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कामिनी 3.0 भाग -7


मेरी माँ कामिनी 3.0 - अध्याय 7

कामिनी की साँसें धौंकनी की तरह चल रही थीं। उसे लगा जैसे आज बीस साल की इस घुटन से उसे आख़िरकार मुक्ति मिलने ही वाली है। उसके जिस्म की गर्मी अपने चरम पर थी, वो वासना के उस आख़िरी मुहाने पर खड़ी थी, जहाँ से लौटना अब नामुमकिन था। सामने से शंकर की जंगली छुअन और पीछे से जमील का खुरदरा मोटा, भारी लंड का सख़्त दबाव उसे पागल कर रहा था।
"आअह्ह्ह.... जमील... अंदर..." कामिनी के होंठों से एक बेकाबू सिसकी फिसल गई।
जमील ने अपनी कमर को और आगे बढ़ाया। उसकी सख़्त मर्दानगी जैसे ही कामिनी के जिस्म के उस सबसे संवेदनशील हिस्से से टकराई...
"आआआआहहहहहहह.... जमील!"
कामिनी इस जंगली स्पर्श से इतनी ज़ोर से चीख पड़ी कि उस सुनसान जंगल का सन्नाटा ही नहीं टूटा, बल्कि पीछे ऑटो में लगभग बेहोश पड़े रमेश की चेतना भी एक झटके में लौट आई।
"हेयम.. ककम.... क्या हुआ? कहाँ हूँ मैं..."
रमेश की भारी, लड़खड़ाती और नशे में डूबी आवाज़ ऑटो के अँधेरे से गूँजी। वो आँखें मलता हुआ ऑटो से बाहर आने की नाकाम कोशिश करने लगा। लेकिन सस्ती शराब का नशा अभी भी उसकी नसों में दौड़ रहा था, उसके जिस्म ने उसका साथ नहीं दिया और वो वापस सीट पर लुढ़क गया।
इधर बाहर, कामिनी को तो जैसे काठ मार गया। उसका जिस्म, जो अभी डर, हवस और अत्यधिक उत्तेजना से सुलग रहा था, अचानक ठिठुर गया। ऐसा लगा जैसे किसी ने उसे वासना के उबलते दरिया से खींचकर सीधे बर्फ़ पर फेंक दिया हो।
"मरवा दिया बे आज इस औरत ने!" सामने खड़े शंकर के मुँह से हड़बड़ाहट में एक गाली निकली। उसने पलक झपकते ही अपने कपड़े सँभाले और भागता हुआ ऑटो की तरफ़ गया। जमील ने भी बिना एक पल गँवाए ख़ुद को समेटा।
"मैडम, आप साड़ी पहनो... मैं देखता हूँ उसे।"
"हाँ साब... मैं हूँ, जमील! वो... वो मोहतरमा को ज़ोर से पेशाब लगा था, तो बस थोड़ा साइड में ऑटो रोका है," जमील ने गज़ब की फुर्ती और चालाकी दिखाते हुए रमेश को सँभाला। रमेश नशे में इतना धुत्त था कि उसे अहसास ही नहीं हुआ कि वो सड़क के किनारे नहीं, बल्कि एक सुनसान देवदार के जंगल में है।
तभी कामिनी भी जैसे-तैसे अपनी साड़ी लपेटे हुए, लड़खड़ाते कदमों से ऑटो के पास आ गई।

"साला... इन औरतों का चुत पर कोई कंट्रोल ही नहीं है! कभी भी मूत आ जाता है," रमेश ने कामिनी को देखते ही भद्दी सी गाली दी।
दो अनजान लोगो के सामने अपनी बीवी को गाली देने मे उसे जरा भी गुरेज नहीं हुआ.
कामिनी के कानों में रमेश की यह बात किसी सुई की तरह चुभी। हालाँकि रमेश अपनी जगह सच कह रहा था, वाक़ई कामिनी का ख़ुद पर कोई कंट्रोल नहीं था। लेकिन वो ये नहीं जानता था कि कामिनी किस चीज़ पर कंट्रोल खो चुकी थी। और वो हिस्सा महज़ वो काम नहीं करता जो रमेश सोच रहा था; वो हिस्सा औरत की इच्छाओं, उसकी आज़ादी और उसकी सबसे गहरी आग को व्यक्त करता है।

"आ गई मूत के? बैठ अब!" रमेश ने अपनी लाल, ग़ुस्से से भरी आँखों से कामिनी को घूरा।
कामिनी ने कुछ ना कहा, लेकिन अंदर ही अंदर उसे इस बेइज़्ज़ती में एक अजीब सा, खौफ़नाक सुकून मिला। जिन दो मर्दों के सामने वो अभी चंद पलों पहले बेपर्दा खड़ी थी, अपनी सारी हदें पार कर चुकी थी, उन्हीं के सामने अपने पति की यह गाली उसे अपमानित करने के बजाय और ज़्यादा उत्तेजित कर रही थी। 

कामिनी अब वो संस्कारी औरत नहीं रही थी; वो अब पूरी तरह से एक बाग़ी और वासना में डूबी हुई औरत बन चुकी थी।
"चलें साब?" शंकर ने ऑटो स्टार्ट किया।
ददददरररर..... धक... धक... धक... ऑटो चल पड़ा।
महज़ 10 मिनट भी नहीं लगे कि ऑटो वापस 'होटल कुर्मांचल' के सामने खड़ा था।
"अच्छा साब, चलें?" जमील ने ऑटो से उतरते हुए कामिनी की तरफ़ भूखी बेबस नज़र से देखा, जैसे कोई बहुत बड़ा खज़ाना उसके हाथ आते-आते फिसल गया हो। उसकी आँखों में अधूरापन साफ दिख रहा था।
अधूरी तो कामिनी भी थी, इन लोगो से कहीं ज्यादा, उसकी चुत कुलबुला रही थी, जल रही थी.

"आप इन्हें अंदर तक छोड़ देंगे?"
अचानक कामिनी की आवाज़ गूँजी। यह सिर्फ एक याचना नहीं थी... यह एक खुला निमंत्रण था। अपनी अधूरी हवस, अपने सुलगते जिस्म की आग को मिटाने का एक बेहयायी भरा और सीधा न्योता। अब भला दुनिया में ऐसा कौन सा मर्द होगा जो ऐसी कामुक और सुलगती हुई औरत का न्योता ठुकरा दे?

"हाँ... हाँ मैडम! छोड़ देंगे ना," जमील की आँखों में चमक आ गई।
रमेश अभी भी नशे में झूम रहा था। कामिनी अपनी उसी मादक और लचकदार चाल से आगे-आगे होटल की सीढ़ियों की तरफ़ चल दी, और पीछे जमील बस उसके मटकती हुई गांड को देखकर आहें भरता रह गया।

"और... और है क्या दारू?" तभी रमेश की मरी हुई, नशे में डूबी आवाज़ आई।
"है... है ना साब!" जमील की किस्मत आज पूरी तरह उसके साथ थी। 'अल्लाह मेहरबान तो गधा पहलवान' इसका जीता-जागता उदाहरण जमील ख़ुद था

"शंकर, जल्दी साब के लिए वहीं से एक और बोतल लेकर आ! साब को मज़ा आ जाएगा," जमील के चेहरे पर एक ऐसी वहशी और शातिर मुस्कान थी, जैसे उसने ज़मीन में गड़ा कोई खज़ाना ढूँढ निकाला हो।
"जब तक मै साब को कमरे मे पहुँचता हूँ "

शंकर ने ऑटो वापस मोड़ा, और जमील, रमेश को सहारा देता हुआ, कामिनी के पीछे-पीछे होटल के अँधेरे गलियारों में खो गया। 
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कमरे के अंदर का माहौल बहुत ही भारी, घुटन भरा और एक अजीब सी मादक गर्मी से लबालब था। पीली मद्धम रोशनी में सन्नाटा ऐसा था कि सुई गिरे तो उसकी भी आवाज़ गूँज जाए।
रमेश अभी पूरी तरह से सोया नहीं था। सस्ती शराब के भयंकर नशे में उसकी लाल आँखें कभी झटके से बंद हो रही थीं, तो कभी अधखुली होकर कमरे को घूरने लगती थीं। उसे बस शंकर के लौटने और दारू की बोतल का बेसब्री से इंतज़ार था।
बिस्तर पर औंधे मुँह लेटे-लेटे उसकी धुंधली और लालची नज़रें सामने बैठी कामिनी की ओर गईं। कामिनी के भारी, गदराए जिस्म को देखकर रमेश के सूखे होंठों पर एक बहुत ही नीच, शैतानी और कपटी मुस्कान तैर गई। वो मन ही मन अपना घिनौना प्लान पक्का कर चुका था। उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा था कि उसकी बीवी किस हालत में है; उसके लालची दिमाग़ में बस करोड़ों की डील और मैक्सिकन माफिया (पेड्रो और कार्लोस) घूम रहे थे।

'बस आज रात... फिर मेरी ज़िंदगी सेट!' रमेश ने नशे में बुदबुदाते हुए आँखें मूँद लीं।
दूसरी तरफ़, कामिनी से ठीक कुछ कदमों की दूरी पर कुर्सी पर बैठा जमील पसीने से तर-बतर था।
वो एक घाघ और पुराना शिकारी ज़रूर था, लेकिन रमेश की मौजूदगी उसे थोड़ा हिचकिचाने पर मजबूर कर रही थी। हालाँकि, उसकी फटी और भूखी नज़रें कामिनी के जिस्म का एक-एक पोर नोच रही थीं। अपनी इस बेकाबू होती हवस को दबाने के लिए वो बार-बार, बेताबी से पैंट के ऊपर से ही अपने सख़्त होते लंड को मसल रहा था।

कामिनी, जिसके अंदर हवस और बग़ावत की भयंकर आग अभी भी धधक रही थी, वो इस पूरे माहौल और ख़तरे को बहुत अच्छी तरह समझ रही थी। और ताज्जुब की बात यह थी कि वो इस ख़तरे से डर नहीं रही थी, बल्कि इसे एन्जॉय (Enjoy) कर रही थी।

कामिनी जानबूझकर उठी और बिस्तर पर ठीक रमेश के सिरहाने की तरफ़ जाकर बैठ गई।
उसने अपनी पोज़िशन बहुत ही शातिर तरीके से चुनी। रमेश जिस तरह से लेटा था, उसे कामिनी की गोरी, मांसल पीठ तो साफ़ नज़र आ रही थी, लेकिन सामने कुर्सी पर बैठा जमील पूरी तरह से रमेश की नज़रों के दायरे से बाहर (Blind spot) था।

