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मेरी माँ कामिनी -39


मेरी माँ कामिनी - भाग 39

रात के 9:00 बजे

किचन की लाइट बंद करके कामिनी जब बाहर निकली, तो घर में मौत जैसा सन्नाटा था। रमेश बेसुध सो रहा था, और बंटी अपने कमरे में था।
कामिनी के नंगे पैर ठंडे फर्श पर पड़ते हुए स्टोर रूम की तरफ बढ़ रहे थे।
उसके हाथ में खाने की थाली थी, लेकिन हथेलियां पसीने से भीग रही थीं। दिल पसलियों से टकरा रहा था— "धक्... धक्..."
यह सिर्फ़ एक भूखे को खाना देने जाना नहीं था।
उस थाली में सिर्फ़ रोटियाँ नहीं थीं... उसमें कामिनी का समर्पण, उसकी बरसों से दबी हुई वासना, घर की मर्यादा और एक औरत की "प्यास"—सब कुछ सजा हुआ था।

उसे महसूस हो रहा था कि वह एक लक्ष्मण रेखा पार कर रही है, लेकिन उस पार खड़ा "रावण" उसे अपने "राम" (पति) से ज्यादा अपना लग रहा था।
धड़कते दिल से उसे मुख्य घर से स्टोर रूम तक का फैसला तय कर लिया, गला सूखने को था, लेकिन उन्माद, उत्तेजना उसे होशला दे रहे थे.
कामिनी ने स्टोर रूम के पुराने, दीमक लगे लकड़ी के दरवाज़े को अपनी कोहनी से धीरे से धकेला।
"चर्रर्र..."
जंग लगी कब्जों की आवाज़ सन्नाटे में गूंजी और दरवाज़ा खुल गया।

अंदर एक जीरो वॉट का पीला बल्ब जल रहा था। उस मद्धम, बीमार सी रौशनी ने कमरे में एक तिलिस्मी और रहस्यमयी माहौल बना रखा था। हवा में सीलन, पुराने सामान और कादर के पसीने की मर्दाना गंध घुली हुई थी।
सामने कादर खान बैठा था।
वह ज़मीन पर बिछी एक पुरानी, मैली दरी पर दीवार से पीठ टिकाए अधलेटा सा था।
उसने सिर्फ़ एक पुरानी चेकदार लुंगी पहन रखी थी, जो उसकी कमर पर ढीली बंधी थी।

ऊपर का बदन... बिल्कुल नंगा था।
कामिनी की नज़रें थाली से हटकर सीधे कादर के उस विशाल और भव्य सीने पर जा टिकीं।
रमेश के ढीले और सफाचट सीने के मुकाबले, कादर का सीना किसी चट्टान जैसा था।
उसकी चौड़ी छाती पर काले, घने बालों का जंगल था, जो पसीने और नहाने के पानी से चमक रहा था।

उसके मज़बूत कंधे किसी योद्धा की तरह तने हुए थे।
और पेट? पेट की वो सख्त मांसपेशियां (Abs) साँस लेने पर एक लय में ऊपर-नीचे हो रही थीं।
उसकी सांवली त्वचा पर अभी भी नहाने के बाद की ताज़गी और नमी थी। वह साबुन और अपनी निज की गंध (Pheromones) छोड़ रहा था, जो कामिनी की नासाछिद्रों में घुसकर उसे मदहोश कर रही थी।

दरवाज़े पर आहट सुनते ही कादर ने सिर उठाया।
और सामने कामिनी को देखकर... उसकी सांसें गले में अटक गईं। पलकें झपकना भूल गईं।
कामिनी एक पतले, रेशमी सिल्क गाउन में खड़ी थी।
पीले बल्ब की रौशनी कामिनी के पीछे से आ रही थी, जिससे वह गाउन लगभग पारदर्शी हो गया था।

कादर की अनुभवी और बाज़ जैसी नज़रों ने एक पल में भांप लिया कि अंदर कुछ नहीं है।
गाउन का कपड़ा उसके बदन से चिपका हुआ था। उसके भारी स्तनों की गोलाई, उनका वजन और ठंडक से तन चुके निप्पल्स का तनाव साफ़ झांक रहा था।

कादर के लिए वह किसी अप्सरा जैसी लग रही थी—पवित्र भी, और पापपूर्ण भी। एक ऐसी देवी जिसे पूजा भी जा सकता था और भोगा भी जा सकता था।
कामिनी ने अंदर आकर दरवाज़ा पीछे से बंद किया और कुंडी लगा दी।
"खटक..."
लोहे की चिटकनी की उस आवाज़ ने कमरे में बाहरी दुनिया को रोक दिया। अब यहाँ कोई समाज, कोई पति, कोई मान मर्यादा नहीं थी .. सिर्फ़ एक मर्द और उसकी दबी कुचली इच्छा थी,
कामिनी दरी पर, कादर के बिल्कुल सामने, घुटनों के बल बैठ गई।
उसने थाली बीच में रखी।
कादर की नज़रें शर्म और झिझक से झुकी हुई थीं। वह कामिनी के चेहरे को देखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था, क्योंकि उसकी नज़र बार-बार उसके खुले गले और गाउन के अंदर लटकते उन रसीले फलों पर फिसल रही थी, जिन्हें वह अपनी मुट्ठी में भरने के लिए तड़प रहा था।
खामोशी बहुत भारी हो गई थी। सिर्फ़ दोनों की साँसों की आवाज़ आ रही थी।

कादर ने चुप्पी तोड़ी। उसकी आवाज़ भारी, गहरी और भर्राई हुई थी।
"मुझे माफ़ कर दीजिये कामिनी जी..."
कादर ने अपनी मुट्ठियाँ अपनी लुंगी पर भींच लीं। नसों का जाल उसकी बांहों पर उभर आया।

"मेरी वजह से... आज आपके साथ वो सब हुआ। उन गुंडों ने आपको हाथ लगाया... आपको तकलीफ दी। मैं गुनहगार हूँ आपका। मुझे बहार नहीं जाना चाहिए था ..."
कामिनी ने कादर की आँखों में देखा।
वहां सिर्फ़ और सिर्फ़ पश्चाताप था। एक गुंडे की आँखों मे नमी?
कामिनी कुछ नहीं बोली।
बोलती भी क्या?
उसे खुद नहीं पता था कि जो हुआ वो गलत था या सही।
उस दर्द ने, उस घसीटने ने, उस नोंचने ने एक अलग सा अहसास और सिंहरन पैदा कर दी थी उसके जिस्म मे, 
रमेश तो बिस्तर पर पड़ा एक लाश था, लेकिन यह कादर... यह जिन्दा आग था। कादर की ताकत उसकी हिम्मत, उसका रोन्द्र रूप कामिनी को भा गया था, उसके दिल मे उतर चूका था.

और वैसे भी, गुंडों ने तो सिर्फ़ छुआ था... उसकी असली इज़्ज़त और जान तो इसी "गुनहगार" ने बचाई थी।
कामिनी ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसने थाली में रखी रोटी का एक टुकड़ा तोड़ा।
उसे सब्जी में अच्छी तरह डुबोया।
और धीरे से अपना गोरा, नाज़ुक हाथ कादर के खुरदरे मुंह की तरफ बढ़ा दिया।

कादर सन्न रह गया।
वह हैरान था। उसकी आँखों में अविश्वास था।
उसने अपनी नज़रें उठाईं।
कामिनी की आँखों में न गुस्सा था, न डर, न नफरत।
वहां सिर्फ़ अपनापन था... एक अजीब सी ममता और प्यास का मिश्रण।
वह बड़े घर की रोबदार औरत नहीं लग रही थी, वह एक प्रेमिका लग रही थी जो अपने रूठे यार को मना रही हो।
कादर, जो बचपन से अनाथ था, जिसने गलियों की खाक छानी थी, जिसे लोगों ने सिर्फ़ दुत्कारा था, पुलिस ने पीटा था, या डरकर "कादर भाई" कहा था...
आज उसे कोई इज़्ज़तदार घर की औरत अपने हाथों से खाना खिला रही थी।

