मेरी माँ कामिनी - भाग 40
सुबह 6:00 बजे, स्टोर रूम
बाहर हल्का-हल्का उजाला फूटने लगा था।
स्टोर रूम की छोटी सी खिड़की से सुबह की पहली सर्द किरण अंदर आई और दरी पर सो रहे दो नंगे, पसीने और कामरस में लिपटे शरीरों पर पड़ी।
रात भर का वह जंगली तांडव अब शांत हो चुका था।
कामिनी की नींद खुली।
उसने करवट लेनी चाही, लेकिन उसके मुंह से एक तीखी, आधी सोई हुई सिसकारी निकल गई— "सीइइइइ... उफ्फ्फ्फ..."
उसके जिस्म का रोम-रोम दुख रहा था।
लेकिन सबसे ज़्यादा दर्द... उसकी जांघों के बीच, उसकी चुत की गहराइयों में था।
वहां एक भारीपन, एक मीठी सी टीस और सूजन थी, जो उसे याद दिला रही थी कि कल रात उसके साथ क्या बीता था। वह कोई सपना नहीं था, कादर का वह 8 इंच का फौलादी मुसल सचमुच उसके जिस्म के आर-पार हो चुका था।
कामिनी ने आँखें खोलीं।
उसके नीचे कादर लेटा था। बिल्कुल नंगा। उसका विशाल, सांवला सीना धीरे-धीरे ऊपर-नीचे हो रहा था।
कामिनी को कल रात की वो सारी बातें याद आ गईं, उसका कादर के ऊपर उछलना, दीवार पर टंगना, और फिर अपनी नाभि तक उस गर्म वीर्य को महसूस करना।
अचानक कामिनी को भयानक शर्म आने लगी।
कल रात वो एक घरेलु संस्कारी औरत नहीं, बल्कि एक सस्ती 'रंडी' की तरह कादर से 'और ज़ोर से' चोदने की भीख मांग रही थी।
अब, सुबह की इस रौशनी में, वह कादर से नज़रें मिलाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी।
उसने हड़बड़ाहट में अपने नंगे, भारी स्तनों को हाथों से छुपाया और ज़मीन पर पड़े अपने सिल्क के गाउन को ढूंढने लगी।
उसी हड़बड़ाहट में कादर की नींद खुल गई।
उसने कामिनी को अपने कपड़े समेटते और छुपते हुए देखा।
कादर के होंठों पर एक विजेता जैसी मुस्कान आ गई।
कल रात की उस डरी-सहमी औरत और इस सुबह की 'शर्माती हुई' औरत में बहुत फर्क था।
कामिनी ने जैसे-तैसे गाउन उठाया और उसे अपने सिर के ऊपर से पहन लिया।
ज़िप बंद करने के लिए वह खड़ी हुई।
लेकिन जैसे ही उसने अपने पैरों पर वजन डाला... उसकी टांगें कांप गईं।
कल रात जांघें फैलाकर जो तूफानी ठुकाई हुई थी, उसकी वजह से उसकी जांघों की मांसपेशियां (Inner thighs) पूरी तरह अकड़ चुकी थीं।
कामिनी का संतुलन बिगड़ा और वह पीछे की तरफ गिरने लगी
"आह्ह...!!"
इससे पहले कि वह ज़मीन पर गिरती, कादर बिजली की रफ़्तार से उठा।
उसने अपने मज़बूत हाथों से कामिनी की कमर को जकड़ लिया और उसे अपनी तरफ खींच लिया।
"धप्प..."
