दूसरी तरफ़, शहर के व्यस्त और महँगे बाज़ार के बीचों-बीच, हरीश के होश पूरी तरह उड़े हुए थे। वो एक आलीशान लाँजरी (Lingerie) की दुकान के काउंटर पर खड़ा था और पसीने पोंछ रहा था।
"अबे ये क्या आफत बोल दी भाई ने! कौन सी लेनी है? कैसी लेनी है? साइज क्या है? कुछ बताया ही नहीं..." हरीश बड़बड़ाते हुए दुकान के अंदर घुस गया था।
"अरे भाई, वो दिखाना जरा !" हरीश ने थोड़ा सकपकाते हुए काँच के शोकेस की तरफ़ इशारा किया।
दुकानदार, जो किसी रहीसज़ादे की तरह तमीज़ से काउंटर पर खड़ा था, ने हरीश को ऊपर से नीचे तक घूरा उसकी ख़ाकी वर्दी और उसकी कम उम्र को देखकर उसे लगा कि कोई आवारा लड़का मुफ़्त में तमाशा देखने आ गया है।
"क्या दिखाना है?" दुकानदार ने थोड़ा अकड़ कर पूछा।
"बाहर टंगी तो हैं इतनी सारी..." हरीश ने बाहर स्टैंड पर टंगे हुए कुछ सैम्पल्स की तरफ़ इशारा किया।
"तू पहनेगा क्या?" दुकानदार ने व्यंग्य करते हुए एक भद्दा मज़ाक कर दिया।
दुकानदार की उस एक बात ने पलक झपकते ही हरीश के चेहरे से वो 'मासूम बच्चे' वाला भोलापन पूरी तरह गायब कर दिया। उसकी जगह चेहरे पर एक ऐसी खौफ़नाक और दहशतगर्दी आ गई, जिसे देखकर कोई भी काँप जाए।
"मादरचोद... तेरी बीवी के लिए चाहिए, चल दे अब"
हरीश के हाथ बिजली की तेज़ी से अपनी कमर के पीछे गए। 'खट!' की एक तीखी आवाज़ के साथ, उसके हाथ मे एक भारी-भरकम लोहे की चीज़ बाहर आ चुकी थी एक खतरनाक, चमचमाती हुई पिस्टल!
"साले, औकात में रहकर मज़ाक किया कर किसी से! ये दुकान आज रात भर में मिट्टी में मिल जाएगी, पता भी नहीं चलेगा!"
हरीश की दहाड़ इतनी खौफ़नाक और भारी थी कि दुकान में मौजूद हर एक सेल्समैन, कैशियर और वहाँ खड़े दूसरे ग्राहक... सबकी साँसें जैसे एक पल के लिए थम गईं।
"ससस... सॉरी भाई! ग़लती हो गई... मैं तो बस..." दुकानदार का रंग पीला पड़ गया, उसके होंठ काँपने लगे।
"क्या बस, भड़वे! अभी एक चड्डी के चक्कर में तुझे यमराज दिख जाता!" हरीश ने आसपास के सहमे हुए माहौल को देखकर खुद को थोड़ा शांत किया और पिस्टल वापस अपनी कमर में खिसका ली।
दुकानदार की सिट्टी-पिट्टी गुम हो चुकी थी। उसने तुरंत अपनी सेल्सगर्ल को आवाज़ दी, "ऐ... नेहा! सर जो माँग रहे हैं, वो तुरंत निकालकर दे!"
हालाँकि हरीश ने आज तक अपनी ज़िंदगी में कभी किसी पर गोली नहीं चलाई थी, लेकिन वो अच्छी तरह जानता था कि असली हथियार बंदूक नहीं उसका 'डर' होता है।
"आइए सर, आप इधर आइए..." एक काँपती हुई, मीठी सी आवाज़ तुरंत गूँजी। नेहा (सेल्सगर्ल) डरते हुए आगे आई।
हरीश उसके पीछे-पीछे हो लिया। उसके चेहरे पर एक सेकंड के भीतर वापस वही मासूमियत लौट आई थी, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
"बताइए सर, किसके लिए लेना है? गर्लफ्रेंड के लिए या वाइफ के लिए?" नेहा ने थोड़ा सहज होने की कोशिश करते हुए पूछा।
"अरे यार..." हरीश ने अपना सिर खुजाया। "गर्लफ्रेंड ही समझो..." उसने सुलेमान के नजरिये को ध्यान में रखकर जवाब दिया।
नेहा ने दो-चार छोटी-छोटी ब्रा और पैंटी काउंटर पर निकाल कर रख दीं।
उन्हें देखते ही हरीश के ज़ेहन में कामिनी का भारी-भरकम और गदराया हुआ जिस्म नाचने लगा।
"साला, इतनी छोटी चीज़ में कैसे आएगी उसकी?"
"नहीं... थोड़ी बड़ी दिखाओ," हरीश ने सिर हिलाते हुए कहा।
"कितनी बड़ी सर?" नेहा ने पूछा।
"अब कितनी क्या... इतनी बड़ी कि उसमें पूरी आ जाए!" हरीश ने अपनी दोनों हथेलियों को चौड़ा करके हवा में एक बड़े आकार का इशारा किया।
"हे-हे-हे... सर, आप पहली बार ले रहे हैं क्या?" नेहा उसकी मासूम और देहाती हरकत पर मुस्कुराए बिना नहीं रह सकी।
"हह... हाँ... ऐसा ही समझो," हरीश ने अपना कान खुजाया।
"आपकी गर्लफ्रेंड उम्र में बहुत बड़ी है क्या?" नेहा ने उत्सुकतावश पूछ लिया।
"हह... हाँ... है तो..."
"कितनी बड़ी...?"
"अब... ये तो कैसे बताऊँ... हाँ... 38-40 साल की तो होगी ही!"
"है...?" नेहा बुरी तरह चौंक गई। क्योंकि हरीश खुद महज़ 20-22 साल का एक नौजवान लड़का था। "मतलब आपसे दुगुनी उम्र की...?" नेहा के मुँह से बेसाख्ता निकल पड़ा।
"ससस... सॉरी सर! मैं समझी... मैं अभी कुछ और दिखाती हूँ!" नेहा को अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने तुरंत पुश-अप ब्रा और बेहद बोल्ड डिज़ाइन के कुछ नए सेट निकाल कर रख दिए। "यह ठीक रहेगा सर..."
हरीश ने नज़र डाली लाल रंग का ब्रा और पैंटी का सेट बेहद भड़कीला और कामुक था।
"है तो मस्त... लेकिन ये आ जाएगा क्या?" हरीश ने खुद से ही सवाल किया, लेकिन थोड़ा ज़ोर से बोल पड़ा।
"साइज क्या है, बता सकते हैं आप?" नेहा ने पूछा।
"पप्प... पता नहीं..."
"ऑफफ़फ़.. हो......" नेहा ने अपनी कमर पर हाथ रखा और काउंटर के पास सीधी खड़ी हो गई। "सर, आपको ये लेना भी है या बस मज़े ले रहे हैं?"