यह खाना नहीं, यह प्रेम का निवाला था।
कादर का दिल भर आया। गला रुंध गया।
उसका कठोर, पत्थर जैसा सीना पिघलने लगा। उसे लगा जैसे उसका कोई वजूद ही नहीं, वह बस इस औरत के चरणों की धूल है।

उसे लगा जैसे वह कोई छोटा बच्चा है और सामने उसकी माँ बैठी है।
उसने कांपते होंठों से अपना मुंह खोला।
कामिनी ने वह निवाला उसके मुंह में रख दिया।
कामिनी की उंगलियां कादर के होठों से छू गईं।
"झन्न्न्न्...."
एक बिजली का करंट सा दौड़ा दोनों के बदन में।
कादर ने निवाला चबाया, लेकिन उसे रोटी का स्वाद नहीं आ रहा था... उसे सिर्फ़ कामिनी की उंगलियों की महक और उसके स्पर्श की गर्माहट महसूस हो रही थी।

उसका मन किया कि वह दहाड़ मारकर, फूट-फूट कर रो दे। कामिनी के पैरों में गिर जाए।
वह कादर खान... जिसे पुलिस के थर्ड डिग्री टॉर्चर नहीं रुला सके, आज एक निवाले ने उसे अंदर से तोड़कर रख दिया था।

लेकिन वह मर्द था... साला गुंडा था... रोता कैसे?
उसने अपनी भावनाओं को हलक में ही दबा लिया। उसकी आँखें नम हो गईं, किनारों पर पानी तैरने लगा, लेकिन उसने आंसू गिरने नहीं दिए।

कामिनी उसे खिलाती रही। एक के बाद एक निवाला।
कामिनी की नज़रें कादर के चेहरे से हट ही नहीं रही थीं।
वह उसकी मज़बूत गर्दन को देख रही थी जहाँ निवाला निगलते वक़्त कंठ (Adam's apple) ऊपर-नीचे हो रहा था।
वह उसके चबाते हुए मज़बूत जबड़े को देख रही थी।
इस वक़्त कादर उसे सिर्फ़ एक प्रेमी या रक्षक नहीं लग रहा था।
उसमें कामिनी को रति (कामदेव की पत्नी) और ममता की मूरत (अन्नपूर्णा)... सब एक साथ दिखाई दे रहा था।
उसे लग रहा था कि वह किसी भूखे शेर को पाल रही है,

 जो बाद में उसी को शिकार बनाएगा... और वह शिकार बनने के लिए तैयार थी।
कादर खाते-खाते, अनजाने में, कामिनी की उंगलियों को अपने होंठों से हल्का सा चूमने लगा।
निवाला लेते वक़्त उसके होंठ कामिनी की पोरों (Fingertips) को स्पर्श कर रहे थे।
यह जानबूझकर नहीं था, यह बस उस समर्पण का इज़हार था।
कामिनी ने हाथ नहीं खींचा।
उसे कादर के गीले, गर्म होंठ और उसके होंठो पर क्लीन शेव के बाद उग आगे कड़क रोये अपनी उंगलियों पर महसूस हो रही थी।

यह स्पर्श... रमेश के उस मरे हुए, ठंडे स्पर्श से लाख गुना ज़्यादा जीवंत और उत्तेजक था।
थाली खाली हो रही थी।
स्टोर रूम की हवा में तनाव इतना बढ़ गया था कि एक चिंगारी से विस्फोट हो सकता था।

थाली कब एक तरफ सरका दी गई पता ही नहीं चला, खाना तो कबका खत्म हो गया था, 
लेकिन कादर अभी भी कामिनी की उंगलियों को अपने मुंह में भरे हुए था।
वह किसी भूखे बच्चे की तरह नहीं, बल्कि एक समर्पित भक्त की तरह उसकी उंगलियों को चूस रहा था।
"सुडप... सुडप..."
उसकी खुरदरी जीभ कामिनी की पोरों के बीच, नाखूनों के किनारों पर और हथेली के मांसल हिस्सों पर फिर रही थी।
जैसे वह कामिनी के शरीर का सारा स्वाद, सारी महक अपनी आत्मा में उतार लेना चाहता हो।
कामिनी की आँखें मदहोशी में बंद हो रही थीं और फिर झटके से खुल जातीं।
जब भी उनकी नज़रें मिलतीं, हवा में एक अदृश्य बिजली कौंध जाती।
कामिनी का जिस्म सिसक रहा था।
कादर का यह गीला और गर्म स्पर्श उसकी उंगलियों से होता हुआ सीधे उसकी नसों में आग लगा रहा था।
उसकी योनि में एक मीठा सा दर्द और भारीपन आ गया था। वहां से रिसता हुआ कामरस (wetness) अब बेकाबू हो रहा था, जैसे किसी बांध के दरवाज़े खुल गए हों।

अचानक, कादर ने उसकी कलाई पकड़ी और उसे अपनी तरफ खींचा।
कामिनी, जो पहले से ही उस जादू की गिरफ़्त में थी, किसी चुंबक की तरह खिंचती चली गई।
दोनों के चेहरे एक-दूसरे के बेहद करीब आ गए। गर्म सांसें आपस में टकराने लगीं।
और फिर... जुड़ गए।
दोनों के होंठ एक-दूसरे पर टूट पड़े।
यहाँ कोई शब्द नहीं बोले गए, क्योंकि इन हालातों के लिए कोई शब्द बने ही नहीं थे।

कादर ने कामिनी के निचले होंठ को अपने दांतों और होंठों के बीच दबा लिया और उसे चूसने लगा।
कामिनी ने अपनी उंगलियां कादर के घने बालों में फंसा दीं और उसे अपने और करीब खींच लिया।
मुंह के अंदर जीभों की लड़ाई शुरू हो गई। एक-दूसरे की लार, एक-दूसरे की सांसें... सब एक हो रहा था।
कमरे में सिर्फ़ चूसने और भारी सांसों की आवाज़ें गूंज रही थीं— "म्मम्म्म... उम्म्म्म..."

कामिनी की उत्तेजना अब बर्दाश्त से बाहर हो रही थी।
उसे कादर के और करीब जाना था। इतना करीब कि हवा भी बीच से न गुज़र सके।
चुंबन को तोड़े बिना, कामिनी ने अपने घुटने उठाए और कादर की कमर के दोनों तरफ अपने पैर फैला दिए।
वह कादर की गोद में आ बैठी।
जैसे ही कामिनी की भारी और मांसल गांड कादर की जांघों पर टिकी...
एक धमाका हुआ।
कामिनी के पतले रेशमी गाउन के नीचे उसकी नंगी, गीली और गर्म योनि... कादर की लुंगी के नीचे तने हुए उस विशाल और पत्थर जैसे सख्त मुसल लंड से टकरा गई।
कपड़े की दो पतली परतें थीं, लेकिन अहसास ऐसा था जैसे नंगी बिजली का तार छू लिया हो।
कादर का लंड, जो लुंगी के अंदर फन उठाए खड़ा था, कामिनी की दरार के ठीक बीचों-बीच सेट हो गया।
वह इतना मोटा और सख्त था कि कामिनी को अपने नितंबों के बीच एक लोहे की रॉड महसूस हुई।
कामिनी की रूह कांप गई।

रमेश के जिस मांस के लोथड़े पर वह कुछ देर पहले कूद रही थी, उसके मुकाबले यह चट्टान थी।
कामिनी पागल हो गई।
उसने अपने होंठ कादर के होंठों में उलझाए रखे और नीचे...
अपनी कमर को हिलाना शुरू कर दिया।
वह गाउन के ऊपर से ही अपनी गीली चुत को कादर के लंड पर रगड़ने लगी।

"घिस... घिस..."
लुंगी का खुरदरा कपड़ा उसकी संवेदनशील चुत को रगड़ रहा था, और नीचे कादर का मुसल उसकी हर रगड़ का जवाब दे रहा था।
दोनों के जिस्म पसीने से भीग चुके थे।
कादर के मज़बूत हाथ कामिनी की कमर और पीठ पर कस गए थे, उसे और जोर से नीचे दबा रहे थे।
ऊपर होंठों का युद्ध चल रहा था, और नीचे जिस्मों का घर्षण।