रमेश को लग रहा था कि कामिनी बस थकावट से बैठी है, जमील जैसे औरतबाज़ इंसान से ऐसा सुनहरा मौका कैसे छूट जाता? कामिनी का इस तरह सिरहाने बैठना और अपने पैरों को बिस्तर से नीचे लटकाना, जमील के लिए एक सीधे और बेशर्म निमंत्रण की तरह था।

जमील ने अपनी कुर्सी से अपना एक गंदा, मैला और काले बालों से भरा पैर धीरे से आगे बढ़ाया।
उसका खुरदरा पैर ज़मीन पर खिसकता हुआ सीधा आगे गया और बिस्तर से नीचे लटक रहे कामिनी के गोरे, नाज़ुक पैरों के ऊपर जा चढ़ा।
जैसे ही जमील के मैले, खुरदरे तलवे और सख़्त उँगलियों की रगड़ कामिनी की पिंडली कि नंगी त्वचा से टकराई... कामिनी के पूरे वजूद में 440 वोल्ट का करंट दौड़ गया। ठीक उसके पीछे उसका पति लेटा था, जो कभी भी आँखें खोल सकता था, और सामने एक सड़कछाप आदमी सरेआम उसके जिस्म से खेल रहा था।
"इस्स्स्स...."
कामिनी के रसीले होंठों से एक बेहद गर्म, काँपती हुई और मादक सिसकी निकली। लेकिन इससे पहले कि वो आवाज़ कमरे के सन्नाटे को चीरकर रमेश के कानों तक पहुँचती, कामिनी ने अपने निचले होंठ को दाँतों तले बुरी तरह भींच लिया और सिसकी को अपने हलक में ही पूरी तरह से दबा लिया।

उसका सीना ज़ोर-ज़ोर से ऊपर-नीचे होने लगा था। पीछे रमेश के जागने का डर था, वही सामने हवस की खुरदरी आग उसे अंदर तक जला रही थी।
ना जाने किस जन्म के संस्कार उसे रोक रहे थे, वरना मन तो कर रहा था यही रमेश के बगल मे टांगे फैला कर चुद जाये.

जमील का मैला, खुरदरा पैर अब रुकने वाला नहीं था। उसने अपनी सख़्त उँगलियों से कामिनी की लाल साटन की साड़ी के किनारे को पकड़ा और बहुत ही बेशर्मी से धीरे-धीरे ऊपर की तरफ़ सरकाने लगा।

कामिनी की ख़ुमार भरी नज़रें ज़मीन से उठकर जमील के पैर पर गईं। वो पैर बेहद काला, भद्दा और खुरदरा था। उसकी एड़ियों में गहरी दरारें थीं और उँगलियों के पोरों में बरसों का मैल जमा हुआ था। अगर यह कोई आम दिन होता, तो कामिनी जैसी साफ-सफाई और सलीके से रहने वाली 'संस्कारी' औरत को उस गंदे पैर को देखकर ही उबकाई आ जाती। वो चीखकर पूरा घर सिर पर उठा लेती।

लेकिन आज? आज हालात बिल्कुल अलग थे। कामिनी इस वक़्त हवस और बग़ावत के ऐसे गहरे और अंधे दरिया में बह रही थी, जहाँ उसे सही-ग़लत, साफ़-गंदे या इज़्ज़त-बेइज़्ज़ती का कोई फ़र्क ही महसूस नहीं हो रहा था।
जैसे-जैसे वो मैला पैर साड़ी को खिसकाते हुए कामिनी की गोरी, दूधिया पिंडलियों (Calves) को छूता हुआ ऊपर बढ़ रहा था, कामिनी को उस खुरदरेपन में एक अजीब सी, गंदी लेकिन मीठी आग महसूस हो रही थी। वो इतनी बेहया और बेख़ौफ़ हो चुकी थी कि अपने ही पति के सिरहाने बैठकर, पीठ पीछे उसे धोखा देते हुए, अपनी जाँघों को सिकोड़ने के बजाय... उन्हें धीरे-धीरे और चौड़ा कर रही थी।
वो बिना एक शब्द बोले, सिर्फ़ अपनी सुलगती साँसों और खुली हुई जाँघों से जमील के फटे, मैले पैर को अपने जिस्म के और करीब, अपनी जाँघों के बीच आने का अनकहा न्योता दे रही थी।
उसकी कमर खुद ब खुद आगे सरक आई,
आंखे कभी जमील के बदसूरत चेहरे को देखती तो, कभी उसके निहायती गंदे पैरो को.

कामिनी की गदराई, बेदाग़  गोरी जाँघों पर जमील का  काला, गंदा पैर ऐसे रेंग रहा था... जैसे किसी पवित्र, महकते हुए 'चन्दन के पेड़' पर कोई काला, ज़हरीला नाग आहिस्ता-आहिस्ता ऊपर चढ़ रहा हो, और अपने लिए कोई गहरा, अँधेरा बिल तलाश कर रहा हो।
पीछे रमेश नशे में धुत्त होकर कभी-कभी कुछ बड़बड़ा देता, तो कामिनी की धड़कनें एक पल को रुक जातीं। लेकिन उसका जिस्म पीछे हटने को राज़ी नहीं हुआ। नाग अब अपनी मंज़िल के बिल्कुल करीब था, और कामिनी का रोम-रोम उस ज़हरीले डंक (स्पर्श) का इंतज़ार कर रहा था।. कामिनी ने अपनी कमर को झटके से आगे किया.
ईईस्स्स्स.... आअह्ह्ह.... उम्मम... कामिनी ने अपने होंठ आपस मे भींच लिए, जमील के पैर का अंगूठा सीधा कामिनी कि गीली चुत के दाने से जा टकराया था.

क्या सुकून था इस गंदेपन मे, कामिनी ने लज्जत से आंखे बंद कर ली.

तभी... कमरे के बाहर के सन्नाटे को चीरते हुए, दरवाज़े की तरफ़ से भारी कदमों की आवाज़ आई।
कोई कमरे की तरफ़ ही आ रहा था।

तभी कमरे के दरवाज़े पर एक तेज़ दस्तक हुई
ठक... ठक... ठक...
कामिनी की जाँघों के बीच, जहाँ जमील के मैले पैर का अँगूठा बस चुत के संवेदनशील दाने को मसलता ही कि दरवाज़े की आवाज़ ने सब तहस-नहस कर दिया।
रमेश, जो अब तक नशे में मुर्दे सा पड़ा था, अचानक झटके से उठ बैठा।
"आ जाओ भाई... खुला है!" उसने भारी, नशेड़ी आवाज़ में हाँक लगाई।

कामिनी ने हड़बड़ाहट में झट से अपनी साड़ी नीचे खींच ली। उसका दिल, दिमाग़ और सुलगता हुआ जिस्म... सब कुछ जैसे ग़ुस्से और बेबसी से फटा जा रहा था। वो बार-बार लज़्ज़त (चरम सुख) के बिल्कुल करीब पहुँचकर वापस उसी अधूरी प्यास में धकेल दी जा रही थी।

दरवाज़ा खुला...
सामने शंकर खड़ा था, और उसके हाथ में पहाड़ी देसी दारू की पूरी बोतल थी।
उसे देखते ही रमेश की लाल, धुंधली आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई। प्यासे को जैसे पूरा समंदर मिल गया था।
"ला भाई... कितनी देर लगा दी तूने!"
इधर कामिनी का दिल मुरझाने लगा। उसका पूरा जिस्म ग़ुस्से और अधूरेपन की आग में जल रहा था। उसे लगा कि रमेश अब दारू लेकर इन दोनों को यहाँ से जाने के लिए बोल देगा।
'क्या करूँ... कोई इशारा करूँ? नहीं, नहीं... क्या बहाना दूँ? कोई बहाना भी तो नहीं है... ये दोनों यहाँ कैसे रुकेंगे?' कामिनी का हवस भरा दिमाग़ तेज़ी से दौड़ने लगा। वो अभी इसी उधेड़बुन में थी कि तभी रमेश की आवाज़ गूँजी

"कामिनी, ज़रा तीन गिलास ले आना टेबल से!"
'तीन गिलास!'
ये शब्द सुनते ही कामिनी के चेहरे के भाव पूरी तरह बदल गए। ना जाने क्यों, उसके सीने में एक ऐसी राक्षसी ख़ुशी दौड़ गई जैसे उसकी कोई असंभव सी मुराद पूरी हो गई हो।
"ल... लाई!" कामिनी चहकते हुए उठी और झट से तीन गिलास और पानी की बोतल लाकर बिस्तर पर रख दी।

"आओ भाई, एक-एक पेग तुम लोग भी मार लो। परदेस में तुम्हारे जैसे नेक आदमी कहाँ मिलते हैं!" रमेश ने खुशामद करते हुए फटाफट तीन पेग बना दिए।
कामिनी की पीठ उनकी तरफ़ थी, लेकिन उसके होंठों पर एक बहुत ही शैतानी और मादक मुस्कान तैर गई।
वाक़ई, दारू भी क्या ग़ज़ब की चीज़ है सड़कछाप और मावली लोग भी पल भर में 'नेक दोस्त' बन जाते हैं!
कामिनी वहाँ से अपनी उसी लचकदार चाल में चलती हुई बालकनी में लगी कुर्सी पर जाकर बैठ गई। अब मर्दों की महफ़िल सज चुकी थी, तो उसका वहाँ बीच में क्या काम था?

