शाम के 5 बज चुके थे। नैनीताल की वादियों में धुंध और ठंडक ने अपना डेरा जमाना शुरू कर दिया था।
होटल कुर्मांचल से कुछ ही दूरी पर, एक सस्ते और सीलन भरे देसी ठेके (Bar) के अंदर सिगरेट का गाढ़ा धुआँ और सस्ती शराब की बदबू फैली हुई थी। उसी ठेके के एक गंदे से कोने में रमेश बैठा हुआ था।
"साला... कहाँ से लाऊँ मैं घरेलू औरत?"
हिच... हिच... हिच...
रमेश ने नशे में धुत्त होकर हिचकी लेते हुए शराब का एक और बड़ा घूँट अपने हलक में उतार लिया। उसकी आँखें लाल हो चुकी थीं और चेहरा हताशा से पीला पड़ गया था।
करोड़ों रुपये कमाने का सुनहरा मौका, जो कुछ घंटों पहले तक उसकी मुट्ठी में था, अब रेत की तरह फिसल चुका था। पेड्रो की खौफ़नाक शर्त 'एक देसी और घरेलू औरत' रमेश के दिमाग़ में हथौड़े की तरह बज रही थी। इतनी दूर नैनीताल आकर, इतनी बड़ी रिस्क लेकर भी उसके हाथ सिर्फ़ मायूसी लगी थी।
एक लालची और घूसखोर इंसान के लिए करोड़ों का नुकसान बर्दाश्त से बाहर था। उसका मूड भयंकर ख़राब था।
उसी ठेके के बाहर, हल्की धुंध और गिरती हुई शाम के साये में दो आकृतियाँ खड़ी थीं।
एक तरफ हरीश था, जो कुल्हड़ में चाय की चुस्की ले रहा था, और दूसरी तरफ था सुलेमान। सुलेमान इस वक़्त अपने 'देहाती मज़दूर' वाले रूप से बिल्कुल अलग लग रहा था। वो अँधेरे कोने में खड़ा, उँगलियों में फँसा एक बेहद महँगा और मोटा विदेशी सिगार पी रहा था।
सिगार का सुलगता हुआ लाल सिरा धुंध में किसी ख़ूँख़ार जानवर की आँख जैसा चमक रहा था।
"दे आया हरीश?" सुलेमान ने सिगार का गाढ़ा धुआँ हवा में छोड़ते हुए अपनी भारी आवाज़ में पूछा।
"हाँ बॉस... दे आया, हरीश ने चाय का कुल्हड़ होंठों से लगाते हुए जवाब दिया, लेकिन उसकी आँखों के सामने अभी भी कामिनी का गद्दाराया कामुक गोरा जिस्म ही घूम रहा था।
उसने सिर्फ इतना ही कहा, वहाँ क्या हुआ इस बात कि कोई चर्चा नहीं कि, एक औरत का हुस्न वफ़ादारी मे दरार पैदा कर ही सकता है. कोई नयी बात नहीं.
"क्या हुआ बॉस? डील हो गई क्या इस चूतिये की?" हरीश ने ठेके के अंदर इशारा करते हुए पूछा।
"घंटा डील होगी इसकी!" सुलेमान ने एक व्यंग्यात्मक और ठंडी हँसी हँसते हुए कहा। "साले का थोबड़ा देख के लग रहा है कि ये इंटरनेशनल डील करेगा? अंदर बैठकर ग़म में सस्ती दारू पी रहा है... हाहाहा!"
"तो फिर बॉस, हमें क्या करना है अब?" हरीश ने पूछा।
"हमें क्या करना है? तू बस नज़र रख उन मैक्सिकन चूतियों (कार्लोस और पेड्रो) पर। बाक़ी सब मैं देख लूँगा। डील वाला दिन तो आने दे..." सुलेमान ने अपनी आँखों में एक बहुत ही शातिर और रहस्यमयी चमक लाते हुए कहा।
तभी हरीश, जिसके रगों में अभी-अभी एक औरत के बेकाबू हुस्न को देखकर जवानी का ख़ून खौलने लगा था, अचानक बोल पड़ा
"बॉस... इस बार मुझे भी मौका देना प्लीज़..."
सुलेमान ने सिगार होंठों से हटाया और अपनी चील जैसी निगाहों से हरीश को घूरा।
"तू कब से 'घोड़ा' (बंदूक) चलाने को बेताब होने लगा बे?"
"क्यों? बड़ा हो गया हूँ मैं भी..." हरीश ने सीना चौड़ा करते हुए अपनी कमर के पीछे पैंट में खुँसी हुई अपनी गन पर हाथ फेरा।
सुलेमान की नज़रें बहुत तेज़ थीं। वो इंसानों को पढ़ने में माहिर था। उसने तुरंत भाँप लिया कि लड़का, मर्द बनना चाह रहा है।
"अच्छा?" सुलेमान ने एक तीखा ताना (Taunt) मारा, "सुबह तक तो तू 'दिमाग़' से खेलने की बात कर रहा था, और अब अचानक तुझे ये 'घोड़े' से खेलने का शौक कहाँ से चर्रा गया?"
हरीश क्या बोलता? वो एकदम चुप रह गया। वो सुलेमान को कैसे बताता कि अभी-अभी वो एक भरपूर जवान, उसके दहकते जिस्म कि मादकता देखकर आया है,
इसे अभी थोड़ी देर पहले ही मर्द होने का अहसास हुआ है.
हरीश को ख़ामोश देखकर सुलेमान ने बात को वहीं ख़त्म करना बेहतर समझा।
"चल अंदर... वो भड़वा अगर ज़्यादा पी लेगा, तो यहीं नाली में लुढ़क जाएगा। फिर इसे उठाकर ले जाना भारी पड़ेगा।"
सुलेमान ने अपना आधा जला हुआ महँगा सिगार वहीं सड़क पर फेंका, उसे अपने भारी जूतों से कुचला, और ठेके के उस धुएँ भरे माहौल में अंदर घुस गया।
ठेके के सीलन भरे अँधेरे कोने में बैठे-बैठे रमेश का नशेड़ी और लालची दिमाग़ अब घोड़े की तरह दौड़ने लगा था। चार पेग अंदर गए ही थे कि अचानक उसकी लाल आँखें चौड़ी होने लगीं। दिमाग़ में कोई शैतानी कीड़ा कुलबुलाने लगा और उसके चेहरे पर छाई हुई हताशा और पीलापन छँटने लगा।
बाहर नैनीताल की वादियों में रात का अँधेरा गहरा रहा था, जबकि रमेश के चेहरे पर एक खौफ़नाक और नीच रौनक लौट आई थी।
"बग़ल में छोरा, और गाँव में ढिंढोरा..." रमेश के होंठों से एक कपटी फुसफुसाहट निकली। "साला... इतनी देर से जिस 'घरेलू और संस्कारी' औरत को ढूँढ रहा हूँ, वो तो मेरे ही कमरे में बैठी है!"
करोड़ों की डील के लिए अपनी ही पत्नी का सौदा करने का ख़याल आते ही रमेश खुशी से पागल हो उठा। "चलो... बीस साल की शादी में साली आज किसी काम तो आएगी मेरे!"
रमेश झटके से अपनी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। ठीक उसी वक़्त सुलेमान भी ठेके के अंदर पहुँचा।
"चलें साब?" सुलेमान ने अपनी भारी आवाज़ में पूछा।
"बिल्कुल! चलो भाई!" रमेश ने एक बड़ी सी शैतानी मुस्कान के साथ कहा।
सुलेमान अंदर ही अंदर बुरी तरह हैरान था। 'साला, जब होटल से निकला था तो इसका चेहरा उतरा हुआ था, रो रहा था। और अब दाँत निपोर रहा है? इसे अचानक क्या मिल गया?'
दोनों बाहर आए और हरीश की टैक्सी में बैठ गए।
होटल कुर्मांचल पहुँचते ही रमेश ने अपनी जेब से कुछ पैसे निकाले और सुलेमान की तरफ़ बढ़ा दिए।
"सुन भाई... ये कुछ पैसे ले और आज रात अपने लिए कोई सस्ता सा कमरा देख के रुक जा। मुझे काम होगा तो मैं ख़ुद फोन कर लूँगा तुझे," रमेश ने बड़ी बेरुख़ी से कहा।
सुलेमान एक पल के लिए चौंका। साले का डर कहाँ गया? इसमें अचानक इतनी हिम्मत कहाँ से आ गई कि ये मुझे दूर कर रहा है? लेकिन ठीक था... सुलेमान को भी कुछ समय के लिए इस शराबी से छुटकारा चाहिए था। उसने पैसे लिए और हरीश को चलने का इशारा किया। सुलेमान और रमेश को होटल के बाहर छोड़कर निकल गए।
रमेश ने शराब पी ज़रूर थी, लेकिन अब उस पर नशा कोई ख़ास हावी नहीं था। करोड़ों की डील की ख़ुशी ने उसका सारा नशा उतार दिया था। वो अपनी ही बीवी की इज़्ज़त नीलाम करने के ख़याल में मगन, होटल की सीढ़ियाँ तेज़ी से चढ़ने लगा।
उधर, कमरे के अंदर...
कामिनी पूरी तरह से तैयार थी। वो आज इतनी ख़ूबसूरत सज-धज के खड़ी थी कि कोई भी देखकर अपना होश गँवा बैठे। लाल और काले रंग की शानदार साटन साड़ी में उसका गदराया हुस्न कहर ढा रहा था। आज उसका अंदर और बाहर... सब कुछ रेड और ब्लैक कलर में ही रँगा था।
लेकिन नीली दवा के भयंकर असर ने उसके जिस्म को किसी दहकती हुई भट्टी में बदल दिया था। उसे एक पल के लिए भी चैन नहीं आ रहा था। वो रह-रह कर उस बंद कमरे में यहाँ से वहाँ टहल रही थी।
उसके हर क़दम के साथ उसकी भारी, गोरी जाँघें आपस में रगड़ खा रही थीं। उसकी चूत लगातार कामरस छोड़ रही थी और बुरी तरह रिस रही थी। ऊपर से ये नई और जालीदार पैंटी (Thong) उसे चैन की साँस ही नहीं लेने दे रही थी। एक पल को तो कामिनी के दिमाग़ में आया कि 'उफ़्फ़... उतार ही देती हूँ इसे, बहुत चुभ रही है।'
लेकिन फिर ना जाने क्या सोचकर उसने उसे पहने ही रखा। वो बेशर्म चुभन अब उसकी तलब बन गई थी।
उसकी माँसल गांड की गहरी दरार में फँसी काली रेशमी डोरी (रस्सी) हर क़दम के साथ एक मीठी सी गुदगुदी पैदा कर रही थी। डोरी की रगड़ कामिनी को एक ऐसा अजीब सा सुकून और बेचैनी दे रही थी, जिसने उसके पूरे वजूद को हवस की आग में धधका कर रख दिया था।
कमरे की दीवार घड़ी टिक-टिक कर रही थी, और कामिनी का दहकता हुआ जिस्म अब किसी ऐसे मर्दाने स्पर्श के लिए कुलबुला रहा था जो उसकी इस आग को बुझा सके।
डिंग... डोंग...
कमरे की घंटी बजी। कामिनी की धड़कनें तेज़ हो गईं, उसकी जाँघों के बीच थॉन्ग की रगड़ ने एक सिहरन पैदा कर दी। उसने अपनी चाल में लचक लाते हुए दौड़ कर दरवाज़ा खोला।
सामने रमेश खड़ा था... बिल्कुल अकेला।
एक पल के लिए कामिनी की आँखों में हल्की सी निराशा तैरी क्योंकि दरवाज़े पर सुलेमान का चौड़ा और फौलादी जिस्म नहीं था। लेकिन अगले ही पल उसे एक अजीब सी ख़ुशी भी हुई, क्योंकि रमेश इस वक़्त बिल्कुल सज्जन लग रहा था। उसके चेहरे पर नशे का कोई ख़ास असर या वो पहले जैसी शराबी वाली बदहवासी बिल्कुल नहीं थी।
"हो गया आपका काम?" कामिनी ने एक नई उम्मीद और चहकती हुई आवाज़ में पूछा।
"समझ ले कि लगभग हो ही गया! चल... आज तुझे बाहर एक शानदार डिनर करा के लाऊँ," रमेश ने एक बेबाक और चौड़ी मुस्कुराहट के साथ कहा।
कामिनी बुरी तरह हैरान थी। 'ये अचानक रमेश में इतना बड़ा बदलाव कैसे आ गया?'
लेकिन वो कुछ नहीं बोली। वो अपनी उसी धीमी, मादक और लचकदार चाल से चलती हुई ड्रेसिंग टेबल के सामने जाकर खड़ी हो गई और अपने होंठों को सजाने के लिए उसने लाल लिपस्टिक उठा ली।
पीछे खड़े रमेश की लालची नज़रें कामिनी के शीशे में दिखते अक्स पर टिक गईं। साड़ी के नीचे कामिनी की मटकती हुई चौड़ी गांड और उसका कसा हुआ यौवन आज अलग ही कहर ढा रहा था।
'साली औरत बिस्तर पर भले ही एकदम ठंडी है... लेकिन जैसी पेड्रो और कार्लोस की डिमांड है, बिल्कुल वैसी 'घरेलू' और 'संस्कारी' तो है ही। वैसे भी उन मैक्सिकन सालों ने ये कहाँ कहा था कि औरत ठंडी चाहिए या गरम?' रमेश मन ही मन अपने लालच के खयाली पुलाव पका रहा था।
उसे अचानक अपने गाँव के उस ताऊ की बात याद आ गई।
'साला... फ़ौजा सिंह ने बिल्कुल सही कहा था... ले जाओ कामिनी को साथ, क्या पता कब कहाँ काम आ जाए!'