कादर और कामिनी के होंठ एक-दूसरे से ऐसे चिपके हुए थे जैसे ज़िंदगी और मौत का सवाल हो।
यह सिर्फ़ चूमना नहीं था, यह एक-दूसरे की "प्राणवायु" को चूस लेना था।
कामिनी ने अपनी जीभ कादर के मुंह के अंदर इतनी गहराई तक धकेल दी थी कि वह कादर के तालू (Palate) को गुदगुदा रही थी।
कादर ने जवाब में कामिनी की जीभ को अपने दांतों और होठों के बीच जकड़ लिया और उसे किसी लॉलीपॉप की तरह चूसने लगा।
"स्लप... चप... सुडप..."
कमरे में सिर्फ़ गीली आवाज़ें गूंज रही थीं। दोनों के मुंह से लार (Saliva) का अत्यधिक रिसाव हो रहा था, जो उनके होठों के कोनों से बहकर उनकी ठुड्डी और गले को भिगो रहा था।

कामिनी पागलों की तरह कादर के होंठों को चूस रही थी, काट रही थी।
उसने अपनी जीभ कादर के मुंह के अंदर पूरी ताकत से घुसा दी थी, जिसे कादर ने बड़े ही चाव और लगन से अपनी जीभ से लपेटा और चूसना शुरू कर दिया।

मुंह के अंदर एक अलग ही युद्ध चल रहा था—दोनों की जीभें आपस में गुत्थमगुत्था हो रही थीं, दोनों एक-दूसरे की लार को पी रहे थे । कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं था, जैसे बरसों की प्यास एक ही पल में बुझा लेना चाहते हों।

"हम्मफ़्फ़्फ़... हमफ्फ्फ्फफ्फ्फ़...."
थोड़ी देर में ही, साँस की कमी ने कामिनी को हार मानने पर मजबूर कर दिया। उसका दम घुटने लगा था, फेफड़े हवा के लिए तड़प उठे।
एक झटके से उसने अपना सिर पीछे खींचा।
दोनों के होंठ अलग हुए, लेकिन उनके बीच थूक और लार की एक लंबी, चिपचिपी तार खिंच गई जो टूटकर कामिनी की ठुड्डी पर गिर गई।

"हम्मफ़्फ़्फ़.. हमफ़्फ़्फ़... कादर..."
कामिनी हांफ रही थी। उसका सीना तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहा था।
लेकिन ऊपर की सांसें भले ही रुक गई हों, नीचे का काम जारी था।
कामिनी की कमर अभी भी, अपनी ही लय में, धीरे-धीरे कादर के पत्थर जैसे लंड पर रगड़ खा रही थी।
"घिस... घिस..."

लुंगी और गाउन के कपड़े के बीच से वह रगड़ ऐसी लग रही थी जैसे कामिनी कादर के हथियार को धार दे रही हो। वह अपनी योनि की गर्मी उस तक पहुँचा रही थी।
कादर मदहोश होकर अपनी गोद में बैठी इस काम-पिपासु औरत को देख रहा था।

कामिनी के होंठ सूजकर लाल हो गए थे, दोनों कोनों से लार टपक रही थी।
लेकिन कादर की नज़रें चेहरे पर नहीं टिकीं।
इस हाथापाई और रगड़ में, कामिनी के गाउन की ढीली ज़िप और खुल गई और रेशमी कपड़ा उसके कंधों से फिसलकर नीचे लटक गया था.

उसके बड़े, भारी और उन्नत स्तन (Breasts) अब पूरी तरह से आज़ाद थे।
पसीने और उत्तेजना से कामिनी की त्वचा गुलाबी पड़ गई थी।
उसके स्तनों के निप्पल्स,  जो ठंडक और रगड़ से पहले ही खड़े थे, अब हवा के स्पर्श से और भी सख्त और नुकीले हो गए थे, 

वे साँस लेने की वजह से तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहे थे— "धौंकनी की तरह।"
पसीने से भीगे हुए वो गोरे-चिट्टे मांस के गोले बल्ब की पीली रौशनी में चमक रहे थे। उनके ऊपर तने हुए काले-भूरे निप्पल्स कादर को सीधे चुनौती दे रहे थे।

कादर का लंड लुंगी के अंदर एक ज़बरदस्त झटका खा गया।
वह इस हसीन और उत्तेजक मंज़र को और बर्दाश्त नहीं कर सका। उसका सब्र टूट गया।
कादर ने एक जानवर की तरह गुर्राते हुए कामिनी के स्तनों पर हमला बोल दिया।

उसने बाएँ स्तन को नीचे से हथेली का सहारा दिया और ऊपर से मुंह खोलकर पूरे एरियोला (Areola) सहित निप्पल को अपने मुंह में भर लिया।
"गप्पप... भप..."
​उसने एक ज़बरदस्त वैक्यूम (Vacuum) बनाया और गाल पिचका कर चूसने लगा।
कामिनी की रीढ़ की हड्डी में बिजली दौड़ गई।
कादर की खुरदरी जीभ निप्पल के छेद पर गोल-गोल घूम रही थी, और उसके दांत निप्पल की जड़ को हल्का-हल्का कुतर रहे थे।
यह दर्द और मज़े का ऐसा संगम था कि कामिनी की आँखें पलट गईं।
​उसी वक़्त, कादर के दाहिने हाथ ने कामिनी के दूसरे स्तन पर कब्जा कर लिया।
उसने अपनी मज़बूत, गुंडों वाली उंगलियों को उस नरम, मखमली मांस में गड़ा दिया।
वह उसे आटे की लोई की तरह मसल रहा था, अपनी मुट्ठी में भरकर निचोड़ रहा था।
कभी वह उसे ऊपर उठाता, कभी दबाता।
​"आअह्ह्ह.. माआआं... उउउफ्फ्फ्फ़.... कादर... निचोड़ ले..."
कामिनी सिसक उठी, उसका जिस्म धनुष की तरह तन गया।
उसने अपने दोनों हाथों से कादर के सिर को जकड़ लिया और उसे अपनी छाती में और ज़ोर से भींचने लगी।
वह चाहती थी कि कादर उसके स्तनों को खा जाए, पी जाए।

"आअह्ह्ह.. आउचम्म... उउउफ्फ्फ्फ़.... कादर..."
कामिनी के मुंह से एक तीखी, कामुक सिसकी निकल गई।
दर्द और मज़े की एक लहर ने उसके जिस्म को अकड़ा दिया।
कादर के दांतों का हल्का सा दबाव और उसके हाथ की वहशी पकड़... यह वही तो था जिसके लिए वह तरस रही थी। रमेश ने कभी उसे ऐसे नहीं छुआ था। रमेश उसे नोचता था, लेकिन कादर उसे पी रहा था।

कादर एक स्तन को छोड़ता और दूसरे पर टूट पड़ता।
"चप... चप... चप..."
कमरे में सिर्फ़ चूसने की गीली आवाज़ें और कामिनी की भारी आहें गूंज रही थीं।
कादर कामिनी के निप्पल्स को अपनी जीभ से गुदगुदाता, फिर दांतों से हल्का काटता, और फिर चूसकर उसे लाल कर देता।
कामिनी की योनि अब पूरी तरह से बाढ़ की चपेट में थी। उसका पूरा गाउन नीचे से गीला हो चुका था।
वह कादर की गोद में उछलना चाहती थी, लेकिन कादर ने उसे अपनी पकड़ में जकड़ रखा था।

​नीचे, कामिनी की योनि अब बाढ़ की तरह बह रही थी।
गाउन का रेशमी कपड़ा उसकी जांघों के बीच पूरी तरह गीला होकर पारदर्शी हो चुका था।
कादर का लुंगी में कैद लंड उस गीलेपन और गर्मी को महसूस कर रहा था।
कामिनी जानबूझकर अपनी पेल्विस (Pelvis) को गोल-गोल घुमा रही थी— "मथनी की तरह।"
वह अपनी गीली चुत की रगड़ से कादर के लंड को लुंगी के अंदर ही पागल कर रही थी।

