मेरी माँ कामिनी, भाग -42
उसका 8 इंच का काला, नसों वाला लंड कामिनी की गांड के सबसे गहरे हिस्से में जड़ तक धँसा हुआ था, पूरी तरह अंदर, अभी भी धड़क रहा था। दोनों के साँसें एक साथ चल रही थीं। कमरे में सिर्फ उनकी भारी हाँफ और चादर पर टपकते रस की ‘टप… टप…’ की आवाज़ गूंज रही थी।
कामिनी रमेश की छाती पर बिल्कुल लेटी हुई थी।
उसका पूरा गोरा, गदराया बदन थकान और आनंद से निढाल पड़ा था। उसके भारी स्तन रमेश की छाती पर दबे हुए थे। बाल बिखरे हुए रमेश के चेहरे पर गिर रहे थे। लेकिन उसका ध्यान… उसकी सारी रूह… सिर्फ पीछे थी।
उसकी गांड अंदर से बार-बार संकुचित हो रही थी।
जैसे कोई भूखी, प्यासी मुंह वाली मछली शमशेर के लंड को चूस रही हो। हर संकुचन के साथ उसकी गांड की दीवारें लंड को जकड़ लेतीं, फिर हल्का छोड़तीं। शमशेर का गाढ़ा वीर्य अंदर ही अंदर फैला हुआ था, गरम, चिपचिपा, भारी। हर बार जब कामिनी की गांड सिकुड़ती, एक-एक बूँद को अंदर खींच लेती।
“हम्म्म्म… उफ्फ्फ…”
कामिनी की आँखें आधी बंद थीं। होंठों से सिर्फ दबी हुई सिसकियाँ निकल रही थीं। उसका गुदा द्वार अभी भी पूरी तरह फैला हुआ था, लंड को अपने अंदर समेटे हुए।
थोड़ी देर बाद… शमशेर का जिस्म हिला।
उसने अपनी कमर को हल्का सा पीछे खींचा।
“आआआआह्ह्ह्ह्ह्ह्ब्ब्ब्ब्… उउउउफ्फ्फ्फ्फ्फ़्फ़्…!!”
कामिनी की चीख फुट पड़ी।
उसे लगा जैसे उसका पूरा गुदा द्वार उलटकर बाहर आ जाएगा। शमशेर का मोटा लंड अभी भी अंदर था, जब वह बाहर खींचा, कामिनी की गांड भी उसके साथ बाहर को खिंचने लगी। गोरे, लाल, सूजे हुए पल्ले बाहर की तरफ मुड़ने लगे।
“पुककक… प्लम्ब्ब्ब्…!!”
एक जोरदार, गीला, चिपचिपा झटका। शमशेर का पूरा लंड एक ही बार में बाहर निकल आया।
और उसी पल… कामिनी की गांड से वीर्य की भारी, गाढ़ी धारा भलभला कर बाहर निकलने लगी।
“फ़फ़फ़फ़ऊऊऊरररररर… पच… पच… फुश्श्श…”
सफेद, गाढ़ा, गरम वीर्य उसकी गांड से फव्वारे की तरह छलक उठा। हवा के साथ मिलकर ‘फुर्र्र…’ की आवाज़ आई। कुछ बूँदें रमेश की जांघों पर गिर गईं, कुछ चादर पर फैल गईं। कामिनी की गांड का छेद अब पूरी तरह खुला था, एक बड़ा, गुलाबी, लाल, वीर्य से सना हुआ गड्ढा जो अभी भी हल्का-हल्का सिकुड़-फैल रहा था।
“हह्म्म्म्म्म्म… उउउफ्फ्फ्फ्…!!”
