड़ा था।
उसके खर्राटे जारी थे।
कामिनी की आँखों से पानी आ गया था।
मुँह भरा हुआ था, साँसें नाक से चल रही थीं।
नीचे उसकी चुत शंकर के मोटे लंड को पूरी तरह निगल रही थी।
शंकर ने अचानक गाँड के एक हिस्से पर जोरदार थप्पड़ जड़ दिया।
चटाक…!
“आअह्ह्ह…!”
कामिनी की सिसकी लंड के अंदर ही दब गई।
शंकर ने दूसरा थप्पड़ भी मारा।
फिर दोनों हाथ कमर पर जमाकर रफ्तार और तेज कर दी।
जमील भी अब जोर लगाने लगा।
वह कामिनी के सिर को दोनों हाथों से पकड़े हुए अपने लंड को उसके गले तक पहुँचा रहा था।
कामिनी का जिस्म पूरी तरह से इस्तेमाल हो रहा था।
पीछे से चुत, आगे से मुँह।
और वह…
वह मजे ले रही थी।
शंकर की रफ्तार अब बेकाबू हो चुकी थी।
धप्प… धप्प… धप्प… धप्प…
हर प्रहार के साथ कामिनी की गाँड जोर से हिल रही थी।
माँस के दोनों हिस्से शंकर की जाँघों से पटपटाने की तेज आवाज कर रहे थे।
चुत पूरी तरह खुल चुकी थी। लंड आसानी से अंदर-बाहर हो रहा था, लेकिन हर बार चुत कि दीवारें उसे कसकर जकड़ लेतीं।
आगे जमील अभी भी कामिनी के मुँह में था।
वह बाल पकड़े हुए धीरे-धीरे अंदर-बाहर कर रहा था, लेकिन अभी खुद पर काबू रखे हुए था।
तभी शंकर की साँसें और तेज हो गईं।
उसने कामिनी की कमर दोनों हाथों से और कस ली।
“मैडम… मैं… मैं जाने वाला हूँ…”
कामिनी ने जमील का लंड मुँह से बाहर निकाला।
लार की मोटी धार उसके ठुड्डी से टपक रही थी।
वह पीछे मुड़ी और अधखुली आँखों से शंकर को देखा।
“अंदर… डाल अंदर… पूरा… और अंदर आअह्ह्ह.... जोर से ”
शंकर की आँखें फटी रह गईं।
अगले ही पल उसने कमर पूरी ताकत से आगे धकेली।
धप्प्प्प…
पूरा लंड जड़ तक धँस गया।
शंकर की कमर काँप उठी।
“आआअह्ह्ह… ले… ले पूरा…”
उसका लंड जोर-जोर से धड़कने लगा।
गर्म, गाढ़ा वीर्य की धार एक के बाद एक कामिनी की चुत की गहराई में छूटने लगी।
पहली धार इतनी तेज थी कि कामिनी को लगा जैसे कोई गर्म फव्वारा उसके अंदर फूट पड़ा हो।
उसी पल कामिनी का भी चरम फूट पड़ा।
“आआआह्ह्ह… उउउड़… मै गई… अंदर…!”
उसकी जाँघें बुरी तरह काँपने लगीं।
गाँड सिकुड़-सिकुड़कर शंकर के लंड को निचोड़ रही थी।
कामरस और शंकर का वीर्य मिलकर उसकी जाँघों से बहने लगा।
कामिनी का पूरा जिस्म एक बार तन गया, फिर अचानक पूरी तरह ढीला पड़ गया।
सारी ताकत जैसे निकल गई हो।
वह निढाल होकर आगे की तरफ लुढ़क गई और सीधा जमील के ऊपर आ गिरी।
जमील अचानक उसके भारी, पसीने से भरे जिस्म का वजन महसूस करके पीछे की तरफ गिर गया।
कामिनी उसके सीने पर औंधे मुँह लेट गई।
उसके गीले स्तन जमील के सीने से चिपक गए।
मुँह खुला था, साँसें उखड़ी हुई, आँखें बंद होती गई,
शंकर अभी भी पीछे से उसकी चुत मे धसा हुआ था।
लंड हल्के-हल्के फड़क रहा था, आखिरी बूँदें छोड़ रहा था।
धीरे-धीरे उसने कमर पीछे खींची।
पच्च्च…
लंड निकलते ही कामिनी की खुली हुई चुत से गाढ़ा सफेद वीर्य की धार बाहर बह निकली और उसकी जाँघों पर फैल गई।
जमील के ऊपर लेटी कामिनी अभी भी काँप रही थी।
चरम की लहरें पूरी तरह उतर नहीं पाई थीं।
जमील का लंड अभी भी तना हुआ था।
वह कामिनी के बालों को सहलाते हुए नीचे देख रहा था।
उसके चेहरे पर एक शातिर मुस्कान आ गई.
जमील अभी झड़ा नहीं था। और कामिनी बिल्कुल निढाल उसकी छाती पर पड़ी थी।
*****************
कामिनी का पूरा शरीर जमील के सीने पर औंधे मुँह गिर चुका था।
शंकर के झटको से कामिनी का भारी, गदराया हुआ जिस्म जमील के ऊपर पूरा फैल गया।
गीले, पसीने से चमकते स्तन जमील के रोएँदार सीने से पूरी तरह चिपक गए। निप्पल अभी भी सख्त थे और जमील की त्वचा को छू-छूकर सिहरन पैदा कर रहे थे।
कामिनी का चेहरा जमील के कंधे और गर्दन के बीच दब गया था।
गर्म, उखड़ी हुई साँसें जमील के गले पर पड़ रही थीं।
बाल बिखरे हुए, पसीने से चिपके हुए, जमील के चेहरे और सीने पर बिखर गए थे।
कामिनी का गद्दाराया नरम पेट जमील के पेट पर पूरा चिपका हुआ था।
नीचे उसकी गीली, वीर्य से भरी चुत जमील की जाँघ से सटी हुई थी। शंकर का गाढ़ा वीर्य अभी भी धीरे-धीरे रिस-रिसकर जमील की जाँघ पर गिर रहा था.
कामिनी की दोनों बाँहें जमील के शरीर के दोनों तरफ बेजान पड़ी थीं।
पैर ढीले पड़े हुए, जाँघें थोड़ी खुली।
पूरा वजन जमील पर था।
कामिनी का गदराया, भारी शरीर किसी गर्म रजाई की तरह जमील के ऊपर फैल चुका था।
जमील के नीचे से कामिनी के जिस्म की गर्मी, पसीने की महक, और चुत से आती हुई तेज गंध एक साथ उठ रही थी।
उसका तना हुआ लंड कामिनी के पेट और जाँघ के बीच दबकर और सख्त हो गया।
कामिनी अभी भी हल्के-हल्के काँप रही थी।
चरम की आखिरी लहरें उसके शरीर में दौड़ रही थीं।
आँखें बंद थीं। मुँह थोड़ा खुला हुआ।
आअह्ह्ह.... इसससस.....कभी-कभी एक कमजोर सी सिसकी उसके होंठों से निकल जाती।
जमील दोनों हाथों से उसकी पीठ और गाँड को सहला रहा था। जैसे रेस कि घोड़ी को अगली रेस के लिए तैयार कर रहा हो.
उसकी खुरदरी हथेलियाँ कामिनी की पसीने से भरी, मुलायम पीठ पर फिसल रही थीं।
“मोहतरमा…”
जमील ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा।
“ थक गईं…?”
कामिनी ने जवाब नहीं दिया।
सिर्फ अपना चेहरा जमील के गले में और गहराई तक छुपा लिया।
उसका पूरा नंगा, गर्म, थका हुआ शरीर जमील के सीने पर चिपका हुआ पड़ा था।
******************
कामिनी का पूरा जिस्म अभी भी थर-थर काँप रहा था।
चरम के बाद की कमजोरी पूरे बदन में फैल चुकी थी। वह जमील के सीने पर औंधे मुँह पड़ी हांफ रही थी, जैसे सारी जान निकाल दी गई हो।
लेकिन जमील का लंड उसके पेट के नीचे दबा हुआ कसमसा रहा था।
तना हुआ, गर्म, और बेचैन था।
जमील दया के मूड में बिल्कुल नहीं था।
उसने अपनी दोनों जाँघें फैला दीं।
कामिनी की जाँघें भी अपने-आप उसकी कमर के दोनों तरफ खुल गईं।
जमील का खुरदरा लंड सीधा कामिनी की चुत और गाँड की दरार के बीच दस्तक देने लगा।
चुत पहले से ही शंकर के वीर्य से पूरी तरह तरबतर थी।
गीली, चिपचिपी, और खुली हुई।
पच्च… पचाक्क्क…
जमील ने कमर हल्के से ऊपर उठाई और फिर एक ही धक्के में अपना लंड कामिनी की चुत में धँस दिया।
“आआआह्ह्ह… उउउफ़्फ़्फ़… हमफ़्फ़्फ़…”
कामिनी सिसक उठी।
उसका सर ऊपर उठा, फिर थककर वापस जमील के कंधे पर झूल गया।
चुत इतनी गीली और पहले से खुली हुई थी कि जमील का लंड एक ही बार में पूरा अंदर तक समा गया।
दर्द की कोई गुंजाइश ही नहीं बची थी। सिर्फ एक गहरी, भरी हुई अनुभूति थी, कामिनी का जिस्म वापस से भर गया.