कमर पर हाथ रखकर खड़े होने से नेहा के स्तन कसकर बाहर की तरफ़ तन गए थे। हरीश की नज़र अनजाने ही उसकी उस अदा पर चली गई, लेकिन उसका दिमाग़ तुरंत कामिनी के जिस्म पर वापस लौट आया।
"हाँ... वो... आपसे डबल वाला दे दो," हरीश तपाक से बोल पड़ा, क्योंकि उसके ज़ेहन में उस वक्त सिर्फ कामिनी का भरा-पूरा जिस्म घूम रहा था।
"ससस... सर...?" नेहा सकपका गई और उसे बड़ी संशय भरी नज़रों से देखने लगी।
"साइज़ पूछा ना, तो बता तो दिया मैंने!" हरीश के बोलने में इतनी मासूमियत थी कि नेहा चाहकर भी उस पर गुस्सा नहीं हो पाई।
"ननन... निकलती हूँ..... देती हूँ..."
नेहा पलटी और 38 साइज के कई सारे शानदार सेट निकालकर काउंटर पर रख दिए।
हरीश ने एक नज़र डाली और उंगली उठाई— "ये एक ब्लैक और रेड वाला दे दो।"
"और पैंटी...?" नेहा ने पूछा।
"जो इसके साथ है, वो दे दो।"
"सर, आप समझे नहीं! लड़कियाँ अपनी पसंद के हिसाब से अलग-अलग स्टाइल पहनती हैं—जैसे ये फुल कवरेज है, ये हाफ है, और ये थॉन्ग (Thong) है... आपको क्या पसन्द है?" नेहा ने पूछा।
"मुझे... म्म... मुझे क्या पसंद..."
"अरे, जब आप गिफ्ट देने के लिए ले रहे हैं, तो अपनी पसंद का ही तो पहनेगी अपनी गर्लफ्रेंड?"
"हम्म...मेरी पसन्द...’ हरीश ने ज़ेहन पर जोर डाला। उसे अचानक वो दृश्य याद आया जब होटल के कमरे में कामिनी भाग कर बालकनी की तरफ़ गई थी और उसकी चौड़ी गांड साड़ी के नीचे पूरी तरह से आज़ाद हिल रही थी।
‘मतलब वो ढीली-ढाली चीज़ें तो बिल्कुल नहीं पहनती होगी! साड़ी के नीचे कोई निशान या खिंचाव भी नज़र नहीं आ रहा था... इसका मतलब फुल पैंटी का तो सवाल ही पैदा नहीं होता!’
गांड पूरी तरह कमर से ले कर जाँघ तक हिल रही रही, मतलब हाफ पैंटी भी नहीं पहनती होंगी.
हरीश की नज़र काउंटर पर रखी बेहद बारीक 'थॉन्ग' (Thong) पर गई।
"साला, ये तो गज़ब चीज़ है!" उसे देखते ही कामिनी की मटकती हुई गांड हरीश के दिमाग में कौंध गई।
"पक्का! यही पहनती होगी वो!"
"ये ब्लैक और रेड वाला सेट दे दो...!" हरीश ने पूरी शान से फैसला सुना दिया।
हालाँकि, हरीश इस बात से पूरी तरह अनजान था कि कामिनी ने असल में उस वक़्त कोई पैंटी पहनी ही नहीं थी, लेकिन उसने अपनी शातिर बुद्धि से जो अंदाज़ा लगाया था, वो उस हॉट सिचुएशन के बिल्कुल करीब था।
बाहर काउंटर पर बिल चुकाया गया।
जाते-जाते हरीश ने मुड़कर उस दुकानदार को देखा और अपनी मासूम सी आँखों से एक आखिरी धमकी दी
"और सुन बे... चड्डी खरीदने वालों को कभी छोटा मत समझना, वरना किसी दिन इस शहर में चड्डी पहनने लायक नहीं छोडूंगा!"
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Hotel kurmanchal
रमेश और सुलेमान के जाने के बाद, कामिनी होटल के शानदार कमरे में बिल्कुल अकेली थी। कल शाम से शुरू हुए ट्रेन के लंबे सफ़र और रात के मादक तूफ़ान ने उसके बदन को थका दिया था।
"पहले नहा लेती हूँ..." कामिनी ने ख़ुद से कहा और अपना बैग खोलकर कुछ कपड़े बाहर निकाल लिए। एक सुंदर सी साड़ी, ब्लाउज़ और पेटीकोट... लेकिन कमी थी तो सिर्फ़ ब्रा और पैंटी की।
"कैसे भूल आई मैं इतनी ज़रूरी चीज़!" कामिनी ने ख़ुद को कोसा, लेकिन अगले ही पल उसके चेहरे पर एक नशीली मुस्कान तैर गई। सुलेमान के साथ बिताए गए कामुक पल अब उसे शर्मिंदगी नहीं, बल्कि एक अजीब सी ख़ुशी और ढिठाई दे रहे थे। इसी पैंटी कि वजह से वो सुलेमान कि मजबूत मोती उंगलियों को महसूस कर डाकि...
ईईस्स्स.... एक पल को उसे लगा उसकी चुत मे अभी भी सुलेमान कि उंगलियां नृत्य कर रही है.
कामिनी ने जाँघे आपस मे भींच ली.
कामिनी से रहा नहीं गया, उसने झट से अपने बदन से लाल साड़ी उतार फेंकी। कमरे के मद्धम पीले उजाले में उसका मदमस्त, गदराया हुआ गोरा यौवन दमक रहा था। आज ये बेजान कमरा भी जैसे धन्य हो गया था कि उसे हुस्न की ऐसी भरी-पूरी देवी की मेज़बानी का मौका मिला।
एक पल के लिए कामिनी ने ख़ुद को आदमक़द शीशे में निहारा। बीस साल की घुटन के बावजूद, उसका जिस्म ढलने के बजाय दिन-पर-दिन और खिलता ही जा रहा था।
तभी उसकी नज़र बेड पर पड़े अपने पर्स पर गई। ना जाने क्यों, उसके कदम ख़ुद-ब-ख़ुद उस तरफ़ बढ़ गए। उसने पर्स की ज़िप खोली और अगले ही पल उसके हाथ में काँच की एक छोटी सी शीशी चमक रही थी, जिसमें नीले रंग की एक अजीब सी दवा भरी हुई थी।
उसे देखते ही कामिनी के ज़ेहन में 'हकीम लकड़द्दीन' की वो भारी आवाज़ गूँज उठी
"हर तकलीफ़ की दवा है ये... सिर्फ़ औरतों के लिए ही बनी है। ये जिस्म को हमेशा जवान और गरम बनाए रखती है।"
कामिनी को सुबह से ही एक अजीब सी तलब लग रही थी, जैसे कुछ अधूरा छूट रहा हो। उसका जिस्म किसी अनजाने अधूरेपन में कसक रहा था। लेकिन हाथ में वो नीली दवा आते ही उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई, बिल्कुल वैसे ही जैसे किसी नशेड़ी को उसकी पुड़िया मिल गई हो।
कामिनी को ख़ुद इस बात का अंदाज़ा नहीं था, लेकिन उसका जिस्म और उसका दिमाग़ अब इस नीली दवा का आदी होता जा रहा था। ये एक प्रकार का नशा था, एक ऐसी मीठी गर्मी जिसे वो बार-बार अपनी रगों में महसूस करना चाहती थी।
कामिनी से अब और रहा नहीं गया। आख़िर कौन सी औरत नहीं चाहती कि वो सदा जवान और मदहोश रहे? कामिनी ने झट से शीशी का ढक्कन खोला और उसकी चार बूँदें टेबल पर रखे पानी से भरे गिलास में डाल दीं।
गट... गट... गट...