बालकनी की ठंडी और मद्धम रोशनी वाली कुर्सी पर बैठी कामिनी के कान अंदर कमरे से आती आवाज़ों पर लगे हुए थे। कमरे के अंदर कांच के गिलासों के टकराने की हल्की सी खनक और तीनों की दबी हुई बातचीत का शोर हवा में तैर रहा था।
"लो साब... एक घूँट और गले के नीचे उतारो, फिर देखो इस पहाड़ की ठंड कैसे छू मंतर होती है!" जमील की चालाकी भरी और भारी आवाज़ गूँजी।
रमेश पहले से ही थका हुआ और नशे में था। उस कच्ची और तेज़ शराब के दो-तीन बड़े पेग अंदर जाते ही उसका दिमाग़ सुन्न होने लगा। उसकी आँखें झपकने लगीं, और बड़बड़ाते हुए उसने कहा, "तुम लोग... तुम लोग बहुत अच्छे आदमी हो यार... .. आजकल कहाँ मिलते है ऐसे लोग"
शंकर और जमील एक-दूसरे को देखकर मंद-मंद मुस्कुराए। उन्हें समझ आ गया था कि रमेश पूरी तरह से उनके जाल में फँस चुका है और अब बस कुछ ही पलों की बात है जब ये शराबी पति पूरी तरह से होश खो बैठेगा।

बालकनी में बैठी कामिनी का जिस्म अभी भी सुलग रहा था। बाहर की बर्फीली हवा जब उसके गर्म, पसीने से भीगे चेहरे और खुले कंधों से टकराती, तो एक अजीब सी सिहरन उसके रोम-रोम में दौड़ जाती। उसकी निगाहें कमरे के परदे के उस पार जमी थीं. कितनी बेहाया औरत हो गई थी कामिनी, आपने पति के बेहोश होने कि कामना कर रही थी.
कमरे के अंदर रमेश ने लड़खड़ाते हाथों से एक और पेग गटका और बिस्तर पर पीछे सिर टिका दिया।
"साला... सिर भारी हो रहा है..." बड़बड़ाते हुए रमेश की आँखें पूरी तरह बंद हो गईं, और कुछ ही सेकंड में उसके मुँह से भारी खर्राटों की आवाज़ गूँजने लगी।

वह सो चुका था—पूरी तरह, गहरी नींद में!
कमरे में सन्नाटा पसर गया।
जमील की आँखों में हवस भरी चमक आ गई। उसने धीरे से अपनी जगह छोड़ी, और बिना कोई आवाज़ किए धीमे कदमों से बालकनी के अंधेरे कोने की तरफ बढ़ने लगा जहाँ कामिनी अपनी सुलगती साँसों के साथ बैठी हुई थी। 

कामिनी कि बेचैनी अपने चरम पर थी। उसका सीना तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहा था, सुलगते जिस्म की हर एक नस उस स्पर्श के लिए चीख रही थी जो कुछ देर पहले अधूरी छूट गई थी। तभी पीछे से एक भारी और दबी हुई आवाज़ गूँजी
"क्या... कुछ चाहिए, मोहतरमा?"
कामिनी ने चौंककर पीछे देखा। सामने जमील खड़ा था। उसे उम्मीद भी इसी कि थी. शराब के नशे में उसकी आँखें लाल और सुर्ख़ हो चुकी थीं, और उसके चेहरे पर एक वहशी और आदमखोर सी मुस्कान थी।

 उसके पजामे के सामने एक बहुत बड़ा, सख़्त और भयानक उभार साफ नज़र आ रहा था, जिसे वो बेताबी से अपने मैले हाथों से सहला रहा था। उसकी आँखें सीधे कामिनी की तरफ़ थीं, 

रात के सन्नाटे में, उस विशालकाय और तने हुए उभार को देखकर कामिनी का गला सूख गया। उसकी जाँघे पहले ही हवस और कामरस से पूरी तरह गीली थीं। उसके अंदर की सारी झिझक, सारा डर और संकोच एक ही पल में हवा हो गया।

कामिनी के हाथ बेसाख्ता आगे की तरफ़ बढ़ गए। वो अब इस मौके को अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहती थी। जमील भी शायद अच्छी तरह जानता था कि इस वक्त इस भूखी औरत को क्या चाहिए।
उसने बिना एक पल गँवाए, झटके से अपने पाजामे का नाड़ा खींच दिया

सरररर...
पाजामा उतरकर पैरों में सिमट गया। जमील कमर के नीचे पूरी तरह से नंगा था, और उसका विशाल, नसो से उभरा हुआ लंड हवा में झटके खा रहा था। उसी पल, एक बहुत ही तीव्र, कच्ची और कसीली मर्दाना गंध कामिनी की नाक से टकराई।

स्निफ... स्निफ...
उस महक को महसूस करते ही कामिनी का दिमाग मानो पूरी तरह से जाम हो गया। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं, उसके काँपते हुए हाथ सीधे आगे बढ़कर जमील के सुलगते हुए लंड पर जा टिके। उसने बिना एक सेकंड की भी देरी किए उसे अपनी मज़बूत गिरफ्त में जकड़ लिया।
"आअह्ह्ह.... मोहतरमा..."
जमील के मुँह से एक गहरी और काँपती हुई सिसकी निकल गई, और बालकनी का छोटा सा कोना पूरी तरह से हवस की आग में सुलग उठा।

बालकनी के सन्नाटे और बर्फीली हवा के बीच, समय जैसे कहीं ठहर सा गया। कामिनी की उँगलियाँ जिस खुरदरे, सख़्त और फड़कते हुए लंड पर कसी थीं, वह कोई साधारण स्पर्श नहीं था, वह उसकी बीस साल की घुटन, उसके टूटे हुए संस्कारों और उसकी नसों में दौड़ती हवस थी जिसे हकीम लक्कद्दीन कि दवा ने दोगुना कर दिया था,

जमील सन्न खड़ा था। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं, आवाज़ जैसे हलक में अटक गई उसकी वहशी हँसी भी जैसे कहीं गायब हो गई। वह खुद को इस मामले मे उस्ताद समझ रहा था, जाने कितनी औरतों के नखरे देखे थे, उन्हें चोदा था, आज वह कामिनी के इस बेख़ौफ़, पागलपन भरे और अप्रत्याशित रूप को देखकर भीतर तक हिल गया था। उसके भीतर एक पल के लिए डर और अजीब सी हैरत का मिला-जुला अहसास दौड़ा ‘ये... ये कोई आम औरत नहीं है, ये तो आंधी है...!’ जमील की पकड़ खुद अपनी ही साँसों पर ढीली पड़ने लगी।

लेकिन कामिनी... कामिनी तो इस दुनिया से बहुत दूर जा चुकी थी। उसके लिए अब न पीछे कमरे में सोते हुए रमेश का वजूद बचा था, न दुनिया का कोई डर।
उसकी नाज़ुक, कोमल उँगलियों ने भारी, तने हुए मर्दाने लंड को अपनी मुट्ठी में और कस लिया। हवा में एक तीव्र, कच्ची, कसीली और मादक मर्दाना महक तैर गई, एक ऐसी गंध, जो किसी संस्कारी घर की औरत को कोसों दूर भगा देती, पर आज कामिनी के लिए वह किसी दुर्लभ और मादक इत्र से कम नहीं थी।

कामिनी ने अपनी आँखें आधी मूँद लीं। अपने चेहरे को थोड़ा और आगे झुकाया। उसकी लालसा और हवस इतनी हावी हो चुकी थी कि उसने बिना एक पल का भी लिहाज़ किए, अपनी नाक लंड के गुलाबी खुरदरे हिस्से के करीब ले जाकर  कच्ची, महकती गंध को गहरी साँस के साथ अपने भीतर उतार लिया।
स्निफ... शनिफ़्फ़्फ़....

वह महक, वह कसीलापन... कामिनी के मस्तिष्क की आखिरी नैतिकता की दीवार को भी चकनाचूर कर गया। उसके होंठ फड़क उठे। अगले ही पल, उसने अपनी गर्म और गीली ज़बान का पहला स्पर्श लंड पर उतारा।

"आअह्ह्ह... मोहतरमा..." जमील के मुँह से एक दबी हुई, काँपती और रूह को कंपा देने वाली चीख सी निकली। उसके घुटने तक काँप गए।
कामिनी अब पूरी तरह होश खो चुकी थी। उसकी ज़बान किसी प्यासे रेगिस्तान की नदी की तरह जमील के खुरदरे, नसो से भरे गंदे लंड पर तैरने लगी।
 वह चाट रही थी, बिना किसी झिझक के, बिना किसी शर्म के, एक ऐसी भूखी और तृषित औरत की तरह जो बरसों से पानी को तरसी हो।

जमील का लंड वाहियात था, गन्दा बदबूदार, मेल जमा हुआ, लेकिन कामिनी जैसे कसम खा चुकी थी इस गंदगी को चाट चाट कर साफ कर देगी.
 कामिनी ने अपने मुँह को पूरी तरह से आगे बढ़ाया। उसने विशालकाय लंड को अपने महकते, लाल होंठों के घेरे में ले लिया।
 जैसे ही वह गर्माहट और कसीलापन उसके हलक के पास पहुँचा, कामिनी की आँखें पूरी तरह पलट गईं। उसके दोनों हाथ पीछे रैलिंग को कसकर थामे हुए थे, और उसका सिर हल्के-हल्के ऊपर-नीचे होने लगा।

सुड़प... चप... उफ़्फ़्फ़...
पच पच... कामिनी जमील के गंदे लंड को चूस रही थी, उसके खूबसूरत लाल होंठ, गंदे मैले लंड के चारो और कसे हुए थे.
जमील कि एडिया हवा मे उठ गई, उसे ऐसे प्रहार कि उम्मीद नहीं थी.

बालकनी के छोटे से अंधेरे में गूँजती हुई कामिनी के चूसने की अश्लील और मादक आवाज़, पीछे कमरे में खर्राटे ले रहे रमेश की नींद से महज़ एक परदे की दूरी पर थी। पर कामिनी को अब किसी चीज़ की परवाह नहीं थी। वह चूस रही थी पागलों की तरह, लंड से निकलने वाले थूक से साने मेल कि हर एक बूँद को अपनी रूह में उतार लेना चाहती थी।

जमील की उँगलियाँ काँपते हुए कामिनी के बिखरे हुए बालों में उलझ गईं। वो जो कुछ पल पहले तक उसे एक 'माल' समझ रहा था, अब वह उस औरत के आगे लाचार खड़ा था। उसे समझ आ गया था कि ये औरत हवस के जिस समंदर में कूदी है, वहाँ से या तो वो खुद जलकर राख होगी, या सामने वाले की धज्जियाँ उड़ा देगी।
"उफ़्फ़... अ... अल्लाह... ये क्या बला है..." जमील की आँखें बंद हो गईं, और उसके पैर लड़खड़ाने लगे।

कामिनी अब किसी संस्कारी घर की औरत नहीं रह गई थी; वो हवस के उस अंधकूप में गिर चुकी थी जहाँ से उसे बाहर आने की कोई चाह नहीं थी। उसके लाल, रसीले होंठ खुरदरे , मैले और कसीले मर्दाने लंड पर पूरी तरह से कस चुके थे।