पाव्व… पच्च… पचक…
जमील ने बिना किसी देरी के अपनी कमर ऊपर उठाई, फिर जोर से नीचे धकेली।
लंड शंकर के गाढ़े वीर्य में फिसलता हुआ अंदर गया।
बाहर निकला तो ढेर सारा सफेद वीर्य बिस्तर पर चूने लगा।
पच्च… ओच्च… पच्च… पचक…
जमील के धक्के शुरू हो गए।
धीमे नहीं। सीधा तेज।
“आअह्ह्ह… आअह्ह्ह… इस्स्स… इस्स्स… उफ़्फ़्फ़…”
कामिनी हांफने के बाद भी सिसक रही थी।
उसके जिस्म में गजब की गर्मी फिर से दौड़ने लगी थी।
थककर निढाल होने के बावजूद चुत जमील के हर धक्के पर सिकुड़ रही थी।
पीछे शंकर खड़ा साँसें संभाल रहा था।
उसकी आँखें कामिनी की गाँड और चुत पर टिकी थीं, जो जमील के हर प्रहार के साथ ऊपर-नीचे हो रही थीं।
वीर्य की सफेद धार हर धक्के के साथ बाहर निकलकर बिस्तर को और गीला कर देती।
जमील दोनों हाथों से कामिनी की गाँड को पकड़े हुए जोर-जोर से ऊपर धकेल रहा था।
कामिनी का भारी शरीर उसके ऊपर पूरा तैर रहा था।
स्तन उसके सीने से रगड़ खा रहे थे।
जमील बराबर चोद रहा था।
थाड… थाड… थाड…
कामिनी उसके ऊपर लेटी हुई चुद रही थी।
पूरा शरीर जमील के सीने से चिपका हुआ। स्तन रगड़ खा रहे थे। पेट से पेट सटा हुआ किसी आटे कि तरह आपस मे गूथ रहा था.
शुरुआत में जो थकान थी, वह अब फिर से करंट में बदलने लगी.
जमील का हर धक्का उसके अंदर बिजली की तरह दौड़ रहा था।
चुत पहले से गीली और खुली होने के बावजूद हर प्रहार पर सिकुड़ रही थी।
पीछे शंकर की साँसें अब पूरी तरह दुरुस्त हो चुकी थीं।
वह घुटनों के बल बैठकर नजारा देख रहा था।
उसके सामने कामिनी की चुत थी, जमील का काला लंड जिसमें बार-बार गायब हो रहा था और बाहर निकलते समय शंकर का अपना सफेद वीर्य निकाल ला रहा था।
और ठीक उसके ऊपर… गाँड का छेद।
छोटा, गुलाबी, और हर धक्के के साथ सिकुड़-सिकुड़कर खुल रहा था।
शंकर खुद को रोक न सका।
उसने एक उंगली आगे बढ़ाई और कामिनी की गाँड पर धीरे से रख दी और बहुत आहिस्ता-आहिस्ता सहलाने लगा।
कामिनी के रोएँ तुरंत खड़े हो गए।
“आअह्ह्ह… क्या… क्या… उउउफ़्फ़… कर रहे हो… आअह्ह्ह…”
शंकर सुनने वाला नहीं था।
जमील भी नहीं।
जमील लगातार थाड… थाड… थाड… धक्के लगाए जा रहा था।
कामिनी को अपनी छाती से चिपकाए हुए जोर-जोर से ऊपर धकेल रहा था।
कामिनी बेबस थी। वह सीधी बैठ भी नहीं सकती थी। सिर्फ लेटी हुई सह रही थी।
शंकर की उंगली गाँड के छेद पर गोल-गोल घूम रही थी।
कभी हल्का दबाती, कभी किनारे सहलाती।
कामिनी अनजाने डर से छेद को सिकोड़ लेती, लेकिन जैसे ही उंगली फिर से धीरे से फिरती, छेद अपने-आप ढीला पड़ जाता और खुल जाता।
इस्स्स… आअह्ह्ह…
शंकर ने इस बार उंगली पर थोड़ा और जोर दिया।
नोक छेद के अंदर हल्की सी घुस गई।
कामिनी की कमर झटके से तन गई।
“आआअह्ह्ह…!”
जमील ने उसी पल एक जोरदार धक्का मारा।
लंड पूरा अंदर तक चला गया।
कामिनी दोनों तरफ से दब गई।
नीचे जमील का लंड, पीछे शंकर की उंगली।
उसकी साँसें उखड़ने लगीं।
आवाज अब सिर्फ सिसकियों में रह गई थी।
इस्स्स… आअह्ह्ह… उफ़्फ़…
शंकर की उंगली अब सिर्फ किनारे सहलाने तक सीमित नहीं रही।
उसने नोक को गाँड के छेद पर रखा और धीरे-धीरे अंदर की तरफ दबाव बढ़ाने लगा।
कामिनी की साँस अटक गई।
“आअह्ह्ह… शंकर… धीरे…”
लेकिन शंकर रुका नहीं।
उंगली और अंदर सरक गई।
पहले एक पोर… फिर आधा पोर और।
कामिनी की गाँड सिकुड़ गई।
गांड के छेद ने उंगली को कसकर जकड़ लिया।
लेकिन शंकर ने धीरे-धीरे घुमाते हुए और गहराई तक धकेल दिया।
पूरा एक पोर अंदर चला गया।
“आआअह्ह्ह…!”
कामिनी की कमर झटके से ऊपर उठी।
उसकी आँखें फटी रह गईं।
नीचे जमील ने उसी पल जोर का धक्का मारा।
थाड…! फचककककक....
लंड पूरा अंदर तक धँस गया और उंगली के साथ-साथ कामिनी को अंदर तक दो जगहों से भरा होने का अहसास एक साथ हो गया।
कामिनी का दिमाग सुन्न पड़ गया।
चुत में जमील का मोटा लंड, गाँड में शंकर की उंगली।
दोनों एक-दूसरे के इतने करीब कि कामिनी को लग रहा था जैसे दोनों चीजें अंदर मिल रही हों।
सिर्फ एक झिल्ली का फासला ही था लंड और ऊँगली के बीच मे.
शंकर ने उंगली को धीरे-धीरे अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया।
गोल घुमाते हुए, दबाते हुए।
इस्स्स… आअह्ह्ह… उफ़्फ़…
कामिनी के मुँह से अब सिर्फ अधूरी सिसकियाँ निकल रही थीं।
वह जमील के सीने पर अपना चेहरा छुपाए हुए काँप रही थी।
नाखून जमील की पीठ में गड़ने लगे थे।
जमील की रफ्तार और तेज हो गई।
थाड… थाड… थाड… थाड…
हर धक्के के साथ कामिनी की गाँड हिलती और शंकर की उंगली और गहराई तक चली जाती.
शंकर ने एक उंगली पूरी तरह अंदर कर रखी थी।
अब उसने दूसरी उंगली भी लाकर छेद के किनारे पर रख दी।
कामिनी तुरंत सहम गई।
“नहीं… एक ही काफी है… आअह्ह्ह… मत…नहीं...”
लेकिन शंकर ने सुना नहीं।
उसने दोनों उंगलियों की नोक एक साथ छेद पर रखी और धीरे-धीरे दबाव देना शुरू कर दिया।
कामिनी की गाँड जोर से सिकुड़ गई।
छेद ने विरोध किया।
लेकिन शंकर लगातार हल्का-हल्का घुमाते हुए धकेलता रहा।
पहले एक पोर…
फिर और अंदर…
दोनों उंगलियाँ एक साथ छेद के अंदर समा गईं।
“आआआअह्ह्ह…!”
कामिनी की चीख दबी हुई निकली।
उसने जमील के कंधे में दाँत गाड़ दिए।
पूरा शरीर तन कर काँपने लगा।
नीचे जमील ने उसी पल एक जोरदार धक्का मारा।
थाड…! फचककककक.....
लंड पूरा अंदर तक चला गया।
अब कामिनी के अंदर दो जगहों पर भराव एक साथ हो रहा था, चुत में जमील का मोटा लंड और गाँड में शंकर की दो उंगलियाँ।
दोनों इतने करीब थे कि कामिनी को साफ महसूस हो रहा था कि लंड और उंगलियाँ अंदर से एक-दूसरे को छू रहे हैं।
शंकर ने दोनों उंगलियों को धीरे-धीरे फैलाना शुरू कर दिया।
अंदर की दीवारों को खोलते हुए।
फिर अंदर-बाहर करने लगा।
पच्च… पच्च…
कामिनी की साँसें पूरी तरह बिखर गईं।
आवाज अब रोने और सिसकने के बीच झूल रही थी।
“आअह्ह्ह… बहुत… बहुत हो रहा है… इस्स्स… निकाल… नहीं… मत निकाल…”
शरीर एक साथ विरोध भी कर रहा था और खोल भी रहा था।
गाँड का छेद अब दोनों उंगलियों को अंदर ले रहा था।
हर बार जब शंकर उंगलियाँ बाहर खींचता, छेद सिकुड़ता, और जब वापस धकेलता तो फिर खुल जाता।
जमील नीचे से लगातार पेल रहा था।
थाड… थाड… थाड…
हर धक्के के साथ कामिनी का शरीर आगे-पीछे हो रहा था और शंकर की उंगलियाँ और गहराई तक चली जा रही थीं।
कामिनी जमील के सीने पर पूरी तरह पसरी हुई थी।
नाखून उसकी पीठ में गड़े हुए थे।
मुँह खुला हुआ, लार टपक रही थी।
आँखें आँसुओं से भरी हुई।
वह अब पूरी तरह दो मर्दों के हाथों में थी।
एक नीचे से चुत चीर रहा था।
दूसरा पीछे से गाँड का छेद खोल रहा था।
लेकिन कामिनी इस दोहरे प्रहार को ज्यादा देर झेल नहीं पाई।
नीचे जमील का लंड जोर-जोर से उसकी चुत को चीर रहा था।
पीछे शंकर की दोनों उंगलियाँ गाँड के छेद को फैलाए हुए अंदर-बाहर कर रही थीं।
दोनों चीजें एक साथ उसके अंदर काम कर रही थीं। उसके जिस्म के उस बिंदु पर चोट कर रही थी जहाँ हवस का लावा जमा होता है, ठीक नाभि के नीचे.
लंड और उंगलियाँ इतने करीब थे कि हर धक्के के साथ कामिनी को लग रहा था जैसे उसका पूरा निचला हिस्सा एक साथ कुचला जा रहा हो।
“आअह्ह्ह… नहीं… बहुत… आआअह्ह्ह…”
उसकी आवाज टूट गई।
जाँघें बुरी तरह काँपने लगीं।
गाँड जोर से सिकुड़ गई और शंकर की उंगलियों को कसकर जकड़ लिया।
अगले ही पल कामिनी का शरीर एक बार जोर से तन गया।
“आआआआह्ह्ह…!”