वो उस नीले पानी को एक ही साँस में पी गई।
"आआहहहह...."
कामिनी के होंठों से एक मादक सिसकी निकल गई। एक तेज़, सुलगती हुई गर्मी उसके गले से होती हुई सीधे पेट में उतरी, और फिर ठीक नाभि के आस-पास जाकर एकत्रित होने लगी।
"आअह्ह्हम्म्म... क्या चीज़ है ये!" कामिनी ने जैसे एक बहुत बड़ी राहत की साँस ली। उस नीली दवा ने पलक झपकते ही अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था।
एक पल मे ही सम्पूर्ण जिस्म मे ठंडाई छा है, आँखों कि पुतलियाँ फ़ैल सी गई.
इसी अहसास, ऐसे सुकून के लिए ही तो वो परेशान थी, यही चाहत, यही सुख उसे नीली दवा के पास ले आता था.
जादू था इस शीशी मे, काम का जादू, वासना का जादू....
नीली दवा की सुलगती हुई गर्मी कामिनी की रगों में किसी पिघले हुए लावे की तरह दौड़ रही थी। उसने एक गहरी साँस ली और अपने क़दम शानदार बाथरूम की तरफ़ बढ़ा दिए।
साड़ी वो कमरे में ही उतार कर फेंक चुकी थी। बाथरूम के अंदर दाखिल होते वक़्त उसके गदराए हुए बदन पर सिर्फ़ एक कसा हुआ लाल ब्लाउज़ और मैचिंग साटन का पेटीकोट था। दरवाज़ा बंद करने के बाद कामिनी अंदर लगे एक बड़े से आदमक़द (Full-length) शीशे के सामने आकर रुक गई।
मद्धम पीली रोशनी में उसने ख़ुद को निहारा। उसे अपना ही अक्स कुछ बदला-बदला सा लग रहा था। ब्लाउज़ के हुक जैसे टूटने को बेताब थे। उसके सीने का उभार इतना ज़्यादा और कसा हुआ महसूस हो रहा था कि ब्लाउज़ का कपड़ा उस सख़्ती को सँभाल नहीं पा रहा था। कामिनी की साँसें तेज़ चलने लगीं।
उसके काँपते हाथों ने धीरे-धीरे अपने ब्लाउज़ के हुक खोलने शुरू किए।
एक... दो... तीन...
जैसे ही आख़िरी हुक खुला और कामिनी ने ब्लाउज़ को अपने कन्धों से नीचे सरका कर ज़मीन पर फेंका, उसके भारी और गोरे स्तन आज़ाद होकर बाहर छलक पड़े।
कामिनी ने अपनी ख़ुमार भरी आँखों से ख़ुद के अक्स को निहारा। उसे अपनी ही आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था। बीस साल की नीरस शादी और एक बड़े बेटे की माँ होने के बावजूद, उसका जिस्म ढलने की बजाय एक अजीब सी जवानी से भर उठा था। ये रहस्यमयी 'नीली दवा' का ही असर था जो उसके जिस्म के कोने-कोने में हवस और यौवन का अमृत भर रही थी।
उसकी नज़र अपने सीने पर गई। कामिनी के भारी स्तन, जो आम उम्र की औरतों की तरह थोड़े ढीले पड़ जाने चाहिए थे, वो अब पूरी तरह से बदल चुके थे। वो एकदम कड़क, सुडौल और ऊपर की तरफ़ तन गए थे। उनमें एक ऐसी कसावट आ गई थी जैसे किसी बीस साल की कुँवारी लड़की के हों। उन गोरे, भरे हुए स्तनों के बीच की गहरी खाई (Cleavage) अब और भी ज़्यादा मादक और गहरी लगने लगी थी। बाथरूम की ठंडक और दवा की गर्मी के संगम से उसके स्तनों के उभरे हुए डार्क निप्पल (Nipples) पूरी तरह से तन कर सख़्त हो गए थे।
कामिनी ने अपने ही काँपते हाथों को अपने स्तनों पर रखा और उन्हें हल्के से भींचा। 'आह्ह...' उसके होंठों से एक सिसकी फूट पड़ी। उसकी त्वचा इतनी नाज़ुक और संवेदनशील (Sensitive) हो गई थी कि ख़ुद का स्पर्श भी उसे बिजली के झटके जैसा लग रहा था।
उसकी कमर का घेरा पहले से ज़्यादा सुडौल और माँसल हो गया था, उसकी चौड़ी जाँघों के बीच की गोलाई एक अलग ही निखार पर थी। जांघो के बीच एक फुला हुआ त्रिकोण था, कामिनी कि चुत का ऊपरी हिस्सा फूल के कुप्पा हो गया था, कामिनी को महसूस हो रहा था कि उसके जिस्म का हर एक हिस्सा, हर एक पोर जैसे ख़ुद-ब-ख़ुद प्यार और मर्दानगी की भीख माँग रहा हो।
उसने शावर ऑन कर दिया।
गुनगुने पानी की तेज़ धार फव्वारे से निकलकर सीधे कामिनी के तपते हुए जिस्म पर गिरी। पानी की बूँदें उसके तने हुए निप्पल्स और उसकी भारी, गोल जाँघों से टकराकर नीचे फिसलने लगीं, कामिनी ने अतिआंनद अपनी आँखें बंद कर लीं।
ईईस्स्स्स.... आअह्ह्ह...... सारी थकान पानी के साथ बहने लगी.
गर्म पानी के साथ मिलकर कामिनी के जिस्म से एक अजीब सी, बेहद नशीली और प्राकृतिक महक उठने लगी थी। ये किसी साबुन या शैम्पू की ख़ुशबू नहीं थी, बल्कि एक औरत के जिस्म की असली कस्तूरी (Musk) महक थी, जिसे नीली दवा और भी ज़्यादा कामुक बना रही थी। वो महक इतनी तेज़ और नशीली थी कि पूरा बाथरूम उस कामरस की ख़ुशबू से भर गया था।
साबुन का झाग बनाते हुए कामिनी के हाथ अपनी ही सुराहीदार गर्दन, भरे हुए स्तनों, चौड़ी नाभि और फिसलती हुई जाँघों पर घूमने लगे। आज वो सिर्फ़ नहा नहीं रही थी, बल्कि ख़ुद के जिस्म से प्यार कर रही थी।
पानी की धार के नीचे खड़ी कामिनी को अब लग रहा था कि वो कोई साधारण औरत नहीं है। वो तो साक्षात 'कामदेवी' बन चुकी है, ऐसा शानदार खूबसूरत हुस्न किसी एक का हो कर रह जाये ये तो बेमानी हुई ना.