कामिनी की पीठ कादर के चौड़े, नंगे सीने से जा टकराई।
कामिनी की सांसें अटक गईं।
पीछे कादर खड़ा था... बिल्कुल नंगा।
और सुबह की अंगड़ाई के कारण कादर का विशाल लंड (Morning Wood) पूरी तरह खड़ा होकर फन काढ़े हुए था।
कामिनी के पतले गाउन के ऊपर से ही, कादर का वह गरम, पत्थर जैसा सख्त और मोटा लंड कामिनी की सूजी हुई और दर्द करती चुत की दरार पर सटीक तरीके से सेट हो गया।
लंड की वह सख्त ठोकर लगते ही कामिनी के शरीर में करंट दौड़ गया।
रात की बची-खुची उत्तेजना फिर से ज्वालामुखी बनकर फूट पड़ी। उसका जिस्म एकदम से गीला हो गया।
"ईईस्स्स... आअह्ह्ह... कादर..." कामिनी दर्द और बेपनाह उत्तेजना में सिसक उठी।
वह उससे दूर हटना चाहती थी, लेकिन उस सख्त लंड की रगड़ ने उसे वहीं कादर के सीने से चिपकाए रखा।
कादर ने अपना चेहरा कामिनी के कानों के पास झुकाया। उसकी गर्म सांसें कामिनी की गर्दन को गुदगुदा रही थीं।
"दर्द हो रहा है कामिनी जी?" कादर ने अपनी भारी, मर्दाना आवाज़ में धीरे से पूछा।
उसकी आवाज़ में चिंता भी थी और अपने 'काम' पर घमंड भी।
कामिनी ने कादर की तरफ पलटने की हिम्मत नहीं की।
उसने बस अपना सिर झुका लिया, उसका चेहरा टमाटर की तरह लाल हो रहा था।
"हहहम्म्म..." कामिनी ने धीरे से हाँ भरते हुए शर्मा कर नज़रें नीचे कर लीं।
उसे अपने ही गाउन के नीचे अपनी योनि से रिसता हुआ कादर का गाढ़ा कामरस (वीर्य) महसूस हो रहा था, जो अभी तक पूरी तरह सूखा नहीं था।
कादर मुस्कुरा दिया। उसने कामिनी की कमर पर अपनी पकड़ थोड़ी ढीली की।
"वो तेल लगा लेना नहाने से पहले... ठीक हो जाएगा।" कादर ने उस जादुई तेल की याद दिलाई जिसने कामिनी के पिछले दर्दों को मिटाया था।
कामिनी का दिल ज़ोर से धड़का।
उसने बिना कुछ कहे, बस अपना सिर हिलाया और कादर की पकड़ से आज़ाद होकर स्टोर रूम के दरवाज़े की तरफ बढ़ी।
कामिनी ने दरवाज़ा खोला और बाहर निकली।
कादर वहीं खड़ा रहा... पूर्ण नग्न, अपनी छाती चौड़ी किए, और अपने खड़े लंड पर हाथ फेरते हुए।
उसकी बाज़ जैसी नज़रें कामिनी की पीठ पर टिकी थीं।
बाहर लॉन में चलते हुए कामिनी की चाल पूरी तरह बदल चुकी थी।
वह पहले की तरह सीधे नहीं चल पा रही थी।
उसकी जांघों के बीच की सूजन और उस 8 इंच के मुसल के 'अहसास' ने उसे जांघें फैलाकर चलने पर मजबूर कर दिया था।
हर कदम पर उसकी गांड एक अजीब सी लय में मटक रही थी—एक ऐसी चाल जो सिर्फ़ एक औरत तब चलती है जब वह रात भर किसी असली मर्द के नीचे बुरी तरह रौंदी गई हो।
उसके कदम भारी थे, जांघों में टीस उठ रही थी— "सीइइ... आह्ह..."