लंड की टोपी लुंगी के कपड़े से रगड़ खा रही थी, और ऊपर कादर के मुंह में कामिनी का निप्पल खिंच रहा था।
​कामिनी बड़बड़ाई, "और जोर से कादर... मेरे दूध के कटोरे हैं ये... पी जा इन्हें... मुझे खाली कर दे..."
यह सुनते ही कादर ने चूसने की रफ़्तार बढ़ा दी।
"सुडप... सुडप... स्लर्प..."
वह एक निप्पल छोड़ता और दूसरे पर लपकता, जैसे बरसों का प्यासा बछड़ा अपनी माँ के थनों पर टूट पड़ा हो।

कादर की गोद में बैठी कामिनी पूरी तरह से बेसुध हो चुकी थी।
उसका रेशमी गाउन सरककर उसकी कमर पर इकट्ठा हो गया था, जैसे किसी पुराने पर्दे को हटा दिया गया हो।

बल्ब की पीली, मद्धम रौशनी में कामिनी की विशाल, गोरी और नंगी गांड पसीने से भीगी हुई चमक रही थी।
कादर के दोनों मज़बूत और खुरदरे हाथ उस मलाई जैसे मुलायम मांस पर जम गए।

वह कामिनी के कूल्हों (Buttocks) को सिर्फ़ पकड़ नहीं रहा था, बल्कि उन्हें बेदर्दी से मसल रहा था। उसकी उंगलियां मांस में धंस रही थीं, उसे दबा रही थीं, और फिर अपनी तरफ खींचकर अपने लोहे जैसे सख्त लंड पर कस रही थीं।

"आअह्ह्ह.... आअह्ह्ह... सस्सियस... उउउफ्फ्फ्फ़...."
कामिनी का सिर पीछे की तरफ लुढ़क गया था।
ऊपर, कादर का मुंह अभी भी उसके स्तन से चिपका हुआ था। वह एक निप्पल को वैक्यूम की तरह चूस रहा था, जबकि उसका एक हाथ दूसरे आज़ाद स्तन को पकड़कर रगड़-रगड़ कर लाल कर चुका था। 20210802-133132
कामिनी उत्तेजना और हवस के भंवर में फंसकर कादर के घने बालों को अपनी मुट्ठियों में जकड़ रही थी, उन्हें खींच रही थी, जैसे वह उस दर्द और मज़े को संतुलित करने की कोशिश कर रही हो।

लेकिन असली कयामत तो नीचे हो रही थी।
कादर का लंड लुंगी के अंदर फन उठाए खड़ा था, और कामिनी की गीली चुत गाउन के कपड़े के ऊपर से ही उस पर रगड़ खा रही थी।
कादर का एक हाथ कामिनी की गांड के एक हिस्से (Butt cheek) को कसकर दबोचे हुए था, जबकि उसका दूसरा हाथ...
वह दूसरा हाथ कामिनी की गांड की गहरी और पसीने से भीगी दरार (Cleft) में खेल रहा था।
कादर की मोटी और सख्त उंगली कामिनी की उस दरार में ऊपर-नीचे नाच रही थी।

वह उंगली धीरे-धीरे फिसलती हुई नीचे जाती... और जैसे ही वह कामिनी के गांड के संकरे छेद (Anus) को छूती...
"इइइस्स....उउउफ्फ्फ्फफ्फ्फ़ग..."
कामिनी के बदन में बिजली दौड़ जाती।
उसकी कमर अपने आप आगे की तरफ झटका खाती, जिससे उसकी गीली योनि कादर के खड़े लंड से और ज़ोर से चिपक जाती।

यह एक लय बन गई थी।
जैसे ही लंड की रगड़ और चाहत उसे महसूस होती, कामिनी अपनी कमर पीछे करती, ताकि वह रगड़ और गहरी हो।
लेकिन जैसे ही वह पीछे आती, कादर की उंगली फिर से उस गीले, कामुक और वर्जित छेद पर रगड़ खाने लगती, उसे गुदगुदाने लगती।
कामिनी मरे जा रही थी।
पीछे गांड में उंगलियों की शैतानी, और आगे चुत पर लंड की सख्ती।
ऊपर स्तन मसले जा रहे थे, निप्पल चूसे जा रहे थे।
उसका पूरा शरीर एक कामुक यंत्र बन गया था जिस पर कादर अपनी धुन बजा रहा था।

कामिनी का सब्र का पैमाना अब छलक चुका था।
उसे अपनी पिछली सारी अधूरी रातें याद आ गईं।

हर बार जब भी वह अपनी हवस मिटाने की दहलीज पर होती, कोई न कोई अड़चन, कोई न कोई मुसीबत आ ही जाती थी।
आज वह ऐसा नहीं चाहती थी। उसे डर था कि कहीं फिर कोई आ न जाए, कहीं यह नशा उतर न जाए।
कामिनी ने कादर के बालों को झकझोरा और उसका चेहरा अपने स्तनों से हटाया।
उसकी आँखों में आंसू और हवास दोनों थे।
वह हांफ रही थी, उसकी छाती धौंकनी की तरह चल रही थी।
"हमफ़्फ़्फ़... हमफ्फ्फ्फफ्फ्फ़.... कादर... प्लीज..."
कामिनी की आवाज़ टूटी हुई और भारी थी।
"अब और नहीं... प्लीज कादर... सब्र नहीं होता अब..."
उसने अपनी कमर को कादर के लंड पर ज़ोर से पटका।
"मुझे भर दो... मैं मर जाउंगी ऐसे... मेरी चुत मे दर्द हो रहा है, मिटा दो ये दर्द, .. इसे अंदर ले लो कादर... अभी... इसी वक़्त..."
कामिनी दुहाई मांग रही थी।
ना जाने सभ्य कामिनी ऐसे शब्द कैसे बोल गई, हमेशा अपनी इच्छा, अपनी भावनाओं को दबाये रखने वाली औरत आज लंड लेने की चाहत को चिल्ला कर बता रही थी.
कुदरत का निज़ाम भी गजब है, कब किसको क्या बना दे.

कामिनी बेइंतहा पागल हुए जा रही थी। उसकी कामुकता ने शर्म और हया के सारे बांध तोड़ दिए थे।
उसकी चुत से निकल रहे निरंतर पानी के रिसाव ने कादर की जांघों और उसकी लुंगी के उस हिस्से को पूरी तरह गीला कर दिया था जहाँ वह बैठी थी।
वहाँ एक "बाढ़" आई हुई थी।

कामिनी ने अपनी कांपती हुई, गोरी और भारी जांघों को थोड़ा ऊपर उठाया।
उसने अपनी नज़रें नीचे झुकाईं।
गाउन और लुंगी की रगड़ में, कादर का लंड तो कबका बाहर आ चुका था।
बल्ब की पीली रौशनी में वह बिल्कुल नंगा था, और सबसे उत्तेजक बात यह थी कि वह कामिनी की ही चुत के रस से सना हुआ था।
वह विशाल, काला और नसों वाला मुसल कामिनी के कामरस की वजह से शीशे की तरह चमक रहा था।
उसका टोपा (Supari), जो एक बड़े मशरूम जैसा था, लाल होकर धधक रहा था और उस पर कामिनी की योनि का चिपचिपा पानी लगा हुआ था।

कामिनी का मन किया कि झुक जाए और इस हसीन, गीले और रसीले लंड को प्यार करे।
उसे अपनी जीभ से साफ़ करे, उसे चाटे।
लेकिन उसकी प्राथमिकता अभी अलग थी।
उसके अंदर, उसकी चुत के मुहाने पर जो मीठी खुजली और खालीपन था, उसे मिटाना सबसे ज़रूरी था। वह उस लंड को अपने अंदर महसूस करने के लिए मर रही थी।

कामिनी ने एक बार अपनी नशीली आँखों से कादर की ओर देखा।
उसकी आँखों में एक मूक प्रश्न था, जैसे अनुमति मांग रही हो— "क्या मैं इसे ले लूं?"
कादर ने उसकी आँखों में झांका। उसने कामिनी की तड़प को महसूस किया।
उसने अपने भारी होंठ हिलाए और धीरे से, लेकिन अधिकार के साथ फुसफुसाया:
"तेरा ही है...कामिनी... पूरा ले लो इसे..."
कादर के इन शब्दों ने कामिनी के कानों में पिघला हुआ सोना डाल दिया।