चुत ने अचानक पानी छोड़ दिया। जैसे कोई बरसाती झरना अचानक से बह निकला हो।
कामरस की तेज फुहार जमील के लंड और पेट पर छलक पड़ी।
बिस्तर और भी गीला हो गया।
कामिनी का पूरा जिस्म थर-थर काँप रहा था।
आँखें पलट गईं। मुँह खुला रह गया।
वह फिर से पूरी तरह निढाल होकर जमील के सीने पर ढेर हो गई।
जमील ने उसी पल अपने लंड को पूरी तरह रोक लिया।
अंदर तक धँसा हुआ, लेकिन हिलना बंद कर दिया।
वह खुद पर काबू रखते हुए कामिनी के काँपते शरीर को महसूस कर रहा था। चुत से निकली हर तरंग उसे अपने लंड पर साफ महसूस हो रही थी.
उसका लंड अभी भी तना हुआ था, उसका जिस्मानी पानी अभी तक उसके नियंत्रण मे था.
कामिनी जमील के ऊपर पूरी तरह बेजान पड़ी थी।
साँसें उखड़ी हुई। शरीर अभी भी हल्के-हल्के काँप रहा था।
चुत से पानी और पहले का वीर्य मिलाजुला बह रहा था।
जमील ने उसके बालों को सहलाते हुए धीमी आवाज में कहा—
“मोहतरमा… अभी थकना नहीं है, अभी तो हम शुरू हुए है, कहाँ गई तेरी जवानी ” जमील कामिनी को उकसा रहा था. उसकी हिम्मत बढ़ा रहा था.
कामिनी ने जवाब नहीं दिया।
सिर्फ अपना चेहरा उसके गले में और गहराई तक छुपा लिया।
हमफ़्फ़्फ़.... हमफ्फ्फ्फफ्फ्फ़....
कामिनी का शरीर अब पूरी तरह जवाब दे चुका था।
दोहरे प्रहार के बाद की थकान ने उसे निढाल कर दिया था।
वह जमील के चौड़े सीने पर औंधे मुँह पड़ी हुई थी।
साँसें इतनी तेज चल रही थीं कि उसका सीना ऊपर-नीचे हो रहा था।
पसीने से पूरा शरीर चमक रहा था। बाल चेहरे पर चिपके हुए थे।
हाथ-पैर में कोई ताकत नहीं बची थी।
वह सिर्फ लेटी हुई काँप रही थी।
कभी-कभी एक कमजोर सी सिसकी उसके होंठों से निकल जाती।
पीछे शंकर ने देखा कि कामिनी पूरी तरह ढीली पड़ गई है।
उसने धीरे से अपनी दोनों उंगलियाँ गाँड के छेद से बाहर खींचना शुरू किया।
पहले हल्का सा घुमाया।
फिर धीरे-धीरे बाहर की तरफ खींचा।
पूछ्ह… पक....
एक उंगली निकली।
पक… पुच्च…
दूसरी उंगली भी बाहर आ गई।
कामिनी की गाँड हल्के से सिकुड़ गई।
छेद कुछ पल के लिए खुला रह गया, गुलाबी और थोड़ा सूजा हुआ।
फिर धीरे-धीरे सिकुड़कर अपनी जगह पर आने लगा।
शंकर ने अपनी गीली उंगलियों को देखा। उसकी उंगलियां गीली और चिपचिपी थी. उसने अपनी उंगलियों को कामिनी की गाँड पर रख पोंछ दिया.
कामिनी ने सिर्फ एक लंबी, थकी हुई साँस ली।
उसका शरीर और भी ज्यादा जमील के ऊपर चिपक गया।
जैसे अब हिलने की कोई शक्ति ही न बची हो।
जमील के नीचे उसका तना हुआ लंड अभी भी कामिनी के पेट से दब रहा था।
लेकिन कामिनी इतनी थक चुकी थी कि उसे उसकी सुध भी नहीं थी।
वह बस पड़ी रही।
आँखें बंद।
साँसें धीरे-धीरे सामान्य होने की कोशिश करती हुई।
जमील के चौड़े सीने पर निढाल पड़ी हुई।
साँसें भारी-भारी चल रही थीं। सीना ऊपर-नीचे हो रहा था।
पूरा शरीर पसीने से नहाया हुआ चमक रहा था।
लेकिन उसके जिस्म में अभी भी एक अजीब सी गर्मी दौड़ रही थी।
रह-रहकर।
चुत और गाँड का छेद दोनों हल्के-हल्के फड़क रहे थे।
जैसे अभी भी कुछ माँग रहे हों।
शंकर इस जानलेवा नजारे को देखकर खुद को रोक न सका।
उसने तुरंत गर्दन झुकाई और अपने होंठ कामिनी की गाँड के छेद से चिपका दिए।
पच्च… फचाक…
“आआआह्ह्ह… मर गई…!”
कामिनी की सिसकी निकली।
उसकी कमर हल्के से उछल गई।
उसी पल उसकी चुत ने एक आखिरी धार छोड़ी।
गर्म पानी की तेज फुहार जमील के लंड और पेट पर छलक पड़ी।
पूरे जाँघों का हिस्सा चिपचिपे पानी से सरोबार हो गया।
बिस्तर और भी गीला होता चला गया।
शंकर रुका नहीं।
वह कामिनी की गाँड के छेद को चाट रहा था, चूस रहा था।
जीभ की नोक अंदर तक घुसाकर घुमा रहा था।
पच्च… पच्च… श्श्श…
कामिनी के जिस्म में फिर से करंट दौड़ने लगा।
थकान के बावजूद एक नई सिहरन सिर से पैर तक फैल गई।
उसकी उंगलियाँ जमील की पीठ पर गड़ गईं।
जमील नीचे से उसकी पीठ, कमर और सिर को धीरे-धीरे सहला रहा था।
खुरदरे हाथ पसीने से भरी पीठ पर फिसल रहे थे।
कामिनी का पूरा जिस्म पसीने से नहा चुका था।
बाल चेहरे पर चिपके हुए।
स्तन जमील के सीने से सटे हुए काँप रहे थे।
साँसें उखड़ी हुई।
और पीछे…
शंकर उसकी गाँड चाट रहा था।
कामिनी की आँखें बंद थीं।
होंठ खुले हुए।
एक नई, थकी हुई लेकिन गहरी प्यास फिर से जाग रही थी।
शंकर ने दोनों हाथों से कामिनी की गाँड के गोलाकार हिस्सों को फैला दिया और जीभ को बार-बार छेद के अंदर घुसाने कि कोशिश करने लगा, उसकी जबान गांड मे गीले छेद को चाट रही थी, चूस रही थी।
पच्च… फचाक… श्श्श… पच्च…
कामिनी फिर से उत्तेजित होने लगी।
थकान के बावजूद उसके जिस्म में गर्मी लौट आई थी।
वह अनजाने में अपनी कमर को धीरे-धीरे पीछे की तरफ धकेलने लगी।
जमील का कड़क लम्बा लंड अभी तक कामिनी कि चुत मे धसा ही हुआ था, उस से निकलती गर्मी उसे और ज्यादा उकसा रही थी.
हर बार जब वह गाँड पीछे करती, जमील का लंड उसकी चुत में और गहराई तक चला जाता।
और जब कमर आगे करती, लंड बाहर की तरफ खिंचता।
इस तरह बिना जमील के ज्यादा मेहनत किए ही लंड अंदर-बाहर होने लगा।
पच्च… धप्प… पच्च… धप्प…
कामिनी अपनी गाँड के छेद को और ज्यादा खोलने की कोशिश कर रही थी।
वह जानबूझकर छेद को ढीला छोड़ रही थी, ताकि शंकर की जीभ और अंदर तक जा सके।
“आआअह्ह्ह… चाटो… चुसो… आअह्ह्ह… जोर से…”
उसकी आवाज अब साफ और भूखी हो गई थी।
शंकर ने कामिनी कि ललकार सुन जीभ को और अंदर धकेल दिया, छेद की दीवारों को चाटते हुए, जितना हो सकता था उतना अंदर कि तरफ घुमाने लगा.
कभी पूरे छेद को मुँह में भरकर जोर से चूस लेता। तो कभी बहार बहार से पूरे छेड़ पर जीभ को फेर देता.
चुत गांड चाटने मे शायद पीएचडी कि थी शंकर ने.
कामिनी की कमर अब और तेजी से हिलने लगी।
पीछे शंकर की जीभ के लिए, नीचे जमील के लंड के लिए।
जमील ने भी ताल से ताल मिला ली.
वह धीरे-धीरे लेकिन मजबूती से धक्के लगाने लगा।
जब कामिनी गाँड पीछे करती, वह भी कमर ऊपर उठाकर लंड और गहराई तक पहुँचा देता।
थाड… पच्च… थाड… पच्च…
कामिनी अब दोनों तरफ से फिर से भर रही थी।
नीचे जमील का लंड अंदर-बाहर हो रहा था।
पीछे शंकर की जीभ गाँड के छेद को चाट-चाटकर गीला किए जा रही थी।
उसका शरीर पसीने से चमक रहा था।
साँसें तेज हो गई थीं।
वह जमील के कंधे में चेहरा छुपाए हुए सिसक रही थी, लेकिन कमर लगातार हिल रही थी।
“आअह्ह्ह… और अंदर… जीभ और अंदर… आअह्ह्ह…”
शंकर ने दोनों हाथों से गाँड और जोर से फैला दिया और जीभ पूरी ताकत से अंदर तक घुसा दी।
आअह्ह्ह..... ऊफ्फफ्फ्फ़.... इसससस....
