मेरी माँ कामिनी 2.0 - अध्याय 1
टैक्सी किशनगंज की तरफ दौड़ती चली जा रही थी, और आगे बैठे रमेश की आंखे धुंधला रही थी.
साल 1990
दिसंबर की कड़ाके की ठंड थी। किशनगंज गाँव के उस पुराने सरकारी घर के आँगन में कोहरा और अलाव का धुआँ आपस में लिपट रहे थे।
आँगन में बिछी एक पुरानी चारपाई पर रमेश और सब-इंस्पेक्टर शमशेर बैठे शराब के जाम टकरा रहे थे। रमेश को इस सरकारी नौकरी में आए अभी मुश्किल से एक साल ही हुआ था, लेकिन इस एक साल में ही उसने इलाके में अपना खौफ और काली कमाई का ऐसा जाल बिछा लिया था कि बड़े-बड़े ज़मींदार भी उसे सलाम ठोकते थे। और इस पाप की दुनिया में उसका सबसे पक्का जोड़ीदार था शमशेर। दोनों की दोस्ती ऐसी थी जैसे हवस और लालच ने ही उन्हें जन्मों का साथी बना दिया हो।
दोनों हम उम्र थे, कोई 25,26 साल के, नया नया जोश, नयी जवानी.
लेकिन दोनों मे ही वो इच्छा थी जिसका अंत नहीं था, काम वासना और पैसो का लालच, यही वो वजह थी की थोड़े से टाइम मे दोनों पक्के दोस्त और एक दूसरे के राजदार बन गए थे.
"हिच... ह्ह्हम्मम्म्म्म..... हिचहम्म्म्..."
रमेश ने नशे में झूलते हुए, कांच के गिलास को चारपाई के पाये पर पटका। उसकी आँखें लाल सुर्ख हो रही थीं।
"यार शमशेर... क्या करूँ मैं? उस राघव की लुगाई ने मेरा जीना हराम कर रखा है। साला, सारा गाँव मेरी मुट्ठी में है, लेकिन वो साली सुगना... वो सेट ही नहीं हो रही!" रमेश ने एक गहरी, हवस भरी साँस छोड़ते हुए कहा।
शमशेर ने इत्मीनान से अपना दूसरा पेग बनाया। उसने रमेश की इस बेकरारी पर एक तिरछी नज़र डाली और बोला
"अबे साले, मुझे तो समझ ही नहीं आता कि उस सुगना में तुझे ऐसा क्या नज़र आता है? ऊपर से पेट से है वो... 8 महीने का गर्भ लेकर घूम रही है। और तू साला उसके पीछे पागल हुआ जा रहा है?"
रमेश की आँखों में एक अजीब सा पागलपन और वहशीपन तैर गया।
"अबे वही तो... वही तो पसंद है मुझे उसका!" रमेश अपने दोनों हाथों से हवा में कुछ टटोलते हुए बोला, "उसका वो निकला हुआ, गोरा और चिकना पेट... उफ्फ्फ! तूने देखा है साले उसे सुबह सरकारी नल पर पानी भरते हुए?"
शमशेर बस सिगरेट फूंकता रहा, और रमेश अपनी गंदी कल्पनाओं में डूबता चला गया।
"साली की उम्र मुश्किल से 22 साल होगी, लेकिन बदन देख उसका... एकदम कसा हुआ। 8 महीने का बच्चा पेट में है, फिर भी जब वो घाघरा-चोली पहन कर मटकती हुई नल तक आती है ना... साला, उसके वो बड़े-बड़े, भारी स्तन चोली को फाड़ कर बाहर आने को मचलते रहते हैं। उसकी गहरी घाटी पसीने से चमकती है। और जब वो घड़ा उठाकर वापस मुड़ती है... आय हाय!
उस भारी घाघरे के अंदर उसकी वो बड़ी-बड़ी, गोल गांड क्या गोते लगाती है यार! मैं शर्त लगा कर कह सकता हूँ शमशेर... पक्का साली अंदर कुछ नहीं पहनती। उफ्फ्फ्फ़... उसकी चुत की वो कच्ची खुशबू क्या होगी... गज़ब!"