कामिनी की जान में जान आई।
एक लंबी, राहत भरी सांस निकली। उसका पूरा बदन ढीला पड़ गया। गांड से निकलते वीर्य की गर्मी अभी भी अंदर महसूस हो रही थी, लेकिन अब बाहर का ठंडा स्पर्श… उसे अजीब सा सुकून दे रहा था।
शमशेर बिना कुछ बोले उठ खड़ा हुआ।
उसका लंड अभी भी आधा खड़ा था, वीर्य और कामिनी के रस से चमक रहा था। उसने पैंट उठाई, जांघों पर चढ़ाई, बेल्ट कसी। फिर सिगरेट का पैकेट निकाला, एक सिगरेट मुँह में दबाई, लाइटर जलाया।
‘क्लिक…’
सिगरेट जल गई। धुआँ छोड़ता हुआ वह बेडरूम के दरवाज़े की तरफ बढ़ा।
फिर अचानक रुका।
पीछे मुड़ा।
उसके काले, शैतानी चेहरे पर एक बहुत ही वाहियात, नीच मुस्कान थी।
“भाभीजी… रमेश को बता देना कि उसकी बीवी कितनी गर्म है…”
“हाहाहाहाहाहा…!!”
वह खुलकर, घिनौने अंदाज़ में हँसा। हँसी की गूंज कमरे में गूँजी। फिर बिना रुके दरवाज़ा खोला और बाहर निकल गया।
‘धड़… धड़… धाड़…!’
बाहर पुलिस की बुलेट की स्टार्ट होने की आवाज़ आई।
इंजन गरजा। फिर धीरे-धीरे आवाज़ दूर होती चली गई… और पूरी तरह गायब हो गई।
कामिनी अकेली रह गई।
वह अभी भी रमेश की छाती पर लेटी हुई थी।
उसका नंगा, पसीने से तर, वीर्य और कामरस से सना बदन थकान से भरा हुआ था। गांड का छेद अभी भी खुला ही था जो की धीरे-धीरे सिकुड़ रहा था, लेकिन पूरी तरह बंद नहीं हुआ था। उसमें से हल्की-हल्की वीर्य की बूँदें अभी भी रिस रही थीं।
उसके मन में दर्द था… ग्लानि थी… शर्म थी।
“मैं… मैं क्या कर गई… अपने पति के ऊपर… उसके दोस्त से… गांड मरवा ली… और वो भी इतनी बेशर्मी से…”
लेकिन इन सबके बीच… एक परम संतोष था।
एक अजीब सा, गहरा आनंद था।
जैसे उसकी आत्मा को आज पहली बार असली तृप्ति मिली हो।
उसकी आँखें धीरे-धीरे बंद होती चली गईं।
शरीर पूरी तरह ढीला पड़ गया।
गांड का खुला छेद अभी भी हल्का-हल्का फड़क रहा था… जैसे अभी भी शमशेर के लंड की याद में सांस ले रहा हो।
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रात के उस भयंकर तूफ़ान के बाद की सुबह एकदम शांत और उजली थी।
कामिनी नहा-धोकर बेडरूम से बाहर निकली। उसके चेहरे पर एक अजीब सा नूर, एक ऐसी दमक (Glow) थी जो आज से पहले कभी नहीं देखी गई थी। उसके अंदर सालों से जो वासना का ज्वालामुखी सुलग रहा था, वो कल रात शमशेर ने अपनी हैवानियत से पूरी तरह बुझा दिया था।
आज उसके मन में कोई हवस, कोई आग नहीं थी... सिर्फ एक गहरी और 'परम संतुष्टि' थी।
लेकिन इस संतुष्टि की कीमत उसके जिस्म ने बहुत भारी चुकाई थी। कामिनी की चाल पूरी तरह से बिगड़ चुकी थी।
उससे ज़मीन पर ठीक से पैर नहीं रखा जा रहा था। उसकी जांघें, गांड और कमर इतनी बुरी तरह से सूज कर अकड़ चुके थे कि एक-एक कदम बढ़ाना उसके लिए किसी सज़ा से कम नहीं था। वो बस यही चाहती थी कि आज दिन भर अपने बिस्तर पर निढाल पड़ी रहे और इस मीठे दर्द के साथ आराम करे।
डाइनिंग टेबल पर नाश्ता लग चुका था।
सामने कुर्सी पर रमेश बैठा चाय सुड़क रहा था। साला एकदम चूतिया और बेखबर! रात भर जो शराब का तांडव उसने किया था, उसकी वजह से उसके दिमाग की स्लेट एकदम कोरी थी। उसे रत्ती भर भी याद नहीं था कि कल रात उसी की छाती पर उसकी बीवी ने शमशेर के साथ क्या-क्या 'लीला' रची थी।
कामिनी दर्द से कराहती हुई, बहुत ही आहिस्ता से डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर टिक कर बैठी। उससे सीधा बैठा भी नहीं जा रहा था। रमेश ने एक नज़र अपनी बीवी की उस लंगड़ाती चाल पर डाली, लेकिन अपने भारी सिरदर्द की वजह से उसने कुछ पूछने की ज़हमत नहीं उठाई।
कमरे में सिर्फ चाय की चुस्कियों और बर्तनों की खटपट की आवाज़ थी। सुबह के ठीक 8 बज रहे थे।
तभी... मेज़ पर रखा रमेश का मोबाइल वाइब्रेट करते हुए चीख उठा।
"ट्रिन.... ट्रिन...."