कामिनी का चेहरा शर्म और उत्तेजना से लाल होकर जलने लगा।
उसने एक गहरी सांस ली।
उसने अपनी दोनों टांगे कादर की कमर के दोनों तरफ और चौड़ी कर दीं।
संतुलन बनाने के लिए उसने अपने दोनों गोरे हाथ कादर के मज़बूत कंधों पर रख दिए, जैसे कोई घुड़सवार अपनी सवारी को थाम रहा हो।

कादर जानता था कि उसका हथियार कितना बड़ा है और कामिनी कितनी नाज़ुक।
इसलिए उसने तुरंत अपने दोनों मज़बूत हाथ कामिनी के भारी कूल्हों (Buttocks) के नीचे लगा दिए।
उसने उसकी गांड को अपनी हथेलियों में भर लिया, ताकि वह कामिनी के वजन को संभाल सके और उसे अचानक गिरने से रोक सके।

अब... मिलन का क्षण आया।
कामिनी धीरे-धीरे, बहुत संभलकर नीचे बैठने लगी।
उसने अपनी कमर को सेट किया।
उसकी योनि का गीला और खुला हुआ मुंह कादर के लंड के टोपे (Head) पर आकर टिक गया।

"आआआआहहहह..... आउच.... उइइइ...."
कादर का वह मोटा, गर्म और लोहे जैसा सख्त टोपा जैसे ही कामिनी की गीली और संवेदनशील त्वचा से छूआ...
कामिनी कांप उठी।
एक ठंडे बर्फ जैसी लहर ने उसके पूरे जिस्म को अपनी आगोश में ले लिया। 
यह अहसास इतना तीव्र था कि उसकी रीढ़ की हड्डी में झनझनाहट हो गई। ये अहसास भी क्या गजब होता है, लंड चुत दोनों ही गर्म होते है लेकिन उनका मिलन ठंड़ाई देता है.

कामिनी ने अपनी आँखें फाड़कर नीचे देखा।
वह दृश्य अविश्वसनीय था।
उसकी गोरी-चिट्टी, फूली हुई योनि के गुलाबी होंठ (Labia) कादर के उस काले, विशाल लंड के टोपे को चूम रहे थे।

कादर का लंड इतना मोटा था कि वह कामिनी की चुत के मुहाने पर ही अटक गया था।
हालाँकि कल रात रघु के साथ चुदने से उसकी योनि में थोड़ी जगह और लचीलापन बन गया था, लेकिन रघु का लंड एक आम इंसान का लंड था... और यह?
यह कादर खान का "अजगर" था।

इसे अंदर लेने के लिए कामिनी को अपनी आत्मा तक का दरवाज़ा खोलने की जरुरत पड़ने वाली थी.

कामिनी रुकी नहीं।
उसने कादर के कंधों पर अपनी पकड़ मज़बूत की और अपनी गांड को ढीला छोड़ा।
कादर ने भी नीचे से हल्का सा धक्का दिया।
और फिर... एक गीली, लसलसी आवाज़ गूंजी।

"पच... पच... फस्स्स..."
उस आवाज़ के साथ, कादर का वह विशाल, गुलाबी और नंगा टोपा कामिनी की तंग योनि की दीवारों को चीरता हुआ अंदर धंस गया।
मांस ने मांस को रास्ता दिया। कामिनी की योनि की दीवारें फैल गईं, उस मोटे घेरे को अपने अंदर समाने के लिए खिंच गईं।

"आआआह्ह्हः... कादर..... हाआआए.... मै मर गई..."
कामिनी लगभग चीख ही उठी।
उसकी गर्दन पीछे लुढ़क गई।
यह दर्द नहीं था, यह पूर्णता (Completion) का अहसास था।
उस मोटे टोपे के अंदर घुसते ही कामिनी को लगा जैसे उसके पेट के निचले हिस्से में कोई ज्वालामुखी भर गया हो।
राहत और उस अजीब से, भरे-भरे अहसास की वजह से कामिनी ने अनजाने में अपनी गांड के छेद (Anus) और योनि की मांसपेशियों को कसकर सिकोड़ लिया।

उसकी भीतरी दीवारों ने कादर के टोपे को जकड़ लिया, जैसे कह रही हों— "अब तुझे जाने नहीं दूंगी।"
कादर ने भी सिसकारी ली। कामिनी की वो गर्म, भींचने वाली पकड़ (Grip) उसे पागल कर रही थी।

वह जकड़ इतनी तेज़ थी कि कादर की आँखों के आगे अंधेरा छा गया।
"उफ्फ्फ्फ... कामिनी..." कादर बुदबुदाया।
कादर के होश भी उड़ गए थे, पहली बार किसी औरत ने उसके मुँह से सिस्कारी निकली थी, वो कादर जो ना जाने कितनी रंडियो औरतों को मसल चूका था, चुत को फाड़ चूका था, लेकिन आज?
आज एक घरेलु औरत ने उसके लंड को ऐसे जकड़ा हुआ था मानो उसके लंड का गला दबोच लिया हो.
टोपा अंदर था... लेकिन अभी 8 इंच का लंबा सफर बाकी था।
8इंच कहने सोचने मे छोटा है, लेकिन ये फैसला 8किलोमीटर से कम का तो कतई नहीं लग रहा था, कामिनी को ये फैसला तय करना ही था आज.

कादर का बाकी बचा हुआ 8 इंच लंबा और कलाई जैसा मोटा तना बाहर लुंगी के ऊपर अकड़ा हुआ था, जिस पर मोटी-मोटी नसें (Veins) सांप की तरह लिपटी हुई थीं।
कामिनी ने एक गहरी सांस ली।

उसने अपने फेफड़ों में हवा भरी, और अपने दोनों हाथों से कादर के मज़बूत कंधों को कसकर जकड़ लिया। उसके नाखून कादर के मांस में गड़ गए।
उसने अपनी कमर को ढीला छोड़ा और धीरे-धीरे... नीचे उतरना शुरू किया।
"फस्स्स... सर्रर्र.... पच..."
जैसे ही कामिनी नीचे खिसकी, कादर का मोटा लंड उसकी तंग गुफा को चीरता हुआ (Stretching) ऊपर चढ़ने लगा।

कामिनी को महसूस हुआ कि सिर्फ़ मांस नहीं, बल्कि कोई गर्म लोहे की रॉड उसके अंदर डाली जा रही है।
वह रॉड बिल्कुल चिकनी नहीं थी।
कादर के लंड पर उभरी हुई सख्त नसें कामिनी की योनि की नाज़ुक और रसीली दीवारों को रगड़ती हुई (Scraping), उन्हें सहलाती हुई अंदर घुस रही थीं।
हर इंच के साथ कामिनी की आँखें फटी जा रही थीं।

"आआआह्ह्ह... उइइइ माँ... कितना बड़ा है... उफ्फ्फ्फ..."
कामिनी सिसक रही थी, लेकिन रुक नहीं रही थी।
आधा लंड अंदर जाते ही कामिनी की साँसें अटक गईं।
उसे लगा उसका पेट भर गया है। उसे लगा अब और जगह नहीं बची।
रमेश का लंड तो कभी चुत के मुहने से आगे बढ़ा ही नहीं था, लेकिन कादर का लंड? यह तो अभी आधा भी नहीं गया था और कामिनी को "भरने" (Fullness) का अहसास हो रहा था।
कैसी बेहया हो गई थी कामिनी हर वक़्त रमेश से तुलना किये जा रही थी, खेर करती भी क्यों नहीं... इस अंजाम तक लाने वाला भी तो वही था.

कामिनी एक पल के लिए रुकी।
उसकी योनि की दीवारें उस मोटाई के साथ तालमेल बिठाने (Adjust) के लिए फैल रही थीं।

उसकी चुत का रस (Lubrication) उस काले लंड को गीला और फिसलन भरा बना रहा था, ताकि वह और गहराई तक जा सके।
कादर ने नीचे से कामिनी की कमर पकड़ी और हौसला दिया—
"क्या हुआ अभी से हार मन ली क्या कामिनी जी?" कादर मुस्कुराता हुआ फुसफुसाया.