सुड़प... चप... पच...
उसकी गर्म और गीली ज़बान जमील के लंड पर इस कद्र चल रही थी जैसे कोई रेगिस्तान का मुसाफिर आख़िरी बार पानी पी रहा हो। उसके होंठ जमील के लंड पर पूरी तरह से घेरे हुए आगे पीछे हो रहे थे, गुलप... पच... पच.... गु.. गु....
लज्जा और हया का तो नामोनिशान नहीं था। कामिनी के मुँह से लार (थूक) की एक मोटी धार रिसकर उसकी ठुड्डी से होती हुई नीचे ज़मीन पर टपक रही थी। वो गंदे, मैले लंड के हर एक हिस्से यहाँ तक कि लंड के नीचे बालो से भरे भारी टट्टो को भी अपनी ज़बान से इस तरह साफ़ कर रही थी, जैसे वो कोई बहुत पवित्र चीज़ हो।

कामिनी की इस खौफ़नाक और अंधी भूख को देखकर जमील का नशा भी सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने अपने दोनों खुरदरे, सख़्त हाथों से कामिनी के पसीने से भीगे बालों को मुट्ठी में जकड़ लिया और उसके सिर को एक लय में अपने लंड की तरफ़ धकेलने लगा।

"आअह्ह्ह... क्या बात है मोहतरमा... चूसो... पूरा पी जाओ..." जमील की भारी, कँपकँपाती आवाज़ बालकनी में गूँजी।
इस धक्का-मुक्की और पागलपन में कामिनी के सीने से साड़ी का लाल पल्लू कब सरक कर उसकी कोहनियों तक आ गिरा, उसे ख़बर ही नहीं हुई। ठंडी बर्फीली हवा के थपेड़ों ने जैसे ही उसके लाल ब्लाउज़ में क़ैद, लगभग आधे नंगे भारी स्तनों को छुआ, उसके निप्पल सख़्ती से तन गए। पर कामिनी की आँखें बंद थीं, वो बस कसेले गंदे मर्दाने स्वाद में डूबी हुई थी।

तभी... बालकनी मे किसी के कदमो कि आहाट हुई।

"क्या बे... तूने तो अकेले ही महफ़िल शुरू कर दी!"
शंकर की भारी, दबी हुई आवाज़ सन्नाटे में गूँजी। वो अंदर रमेश को पूरी तरह बेसुध छोड़कर बाहर बालकनी में आ गया था।
लेकिन ताज्जुब की बात यह थी कि एक नए मर्द की आवाज़ सुनकर भी कामिनी ने अपनी आँखें खोलकर देखने की ज़हमत नहीं उठाई। उसका सिर उसी तरह जमील के पैरों के बीच आगे पीछे हो रहा था। उसका जिस्म इतनी ढिठाई और बग़ावत पर उतर आया था कि अब चाहे कोई भी आ जाए, उसकी इस मादक तपस्या को भंग नहीं कर सकता था।

उसे इतनी भी परवाह नहीं थी कि शंकर कि जगह उसका पति रमेश हो सकता था, या फिर वो इस कद्र हवस मे डूबी उस लंड कि पूजा कर रही थी कि रमेश आ भी जाता तो वो इस लंड को अपने मुँह से बहार नहीं निकालती.

कामिनी की इस बेशर्मी ने जमील के अंदर के वहशी जानवर को और हवा दे दी।
"मैंने कहाँ शुरू की बे... ये मोहतरमा तो खुद ही शुरू हो गईं!" जमील ने एक नीच, शैतानी हँसी हँसते हुए शंकर की तरफ़ देखा और फिर कहा, "आ जा तू भी... मोहतरमा को बहुत प्यास लगी है।"

ये कहते ही जमील के अंदर गुरूर और जोश का एक ऐसा भभका उठा कि उसने कामिनी के बालों को पकड़े-पकड़े ही एक बेहद ख़ौफ़नाक और ज़ोरदार धक्का आगे की तरफ़ मार दिया!
पच्चच...!
बिना किसी चेतावनी के, विशालकाय, खुरदरा लंड कामिनी के हलक (गले) को चीरता हुआ बिल्कुल गहराई तक धँस गया।

गुग... गुउउवू...!!
कामिनी की आँखें खौफ़ और दम घुटने से पूरी तरह फट गईं। उसकी साँसें एक झटके में अटक गईं। गले के बिल्कुल आख़िरी छोर पर सख़्त माँस के टकराने से उसे लगा जैसे उसकी जान निकल जाएगी। हवा की नली बंद हो गई, आँखों से पानी छलक आया।

कामिनी ने तड़पते हुए अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाए और जमील की सख़्त, खुरदरी जाँघों को अपने नाख़ूनों से पूरी ताक़त से नोच लिया। वो आज़ाद होने के लिए छटपटा रही थी, लेकिन जमील ने बालों को कसकर पकड़ा हुआ था।

"गुग... ऊऊऊँ..." कामिनी के गले से एक घुटी हुई, दर्दनाक आवाज़ निकली। उसके नाख़ून जमील की जाँघों के माँस में गहरे गड़ गए।
इस चुभन से जमील का नशा अचानक टूटा। उसे अहसास हुआ कि उसने जोश में आकर क्या कर दिया है।
झटअक!
उसने एक ही झटके में ख़ुद को पीछे खींच लिया।
प्लूप्प...
लंड एक झटके मे कामिनी के गले से आज़ाद हुआ। दोनों के बीच लार और थूक की एक चमकती हुई, मोटी चाँदी जैसी तार खिंच गई, जो आख़िरकार टूट कर कामिनी के लाल ब्लाउज़ पर जा गिरी। जमील का मोटा काला लंड कामिनी के मुँह के रस से पूरी तरह तरबतर होकर चमक रहा था।

"खों ... खों... खों... आह्ह्ह..."
कामिनी घुटनों के बल बैठी बुरी तरह खाँसने लगी। उसका पूरा चेहरा लाल पड़ गया था। खाँसते हुए वो हाँफ रही थी, उसकी छाती ज़ोर-ज़ोर से धौंकनी की तरह चल रही थी।
जैसे ही उसे थोड़ी साँस मिली, उसने अपनी बड़ी-बड़ी लाल आँखों से जमील को घूरा।

"पागल हो गए हो क्या? जान निकालोगे क्या मेरी?" कामिनी ने फुसफुसाते हुए, लेकिन एक तीखी मालकिन वाले अंदाज़ में उसे हड़काया। ये ग़ुस्सा बता रहा था कि वो भले ही हवस में अंधी थी, पर इन मर्दों के आगे बेबस नहीं थी।

"म-माफ़ करना मोहतरमा... वो मैं जोश में थोड़ा..." जमील ने हड़बड़ाते हुए अपनी जाँघ सहलाई जहाँ कामिनी के नाख़ूनों के निशान उभर आए थे।
तभी पीछे से शंकर आगे बढ़ा।

"हट बे... ये तो साला जानवर है। इसे पता ही नहीं है कि ऐसी नाज़ुक और खूबसूरत औरत से कैसे पेश आते हैं," शंकर ने जमील को कंधे से धक्का देकर साइड में कर दिया।
"साला तुझे ये रंडी लगती है क्या? जो ऐसे पेश आ रहा है?" 
शंकर जानबूझ कर रंडी शब्द बोल के कामिनी को उकसा रहा था.
कामिनी को महसूस हुआ वो रंडी ही तो बन गई है.

शंकर कामिनी के ठीक सामने आ खड़ा हुआ,  कामिनी अभी भी घुटनों के बल बैठी, ऊपर की ओर देख रही थी। शंकर ने बिना कोई वक़्त ज़ाया किए एक झटके में अपनी पैंट और अंडरवियर नीचे सरका दिया। कपड़ा ज़मीन को चूमने लगा।

और जैसे ही शंकर का लंड आज़ाद होकर बाहर आया... कामिनी की साँसें फिर से अटक गईं।
अब कामिनी की नज़रों के ठीक सामने दो अलग-अलग मर्दाने लंड पुरे गुरुर मे हवा में झूल रहे थे।

बीस साल! एक वो वक़्त था जब बीस साल तक यह औरत अपने पति के बिस्तर पर एक बूँद प्यार और एक मर्द की गर्माहट के लिए तरसती रही थी। उसका पूरा यौवन सूखे रेगिस्तान की तरह बंजर हो रहा था।
और आज... आज इस सुनसान बालकनी में, हवस का पूरा समंदर उसके सामने दो अलग-अलग रूपों में हिचखोले खा रहा था।

कामिनी की पारखी नज़रों ने तुरंत दोनों में फ़र्क़ भाँप लिया।
एक तरफ़ जमील का खौफ़नाक लंड था, रंग में बिल्कुल काला, लंबाई में डरावना, जिसकी ऊपरी त्वचा पीछे की तरफ़ हटी हुई थी और नसें किसी अजगर की तरह उभरी हुई थीं।

वहीं दूसरी तरफ़, ठीक कामिनी के होंठों के सामने शंकर का लंड बिन पानी कि मछली कि तरह कांप रहा था, रंग में गोरा, बेहद मांसल और मोटाई में इतना भारी कि कामिनी की दोनों मुट्ठियाँ भी कम पड़ जाएँ। उसकी ऊपरी त्वचा अभी भी एक घुँघट की तरह उसके मुख्य हिस्से (सुपाड़े ) को ढके हुए थी।

कामिनी की आँखों में एक अजीब सी चमक, एक नशीला पागलपन छा गया। कहाँ वो एक के लिए तरसती थी, और कहाँ आज उसे चुनने का मौक़ा मिल रहा था।

"लो मैडम... इसे आज़माओ। ये जमील कि तरह जानवर नहीं है, जितना प्यार दोगी उतना प्यार करेगा आपको, शंकर ने अपने लंड को पकड़ उसकी चमड़ी को पीछे सरका दिया, चमड़ी हटते ही गुलाबी सुपाडा आज़ाद हो गया, एक भीनी भीनी गंदी सी स्मेल कामिनी कि नाम मे सामने लगी...
ये वो स्मेल थी जिसे सुंधा नहीं जा सकता लेकिन बिना सूंघ रहा भी नहीं जा सकता, 

शनिफ्फ्फ्फफ्फ्फ़... शनिफ्फ्फ्फफ्फ्फ़... आअह्ह्ह.....
कामिनी के हलक से हवस कि रखा आह फुट पड़ी.

कामिनी ने देखा सुपाड़े और चमड़ी के बीच सफ़ेद सफ़ेद सा कुछ जमा हुआ था, यही वो अजीब सी चीज थी जहाँ से स्मेल उठ रही थी.
अब ये खुसबू है या बदबू ये एक औरत ही जाने.