भला ताजमहल किसी एक का हुआ है आजतक.
उसे सब देखने जाये है, हर कोई उसकी खूबसूरती कि दुहाई देता है,
ठीक वैसे ही खूबसूरत औरत किसी एक कि जायदाद नहीं होती, उस पर हर उस मर्द का अधिकार है जो हुस्न, खूबसूरती का दीवाना हो.
शावर बंद करने के बाद कामिनी ने एक सफ़ेद, रोएँदार तौलिया अपने सुलगते हुए बदन पर लपेट लिया। तौलिया उसके घुटनों से बहुत ऊपर तक था, और उसकी क्लीवेज आधी बाहर झाँक रही थी। पानी की बूँदें अभी भी उसके गीले बालों से टपक कर उसकी गोरी पीठ पर फिसल रही थीं।
तभी....
ठक... ठक... ठक...
कमरे के दरवाज़े पर किसी ने बहुत ही हल्के से दस्तक दी।
कामिनी के दिल की धड़कन तेज़ हो गई।
कामिनी बाथरूम से बाहर आई ही थी कि...
ठक... ठक... ठक...
दरवाज़े पर एक बार फिर हल्की सी दस्तक हुई।
"इतनी जल्दी आ भी गए...?" कामिनी ने मन ही मन सोचा। रमेश को गए अभी मुश्किल से आधा घंटा ही बीता होगा।
कामिनी ने एक नज़र बेड पर पड़ी अपनी साड़ी और पेटीकोट की तरफ़ देखा, और फिर नीचे अपने ही जिस्म को निहारा जो इस वक़्त सिर्फ़ एक छोटे से सफ़ेद तौलिये में लिपटा हुआ था।
'क्या रमेश के साथ सुलेमान भी होगा?'
कामिनी के ज़ेहन में मर्दानगी इस क़दर हावी हो चुकी थी कि उसे अपने पति का ख़याल बाद में, और सुलेमान के चौड़े, फौलादी जिस्म का ख़याल पहले आया।
एक अजीब सा, झुरझुरी पैदा कर देने वाला विचार उसके दिमाग़ में दौड़ने लगा 'अगर सुलेमान मुझे सिर्फ़ एक तौलिये में, इस अर्धनग्न हालत में देख लेगा तो क्या होगा? मैं क्या करूँगी? क्या वो रमेश के सामने ही.... नहीं... नहीं.... क्या सोच रही हूँ मै.
ये ख़ौफ़नाक लेकिन बेहद मादक ख़याल सोचकर ही कामिनी के रसीले होंठों पर एक शरारती और नशीली मुस्कान आ गई। उसकी नाभि के नीचे मीठी सी टीस उठने लगी।
उसने धीरे से क़दम बढ़ाए और दरवाज़े के बिल्कुल पास जाकर खड़ी हो गई।
"क-क-कौन है...?" कामिनी के ना चाहते हुए भी उत्तेजना मे उसकी आवाज़ में थोड़ी घबराहट घुल गई,
वो चाहकर भी एकदम से दरवाज़ा नहीं खोल सकी। आख़िरकार, उसके अंदर कहीं ना कहीं अभी भी ये फ़िक्र बाकी थी कि अपने पति के होते हुए वो किसी ग़ैर मर्द को ख़ुद को इस हालत में कैसे दिखा सकती है।
"म-म-मैडम... मैं... मैं हरीश हूँ..."
बाहर से एक भोली, मासूम लेकिन हल्की सी काँपती हुई आवाज़ आई।
दरवाज़े के दूसरी तरफ़ खड़ा हरीश वाक़ई बुरी तरह सकपकाया हुआ था। वो समझ नहीं पा रहा था कि वो इस पैकेट को कैसे देगा? क्या कहेगा? किस मुँह से बोलेगा कि ये अंडरगारमेंट्स सुलेमान भाई ने मँगवाए हैं? यही सब सोच-सोच कर उसका जिस्म सुन्न हुआ जा रहा था।
उसके हाथ में पकड़ी डिज़ाइनर लाँजरी (Lingerie) की थैली हल्की-हल्की काँप रही थी और होटल के ठंडे कॉरिडोर में भी उसके गोरे माथे पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं।
हरीश ख़ुद अपनी इस हालत पर हैरान था।
'साला... बड़े-बड़े डॉन और माफियाओं की बंदूकों के सामने आज तक मेरा हाथ नहीं काँपा, और आज एक औरत को महज़ ब्रा-पैंटी देने में मेरी रूह हिली जा रही है!'
लानत है बे तुझ पे हरीश.... अभी दरवाजा खुलेगा, अंदर फेंकूँगा और निकल लूंगा.
हाँ... यही ठीक रहेगा... हरीश खुद को हौसला दे रहा था.
हरीश ने एक गहरी साँस ली और ख़ुद को नॉर्मल दिखाने की कोशिश करते हुए दोबारा दरवाज़े के क़रीब झुका।
हरीश का नाम सुनते ही कामिनी का जिस्म अंदर तक झनझना उठा। बंद दरवाज़े के पार भी उसे उस मासूम और भोले से लड़के का चेहरा साफ़ दिखाई दे रहा था—भूरी आँखें, दूध जैसा गोरा रंग, सुनहरे लहराते बाल और एक बिल्कुल चुस्त-दुरुस्त कसरती जिस्म।
ईस्स्स...
कामिनी के होंठों से एक गहरी, काँपती हुई साँस छूट गई। हरीश के ख़याल भर से उसकी जाँघों के बीच की गर्मी एक तेज़ झटके के साथ फूट पड़ी थी। उसे महसूस हुआ जैसे उसकी चुत की बंद कलियों ने एक मीठा सा रस छोड़ दिया हो।
"ससस... साब नहीं आए क्या?" कामिनी ने वो सवाल कर दिया जो उसे नहीं करना चाहिए था। आख़िर वो जानना क्या चाहती थी? रमेश के ना होने की तसल्ली?
"न-न-नहीं... मैं कुछ लाया था। साब ने बोला था लाने को..." हरीश बाहर से एक दबी और मरी हुई आवाज़ में बोला।
कामिनी के ज़ेहन पर सुलेमान का मर्दानगी वाला साया ज़रूर था, लेकिन हरीश में एक अजीब सी कशिश थी, एक नशीला आकर्षण। बिल्कुल वैसे ही, जैसे कोई भूखी शेरनी किसी नाज़ुक और ताज़ा खरगोश को देखती है। और वो 'खरगोश' इस वक़्त दरवाज़े के ठीक उस पार खड़ा था।
हम्फ़्फ़्फ़... हम्फ़्फ़्फ़...