कादर की इस कामुक चुनौती ने कामिनी के अंदर आग लगा दी।
उसने अपनी आँखें बंद कीं, दांत भींचे और एक ही झटके में अपनी पूरी ताकत से नीचे बैठ गई।

"धप्प!!"
मांस से मांस टकराने की एक भारी आवाज़ गूंजी।
कामिनी के भारी और गोरे कूल्हे कादर की सांवली और सख्त जांघों से पूरी ताकत से टकराए।
और उसी पल...
कादर का वह विशाल मुसल कामिनी की योनि की आखरी गहराई (Cervix) तक, उसकी बच्चेदानी के मुंह तक जा पहुंचा।
उसने कामिनी को जड़ तक (Balls deep) भेद दिया था।
"आआआआआआआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह!!!!"
कामिनी का सिर पीछे की तरफ झटक गया।
उसका मुंह खुला रह गया, लेकिन आवाज़ गले में ही घुट गई।
उसकी आँखें पथरा गईं।
यह दर्द था? या मज़ा?
यह दोनों का विस्फोटक मिश्रण था।
उसे लगा जैसे कादर ने उसके शरीर के आर-पार कोई खंभा गाड़ दिया हो।

उसकी नाभि (Navel) तक उसे कादर की मौजूदगी महसूस हो रही थी।
वह पूरी तरह से "भरी" (Filled) हुई थी। इतनी भरी हुई कि उसे लगा अगर वह हिली तो फट जाएगी।
कामिनी वहीं, उस चरम स्थिति में, कादर के कंधों पर लटक गई।

उसका सीना तेज़ी से धड़क रहा था।
नीचे... दोनों के जननांग (Genitals) एक-दूसरे में लॉक (Locked) हो चुके थे।
कादर के लंड की जड़ कामिनी की चुत के बाहरी होंठों को कुचल रही थी।
अंदर... कादर का लंड कामिनी की हर नब्ज़, हर धड़कन को महसूस कर रहा था।
कामिनी की भीतरी दीवारें उस घुसपैठिये को चारों तरफ से जकड़े हुए थीं, उसे "लभ... लभ... लभ..." करते हुए दबा रही थीं।

कादर ने अपनी आँखें बंद कर लीं और एक गहरी, संतोषजनक गुरराहट छोड़ी—
"हम्मम्म... आअह्ह्ह..... अब गई ना म्यान मे तलवार " 

कामिनी ने धीरे से अपनी आँखें खोलीं।
नशा, दर्द और हवस से भरी आँखों से उसने कादर को देखा।
और उसके कान में, एक पत्नी नहीं, बल्कि एक रखैल की तरह फुसफुसाया

"हाय...  उउउफ्फ्फ्फ़...कादर... आअह्ह्ह...... तुमने तो मेरी आत्मा तक को छू लिया... आज तक मैं खाली थी... अब भरी हूँ..."।


कामिनी एक पल के लिए रुकी रही, उस भराव (Fullness) को महसूस करती रही। उसे लगा जैसे उसके पेट में, उसकी नाभि के नीचे, कादर ने अपना घर बना लिया है।

कादर का लंड कामिनी के अंदर स्थापित हो चुका था। लेकिन कामिनी को सिर्फ़ 'रखा' हुआ लंड नहीं चाहिए था, उसे वो रगड़ चाहिए थी जो उसकी आत्मा को झकझोर दे।
कामिनी ने अपने दोनों हाथ कादर के पसीने से भीगे, मज़बूत कंधों पर जमाए।
उसने एक गहरी सांस खींची और अपनी भारी, गोरी और मांसल गांड को हवा में ऊपर उठाना शुरू किया।
"स्लुप्प... सर्रर्र..."
एक गीली और कसी हुई आवाज़ के साथ, कादर का वो विशाल, काला और नसों वाला मुसल कामिनी की तंग गुफा (योनि) से फिसलते हुए बाहर आने लगा।

यह अहसास कामिनी के लिए पागल कर देने वाला था।
कादर के लंड पर उभरी हुई मोटी-मोटी नसें (Veins) कामिनी की योनि की भीतरी, रसीली दीवारों को रगड़ती हुई (Scraping), उन्हें खुरचती हुई नीचे उतर रही थीं।
हर इंच के साथ कामिनी को अपनी गुफा के अंदर एक खालीपन महसूस होने लगा, जो उसे बेचैन कर रहा था।
जब कामिनी लगभग पूरी ऊपर उठ गई, तो कादर का लंड सिर्फ़ अपने टोपे (Supari) के सहारे उसके योनि-द्वार पर टिका रह गया।

बाकी पूरा 8 इंच का गीला, चमकीला और फौलादी तना बाहर हवा में नंगा हो गया था, जो कामिनी के कामरस से सना हुआ बल्ब की रौशनी में चमक रहा था।
कामिनी ने एक पल के लिए उस खालीपन को महसूस किया।
उसने अपनी कमर को हवा में ही रोका।
उसकी योनि का मुंह कादर के टोपे को जकड़े हुए था, जैसे उसे वापस अंदर बुला रहा हो।
कामिनी ने अपनी आँखें कसकर बंद कीं, अपने होंठों को दांतों तले दबाया।

और फिर... अपनी पूरी ताकत, अपना पूरा वजन और अपनी बरसों की प्यास को एक साथ समेटा।
"धप्प....!!!!"
कामिनी ने अपनी कमर को एक झटके से, पूरी निर्दयता के साथ नीचे पटक दिया।
यह कोई प्यार भरा मिलन नहीं था, यह एक हमला था।
कामिनी के भारी-भरकम कूल्हे कादर की सख्त जांघों से किसी हथौड़े की तरह टकराए।

"पच... फस्स्स...फटाक.."
हवा और मांस के टकराने की आवाज़ स्टोर रूम के सन्नाटे को चीर गई।
कादर का वो पत्थर जैसा लंड एक ही झटके में, बिना रुके, कामिनी की योनि को चीरता हुआ, उसकी गहराई को रौंदता हुआ, सीधा उसकी बच्चेदानी (Cervix) के मुंह से जा टकराया।

उसने कामिनी को जड़ तक (Balls Deep) भर दिया।
"आआआआह्ह्ह्ह.... माआआ.... उफ्फ्फ्फ मर गई..."
कामिनी का सिर एक झटके से पीछे लुढ़क गया।
उसका मुंह खुल गया, आँखें चढ़ गईं।
उस धक्के की तीव्रता (Impact) इतनी ज़बरदस्त थी कि कामिनी को लगा जैसे कादर का लंड उसके पेट को फाड़कर नाभि तक पहुंच गया है।
उसके अंदर का कोना-कोना उस मोटे मांस से भर गया।

रमेश के साथ जो 'खालीपन' उसे महसूस होता था, वह आज इस एक झटके में हमेशा के लिए मिट गया।
कामिनी वहीं, उस गहराई में रुक गई।
उसने अपनी गांड को कादर की जांघों पर दबाए रखा।
वह उस "फुलनेस" (Fullness) को महसूस कर रही थी।

नीचे कादर भी इस वार से हिल गया था।
"उफ्फ्फ्फ...  कामिनी जी.. क्या कर रही है?..." कादर गुर्राया।
कामिनी के गोरे जांघों का मांस कादर की सांवली त्वचा पर फैल गया था।

यह अहसास उसे सम्पूर्ण कर रहा था।
कामिनी ने वापस से धीरे से अपनी जांघों पर जोर दिया।
उसने अपने कूल्हों को हवा में 2-3 इंच ऊपर उठाया।
"स्लुप्प..."
एक गीली, सक्शन (Suction) वाली आवाज़ के साथ कादर का मोटा लंड कामिनी की भीतरी दीवारों से रगड़ खाता हुआ थोड़ा बाहर निकला।

कामिनी को अपनी योनि के अंदर उन मोटी-मोटी नसों की रगडन महसूस हुई। वह रगडन इतनी सुखद थी कि उसकी आँखें पलट गईं।
जैसे ही लंड का टोपा बाहर आने को हुआ, कामिनी ने वापस अपनी कमर नीचे पटक दी।
"धप्प... पच!!"
कादर का लंड फिर से एक झटके में जड़ तक (Deep) अंदर धंस गया।
कामिनी की गांड कादर की जांघों से टकराई।
और बस... यहाँ से लय (Rhythm) शुरू हो गई।
कामिनी 5 सेकंड इस अहसास को महसूस करती फिर ऊपर उठती.... उठने ही खालीपन को महसूस करती फिर पूरी ताकत से अपनी भारी गांड को कादर के लंड से टकरा देती...
कादर जजसा मर्द भी उसकी टक्कर से हिल के रह जाता.
हर टक्कर के साथ कामिनी चीखती... कादर के सीने कंधो मे नाख़ून गाढ़ाती, लेकिन मजाल की रूकती...
फिर से ऊपर उठती फिर... नीचे... धम.. धमममम...ठप...
फिर ऊपर.... फिर नीचे... ठप... धप....
अब ये सिलसिला चल पड़ा, कामिनी की चुत इतनी काबिल हो गई की वो कादर के लंड को झेल सके...