शंकर ने कामिनी को हैरान, किसी सोच मे डूबा देख अपनी कमर को हल्का सा आगे की ओर धकेल दिया,  जिससे उसका गोरा, भारी-भरकम और तना हुआ लंड कामिनी के काँपते, रसीले होंठों के बिल्कुल करीब आकर परोस दिया गया।

कामिनी के होंठों से फिर से लार टपकने लगी थी। उसकी आँखें पूरी तरह से लालसा में डूब चुकी थीं। उसने एक गहरी साँस ली, जिससे शंकर के पसीने की गंध उसके फेफड़ों में भर गई, और उसके दोनों हाथ अपने आप उस नए, मांसल पहाड़ को थामने के लिए आगे बढ़ गए...

आखिरकार कामिनी के काँपते हाथों ने शंकर के मोटे, गोरे लंड को अपनी मुट्ठी में जकड़ ही लिया।  
उसकी उँगलियाँ भारी माँस के चारों ओर पूरी तरह नहीं समा पा रही थीं। लंड इतना मोटा था कि कामिनी को लगा जैसे वो कोई गर्म, धड़कता हुआ लोहा थाम रही हो।
इसके हाथ शंकर के लंड पर पीछे कि तरफ सरक गए, मोटा आलू जैसा सुपाडा बहार को आगया.

शनिफ्फ्फ…  

कामिनी खुद को रोक ना सकी, उसका चेहरा और करीब चला गया। शंकर के सुपाड़े से उठती हुई हल्की, कसीली, थोड़ी सी बासी महक सीधे उसकी नाक में घुस गई। नीली दवा के असर से कामिनी की इंद्रियाँ इतनी तेज़ हो चुकी थीं कि वो महक उसे किसी नशीले इत्र जैसी लगी। 

उसने जीभ निकाली।और एक लंबी, धीमी लकीर लंड के निचले हिस्से से ऊपर कि तरफ खिंच दी, शंकर का लंड थूक और गर्म लार से नहा गया,

“आअह्ह्ह…” शंकर की साँस अटक गई।  

कामिनी ने आँखें बंद कर लीं।  
जमील का लंड काला था, खुरदरा था, नसें उभरी हुई थीं… जैसे कोई जंगली साँप।  
और ये… ये शंकर का… गोरा, मोटा, नरम चमड़ी वाला… जैसे कोई भरा-पूरा फल।  

दोनों का स्वाद अलग था।  
जमील का स्वाद कड़वा, कच्चा, मर्दाना।  
शंकर का थोड़ा नमकीन, थोड़ा मीठा, और बहुत भारी।  

कामिनी ने मुँह खोला और शंकर के सुपाड़े को अपने होंठों के घेरे में ले लिया।  
धीरे-धीरे… बहुत धीरे। कामिनी कि जीभ शंकर के लंड के टोपे पर गोल घूमने लगी...एक पूरा चक्कर, फिर उल्टी दिशा में। 
आअह्ह्ह.... मैडम... शंकर के भी तोते उड़ गए, उसकी सिस्कारी निकल गई, कामिनी अपनी इस काबिलियत पर सिर्फ मुस्कुरा दी.
कितना कुछ सीख गई थु कमीनी.

कामिनी यही तक नहीं रुकी उसने हल्के से दाँतों दबा दिया...
आअह्ह्ह..... मैडम... उफ्फ्फ्फ़... शंकर ने उत्तेजना मे गांड भींच ली, उसकी कमर काँप गई। 
तभी कामिनी ने गाल अंदर खींचे और जोर से लंड को अंदर खींचना चाहा...।
“पच्च…”
लार की मोटी आवाज़ निकली। सुडप..... कामिनी ने खुद लंड पर आगे नहीं बढ़ रही थु बल्कि लंड को अपने मुँह मे खिंच रही थी, शंकर का मोटा लंड उसके मुँह को फैलाता चला गया। गले के पास पहुँचते ही उसने रुककर जीभ नीचे से ऊपर की तरफ तेजी से फेरनी शुरू की।
कामिनी पूरी सिद्दत से चूस रही थी, उसका पूरा मुँह फ़ैल गया था,  हर फेर के साथ लार और ज्यादा निकल के बहार गिर जाती,.
कामिनी ने सर पीछे खिंचा वेक्क....फिर झटके से आगे चला देती पूरा लंड एक बार मे मुँह मे समा जाता, जैसा बता रही हो कितनी हवस भरी है उसके अंदर.

सुपाड़ा होंठों से बाहर निकलता, चमकता, फिर वापस अंदर चला जाता। गति बढ़ती गई।
“वेक… वेक… पच्च… पच्च…”
आवाज़ें साफ और गीली थीं। कामिनी ने एक हाथ आगे बढ़ा कर शंकर के टट्टों को सहला दिया.
कामिनी लंड को चूस रही थी साथ ही टट्टो को हल्के से दबाती , ऊपर खींचती , फिर छोड़ देती ।
आअह्ह्ह..... अबे ये तो रंडी को भी फ़ैल कर दे यार, " शंकर ने पीछे खड़े जमील को देख कहाँ.
जमील चुपचाप कामिनी का रंडीपना देख रहा था, 
जमील कि गंदी तारीफ, खुद को रंडी से भी बड़ा बतलाये जाने के सम्मान ने कामिनी को गदगद कर दिया.

कामिनी कि आंखे खुली, उसने देखा जमील का लंड तड़प रहा है, जैसे किसी मछली को पानी से बहार निकाल दिया गया हो,
ये क्या हो गया था कामिनी को, एक लंड मुँह मे था फिर भी दूसरे लंड को छोड़ना नहीं चाहती थी.

जमील पीछे खड़ा देख रहा था। उसकी साँसें तेज़ हो रही थीं। उसकी नजर कामिनी से मिली, ना जाने क्या सहमति हुई, जमील एक कदम आगे आ गया, उसका खुरदरा लंड फिर से कामिनी के गाल से टकराने लगा।  

“मोहतरमा… देखो ना कैसे तड़प रहा है बेचारा, जमील ने अपने तम्बाकू से साने दाँत चियारते हुए कहा.

कामिनी के सामने दो मर्दाने लंड मौजूद थे, एक मुँह में, एक गाल पर रगड़ खाता हुआ।    

थोड़ी देर बाद उसने शंकर का लंड मुँह से निकाला। लार की लंबी लकीर उसके निचले होंठ से शंकर के सुपाड़े तक लटक रही थी। बिना पोंछे वह सीधे जमील के लंबे लंड पर मुँह ले गई।
कामिनी खुद नहीं जानती थी कि वो ऐसा भी कर सकती है, ये काला कब विकसित हो गई उसके अंदर उसे खुद नहीं पता.

उसने दूसरे हाथ से जमील के लंड को कब्ज़ा लिया, और अपनी गीली जीभ से चाट लिया, एक लंबी, गीली लकीर नीचे से ऊपर तक खींचती चली गई, सुड़प.. सुड़प.....
पच.... कामिनी ऐसे चाट रही थी जैसे चॉकलेट हो, 28679951
भरपूर चाट लेने के बाद कामिनी ने लंड के नीचे लटकते गंदे टट्टों पर मुँह दे मारा, ना जाने उसे क्या मजा आ रहा था टट्टे चाट के साफ करने मे?
एक-एक करके जमील कि दोनों बॉल्स को चाट लेती, चूसती, मुँह मे भर कर अंदर ही अंदर जीभ घूमती...
आआहहब..... मोहतरमा..... उउउफ्फ्फ्फ़....
जमील तो मरा जा रहा था.
उसकी उंगलियाँ कामिनी के बालों में कस गईं, वो कामिनी को अंदर कि तरफ धकेल रहा था, जैसे पूरा लंड टट्टो समेत ही कामिनी के मुँह मे उतार देगा...
पच... पच..... आआहह..... उउउफ्फ्फ्फ़....

इधर कामिनी का दूसरा हाथ शंकर के लंड से खेल रहा था, उसके लंड को हिला रहा था टट्टो को टटोल रहा था.
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बालकनी मे जलते पीले बल्ब कि मध्यम रौशनी और बर्फीली ठंड में कामिनी की वासना अपने उस विकराल रूप पर पहुँच चुकी थी जिसकी कल्पना करना भी असंभव था, 
जहाँ सही-गलत और सामाजिक मर्यादा के सारे पैमाने पूरी तरह ध्वस्त हो चुके थे।
कमरे के भीतर रमेश बेसुध पड़ा खर्राटे भर रहा था, और बाहर बालकनी की ठंडी फर्श पर कामिनी घुटनों के बल बैठी दो अनजान मर्दों की मर्दानगी के बीच पूरी तरह समाई हुई थी।

कामिनी का एक हाथ शंकर के भारी, गोरे और सुलगते हुए लंड पर अपनी पकड़ कसे हुए था। उसकी नाज़ुक उँगलियाँ मोटे माँस के लट्ठे को जड़ से लेकर सुपाड़े तक आहिस्ता-आहिस्ता मसल रही थीं। शंकर की कमर हर छुअन के साथ हलकी सी झटके खाती, आआहहहह...... इसस्स..... मैडम.....उसके मुँह से एक गर्म सिसकारी निकलकर हवा में घुल जाती।

दूसरी तरफ, कामिनी का मुँह जमील के लंबे, काले और खुरदरे लंड पर पूरी तरह कसा हुआ था। जमील के लंड से उठती तीखी, बासी और कसीली गंध अब कामिनी के फेफड़ों में उतरकर उसके दिमाग पर किसी नशे की तरह हावी हो चुकी थी।
"पच्च... सुड़प... पच्च..."
कामिनी अपनी जीभ को जमील के सुपाड़े के चारों ओर गोल-गोल घुमाते हुए उसे गहराई से चूस रही थी। उसकी लार की एक मोटी धार उसकी ठुड्डी से टपककर ब्लाउज़ के खुले गले पर गिर रही थी, लेकिन उसे इसका कोई होश नहीं था। वह बारी-बारी से अपने गाल को जमील के लंड से रगड़ती और बीच-बीच में जीभ का तीखा प्रहार उसके निचले हिस्से पर करती।
जमील ने उत्तेजना के चरम पर आकर अपने दोनों खुरदरे हाथों से कामिनी के खुले, बिखरे बालों को मुट्ठी में जकड़ लिया।
"उफ़्फ़... मोहतरमा... चूसो... पूरा निगल जाओ इसे..." जमील की भारी, काँपती हुई आवाज़ सन्नाटे को चीर रही थी।
कामिनी ने अपनी आँखें आधी मूँद रखी थीं। उसकी एक नज़र शंकर के काँपते हुए गोरे लंड पर टिकती, तो दूसरी नज़र जमील की नसों से भरे काले लंड पर। बीस साल का सूखा, घुटनों के बल बैठी इस औरत के मुँह और हाथों मे समाये लंड पल-पल मिटा रहे थे.