कामिनी ने एक गहरी साँस ली, जैसे शिकार पर झपटने से पहले कोई शेरनी हिम्मत जुटा रही हो।
खट... उसने दरवाज़े की चिटकनी खोल दी। ना जाने कहाँ से उसमें ये दुस्साहस आ गया था। वो लगभग अर्धनग्न थी, और अपने बेटे की उम्र के एक अनजान लड़के के लिए दरवाज़ा खोल रही थी।
चरररर... कामिनी ने काँपते हाथों से दरवाज़े का हैंडल घुमाया।
दरवाज़ा आधा ही खुला था कि ना जाने कामिनी के अंदर के कौन से बचे-खुचे संस्कार जाग उठे, उसने तुरंत दरवाज़े की ओट (सहारा) ले ली और अपना भारी बदन पीछे छुपा लिया।
"कक्क... क्या है?" कामिनी ने हकलाते हुए पूछा।
"वो... लम्बे वाले साब ने ये भिजवाया है..." हरीश ने काँपते हाथों से वो पैकेट आगे बढ़ा दिया।
दरवाज़े की दरार से कामिनी का चेहरा और उसके नंगे, गोरे कंधे साफ़ दिख रहे थे, जिन पर पानी की बूँदें अभी भी सरक रही थीं। गीले बाल उसके टमाटर जैसे लाल चेहरे पर चिपके हुए थे। कामिनी को इस रूप में देखकर हरीश तो जैसे अपनी सारी सुध-बुध ही खो बैठा। ऐसी खिली हुई सुंदरता, ऐसा दहकता हुआ मादक चेहरा... उफ़्फ़्फ़!
कामिनी ने अपना गोरा हाथ बाहर निकालकर पैकेट पकड़ लिया। उसने पैकेट को अपनी तरफ़ अंदर खींचना चाहा... लेकिन हरीश तो जैसे बुत बनकर जाम हो गया था, उसने पैकेट की दूसरी तरफ़ से अपनी पकड़ ढीली ही नहीं की।
"लाओ... दो इसे..." कामिनी ने झुँझलाते हुए हल्का सा ज़ोर लगाया।
चररररर... फ़ट!
कागज़ का वो पैकेट एक तेज़ आवाज़ के साथ फटता चला गया।
ठीक उसी पल... बाहर गैलरी से किसी के क़दमों की आहट सुनाई दी। शायद पास के कमरे से कोई बाहर आ रहा था।
कामिनी का चेहरा ख़ौफ़ से सफ़ेद पड़ गया। 'अगर इस हालत में मुझे इस लड़के के साथ किसी ने देख लिया तो...'
"अंदर आओ!" कामिनी ने घबराहट में हरीश की कलाई को पकड़ा और एक ज़बरदस्त ताक़त के साथ उसे झटके से अंदर खींच लिया।
धड़ाममम...!
हरीश अपना संतुलन खो बैठा और अंदर की तरफ़ खिंचता हुआ सीधा ज़मीन पर आ गिरा।
धाड़...! कामिनी ने पलक झपकते ही दरवाज़ा बंद करके कुंडी लगा दी।
"पागल हो क्या तुम? क्या कर रहे थे ये? छोड़ क्यों नहीं रहे थे पैकेट?" कामिनी हाँफते हुए उस पर चिल्लाई।
लेकिन हरीश को तो जैसे काटो तो खून नहीं! उसकी साँसें हलक में अटक गई थीं।
वो घुटनों के बल ज़मीन पर बैठा हुआ था। फटे हुए पैकेट से वो लाल और काले रंग की कामुक थॉन्ग (Thong) और ब्रा निकलकर फर्श पर बिखरी हुई थी। और हरीश की नज़रों के ठीक सामने... साक्षात कामदेवी रूपी कामिनी खड़ी थी!
वो गुस्से में कमर पर हाथ रखकर उस पर चिल्ला रही थी "अगर बाहर कोई देख लेता तो... मेरी इज़्ज़त का क्या होता... ये... वो...ब्ला... ब्ला..."
लेकिन हरीश को कुछ सुनाई ही कहाँ दे रहा था! उसकी नज़रें तो बस सामने के नज़ारे पर चिपकी हुई थीं। कामिनी के गीले बाल, छोटा सा सफ़ेद तौलिया, तौलिये के ऊपर से उछल कर बाहर झाँकती उसकी गहरी क्लीवेज, पानी से भीगा हुआ उसका मादक गोरा जिस्म और उसकी भारी नंगी जाँघें... कमरे की मद्धम रोशनी में सब कुछ इस क़दर दमक रहा था कि ज़मीन पर बैठे हरीश की आँखों के आगे हवस और मदहोशी का अँधेरा छाने लगा था।
कामिनी गुस्से में हाँफते हुए हरीश पर चिल्ला रही थी, लेकिन सामने से कोई जवाब ना पाकर वो अचानक ठिठक गई। उसने गौर किया कि हरीश के होंठ तो सिले हुए हैं, लेकिन उसकी फटी-फटी आँखें कामिनी के चेहरे पर नहीं, बल्कि कहीं और ही टिकी हैं।
कुछ ही सेकंड में कामिनी के दिमाग़ से बाहर कोई देख लेने का डर दूर हुआ और उसकी नज़र हरीश की टकटकी का पीछा करते हुए सीधे फर्श पर गई।
हे भगवान...!
कामिनी बुरी तरह से सन्न रह गई। शर्म की एक भयंकर लहर ने उसके पैरों से लेकर सिर तक झुरझुरी पैदा कर दी।
होटल के साफ़-सुथरे सफ़ेद फर्श पर लाल और काले रंग की भड़कीली डिज़ाइनर ब्रा और पैंटी पूरी तरह से निर्लज्ज होकर बिखरी पड़ी थी। हरीश की नज़रें कामिनी की तौलिये से झाँकती जाँघों और ज़मीन पर पड़े कामुक कपड़े के बीच झूल रही थीं।
अगर दुनिया में ज़मीन से रुमाल उठाने का कोई ओलंपिक खेल होता, तो आज कामिनी यक़ीनन उसमें गोल्ड मेडल जीत लेती!
कामिनी ने आव देखा ना ताव, पलक झपकते ही किसी भूखी चील की तरह ज़मीन पर झपट्टा मारा। झुकते वक़्त उसका छोटा सा सफ़ेद तौलिया जाँघों से और भी ऊपर खिसक गया, लेकिन कामिनी को अब किसी चीज़ की परवाह नहीं थी। उसने एक ही मुट्ठी में उस लाल-काले मख़मली कपड़े को भींचा और हरीश को हड़काते हुए बोली
"यहीं रुकना... मैं आती हूँ अभी!"
इतना कहकर कामिनी ने जो दौड़ लगाई, उसे देखकर तो शायद आज उसैन बोल्ट (Usain Bolt) भी शर्म से हार मान लेता।
धड़... धाड़... चटक!
वो तूफ़ान की तरह बाथरूम में घुसी और झटके से दरवाज़ा बंद करके अंदर से कुंडी चढ़ा दी।
हम्फ़्फ़्फ़... हम्फ़्फ़्फ़... हम्फ़्फ़्फ़...
बाथरूम के शांत एकांत में अब सिर्फ़ कामिनी की भारी साँसों की आवाज़ गूँज रही थी। उसका सीना ज़ोर-ज़ोर से ऊपर-नीचे हो रहा था। उसे ख़ुद को सामान्य करने में लगभग एक पूरा मिनट लग गया।
"ये मैंने क्या कर दिया? ये कैसे हो गया अभी-अभी?"