रमेश ने झुंझलाते हुए फोन की स्क्रीन की तरफ देखा। लेकिन स्क्रीन पर चमकता हुआ नाम देखते ही... रमेश बुरी तरह सकपका गया। उसके चेहरे की हवाइयां उड़ गईं।
स्क्रीन पर फ्लैश हो रहा था— "ताऊजी... किशनगंज"
किशनगंज से इस वक़्त फोन? रमेश का दिल किसी अनजाने डर से धड़क उठा। उसने कांपते हाथों से झट से फोन उठाया।
"ह... हेलो... हाँ... हेलो ताऊजी..."
रमेश की आवाज़ में एक अजीब सी घबराहट थी। कामिनी भी अपना दर्द भूलकर रमेश के उतरे हुए चेहरे को देखने लगी।
सामने से एक बूढ़े आदमी के फूट-फूट कर रोने की आवाज़ आई। वो आवाज़ इतनी तेज़ थी कि कामिनी को भी हल्की-हल्की सुनाई दे रही थी।
"बिटवा... रमेश बिटवा... गज़ब हो गया रे... तेरी ताई मर गई रे..." यह सुनते ही रमेश के हाथ सुन्न पड़ गए। मोबाइल उसके पसीने से भीगे हाथों से फिसलते-फिसलते बचा। रमेश का चेहरा एकदम सफ़ेद पड़ गया, जैसे किसी ने उसके बदन का सारा खून निचोड़ लिया हो। उसकी आँखें नम हो गईं और होंठ कांपने लगे।
कामिनी और बंटी दोनों हैरानी से उसे देख रहे थे।
"मेरी ताईजी नहीं रहीं..." रमेश ने फ़ोन को डाइनिंग टेबल पर पटकते हुए कहा,
"हमें अभी निकलना होगा "
बंटी, जो हमेशा से बहुत तेज़ दिमाग का था, उसने तुरंत सवाल किया, "ताईजी? पापा, आपने और दादाजी ने तो कभी नहीं बताया कि आपकी कोई ताईजी भी हैं। हम तो कभी उनसे मिले भी नहीं।"
रमेश ने एक गहरी सांस ली और अपनी नज़रों को चुराते हुए बोला, "बेटा... काम ही इतना रहता है। और वैसे भी रिश्तेदारों में रखा क्या है? साले सब पैसों के भूखे हैं, गिद्ध की तरह नोचने को तैयार रहते हैं। बस ये एक ताईजी ही थीं, जो पापा के जाने के बाद मेरी अपनी थीं। बहुत दूर, एकांत गांव में रहती थीं। तो कभी वहाँ जाने का मौका ही नहीं लगा"
रमेश वाक़ई दुखी लग रहा था। लेकिन इस दुख के पीछे एक बहुत बड़ा, काला और खौफनाक सच छुपा हुआ था।
सच ये था कि जिस ज़मीन और खेत पर रमेश ने कब्ज़ा जमाया था, हाँ, वही 'किशनगंज', जो रघु का पुश्तैनी गाँव था, वहाँ रघु की 5बीघा जमीन पर रमेश ने एक शानदार फार्महाउस खड़ा कर रखा था। वो फार्महाउस रमेश की काली कमाई, उसकी अय्याशियों का अड्डा और उसके काले कारनामों की सबसे बड़ी तिजोरी था।
उसके बाप की मौसी की बहन (वही तथाकथित 'ताईजी') बहुत गरीब और बेसहारा थीं। रमेश ने उनका फायदा उठाते हुए, उस फार्महाउस की देखरेख के लिए उन्हें वहीं रख छोड़ा था, ताकि गाँव वालों और दुनिया की नज़रों में कोई शक पैदा न हो और वो बेशकीमती संपत्ति उसके कब्ज़े में सुरक्षित रहे।
रमेश ने अभी भी अपनी बीवी और बेटे को अंधेरे में रखा हुआ था। उसने ये नहीं बताया था कि वो आलीशान फार्महाउस असल में उसी की 'बेनामी' संपत्ति है।
लेकिन बंटी... बंटी का राडार बहुत तेज़ था।
जैसे ही रमेश के मुँह से जगह का नाम 'किशनगंज' निकला, बंटी के कान खड़े हो गए। किशनगंज... रघु का गाँव? मौका बड़ा अजीब था, ये मात्र संयोग तो नहीं हो सकता?