रमेश आज ख़ुद अंदर ही अंदर कामिनी के हुस्न और उसके भरे-पूरे जिस्म की तारीफ़ कर रहा था। लाल साड़ी में लिपटी उसकी बीवी आज वाक़ई किसी महँगे और ताज़ा गोश्त की तरह लग रही थी। लेकिन उस हरामी पति से इतना ना हो सका कि वो दो लफ़्ज़ अपने मुँह से बोल दे— "कामिनी... आज तुम बहुत सुंदर लग रही हो।"
करोड़ों के लालच ने रमेश की आँखों पर ऐसी पट्टी बाँध दी थी कि वो अपनी ही बीवी का पति कम, और उसका सौदा करने वाला 'भड़वा' ज़्यादा बन चुका था।
रमेश अपनी इस ख़ुशी और शैतानी जीत को छिपाते हुए सीधे बाथरूम में घुसा।
बाथरूम के अंदर रमेश ने अपने मुँह पर ठंडे पानी के कई छपाके मारे। तौलिये से मुँह पोंछते हुए उसने ख़ुद को आईने में देखा, उसके चेहरे पर एक बहुत ही शातिर और नीच हँसी तैर गई।
"मुझे बस कामिनी को ख़ुश रखना है... किसी तरह इस साली को बोतल में उतारना है," रमेश शीशे में ख़ुद की आँखों में आँखें डालकर बड़बड़ा रहा था।
"अब कामिनी ख़ुद अपनी मर्ज़ी से तो उन मेक्सिकन दरिंदों के पास जाने से रही। कुछ तो आईडिया लगाना पड़ेगा... कुछ ऐसा कि वो ख़ुद-ब-ख़ुद उनके जाल में फँस जाए और मेरा करोड़ों का काम हो जाए।"
रमेश का लालची दिमाग़ कोई बहुत ही घिनौना जाल बुनने में लगा था।
रमेश जब तैयार होकर बाहर निकला, तो कामिनी पूरी तरह से सज-धज कर उसका इंतज़ार कर रही थी। लेकिन बाहर से जितनी शांत वो दिख रही थी, अंदर से समय बीतने के साथ-साथ वो उतनी ही बुरी तरह सुलग रही थी। नीली दवा का असर अब अपने चरम पर था। उसका रोम-रोम, उसके जिस्म का एक-एक पोर किसी मर्द की छुअन के लिए तड़प रहा था।
"चलें कामिनी?" रमेश ने बनावटी मिठास के साथ पूछा।
"आ... आ.. हाँ... चलो," कामिनी ने अपनी भारी होती साँसों को क़ाबू करते हुए जवाब दिया।
कामिनी जब कमरे से बाहर निकली, तो उसकी चाल वाक़ई पूरी तरह बदल चुकी थी। लाल-काले जालीदार थॉन्ग की पिछली डोरी उसकी गांड की दरार में इतनी गहराई तक फँसी थी कि हर क़दम पर एक नशीली चुभन दे रही थी। इस चुभन की वजह से कामिनी की चाल में एक ऐसी मादक लचक और नज़ाकत आ गई थी कि होटल से बाहर निकलते वक़्त वहाँ खड़े नौजवान लड़के भी उस भरे-पूरे जिस्म की लचक को देखकर आहें भरने लगे।
"हाँ... भाई ऑटो!" होटल के बाहर आते ही रमेश ने आवाज़ दी।
एक ऑटो आकर उनके सामने रुका।
"हाँ साब, कहाँ चलना है?" ऑटो वाले ने पूछा, लेकिन उसकी भूखी और फटी हुई नज़रें रमेश पर नहीं, बल्कि लाल साड़ी में कहर ढाती कामिनी के गदराए हुए जिस्म पर टिकी थीं।
"कोई अच्छी जगह ले चल... जहाँ खाना अच्छा हो, सस्ता हो, और..." रमेश ने अपने अँगूठे को होंठों से लगाकर शराब पीने का इशारा किया, "उसका भी जुगाड़ हो।"
करोड़ों का ख़्वाब देखने वाला रमेश अपनी फितरती कंजूसी से यहाँ भी बाज़ नहीं आ रहा था। उसे आज भी 'सस्ती' जगह ही चाहिए थी।
"है ना साब! बैठो... 250 रुपये लगेंगे," ऑटो वाले ने कामिनी को निहारते हुए कहा।
"क्या? इतना ज़्यादा?" रमेश ने मुँह सिकोड़ लिया।
"चलो 10 रुपये कम दे देना साब, अब बैठो भी!" ऑटो वाले ने झुँझलाते हुए कहा।
कामिनी ने चुपचाप रमेश को बैठने का इशारा किया। दोनों ऑटो की पिछली सीट पर अगल-बगल बैठ गए। ऑटो ने रफ़्तार पकड़ी और नैनीताल की ठंडी हवा कामिनी के सुलगते चेहरे से टकराने लगी।
ऑटो अभी कुछ ही दूर चला होगा कि अचानक ज़ोर से ब्रेक लगे... चीईईंइक्क!
ऑटो वाले ने सड़क किनारे खड़े एक आदमी को देखकर झटके से ऑटो रोक दिया था।
"अरे जमील ... तू यहाँ, कब आया बहार?" ऑटो वाले ने उस आदमी को देखकर ख़ुशी से आवाज़ दी।
"अरे साले शंकर तू इतने दिन से कहाँ था बे?" जमील नाम के उस आदमी ने आगे बढ़कर ऑटो वाले को कस के गले लगा लिया।
"बस यार, चल आज साथ बैठेंगे... इतने दिन बाद मिला है!" ऑटो वाले ने ख़ुशी से कहा।
फिर शंकर ने पीछे मुड़कर रमेश और कामिनी की तरफ़ देखा और बोला, "साब, ये मेरा जिगरी दोस्त है। इसी रास्ते पर आगे इसका घर है... ये भी साथ ही जाएगा। आप लोग थोड़ा सरक जाएँ तो ये भी यहीं बैठ जाएगा। आपको आपकी जगह उतार कर, मैं इसे घर ले जाऊँगा।"
कामिनी की आँखें चौड़ी हो गईं। ऑटो की पिछली सीट वैसे ही छोटी थी, और अब उस पर तीन लोगों को बैठना था। रमेश ने कुछ कहने के बजाय बस मुँह बिचकाया और खिसक कर कामिनी की तरफ़ सटने लगा,
"आजा भाई, बैठ जा..." ऑटो वाले ने जमील को पीछे बैठने का इशारा किया।
जमील ने एक नजर अंदर देखा कामिनी कि नजरें भी उसे ही देख रही थी, जमील कोई 50 साल के आस पास का आदमी रहा होगा, मैला सा कुर्ता पजामा पहने हुए, दाढ़ी बड़ी हुई लेकिन मुछे नहीं थी, मुँह मे शायद पान दबा रखा था, लाल पिक मुँह के कोने से दिख रही थी, सर पर जालीदार टोपी पहने हट्टा कट्टा सा आदमी थी.
शंकर का ऑटो दोनों साइड से खुला हुआ था, जमील जानबूझ कर कामिनी कि साइड से अंदर घुसने लगा.
"मोहतरमा थोड़ा जगह दे दे, आपको तकलीफ हुई उसके लिए माफ़ी.
"मै 150 ही दूंगा अब " रमेश ने मुँह भींच कर शंकर को कहाँ.
"साब रेट तो पहले तय हुई थी ना " शंकर ने विरोध किया.
"नहीं 150 ही.... "
"जाने दे यार... बाहरी लोग है कम ले लेगा तो क्या बिगड़ जायेगा " जमील कामिनी को घूरता हुआ, ऐसे बैठा कि उसकी हथेली सीधा कामिनी के जांघो पर जा धसी, जिसे उसने बुरी तरह से भींचा भी.
इस्स्स्स...... कामिनी के मुँह से एक सिसकी निकली
लेकिन कुछ बोली नहीं... बस गुस्से से एक बार जमील को देखा फिर सामने देखने लगी.
ऑटो में चढ़ा और जमील, कामिनी के बिल्कुल बगल में, उससे सटकर बैठ गया। जगह इतनी कम थी कि कामिनी को एक तरफ़ अपने पति रमेश और दूसरी तरफ़ उस अनजान, खुरदरे आदमी के बीच बुरी तरह से सैंडविच की तरह दबना पड़ा।
जैसे ही ऑटो दोबारा चालू हुआ और हिचकोले खाने लगा... कामिनी की साँसें अटक गईं।
एक तरफ़ रमेश का शरीर था, और दूसरी तरफ़ अनजान मर्द जमील की चौड़ी, सख़्त जाँघ कामिनी की गोरी जाँघ से पूरी तरह रगड़ खाने लगी। जमील के शरीर की खुरदरी मर्दाना गर्मी, नीली दवा से सुलगते कामिनी के जिस्म में पेट्रोल का काम कर रही थी।
ऑटो नैनीताल की घुमावदार और सर्द सड़कों पर हिचकोले खा रहा था। बाहर ठंडी हवाओं का पहरा था, लेकिन ऑटो की तंग पिछली सीट पर जैसे कोई ज्वालामुखी सुलग रहा था।
रमेश अपनी ही धुन में मगन था। वो कामिनी की दूसरी तरफ़ सटकर बैठा ज़रूर था, लेकिन उसका दिमाग़ प्लान बनाने मे व्यस्त था,
जमील के जिस्म कि कच्ची पसीने से भरी गंध, कामिनी के महकते जिस्म कि खुसबू से मिल मर एक अजीब सा माहौल बना रही थी.
जमील की चौड़ी और सख़्त जाँघ कामिनी की गोरी, गदराई जाँघ से पूरी तरह सटी हुई थी। ऑटो के हर झटके के साथ जमील के मैले पजामे का खुरदरापन कामिनी की रेशमी लाल साड़ी से घिसट रहा था।, मर्दाना खुरदरी रगड़... कामिनी के जिस्म में दौड़ रही नीली दवा की गर्मी में जैसे घी का काम कर रही थी।
कामिनी ने एक बार जमील को ग़ुस्से से घूरना चाहा, लेकिन उसकी आँखों का ग़ुस्सा अब एक अजीब सी मादक बेबसी में पिघलने लगा था। जमील, घाघ और औरतबाज इंसान मालूम पड़ता था, शायद औरतों के चाहत को बारीकी से समझता था, कामिनी की ख़ुमार भरी आँखों को देखकर तुरंत समझ गया कि ये 'शिकार' विरोध नहीं कर रहा, बल्कि अंदर ही अंदर इस छुअन का लुत्फ़ उठा रहा है।
इस अहसास ने जमील की हिम्मत को बढ़ा दिया, उसने अपनी जाँघ को कामिनी की जाँघ से और भी ज़ोर से भींच दिया।
ईस्स्स्स... कामिनी के रसीले होंठों से एक काँपती हुई सिसकी फिसल गई। उसने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं।
तभी ऑटो एक तीखे मोड़ पर घूमा।
इसी हिचकोले का फ़ायदा उठाकर जमील ने अपनी कोहनी को हल्का सा तिरछा किया और उसे कामिनी के कसे हुए लाल ब्लाउज़ के ठीक किनारे पर, उसकी पसलियों और सीने के भारी उभार के बीच बड़ी बेशर्मी से गड़ा दिया।
आअह्ह्ह... उफ़्फ़्फ़!
कामिनी का पूरा बदन एक झटके से तन गया। जमील की सख़्त कोहनी का दबाव उसके नाज़ुक और संवेदनशील जिस्म पर एक मीठी बिजली बनकर गिरा। कामिनी ने पलट कर जमील को घूरा, उसकी साँसें धौंकनी की तरह चल रही थीं, उसका सीना ज़ोर-ज़ोर से ऊपर-नीचे हो रहा था। लेकिन जमील ने बहुत ही ढिठाई से अपना पान चबाते हुए मुँह दूसरी तरफ़ फेर लिया, जबकि उसकी कोहनी अभी भी कामिनी के ब्लाउज़ के किनारे पर दबाव बनाए हुए थी।
कामिनी चाहकर भी उसे धकेल नहीं पाई। सुलगते जिस्म ने उसके सारे संस्कार और शर्म को जलाकर राख कर दिया था।
नीचे साड़ी में छिपी उस काली डोरी की रगड़ और ऊपर जमील की इस बेख़ौफ़ छेड़खानी ने कामिनी के जिस्म का सारा बाँध तोड़ दिया। उसे अपनी जाँघों के बीच एक अजीब सी चिपचिपाहट और भारीपन महसूस होने लगा; वो कामरस की आग में पूरी तरह से पिघल रही थी। सीट पर जहाँ वो बैठी थी, वहाँ की हल्की सी नमी भी अब उसे महसूस हो रही थी। वो पूरी तरह से बहक चुकी थी। एक अनजान और मैले से आदमी की ये ढीठ मर्दानगी उसे पागल कर रही थी।
चीईईंइक्क...