हर कदम पर गाउन उसकी सूजी हुई योनि के होंठों (Labia) से रगड़ खा रहा था, जो दर्द के साथ-साथ एक मीठी सी कामुकता भी जगा रहा था।
पीछे खड़ा कादर, अपनी मोहब्बत की उस दर्द भरी और मदमस्त चाल (Waddle) को देखकर मुस्कुरा रहा था।
लॉन की ठंडी ओस से बचते हुए कामिनी घर के मुख्य दरवाज़े से अंदर दाखिल हुई।
घर में अभी भी मौत जैसा सन्नाटा पसरा हुआ था। पर्दों से छनकर आती सुबह की नीली रौशनी डाइनिंग हॉल में एक अजीब सी शांति बिखेर रही थी।
कामिनी के कदम भारी थे। कादर के उस '8 इंच के फौलादी मुसल' ने रात भर उसकी जो खदान खोदी थी, उसका असर अब उसके शरीर पर साफ़ दिख रहा था। उसकी जांघों के बीच एक मीठी सी सूजन थी, जिसकी वजह से वह अपने पैर सटाकर नहीं चल पा रही थी।
वह हल्का सा लंगड़ाते हुए, अपनी गांड को मटकाते हुए चल रही थी— "उफ्फ्फ... सीइइइ..." वह डाइनिंग हॉल की मेज़ के पास पहुँची ही थी कि अचानक पीछे से एक आवाज़ गूंजी...
"कैसी रही रात?"
उस खामोशी में यह आवाज़ किसी बम की तरह फटी।
कामिनी का दिल धक् से रह गया, कलेजा मुँह को आ गया। उसकी साँसें गले में अटक गईं।
"हे भगवान... रमेश उठ गया क्या?" वह कांपते हुए, घबराहट में पीछे पलटी।
लेकिन सामने... बंटी खड़ा था।
वह अपने पजामे में था और उसके चेहरे पर एक बहुत ही शैतानी, समझदार और रहस्यमयी मुस्कान तैर रही थी।
बंटी को देखते ही कामिनी की रुकी हुई साँस वापस आई। उसने एक गहरी, राहत की साँस छोड़ी और अपने सीने पर हाथ रख लिया।
"हट बदमाश...!" कामिनी ने बनावटी गुस्से से कहा, लेकिन उसके चेहरे पर कोई डर नहीं था।
अब उसे बंटी से कोई हया, कोई शर्म नहीं बची थी। वे दोनों अब माँ-बेटे से ज़्यादा 'एक जान, दो जिस्म' जैसे बन चुके थे—एक-दूसरे के हर पाप के राज़दार।
"तूने तो मेरी जान ही निकाल दी थी... ऐसे डराते हैं क्या?" कामिनी ने अपनी भारी साँसों को काबू करते हुए कहा।
बंटी एक कदम आगे बढ़ा। उसकी नज़रें अपनी माँ के उस बिखरे हुए रूप को स्कैन कर रही थीं, सूजे हुए होंठ, बिखरे बाल, गले पर कादर के दांतों के हल्के निशान और गाउन के अंदर से झांकता हुआ वह तृप्त निखार।
"डरना तो चाहिए आपको..." बंटी ने आँख मारते हुए कहा, "रात भर गायब थीं आप?"
कामिनी के चेहरे पर एक पल के लिए भी झिझक नहीं आई। उल्टे, उसके होंठों पर एक नशीली, मदमाती मुस्कान आ गई। रात की उस भयंकर ठुकाई ने उसके अंदर के सारे संकोच को धो डाला था।
उसने अपनी कमर पर हाथ रखा और इतराते हुए बोली
"तो आकर देख लेता ना... कि कहाँ थी मैं और क्या कर रही थी?"
बंटी अपनी माँ की इस बेशर्मी और बेबाकी पर हैरान भी हुआ और खुश भी।
"आप बुलाती ही नहीं... मैं कैसे आता?" बंटी ने भी ठुड्डी सिकोड़कर बनावटी शिकायत की।
कामिनी ने एक हल्की सी कामुक हंसी (Giggle) बिखेरी।
"अरे चल झूठे! पहले भी कब बुलाया था मैंने तुझे? तू तो अपनी माँ को छुप-छुप के ही देख लेता था ना खिड़की से? कल रात भी देख लेता... मना किसने किया था?"