बंटी का दिमाग़ कुलबुलाने लगा, किशनगंज तो जाना ही होगा।
कामिनी ने आनाकानी शुरू कर दी। "कहाँ अचानक से रिश्तेदार निकाल लिए और वहाँ जाने को बोल रहे हो? मेरी तबीयत भी कुछ ठीक नहीं लग रही..." उसके जिस्म का निचला हिस्सा अभी भी उस भयंकर दर्द और सूजन से जूझ रहा था, ऐसे में गाँव का लंबा सफर करना उसके लिए किसी सज़ा से कम नहीं था।
"कभी तो अपने पति का साथ दिया कर " रमेश ने जहर बुझी आँखों से कामिनी को देखा.
"मै तैयारी करता हूँ " रमेश मोबइल उठाया कर नंबर दर्ज करने लगा.
"माँ, चलते हैं ना। इतने दिनों से घर में ही हो, कुछ दिन का चेंज मिल जाएगा। और पापा को भी इस वक़्त हमारे सपोर्ट की ज़रूरत है।" बेटे की इस बात के आगे कामिनी को झुकना ही पड़ा।
रमेश जो भी था, था तो उसका पति ही, उसके दुख मे साथ देना ही पत्नी का कर्तव्य होता है.
कामिनी को अपनी सोच पर निराशा हुआ, वो अपने सुख के लिए पत्नीव्रता धर्म त्याग रही थी.
बंटी ने उसका नारित्व, उसका संस्कारी पत्निव्रता रूप कायम रखा.
कोई एक घंटे मे सारी तैयारी हो गई, घर के बहत एक टैक्सी आ कर खड़ी थी.
बंटी ने एक, दो बैग लोड किये.
रमेश ड्राइवर के साथ आगे बैठ गया, पीछे बंटी और कामिनी.
टैक्सी चल पड़ी... हर झटके के साथ कामिनी की जांघों और कमर में एक चुभन सी हो रही थी। वो खिड़की के बहार पीछे छूटता अपना शहर, अपना घर देख रही थी, अभी तो उसने जीवन जीना सीखा था,
अब अचानक से आने वाला वो अनजान गाँव... उसे नहीं पता था कि किशनगंज की वो ज़मीन उसके लिए कौन सा नया तिलिस्म लेकर खड़ी है।
टैक्सी जब हाइवे पर रफ़्तार पकड़ चुकी थी, तब रमेश ने पीछे मुड़ बंटी को देखा आज वो एक 'बाप' के मोह में थोड़ा भावुक हो रहा था। अपनी उस छिपी हुई रियासत की तरफ बढ़ते हुए, उसकी दबी हुई इच्छा जुबां पर आ ही गई।
"किशनगंज पहुँच कर उसे अपना ही घर समझना, बेटा बंटी..." रमेश ने बहुत ही गर्व और रहस्यमयी अंदाज़ में मुस्कुराते हुए कहा, "समझो... सब तुम्हारा ही है।"
रमेश ने साफ-साफ तो नहीं बोला कि वो काली कमाई और कब्ज़े से बनाई गई संपत्ति उसी की है, और उसके बाद बंटी की होगी। लेकिन बंटी की तेज़ आँखों ने अपने बाप के उस घमंड और राज़ को बहुत बारीकी से पढ़ लिया था।
किशनगंज का वो फार्महाउस अब कई नए चेहरों, दबे हुए राज़ों और हवस के एक बिलकुल नए अध्याय का गवाह बनने वाला था।
टैक्सी दौड़ रही थी...