ऑटो एक शानदार रेस्टोरेंट से थोड़ी दूरी पर जाकर झटके से रुक गया।
"आ गया साब!" ऑटो वाले शंकर ने कहा।
रमेश तुरंत बाहर निकल गया।
"चलिए मोहतरमा..." जमील ने अपनी कोहनी हटाते हुए एक नीच मुस्कान के साथ कहा।
कामिनी जब ऑटो से बाहर उतरी, तो उसके पैर काँप रहे थे। उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसके जिस्म का सारा पानी निचोड़ लिया गया हो। नैनीताल की हवा ठंडी थी, लेकिन कामिनी का गोरा जिस्म किसी तपते हुए तवे की तरह जल रहा था। गाल लाल हो गए थे,
रमेश ने अपनी जेब से पैसे निकालकर ऑटो वाले शंकर को थमाए। इधर पीछे खड़ा जमील अपनी फटी और भूखी नज़रों से कामिनी को ऊपर से नीचे तक घूरे जा रहा था। और ताज्जुब की बात तो ये थी कि कामिनी भी मुँह फेरने के बजाय, ना जाने क्यों चोर नज़रों से उस खुरदरे, मैले से आदमी को देख ले रही थी। कुलबुलाती उत्तेजना ने उसके अंदर की औरत को इतना ढीठ बना दिया था कि अब उसे हर मर्द की हवस भरी नज़रों में अपने हुस्न की जीत नज़र आ रही थी।
सही गलत का कोई फर्क नहीं था, बस सामने वाला मर्द होना चाहिए,
रमेश कामिनी को लेकर रेस्टोरेंट की तरफ़ आगे बढ़ गया...
और पीछे शंकर और जमील अपनी जगह पर खड़े उस कयामत को जाते हुए देख रहे थे।
"साला... क्या माल है बे यार!" जमील ने एक गहरी, हवस भरी साँस छोड़ते हुए शंकर की पीठ पर ज़ोर से हाथ मारा।
"साले, आज सुबह ही तो जेल से छूटा है तू, और अभी से रंडीबाज़ी का भूत सवार हो गया?" शंकर ने उसे ताना मारा, लेकिन उसकी अपनी नज़रें भी लाल साड़ी में मटकती कामिनी की भारी गांड पर ही चिपकी थीं।
"अरे ऐसी औरत के आगे तो बड़ी से बड़ी रंडी फ़ैल है बे! साली इतनी गरम थी कि छूते ही हाथ जल जाए। मैंने पूरा हाथ जाँघों में गड़ा दिया, लेकिन कुछ नहीं बोली... साली चुदना चाहती है, लगता है!" जमील अपनी पान से लाल हुई बत्तीसी दिखाते हुए खूँखार अंदाज़ में बोला।
शंकर भी अपनी पैंट के ऊपर से ही अपने पाजामे में तने हुए लंड के उभार को सहलाने लगा था। कामिनी के बेकाबू हुस्न ने ऑटो वाले का भी ईमान डिगा दिया था।
"चल बे, ख़याली पुलाव मत बना। ऐसी औरतें अपनी क़िस्मत में नहीं होतीं, किसी रईस की रखैल हो सकती है लेकिन अपनी नहीं," शंकर ने गहरी हताशा में सिर झटकते हुए ऑटो का इग्निशन ऑन किया। "चल बैठ... अब क्या नज़रों से ही चोद लेगा? चल, दारू पिलाता हूँ तुझे।"
जमील ने भी एक ठंडी, मायूस साँस ली। उसकी हताशा उसके चेहरे पर साफ़ झलक रही थी। उसने आसमान की तरफ़ मुँह उठाया, दोनों हाथ फैलाए और बड़ी शिद्दत से बुदबुदाया, "या अल्लाह... बस एक बार ये औरत दिला दे, क़सम से सारे ग़लत धंधे छोड़ दूँगा!"
"चल ना बे लोड़ू... बैठ जल्दी!" शंकर ने उसे भद्दी गाली देते हुए टोका।
जमील भारी मन से ऑटो में बैठा। शंकर ने ऑटो का हैंडल मोड़ा ही था कि...
"ऐ... भाई! रुको यार...!"
सड़क पर एक ज़ोरदार और जानी-पहचानी आवाज़ गूँजी।
शंकर ने तुरंत ब्रेक मारे और ऑटो से मुँह बाहर निकालकर देखा।
सामने से रमेश और कामिनी वापस उन्हीं की तरफ़ चले आ रहे थे। कामिनी की मदमस्त, बलखाती चाल, साड़ी के पल्लू से झाँकता उसका गदराया सीना और थॉन्ग की चुभन से रगड़ खाती जाँघें... जमील की तो जैसे बांछें ही खिल गईं!
'अबे... अल्लाह ने इतनी जल्दी सुन ली क्या बे?' जमील की आँखें ख़ुशी, हवस और अचरज से फटी की फटी रह गईं। उसका पूरा जिस्म रोमांच से काँप उठा।
"अरे भाई, कोई दूसरा रेस्टोरेंट नहीं है क्या आस-पास? यहाँ तो बहुत भीड़ है, अंदर खड़े होने की भी जगह नहीं है," रमेश ने ऑटो के पास आकर झुँझलाते हुए कहा।
शंकर कुछ बोलता, उससे पहले ही जमील ऑटो से बाहर लगभग कूदता हुआ सामने आ गया।
"है ना साब... बहुत हैं! जैसा आपको चाहिए, बिल्कुल वैसा जुगाड़ है। आप बैठिए तो सही..."
जमील की आवाज़ में एक ऐसी चालाकी, ख़ुशी थी, जैसे किसी भूखे और खूँखार कुत्ते के सामने वापस से ताज़ा गोश्त की हड्डी डाल दी गई हो।
रमेश ऑटो में चढ़कर बैठता, उससे पहले ही इस बार कामिनी ने एक बेहद चौंकाने वाली हरकत की। वो ख़ुद तेज़ी से आगे बढ़ी और सीधा जमील के बिल्कुल बगल में जाकर बैठ गई। ऐसा लग रहा था जैसे वो उस खुरदरे, मैले और मर्दाने स्पर्श को एक बार फिर से अपने जिस्म पर महसूस करने के लिए तड़प रही हो। रमेश चुपचाप दूसरी तरफ़ बैठ गया।
"शंकर, उस वाले ढाबे पर ले चल जहाँ नए-नए लड़के-लड़कियाँ ज़्यादा आते हैं... वहाँ भीड़-भाड़ नहीं होती," जमील ने ऑटो वाले को इशारा किया।
शंकर को जगह पता थी। उसने बिना कुछ कहे ऑटो रफ़्तार में दौड़ा दिया।
"आपको जगह बहुत पसंद आएगी मोहतरमा..." जमील ने एक बेहद खूँखार और नीच मुस्कान के साथ कहा और जानबूझकर अपना भारी, खुरदरा हाथ कामिनी की गोरी जाँघ पर रख दिया। लेकिन इस बार उसने अपना हाथ वहाँ से हटाया नहीं।
कामिनी ने एक नज़र अपनी लाल साड़ी पर रखे मैले और काले बालों से भरे मर्द के हाथ को देखा, और फिर धीरे से अपनी नज़रें उठाकर जमील को देखा। दोनों की नज़रें मिलीं। कामिनी की बड़ी-बड़ी ख़ुमार भरी आँखों में हवस और प्यास इतनी साफ़ झलक रही थी कि जमील भी एक पल को सिहर गया। कामिनी का बस चलता तो वो अभी इसी वक़्त अपनी साड़ी खोलकर बीच सड़क पर उस जंगली मर्द के हाथों चुद जाती।
हवस ने उसके दिमाग़ पर पूरी तरह कब्ज़ा कर लिया था।
कामिनी ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और ख़ुद को क़ाबू करने की नाकाम कोशिश करने लगी। लेकिन ऑटो के झटके... और झटकों के साथ जमील का खुरदरा हाथ अब कामिनी की जाँघों पर धीरे-धीरे रेंगने लगा था। जमील रह-रह कर उसकी माँसल जाँघों को अपनी सख़्त उँगलियों से दबा रहा था। जमील, जो औरतों का पुराना शिकारी था, वो एक ही नज़र में समझ चुका था कि ये 'माल' पूरी तरह से उसके क़ाबू में है और अंदर से भड़क चुका है।
कामिनी की हालत वाक़ई ख़राब थी। उसकी जाँघों के बीच कामरस की बाढ़ आ गई थी। वो हवस की आग में पूरी तरह से पिघल रही थी, यहाँ तक कि उसे महसूस हो रहा था कि जहाँ वो बैठी है, ऑटो की वो गद्दी भी उसके बदन की नमी से चिपचिपी होने लगी है। कामिनी अपनी दोनों जाँघों को आपस में सटाती, फिर खोलती, ताकि उस सुलगती हुई जगह को थोड़ी राहत मिले... लेकिन नहीं, मुसीबत और बढ़ रही थी।जमील कि मर्दाना बेख़ौफ़ छुअन उसे और भी ज़्यादा उन्मादित और पागल कर रही थी।
महज़ 10 मिनट के सफ़र के बाद ऑटो मेन रोड से उतरकर एक सुनसान और शानदार रेस्टोरेंट के सामने जाकर रुका। वो जगह वाक़ई भीड़-भाड़ से दूर थी और अंदर से मद्धम, रोमांटिक गानों की धुन गूँज रही थी।
"साब... आ गया!" शंकर ने ऑटो रोकते हुए कहा।
रमेश तुरंत नीचे उतरा और जेब से पैसे निकालने लगा।
"रहने दो साब, पैसे बाद में दे देना..."
अंदर बैठ कामिनी जैसे ही बाहर निकलने को हुई, जमील ने एक बार फिर उसकी जाँघ को अपनी मुट्ठी में भींचा... लेकिन इस बार बहुत ज़ोर से!
"आआहहहह...!"
कामिनी के मुँह से बेसाख़्ता एक दर्द और हवस में डूबी हुई तेज़ आह निकल गई।
"कक्क... क्या हुआ?" रमेश ने चौंकते हुए कामिनी की तरफ़ देखा।
"वो... वो... सैंडल चुभ गई, उतरने से..." कामिनी ने हड़बड़ा कर बात सँभाल ली, लेकिन उसकी साँसें अभी भी तेज़ चल रही थीं।
कामिनी जैसे ही रेस्टोरेंट की तरफ़ आगे बढ़ी...
"साब, बस एक दिक़्क़त है। यहाँ पीने का इंतज़ाम नहीं है..." शंकर ने रमेश के पास आकर बहुत ही चालाकी से बताया।
"कककक... क्या?" रमेश बुरी तरह आगबबूला हो उठा। बिना पिए तो उसे खाना ही हज़म नहीं होता।
"अरे साब ग़ुस्सा क्यों होते हो? पास में ही है एक जगह। आप चलिए हमारे साथ, मस्त पी लीजिए, फिर आकर मैडम के साथ खाना खा लेना," शंकर ने आईडिया दिया।
उसके और जमील के चेहरे पर एक बहुत ही शातिर और नीच मुस्कान थी, जैसे किसी बहुत ख़ौफ़नाक साज़िश का जाल बिछाया जा रहा हो।
"कामिनी! तुम चल के अंदर बैठो। मैं बस 10 मिनट में आया, तब तक तुम कुछ ऑर्डर करो..." रमेश ने हुक्म दिया।
कामिनी अच्छी तरह जानती थी कि रमेश अपनी शराबी आदत से बाज़ नहीं आएगा, वो सिर्फ़ दारू के जुगाड़ में जा रहा है। कामिनी ने मन मारकर हामी भरी और अंदर की तरफ़ चल दी।
पीछे रमेश, शंकर और जमील के साथ उसी ऑटो में वापस बैठ गया। साला, दारू भी क्या गज़ब की चीज़ है... पल भर में अनजान और सड़कछाप लोग भी 'दोस्त' बन जाते हैं! रमेश जैसा लालची और दारूबाज़ इंसान अपनी हैसियत, अपनी इज़्ज़त का भी ख़याल नहीं कर रहा था।
वैसे देखा जाए तो दोनों मियाँ-बीवी आज अपनी-अपनी तलब और नशे से मज़बूर थे। एक को शराब और पैसे का लालच गिरा रहा था, तो दूसरी को हवस और जिस्म की आग अपनी हैसियत से बहुत नीचे गिरा रही थी।
कामिनी रेस्टोरेंट के अंदर पहुँची। मद्धम पीली रोशनी, शानदार माहौल और एक कोने वाली टेबल... कामिनी जाकर वहाँ बैठ गई। आस-पास के कुछ नए जोड़े उस अकेली और कहर ढाती हुई लाल साड़ी वाली औरत को मुड़-मुड़ कर देख रहे थे, लेकिन बहुत ज़्यादा नहीं... क्योंकि नैनीताल की ऐसी सुनसान जगहों पर आज़ाद खयाल लोगों का आना आम बात थी।
कामिनी ने टेबल पर रखा पानी का गिलास उठाया और एक ही घूँट में आधा पानी गटक लिया। ठंडे पानी से उसके सुलगते गले और जिस्म को थोड़ी सी राहत महसूस हुई। वेटर के आने पर कामिनी ने हॉट सूप ऑर्डर कर दिया।
वो जानती थी कि रमेश एक बार में दारू गटक जाता है और वो जल्दी ही आ जाएगा।
वो दरवाज़े की तरफ़ टकटकी लगाए रमेश का इंतज़ार कर रही थी...