कामिनी की कमर झटके से तन गई।
तभी अचानक शंकर ने एकदम से गाँड चूसना छोड़ दिया।
उसका लंड बुरी तरह तन चुका था। इतना सख्त कि दर्द करने लगा था।
वह घुटनों के बल उठकर कामिनी के पीछे आ गया।
कामिनी को अचानक अपनी गाँड पर खालीपन महसूस हुआ।
जीभ की गर्माहट गायब हो गई थी।
उसने पीछे पलटकर देखना चाहा।
लेकिन उसी पल जमील ने नीचे से कसकर दो-चार जोरदार धक्के लगा दिए।
फट… फट… थाड… थाड… पच्च…
“आअह्ह्ह… उफ़्फ़्फ़…”
कामिनी की गर्दन झुक गई। जमील ने उसे अपनी छाती से और कसकर जकड़ लिया।
दोनों हाथ उसकी पीठ पर फैला दिए। जैसे उसे भागने न देना हो।
शंकर और जमील की नजरें मिलीं।
एक छोटा सा इशारा हुआ।
अभी दो पल ही बीते होंगे कि कामिनी को अपनी गाँड की दरार में कुछ गीला, मोटा और गर्म रेंगता हुआ महसूस हुआ।
शंकर ने अपने लंड के सुपाड़े को उसकी गाँड के छेद पर रख दिया था।
वीर्य और थूक से गीला।
धीरे-धीरे रगड़ रहा था।
कामिनी को समझते देर नहीं लगी।
“नहीं… नहीं… एक साथ… उफ़्फ़… आअह्ह्ह…”
उसकी आवाज में घबराहट साफ थी।
शंकर ने सुपाड़े को छेद के मुहाने पर दबाया।
“आउच… नहीं…”
कामिनी लगभग चिल्ला उठी।
“सस्स… साहब जाग जाएंगे… क्या मोहतरमा… आराम से… हर चीज पहली बार ही होती है।”
जमील ने कान के पास फुसफुसाया और उसी पल जोर-जोर से धक्के लगाने लगा।
थाड… थाड… फट… फट… पच्च… ओच्च…
कामिनी का प्रतिरोध धीरे-धीरे टूटने लगा।
जमील के तेज प्रहारों ने उसका ध्यान बँटा दिया।
उसने आँखें कसकर बंद कर लीं।
हकीम लक्कद्दीन और शमशेर उसकी गाँड पहले भी ले चुके थे।
लेकिन ये पहला मौका था जब उसके दोनों छेद एक साथ भरे जाने वाले थे।
कामिनी ने साँस रोक ली।
आँखें कसकर बंद कर लीं।
पूरा शरीर तन गया।
वह आने वाले उस भयानक और मादक पल का इंतजार करने लगी।
शंकर ने कमर थोड़ी और आगे बढ़ाई।
सुपाड़ा छेद के मुहाने को धीरे-धीरे धकेलने लगा।
शंकर ने सुपाड़े को गाँड के छेद पर मजबूती से दबाया।
कामिनी की साँस पूरी तरह अटक गई।
उसने जमील के कंधे में नाखून गड़ा दिए।
शंकर ने धीरे से कमर आगे बढ़ाई।
पहले सिर्फ सुपाड़े की नोक अंदर गई।
कामिनी की गाँड जोर से सिकुड़ गई।
“आआअह्ह्ह… धीरे…”
शंकर रुका नहीं।
उसने दोनों हाथ कामिनी की कमर पर जमाए और हल्का सा और दबाव दिया।
सुपाड़ा पूरा अंदर चला गया।
ईईस्स्स्स..... ससससससस......कामिनी का मुँह खुला रह गया। आवाज नहीं निकली।
सिर्फ एक लंबी, काँपती हुई साँस छोड़ी।
शंकर ने एक पल रुका।
फिर धीरे-धीरे कमर आगे धकेली।
पच्च्च…
लंड आधा अंदर तक चला गया।
“आआआह्ह्ह… बहुत… बड़ा… मोटा.....आअह्ह्ह…”
कामिनी की आँखों से पानी आ गया।
गाँड का छेद बुरी तरह फैल चुका था।
शंकर का मोटा गोरा लंड धीरे-धीरे उसकी दीवारों को चीरता हुआ अंदर जा रहा था।
नीचे जमील ने उसी पल एक गहरा धक्का मारा।
थाड…!
दोनों लंड अब कामिनी के अंदर एक साथ थे।
सिर्फ एक पतली दीवार दोनों के बीच बची हुई थी।
कामिनी को साफ महसूस हो रहा था।
चुत में जमील का काला खुरदरा लंड।
गाँड में शंकर का मोटा गोरा लंड।
दोनों एक-दूसरे से रगड़ खा रहे थे।
शंकर ने आखिरी धक्का दिया।
धप्प्प… फचककककक.....
पूरा लंड जड़ तक अंदर चला गया।
उसके अंडकोष कामिनी की गाँड से जा टकराए।
कामिनी का शरीर एक बार जोर से तन गया।
फिर पूरी तरह काँपने लगा।
“आआआअह्ह्ह… भर गई… दोनों… आअह्ह्ह…”
उसकी आवाज रोने जैसी हो गई थी।
लेकिन कमर पीछे नहीं हटी।
शंकर कुछ पल पूरा अंदर रुका रहा।
साँसें भारी थीं।
उसे महसूस हो रहा था कि जमील का लंड ठीक दूसरी तरफ से उसकी नसों को छू रहा है।
कामिनी दोनों तरफ से पूरी तरह भरी हुई थी।
हिलने की जगह नहीं बची थी।
उसने आँखें बंद कर लीं।
दांत भींच लिए।
और दोनों मर्दों के लंड को अपने अंदर महसूस करने लगी।
शंकर कुछ पल पूरा अंदर रुका रहा।
कामिनी की गाँड उसके लंड को बुरी तरह जकड़े हुए थी।
नीचे जमील भी हिल नहीं रहा था।
फिर शंकर ने धीरे से कमर पीछे खींची।
पच्च्च…
लंड आधा बाहर निकला।
गाँड का छेद लंड के साथ बाहर की तरफ खिंच गया।
कामिनी की साँस अटक गई।
शंकर ने फिर धक्का दिया।
धप्प…
पूरा लंड वापस अंदर चला गया।
उसी पल जमील ने भी नीचे से धक्का मारा।
थाड…!
दोनों लंड एक साथ कामिनी के अंदर गहरे तक चले गए.
“आआअह्ह्ह…!”
कामिनी की चीख दबी हुई निकली।
उसने जमील के कंधे में चेहरा छुपा लिया।
अब दोनों ने रफ्तार पकड़ ली।
शंकर पीछे से गाँड में धक्के लगाने लगा।
जमील नीचे से चुत में।
पहले असमान।
कभी शंकर अंदर जाता तो जमील बाहर खिंचता।
कभी दोनों एक साथ अंदर चले जाते।
धप्प… थाड… पच्च… धप्प… थाड…
कामिनी का शरीर दो मर्दों के बीच झूल रहा था।
हर प्रहार के साथ उसके स्तन जमील के सीने से रगड़ खाते।
गाँड शंकर की जाँघों से पटपटानी।
धीरे-धीरे दोनों ने ताल मिला लिया।
जब शंकर अंदर धकेलता, जमील भी अंदर धकेलता।
दोनों लंड एक साथ कामिनी को चीरते।
जब बाहर खींचते, तो कामिनी खाली होने का अहसास पागल कर देता।
धप्प-थाड… धप्प-थाड… धप्प-थाड…
आवाजें अब साफ और गीली हो गई थीं।
पच्च… पच्च… फट… फट…
कामिनी की आवाज टूट-टूटकर निकल रही थी।
“आअह्ह्ह… धीरे… बहुत… आअह्ह्ह… अंदर… दोनों…”
उसकी उंगलियाँ जमील की पीठ में गड़ी हुई थीं।
पैर की उंगलियाँ सिकुड़ गई थीं।
पूरा शरीर पसीने से नहाया हुआ काँप रहा था।
शंकर ने दोनों हाथ उसकी कमर पर और कस लिए।
रफ्तार बढ़ा दी।
जमील ने भी नीचे से जोर लगाना शुरू कर दिया।
अब दोनों तेज हो गए थे।
धप्प… थाड… धप्प… थाड… धप्प… थाड…
कामिनी का दिमाग सुन्न पड़ने लगा।
दोनों छेद पूरी तरह भरे हुए थे।
हर धक्के के साथ उसे लग रहा था जैसे उसका पूरा निचला हिस्सा फट जाएगा।
लेकिन वह हटी नहीं।
बल्कि कभी-कभी अपनी कमर थोड़ी पीछे धकेल देती, ताकि दोनों लंड और गहराई तक चले जाएँ।
कमरे में सिर्फ गीली आवाजें, भारी साँसें और कामिनी की दबी हुई सिसकियाँ गूँज रही थीं।
रमेश बगल में अभी भी बेसुध खर्राटे ले रहा था।
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शुरुआत में दर्द था।
गाँड का छेद शंकर के मोटे लंड से बुरी तरह फैला हुआ था।
हर धक्के के साथ एक तेज, जलन भरी अनुभूति होती।
कामिनी दाँत भींचे हुए सह रही थी।
लेकिन धीरे-धीरे वो जलन बदलने लगी।
शंकर का लंड अंदर-बाहर होते हुए उसकी दीवारों को सहला रहा था।
जमील का लंड चुत में गहरे तक जा रहा था।
दोनों के बीच की पतली दीवार हर प्रहार पर दब रही थी।
धीरे धीरे मादक घर्षण से दर्द कम होने लगा।
उसकी जगह एक गहरी, भारी और मादक भरन ने ले ली।
कामिनी की सिसकियाँ बदल गईं।
“आअह्ह्ह… आअह्ह्ह… उफ़्फ़…”
अब दर्द की आवाज नहीं थी।
मजे की आवाज थी। कामुकता कि आवाज़ थी, इस से ज्यादा चाहत कि आवाज़ थी.