पीछे मिल के पत्थर पर लिखा था....
किशनगंज
100km
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शहर की दौड़-भाग के बीच पुलिस कमिश्नर का आलीशान और ठंडा ऑफिस एकदम शांत था। टेबल पर रखी फाइलें शहर के बढ़ते क्राइम का सबूत थीं।
तभी... डेस्क पर रखे लैंडलाइन की घंटी ने सन्नाटा चीर दिया।
"ट्रिन... ट्रिन..."
कमिश्नर विक्रम ने अपनी भारी उंगलियों से रिसीवर उठाया।
"हाँ, विक्रम स्पीकिंग..."
दूसरी तरफ से पुलिस के एक बहुत ही खास और गुप्त खबरी की कांपती हुई आवाज़ आई।
"साब... एक बहुत बड़ी खबर है। सुना है किशनगंज के इलाके में कोई नया और खतरनाक गैंग पनप रहा है जो ड्रग्स की बहुत बड़ी सप्लाई कर रहा है। वो साले लोकल किसानों को डरा-धमका कर उनके खेतों के बीच में बिना परमिशन अफीम (Opium) की खेती करवा रहे हैं... मामला बहुत बड़ा है साब!"
यह सुनते ही कमिश्नर विक्रम का चेहरा गुस्से से लाल सुर्ख हो गया। उसकी कनपटी की नसें तन गईं।
उसने रिसीवर को पूरी ताकत से टेबल पर दे मारा— "ठहाक्क!"
प्लास्टिक का रिसीवर चटक गया।
"साले ये ड्रग माफिया शहर में कुकुरमुत्ते की तरह पनप रहे हैं!" विक्रम गुर्राया। उसने अपनी जेब से सिगरेट निकाली, उसे सुलगाया और खिड़की के बाहर देखते हुए धुएं का एक गहरा छल्ला छोड़ा। किशनगंज... यह नाम अब विक्रम की हिट-लिस्ट में सबसे ऊपर आ चुका था।
वही कहीं किसी गुप्त स्थान पर
शहर के एक पुराने, जंग खाए पब्लिक टेलीफोन बूथ पर दो टूटे-फूटे, शराबी किस्म के लड़के रिसीवर पकड़े खड़े थे। उनके चेहरों पर चोट के पुराने निशान थे और आँखों में एक अजीब सी सनक।
"बड़ा भाई... मैं... लकी...!" फोन पकड़े हुए लड़के ने हड़बड़ाहट में कहा।
तभी पीछे से किसी कार्टून जैसी, चिढ़ाने वाली आवाज़ आई— "अबे... मैं भी तो हूँ, बता ना... बड़ा भाई मैं बिट्टू... हीहीही..."
फोन के दूसरी तरफ... शहर के एक अनजान, घुटन भरे और अँधेरे कमरे में कोई बैठा था। कमरे में सिर्फ सिगरेट का धुआँ उड़ रहा था और एक बहुत ही खौफनाक, भारी वजूद कुर्सी पर टिका था।
"ज़िंदा हो... अभी भी तुम लोग?" 'बड़ा भाई' की वो कर्कश और रूह कंपा देने वाली आवाज़ फोन के स्पीकर से गूंजी। इस आवाज़ में कोई भावना नहीं थी, सिर्फ मौत की ठंडक थी।
फोन बूथ पर खड़े लकी और बिट्टू अपनी होशियारी पर झूम रहे थे। आख़िरकार उन्होंने अपने उस दुश्मन का पता लगा लिया था, जिसने उन्हें जानवरों की तरह पीटा था।
"बड़ा भाई... बहुत ज़बरदस्त खबर है! उस मादरचोद कादर खान का पता लग गया है..." लकी उत्साह में चिल्लाया।
पीछे से बिट्टू फिर बड़बड़ाया "अबे ये भी बता ना कि मैंने पता लगाया है... हीहीही... साले को अब हम काटेंगे!"