इधर, रेस्टोरेंट की चमक-दमक से दूर, रमेश को ये दोनों (शंकर और जमील) एक निहायती सस्ते और सीलन भरे बार में ले आए थे।
"लो साब... पियो! ये पहाड़ की स्पेशल लाल शराब है, अंदर जाते ही जन्नत का नज़ारा दिखा देती है," जमील ने एक पुरानी सी कांच की बोतल रमेश के सामने रखते हुए कहा। उस बोतल में लाल रंग का कोई तेज़ स्मेल वाला तरल पदार्थ भरा हुआ था।
जमील ने फुर्ती से तीन पेग बना दिए। अभी कुछ देर पहले तक रमेश उनका महज़ एक 'ग्राहक' था, लेकिन अब वे 'दोस्त' बन चुके थे। साला... दारू चीज़ ही ऐसी है, जो पल भर में अमीर-ग़रीब, मालिक-मज़दूर का फ़र्क मिटाकर सबको एक ही गंदी नाली में ला खड़ा करती है।
महज़ 10 मिनट ही बीते थे और रमेश ने जल्दबाज़ी में लाल शराब के 3-4 बड़े पेग अपने हलक के नीचे उतार लिए। वो भूल गया था कि उसकी ख़ूबसूरत बीवी अकेले रेस्टोरेंट में उसका इंतज़ार कर रही है। हुआ वही जो होना था... रमेश बुरी तरह बहकने लगा।
"साब... रहने दो अब, ज़्यादा हो जाएगी," शंकर ने थोड़ा डरते हुए रमेश को टोका।
"अबे चुप कर! ये तो... ये तो रोज़ का है मेरा!" रमेश ने नशे में अपनी ज़ुबान लड़खड़ाते हुए एक पेग और खींच लिया।
लेकिन वो कोई महँगी विदेशी शराब नहीं थी, वो पहाड़ की सस्ती और कच्ची दारू थी जो सीधा दिमाग़ की नसों पर हथौड़ा मारती थी। शराब ने अपना असर दिखा दिया।
अगले 20 मिनट बीतते-बीतते रमेश का सिर भारी हुआ और वो धड़ाम से टेबल पर औंधे मुँह गिरकर ढेर हो गया।
"अबे... ये तो गया अब!" शंकर ने रमेश को हिलाकर देखा और डरते हुए कहा।
"जाने दे साले को! ये लुढ़केगा, तभी तो अपना काम बनेगा..." जमील के मुँह से एक बेहद वहशी और खूँखार हँसी फूट पड़ी। उसकी आँखों में एक चमक आ गई।
"सुन... अब मैं जो बोल रहा हूँ, कान खोलकर ध्यान से सुन," जमील ने अपनी गर्दन आगे की और शंकर के कान में कुछ फुसफुसाने लगा। वो जो भी साज़िश रच रहा था, वो यक़ीनन कामिनी के गदराए जिस्म को नोचने की ही थी।
उधर रेस्टोरेंट में, समय जैसे काटे नहीं कट रहा था।
आधा घंटा बीत चुका था। कामिनी अब बुरी तरह परेशान होने लगी थी। उसका जिस्म तो पहले से ही किसी भट्टी की तरह सुलग रहा था, लेकिन अब रमेश के ना आने से उसका दिमाग़ भी गर्म होने लगा था।
उत्तेजना, जल्दबाज़ी और रमेश के साथ होने के भरोसे में वो अपना मोबाइल फोन भी होटल के कमरे में ही भूल आई थी। अब वो पूरी तरह से अकेली और बेबस थी।
तभी... रेस्टोरेंट के काँच के दरवाज़े से उसे सामने से जमील अंदर आता हुआ दिखाई दिया।
ना जाने क्यों, उस मैले और खुरदरे आदमी को देखकर कामिनी को डरने के बजाय एक अजीब सी राहत महसूस हुई।
"मोहतरमा... मोहतरमा... वो साब तो लुढ़क गए!" जमील ने कामिनी के पास आकर एक बनावटी घबराहट के साथ कहा।
ये सुनते ही कामिनी ने गहरी हताशा से अपना सिर झुका लिया। उसके चेहरे पर कोई हैरानी या डर नहीं था, बल्कि एक गहरी चिढ़ थी। जैसे वो जानती हो कि इस शराबी और नीच आदमी के साथ तो यही होना था।
"कहाँ हैं वो? चलो..." कामिनी ने अपना पर्स उठाया और एक ठंडी साँस भरते हुए जमील के साथ बाहर आ गई।
रेस्टोरेंट के बाहर अँधेरा गहरा चुका था। सामने ही शंकर ऑटो स्टार्ट किए बैठा था।
कामिनी ऑटो के पास पहुँची। उसका दिल एक पल के लिए ज़ोर से धड़का... 'क्या इन दो अनजान आदमियों के साथ इस सुनसान रात में जाना ठीक होगा?'
दिमाग़ ने चेतावनी दी, लेकिन उसके जिस्म में दौड़ रही हवस की आग और रमेश पर आ रहे भयंकर ग़ुस्से ने उसकी सोचने-समझने की ताक़त छीन ली थी। वो आख़िरकार ऑटो में चढ़कर बैठ गई।
"कहाँ हैं वो?" कामिनी ने तीखी आवाज़ में पूछा।
"मैडम, साब बिल्कुल उठने की हालत में नहीं थे। वहीं बार में उल्टी कर दी थी उन्होंने। तो मैं उन्हें अपने साथ ही ले आया," शंकर ने बहुत ही चालाकी और मासूमियत से बोला.
कामिनी ने हताशा में अपना माथा पीट लिया। रमेश लगभग बेहोश हालत मे ऑटो कि पिछली सीट पर पड़ा हुआ था, बीस साल की शादी में उस शराबी ने उसे सिर्फ़ ज़िल्लत ही दी थी।
रमेश उसकेिये बोझ बनता जा रहा था,
"चलिए मैडम आपको आपके hotel मे छोड़ देते है " शंकर ने कहाँ.
शंकर कि बात सुनते ही कामिनी का कलेजा कांप गया, उसका जिस्म झंझना गया, रोये खड़े हो गए.
वो दो अनजान लोगो को अपने होटल के कमरे मे ले जाएगी?
लेकिन क्या करे? लोग होटल के लोग देखेंगे तो क्या सोचेंगे? मेरे बारे मे क्या अंदाजा लगाएंगे.
कामिनी के अंदर कि औरत उस से सवाल कर रही थी, जिस्म दहक रहा था,
पति कि मौजूदकी मे दो अनजाने मर्द उसे उत्तेजना दे रहे थे.
"क्या हुआ मैडम नहीं जाना?" जमील ने बिल्कुल पास आ कर पूछा, उसकी नजरें कामिनी के ब्लाउज से झंक्ति गहरी दरार पर थी.
"आ... हाँ... चलो.... कामिनी ने मन मार कार हाँ कह दिया.
कामिनी रमेश के बगल मे जा बैठी, और जमील सीधा उस से सट कर बैठ गया..
बहार मौसम ठंडा था, लेकिन कामिनी का जिस्म जल रहा था, रमेश कि बेहोशी उसे एक आनंद सा महसूस करा रही थी, जैसे कोई बहुत बड़ी बधा हट गई हो.
ऑटो एक झटके के साथ आगे बढ़ गया।
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रात गहरा चुकी थी। नैनीताल की घुमावदार सड़कों पर अब सन्नाटा पसरने लगा था। बाहर पहाड़ी हवाएँ बर्फ जैसी सर्द थीं, लेकिन ऑटो की तंग पिछली सीट पर जैसे हवस और बगावत की एक दहकती हुई भट्टी जल रही थी।
ऑटो के फक-फक करते इंजन की आवाज़ के बीच, कामिनी को सिर्फ़ अपनी और जमील की भारी होती साँसें सुनाई दे रही थीं। उसके एक तरफ़ उसका पति रमेश शराब के नशे में मुर्दे की तरह औंधे मुँह पड़ा था, उसका सिर बार-बार झटके खाकर कामिनी के कंधे से टकरा जाता, और दूसरी तरफ़... जमील था, जिसकी खुरदरी और चौड़ी जाँघ कामिनी की गोरी जाँघ को पूरी तरह से भींचे हुए थी।
कामिनी खुद यही चाहती थी, इसे कोई मर्द छुवे मसले रगड़े, विरोध का तो कोई सवाल ही नहीं था.
कितनी गिर गई थी कामिनी अपनी हवस मे, 2घंटे पहले मिले अनजान मर्द से अपनी जाँघ मसलवा रही थी.
असल मे ये अनजानापन ही उसकी उत्तेजना को बढ़ा रहा था, इसके जिस्म को ज्वालामुखी बना रहा था.
रास्ते का सन्नाटा और अँधेरा देखकर जमील के अंदर का शिकारी पूरी तरह से आज़ाद हो गया। उसने एक नज़र बगल में लुढ़के रमेश को देखा और फिर उसकी फटी हुई भूखी नज़रें कामिनी के लाल साड़ी से झाँकते गोरे और गदराए जिस्म पर आकर टिक गईं।
जमील ने अपना खुरदरा, मैले बालों वाला हाथ धीरे से आगे बढ़ाया और उसे सीधे कामिनी की नंगी, पसीने से भीगी कमर पर रख दिया।
ईईस्स्स्स...! आआहहहह.....
कामिनी के होंठों से एक बहुत ही धीमी, काँपती हुई सिसकी निकली। एक अनजान मर्द के सख़्त और ढीठ स्पर्श ने उसके सुलगते जिस्म में 440 वोल्ट का करंट दौड़ा दिया। कामिनी ने डर और सुकून के मारे आँखें बंद कर लीं।
'मेरा पति... मेरा पति मेरे बिल्कुल बगल में बैठा है...' कामिनी के दिमाग़ ने चीख कर उसे चेतावनी दी। लेकिन उसके जिस्म में दौड़ रही हवस और रमेश के प्रति उसकी नफ़रत ने उस डर को एक अजीब से 'मादक थ्रिल' में बदल दिया।
एक औरत के लिए इससे ज़्यादा ख़तरनाक और नशीला क्या हो सकता था कि उसका पति उसी सीट पर बेहोश पड़ा हो, और वो किसी ग़ैर मर्द की मर्दानगी का लुत्फ़ उठा रही हो?
कामिनी ने जमील का हाथ झटकने के बजाय, अपनी कमर को बहुत ही नज़ाकत से जमील के खुरदरे हाथ की तरफ़ और ज़्यादा मोड़ दिया। कामिनी की इस मूक रज़ामंदी (Silent consent) ने जमील को पागल कर दिया।
"मोहतरमा... आप तो आग का गोला हो," जमील ने कामिनी के कान के बिल्कुल करीब आकर फुसफुसाया। उसके मुँह से आती पान और सस्ती शराब की बदबू भी आज कामिनी को किसी अजीब से मर्दाने इत्र जैसी लग रही थी।
इस तारीफ का असर सीधा कामिनी कि चुत पर हुआ, वो फाड़की.... कामिनी सिसकी... इस्स्स्स.... धीरे....
कामिनी ने आंखे खोल जमील का बदसूरत चेहरा देखा.
सामान्य औरत जमील के मुँह पर थूकती भी नहीं, लेकिन कामिनी उसने तो अपना जिस्म उसकी तरफ धकेल दिया था.
जमील की मोटी और सख़्त उँगलियाँ कामिनी की कमर से रेंगती हुई उसके लाल साटन के पेटीकोट के अंदरूनी हिस्से तक पहुँचने की कोशिश करने लगीं। ऑटो के हर हिचकोले के साथ जमील का हाथ कामिनी के बदन को और भी मज़बूती से नोच रहा था। उसकी कमर, कूल्हे पर रेंग रहा था, पेटीकोट मे घुसने कि बेतहाशा कोशिश कर रहा था.
जमील जल्दबाज़ी मे था, जितना लुत्फ़ उठा सके उतना ही सही, ऐसी शहरी औरत दुबारा कहाँ मिलेगी.
कामिनी की हालत ख़राब थी। उसकी साँसें धौंकनी की तरह चल रही थीं। साड़ी के नीचे जालीदार 'थॉन्ग' (Thong) उसकी माँसल गांड की दरार में इतनी बुरी तरह रगड़ खा रही थी कि उसका पूरा वजूद अपनी जाँघों के बीच की गीली चुभन पर सिमट कर रह गया था।
जमील का हाथ जैसे-जैसे उसकी जाँघों के ऊपर खिसक रहा था, कामिनी अपनी जाँघों को आपस में सटाने के बजाय... और ज़्यादा खोलती जा रही थी, ताकि वो उस पराये मर्द की छुअन को और गहराई तक महसूस कर सके।
आगे बैठा ऑटो वाला शंकर रियर-मिरर (शीशे) से पीछे का ये कामुक मादक नज़ारा देख रहा था।
"साले जमील... तेरी तो लॉटरी लग गई आज!" शंकर ने धीरे से बडबडाते हुए अपनी पैंट के ऊपर से ही अपने उभार को सहला लिया और ऑटो की रफ़्तार थोड़ी और धीमी कर दी, ताकि रास्ते का ये अँधेरा थोड़ा और लंबा खिंच जाए।
अचानक, एक तेज़ झटके के साथ ऑटो एक गड्ढे से गुज़रा।
रमेश का सिर झटके से कामिनी की गोद में आ गिरा। कामिनी की साँसें हलक में अटक गईं। उसने खौफ़ से आँखें खोलीं... लेकिन रमेश अभी भी बेसुध था, बस नींद में कुछ बड़बड़ा रहा था।
इस डर और एड्रेनालाईन (Adrenaline) के रश ने कामिनी की हवस को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया। उसने अपना हाथ नीचे किया और रमेश के सिर को अपनी गोद में ही पड़े रहने दिया... और उसी वक़्त जमील का दूसरा हाथ कामिनी के लाल ब्लाउज़ के खुले हुए गले से अंदर की तरफ़ खिसक गया।
आअह्ह्ह... उफ़्फ़्फ़...