वह अनजाने में अपनी गाँड को पीछे की तरफ धकेलने लगी।
जब शंकर लंड बाहर खींचता, कामिनी गाँड पीछे करके उसे फिर से अंदर ले लेती।
जब जमील नीचे से धक्का देता, वह कमर नीचे गिराकर उसे और गहराई तक पहुँचा देती।
पच्च… पच्च… धप्प… थाड… पच्च…
गीली आवाजें अब पूरे कमरे में गूँज रही थीं।
रमेश के भारी खर्राटों के साथ मिलकर एक अजीब सा संगीत बन गया था।
खर्र… खर्र… पच्च… धप्प… खर्र… पच्च…
कामिनी पागलों की तरह चुदने लगी।
उसकी कमर अब खुद हिल रही थी।
पीछे शंकर के लंड पर गाँड पटक रही थी।
नीचे जमील के लंड पर चुत।
“आअह्ह्ह… और जोर से… दोनों… आअह्ह्ह… भर दो…”
आवाज अब साफ और भूखी हो गई थी।
वह जमील के कंधे में दाँत गड़ाए हुए सिसक रही थी, लेकिन शरीर पूरी तरह सक्रिय हो चुका था।
शंकर ने उसकी कमर कसकर पकड़ ली और रफ्तार बढ़ा दी।
जमील ने भी नीचे से जोर लगाना शुरू कर दिया।
अब दोनों तेज हो गए थे।
धप्प-थाड… धप्प-थाड… धप्प-थाड…
कामिनी की गाँड शंकर की जाँघों से बार-बार टकरा रही थी।
माँस की पटपटाहट साफ सुनाई दे रही थी।
चुत से शंकर का पुराना वीर्य और नया कामरस मिलाजुला बाहर निकल-निकलकर बिस्तर को गीला किए जा रहा था।
कामिनी की आँखें बंद थीं।
मुँह खुला हुआ।
लार टपक रही थी।
वह अब खुद को पूरी तरह छोड़ चुकी थी।
दर्द खत्म हो चुका था।
बस एक गहरी, पागल कर देने वाली भूख बाकी थी।
वह गाँड पीछे पटक-पटककर शंकर का लंड ले रही थी।
कमरा रमेश के खर्राटों और उनकी गीली चुदाई की आवाजों से गूँज रहा था।
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कामिनी की साँसें अब बदल चुकी थीं।
पहले जो तेज और बेकाबू सिसकियाँ थीं, वे अब लंबी, गहरी और काँपती हुई हो गई थीं।
उसके अंदर कुछ बहुत गहराई से उठ रहा था।
शंकर और जमील की रफ्तार अभी भी तेज थी, लेकिन कामिनी का शरीर अब अलग लय में हिल रहा था।
वह खुद अपनी गाँड को पीछे पटक रही थी, लेकिन हर धक्के के साथ एक नई लहर उसके पेट के नीचे से उठकर रीढ़ की हड्डी तक जा रही थी।
धीरे-धीरे।
पहले सिर्फ एक हल्की सी ऐंठन उठी,
चुत ने जमील के लंड को कसकर जकड़ लिया ।
गाँड ने शंकर के लंड को और सख्ती से दबोच लिया,
कामिनी की उंगलियाँ जमील की पीठ पर गड़ गईं।
नाखून माँस में धँस गए।
“आअह्ह्ह… रुको… थोड़ा… आअह्ह्ह…”
लेकिन दोनों रुके नहीं।
और कामिनी भी नहीं रुकी।
लहर दूसरी बार आई।
इस बार थोड़ी तेज।
उसकी जाँघें काँपने लगीं।
पैर की उंगलियाँ सिकुड़ गईं।
तीसरी लहर ने उसे लगभग उठा ही लिया।
“आआअह्ह्ह… नहीं… मैं… आअह्ह्ह….. गई.... इऊफ्फफ्फ्फ़.... "
उसकी आवाज टूट गई।
शरीर एक बार जोर से तन गया। फिर काँपने लगा।
कामिनी कि रफ्तार अपने-आप तेज हो गई।
शंकर और जमील दोनों महसूस कर रहे थे कि कामिनी का शरीर सिकुड़-सिकुड़कर उनके लंडों को निचोड़ रहा है।
उन्होंने और जोर लगा दिया।
धप्प-थाड… धप्प-थाड… धप्प-थाड…
कामिनी की आँखें पीछे की तरफ पलटने लगीं।
मुँह खुला रह गया।
आवाज अब निकल नहीं पा रही थी। सिर्फ अटक-अटककर साँसें चल रही थीं।
फिर वो पल आया।
पूरा शरीर एक साथ तन गया।
गाँड और चुत दोनों ने एक साथ इतनी जोर से सिकुड़न मारी कि दोनों मर्दों की साँसें अटक गईं।
कामिनी की चुत से पानी की तेज धारा छूटी।
जोरदार।
जमील के लंड और पेट पर छलक पड़ी।
गाँड भी सिकुड़-सिकुड़कर शंकर के लंड को निचोड़ रही थी।
“आआआआअह्ह्ह…!”
आवाज आखिरकार फूटी।
लंबी। काँपती हुई। अधूरी।
उसके बाद शरीर में जैसे कोई करंट दौड़ गया हो।
लहर के बाद लहर।
एक के बाद एक।
रुकने का नाम नहीं ले रही थीं।
कामिनी का शरीर थर-थर काँप रहा था।
आँखें पूरी तरह बंद।
मुँह खुला। लार टपक रही थी।
हाथ-पैर में कोई नियंत्रण नहीं बचा था।
वह जमील के ऊपर पूरी तरह निढाल हो गई।
लेकिन अंदर अभी भी सिकुड़न चल रही थी।
चुत और गाँड दोनों बार-बार जकड़ रहे थे, जैसे और निचोड़ना चाहते हों।
साँसें इतनी तेज थीं कि लग रहा था साँस ही रुक जाएगी।
चेहरा लाल हो चुका था।
पूरा शरीर पसीने से नहाया हुआ काँप रहा था।
कुछ पल तक वह ऐसे ही पड़ी रही।
आँखें बंद।
शरीर बेकाबू।
जैसे होश ही खो बैठी हो।
दोनों मर्द अभी भी अंदर थे।
लेकिन कामिनी अब कुछ महसूस नहीं कर पा रही थी।
सिर्फ एक गहरी, भारी खालीपन और सुकून।
उसकी पलकें भारी हो गईं।
साँसें धीरे-धीरे लंबी होने लगीं।
वह लगभग बेहोश सी हो गई थी।
लेकिन शंकर और जमील अब पूरी तरह राक्षस बन चुके थे।
उन्हें दुनिया-दारी से कोई मतलब नहीं रह गया था।
रमेश इस वक्त उठ भी जाता, तब भी वे कामिनी को उसके सामने ही चोदते।
कामिनी आँखें बंद किए हुए बुरी तरह हाँफ रही थी।
हंफ… हमफ़्फ़्फ़… आअह्ह्ह… इस्स्स…
जमील उसके भारी स्तनों को मसलने लगा।
मुँह से निप्पल पकड़कर जोर-जोर से चूसने लगा।
दाँतों से हल्का काटता, फिर जीभ से सहलाता।
तभी शंकर उठा।
“साली बहुत गर्मी दिखा रही थी ना… अब बताते हैं गर्मी क्या होती है रांड साली…
तेरी हड्डी-हड्डी पिघला के जाएँगे आज।”
शंकर ने कामिनी को खींचकर अपने ऊपर लिटा दिया।
अब कामिनी उसके सीने पर औंधे मुँह थी।
पच्च… फचाक…
शंकर ने अपने मोटे लंड को एक ही बार में कामिनी की चुत में ठूँस दिया।
“आअह्ह्ह… इस्स्स…”
कामिनी के मुँह से बस एक हल्की सी आह निकली।
उसमें इतनी ताकत ही नहीं बची थी कि जोर से चिल्ला सके।
उसके दोनों छेद पहले से ही पूरी तरह खुले और इस्तेमाल हो चुके थे।
उधर जमील पीछे आ गया।
उसने कामिनी की गाँड के दोनों हिस्से फैलाए और अपने काले, खुरदरे लंड को छेद पर टिकाया।
“आअह्ह्ह… आउच… उफ़्फ़… धीरे… आराम से…”
जमील ने बहुत रखाव नहीं किया।
एक ही जोरदार धक्के में अपना लंड गाँड में उतार दिया।
धप्प्प…
कामिनी की कमर झटके से तन गई।
लेकिन उसने एक बार भी मना नहीं किया।
थकी हुई थी।
तीन बार झड़ चुकी थी।
फिर भी चुदने के लिए राजी थी।
अब पोजीशन बदल चुकी थी।
नीचे शंकर उसकी चुत में था।
पीछे जमील उसकी गाँड में।
दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।
फिर साथ-साथ धक्के लगाने शुरू कर दिए।
शंकर ने पहले धीमे से कमर ऊपर उठाई।
लंड कामिनी की गीली चुत में गहराई तक चला गया।
उसी पल जमील ने पीछे से धक्का मारा।
धप्प… थाड…
दोनों लंड एक साथ कामिनी के अंदर गहरे चले गए।
“आअह्ह्ह…”
कामिनी की आवाज बहुत कमजोर निकली।
वह शंकर के सीने पर औंधे मुँह पड़ी हुई बस सह रही थी।
अब दोनों ने रफ्तार पकड़ ली।
शंकर नीचे से ऊपर की तरफ धकेल रहा था।
जमील पीछे से गाँड में पेल रहा था।
कभी एक साथ अंदर जाते।
कभी एक अंदर तो दूसरा बाहर।
धप्प… थाड… पच्च… धप्प… थाड…
आवाजें फिर से कमरे में गूँजने लगीं।
गीली, भारी और तेज।
कामिनी का शरीर दो मर्दों के बीच झूल रहा था।
जब शंकर ऊपर धकेलता, उसके स्तन शंकर के चेहरे से रगड़ खाते।
जब जमील पीछे से मारता, उसकी गाँड जमील की जाँघों से पटपटाती।
शंकर ने दोनों हाथ कामिनी की कमर पर रख दिए और जोर लगाने लगा।
जमील ने गाँड के दोनों हिस्से फैलाए हुए और गहराई तक पेलना शुरू कर दिया।
अब रफ्तार तेज हो गई।
धप्प-थाड… धप्प-थाड… धप्प-थाड…
कामिनी की सिसकियाँ टूट-टूटकर निकल रही थीं।
हंफ… आअह्ह्ह… इस्स्स… आअह्ह्ह…
उसके दोनों छेद पूरी तरह खुले हुए थे।
लंड आसानी से अंदर-बाहर हो रहे थे।
लेकिन हर प्रहार के साथ कामिनी को लग रहा था जैसे उसका पूरा निचला हिस्सा फिर से भर जा रहा हो।
जमील ने अचानक गाँड पर एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया।
चटाक…!