रमेश सुगना की मादकता का बखान करते-करते अपने छोटे लंड को सहला रहा था.
"क्या यार... तू भी बड़ा अजीब आदमी है!" शमशेर ने पेग गटकते हुए कहा और हँस पड़ा।
"अजीब क्या है? क्या करूँ यार... मेरा लंड उसे देख के सब्र ही नहीं कर पाता। ये देख... उसके बारे में सोचते ही साला खड़ा होने लगा है।" रमेश ने नशे में बेशर्मी से अपनी पैंट की ज़िप के पास बने उस छोटे से, 2 इंच के उभार की तरफ इशारा किया।
शमशेर ने अलाव सेंकते हुए अपनी आँखें सिकोड़ीं और एक बहुत ही चुभता हुआ सवाल दागा, "अबे साले रमेश... एक बात बता। तू उस सुगना के पीछे एकदम पागल कुत्ता बना हुआ है, लेकिन घर पर तेरी अपनी लुगाई भी तो है! कामिनी भी तो पेट से है... उसका क्या? अपनी घर की खेती छोड़कर तू साला दूसरे के खेत में मुँह क्यों मार रहा है?"
कामिनी का नाम सुनते ही रमेश के चेहरे पर एक अजीब सी खीझ और नफरत उभर आई। उसने ज़मीन पर थूकते हुए कहा, "थू!
अरे काहे की खेती साले? वो साली तो एकदम ठंडी औरत है। मुर्दा है साली मुर्दा!"
रमेश ने गिलास को ज़ोर से चारपाई पर पटका। उसकी नई-नई शादी हुई थी, लेकिन कामिनी में उसे रत्ती भर भी कोई दिलचस्पी नहीं थी।
"अबे शमशेर... तूने देखा है उसे? साला, 22 साल की उम्र है उसकी, लेकिन बदन देख उसका... किसी सूखी लकड़ी जैसी है। बाउजी ने भी ना जाने क्या देख शादी करा दी उस गरीब घर मे, उसे देख लगता है कभी कुछ ढंग का खाने को ना मिला हो,
ना छाती में उभार है, ना गांड में गोलाई। और जब से वो पेट से हुई है... साला उसका चेहरा एकदम पीला पड़ गया है। आँखें गड्ढे में धंस गई हैं, जैसे खून ही ना बचा हो बदन में। एकदम मुरझा गई है। उसे देखकर तो मेरा जो थोड़ा बहुत मूड बनता भी है, वो भी मर जाता है।
रमेश ने पास पड़ी बोतल को मुँह से लगा लिया गुटक... गटक.. " हट साला कैसा दोस्त है तु, पूरा नशा ख़राब कर दिया मादरचोद ".
"हाहाहाहां... शमशेर हस पड़ा उसे रमेश की टांग खींचने मे मजा आ रहा था.
"बड़ी हसीं आ रही है तुझे, तेरा कुछ काम बना?" रमेश ने भी शमशेर की दुखती रग पर हाथ रख दिया.
"अब आया तु काम की बात पर, सुन मेरे पास एक प्लान है, जिससे तुझे सुगना भी मिल जाएगी और मुझे वो हाइवे वाली जमीन "
शमशेर रमेश के कान मे कुछ फुसफुसाने लगा.... औरत को चोदना है तो पहले उसके पति को मजबूर करना पड़ेगा.... उस राघव की गोटी सेट करनी पड़ेगी.
जैसे जैसे रमेश बोलता गया रमेश की आंखे चौड़ी होती गई, उसने नशे मे सर झटका.
"क्या भाई... सच.. ऐसा कर सकते है?"
"हाँ... भाई... पुलिस वाला हूँ आखिर मै "
दोनों मे कुछ खिचड़ी पक गई थी, गुनाह की नीव रख दी गई थी.
रमेश ने एक पेग और बना लिया, "साला मेरे से भी तेज़ दिमाग़ चला दिया तूने तो "
हाहाहाबा... हाहाहाबा.... दोनों राक्षसी हसीं हस पड़े.