कामिनी का सिर पीछे की तरफ़ ऑटो की सीट से जा टकराया। उसकी आँखें पलट गईं। जमील की खुरदरी हथेली उसके तने हुए, भारी स्तन को पूरी बेरहमी से भींच रही थी। कामिनी ने अपने होंठों को दाँतों तले इतनी ज़ोर से दबा लिया कि कहीं उसकी सिसकियाँ बाहर सड़क तक ना गूँज जाएँ।
एक तरफ़ पति का सिर गोद में... और दूसरी तरफ़ एक सड़कछाप मावली के हाथों अपने हुस्न को इस तरह निचुड़वाते हुए, कामिनी ने आज अपनी ज़िंदगी की सारी हदें, सारे संस्कार और सारी शर्म उसी ऑटो की पिछली सीट पर हमेशा के लिए दफ़न कर दिए थे। वो अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुकी थी।
तभी... दूर से एक बहुत बड़ा और चमकता हुआ बोर्ड नज़र आया।
"होटल कुर्मांचल - 1 km"
"जमील... होटल आने वाला है..." शंकर ने आगे से हल्की आवाज़ में चेतावनी दी।
जमील ने बहुत ही बेमन से अपना हाथ कामिनी के ब्लाउज़ से बाहर निकाला और उसकी कमर से हाथ हटाकर सीधा हो गया। कामिनी का पूरा जिस्म अभी भी काँप रहा था। उसका सीना ज़ोर-ज़ोर से ऊपर-नीचे हो रहा था, माथे पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं और साड़ी अस्त-व्यस्त हो चुकी थी।
कामिनी कि आंखे खुली, उसकी नजरों मे सवाल था रुक क्यों गए? रगडो मुझे? नोचो अभी तो शुरू हुए थे?
"होटल आने वाला है मोहतरमा " जमील ने जैसे बेबसी दिखाई.
वो आगे क्यों ना बढ़ सका वो मज़बूरी बताई
कामिनी का चेहरा मुरझा गया, उसका जिस्म जल रहा था, चुत सुलग रही थी, नाभि के नीचे कुछ कुलबुला रहा था जिसे बहार निकाल फेंकना जरुरी था वरना कामिनी इस आग मे खुद जल जाएगी.
कामिनी लम्बी लम्बी सांसे भर रही थी, दिमाग़ सुन्न हो चूका था.
ऑटो 'होटल कुर्मांचल' से महज़ आधा किलोमीटर की दूरी पर था। घुमावदार सड़क से नीचे होटल की जगमगाती रोशनियाँ और चहल-पहल साफ़ नज़र आने लगी थी। रात के 9 बज चुके थे, लेकिन नैनीताल में इस वक़्त पर्यटक सड़कों पर घूमते ही हैं।
उन रोशनियों को देखते ही कामिनी के सुलगते हुए दिमाग़ में अचानक एक ख़ौफ़ की लहर दौड़ गई।
'हे भगवान! इस शराबी को इस तरह बेहोशी की हालत में मैं सीढ़ियों से कैसे ऊपर ले जाऊँगी? रिसेप्शन पर खड़े लोग क्या सोचेंगे? इन दोनों को साथ ले गई फिर क्या होगा इनकी शक्ल देख कर अगर किसी ने पुलिस बुला ली तो?'
"ऑटो रोको!" कामिनी के मुँह से हड़बड़ाहट में निकला।
शंकर ने तुरंत ब्रेक मार दिए। "क्या हुआ मैडम?"
"वहाँ... वहाँ बहुत भीड़ है। मैं इन्हें इस हालत में अंदर कैसे ले जाऊँगी? लोग तमाशा बना देंगे," कामिनी की आवाज़ में एक असली डर था, जो एक इज्ज़तदार औरत के अंदर होता है।
आगे बैठे शंकर की आँखों में एक बेहद शातिर और खूँखार चमक आ गई। उसने शीशे में पीछे बैठे जमील को देखा, जमील ने अपनी पान खायी बत्तीसी दिखाते हुए आँखों ही आँखों में कोई शैतानी इशारा किया।
"मैडम, आप घबराइए मत। बात तो आप बिल्कुल सही कह रही हैं। मै खुद साब को छोड़ कर आता आपके कमरे मे लेकिन मै थोड़ा बदनाम हूँ इस इलाके मे, कहीं किसी ने पुलिस बुला ली तो लफड़ा हो जायेगा?
जमील ने कामिनी के डर को जिन्दा कर दिया.
कामिनी ने बेहोश रमेश को इस बार बहुत ही गंदी और नफरत भरी नजर से देखा, जैसे खुद को कोष रही हो.
"एक काम करते हैं... मैं ऑटो को यहाँ सड़क से नीचे जंगल वाली पगडंडी पर उतार देता हूँ। वहाँ एकदम सन्नाटा है। आधा घंटा ठंडी हवा लगेगी तो साब का नशा थोड़ा कम हो जाएगा। फिर आराम से अंदर ले चलेंगे।" शंकर ने कामिनी को गहन चिंतन मे देख सुझाव दिया.
कामिनी के पास सोचने का वक़्त नहीं था, इसका जलता जिस्म सोचने भी कहाँ दे रहा था, रमेश का सिर अभी भी उसकी गोद में लुढ़का हुआ था, और बगल में बैठा जमील उसके जिस्म की गर्मी को ऐसे महसूस कर रहा था जैसे कोई भूखा भेड़िया शिकार के पकने का इंतज़ार कर रहा हो।
"ठ-ठीक है... वहीं चलो," कामिनी ने हामी भर दी।
शंकर ने ऑटो का हैंडल घुमाया और मेन रोड से उतारकर उसे देवदार के घने पेड़ों के बीच जाती एक कच्ची, सुनसान पगडंडी पर डाल दिया। कुछ दूर जाने के बाद, जहाँ सड़क की कोई रोशनी नहीं पहुँच रही थी, शंकर ने ऑटो बंद कर दिया।
इंजन बंद होते ही वहाँ एक ऐसा जानलेवा और भारी सन्नाटा पसर गया, जिसमें सिर्फ़ रात के कीड़ों की आवाज़ और बर्फीली पहाड़ी हवाओं की सनसनाहट गूँज रही थी। ऊपर आसमान से चाँद की मद्धम पीली रोशनी देवदार के पत्तों से छनकर कामिनी के चेहरे पर पड़ रही थी।
"मैं ज़रा बाहर बीड़ी पी लेता हूँ," शंकर ने चालाकी से कहा और ऑटो से उतरकर थोड़ा दूर एक पेड़ के पास जाकर खड़ा हो गया। हालाँकि अँधेरे में उसकी नज़रें अभी भी ऑटो की पिछली सीट पर ही गड़ी हुई थीं।
अब उस तंग ऑटो में सिर्फ़ तीन लोग थे। एक बेहोश पति, एक हवस में सुलगती हुई बीवी, और एक खुरदरा, जंगली आशिक़।
बाहर की ठंडी हवा जैसे ही कामिनी के लाल साटन के ब्लाउज़ और साड़ी को छूकर निकली, उसके रोंगटे खड़े हो गए। लेकिन ये सिहरन ठंड की नहीं, बल्कि उस भयानक एड्रेनालाईन (Adrenaline) और हवस की थी जो अब पूरे उफ़ान पर थी।
जमील ने अपना वक़्त ज़ाया नहीं किया। सन्नाटा और अँधेरा पाकर उसका जंगलीपन पूरी तरह से आज़ाद हो गया।
उसने अपना भारी हाथ उठाया और सीधा कामिनी के काँपते हुए गोरे कंधे पर रख दिया।
"मोहतरमा... डरिए मत। जब तक जमील है, आपको कोई आँच नहीं आने देगा, जब तक साब का नशा उतरता है, तब तक आपकी सर्विस कर देता हुआ मै" जमील ने बड़ी ही बेशर्मी से अपनी बात कहीं...
कामिनी समझ चुकी थी क्या होना है, वो खुद रुकने के मूड मे नहीं थी.
उसका डर, उसके संस्कार सब जिस्म कि आग मे जल के भस्म हो चुके थे.
उसकी साँसें इतनी तेज़ चल रही थीं कि उसका गदराया हुआ सीना लाल ब्लाउज़ को फाड़कर बाहर आने को बेताब था। गोरे सुडोल पसीने से भीगे स्तन चांदनी रौशनी मे चमक रहे थे, जिसमे जमील बड़ी ही ललचाई नजरों से घूर रहा था.
जमील का खुरदरा हाथ कामिनी के कंधे से फिसलता हुआ उसकी नंगी पीठ पर चला गया। साड़ी के पल्लू को उसने बड़ी ही ढिठाई से नीचे खिसका दिया। कामिनी की गोरी, दूधिया पीठ अब चाँद की रोशनी में पूरी तरह से चमक रही थी। जमील की मोटी और सख़्त उँगलियाँ कामिनी की पीठ पर ऐसे रेंग रही थीं जैसे कोई साँप अपने शिकार को जकड़ रहा हो।
उउफ़्फ़्फ़... आह्ह्ह...
कामिनी ने अपनी आँखें बंद कर लीं और अपना सिर पीछे की तरफ़ ऑटो की सीट पर टिका दिया। जमील का हाथ उसकी पीठ से होता हुआ सीधा उसके लाल ब्लाउज़ की डोरी पर जा पहुँचा।
"इतने महँगे हुस्न को इस शराबी ने बीस साल से कैसे सँभाल रखा था? ये जिस्म तो राजाओं के लिए बना है," जमील ने कामिनी की सुराहीदार गर्दन पर अपना खुरदरा चेहरा रगड़ते हुए कहा। उसकी पान की बदबूदार लेकिन गर्म साँसें कामिनी की गर्दन को झुलसा रही थीं।
कामिनी का पूरा बदन कमान की तरह तन गया। एक तरफ़ उसका पति रमेश था, जो अभी भी नींद में कुछ बड़बड़ा रहा था, और दूसरी तरफ़ जमील उसके जिस्म के एक-एक पोर को अपनी जंगली मर्दानगी से नोच रहा था। इस 'पाप' का अहसास ही कामिनी के लिए सबसे बड़ा नशा बन गया था।
ऑटो के अँधेरे कोने में जमील की खुरदरी जीभ कामिनी की पसीने से भीगी, सुराहीदार गर्दन पर रेंग रही थी। उसके मुँह से आती पान और कच्ची शराब की गंध भी कामिनी को आज किसी नशीले इत्र की तरह लग रही थी।
"आअह्ह्ह..... ईसससस..."
कामिनी के काँपते होंठों से एक गहरी और मादक सिसकी फूट पड़ी। उसका गोरा, गदराया जिस्म वाक़ई उस भयंकर गर्मी और हवस की आग में मोम की तरह पिघल रहा था।
तभी बाहर सन्नाटे को चीरती हुई शंकर की शातिर आवाज़ कामिनी के कानों में पड़ी
"अरे यार जमील... मैडम को बाहर तो आने दे। देख, कितनी ठंडी हवा चल रही है, उन्हें खुले में बहुत अच्छा लगेगा..."
शंकर की आवाज़ सुनते ही जमील ने अपनी जीभ कामिनी की गर्दन से हटाई, कामिनी भी सकपका गई उसे अपनी स्थति का आभास हुआ, उसका हाथ जमील के खड़े लंड को पाजामे के ऊपर से ही सहला रहा था, घिस रहा रहा, उसे अहसास ही नहीं हुआ कब उसके हाथ उस मजबूत लंड को पकड के सहला रहे थे, वो किसी सस्ती रंडी कि तरह बर्ताव कर रही थी.
आअह्ह्ह...... इसस्स.... जमील के हट ते ही उसके जिस्म को ठंडी हवा ने घेर लिया, पसीने से भीगा जिस्म एक बार को कांप गया.
तभी जमील बिल्कुल क़रीब आकर फुसफुसाया, "आइए मोहतरमा... शायद ऐसा हसीन नज़ारा आपने अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी नहीं देखा होगा।"
इतना कहकर जमील ने कामिनी का नाज़ुक, पसीने से भीगा हाथ पकड़ा और उसे हल्के से अपनी तरफ़, ऑटो से बाहर की ओर खींचा।
कामिनी किसी कठपुतली की तरह उस खुरदरे मर्द के इशारों पर चल रही थी। साड़ी का पल्लू अब उसके सीने पर नहीं था, वो पूरी तरह खिसक कर ऑटो के गंदे फर्श को चूम रहा था। लाल ब्लाउज में कसे हुए उसके भारी, दहकते हुए स्तन और गहरी क्लीवेज अब बिना किसी पर्दे के पूरी तरह से आज़ाद थे।
कामिनी पसीने से तर-बतर ऑटो से बाहर आई।
जैसे ही उसके पैरों ने ज़मीन को छुआ और नैनीताल की बर्फीली पहाड़ी हवा का पहला तेज़ झोंका उसके खुले, नंगे सीने और गोरी कमर से टकराया... कामिनी का पूरा जिस्म एक ज़बरदस्त मादक सिहरन से झनझना गया!
क्या अकल्पनीय और ख़ूबसूरत नज़ारा था वो!