कामिनी अब रुक नहीं रही थी, वो कमर उठती, और झट से नीचे बैठ जाती...
आअह्ह्ह.... ऊफ्फफ्फ्फ़... ठप... धप....
ऊपर... नीचे... पच.... धप....
ऊपर... नीचे... पच.... ठप....
कामिनी अब सवारी कर रही थी।
वह किसी मदमस्त घोड़ी की तरह कादर के लंड पर उछल रही थी।
हर बार जब वह नीचे आती, कादर का सख्त मुसल उसकी योनि की गहराइयों को खंगाल देता। Ava-Addams-cock-riding-sex

"चप... चप... चप... धप्प... धप्प..."
स्टोर रूम में अब सिर्फ़ गीलेपन और मांस के टकराने की आवाज़ें गूंज रही थीं।
कादर नीचे लेटा, एक घरेलु औरत के इस रूप को देख पागल हो रहा था।
ऊपर बल्ब की रौशनी में कामिनी के खुले, भारी और पसीने से भीगे स्तन आज़ाद होकर हवा में झूल रहे थे।

जब कामिनी उछलती (Bounce), तो उसके स्तन भी "धप... धप..." करते हुए ऊपर-नीचे होते।
उनके काले निप्पल हवा को काट रहे थे।
कादर ने अपने दोनों हाथ ऊपर उठाए और कामिनी के उछलते हुए स्तनों को मुट्ठी में भर लिया।
वह उन्हें नीचे से दबाने लगा, मसलने लगा, जिससे कामिनी की उत्तेजना और बढ़ गई।

"आआआह्ह्ह... कादर... फाड़ दो.. चिर   दो... उफ्फ्फ्फ... ऐसे ही..."
कामिनी अपनी सुध-बुध खो चुकी थी।
उसकी योनि अब लंड के आकार में ढल चुकी थी।
कादर का लंड उसके अंदर एक मथनी (Churner) की तरह चल रहा था।
कामिनी अपनी कमर को गोल-गोल घुमाने लगी।

वह कादर के लंड को अपनी दीवारों से चारों तरफ से निचोड़ रही थी।
उसकी योनि का रस (Lubrication) इतना ज़्यादा बह रहा था कि कादर का लंड और जांघें पूरी तरह से चिकनी हो गई थीं। 35974021
"पच... पच... पच..." की आवाज़ें अब तेज़ हो गई थीं।
कादर से अब सिर्फ़ लेटे रहना बर्दाश्त नहीं हुआ।
उसने नीचे से ठुकाई (Thrusting) शुरू कर दी।
जब कामिनी नीचे आती, कादर अपनी कमर ऊपर उछालता।
दोनों का मिलन एक विस्फोट जैसा होता।
"ठक... ठक... ठक..."
कादर का पेडू (Pelvic bone) कामिनी के नितंबों से टकरा रहा था।
हर टक्कर पर कामिनी का मुंह खुल जाता और एक लंबी, गहरी आह निकलती— "हाआआए राम... मर गई..."
यह रमेश का बिस्तर नहीं था। यह कोई नपुंसक खेल नहीं था।
यह असली हमबिस्तरी थी।
कामिनी को पहली बार पता चला कि एक औरत को 'भरा' जाना क्या होता है।

उसका गोरा बदन पसीने से नहाया हुआ था, बाल बिखर कर चेहरे पर आ गए थे, और वह किसी रणचंडी की तरह कादर के ऊपर तांडव कर रही थी।

कादर का काला, मज़बूत लंड उस गोरी गुफा के अंदर-बाहर हो रहा था।
दृश्य ऐसा था जैसे काली नाग किसी गोरे बिल में बार-बार फन मार रहा हो।
कामिनी अब रुकने वाली नहीं थी।
वह अपनी मंज़िल (Orgasm) के करीब थी।
उसने अपनी गति और बढ़ा दी।
"और ज़ोर से कादर... मुझे तोड़ दो आज... मुझे अपना बना लो..."


कामिनी किसी भूखी शेरनी की तरह कादर के लंड पर ऊपर-नीचे हो रही थी।
उसकी साँसें तेज थीं, आँखें चढ़ी हुई थीं, और वह अपने चरम (Climax) के बिल्कुल करीब थी।
उसकी योनि की दीवारें कादर के लंड को कसने लगी थीं (Spasms), जो इस बात का संकेत था कि वह अब झड़ने वाली है।

लेकिन कादर एक पुराना खिलाड़ी था।
इतनी जल्दी खेल ख़त्म करना उसे मंजूर नहीं था। उसे कामिनी की इस प्यास को और भड़काना था, उसे तड़पाना था।
अचानक...
कादर ने एक झटके में कामिनी की पीठ को अपनी मज़बूत बांहों में जकड़ लिया और उसे अपनी छाती से चिपका लिया।
"दब...!चपक..!"
कामिनी के पसीने से भीगे, भारी और नंगे स्तन कादर के पत्थर जैसे सीने में पिस गए।
कादर की छाती के घने, कड़े और पसीने से लथपथ बाल कामिनी के संवेदनशील निप्पल्स पर रगड़ खाने लगे.

वह खुरदरी गुदगुदी और दबाव कामिनी के लिए एक अजीब सा करंट ले आया।
कामिनी की नशीली आँखों में एक सवाल था, जिसे कादर ने बखूबी पढ़ लिया।
कादर ने उसके कान के पास अपने होंठ ले जाकर, एक शिकारी की तरह फुसफुसाया:
"कामिनी तेरा हो गया.. अब मेरी बारी है..."

कामिनी कुछ समझ पाती, उससे पहले ही उसकी आँखें और दिमाग आश्चर्य से फट गए।
कादर ने अपनी टांगों पर जोर दिया और एक ही झटके में खड़ा हो गया।
हैरानी की बात यह थी कि उसने कामिनी को गोदी में उठा रखा था, और उसका 8 इंच का मुसल लंड अभी भी कामिनी की चुत में जड़ तक धंसा हुआ था।

कामिनी का भारी-भरकम, भरा हुआ जिस्म... लेकिन कादर ने उसे ऐसे उठा लिया जैसे वह कोई फूल हो।
कादर की यह अमानवीय जिस्मानी ताकत देखकर कामिनी का दिल दहल गया।

गिरने के डर से कामिनी ने तुरंत अपने दोनों हाथ कादर के गले में डाल दिए और उसे कसकर पकड़ लिया।
कादर कामिनी को हवा में उठाए-उठाए पलटा।
उसने दो कदम बढ़ाए और कामिनी की नंगी पीठ को स्टोर रूम की ठंडी, सीलन भरी दीवार से सटा दिया।

"आअह्ह्ह... इस्स्स.... उउउईईई...."
कामिनी की गर्म पीठ जैसे ही दीवार की बर्फीली ठंडक के संपर्क में आई, वह बुरी तरह सिसक उठी।
उसकी रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।
पीछे दीवार की ठंडक, और आगे कादर के जिस्म की भट्टी जैसी गर्मी कामिनी इन दो एहसासों के बीच सैंडविच बन गई थी।

कादर ने कामिनी के दोनों पैरों को घुटनों के नीचे से पकड़ा और उन्हें चौड़ा (Spread) कर दिया।
अब कामिनी का पूरा जिस्म कादर के सामने नंगा और खुला हुआ था।
उसके हाथ कादर के गले में टंगे थे, पीठ दीवार से चिपकी थी, और टांगें हवा में खुली हुई थीं।
उसकी योनि कादर के लंड को निगले हुए साफ़ दिख रही थी।
और फिर... तूफ़ान आया।
कादर ने अपनी कमर को थोड़ा पीछे खींचा और फिर पूरी ताकत से दे मारा।
7a2bc014f20618298323e46cb71f2544 "धड़... धाड़... धड...!!"
बिना किसी चेतावनी के, कादर ने ताबड़तोड़ कामिनी की चुत को पेलना (Pounding) शुरू कर दिया।
"फच... फच... फच... पच... पच..."
आवाज़ें बदल गईं।
अब यह रगड़ की आवाज़ नहीं थी, यह गीले मांस पर हथौड़े बजने की आवाज़ थी।

कादर अपनी पूरी ताकत से ठुकाई कर रहा था।
हर धक्के के साथ कामिनी का सिर पीछे दीवार से टकराता, और उसके स्तन हवा में बुरी तरह हिलते। 22539476
"आअह्ह्ह... आअह्ह्ह... उउउफ्फ्फ्फ़.... कादर... मर गई.... हाआआए..."