कामिनी की आवाज़ में कोई पछतावा नहीं था। उसकी आँखें चमक रही थीं। उसकी बातों से, उसके खड़े होने के अंदाज़ से साफ़ झलक रहा था कि वह कितनी खुश है, कितनी "संतुष्ट" है। बरसों की जो प्यास रमेश नहीं बुझा पाया था, वो आज एक असली मर्द ने बुझा दी थी।
बंटी अपनी माँ के चेहरे पर वह 'औरत वाला निखार' देखकर अंदर ही अंदर बहुत खुश था। वह जानता था कि उसकी माँ इस ख़ुशी की हक़दार थी।
बंटी की नज़रें कामिनी की टांगों पर गईं, जो अभी भी फैली हुई थीं।
"लगता है..." बंटी ने मुस्कुराते हुए चुटकी ली, "कादर खान ने चाल बिगाड़ दी है आपकी? पैर सीधे नहीं पड़ रहे मैडम जी के..."
यह सुनते ही कामिनी का चेहरा शर्म और उत्तेजना से लाल हो गया। कादर का नाम सुनते ही उसकी जांघों के बीच फिर से एक सिहरन दौड़ गई।
उसने झेंपते हुए गाउन को थोड़ा नीचे खींचा।
"ऐसी बात करते हैं क्या अपनी माँ से? बेशर्म कहीं का!" कामिनी ने उसे एक मीठी सी डांट पिलाई।
"जा अंदर अपने कमरे में... तेरे पापा उठने वाले होंगे। मैं नहा-धोकर फ्रेश हो जाती हूँ, फिर चाय-नाश्ता बनाती हूँ।"
कामिनी वहाँ से मुड़ी और अपने बेडरूम की तरफ चल दी।
बंटी वहीं खड़ा अपनी माँ की उस लंगड़ाती, मदमस्त चाल को देखता रहा। कामिनी के भारी कूल्हे हर कदम के साथ उस दर्द और मज़े की गवाही दे रहे थे। कामिनी के चेहरे पर एक विजेता वाली मुस्कान थी, और दिल में बंटी जैसे समझदार बेटे को पाने का गर्व।
कामिनी अपने कमरे में दाखिल हुई।
बिस्तर पर... रमेश अभी भी उसी मुर्दे जैसी हालत में पड़ा था। टांगें पसारकर, मुँह फाड़कर खर्राटे ले रहा था।
कामिनी को उसे देखकर एक पल के लिए सख्त घिन आई।
उसने रमेश को कोई अहमियत नहीं दी। वह सीधे ड्रेसिंग टेबल के पास गई।
वहाँ कादर का दिया हुआ वह "जादुई तेल" की छोटी सी शीशी रखी थी।
कामिनी ने वह शीशी अपने गोरे हाथों में उठाई।
तेल को देखते ही उसे कादर के वो खुरदरे, मज़बूत हाथ याद आ गए।
उसने एक नज़र सोते हुए रमेश पर डाली, एक व्यंग्यात्मक मुस्कान दी, और बाथरूम का दरवाज़ा खोलकर अंदर घुस गई।
"क्लिक..."
अंदर से कुंडी लग गई।
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सुबह के साढ़े सात बज चुके थे। घर में सब कुछ सामान्य लग रहा था।
कादर के उस 'जादुई तेल' ने अपना असर दिखा दिया था। रात की वह वहशी ठुकाई, जिसने कामिनी के जिस्म को तोड़ कर रख दिया था, उसका सारा दर्द अब उड़नछू हो गया था। उसकी चाल अब सामान्य थी।
हाँ, बस एक मीठी सी टीस और कादर के उस 8 इंच के फौलादी मुसल की 'रगड़' का अहसास वह अभी भी अपनी चुत की गहराइयों में महसूस कर रही थी। हर कदम पर उसे रात का वह तांडव याद आ रहा था।
नहा-धोकर कामिनी जब बेडरूम से बाहर निकली, तो जैसे पूरे घर में एक अलग ही उजाला छा गया।
उसने आज एक चटक लाल रंग की सूती साड़ी पहनी हुई थी। साड़ी के साथ एक बेहद कसा हुआ, डीप-नेक स्लीवलेस ब्लाउज था, जो उसके भारी और उन्नत स्तनों को मुश्किल से कैद कर पा रहा था। ब्लाउज के गहरे गले से उसकी गोरी क्लीवेज साफ़ झांक रही थी।
नंगे गोरे बाजू, मांग में गहरा लाल सिंदूर, माथे पर बड़ी सी बिंदी, कलाइयों में खनकती लाल चूड़ियाँ और गले में लटकता मंगलसूत्र... उसकी खूबसूरती में चार चांद लगा रहे थे।
रमेश चाय का कप हाथ में लिए अखबार पढ़ रहा था। उसने नज़र उठाई और अपनी पत्नी के इस दहकते हुए रूप को देखकर ठिठक गया।
"अरे वाह... क्या बात है कामिनी! आज तो सुबह-सुबह ही दमक रही हो। कोई खास बात?"