वो एक पहाड़ी के सुनसान जंगल में खड़ी थी। आसमान से छनकर आती चाँद की दूधिया रोशनी ने उसके गोरे जिस्म को ऐसे नहला दिया था, जैसे वो कोई देवी या अप्सरा हो। ठीक सामने, दूर नीचे नैनी झील का शांत पानी और उसके आस-पास जगमगाती शहर की रोशनियाँ सितारों की तरह चमक रही थीं। पूरा नैनीताल उसके कदमों में बिछा नज़र आ रहा था।
कामिनी की उत्तेजना इस नज़ारे को देखकर पूरी तरह बेकाबू हो गई। बाहर की सर्द और कंपा देने वाली हवा जैसे कामिनी के जिस्म की आग के आगे अपनी सारी ठंडक खो चुकी थी। उसे ठंड का कोई अहसास ही नहीं हो रहा था। उसका जिस्म बुरी तरह जल रहा था, हवस से, 'नीली दवा' के नशे से, और सबसे बढ़कर... अपने पति रमेश के प्रति एक भयंकर नफ़रत से।
'बीस साल... बीस साल में उस इंसान ने मुझे कभी ख़ुशी का एक पल नहीं दिया,' कामिनी का दिमाग़ चीख रहा था।
जो रोमांटिक दृश्य, जो ख़ूबसूरत पल उसे आज रात अपने पति की बाँहों में देखने चाहिए थे... वो आज उसे दो अनजान, सड़कछाप मर्द दिखा रहे थे! और उसका पति? वो उसी ऑटो में चंद क़दमों की दूरी पर, एक सडक छाप बेवड़े की तरह शराब के नशे में मुँह बाए बेहोश पड़ा था,
इस ख़याल ने कामिनी के अंदर की रही-सही लज्जा, शर्म और 'संस्कारी' होने के ढोंग को हमेशा के लिए जलाकर राख कर दिया।
कामिनी ने एक गहरी साँस ली, जिससे उसका सीना और भी ज़्यादा फूल कर तन गया। उसने चाँद की दूधिया रोशनी में अपने खुले हुए यौवन को छिपाने की कोई कोशिश नहीं की, बल्कि उसने अपने सीने को थोड़ा और आगे की तरफ़ तान दिया। वो जानती थी कि उसके ठीक सामने खड़े जमील और पास में बीड़ी पी रहे शंकर की भूखी नज़रें उसके जिस्म को नोच रही हैं। लेकिन आज उसे छुपना नहीं था, वो अपनी जवानी जीना चाहती थी, अपना यौवन दिखाना चाहती थी।
हुआ भी वही जमील और शंकर उस हुस्न कि देवी को एक टक निहारते रहे, उनके लंड सम्मान मे सलामी दे रहे थे.
नजरों से इस खूबसूरती को पी रहे थे, वाह रे ऊपर वाले कि लीला... जमील ने जो दुआ मांगी वो इतनी जल्दी कबूल हो गई थी.
कामिनी एकटक उस सुंदर नज़ारे को देख रही थी। चाँद की दूधिया रोशनी में नैनी झील और नीचे बिखरी रोशनियाँ किसी सपने जैसी लग रही थीं। लेकिन उसके शरीर के अंदर जो आग जल रही थी, वो किसी सपने से कहीं ज्यादा असली थी।
“कैसा लग रहा है मोहतरमा…”
जमील की भारी, गंदी आवाज़ उसके कानों में गूँजी। कामिनी को अहसास हुआ कि ठीक उसकी कमर के पीछे वो खड़ा है। उसकी पैंट के अंदर का मोटा, सख्त उभार सीधे उसकी गांड की दरार पर दबाव बना रहा था। साड़ी के पतले कपड़े के आर-पार वो चुभन साफ महसूस हो रही थी।
“अ… आअह्ह्ह… इसस्स… अच्छा है…” कामिनी के मुँह से सिर्फ इतना ही निकल पाया। उसकी आँखें अपने आप बंद हो गईं।
जमील ने अपनी कमर और आगे दबाया । उसका लंड कामिनी की भारी गांड पर रगड़ खाते हुए ऊपर-नीचे सरकने लगा। उसी समय उसकी खुरदरी उँगलियाँ कामिनी की पतली कमर पर फैल गईं और उसकी गर्म साँसें कामिनी के नंगे कंधे पर पड़ने लगीं।
जमील ने जीभ निकाली और कामिनी की गर्दन से लेकर कंधे तक एक लंबी, गीली लकीर खींच दी।
पान कि पिक से साना थूक कामिनी के जिस्म को रंगने लगा, हवस कि चित्रकारी उभरने लगी थी.
“आअह्ह्ह… इस्स्स्स…” कामिनी की सिसकी निकली, लेकिन वो एक इंच भी नहीं हिली। उल्टे उसने अपनी कमर को थोड़ा और पीछे धकेल दिया, जैसे वो खुद उस दबाव को और गहराई से महसूस करना चाहती हो।
थोड़ी दूर पर शंकर बीड़ी के आखिरी कश लेते हुए ये नज़ारा देख रहा था। उसकी आँखें फटी हुई थीं। पैंट के अंदर उसका अपना उभार पहले ही तन चुका था।
अब कामिनी की पूरी पीठ नंगी थी। चाँद की रोशनी में उसकी दूधिया त्वचा चमक रही थी। ब्लाउज़ का गहरा कट और उसके नीचे की पतली ब्रा की डोरियाँ साफ दिख रही थीं।
जमील ने दोनों हाथों से कामिनी की कमर को जकड़ा और अपना मुँह उसकी गर्दन की नस पर लगा दिया। दाँत हल्के से दबाए, जीभ से चाटा।
कामिनी का सिर पीछे की ओर झुक गया। उसके होंठ खुले हुए थे, साँसें तेज चल रही थीं। जमील के हाथ आगे बढ़े और उन्होंने साड़ी के उस हिस्से को पकड़ लिया जो कमर पर बँधा हुआ था।
एक हल्के से झटके के साथ उसने गाँठ खोल दी।
सरररर…
लाल साटन की साड़ी कामिनी के शरीर से फिसलती हुई नीचे की ओर सरकने लगी। पहले कमर, फिर जाँघें, फिर घुटने… और आखिरकार वो कपड़ा उसके पैरों के पास एक ढेर बनकर गिर गया।
अब कामिनी सिर्फ लाल ब्लाउज़ और पेटीकोट में खड़ी थी। लेकिन पेटीकोट भी जमील के हाथों से ज्यादा देर तक नहीं बचा। उसने दोनों तरफ से कमर की इलास्टिक पकड़ी और एक ही झटके में उसे नीचे खींच लिया।
पेटीकोट भी साड़ी के साथ जमीन पर जा गिरा।
कामिनी अब चाँदनी रात में, घने जंगल के बीच, सिर्फ एक छोटे से लाल-काले ब्रा और उस पतली थॉन्ग में खड़ी थी।
जमील और शंकर दोनों की साँसें एक साथ अटक गईं।
कामिनी की भारी, गोरी गांड पूरी तरह नंगी थी। थॉन्ग की काली डोरी उसकी गहरी दरार में समाई हुई थी, और दोनों गोल माँस के हिस्से चाँद की रोशनी में ऐसे चमक रहे थे जैसे कोई मूर्तिकार ने गढ़े हों। आगे की तरफ छोटा सा जालीदार कपड़ा उसकी फूली हुई चुत को मुश्किल से ढक पा रहा था। ऊपर उसके कड़क निप्पल ब्लाउज मे साफ नजर आ रहे थे।
जमील का मुँह खुला का खुला रह गया। शंकर की बीड़ी उँगलियों से छूटकर जमीन पर गिर गई।
कामिनी ने आँखें खोलीं। उसने अपनी छाती नीचे झुकाकर देखा।
उसे अहसास ही नहीं हुआ था कि उसकी साड़ी और पेटीकोट कब उतार दिए गए। ठंडी पहाड़ी हवा जब उसके अंदरूनी हिस्से से टकराई तो जैसे अचानक होश आया।
लेकिन उसने अपने जिस्म को छिपाने की कोई कोशिश नहीं की।
ना हाथ आगे किए, ना जाँघें भींचीं। बस खड़ी रही।
ना जाने इतनी हिम्मत कहाँ से आ गई थी उसमें।
शायद हर औरत के अंदर ऐसी ही कोई औरत सोई होती है… बस हिम्मत की कमी होती है। लेकिन आज कामिनी में हिम्मत भी थी, और जिस्म में वो गर्मी भी जो किसी भी मर्द को पिघला दे।
“भेनचोद… शंकर, ये देख… ऐसा माल देखा है कभी तूने?”
जमील की आवाज भारी और काँपती हुई थी। उसने पान की पीक गले में उतारी। गला पूरी तरह सूख चुका था।
कामिनी खुद को “माल” कहे जाने से सिहर उठी।
एक पल के लिए उसके अंदर कुछ टूटा। वो अब सिर्फ औरत नहीं रह गई थी। वो “भरा हुआ, पका हुआ माल” बन चुकी थी। और इस बात ने उसके जिस्म में एक अजीब सी, गंदी लेकिन मीठी गर्मी को और बढ़ा दीया.
शंकर, जो अभी तक थोड़ा दूर खड़ा बीड़ी के आखिरी टुकड़े को कुचल रहा था, कामिनी की इस खामोशी से हिम्मत पा गया।
वो धीरे-धीरे, जैसे कोई सपना देखता हुआ, पास आने लगा। उसके कदम भारी थे। आँखें कामिनी के जिस्म पर चिपकी हुई थीं,
जमील ने पीछे से कामिनी की कमर में दोनों हाथ डाल दिए।
उसकी खुरदरी हथेलियाँ कामिनी की नंगी कमर पर फैल गईं। उसने अपना सख्त उभार फिर से उसकी गांड की दरार में दबा दिया।
“आअह्ह्ह...मोहतरमा… क्या गरम जिस्म है, आज जन्नत नसीब हुई मुझे” उसने कान के पास साँस छोड़ते हुए कहा।
शंकर अब बिल्कुल सामने आ चुका था।
उसकी साँसें तेज चल रही थीं। उसने एक हाथ बढ़ाया, फिर रोका, फिर हिम्मत करके कामिनी के बाएँ स्तन के पास लाया। उँगलियाँ काँप रही थीं।
कामिनी ने उसकी तरफ देखा।
आँखों में न मनाही थी, न शर्म। बस एक गहरी, गीली प्यास।
शंकर की उँगलियाँ जब ब्लाउज के ऊपर से उसके स्तन को छूईं, तो कामिनी की साँस अटक गई।
“आह्ह…”
जमील की दोनों हथेलियाँ कामिनी की नंगी कमर से सरकती हुई ऊपर को आई और सीधे ब्लाउज के निचले हिस्से को पकड़ लिया।
एक हल्के से झटके में उसने हुक खोल दिए।
सररर…
ब्लाउज कामिनी के कंधों से फिसलता हुआ निकल गया,
कामिनी रात मे सुनसान जंगल मे दो अनजान मर्दो के बीच सिर्फ पतली बेहद छोडी चड्डी ब्रा मे खड़ी थी, उसका जिस्म गर्मी और शर्म से लाल हो चूका था.
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चाँदनी रात और देवदार के पेड़ों की लंबी परछाइयों के बीच, कामिनी दोनों अनजान दरिंदों के सामने महज़ एक नाममात्र की जालीदार ब्रा और थॉन्ग में खड़ी थी। वो कपड़े क्या थे, बस उसके गोरे, दहकते जिस्म पर लज्जा का एक ढोंग भर थे, जो अब पूरी तरह से बेमानी हो चुका था।
जमील अपनी जगह से थोड़ा पीछे हटा, उसकी आँखें कामिनी के एक-एक उभार को ऐसे गटक रही थीं जैसे कोई भूखा भेड़िया अपने शिकार को चीरने से पहले देखता है। उसने कामिनी के आगे खड़े शंकर इशारा कर हवस से भरी, काँपती आवाज़ में फुसफुसाया,
"अबे शंकर... देख तो साली को! क्या पहन रखा है इसने... बदन पर कपड़ा है या जिस्म दिखाने का जुगाड़?"
शंकर, जो ठीक कामिनी के सामने बुत बना खड़ा था, जमील की बात सुनकर जैसे अपनी सुधि खो बैठा। उसने बिना एक पल गँवाए अपना एक खुरदरा, मैला हाथ आगे बढ़ाया और सीधे कामिनी के भारी, मटके की तरह उभरे हुए स्तनों पर रखकर पूरी ताकत से भींच दिया।
"आआह्ह्... धीरे..." कामिनी के होंठों से एक दर्द और हवस में डूबी हुई सिसकी फिसल गई। उसके जिस्म को अंदर से ठीक इसी बेरहम छुअन की प्यास थी। कोई उसके इन भरे-पूरे, भारी स्तनों को मसले, उन्हें अपनी मुट्ठी में कैद कर ले, उत्तेजना हवस की आग उसके रोम-रोम में धधक रही थी। शंकर की उँगलियों का खुरदरा दबाव उसके नाज़ुक जिस्म पर किसी मरहम की तरह नहीं, बल्कि एक उत्तेजक चिंगारी बनकर गिरा था।
जमील से अपनी जगह रुका नहीं गया। वो लपककर कामिनी के और करीब आया। उसने अपनी एक गंदी, मैली उँगली कामिनी की कमर मे धसी हुई पतली सी थॉन्ग की डोरी (String) में फँसा ली और उसे हल्का सा खींचते हुए तंज कसा,
"अबे शंकर कभी तूने अपनी बीवी को ऐसी चड्डी पहने देखा है?"
कामिनी का वजूद एक पल के लिए काँप उठा। उसके मन के किसी कोने में शर्म की एक हल्की सी लहर दौड़ी, दो सड़कछाप, मैले-कुचैले अजनबी उसके हुस्न की इस तरह सरेआम गंदी और नीच तारीफ कर रहे थे, और उसका अपना पति रमेश चंद कदमों की दूरी पर ऑटो में किसी मुर्दे की तरह मुँह बाए बेहोश पड़ा था। लेकिन वो शर्म महज़ एक पल का वहम थी; असली सच तो यह था कि इस खुले अपमान और पराई मर्दानगी के अहसास ने उसकी हवस को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया था।
"नहीं बे ये तो अमीर औरतों के शौक है, छुपाना भी होता है और दिखाना भी, क्यों मैडम? " शंकर ने दूसरा हाथ भी कामिनी के दूसरे स्तन पर भींच दिया.
"आअह्ह्ह.... हाँ... हाँ.... दबाओ " कामिनी फुसफुसाई, वो बेबस नहीं थी वो खुले डील से स्वागत कर रही थी इन मैली कुचली हथेलियों का.