कामिनी की चीखें स्टोर रूम में गूंजने लगीं।
उसे आज समझ आ गया कि खुद लंड पर कूदना और एक मर्द द्वारा टांगकर चोदे जाना—इन दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है।

कूदने में 'कंट्रोल' उसके पास था, लेकिन यहाँ?
यहाँ वह पूरी तरह से बेबस थी। कादर उसे रौंद रहा था, उसकी गहराइयों को खोद रहा था।
कादर रुका नहीं।
"फच... फच... फच..."
रफ़्तार और बढ़ गई।
कामिनी की योनि इतना ज़्यादा रस छोड़ रही थी कि हर धक्के (Thrust) के साथ, लंड और चुत के संगम से कामरस और शायद उत्तेजना में निकली पेशाब की बूंदें फव्वारे की तरह बाहर निकल रही थीं।

वे बूंदें हवा में तैरतीं, और फिर कादर के पेट और कामिनी की जांघों पर गिरतीं।
"छपाक... छप..."
कादर का लंड कामिनी की बच्चेदानी (Cervix) पर हथौड़े बरसा रहा था। tumblr-mz3n07-Kc-IA1sqablio1-500
कामिनी को लगा जैसे उसका अस्तित्व ही मिट जाएगा।
वह दर्द... वह मज़ा... वह बेबसी...

कादर की रफ़्तार अब तूफानी हो चुकी थी।
दीवार से कामिनी की पीठ टकराने की आवाज़— "धप... धप..." और जांघों के टकराने की आवाज़— "फच... फच..." मिलकर एक उन्मादी संगीत बना रहे थे।

कामिनी का सिर पीछे लुढ़का हुआ था, बाल पसीने से चिपक कर चेहरे पर आ गए थे।
उसका पूरा शरीर ऐंठन (Spasm) ले रहा था।
उसकी योनि की दीवारें कादर के लंड को ऐसे जकड़ रही थीं जैसे उसे निचोड़ लेंगी।

"आआआह्ह्ह... कादर... मैं गई... उफ्फ्फ्फ... बस... बस..."
कामिनी की आवाज़ फट गई।
उसे लगा जैसे उसके पेट के निचले हिस्से में हज़ारों बिजलियाँ एक साथ गिर गई हों।

उसकी टांगें कादर की कमर के इर्द-गिर्द कस गईं। पंजों ने कादर की पीठ को नोच लिया।
और फिर... बाढ़ आ गई।
कामिनी का शरीर अकड़ गया।
उसकी योनि से कामरस का एक विशाल फव्वारा (Squirt) छूट पड़ा।
वह इतना तेज़ था कि उसने अंदर जाते हुए कादर के लंड को नहला दिया।
कामिनी कांपती रही, सिसकती रही, झड़ती रही।
उसका हर अंग, हर नस ढीली पड़ गई।
लेकिन कादर अभी रुका नहीं था।

कामिनी की योनि के उस भींचने (Clamping) ने कादर के सब्र का बांध भी तोड़ दिया।
उसने कामिनी को दीवार से और जोर से दबाया।
उसने एक गहरी साँस भरी, अपने जबड़े भींचे और...
"धप्प...!!!"
एक आखिरी, जानलेवा धक्का मारा।
उसने अपने 8 इंच के मुसल को कामिनी की बच्चेदानी (Womb) के मुंह में पूरी ताकत से गाड़ दिया और वहीं रुक गया।

"आआआआह्ह्ह्ह्ह.....!!!!"
कामिनी की एक दबी हुई चीख निकली, और कादर ने गुर्राते हुए अपनी आँखें बंद कर लीं।

"अब भरी है तु कामिनी......"
कादर का लंड अंदर ही अंदर फटने लगा।
उसके लंड के छेद से गाढ़े, गर्म और सफ़ेद वीर्य (Sperm) की पिचकारियां छूटने लगीं।

"पिच... पिच... पिच..."
गर्म लावा... सीधा कामिनी की कोख में उड़ेला जा रहा था।
कामिनी को अपनी नाभि के नीचे, बहुत गहराई में, उन गर्म फव्वारों की थपकियाँ महसूस हो रही थीं।
एक... दो..तीन... चार...... दस...
कादर खाली हो रहा था, और कामिनी भर रही थी।
वह उसे "गर्भवती" करने वाले अंदाज़ में भर रहा था।
कामिनी ने अपनी आँखें बंद कर लीं और उस गर्मी को अपने अंदर सोख लिया।

"भर गई... आज मैं सच में भर गई..." उसने मन ही मन सोचा।

कुछ पल तक दोनों वैसे ही खड़े रहे।
कादर का लंड अभी भी अंदर था, लेकिन अब वह शांत हो रहा था।
दोनों की साँसें लोहार की धौंकनी की तरह चल रही थीं।
पसीना दोनों के शरीरों से मिलकर ज़मीन पर टपक रहा था।
धीरे से... कादर ने कामिनी को नीचे उतारा।
कामिनी के पैर ज़मीन पर पड़े, लेकिन वे कांप रहे थे। उनमें खड़े होने की ताकत नहीं थी।
वह कादर के सहारे खड़ी रही।
कादर ने धीरे से, बहुत संभलकर अपना लंड बाहर निकाला।
"प्लप..  पुककक...."
जैसे ही वह विशाल डाट (Plug) बाहर निकला, कामिनी की योनि का मुंह खुला रह गया।
और वहां से... कादर का दिया हुआ सफ़ेद, गाढ़ा वीर्य और कामिनी का अपना पानी मिलकर कामिनी की जांघों से नीचे बहने लगा।

"टप... टप..."
कामिनी ने नीचे देखा।
उसकी गोरी जांघों पर वह सफ़ेद लकीर चमक रही थी।
यह रमेश की दो बूंद नहीं थी... यह एक बाढ़ थी।
कादर ने झुककर अपनी लुंगी उठाई और कामिनी के पैरों को साफ़ करने लगा।

"रहने दो कादर..." कामिनी ने उसे रोका। उसकी आवाज़ में एक नशा था।
"इसे रहने दो... ये सुकून देता है।"
कामिनी कादर की बाहो मे लुढ़क गई जैसे बेहोश हो गई हो,उसमे चलने या खड़े रहने की ताकत नहीं बची थी.
कामिनी की आत्मा उसके चुत के रास्ते बहार निकल गई थी.
बस सांस के साथ उठते गिरते स्तन उसके जिन्दा होने के सबूत थे.


कादर कामिनी को बाहो मे ले कर नीचे फर्श पर बिछि फटी पुरानी डदरी पर लेट गया.
कामिनी को जो सुकून इस नंगे फर्श पर मिल रहा था वो मखमली बिस्तर पर भी नहीं था.
कामिनी की आंखे बंद होती चली गई, कादर ने भी उसके बालो को सहलाते हुए आंखे बंद कर ली.
उसने अपने जीवन मे पहली बार प्यार को महसूस किया था.


क्रमशः...

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1 Comments

  1. Kya update diya hai bhai
    Aaj Jake kamini ko thandak mili
    Ab to dono khul chuke hai
    Agli baar na jane kya dhamaka hoga

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