कामिनी ने ख़ुद से बुदबुदाते हुए सामने लगे आदमक़द शीशे में अपना अक्स देखा, तो ख़ुद ही शर्म से लाल हो गई। अभी कुछ सेकंड पहले वो एक ग़ैर लड़के के सामने सिर्फ़ एक छोटे से तौलिये में खड़ी थी। उसके गोरे माथे पर अब नहाने के पानी की जगह घबराहट और रोमांच के पसीने की बूँदें चमक रही थीं।
तभी... कामिनी को अपनी मुट्ठी में किसी बेहद मुलायम चीज़ के दबे होने का अहसास हुआ।
उसका ध्यान भटका और उसके काँपते हुए हाथ धीरे-धीरे ऊपर उठे... ठीक उसकी नज़रों के बिल्कुल सामने। कामिनी ने अपनी भींची हुई मुट्ठी खोली।
हे भगवान...! ये कैसी ब्रा-पैंटी है?
कामिनी की आँखें हैरानी और एक अनजाने कौतूहल से पूरी तरह फैल गईं। उसने अपनी ज़िंदगी में आज तक ऐसी चीज़ नहीं देखी थी।
उसके एक हाथ में जो ब्रा थी, वो कोई आम ब्रा नहीं थी। वो बिल्कुल नई डिज़ाइन की, एकदम ट्रांसपेरेंट (पारदर्शी) जालीदार ब्रा थी। लाल रंग की उस नाज़ुक जाली पर काले रंग की कई पतली-पतली डोरियाँ (Straps) लगी हुई थीं, जो स्तनों को बस आधा ही ढँकने के लिए बनाई गई थीं।
लेकिन जैसे ही कामिनी की नज़र अपने दूसरे हाथ में लटकते हुए कपड़े पर गई...
उउउफ़्फ़्फ़... भगवान... ये क्या है?
उस लाल-काली 'थॉन्ग' (Thong) पर नज़र पड़ते ही कामिनी के हलक में साँसें अटक गईं। उसने आज तक कभी ऐसा कुछ नहीं पहना था। बीस साल की लंबी शादीशुदा ज़िंदगी में रमेश ने ना तो कभी उसे ऐसी कोई कामुक चीज़ दिलाई थी, और ना ही कामिनी के अंदर कभी ऐसी किसी बेशर्म चीज़ को पहनने की हसरत जगी थी।
कामिनी ने उस थॉन्ग को अपनी दोनों उँगलियों से पकड़कर आँखों के सामने उठाया और उसे उलट-पुलट कर देखने लगी।
पैंटी के नाम पर वो महज़ एक मज़ाक था! आगे की तरफ़ सिर्फ़ एक छोटा सा लाल रंग का जालीदार तिकोना कपड़ा था, जिससे आर-पार सब कुछ साफ़ दिख रहा था। और पीछे? पीछे तो कपड़ा था ही नहीं... सिर्फ़ एक काले रंग की बेहद पतली, रेशमी डोरी थी, जिसे देखने भर से कामिनी की चौड़ी जाँघों के बीच एक अजीब सी मीठी सिहरन दौड़ गई।
ये कपड़ा जिस्म को ढँकने के लिए नहीं, बल्कि जिस्म को नंगा करने के लिए बनाया गया था।
बाथरूम का दरवाज़ा बंद होते ही बाहर कमरे के फर्श पर बैठे हरीश के लिए जैसे किसी सुपरहिट शो पर अचानक पर्दा गिर गया था।
"यहीं रुकना... मैं आती हूँ अभी!" कामिनी के आख़िरी शब्द हरीश के कानों में अभी भी गूँज रहे थे।
"अबे... सुलेमान भाई तो मुझे ज़िंदा गाड़ देंगे! ये क्या कर दिया मैंने?" हरीश ज़मीन पर बैठे-बैठे ही पसीने से भीग गया था। उसे अपनी ग़लती का अहसास हो रहा था।
"साला, मैं भी एक नंबर का बेवकूफ़ हूँ! दरवाज़े से पैकेट देकर तुरंत भाग जाना चाहिए था, और मैं उल्लू की तरह आँखें फाड़ कर हुस्न की देवी को निहार रहा था! हरीश बेटा... तू तो गया आज!" हरीश की गांड सच में फटी जा रही थी। उसे सुलेमान का ख़ौफ़ सताने लगा था।
इधर अंदर बाथरूम में कामिनी एक अलग ही जद्दोजहद में थी।
"सुलेमान ने ये भिजवाया है... लेकिन ये लाँजरी तो बहुत महँगी आती है। सुलेमान जैसे एक मामूली, अनपढ़ मज़दूर के पास इतना पैसा कहाँ से आया?" कामिनी गहरी सोच में पड़ गई। सुलेमान के बर्ताव और इन महँगे कपड़ों ने उसके दिमाग़ में शक के कीड़े दौड़ा दिए थे।
लेकिन वो लाल-काली डिज़ाइनर और सेक्सी ब्रा-पैंटी उसके दिल में एक ऐसी मादक उमंग पैदा कर रही थी कि उसने सारे शक एक पल के लिए किनारे कर दिए।
आख़िर कौन औरत नहीं चाहती कि वो अपने यौवन को ऐसे कामुक वस्त्रों में सज़ा कर ख़ुद को निहारे? जिस्म मे बढ़ती गर्मी ने कामिनी के बचे-खुचे संकोच को भी राख कर दिया था। कामिनी ने ख़ुद को आज़ाद कर हुस्न का लिबास पहनने का फ़ैसला कर लिया।
कामिनी ने अपने जिस्म से सफ़ेद तौलिया खोल खूंटी पर टांग दिया। अब वो शीशे के सामने पूरी तरह नंगी खड़ी थी।
उसने काँपते हाथों से लाल और काले रंग की पारदर्शी (transparent) ब्रा उठाई। अपने गोरे हाथों को उसकी डोरियों (straps) में डाला और पीछे हाथ ले जाकर जैसे ही हुक लगाया... उसे एक मीठा सा झटका लगा। वो ब्रा उसके भारी स्तनों पर एकदम 'परफ़ेक्ट फिट' आई थी! हरीश का अंदाज़ा बिल्कुल सटीक बैठा था।
जैसे ही उसने शीशे में अपना अक्स देखा, उसकी साँसें अटक गईं। उस महँगी पुश-अप ब्रा ने उसके भारी स्तनों को नीचे से ऐसा कसाव और सपोर्ट दिया था कि वो पूरी तरह से उभर कर, छलकते हुए बाहर की तरफ़ आ गए थे। दोनों गोरे स्तनों के बीच की खाई (Cleavage) अब इतनी गहरी और मादक हो गई थी कि कोई भी उसमें डूब कर जान दे दे। कपड़ा इतना बारीक और जालीदार था कि उसमें से उसके कड़क हो चुके काले निप्पल साफ़ बाहर झाँक रहे थे। कामिनी को ऐसा अहसास हो रहा था जैसे उसने कुछ पहना ही नहीं है, बस किसी ने उसके स्तनों को अपने मज़बूत, गर्म हाथों से उठा रखा हो।
अब बारी थी थॉन्ग (Thong) की। कामिनी के हाथों में हल्की सी कंपन थी। उसने अपने पैरों को रेशमी डोरी के बीच से निकाला और उसे अपनी गदराई, चौड़ी जाँघों से रगड़ते हुए ऊपर की तरफ़ खींचा।
सामने का लाल जालीदार तिकोना कपड़ा उसकी फूली हुई, सुलगती चुत पर आकर बिल्कुल फिट बैठ गया। लेकिन जैसे ही कामिनी ने उसे कमर तक ऊपर खींचा...