उसकी आँखें पूरी तरह से खुली थीं और सीधे शंकर के चेहरे पर टिकी थीं, जो अभी भी उसके स्तनों बेरहमी से मसल रहा था, कुचल रहा था। शंकर की हर एक हरकत पर कामिनी का दहकता हुआ जिस्म लहरें खा रहा था, उसका हर एक पोर उत्तेजना से काँप रहा था।
और ठीक उसके पीछे खड़ा जमील अपनी भूखी, लालची और हवस से अंधी हुई आँखों से कामिनी की गोरी, मांसल और भारी गांड को एकटक निहारे जा रहा था। उसकी नज़रें इतनी भूखी थीं कि ऐसा लग रहा था मानो वो अभी के अभी इस चलते-फिरते यौवन को अपनी आँखों से ही खा जाएगा।
"इस्स्स... आआह्ह्..."
चाँदनी रात का बर्फीला सन्नाटा अब कामिनी की भारी साँसों और जिस्मों के टकराने की आवाज़ों से गूँजने लगा। ठंडी हवाओं के बीच कामिनी का सुलगता हुआ बदन अब पूरी तरह से दो अनजान और खुरदरे मर्दों की हवस के साये में पिघल रहा था।
सामने खड़ा शंकर जंगली जानवर की तरह कामिनी के भारी स्तनों पर टूट पड़ा। उसने अपने दोनों खुरदरे, मैले हाथों से कामिनी के गोरे, गदराए हुए सीने को अपनी मुट्ठियों में जकड़ लिया। वो उसके स्तनों को इतनी बेरहमी और हवस से मसल रहा था जैसे किसी गुँधे हुए आटे को रौंद रहा हो। उसकी खुरदरी हथेलियों की रगड़ कामिनी के नाज़ुक, कड़क निप्पल्स पर एक ऐसी जानलेवा और नशीली आग पैदा कर रही थी कि कामिनी का पूरा जिस्म लहरों की तरह काँप रहा था।
"आआह्ह्... उफ़्फ़्फ़... और... और ज़ोर से..." कामिनी के होंठों से बेसर्म सिसकियाँ फूट रही थीं। वो शंकर को उकसा रही थी, बेशर्मी से अपने स्तनो को आगे धकेल कर दबवा रही थी,
वहीं पीछे खड़ा जमील भी कहाँ पीछे रहने वाला था!
उसने कामिनी की भारी, गोल और मांसल गांड पर अपने दोनों सख़्त हाथ जमा दिए। अपनी मोटी उँगलियों से उसकी गांड के दोनों हिस्सों को बुरी तरह नोच और मसल रहा था। जमील हवस में इतना पागल हो चुका था कि वो बार-बार कामिनी की भारी गांड को पूरी ताकत से बाहर की तरफ फैलाता, उसकी गहरी गुलाबी दरार को चाँद की रोशनी में निहारता, और फिर झटके से छोड़ देता।
चटाक... चटाक... थप्प...
गांड के गोरे और भारी मांस के आपस में टकराने की मादक, अश्लील आवाज़ सन्नाटे भरे देवदार के जंगल में गूँजने लगी थी। हर झटके और थप्पड़ के साथ कामिनी के मुँह से एक कामुक चीख निकल जाती।
आअह्ह्ह.... आउच.... इस्स्स... आराम से....
कामिनी की जाँघों के बीच अब हवस की भयानक बाढ़ आ चुकी थी। उसकी चूत कामरस से इस कदर भीग चुकी थी कि दोनों जाँघों के बीच से नमी रिसकर नीचे घुटनो तक आ रही थी। शंकर और जमील की उँगलियों की हर हरकत के साथ नीचे से हल्की-हल्की 'पच-पच' की चिपचिपी आवाज़ साफ़ सुनी जा सकती थी।
कामिनी खुद अपनी चुत और गांड के छेड़ को पूरी ताकत से सिकोड लेती, फिर स्तन पर होते प्रहार के साथ वापस ढीला छिड़ देती.
कामिनी पूरी तरह से मदहोश और बेकाबू थी। उसके अंदर की 'संस्कारी घरेलू औरत' हमेशा के लिए मर चुकी थी और उसकी जगह एक ऐसी भूखी, जंगली औरत ने ले ली थी, जिसे अब सिर्फ और सिर्फ अपनी आग बुझानी थी।
वो कभी आगे की तरफ झुककर शंकर के बालों को अपनी मुट्ठियों में जकड़ लेती और उसे अपने सुलगते सीने की तरफ ज़ोर से खींचती, तो कभी अपने हाथों को पीछे ले जाकर जमील के पसीने से भीगे पाजामे के ऊपर से उसके कड़क, तने हुए उभार को सहलाती। वो पागलपन में जमील के कूल्हों को पकड़कर उसे अपनी गांड की दरार में और गहराई तक धँसाने की कोशिश कर रही थी।
'नीली दवा' और बीस साल की अतृप्त प्यास ने कामिनी का दिमाग़ सुन्न कर दिया था। इस वक़्त उसका जिस्म सिर्फ एक ही चीज़ के लिए कुलबुला रहा था—एक सख़्त, मर्दाना औज़ार!
उसे किसी भी कीमत पर एक मर्द का वो अंग अपने अंदर चाहिए था, जो उसकी चूत में लगी इस भयंकर आग को बुझा सके, जो उसे चीरकर उसे एक मुकम्मल औरत होने का अहसास दिला सके।
कामिनी की मनोदशा इस वक़्त उस मुकाम पर पहुँच चुकी थी जहाँ शर्म, इज़्ज़त या दुनिया का कोई खौफ़ नहीं बचा था। इस पल अगर ये दोनों सड़कछाप मर्द उसे किसी भरी हुई, भीड़-भाड़ वाली सड़क के बीचों-बीच भी लिटाकर अपनी हवस का शिकार बनाते, तो भी कामिनी एक शब्द नहीं बोलती। बल्कि वो बेशर्मी से अपनी टाँगें उनके लिए खुद-ब-खुद पसार देती। उसका वजूद सिर्फ जिस्मानी भूख तक सिमट गया था।
पीछे ऑटो में बेहोश पड़ा उसका पति रमेश, जिसने उसे इस दलदल में धकेला था, अब कामिनी के लिए किसी नाली के कीड़े से ज्यादा अहमियत नहीं रखता था। उसे बस चुदना था, बेरहमी से, जंगलीपन से और पूरी आज़ादी से।
"डालो... उफ़्फ़... डालो ना अंदर..." कामिनी हड़बड़ाहट और चरम उत्तेजना में बड़बड़ाई, उसकी आँखें हवस के नशे में पूरी तरह पलट चुकी थीं।
"आअह्ह्हम्म... डालो ना अंदर..." कामिनी ने अपनी भारी गांड को पीछे की तरफ जमील के और करीब सरकाते हुए कहा, जैसे उसके जीवन की यही एक आखिरी इच्छा बची हो।
"इतनी जल्दी कैसे मोहतरमा? अभी तो सिर्फ इस हुस्न को देखा ही है... ऐसी शहरी और महकती औरत फिर कहाँ मिलेगी हमारी किस्मत में?" जमील के मुँह से एक कामुक और जंगली फुसफुसाहट निकली।
अगले ही पल... सससससरररर... जमील ने एक ही झटके में कामिनी की कमर पर टिकी पतली सी जालीदार थॉन्ग को खींचकर उसके पैरों में फेंक दिया।
"आअह्ह्ह..." कामिनी की नंगी, भारी गांड ठंडी हवा के स्पर्श और इस बेशर्म आज़ादी से बुरी तरह थरथरा उठी।
शनिफ्फ्फ्फफ्फ्फ़... शनिफ्फ्फ्फफ्फ्फ़...
जमील ने अपना खुरदरा चेहरा सीधा कामिनी की गोरी, मांसल गांड की गहरी दरार के बीच घुसेड़ दिया और किसी भूखे जानवर की तरह ज़ोर-ज़ोर से उसकी महक को अपनी साँसों में खींचने लगा।
"आअह्ह्ह... उफ़्फ़... क्या खुशबू है... अभी इस जन्नत के रस को चख तो लूँ, आज से पहले ऐसी चुत चखी ही नहीं।"
कामिनी अपनी इस तारीफ से गदगद हो उठी, उसकी चुत कि तारीफ मतलब उसकी तारीफ, कामिनी के घुटने काँपने लगे। जमील की खुरदरी, गर्म और लसलसी ज़बान उसकी गांड की दरार में किसी साँप की तरह रेंगने लगी थी।
उस मैले, पान चबाने वाले मुँह की ज़बान जब उसकी संवेदनशील त्वचा और पिछले हिस्से के सुराख़ को सहलाते हुए चाटने लगी, तो एक अजीब सा कसैला, कामुक और जंगली स्वाद जमील के हलक में उतरने लगा। कामिनी का पूरा वजूद इस अकल्पनीय और अनजाने सुख से झनझना उठा।
वहीं सामने खड़ा शंकर भी इस नज़ारे और कामिनी के सुलगते जिस्म की गर्मी को देखकर खुद को रोक ना सका।
झटअकककक! सससरर....
उसने अपने मैले हाथों से कामिनी के सीने को ढकने वाली उस आख़िरी पतली जालीदार ब्रा को एक झटके में नोच कर दूर फेंक दिया।
"आअह्ह्ह... ईसससस..." कामिनी की एक और सिसकी देवदार के घने जंगल में गूँज गई। अब वो ठंडी, चाँदनी रात में पूरी तरह से निर्वस्त्र, बेपर्दा खड़ी थी। उसकी जाँघों के बीच से हवस का पानी पच-पच कर रिस रहा था, उसका रोम-रोम वासना की भयंकर गर्मी में जल रहा था।
शंकर के सामने जैसे जन्नत का खज़ाना खुल गया हो, कामिनी के भारी, दूधिया स्तन चरम उत्तेजना के कारण बिल्कुल कड़क होकर तन कर ऊपर की ओर उठ आए थे। उसके निप्पल ठंड और हवस के मारे किसी अंगूर की तरह सख्त होकर बाहर को तन गए थे।
शंकर से अब एक पल भी सब्र नहीं हुआ। सुड़प... लप.. लप... सुड़प.... उसने अपना मुँह कामिनी के एक भारी स्तन पर गड़ा दिया। उसकी गंदी, बीड़ी की बदबू से सनी हुई खुरदरी ज़बान कामिनी के नाज़ुक निप्पल पर पागलों की तरह चलने लगी।
"आआह्ह्ह... ईससससस... सससई... मार डाला... आह्हः... आउच..." कामिनी का दिमाग़ सुन्न पड़ गया, दर्द, हवस और एक अजीब सी कच्ची गंदी बदबू उसे पागल कर रही थी।
"आअह्ह्ह...... और जोर से"शंकर ने उसके निप्पल को अपने दाँतों के बीच लेकर हल्का सा काटा और निप्पल को मुँह मे भर कर चूसने लगा,
कामिनी जोरदार रूप से चीख पड़ी, वो आज आवाज़ थी चिल्लाने के लिए, चीखने के लिए, चुदने के लिए, भला दुनिया मे ऐसी कौन औरत नहीं होंगी जो इस तरह से ना चुदना चाहती हो.
उसके दोनों हाथ अपने आप आगे बढ़े और शंकर के रूखे बालों में फँस गए, उसे अपने सीने में और गहराई तक दबाने लगे, जैसे वो चाहती हो कि शंकर उसके स्तनों को चूस-चूस कर खा जाए। आम कि तरह चूस चूस कर उसका सारा गुदा, सारा रस खा जाये.