“आअह्ह्ह…!”
कामिनी की कमर झटके से उछली।
शंकर ने उसी पल नीचे से जोर का धक्का मारा।
दोनों अब पूरी तरह बेकाबू हो चुके थे।
वे कामिनी को दोनों तरफ से कुचल रहे थे।
कामिनी शंकर के सीने पर पसीने से चिपकी हुई हाँफ रही थी।
आँखें बंद।
मुँह खुला।
शरीर उनकी रफ्तार के साथ हिल रहा था।
कमरा फिर से गीली आवाजों और भारी साँसों से भर गया।
शंकर और जमील की रफ्तार अब बहुत तेज हो चुकी थी।
धप्प… थाड… धप्प… थाड… धप्प… थाड…
हर प्रहार के साथ कामिनी का जिस्म थरथरा कर कांप रहा था।
शंकर नीचे से चुत में जोर-जोर से धकेल रहा था। उसका मोटा लंड हर बार जड़ तक जा रहा था।
जमील पीछे से गाँड में पूरी ताकत से पेल रहा था। उसका खुरदरा लंड कामिनी की गाँड को बार-बार फैला रहा था।
कामिनी शंकर के सीने पर पसीने से पूरी तरह चिपकी हुई हांफ रही थी, उउफ्फ्फ.... हमफ़्फ़्फ़... हमफ्फफ्फ्फ़....
उसके स्तन शंकर के चेहरे और सीने से रगड़ खा रहे थे।
साँसें इतनी तेज थीं कि उसका पूरा शरीर हिल रहा था।
आअह्ह्ह… हंफ… इस्स्स… आअह्ह्ह… हंफ…
तभी शंकर की साँसें अचानक और गहरी हो गईं।
उसकी कमर की हरकतें बेकाबू होने लगीं।
उसने कामिनी की कमर दोनों हाथों से इतनी जोर से पकड़ा कि नाखून गड़ गए।
“मैडम… मैं… अब नहीं रोक पा रहा… जा रहा हूँ…”
कामिनी की आँखें आधी खुली थीं।
उसने बहुत कमजोर आवाज में सिर्फ इतना कहा—
“अंदर… डाल दो अंदर…”
शंकर ने आखिरी तीन-चार धक्के बहुत तेज लगाए।
धप्प… धप्प… धप्प…
फिर पूरा लंड जड़ तक धँस गया।
उसकी कमर काँप उठी।
“आआअह्ह्ह… ले… ले पूरा… पूरा ले रंडी”
उसका लंड जोर-जोर से धड़कने लगा।
पहली धार इतनी तेज निकली कि कामिनी को अंदर तक गर्मी महसूस हुई।
फिर दूसरी… तीसरी… चौथी…
गाढ़ा, गर्म वीर्य लगातार उसकी चुत की गहराई में छूटता रहा।
शंकर की कमर बार-बार हल्के-हल्के धकेलती रही, जैसे और अंदर उंडेलना चाहता हो।
उसी दौरान जमील भी अपनी सीमा पर पहुँच चुका था।
उसने कामिनी की गाँड के दोनों हिस्से और जोर से फैलाए।
रफ्तार अचानक बहुत तेज कर दी।
फट… फट… फट… फट…
“मोहतरमा… मैं भी… ले… गाँड में ले…”
कामिनी ने सिर्फ एक लंबी सिसकी निकाली।
जमील ने आखिरी जोरदार धक्का मारा।
पूरा लंड गाँड में जड़ तक चला गया।
उसके अंडकोष कामिनी की गाँड से जा टकराए।
फिर वह भी टूट गया।
गर्म वीर्य की धार एक के बाद एक कामिनी की गाँड की गहराई में फूटने लगी।
जमील की कमर काँप-काँपकर धकेलती रही।
हर धकेल के साथ और वीर्य अंदर जाता गया।
कामिनी के दोनों छेद अब दो मर्दों के वीर्य से पूरी तरह लबालब भर चुके थे।
चुत और गाँड दोनों सिकुड़-सिकुड़कर लंडों को निचोड़ रहे थे।
जैसे और लेना चाहते हों।
शंकर और जमील दोनों कुछ देर तक अंदर धँसे रहे।
साँसें उखड़ी हुई।
लंड अभी भी हल्के-हल्के फड़क रहे थे।
आखिरी बूँदें धीरे-धीरे निकल रही थीं।
कामिनी उनके नीचे पूरी तरह निढाल पड़ी थी।
आँखें बंद।
मुँह थोड़ा खुला।
शरीर कभी-कभी हल्के से काँप जाता।
धीरे-धीरे दोनों ने कमर पीछे खींचना शुरू किया।
पहले शंकर।
पच्च्च…
लंड चुत से बाहर निकला।
गाढ़ा सफेद वीर्य की मोटी धार तुरंत बाहर बह निकली और कामिनी की जाँघों पर फैल गई।
फिर जमील।
पुच्च… पच्च…
लंड गाँड से निकला।
दूसरी धार भी पीछे से बहने लगी।
दोनों छेदों से वीर्य रिस-रिसकर बिस्तर को और गीला कर रहा था।
कामिनी शंकर के ऊपर ऐसे पड़ी रही जैसे उसमें जान ही न हो।
सिर्फ साँसें चल रही थीं।
और दोनों छेदों से टपकता हुआ गर्म तरल।
कमरे में अब सिर्फ भारी साँसें और रमेश के खर्राटे बचे थे।
दोनों मर्द हाँफ रहे थे।
शंकर बिस्तर पर पीठ के बल चित पड़ा था। छाती जोर-जोर से ऊपर-नीचे हो रही थी।
जमील पीछे घुटनों के बल बैठा हुआ साँसें ले रहा था। माथा पसीने से तर था।
कामिनी अभी झड़ी नहीं थी। वीर्य कि गर्मी ने उसके जिस्म को भीतर तक सुलगा कर रख दिया, उसे अजीब सी गर्मी महसूस होने लगी, आंखे लाल हो चुकी थी, हवस का अजीब सा उन्माद उसे पूरे जिस्म मे महसूस हो रहा था.
इस राउंड में सिर्फ दोनों मर्द झड़े थे, कामिनी कि उत्तेजना बाकि थी.
उसकी चुत और गाँड दोनों से गाढ़ा वीर्य धीरे-धीरे टपक रहा था।
जाँघों के अंदरूनी हिस्से पूरी तरह चिपचिपे और चमकदार हो चुके थे।
सफेद धारें उसकी गोरी त्वचा पर फैल रही थीं और बिस्तर पर गिर रही थीं।
कामिनी हांफती हुई धीरे-धीरे उठी।
पैर काँप रहे थे। कमर में दर्द था। दोनों छेद अभी भी खुले और सुन्न से थे।
लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी भूख बाकी थी।
वह पहले शंकर के पास गई।
घुटनों के बल बैठ गई।
शंकर का लंड अभी भी आधा तना हुआ था।
वीर्य और चुत के रस से पूरी तरह सना हुआ, चमक रहा था।
कामिनी ने बिना एक शब्द कहे उसे हाथ में लिया और मुँह में भर लिया।
चप… चप… चपक....
शंकर कामिनी कि हरकत उसकी हिम्मत देख सिहर उठा हे भगवान किस मिट्टी कि औरत है ये. आअह्ह्हब...... शंकर के होंठ धीरे धीरे बड़बड़ाए.…
वह धीरे-धीरे चाटने लगी।
जीभ से सुपाड़े को साफ करती, फिर पूरा लंड मुँह में लेती, फिर निकालकर चाटती।
वीर्य का स्वाद उसकी जीभ पर फैल रहा था।
वह उसे निगल नहीं रही थी। बस चाट-चाटकर साफ कर रही थी। जैसे कोई भूखी कुतिया मलाई कि आखिरी बूँद तक चाटना चाहती हो।
“आअह्ह्ह…”
शंकर की कमजोर सिसकी निकली। उसकी उंगलियाँ कामिनी के बालों में चली गईं।
कामिनी ने शंकर का लंड छोड़ा और घुटनों के बल जमील की तरफ रेंगती हुई चली गई।
जमील का काला लंड भी वीर्य से सना हुआ था।
गाँड के रस और उसके अपने वीर्य की मिली-जुली गंध से भारी।
कामिनी ने उसे भी दोनों हाथों से पकड़ा और मुँह में ले लिया।
पच्च… चप… पच्च…
वह और भी गंदी तरह से चाटने लगी।
लंड के नीचे तक जीभ ले गई। अंडकोष चाटे। फिर वापस सुपाड़े पर आ गई और जोर से चूसने लगी।
वीर्य की बची-खुची धारें उसके गालों से बह रही थीं।
“या अल्लाह… क्या औरत है…”
जमील ने उन्माद में आँखें बंद कर लीं।
उसका हाथ कामिनी के सिर पर चला गया।
कामिनी दोनों के बीच घुटनों के बल बैठी हुई थी।
एक हाथ से शंकर का लंड सहला रही थी, दूसरे से जमील का लंड मुँह में लिए हुए चाट रही थी।
वीर्य और अपने रस से सने दोनों लंडों को वह बारी-बारी से मुँह में ले रही थी।
जैसे सच में कोई रंडी हो जो अपने ग्राहकों को फिर से खड़ा करना चाहती हो।
चप… पच्च… चपक....… आअह्ह्ह… पच्च…
उसके होंठ चमक रहे थे।
ठुड्डी पर वीर्य की धारें सूख रही थीं।
आँखें आधी बंद थीं।
साँसें अभी भी भारी थीं, लेकिन वह रुकने वाली नहीं थी।
दोनों मर्द उसे देख रहे थे।
हाँफते हुए।
हैरान।
कामिनी का ये रंडीपना काफ़ी था उन दोनों के लंड मे ताकत फूँकने के लिए.