ईईस्स्स्स... आह्ह...!
कामिनी के मुँह से बेसाख़्ता एक लंबी, नशीली सिसकी निकल गई। उसकी जाँघें एक झटके से आपस में कस गईं।
पीछे की बेहद पतली, रेशमी काली डोरी कामिनी की भारी गांड के दोनों बड़े गोलों के बीच, गहरी दरार में जाकर पूरी तरह से धँस गई, उसने आज तक अपनी ज़िंदगी में ऐसा कुछ नहीं पहना था। गांड की नाज़ुक दरार में फँसी डोरी हर हल्की सी हरकत के साथ, कामिनी के जिस्म में एक अजीब सी, गुदगुदाती हुई खुजली और मीठी मादकता पैदा कर रही थी। उस डोरी का कसाव उसकी नाभि के नीचे रह रह कर मादक करंट दौड़ा रहा था,
कामिनी ने शीशे में ख़ुद को घूमा कर देखा। पीछे से उसकी चौड़ी, मादक गांड पूरी तरह से नंगी थी, बस बीच में एक काली पतली सी रेखा थी जो उसके जिस्म की दरार में ग़ायब हो चुकी थी।
कामिनी ने एक गहरी साँस ली और खूँटी पर टँगे उसी सफ़ेद तौलिये को वापस अपने सुलगते हुए जिस्म पर लपेट लिया।
चटक...
बाथरूम के दरवाज़े की कुंडी खुलने की तेज़ आवाज़ हुई।
बाहर खड़े हरीश के कान खड़े हो गए। 'बस भाई हरीश... अब तेरी ख़ैर नहीं!'
चररररर... करता हुआ दरवाज़ा धीरे से खुला।
सामने कामिनी तौलिये में लिपटी खड़ी थी। ना जाने कैसे उसमें ये दुस्साहस आ गया था, या शायद हरीश जैसे कोमल और मासूम 'खरगोश' पर उसका दिल आ गया था। उसे लग रहा था कि अगर ये मासूम लड़का उसके हुस्न का रस अपनी आँखों से पी भी लेगा, तो क्या फ़र्क पड़ेगा? वैसे भी, हवस के नशे में डूबी एक आज़ाद औरत अपने जिस्म की नुमाइश से बाज़ कहाँ आती है! कामिनी आज अपनी ज़िंदगी में बहुत कुछ पहली बार कर रही थी।
सामने हरीश की हालत ख़राब थी। वो कमरे के बीचों-बीच किसी मुज़रिम की तरह सिर झुकाए खड़ा था।
"स-स-स-सॉरी मैडम... वो... वो... मैं..."
"किसने पसंद की ये?" कामिनी ने उसकी बात काटते हुए सीधा सवाल दाग़ दिया। उसका चेहरा बनावटी ग़ुस्से से सख़्त था।
"म-म-मैंने..." हरीश ने हकलाते हुए सच उगल दिया।
"क्या? तुम ख़रीद के लाए हो ये?"
"ह-ह-हाँ... मैं... वो सुलेमान साब ने पैसे देकर कहा था कि दुकान से सबसे अच्छी वाली ख़रीद कर दे आना," हरीश ने बिना पलक झपकाए जो सच था, वो बोल दिया।
"इसे अच्छी कहते हो तुम?" कामिनी ने वापस सवाल दाग़ा और धीरे-धीरे क़दम बढ़ाते हुए उसके पास आने लगी।
चप... चरर... पचप...
कामिनी के चलने के अंदाज़ में एक अजीब सी मादकता और भारीपन आ गया था। उसकी जाँघों के बीच से एक बहुत ही धीमी, गीली आवाज़ आ रही थी। दरअसल, उस तंग जालीदार थॉन्ग की रेशमी डोरी उसकी गांड की गहरी दरार में रगड़ खा रही थी। उसे ऐसी चीज़ पहनने की आदत नहीं थी, इसलिए वो डोरी जहाँ चुभ रही थी, वहाँ एक मीठी सी खुजली और बेकाबू हवस पैदा कर रही थी। उसकी चाल किसी मदमस्त नागिन जैसी हो गई थी।
"वो... महँगी थी तो मुझे लगा अच्छी ही होगी..." हरीश ने मासूमियत से सीधा जवाब दिया।
"इससे पहले किसी और के लिए नहीं ख़रीदी क्या?" कामिनी ने उसकी आँखों में घूरते हुए पूछा।
"न-न-नहीं... पहली बार है। अच्छी नहीं है तो... तो मैं बदल कर ले आऊँ?" हरीश ने पीछे हटते हुए कहना चाहा।
कामिनी के होंठों पर एक बहुत ही शैतानी और मादक मुस्कान तैर गई।
"मैं कैसे बताऊँ कि अच्छी है या नहीं... तुम ख़ुद देखकर बता दो।"
"मै... मैं...?"
हरीश की आँखें चौड़ी होती चली गईं। इससे पहले कि वो कुछ समझ पाता...
सररररर...
कामिनी ने झटके से अपने सीने पर बँधी तौलिये की गाँठ खोल दी। सफ़ेद रोएँदार तौलिया सरकता हुआ सीधे कामिनी के पैरों में जा गिरा।
कामिनी अब पूरी तरह से बदल चुकी थी। उसे हरीश को इस तरह तड़पाने और उसके होश उड़ाने में एक ज़ालिमाना मज़ा आ रहा था।
आअह्ह्ह... ईस्स्स्स...
हरीश की साँसें जैसे हलक में ही जम गईं। उसके सीने में दिल की धड़कनें पसलियाँ तोड़ने पर उतारू हो गईं, और पैंट के अंदर उसके सोए हुए लंड ने एक ज़ोरदार झटका खाकर अपना सिर उठा लिया।
हरीश के ठीक सामने कामिनी लाल और काले रंग की पारदर्शी ब्रा और थॉन्ग में लगभग नंगी खड़ी थी। गोरे, गदराए दूधिया जिस्म पर वो लाल जालीदार कपड़ा किसी खिले हुए ख़ूनी गुलाब की तरह दमक रहा था। ब्रा से छलकते हुए भारी स्तन, सख़्त होते काले निप्पल और नाभि के नीचे छोटे से तिकोने कपड़े से झाँकता उभार...
हरीश ने अपनी ज़िंदगी में आज तक ऐसा अकल्पनीय हुस्न नहीं देखा था। उसे पता ही नहीं था कि एक ढलती उम्र की औरत इतनी कामुक, इतनी ख़ूबसूरत हो सकती है। वो बिना पलक झपकाए, मुँह खोले उस देवी को निहारता रह गया। उसका दिमाग़ सुन्न हो चुका था।
कामिनी ने अपने दोनों हाथ अपनी चौड़ी कमर पर रखे, अपना सीना थोड़ा और आगे की तरफ़ ताना और अपनी रसीली आवाज़ में फुसफुसाते हुए पूछा—
"अब बताओ हरीश... कैसी लग रही है...?"