तभी... अलाव के पास गूंजते इन गंदे ठहाकों के बीच, अंदर से एक मीठी सी आवाज़ आई।
"छम... छम... छम..."
पैरों में पहनी चांदी की भारी पायलों की आवाज़।
रमेश और शमशेर दोनों की नज़रें दालान के दरवाज़े की तरफ घूम गईं।
दरवाज़े की चौखट पर, अँधेरे को चीरता हुआ एक बहुत ही भारी, गदराया हुआ साया उभर कर आया। अलाव की पीली रौशनी उस साये के चेहरे पर पड़ी।
वो रमेश की ताईजी (सुगंधा ) थीं।
ताईजी... (रमेश के पिता की मौसी की लड़की)। बेचारी गरीब थी, बच्चा पैदा ना कर सकी तो उस ज़ालिम समाज और पति ने उसे दर-दर की ठोकरें खाने के लिए निकाल फेंका था। लेकिन दुनिया की नज़रों में रमेश उनके लिए एक 'देवदूत' बनकर आया था जिसने उन्हें पनाह दी थी। वो घर का सारा काम करती थीं और रमेश का ध्यान रखती थीं।
लेकिन शमशेर जानता था कि इस 'पनाह' के पीछे रमेश का क्या स्वार्थ था।
ताईजी की उम्र 40 साल थी, लेकिन असली देसी खान-पान और मेहनत की वजह से वो दिखने में किसी 30 साल की गदराई, रसभरी जवान औरत जैसी लगती थीं। उनका जिस्म जैसे एक पका हुआ मीठा फल था। उन्होंने एक सूती साड़ी पहनी हुई थी, जिसे उन्होंने गाँव की औरतों की तरह थोड़ा ऊपर करके बांधा था।
साड़ी के पल्लू के नीचे से उनके वो विशाल, भारी और ढलके हुए स्तन साफ़ नज़र आ रहे थे, जो उनके हर कदम के साथ हल्के-हल्के हिलते थे। उनकी कमर चौड़ी थी और मांस से पूरी तरह भरी हुई थी। जब वो चलती थीं, तो उनकी उस भारी, मटकी जैसी गांड का घुमाव किसी भी सन्यासी का ईमान डिगा सकता था। चेहरे पर एक अजीब सी मासूमियत थी, लेकिन जिस्म में एक ऐसी 'ठहरी हुई आग' थी जो किसी को भी जला दे।
शमशेर की वो ठरकी, घाघ और भेड़िये जैसी नज़रें ताईजी के उस भारी और मादक जिस्म पर फेवीकोल की तरह चिपक गईं। वो बिना पलक झपकाए ताईजी की उस गहरी नाभि और साड़ी से झांकती गोरी कमर को घूर रहा था।
"रमेश... खाना बन गया है बिटवा।" ताईजी ने अपनी मीठी, देहाती आवाज़ में कहा।
रमेश, जो अभी भी सुगना के ख्यालों में अपनी पैंट रगड़ रहा था, उसने बिना ताईजी की तरफ देखे हाथ हिलाते हुए कहा
"आप खा लो ताईजी... यहाँ बहुत ज़रूरी बात चल रही है। हम बाद में खा लेंगे।"
ताईजी ने अपना सिर हिलाया और पलट कर वापस रसोई की तरफ जाने लगीं।
जैसे ही वो मुड़ी, शमशेर ने अलाव की रौशनी में सुगंधा की उस विशाल, मटकती हुई कमर और भारी गांड को देखा... शमशेर ने शराब का एक बड़ा घूंट गले के नीचे उतारा। उसकी आँखें लाल हो गई थीं।
बाहर रमेश 22 साल की सुगना की जवानी का भूखा था, और यहाँ आँगन में शमशेर की हवस 40 साल की इस सुगंधा के गदराये बदन को चीरने के लिए मचल रही थी। दोनों ही इस गाँव की औरतों को नोचने के लिए तैयार बैठे थे।
क्रमशः

1 Comments
Ab aayega maja bhaut mast likha h kamni ka naya avatar
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