वहीं पीछे, कामिनी अपने पंजों के बल खड़ी होने पर मजबूर हो गई, उसने अपनी गोरी, मांसल जाँघों को जितना हो सके उतना चौड़ा कर लिया था ताकि जमील को पूरा रास्ता मिल सके।
उसका दूसरा हाथ पीछे जाकर जमील के सिर को अपनी गांड की दरार में और ज़ोर से धकेल रहा था। जमील की ज़बान अब पूरी बेख़ौफ़ होकर कामिनी की गांड के सुराख़ को चूस रही थी, उसे अपनी थूक और चाट से गीला कर रही थी।
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चाँदनी की वह सर्द रात अब पूरी तरह से हवस की धधकती भट्टी में बदल चुकी थी। देवदार के घने पेड़ों के बीच सन्नाटा इतना गहरा था कि सिर्फ कामिनी की भारी, काँपती साँसें और दोनों मर्दों के गले से निकलती भूखी साँसें ही गूँज रही थीं। कामिनी का रोम-रोम एक ऐसी अज्ञात, वर्जित आग में जल रहा था जिसे बुझाने के लिए वह अब किसी भी हद तक जाने को तैयार थी। शर्म, मर्यादा, बीस साल की शादी—सब कुछ राख हो चुका था।
शंकर अभी भी उसके सामने खड़ा था। उसकी खुरदरी, मैली उँगलियाँ कामिनी के भारी, दूधिया स्तनों को मसल रही थीं। निप्पल इतने कड़क हो चुके थे कि शंकर उन्हें अपनी उँगलियों के बीच दबा-दबाकर घुमाता, फिर अचानक मुँह से झपटकर एक को मुँह में भर लेता और जोर से चूसने लगता। उसकी बीड़ी और पान की मिली-जुली गंदगी भरी साँसें कामिनी के स्तनों पर पड़ रही थीं। कामिनी कि छाती अपने आप आगे झुक जाती। वह शंकर के बालों में उँगलियाँ फँसाकर उसे और जोर से अपने सीने से चिपका लेती।
“आआह्ह्ह… और… और जोर से चूसो… … काट लो…” कामिनी की आवाज़ टूट-टूटकर निकल रही थी। उसकी आँखें आधी बंद थीं, होंठ खुले हुए, लार की एक पतली लकीर मुँह के कोने से बह निकली थी।
पीछे जमील अभी भी घुटनों के बल बैठा था। उसने कामिनी की गोरी, मांसल गाँड के दोनों गोल हिस्सों को अपनी मोटी हथेलियों से फैला रखा था। चाँद की दूधिया रोशनी में उसकी गुलाबी, सिकुड़ी हुई गांड की दरार और उसके ठीक नीचे चुत कि फाँको से लगातार रिसता हुआ गाढ़ा, चमकदार कामरस साफ दिख रहा था।
जमील ने एक पल इस अमृत कुंड को देखा, और अपना पूरा मुँह फिर से उस गहरी दरार में धकेल दिया। उसकी खुरदरी, पान से लाल जीभ ने एक लंबी, गीली लकीर खींची, गांड के सुराख से लेकर कामिनी की पूरी तरह भीगी हुई, फूली हुई चुत तक।
“शनिफ्फ्फ… क्या कैसेली खुशबू है साली की… इतनी गरम है कि मादरचोद जीभ जल रही है” जमील ने गहरी साँस लेकर उसकी महक को अंदर खींचा और फिर जीभ को कामिनी की चुत के बीचोंबीच घुसा दिया। उसने दोनों होठों से उसके फूले हुए माँस को चूसना शुरू कर दिया। पच… पच… पच… की चिपचिपी आवाज़ सन्नाटे में गूँजने लगी।
कामिनी का शरीर झटके से तन गया।
“आआआह्ह्ह्ह… ईसससस… जीभ… जीभ और अंदर… डालो,.. आअह्ह्ह.... अंदर तक चाटो,... इस्स्स... चाटो मेरी चुत को... पी जाओ पूरा....” उसकी आवाज़ में अब सिर्फ गुहार थी। उसने अपनी जाँघें और चौड़ी कर दीं।
घुटने काँप रहे थे। जमील की जीभ जब उसके भीगे हुए छेद के अंदर घुसकर घूमने लगी तो कामिनी की दोनों मुट्ठियाँ भींच गईं।
लेकिन जैसे जमील को फर्क ही नहीं पड़ रहा था, वो तो जन्नत के दरवाजे पर ही दस्तक देने मे मस्त था, कामिनी कि चुत को सहला रहा था, चाट रहा था, धीरे-धीरे, गहराई से, जैसे चुतरस का एक-एक कतरा चाटना चाहता हो।
पलललज़्ज़ज़.... अब्बा.... अब.... और नहीं... आअह्ह्ह.... डाल दो अंदर आअहह्म्म. मै मर जाउंगी... आअह्ह्ह....
कामिनी चित्कार उठी, मिन्नतें करने लगी.
कामिनी की आवाज़ में एक ऐसी कातर और मदहोश कर देने वाली गुहार थी, जिसे सुनकर किसी भी पत्थर दिल इंसान का भी ईमान डोल जाए। उसकी जाँघें काँप रही थीं, और शरीर की हर एक नस उस अंतिम और चरम प्रहार के लिए चीख रही थी।
कामिनी की इस बेकरारी और उसकी देह से छलकते कामरस को देखकर जमील के भीतर का जानवर पूरी तरह से आज़ाद हो गया। उसने अपनी जीभ कामिनी की गांड से हटाई और एक गहरी, भूखी साँस लेते हुए पीछे हटा।
चाँद की दूधिया रोशनी में उसने अपने मैले पाजामे के नाड़े पर हाथ रखा और एक ही झटके में उसे नीचे सरका दिया। उसकी सख़्त और बेकाबू नसो से भरा मोटा लंड बर्फीली हवा में पूरी तरह से आज़ाद थी और सामने जन्नत के दरवाजे में समाने के लिए तड़प रहा था.
उधर शंकर ने भी भारी मन से अपने होंठ कामिनी के सुलगते सीने से हटाए। उसकी आँखें वासना से लाल हो चुकी थीं और साँसें धौंकनी की तरह चल रही थीं। "तेरी प्यास आज मैं बुझाऊँगा मेरी रानी..." बुदबुदाते हुए शंकर ने भी बिना कोई समय गँवाए अपनी पैंट की बेल्ट खोल दी और अपने सुलगते हुए लंड को बाहर निकाल लिया।
अँधेरे मे दोनों के लंड के रंग रूप का कामिनी को कोई अंदाजा नहीं था.
कामिनी दोनों के बीच खड़ी थी, पूर्णतः निर्वस्त्र, बेकाबू और वासना में डूबी हुई। उसने अपने दोनों हाथ पीछे की ओर किए और टटोलते हुए जमील के सख़्त लंड को अपनी मुट्ठी में जकड़ लिया। उस खुरदरे, तपे हुए और विशाल स्पर्श ने कामिनी के भीतर एक मीठी बिजली सी दौड़ा दी।
उसे अहसास हुआ ये कोई मामूली चीज नहीं है, जमील का लंड कामिनी कि हथेली मे फुला नहीं समा रहा था, उसने जमील को अपनी ओर खींचा और अपनी काँपती हुई देह के पिछले हिस्से ( गांड ) को उसके बिल्कुल करीब कर दिया।
"आ जाओ... डालो... मुझे चीर दो आज..." कामिनी की बंद आँखों से एक आँसू छलक पड़ा, जो दर्द का नहीं, बल्कि बीस साल के उस खोखलेपन के टूटने का था।
उसकी आजादी का था, खुल के अपनी जवानी जीने का था.
जमील ने कामिनी की चौड़ी और मांसल कमर को अपने दोनों कठोर हाथों से जकड़ा। कामिनी ने खुद ही अपनी टाँगों के बीच की दूरी को और बढ़ा दिया, जिससे उसकी भीगी हुई गहराइयाँ उस मर्दाने प्रहार का स्वागत करने के लिए पूरी तरह खुल गईं। जमील ने अपने लंड को सुलगती हुई गांड कि दरारा के मुहाने पर दिया, उसका लक्ष्य कुछ नहीं था, उसके और कामिनी का नसीब था थी लंड किस छेद मे जाता.
कामिनी के दोनों kamuk छेद उत्तेजना मे कुलबुला रहे थे,
जमील ने बिना देर किये एक जोरदार धक्का दिया...
जमील का मोटा लंड कामिनी कि गांड के छेद को रोंदता हुआ, चुत कि दरार से गुजरता हुआ सीधा चुत के दाने से टकरा गया.
आआआआहहहहहहह...... उउउफ्फ्फ.... आअह्ह्ह....
कामिनी बेतहासा काम उत्तेजना मे चीख उठी...
उसका दाना चुत से पूरा बहार लटक कर तना हुआ था.
"आआआआहहहहहहह......"
कामिनी की बेतहाशा, उन्मादी और चरम सुख की पुकार देवदार के सन्नाटे भरे जंगल को चीरती हुई दूर तक गूँज गई। वह चीख इतनी तीखी और मादक थी कि उसने ऑटो में पसरे मुर्दा जैसे रमेश के कान मे छाये सन्नाटे को भी एक ही झटके में तोड़ दिया।
"अ... आअह्ह्ह.... कक्क.. कहाँ हूँ मैं... सिर..."
अँधेरे में खड़ी ऑटो की पिछली सीट से रमेश की एक मरी हुई, लड़खड़ाती और भारी आवाज़ आई। यह आवाज़ किसी हथौड़े की तरह उन तीनों के कानों पर पड़ी।
कामिनी का पूरा जिस्म, जो अभी तक हवस की धधकती भट्टी में सुलग रहा था, अचानक जैसे बर्फ़ की सिल्ली में तब्दील हो गया। उसकी तो घिग्घी ही बँध गई। उसकी आँखें खौफ़ से फटी रह गईं। उसे ख़ुद भी अंदाज़ा नहीं था कि उत्तेजना के पागलपन में वह इतनी ज़ोर से चीख पड़ेगी।
"मरवा दिया बे आज इस औरत ने!" सामने खड़े शंकर के मुँह से हड़बड़ाहट और भयंकर खौफ़ में एक दबी हुई गाली निकली। उसकी साँसें फूल गईं। उसने पलक झपकते ही अपनी पैंट ऊपर खींची, बेल्ट को कसकर बाँधा और बदहवास सा भागता हुआ ऑटो की तरफ़ दौड़ पड़ा, ताकि रमेश को उठने से पहले सँभाल सके।
इधर कामिनी की मनोदशा एक भयंकर और उलझे हुए भँवर में फँस गई थी। उसका दिमाग़ ग़ुस्से, हताशा और एक अतृप्त वासना से बुरी तरह तड़प उठा। वह अपनी मंज़िल के बिल्कुल करीब थी! जमील का खुरदरा मोटा लंड बस उसे सुकून देने ही वाला था ... कि तभी उस शराबी ने सब कबाड़ा कर दिया।
उसका जिस्म अभी भी उसी तरह जल रहा था, और उसकी अधूरी प्यास उसे पागल कर रही थी। एक पल के लिए कामिनी के दिमाग़ में एक बेहद खौफ़नाक, बाग़ी और शैतानी ख़याल कौंधा—
'भाड़ में जाए सब! आज इस नशेड़ी के सामने ही अपनी आग बुझा लूँ? देखने दूँ इसे खुली आँखों से कि बीस साल तक इसने क्या खोया है और आज कोई और उसे कैसे पा रहा है!'
वह सच में इस हद तक पागल हो चुकी थी। लेकिन... नहीं। दिमाग़ के किसी गहरे, अँधेरे कोने में अभी भी वो बीस साल पुराने 'संस्कारों', इज़्ज़त और समाज के डर की एक महीन सी डोर बची हुई थी। वो बाग़ी ज़रूर हो गई थी, हवस में अंधी भी हो गई थी, लेकिन अपने ही पति की खुली आँखों के सामने सरेआम यह सब करने की जुर्रत अभी उसमें नहीं आई थी। कहीं ना कहीं वो 'घरेलू औरत' अभी भी उसके अंदर आख़िरी साँसें ले रही थी।
"मोहतरमा... जल्दी साड़ी पहनो। मैं देखता हूँ उसे।"
कामिनी के कुछ कहने या सोचने से पहले ही जमील ने बेहद फुर्ती से अपना पाजामा ऊपर चढ़ा लिया। उसका चेहरा तना हुआ था, लेकिन वो शंकर जितना घबराया हुआ नहीं था। वो एक पुराना खिलाड़ी था, जानता था कि ऐसे वक़्त में कैसे दिमाग़ ठंडा रखना है।
उधर ऑटो में रमेश अपनी भारी, लाल आँखें बार-बार खोल और बंद कर रहा था। शराबी लोगों की यही सबसे बड़ी मुसीबत और आफ़त होती है—कोई भरोसा नहीं होता कि वो कब मुर्दे की तरह नाली में पड़े रहें और कब अचानक भूत की तरह उठ खड़े हों। वो धुंधलाती नज़रों से अँधेरे में कुछ समझने की कोशिश कर रहा था। "कौन है बे... कहाँ हैं हम?" रमेश की ज़ुबान अभी भी बुरी तरह लड़खड़ा रही थी।
कामिनी का नशा अब पूरी तरह खौफ़ में बदल चुका था। उसने झटपट अपने काँपते हाथों से ज़मीन पर बिखरे अपने लाल ब्लाउज़, पेटीकोट और साड़ी को टटोला। साँसें अभी भी तेज़ चल रही थीं। उसने आधी-अधूरी और बदहवास हालत में उन कपड़ों को अपने बदन पर लपेटना शुरू कर दिया।
चाँदनी रात में उसका दहकता हुआ हुस्न, जो कुछ पलों पहले तक पूरी तरह आज़ाद और बेख़ौफ़ था, अब फिर से कपड़ों के पीछे छिपने की हड़बड़ाहट भरी जद्दोजहद कर रहा था। उसकी हवस की आग अभी बुझी नहीं थी, बल्कि वो एक अधूरी तड़प बनकर उसके सीने में और भी गहराई तक धँस गई थी।
ना जाने उन चंद पलों में शंकर और जमील ने क्या जुगाड़ बिठाया, लेकिन कामिनी जब साड़ी लपेट कर लड़खड़ाते कदमों से वापस ऑटो तक पहुँची, तो नज़ारा हैरान करने वाला था। रमेश ऑटो की सीट पर वापस टिका हुआ था, आँखें आधी खुली, आधी बंद... जैसे वो बस उसी का इंतज़ार कर रहा हो।
"आ... गई...? चलो... होटल चलते हैं," रमेश ने नशे में धुत्त, भारी और लड़खड़ाती आवाज़ में बुदबुदाते हुए खिसक कर कामिनी को जगह दी।
कामिनी बिना एक शब्द बोले, अपनी धड़कनों को काबू करते हुए बैठ गई। जमील भी ख़ामोशी से उसके बगल में आकर बैठ गया। लेकिन इस बार ऑटो में एक अजीब सा, घुटन भरा खौफ़नाक सन्नाटा था। किसी ने कोई बात नहीं की।
ऑटो का इंजन गरजा और वो उस सुनसान जंगल की पगडंडी से निकलकर वापस पक्की सड़क की ओर चल दिया।
और पीछे... उस सर्द, अँधेरे जंगल की ज़मीन पर छूट गई कामिनी की बग़ावत और कामवासना की वो निशानी। उसकी वो महँगी, लाल-काली जालीदार ब्रा और पैंटी अब देवदार के सूखे पत्तों के बीच मिट्टी में पड़ी थीं, जो उस अधूरी और सुलगती हुई रात की आख़िरी गवाह थीं।
Sorry दोस्तों मै बहुत ज्यादा लेट हो गया अपडेट देने मे.
इस महीने बहुत काम रहा ऑफिस का.
तो ज्यादा लिख नहीं पाया.
उम्मीद है आप पाठक समझेंगे.
अब अपडेट जल्दी ही दूंगा.

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