कामिनी ने जमील का लंड मुँह से निकाला।
लार और वीर्य की लंबी तार उसके होंठ से लंड तक खिंच गई।
फिर वह मुड़ी और शंकर के लंड पर वापस मुँह ले गई।
पूरे कमरे में सिर्फ उसकी गीली, गंदी चाटने की आवाजें गूँज रही थीं।
कामिनी दोनों के लंड चाटती रही।
चप… पच्च… चाओ… पच्च…
वीर्य और अपने रस से सने लंडों को वह बारी-बारी से मुँह में ले रही थी, चाट रही थी, चूस रही थी।
जमील और शंकर पहले थके हुए थे, लेकिन कामिनी की इस गंदी, भूखी सेवा ने उन्हें फिर से जगा दिया।
पहले शंकर का लंड तनना शुरू हुआ।
फिर जमील का।
दोनों धीरे-धीरे फिर से सख्त और खड़े हो गए।
कामिनी ने महसूस किया।
उसके होंठों पर एक थकी हुई लेकिन शैतानी मुस्कान तैर गई।
वह उठी।
पैर अभी भी काँप रहे थे। दोनों छेदों से वीर्य रिस रहा था।
लेकिन उसकी आँखों में अब थकान नहीं, एक नई भूख थी।
कमरे में रमेश के बिस्तर के ठीक सामने एक सोफा रखा था।
कामिनी ने उस सोफे की तरफ देखा।
फिर जमील की तरफ।
“वहाँ… चलो.... ”
उसकी आवाज कर्कश और काँपती हुई थी। शायद रमेश को कुछ दिखाना चाहती थी, कि औरत कि सेवा कैसे कि जाती है. कैसे ख़ुश करते है एक जवान मादक औरत को.
किसी ने सही कहाँ है औरत को सम्भोग कला सिखाई नहीं जा सकती, उसके अंदर ये गुण पहले से ही विधमान होता है.
जमील समझ गया।
वह उठकर सोफे पर जा बैठा। पीठ टिकाई। पैर फैलाए।
उसका काला, चमकता हुआ लंड हवा में तना खड़ा था।
कामिनी लड़खड़ाते कदमों से उसके पास गई।
रमेश ठीक पीछे बिस्तर पर खर्राटे ले रहा था।
उसका मुँह खुला हुआ था। कामिनी की पीठ लगभग रमेश के चेहरे के सामने थी।
कामिनी ने जमील के कंधों पर हाथ रखे।
फिर खुद ही अपने दोनों घुटनों को सोफे पर टिकाया।
एक हाथ से जमील का लंड पकड़ा और अपनी चुत के मुहाने पर टिकाया।
वह खुद बैठी।
पच्च्च… पचक.... कितनी बेशर्म हो गई थी कामिनी.
लंड एक ही बार में उसकी गीली, खुली हुई चुत में धँस गया।
“आअह्ह्ह…”
कामिनी ने आँखें बंद कर लीं।
धीरे-धीरे पूरी तरह बैठ गई। जमील का लंड जड़ तक अंदर चला गया।
शंकर पीछे आ चुका था।
उसने कामिनी की गाँड के दोनों हिस्से फैलाए।
अपने फिर से तने हुए लंड को गाँड के छेद पर टिकाया।
कामिनी ने खुद ही गाँड थोड़ी पीछे की।
“डाल… पीछे भी भर दो मुझे फिर से आअह्ह्ह.....…”
शंकर ने धक्का दिया।
धप्प्प…
गाँड का छेद पहले से खुला हुआ था। लंड आसानी से अंदर चला गया।
अब कामिनी दोनों लंडों पर पूरी तरह बैठी हुई थी।
नीचे जमील की चुत में।
पीछे शंकर की गाँड में।
रमेश के बिल्कुल मुँह के सामने।
कामिनी ने कमर हिलानी शुरू कर दी।
पहले धीरे।
फिर तेज।
वह खुद उठती और बैठती।
चुत से जमील का लंड बाहर निकलता, फिर वापस पूरा अंदर चला जाता।
पीछे शंकर का लंड गाँड में अंदर-बाहर होता।
पच्च… धप्प… पच्च… धप्प…
आवाजें साफ गूँज रही थीं।
रमेश के खर्राटों के साथ।
कामिनी अब पूरी तरह रंडी बन चुकी थी।
थकी हुई। वीर्य से भरी हुई।
फिर भी खुद लंड पर बैठकर कमर लचका रही थी।
स्तन जोर-जोर से हिल रहे थे।
मुँह खुला हुआ। आवाजें निकल रही थीं।
“आअह्ह्ह… और जोर से… दोनों… आअह्ह्ह…”
वह खुद अपनी गाँड शंकर के लंड पर पटक रही थी।
खुद जमील के लंड पर चुत गिरा रही थी।
जमील ने उसके स्तन पकड़ लिए और जोर-जोर से मसलने लगा।
शंकर ने कमर पकड़कर पीछे से और तेज पेलना शुरू कर दिया।
कामिनी पागलों की तरह हिल रही थी।
दोनों लंडों पर।
रमेश के मुँह के ठीक सामने।
उसने साबित कर दिया था।
उसके अंदर कितनी आग है।
वह कितनी बड़ी रंडी है।
लगाम कामिनी के हाथो मे थी अब, वह सिर्फ सह नहीं रही थी।
वह खुद चुद रही थी।
वह उठती…
पच्च…
जमील का लंड उसकी चुत से लगभग बाहर निकल आता।
फिर जोर से बैठती…
धप्प्प…
पूरा लंड जड़ तक धँस जाता।
पीछे शंकर का लंड भी उसी रफ्तार से गाँड में अंदर-बाहर हो रहा था।
कामिनी की आवाज अब पूरी तरह खुल गई थी।
“आअह्ह्ह… चोदो… दोनों चोदो… आअह्ह्ह… जोर से…”
वह खुद अपनी गाँड शंकर के लंड पर पटक-पटक रही थी।
माँस की पटपटाहट साफ सुनाई दे रही थी।
स्तन जमील के चेहरे के सामने जोर-जोर से हिल रहे थे।
जमील ने उसके बाल पकड़कर चेहरा ऊपर उठाया।
कामिनी की आँखें आधी खुली थीं। मुँह खुला। लार टपक रही थी।
“बोल… तू क्या है?”
जमील ने पूछा।
कामिनी ने बिना झिझक के जवाब दिया।
आवाज कर्कश और काँपती हुई।
“रंडी… तुम्हारी रंडी… आअह्ह्ह… दोनों की रंडी…”
फिर वह और तेज हिलने लगी।
चुत और गाँड दोनों लंडों पर पटक-पटककर।
पसीना उसके पूरे शरीर से बह रहा था।
वीर्य उसकी जाँघों से टपक-टपककर सोफे पर गिर रहा था।
कामिनी ने जमील के बाल पकड़कर उसका मुँह अपने स्तनों पर और जोर से दबा दिया।
“चूस साले… जोर से चूस… काट भी… आअह्ह्ह…”
जमील ने निप्पल को दाँतों से दबाया। कामिनी की कमर झटके से उछली, लेकिन उसने खुद और जोर से बैठ गई।
शंकर ने गाँड पर दो थप्पड़ एक साथ जड़ दिए।
चटाक… चटाक…!
“आआअह्ह्ह… हाँ… मार… और मार… रंडी को मार…”
कामिनी ने खुद ही दोनों हाथ पीछे करके अपनी गाँड के हिस्से फैला दिए।
शंकर के लंड को और गहराई तक लेने के लिए।
“देख… कितनी खुली है… डाल… और जोर से डाल…”
वह उठती और इतनी जोर से बैठती कि सोफे की कराह निकल जाती।
पच्च… धप्प्प… पच्च… धप्प्प…
वीर्य और कामरस की मिश्रित धार उसकी जाँघों से बहकर सोफे पर गिर रही थी।
आवाज इतनी गीली और गंदी थी कि पूरे कमरे में गूँज रही थी।
कामिनी ने जमील का चेहरा अपने दोनों हाथों से पकड़ा।
आँखों में आँखें डालकर बोली
“बोल… मैं क्या हूँ?”
जमील हाँफते हुए बोला, “रंडी…”
“जोर से बोल…”
“रंडी… पक्की रंडी…”
कामिनी मुस्कुराई।
फिर और तेज हिलने लगी।
“हाँ… पक्की रंडी… तुम्हारी… दोनों की… आअह्ह्ह… चोदो रंडी को… मार डालो…”
वह अब पूरी तरह बेकाबू थी।
थकान, दर्द, शर्म… सब कुछ पीछे छूट चुका था।
सिर्फ एक गंदी, भूखी आग बाकी थी।
“साली… देख कैसे मजे ले रही है… अपने पति के सामने…”
कामिनी ने आँखें बंद कर लीं और जोर से चिल्लाई
“हाँ… उसके सामने… चोदो… उसकी बीवी को चोदो… आअह्ह्ह… रंडी को चोदो…”
उसकी कमर अब मशीन की तरह चल रही थी।
उठो… बैठो… उठो… बैठो…
दोनों लंडों को बारी-बारी से निगलती और बाहर निकालती।
जमील के हाथ उसके स्तन मसल रहे थे।
शंकर के हाथ उसकी कमर और गाँड पर थे।
लेकिन असल में हिला रही थी खुद कामिनी।
वह साबित कर रही थी, कि उसके अंदर की औरत पूरी रंडी बन चुकी है.