अँधेरे कमरे में बैठे 'बड़ा भाई' की भौहें तन गईं।
"सालों... किसी दिन गोली मार दूंगा तुम दोनों को! आपस में ही मरोगे या सीधा मुद्दे पर आओगे? कहाँ छुपा है वो कादर खान?"
लकी ने थूक गटका और घबराते हुए बोला "बड़ा भाई... वो किशनगंज गाँव है ना... यहाँ से 100 किलोमीटर दूर। वो साला वहीं कहीं छुपा हुआ है। और सुनने में आया है कि वो आजकल किसी और नए ड्रग माफिया के लिए काम कर रहा है!"
अँधेरे कमरे में एक पल के लिए भारी सन्नाटा छा गया। 'बड़ा भाई' के दिमाग में कई समीकरण एक साथ घूमने लगे। नया माफिया? और वो भी उसके इलाके के आस-पास?
"बहुत अच्छे..." बड़ा भाई की आवाज़ अब एक ठंडे ज़हर जैसी हो गई थी। "मुल्ला के पास जाओ... उससे ज़रूरत का सारा सामान (हथियार, पैसा) लो और तुरंत निकल जाओ किशनगंज के लिए। मुझे वहाँ की पल-पल की खबर चाहिए।"
"ठाक्क...!"
बड़े भाई ने ज़ोर से फोन का रिसीवर क्रैडल पर पटक दिया।
कमरे के अँधेरे में सिर्फ उसकी सुलगती हुई सिगरेट की लाल टिप चमक रही थी। 'बड़ा भाई' ने अपनी लाल आँखों को सिकोड़ा और एक खौफनाक आवाज़ में खुद से फुसफुसाया
"मेरा नाम ही है 'बड़ा भाई'... मुझसे बड़ा कौन आ गया इस खेल में?"
उसने सिगरेट का एक बहुत ही ज़ोरदार और लंबा कश खींचा... और फिर अचानक, उस आधी सुलगती सिगरेट को फर्श पर पूरी नफरत और हिकारत से ऐसे फेंक दिया, जैसे उसे नशे से सख्त नफरत हो। उसने अपने भारी जूतों से उस सिगरेट को कुचल कर बुझा दिया।
समाप्त
मिलेंगे कामिनी 2.0 मे

3 Comments
इस कहानी में नया अध्याय जोड़कर आपने उत्सुकता को और भी गहरा कर दिया है
ReplyDeleteगाँव में ताऊजी, बड़े साहब क़ादर और न जाने कितने किरदारों के बीच अब घटनाएँ किस मोड़ लेंगी — यह देखना सचमुच रोचक होगा
कमिनी का यह उफनता यौवन, उसकी भावनाएँ और उसके निर्णय p कहानी को किस दिशा में ले जाएँगे, यह आने वाला समय ही बताएगा
कहानी अब जिस तरह से आगे बढ़ रही है, वह इसे एक रोचक और भावनाओं से भरपूर कामुक उपन्यास का रूप देती दिखाई दे रही है, जिससे पाठकों की उत्सुकता और भी बढ़ गई है
आपने तो मानो धुरंधर फिल्म की तरह इतनी सटीक पटकथा रच डाली है कि जिसका कोई तोड़ नहीं है
Hats off!!!
2.0 me kahani gaon ki hongi jaha kamini uss gaon me reh kr gaon walo jaise rahengi beta bhi ragu ke bare me pata lagyenga
ReplyDeleteRomance aur Romanch se bhari khanai hai bhai ismai sex bhi aur story bhi mast hai...
ReplyDeleteKamini ki jabardast chudai ke bad wo ab jake puri suntust hui... Aur ab ye kishan ganj mai maza ayega jaha bohot se raaz ka khulasa hoga aur ho sake to kamini tau ji ko ek patni ka sukh aur pyar de to maza ayega