जब जमील के लंड को चूसते-चूसते उसका मुँह पूरी तरह भर जाता, तो वह झटके से उसे बाहर निकालती एक गाढ़ी थूक की तार दोनों के बीच खिंच जाती और बिना एक पल गँवाए वह शंकर के मोटे सुपाड़े पर अपनी गर्म जीभ फेरने लगती।
शंकर की आँखें नशे और हवस से बंद होने लगी थीं। "आअह्ह्ह... मैडम... क्या जादू है तुम्हारी जीभ में... साला पूरा बदन पिघल रहा है... आज तक किसी रंडी ने भी ऐसा नहीं चूसा होगा, क्यों जमील."

हाँ भाई मोहतरमा के सामने महंगी से महँगी रंडी भी फ़ैल है आअह्ह्ह..... " जमील ने तारीफ मे अपना योगदान दिया.
नीचे दोनों लंडो के सामने झुकी कामिनी का दिल झूम रहा था, चुत फड़क रही थी, रंडी से भी बड़ा ओहदा जो मिला था उसे.

कामिनी का सीना तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहा था। लाल साड़ी का पल्लू कंधे से पूरी तरह ढरककर फर्श पर गिर चुका था, और बर्फीली हवा उसके पसीने से भीगे, कसे हुए ब्लाउज़ से टकराकर उसकी उत्तेजना को कई गुना बढ़ा रही थी। वह दोनों मर्दों के स्वादों के इस अंतर का पूरा मज़ा ले रही थी

एक तरफ जमील का कड़वा, तीखा और जंगलीपन, तो दूसरी तरफ शंकर का भारी, नमकीन और गदराया हुआ लंड।
कामिनी बिना किसी संकोच के, एक हाथ से शंकर के टट्टों को सहलाती और अपने मुँह को जमील के लंड पर और गहराई तक ढकेल देती। बालकनी का वह छोटा सा कोना सिर्फ गीली चूसने की आवाज़ों, सुलगती साँसों और हवस की बेकाबू महक से भर चुका था।

कामिनी बेतहाशा इस कद्र चूस चाट रही थी थोड़ी ही देर मे दोनों मर्दों को अहसास हुआ कि अगर यही रफ्तार रही तो वे खुद पर से नियंत्रण खो बैठेंगे, यही झड़ जायेंगे। उन्होंने जैसे-तैसे कामिनी को रोका।
मैडम.... रुको.. आअह्ह्ह.... उउउफ्फ्फ्फ़..... शंकर ने कामिनी का हाथ अपने लंड से छुड़ाया, वही जमील ने कामिनी के मुँह को झटके से पीछे धकेल दिया.
"रुकिए मोहतरमा...आआहहहह...... इतनी भी क्या जल्दी है "

"हाँफ... हाँफ... हंफ..." कामिनी के मुँह और हाथ एक ही झटके मे खाली हो गए, वो हांफ रही थी,
कामिनी जैसे अचानक किसी गहरे सम्मोहन से बाहर आई। उसकी साँसें धौंकनी की तरह चल रही थीं, बाल बिखरे हुए पसीने से माथे पर चिपके थे और उसकी साड़ी,  ब्लाउज पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो चुके थे। वह अपनी सुलगती साँसों पर काबू पाने की कोशिश कर रही थी।

"मोहतरमा, थोड़ा सब्र रखिए... हमें भी तो आपकी खिदमत का मौका दीजिए," जमील ने भारी आवाज़ बोलते हुए  कामिनी को कंधों से थामकर उठाया और बालकनी की ठंडी लोहे की रेलिंग की तरफ झुका दिया।

कामिनी के भीतर जैसे किसी तरह का कोई प्रतिरोध नहीं बचा था। वह बिना किसी झिझक के आगे झुक गई। जैसे वो जानती थी कि क्या होने वाला है, इसी पल कि प्रतीक्षा मे तो वो लंड कि पूजा कर के खुश करने मे लगी थी, ताकि इस लंड का प्रसाद मिल सके
.
कामिनी पूरी तरह से रेलिंग पकड़ कर झुक गई, झुकने से उसकी गांड पूरी तरह को बहार निकल आई, स्तन ब्लाउज से लगभग बहार को झाँकने लगे, मजबूत ब्लाउज था वरना तो अभी तक उसके भरी स्तन बटन तोड़ के बहार आ गए होते.

जमील ने बिना एक पल गंवाए कामिनी कि सारी को एक झटके मे कमर तक पूरा उठा दिया,

"अअअअअअह्ह्हहह्म्म..." कामिनी के होंठों से एक लंबी सीटी जैसी सिसकी निकल गई। बालकनी की बर्फीली हवा जैसे ही उसके गर्म और पसीने से भीगी चुत और गांड के छेदो पर टकराई उसके रोम-रोम में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई। पूरे बदन में एक तीव्र झनझनाहट फैल गई।

दूसरी तरफ, शंकर और जमील उस नजारे को देखकर पूरी तरह सुध-बुध खो बैठे थे। तीव्र उत्तेजना और भय के मिले-जुले माहौल ने माहौल को बेहद भारी बना दिया था। वो दोनों कामिनी कि नंगी गांड देख कर जड़ हो गए थे, 
एक दम सफ़ेद चौड़ी सुडोल गोल आकर मे, ना कोई दाग ना कोई तिल, गांड कि दरारा चुत रस, पसीने से चमक रही थी, गिजबीजा रही थी.
कामिनी ने इतना पानी बहाया था कि जाँघे तक चिपचिपी और गीली थी.

"माशाअल्लाह... क्या बात है! क्या चमत्कार दिखा दिया खुदा ने आज उउउफ्फ्फ्फ़...." जमील के मुँह से एक प्रशंसा भरी फुसफुसाहत निकली 

चाट..... छत्तत्तत्तत्त.... चटाक.... से जमील ने अधिकार जताते हुए एक हल्का सा थप्पड़ गांड के दोनों पाट पर जड़ दिया, जैसा बता रहा हो अब इस पर मेरा अधिकार है,

"आअह्ह्ह..." कामिनी कि गांड आपस मे टकरा कार फिर से फ़ैल गई... उसने आँखें बंद कर ली। उसकी उत्तेजना अपने चरम पर थी और वह बस उस अंतिम पल का इंतज़ार कर रही थी जब यह इंतज़ार खत्म हो।

"अंदर... अब और मत तड़पाओ..." कामिनी के काँपते होंठों से बेहद धीमी, लेकिन बेकाबू बुदबुदाहट निकली।

जमील ने और वक्त ज़ाया न करते हुए कामिनी की कसमसाती गांड को कमर के किनारे से मज़बूती से जकड़ लिया। बालकनी की लोहे की रेलिंग पर कामिनी का ऊपरी बदन टिका हुआ था, और नीचे पहाड़ी रात की बर्फीली हवा का स्पर्श उसकी सुलगती त्वचा को लगातार छू रहा था।

"सब्र का फल मीठा होता है, मोहतरमा..." जमील की भारी, हांफती हुई फुसफुसाहट कामिनी के कान के पास गूंजी।

अगले ही पल एक गरम गीली सी छुवन कामिनी कि गांड कि दरार मे तैरने लगी, 
आअह्ह्ह...... उउउफ्फ्फ... कामिनी सिसकी, साथ ही गांड को हिला कर लंड को सही दिशा दिखाने कि कोशिश भी कि...
कोशिश रंग लाई, कामिनी कि चुत के मुहने पर जमील का लंड दस्तक दे रहा था, 
बस अब 1पल और......
जमील ने कमर को आगे कि तरफ चला दिया.

"आआआआअह्ह्ह्ह्ह्ह... उफ़्फ़फ़फ़!"

कामिनी का गला रील की तरह खिंच गया। एक तीखी, भयानक और बेकाबू चीख उसके हलक तक आई, जिसे उसने बालकनी की रेलिंग को दोनों हाथों से भींचकर अपनी सांसों में ही दबा लिया।
चुत और लंड दोनी इतने गिले थे कि जमील का लंड एक ही बार मे पूरा का पूरा अंदर तक समा गया. कामिनी का पेट पूरा भर गया, चुत कि दीवारों ने जमील के लंड को चारो तरफ से घेर लिया, कामिनी ने जगह बनाने के लिए अपनी जांघो को और चोदा कर दिया....
आअह्ह्ह......
इससससस...... मर गईं.. उफ्फ्फ्फ़.... कामिनी कि आंखे उलट गई, लेकिन उसने हटने या जमील को पीछे धकेलने का कोई प्रयास नहीं किया, करती भी क्यों इसी के लिए तो तड़प रही थी.

जमील के कड़क भारी लंड के प्रहार ने उसके पूरे वजूद को हिलाकर रख दिया। बीस साल की सूखी पड़ी ज़मीन पर जैसे एक आंधी आकर टकराई थी।
जमील ने बिना किसी चेतावनी के कमर को पीछे खिंचा.... पच..... और फिर... धचम्म.. आअह्ह्ह.... वापस अपनी कमर को कामिनी कि गांड से जड़ तक चिका दिया...
कामिनी को ऐसा महसूस हुआ जैसे जमीलनका लंड सीधा उसके कलेजे ओर लगा हो.
आअह्ह्ह.... जमील.... कामिनी फुसफुसाई... उउफ्फ्फ....
उसकी पकड़ रेलिंग पर मजबूत हो गई.
जमील का लंड निकलना, फिर घुसेड़ देना जारी रहा, धीरे धीरे.... कोई 5,6 बार.... कामिनी हर बार दहल जाती, लेकिन जमील के प्रयासों से चुत मे काफ़ी जगह बन गऊ थी कामिनी कि चुत ने लंड को कसना कम कर दिया था.
आअह्ह्ह.... धप....
आअह्ह्ह... पच.... उफ्फ्फ्फ़... धप....
उउउफ्फ्फ.... धच.... आअह्ह्ह..... पच....
अजीब सा गिला संगीत नैनीताल कि वादियों मे गूंज रहा था.
थोड़ी ही देर ने जमील ने बिना रुके एक लय पकड़ ली। रेलिंग से कामिनी का जिस्म बार-बार टकराता, उसके स्तन रेलिंग मे दबते फिर अलग हो जाते, उसकी चूड़ियों की छनछनाहट बालकनी के सन्नाटे में घुलने लगी। शंकर पीछे खड़ा अपनी लाल आंखों से यह पूरा दृश्य देख रहा था, उसकी अपनी सांसें तेज़ थीं।
"ज़रा धीरे बे जमील... कहीं कमरे में शराबी जाग न जाए," शंकर ने दबी आवाज़ में हिदायत दी।
लेकिन कामिनी को अब किसी के जागने या पकड़े जाने की कोई परवाह नहीं थी। वह हर झटके के साथ अपनी कमर को और पीछे धकेल रही थी, जैसे उस दर्द और उत्तेजना के मिले-जुले अहसास में पूरी तरह डूब जाना चाहती हो।