कामिनी दोनों लंडों पर पागलों की तरह हिल रही थी।
नीचे जमील का काला, खुरदरा लंड उसकी चुत को चीर रहा था।
पीछे शंकर का मोटा गोरा लंड गाँड में जड़ तक धँसा हुआ था।
वह खुद उठती…
पच्च…
फिर जोर से बैठती…
धप्प्प…
हर बार जब वह बैठती, दोनों लंड एक साथ उसके अंदर गहरे तक चले जाते।
चुत और गाँड दोनों पूरी तरह भरे हुए थे।
बीच की पतली दीवार हर धक्के पर दब रही थी।
“आअह्ह्ह… और जोर से… दोनों… आअह्ह्ह…”
उसकी आवाज अब पूरी तरह खुल चुकी थी।
लार ठुड्डी से टपक रही थी।
स्तन जोर-जोर से हिल रहे थे।
पसीना पूरे शरीर से बह रहा था।
फिर… अंदर कुछ टूटने लगा।
पहले बहुत धीरे।
पेट के सबसे निचले हिस्से से एक गहरी, भारी लहर उठी।
चुत ने जमील के लंड को कसकर जकड़ लिया।
गाँड ने शंकर के लंड को और सख्ती से दबाया।
कामिनी की साँसें अटक गईं।
उसकी उंगलियाँ जमील के कंधों में गड़ गईं।
“आअह्ह्ह… और कस के … थोड़ा… और अंदर उउउफ्फ्फ्फ़....आअह्ह्ह…” कामिनी लगभग अपने बाल नोच ले रही थी.
कामिनी का जिस्म रुकने वाला नहीं था।
लहर दूसरी बार आई।
इस बार और तेज।
जाँघें काँपने लगीं।
पैर की उंगलियाँ सिकुड़ गईं।
तीसरी लहर ने उसे लगभग उठा ही लिया।
“आआअह्ह्ह… नहीं… मैं… आअह्ह्ह…”
अब रफ्तार अपने-आप तेज हो गई।
कामिनी खुद पागलों की तरह दोनों लंडों पर पटकने लगी।
उठो… बैठो… उठो… बैठो…
हर बार और जोर से।
हर बार और गहरा।
धप्प… थाड… पच्च… धप्प… थाड…
फिर वो पल आया।
पूरा शरीर एक साथ कमान की तरह तन गया।
पीठ में ऐंठन दौड़ गई।
आँखें पीछे की तरफ पलट गईं।
मुँह खुला रह गया।
चुत और गाँड दोनों ने एक साथ इतनी जंगली सिकुड़न मारी कि दोनों मर्दों की साँसें अटक गईं.
कामिनी को अपनी आत्मा चुत के रास्ते बाहर निकलती हुई महसूस हुई.
एक तेज, गर्म, बेकाबू धारा चुत से फुट पड़ी,
इतनी जोरदार कि जमील के लंड और पेट पर छलक पड़ी।
पानी की फुहार की तरह।
लगातार।
रुकने का नाम नहीं ले रही थी।
“आआआआअह्ह्ह…!”
आवाज लंबी, काँपती, अधूरी निकली।
जैसे कोई चीख अंदर ही दब गई हो।
शरीर थर-थर काँप रहा था।
लहर के बाद लहर आ रही थीं।
एक रुकती, दूसरी और जोर से आती।
कामिनी का नियंत्रण पूरी तरह खत्म हो चुका था।
उसकी चुत बार-बार जमील के लंड को निचोड़ रही थी।
गाँड शंकर के लंड को जकड़े हुए काँप रही थी।
दोनों छेद से गर्म खोलता हुआ लावा निकल रहा था, ज्वालामुखी बुरी तरह से फटा था इस बार.
वह जमील के ऊपर पूरी तरह ढेर हो गई।
लेकिन अंदर अभी भी सिकुड़न चल रही थी।
चुत और गाँड बार-बार दोनों लंडों को निचोड़ रहे थे, जैसे आखिरी बूँद तक निकालना चाहते हों।
साँसें इतनी तेज और अटकती हुई थीं कि लग रहा था अब साँस नहीं ले पाएगी।
चेहरा लाल हो चुका था।
पूरा शरीर पसीने से नहाया हुआ काँप रहा था।
कुछ पल तक वह ऐसे ही पड़ी रही।
आँखें बंद।
शरीर शिथिल।
जैसे होश ही चले गए हों।
सिर्फ छाती हल्के-हल्के ऊपर-नीचे हो रही थी।
और कभी-कभी एक बहुत कमजोर सी सिसकी निकल जाती थी।
इधर शंकर और जमील की साँसें पहले से ही भारी थीं।
कामिनी के चरम ने उन्हें और बेकाबू कर दिया।
जमील ने कामिनी की कमर दोनों हाथों से कस ली।
उसकी आँखें लाल हो चुकी थीं।
“मोहतरमा… अब नहीं रोक पा रहा…”
उसने नीचे से जोर-जोर से धक्के लगाने शुरू कर दिए।
थाड… थाड… थाड…
हर धक्के के साथ कामिनी का भारी शरीर ऊपर-नीचे हो रहा था।
स्तन उसके चेहरे से रगड़ खा रहे थे।
पीछे शंकर भी अपनी सीमा पर पहुँच चुका था।
उसने कामिनी की गाँड के दोनों हिस्से और जोर से फैलाए।
रफ्तार अचानक बहुत तेज कर दी।
फट… फट… फट… फट…
“साली… ले… गाँड में ले पूरा…”
दोनों अब एक साथ बेकाबू हो गए।
नीचे जमील चुत में पेल रहा था।
पीछे शंकर गाँड में।
धप्प-थाड… धप्प-थाड… धप्प-थाड…
कामिनी की आवाज अब सिर्फ कमजोर सिसकियों में रह गई थी।
वह सह रही थी। थकी हुई। निढाल।
फिर जमील टूट गया।
उसने आखिरी जोरदार धक्का मारा।
पूरा लंड जड़ तक धँस गया।
कमरा काँप उठी।
“आआअह्ह्ह… ले… चुत में ले…”
उसका लंड जोर-जोर से धड़कने लगा।
गर्म, गाढ़ा वीर्य की धार एक के बाद एक कामिनी की चुत की गहराई में छूटने लगी।
पहली धार इतनी तेज थी कि कामिनी को अंदर तक गर्मी महसूस हुई।
फिर दूसरी… तीसरी… चौथी…
जमील की कमर बार-बार हल्के-हल्के धकेलती रही, जैसे और अंदर उंडेलना चाहता हो।
उसी पल शंकर भी अपने नियंत्रण से बाहर हो गया।
उसने कामिनी की कमर कसकर पकड़ी और आखिरी धक्का मारा।
पूरा लंड गाँड में जड़ तक चला गया।
अंडकोष उसकी गाँड से जा टकराए।
“आआअह्ह्ह… गाँड में… ले रंडी…”
शंकर का लंड भी जोर-जोर से धड़कने लगा।
गर्म वीर्य की धार एक के बाद एक कामिनी की गाँड की गहराई में फूट पड़ी।
हर धकेल के साथ और वीर्य अंदर जाता गया।
कामिनी के दोनों छेद अब दो मर्दों के वीर्य से पूरी तरह लबालब भर चुके थे। दोनों के गर्म वीर्य कामिनी के रिसते लावे से मिल कर जवलामुखी रुपी चुत और गांड को ठंडा करने लगे.
चुत और गाँड दोनों सिकुड़-सिकुड़कर लंडों को निचोड़ रहे थे।
जैसे आखिरी बूँद तक निकालना चाहते हों।
जमील और शंकर दोनों कुछ देर तक अंदर धँसे रहे।
साँसें उखड़ी हुई।
लंड अभी भी हल्के-हल्के फड़क रहे थे।
आखिरी बूँदें धीरे-धीरे निकल रही थीं।
कामिनी उनके बीच पूरी तरह निढाल पड़ी थी।
धीरे-धीरे दोनों ने कमर पीछे खींचना शुरू किया।
पहले जमील।
पच्च्च…
लंड चुत से बाहर निकला।
गाढ़ा सफेद वीर्य की मोटी धार तुरंत बाहर बह निकली और कामिनी की जाँघों पर फैल गई।
फिर शंकर।
पुच्च… पच्च…
लंड गाँड से निकला।
दूसरी धार भी पीछे से बहने लगी।
दोनों छेदों से वीर्य रिस-रिसकर सोफे को और गीला कर रहा था।
कामिनी जमील के ऊपर ऐसे पड़ी रही जैसे उसमें जान ही न हो।
सिर्फ साँसें चल रही थीं।
और दोनों छेदों से टपकता हुआ गर्म तरल।
कमरे में अब सन्नाटा पसर गया था।
सिर्फ तीनों की भारी साँसें और रमेश के खर्राटे गूँज रहे थे।
कामिनी जमील के ऊपर पूरी तरह निढाल पड़ी थी।
उसका भारी, पसीने से नहाया हुआ शरीर जमील के सीने से चिपका हुआ था।
स्तन उसके रोएँदार सीने पर दबे हुए।
चेहरा उसके गले में छुपा हुआ।
जमील की साँसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं।
उसने दोनों हाथों से कामिनी की पीठ को सहलाया, लेकिन कामिनी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
शंकर पीछे बैठा हुआ था।
वह कामिनी की गाँड को देख रहा था खुला, लाल, सूजा हुआ छेद, जहाँ से अभी भी सफेद धार रिस रही थी।
उसने हल्के से हाथ फेरा, लेकिन कामिनी हिली तक नहीं।
कामिनी की आँखें बहुत भारी हो चुकी थीं।
वह आधी-अधूरी कोशिश से आँखें खोलना चाहती थी, लेकिन पलकें नहीं उठ रहीं थीं।
कमरे की दीवार पर लगी घड़ी की तरफ उसकी धुंधली नजर गई।
सुबह के चार बज रहे थे।
‘चार…?’
ये ख्याल उसके दिमाग में आते ही आँखें और भारी हो गईं।
पूारी रात…
कितनी देर…
कितनी बार…
उसका शरीर अब पूरी तरह जवाब दे चुका था।
हाथ-पैर में जान नहीं थी।
कमरा घूम रहा था।
आवाजें दूर होती जा रही थीं।
क्रमशः...

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