"बबबब.... बहुत मस्त.... मतलब अच्छी है " हरीश किसी बकरे कि तरह मिमियाता हुआ बोला.
कमरे में एक भारी और नशीला सन्नाटा छा गया, हरीश की फटी हुई आँखें और काँपते होंठ देखकर कामिनी के अंदर की शैतानी औरत पूरी तरह जाग उठी।
"अब तुम कह रहे हो कि अच्छी है... तो अच्छी ही होगी। चलो, रख लेती हूँ..." कामिनी ने एक बहुत ही कातिलाना और बेपरवाह अंदाज़ में कहा।
इतना कहकर कामिनी उसी मादक और बलखाती हुई चाल से चलती हुई बिस्तर की तरफ़ मुड़ गई, जहाँ उसकी साड़ी, ब्लाउज़ और पेटीकोट रखे थे।
जैसे ही कामिनी पलटी, हरीश के सामने एक ऐसा नज़ारा उजागर हो गया जिसे देखकर वो शायद आज वहीं खून की उल्टी करके मर जाता!
कामिनी की चौड़ी, गोरी और भारी गांड पूरी तरह से हरीश की नज़रों के सामने थी। उस लाल-काले जालीदार कपड़े का पीछे तो कोई वज़ूद ही नहीं था; सिर्फ़ एक बेहद पतली सी काली रेशमी डोरी थी, जो कामिनी के दोनों गोरे चूतड़ों के बीच की गहरी दरार में पूरी तरह से ग़ायब हो चुकी थी। उसके हर क़दम के साथ वो माँसल गांड ऐसे मटक रही थी कि हरीश के दिमाग़ की नसें फटने को हो गईं।
लेकिन हरीश की धड़कनें रुकने से पहले ही, कामिनी ने बिस्तर से लाल साटन का पेटीकोट उठाया, अपनी भारी टाँगों को उसमें डाला और झटके से उसे ऊपर खींचकर अपनी चौड़ी कमर पर कस लिया। वो जादुई और ख़तरनाक नज़ारा पल भर में लाल साटन के पीछे छुप गया।
आज कामिनी के मन में कोई शर्म नहीं थी, कोई लज्जा नहीं थी। अपने ही बेटे की उम्र के एक सीधे-सादे लड़के को अपना नंगा जिस्म दिखाकर, उसके होश उड़ाकर, कामिनी को आज एक अजीब सा सुकून मिल रहा था।
उसे पहली बार इस बात का गहरा अहसास हुआ था कि किसी मर्द को अपनी हवस के लिए 'तड़पाने' में कितना नशीला मज़ा है। हरीश की फटी हुई हालत देखकर वो अंदर ही अंदर मुस्कुरा रही थी। उसकी ये शैतानी हवस उसे एक नई ताक़त दे रही थी।
कामिनी वाक़ई कितनी बदल गई थी!
अब तक वो हमेशा मर्दों के हाथों का खिलौना ही बनी थी। शमशेर, फ़ौजा, ताऊजी... सभी मर्दों के सामने वो बेबस थी, उसकी मज़बूरी, उसकी हवस ने उसे हमेशा ऐसी स्थिति मे ला खड़ा किया था कि वो रोंदी गई थी, उसका इस्तेमाल हुआ था.
लेकिन आज, आज उसकी बढ़ती हवस ने इसे एक बहुत बड़ा सबक़ सिखा दिया था। वो जान गई थी कि 'घोड़े की लगाम' कैसे पकड़ी जाती है। थोड़ा सा सब्र आपको लगाम थामने का मौका दे सकता है.
इसका सुबूत उसने अभी-अभी दिया था। उसका अपना जिस्म अंदर से बुरी तरह कुलबुला रहा था, जाँघों के बीच की जगह मीठे रस से भर चुकी थी और बुरी तरह फड़क रही थी। वो चाहती तो हरीश के सामने आत्मसमर्पण कर सकती थी, लेकिन उसने ख़ुद पर क़ाबू रखा। उसने आगे से कोई पहल नहीं की, क्योंकि वो इस 'खरगोश' को एक ही बार में नहीं, बल्कि इत्मीनान से, स्वाद ले-लेकर, चबा-चबा कर खाना चाहती थी।
"अब ऐसे ही टुकुर-टुकुर देखते रहोगे... या कोई काम भी है तुम्हारे पास?" कामिनी ने शीशे के सामने खड़े होकर, अपने लाल ब्लाउज़ के हुक सीने पर कसते हुए बहुत ही सख़्त लेकिन मादक आवाज़ में पूछा।
ब्लाउज़ कसने से वो डिज़ाइनर ब्रा और भी ज़्यादा उभर आई थी, और गहरी क्लीवेज अभी भी हरीश को पागल कर रही थी।
"ह-ह-हाँ... हाँ... है ना मैडम... बहुत काम है..." हरीश हड़बड़ा कर पीछे की तरफ़ पलटा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो इस कमरे से ज़िंदा बाहर कैसे निकलेगा।
"वैसे..." कामिनी की आवाज़ ने उसके क़दम फिर रोक दिए।
हरीश ने डरते हुए पीछे मुड़कर देखा।
"पसंद बहुत अच्छी है तुम्हारी... थैंक यू।" आख़िरकार कामिनी ने अपनी दयालुता दिखा ही दी। उसके रसीले होंठों पर एक बेहद कातिलाना और जानलेवा मुस्कान थी।
हरीश का दिल एक बार फिर ज़ोर से धड़का।
"थ... थ... थैंक यू मैडम... और कोई काम हो तो... तो बोलना।"
इतना कहकर हरीश लगभग भागता हुआ कमरे से बाहर निकल गया और दरवाज़ा पीछे से बंद हो गया।
कमरे में अकेली खड़ी कामिनी ने शीशे में ख़ुद को देखा और एक बार फिर मुस्कुरा उठी।
नयी साड़ी मे उसका जिस्म दमक रहा था, वो नयी उड़ान के लिए तैयार थी.
हालांकि थोग कि चुभन उसे चैन नहीं लेने दे रही थी.
क्रमशः
Buy me a wine
दोस्तों, आप सबका प्यार और समर्थन ही मेरी लिखाई की सबसे बड़ी ताकत है। हर अपडेट लिखने में काफी समय, मेहनत और समर्पण लगता है। अगर आपको मेरी कहानी पसंद आ रही है और आप चाहते हैं कि नए अपडेट लगातार आते रहें, तो अपनी इच्छा से छोटा सा आर्थिक सहयोग ज़रूर दे सकते हैं।
यह कोई मजबूरी नहीं, सिर्फ आपके प्यार का एक छोटा सा सहयोग होगा, जो मुझे और बेहतर लिखने के लिए हौसला देगा। आपका हर सहयोग मेरे लिए बहुत कीमती है।
जो भी सहयोग देना चाहें, दिल से स्वागत है। आपका प्यार ही मेरी असली कमाई है ❤️
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