"वो... बस... बस ऐसे ही..." कामिनी ने अपनी पलकें झुका लीं और एक नशीली सी मुस्कान उसके लाल होंठों पर तैर गई। उसे अब कहाँ किसी रमेश की फ़िक्र थी?
आज कामिनी किसी 38 साल की अधेड़ औरत जैसी नहीं लग रही थी। वह अपनी जवानी के 20 साल के यौवन को फिर से जी रही थी।
वह बिल्कुल किसी 'नवविवाहिता' (Newlywed) की तरह लग रही थी, अपितु वैसा ही महसूस भी कर रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे कोई नई-नवेली दुल्हन रात में अपनी सुहागरात मनाकर, भयंकर चुदाई के सुख से तृप्त होकर, सुबह पहली बार अपने परिवार के लिए नाश्ता बनाने निकली हो। वही चमक, वही जज़्बा और वही लाली आज कामिनी के चेहरे पर थी।
बंटी खामोशी से टेबल पर ब्रेड-मक्खन खा रहा था, लेकिन वह अपनी माँ की इस 'ख़ुशी' को देखकर अंदर ही अंदर मुस्कुरा रहा था।
तभी...
धड़... धाड़... धाड़.... दरवाज़े पर किसी की ज़ोरदार दस्तक हुई। दस्तक क्या थी, ऐसा लग रहा था जैसे कोई दरवाज़ा उखाड़ कर ही अंदर आ जाएगा।
बंटी ने कुर्सी छोड़ी और दौड़कर दरवाज़ा खोला।
सामने शमशेर खड़ा था। पुलिस की वर्दी में, माथे पर पसीना और चेहरे पर भयानक घबराहट।
"कादर खान कहाँ है...?" अंदर घुसते ही शमशेर का पहला और सीधा सवाल यही था।
लेकिन जैसे ही शमशेर की नज़र डाइनिंग टेबल के पास खड़ी कामिनी पर पड़ी, उसकी कड़क आवाज़ एक पल के लिए नरम पड़ गई।
साक्षात् 'कामदेवी' उसके सामने सजी-धजी खड़ी थी। छोटे स्लीवलेस ब्लाउज से छलकते उसके भारी स्तन और लाल साड़ी में लिपटा वह गदराया हुआ गोरा बदन... शमशेर एक बड़ा ठरकी था, लेकिन आज पहली बार ऐसा हुआ था कि वह कामिनी के इस हुस्न को ठीक से 'ताड़' नहीं पा रहा था।
वह अपनी ही किसी भयानक उलझन में फंसा हुआ था। उसके होश उड़े हुए थे।
"रमेश... कादर को यहाँ से कहीं और ले जाना होगा। उस हरामी कमिश्नर को शक हो गया है कि कादर यहाँ है। वो साला कभी भी यहाँ आ धमक सकता है!" शमशेर का शक जायज़ था, और उसके पास पक्की इन्फॉर्मेशन भी थी। वह पुलिस महकमे में कमिश्नर से हमेशा एक कदम आगे ही चलता था।
"अरे बैठ यार... चाय तो पी। ले जाना कादर को, हमें कौन सा उसका अचार डालना है," रमेश ने शमशेर का हाथ पकड़कर उसे कुर्सी पर बिठाना चाहा।
"टाइम नहीं है यार रमेश, मुझे तुरंत उसे निकाल कर कहीं ओर ले जाना होगा!"