जमील पीछे से लगातार चुत मे अपने लंड को धकेल रहा था। हर झटके के साथ कामिनी का जिस्म रेलिंग से टकराता , चूड़ियाँ छनछनातीं, और उसकी भारी गाँड लहरें खाती हुई आगे-पीछे होती। लंड गीली चुत में पूरी जड़ तक समा कर कुछ पल बहाल सांस के कर वापस कामिनी कि गीली चुत ने गोता लगा देता, फिर निकलता पच्च… धप… पच्च… धप…

कामिनी की आँखें आधी बंद थीं। होंठ खोले लम्बी लम्बी सांसे भर रही थी, साँसें टूट रही थी। उत्तेजना इतनी तेज थी कि उसके अपने हाथ बेकाबू हो गए। उसने अपनी दोनों हथेलियों को अपने भारी स्तनों पर रख दिया, और उन्हें जोर-जोर से मसलने लगी। ब्लाउज के ऊपर से ही उंगलियाँ निप्पलों को पकड़कर मरोड़ने लगी...
आआहहहह.... आअह्ह्ह....
 अंदर... जोर से उफ्फ्फ... आह्हः... आउच.... आअह्ह्ह.... कस के....
थाड... थाड.... कर जमील कि कमर कामिनी कि गांड से टकराने लगी। स्तन उसके हाथों में दबकर फैल रहे थे, फिर वापस आकार ले रहे थे।

शंकर, जो अभी तक पीछे खड़ा नजारा देख रहा था, कामिनी कि हरकत देख आगे बढ़ा। उसकी आँखों में हवस और हल्की सी जलन दोनों थीं। पहला मौका जमील ने उठा लिया जलन होना लाजमी थी, लेकिन अब उसे भी अवसर दिख रहा था.

“मैडम… आप ये सब करोगी तो लानत है मेरे मर्द होने पर…?”
 शंकर कि भारी नशीली आवाज़ कामिनी के जहन मे उतरी । कामिनी ने आँखें खोलकर उसकी तरफ देखा, लेकिन जवाब देने से पहले ही शंकर ने दोनों हाथ आगे बढ़ा कर एक झटके में कामिनी के ब्लाउज के दोनों किनारों को पकड़ लिया और जोर से खींच दिया।

चरररर…  झटक..... आअह्ह्हम...

बटन टूटते चले गए । ब्लाउज के दोनों पल्ले आगे से खुल कर अलग हो गए....
आआआहहहह..... इसससस... कब से परेशान से कामिनी के स्तन खुली हवा मे सांस लेने के लिए, 

 कामिनी के भारी, सुडौल स्तन खुली बर्फीली हवा में पूरी तरह आजाद हो गए। थूक, लार और पसीने से भीगे, गोरे-गोरे, गदराए हुए स्तन जमील के हर झटके के साथ जोर-जोर से हिल रहे थे। निप्पल पूरी तरह तनकर काले-गुलाबी हो चुके थे, जैसे कोई पत्थर हो.

“आअह्ह्ह…!” कामिनी की सिसकी निकल गई, ठंडी हवा ने उसके संवेदनशील निप्पलों को छुआ तो पूरा जिस्म सिहर उठा।

शंकर बिना मौका गवाए घुटनों के बल बैठ गया। उसने दोनों हाथों से कामिनी के स्तनों को नीचे से थाम लिया और अपना मुँह उनके बीच की गहरी दरार में धँसा दिया। बिल्कुल वैसे जैसे कोई भूखा बछड़ा गाय के थनों पर टूट पड़ता है। उसकी खुरदरी जीभ कामिनी के स्तनों के बीच बनी घाटी मे चलने लगी, जहाँ पहले से ही कामिनी का थूक, लार और उन दोनों के लंड का मेल मौजूद था, शंकर पूरी सिद्दत से उस गंदगी, पसीने को चाटने लगा.... सुडप... सुडप.... आअह्ह्ह..... कामिनी इस दोहरी मार से मरी जा रही थी.
थोड़ी ही देर मे शंकर ने एक निप्पल को मुँह में ले लिया और जोर जोर से चूसने लगा। जैसे वाकई दूध पी रहा हो.

सुड़प… लप… लप… सुड़प..
कामिनी ने भी बेशर्मी दिखाते हुए अपने स्तनों को पकड़ उसके मुँह ओर धकेल दिया, कहीं निप्पल निकल ना जाये उसके मुँह से..
आअह्ह्हब..... चुसो.... काटो.... नोच लो.... आह्हः.... कामिनी बदहवस बड़बड़ा रही थी.

कामिनी के आदेश मे शंकर को बेकाबू कर दिया, उसका दूसरा हाथ कामिनी के दूसरे स्तन पर बुरी तरह कस गया, उसे बुरी तरह मसलने लगा, जैसे आटा गुंथ रहा ही, उसकी ऊंगलियाँ कामिनी के मुलायम माँस में धँस रही थीं, निप्पल को मरोड़ रही थीं, फिर छोड़ रही थीं। कभी दाँतों से हल्का काटता, कभी पूरे स्तन को मुँह में भरने की कोशिश करता।

“आअह्ह्ह… आअह्ह्ह… नोचो… चोदो मुझे…” कामिनी बड़बड़ाने लगी। उसकी आवाज टूटी हुई थी, होश लगभग नहीं था। एक हाथ से उसने शंकर का सिर और जोर से अपने सीने से चिपका लिया, दूसरे हाथ से रेलिंग को कसकर पकड़े हुए थी।

पीछे जमील की गति और तेज हो गई,  वह कामिनी की कमर दोनों हाथों से जकड़े हुए पूरी ताकत से धकेल रहा था। हर प्रहार के साथ उसके अंडकोष कामिनी की गीली गाँड से टकराते धप्प… धप्प… धप्प… चुत की दीवारें लंड को जकड़कर रखने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन गीलापन इतना था कि लंड आसानी से अंदर-बाहर हो रहा था। c5435fe12ecb076fc737

नीचे शंकर स्तनों को निचोड़-निचोड़ कर चूस रहा था। एक को छोड़ता तो दूसरे पर टूट पड़ता। कामिनी के स्तन उसके हाथों और मुँह में पूरी तरह कैद थे लाल हो रहे थे, दाँतों और उंगलियों के निशान छपने लगे थे पड़ रहे थे.

पीछे से जमील का भारी, खुरदरा लंड चुत को चीर रहा था। आगे से शंकर के मुँह और हाथ उसके स्तनों को नोच-मसल रहे थे। कामिनी इस दोहरे हमले को ज्यादा देर झेल नहीं पाई।

उसकी जाँघें काँपने लगीं। कमर अपने-आप और पीछे धकेलने लगी। आँखें पूरी तरह पलट गईं। मुँह से बेकाबू आवाजें निकलने लगीं—

“आअह्ह्ह… आअह्ह्ह… अंदर… अंदर और जोर से… मै गई… आअह्ह्ह… उउउड़…!”

पूरा जिस्म एक बार में तन गया। चुत ने जमील के लंड को इतनी जोर से जकड़ा कि जमील की साँस अटक गई। कामरस की बाढ़ उसके लंड पर से होती हुई जाँघों पर बहने लगी। कामिनी की सिसकियाँ चीख में बदल गईं। रेलिंग पर उसकी उंगलियाँ सफेद पड़ गईं। स्तन शंकर के मुँह में ही काँप रहे थे।

कामिनी का पूरा जिस्म एक तनी हुई कमान की तरह काँप रहा था। चरम सुख की लहरें उसके पेट के नीचे से उठकर रीढ़ की हड्डी में दौड़ रही थीं। चुत ने जमील के लंड को इतनी जंगली ताकत से जकड़ लिया था कि हर धड़कन के साथ चुत के अंदर की दीवारें सिकुड़-सिकुड़कर जमील के लंड को निचोड़ने कि कोशिश कर रही थी,

“आआआह्ह्ह… उउउड़… मै… मै गई… अंदर… पूरा… आअह्ह्ह…!”

उसकी आवाज अब चीख बन चुकी थी। आँखें पूरी तरह उलटी हुई थीं, मुँह खुला, लार की एक पतली लकीर ठुड्डी से टपक रही थी। जाँघें काँप-काँपकर फैल रही थीं और फिर जबरदस्त तरीके से भींच रही थीं। हर लहर के साथ उसकी भारी गाँड जमील की जाँघों से जोर से टकराती धप्प… धप्प… धप्प… और कामरस की गरमाहट उसकी जाँघों के अंदरूनी हिस्से से होते हुए घुटनों तक बहने लगती.

शंकर अभी भी उसके स्तनों पर मुँह लगाए हुए था। कामिनी के चरम ने उसके स्तनों को और सख्त, और संवेदनशील बना दिया। निप्पल कांप रहे थे, शंकर के दाँतों के बीच फड़क रहे थे। शंकर ने दोनों स्तनों को और जोर से निचोड़ा, जैसे उनमें से दूध निकालना चाहता हो। कामिनी की चीख और तेज हो गई।

पीछे जमील की हालत खराब हो चुकी थी। कामिनी की चुत इतनी गर्म, इतनी तंग और इतनी गीली हो गई थी कि वह अपने आप पर काबू नहीं रख पाया। हर सिकुड़न उसके लंड को जड़ से सिरे तक निचोड़ रही थी। उसकी साँसें उखड़ गईं। माथा कामिनी की पीठ पर टिक गया।

“उफ्फ्फ… मोहतरमा… साली… कितनी गरम… रांड... तू....आअह्ह्ह…मै रुक नहीं पा रहा…!”

उसने कमर और जोर से आगे धकेली। पूरा लंड आखिरी जड़ तक धँस गया। कामिनी की चुत ने उसे एक बार फिर बुरी तरह जकड़ा लिया और जमील टूट गया।

“आआआह्ह्ह… ले… ले पूरा… अंदर…!”

उसका लंड जोर-जोर से धड़कने लगा। गर्म, गाढ़ा वीर्य की धार एक के बाद एक कामिनी की चुत कि गहराई में छूटने लगी। पहली धार इतनी तेज थी कि कामिनी को लगा जैसे कोई गर्म पानी का फव्वारा उसके अंदर फूट पड़ा हो। दूसरी, तीसरी… जमील की कमर काँप-काँपकर धकेलती रही। हर धकेल के साथ और वीर्य अंदर समाता गया।

कामिनी की आँखें फिर से फटी। उसे अहसास हुआ—जमील उसके अंदर झड़ रहा है। पूरा। बिना निकाले। उसकी चुत पहले से भरी हुई थी, अब वह और भर गई। गर्म तरल उसकी दीवारों को गीला कर रहा था, बाहर की तरफ रिसने की कोशिश कर रहा था, लेकिन जमील का लंड अभी भी अंदर धँसा हुआ था और हर बूँद को रोक रहा था।

“आअह्ह्ह… गरम… अंदर… कितना… उफ्फ्फ…!” कामिनी की आवाज अब सिर्फ सिसकियों में रह गई थी। उसका जिस्म अभी भी लहरें ले रहा था। चरम पूरी तरह उतरने से पहले ही जमील का वीर्य उसकी गर्मी में मिल चुका था।

जमील कुछ पल और अंदर धँसा रहा। उसकी साँसें भारी थीं, माथा कामिनी की पसीने से भीगी पीठ पर टिका हुआ था। धीरे-धीरे उसके धक्के रुक गए। लंड अभी भी फड़क रहा था, आखिरी बूँदें छोड़ रहा था।

कामिनी की जाँघों के अंदर से अब गाढ़ा, सफेद मिश्रण रिस-रिसकर नीचे टपकने लगा, उसका कामरस और जमील का वीर्य मिलाजुला। रेलिंग पर उसकी उंगलियाँ ढीली पड़ गईं। जिस्म अचानक नरम हो गया, जैसे सारी ताकत निकल गई हो।
कामिनी अभी भी झुकी हुई थी। स्तन शंकर के हाथों में कैद थे, गाँड जमील की जाँघों से सटी हुई कांप रही थी,

हमफ... हमफ़्फ़्फ़.....जमील कुछ पल और अंदर धँसा रहा। उसकी साँसें भारीचल रही थीं, माथा कामिनी की पसीने से भीगी पीठ पर टिका हुआ। धीरे-धीरे उसके धक्के पूरी तरह रुक गए। लंड अभी भी हल्के-हल्के फड़क रहा था, आखिरी बूँदें छोड़ रहा था।

फिर उसने धीरे से कमर पीछे खींची।

पच्च्च… पुचक..... पच....

जैसे ही लंड चुत से बाहर निकला, कामिनी की खुली हुई, लाल,  सूजी हुई चुत से गाढ़ा, सफेद वीर्य की एक मोटी धार बाहर की तरफ बह निकली। वीर्य उसकी जाँघों के अंदरूनी हिस्से से होता हुआ नीचे टपकने लगा, गर्म, चिपचिपा और चमकदार। बर्फीली हवा ने उस गीली जगह को छुआ तो कामिनी की जाँघें काँप उठीं।

“आअह्ह्ह…इस्स्स...” कामिनी के मुँह से एक कमजोर सी सिसकी निकली। उसका जिस्म अभी भी गर्म था, किसी भट्टी कि तरह सुलग रहा था,

जमील पीछे हटा। उसका लंड अभी भी आधा तना हुआ था, कामिनी के रस और वीर्य से चमक रहा था। उसने साँस लेते हुए कामिनी की गाँड पर एक बार फिर हाथ फेरा इस बार धीरे, जैसे अपना हक जता रहा हो।

शंकर ने अपना मुँह स्तनों से हटा लिया, उसके होंठ और ठुड्डी लार से भीगे हुए थे। उसने कामिनी के चेहरे की तरफ देखा। उसकी आँखें अभी भी धुंधली थीं, होंठ खुले, साँसें उखड़ी हुई। लेकिन स्तनों में अभी भी सख्ती बाकी थी।

शंकर और इंतजार नहीं कर सका। आखिर कब तक रोकता खुद को.
ताजमहल किसी एक का थोड़ी है, सुंदर सहिज़ पर हर कोई अपना हक़ जमाना चाहता है, शंकर ने भी वही किया, उसे भी अपना हक़ चाहिए था.

उसने जल्दी से अपनी जगह बदली। घुटनों के बल बैठे-बैठे वह कामिनी के सामने से हटकर उसके पीछे आ गया। जमील थोड़ा साइड हो गया। शंकर ने दोनों हाथों से कामिनी की कमर पकड़ी और अपने मोटे, गोरे लंड को उसकी अभी भी खुली, वीर्य से भरी चुत के मुहाने पर टिका दिया।

गर्म सुपाड़ा जैसे ही कामिनी कि गीली, चिपचिपी दरार से छुआ, कामिनी की कमर अपने-आप पीछे की तरफ सरक गई।

“आअह्ह्ह… और…?” उसकी आवाज अब सिर्फ फुसफुसाहट रह गई थी। थकान थी, लेकिन हवस अभी पूरी तरह बुझी नहीं थी। अंदर की खाली जगह फिर से भरे जाने की माँग कर रही थी।

शंकर ने कमर आगे बढ़ाई।
***************-***

बालकनी की जमा देने वाली ठंड में हवस और पागलपन अपने चरम पर था। शंकर बस आगे बढ़ने ही वाला था... दोनों के जिस्म एक-दूसरे से टकराने ही वाले थे कि तभी

धड़ाम... तन्नन... छनाक्क्क!
कमरे के भीतर से एक बेहद तेज़ और भयानक आवाज़ गूँजी। ऐसा लगा जैसे पानी का कोई काँच का जग या शराब की खाली बोतल ज़मीन पर गिरकर चकनाचूर हो गई हो।
वह आवाज़ बालकनी के सन्नाटे में किसी बम के फटने जैसी थी। उस एक आवाज़ ने बालकनी में पसरे हुए हवस के पूरे उबलते समंदर को एक ही सेकंड में जमाकर बर्फ़ कर दिया। शंकर का जिस्म जहाँ था, वहीं पत्थर की तरह ठिठक गया। जमील की साँसें हलक में ही अटक गईं।
"कामिनी... ओ कामिनी... कहाँ गई...?"
कमरे के अंदर से रमेश की भारी, लड़खड़ाती और नशे में डूबी हुई आवाज़ गूँजी।
"पानी... पानी दे ज़रा..."
चप... चप... चप...
रमेश के भारी कदमों की आहट सीधे बालकनी की तरफ़ ही आ रही थी।
बाहर बालकनी में तीनों के चेहरों का रंग ऐसे उड़ गया जैसे किसी ने उनके शरीर का सारा खून सोख लिया हो। शंकर और जमील, जो कुछ पल पहले तक ख़ुद को किसी ख़ूँख़ार शिकारी की तरह महसूस कर रहे थे, अब मौत के खौफ़ से काँप रहे थे। अगर रमेश ने उन्हें इस हालत में यहाँ देख लिया तो, साला शराबी है, हमला ना कर दे? पुलिस ना बुला ले?
जमील और शंकर एक दूसरे को देख खौफजादा यही सोच रहे थे, शंकर का लंड मुरझा गया,

कामिनी का तो जैसे वजूद ही हिल गया। कुछ ही पलों पहले तक जो औरत वासना और बग़ावत के नशे में पूरी तरह अंधी हो चुकी थी, जिसे दुनिया, समाज और अपने पति के वजूद की कोई परवाह नहीं थी... वह अचानक यथार्थ (Reality) के कड़कड़ाते धरातल पर मुँह के बल आ गिरी।
नीली दवा का असर और जिस्म की सारी मादक गर्मी एक झटके में हवा हो गई, और उसकी जगह एक ठंडे, कंपा देने वाले खौफ़ ने ले ली। कामिनी का पूरा जिस्म पत्ते की तरह बुरी तरह काँपने लगा। उसके माथे पर और रीढ़ की हड्डी में डर के ठंडे पसीने की बूंदें छलक आईं।

सच ही तो है चोर कितनी भी सफ़ाई से चोरी करे, कितनी भी ढिठाई दिखाए, लेकिन आख़िरकार रंगे हाथों पकड़े जाने का खौफ़ उसे अंदर तक गला ही देता है। और कामिनी इस वक़्त एक ऐसी चोर थी जिसने सिर्फ़ जिस्म की नहीं, बल्कि अपने बीस साल के संस्कारों और रिश्तों की चोरी की थी।

"भागो... पीछे हटो..." जमील के काँपते होंठों से सिर्फ़ एक बेआवाज़ फुसफुसाहट निकली।
बालकनी में एक खौफ़नाक हड़बड़ाहट मच गई। शंकर ने काँपते हाथों से झटके में अपनी पैंट ऊपर खींची। उसके हाथ इतने बुरी तरह काँप रहे थे कि ज़िपर भी बंद नहीं हो रहा था। जमील हड़बड़ाकर बालकनी के एक अँधेरे कोने में रखी पुरानी कुर्सी के पीछे दुबकने लगा।

कामिनी अभी भी रेलिंग पर झुकी हुई थी,  ब्लाउज पूरा खुला हुआ था, बटन तो टूट ही गए थे, कैसे संभालती, उसके भारी स्तन डर से कांप रहे थे, निप्पल अभी भी कड़क थे। उसका दिमाग़ सुन्न पड़ चुका था। उसने काँपते और बेकाबू हाथों से अपनी साड़ी को नीचे खींचा। उसने झट से साड़ी का लाल पल्लू अपने खुले, पसीने से भीगे सीने पर लपेटा और ख़ुद को समेटकर खड़ी होने की नाकाम कोशिश करने लगी।

चप... चप...

कदमों की आवाज़ बिल्कुल बालकनी के दरवाज़े के पास आ चुकी थी। परदे के उस पार रमेश की परछाई साफ़ नज़र आ रही थी.
कामिनी की धड़कनें इतनी तेज़ हो चुकी थीं कि उसे लग रहा था जैसे उसका दिल पसलियाँ तोड़कर बाहर आ जाएगा। उसने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और अपनी साँसों को पूरी तरह रोक लिया।
और तभी... परदे के उस पार से रमेश का हाथ आगे बढ़ा और उसने बालकनी के दरवाज़े का हैंडल पकड़ लिया।
क्लिक...
दरवाज़े का लॉक खुलने की आवाज़ आई।
बस खेल खत्म होने ही वाला था....
रमेश शराबी था, शराब के नशे मे खूंखार था....
कामिनी ने हवस मे मुसीबत मौल ली थी आज.
क्या कामिनी पकड़ी जाएगी....?
कामिनी का सफर यही खत्म होगा?

Contd......




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1 Comments

  1. Mast chudai ho rahi thi akhir mai maza kharab hogaya uff bechari kamini ki aag har bar bhujne se reh jati hai

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