कादर खान के 'वापस जाने' का नाम सुनते ही कामिनी के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई।
अभी जो चेहरा उत्तेजना, तृप्ति और ख़ुशी से लाल गुलाब की तरह दहक रहा था, वह एकाएक सूखे पत्ते की तरह मुरझा गया।
यह बिल्कुल वैसा ही दर्द था, जैसे किसी जवान फौजी की नई-नवेली दुल्हन को सुहागरात के अगले ही दिन सुबह पता चले कि उसके पति की छुट्टियां रद्द हो गई हैं और उसे वापस युद्ध पर जाना पड़ रहा है।
कामिनी ने अपनी सूनी, कांपती आँखों से कभी रमेश को देखा तो कभी शमशेर को। उसका दिल चीख-चीख कर कह रहा था— 'नहीं... कादर को मत ले जाओ।'
"वो... स्टोर रूम की तरफ इशारा करते हुए रमेश बोला, "वही पड़ा होगा तेरा दोस्त .. ले जा।"
शमशेर तुरंत मुड़ा और स्टोर रूम की तरफ भाग गया।
करीब 15 मिनट बाद...
बाहर से पुलिस की जीप स्टार्ट होने की आवाज़ आई।
कामिनी से रुका नहीं गया। वह अपनी लाल साड़ी का पल्लू संभालती हुई, नंगे पैर भागती हुई रसोई में गई। उसने कांपते हाथों से रसोई की खिड़की का परदा हटाया और बाहर झांका।
शमशेर की जीप स्टार्ट खड़ी थी, पीछे से काला धुआं निकल रहा था। और जीप के अंदर... कादर खान बैठा हुआ था।
गाट... गट... गट... धड़... धड़... ढा... खर... खर.... गियर पड़ने और इंजन की भारी आवाज़ के साथ देखते ही देखते वह जीप, वह कादर, कामिनी की आँखों के सामने से घर के गेट के बाहर निकल गई।
कामिनी वहीं खिड़की की लोहे की ग्रिल पकड़े खड़ी रह गई। उसकी आँखों के बांध टूट गए और गरम आँसू उसकी गोरी गालों पर बह निकले।
उसका प्रेमी, उसका हमबिस्तर, उसका असली मर्द पल भर में उससे दूर जा रहा था। रघु तो कल शाम ही जा चुका था, और अब कादर भी चला गया।
रात भर जिस चुत से कामरस की बाढ़ बह रही थी, जो अभी कुछ देर पहले तक उस फौलादी रगड़ को याद करके गीली हो रही थी, वह अचानक से सूखने लगी। हवस और प्यार की जगह एक भयानक सूनेपन ने ले ली।
कामिनी की बेइंतहा इच्छा हुई कि वह रसोई से भागकर बाहर जाए, शमशेर की जीप के आगे खड़ी हो जाए और चीखकर कहे— "मत ले जाओ कादर को! मैं उसके बिना नहीं जी सकती!"
लेकिन... एक घरेलू औरत की मर्यादा, समाज का डर, और गले में पड़ा वह मंगलसूत्र... इन 'सभ्य संस्कारों' की बेड़ियों ने उसके पैरों को ज़मीन से जकड़ रखा था।
वह चीखना चाहती थी, पर होंठ सिले हुए थे।
"सुबुक... सुबुक..." कामिनी वहीं खिड़की से माथा टिकाए सुबकने लगी।
उसकी धुंधली, आंसुओं से भरी आँखें बस उस जीप के धुएं को सड़क पर दूर जाते हुए देखती रह गईं।
रात को जो औरत इस संस्कारी समाज से निकल कर अपनी इच्छाओ को जी रही थी, सुबह होते ही वह फिर से एक बेबस, प्यासी और अकेली घरेलु बन कर रह गई थी.
घर, उसका दिल वापस से सुनसान हो गए थे. चुत से निकलता वासना का झरना सुख गया था.
जैसे अचानक मौसम ने करवट बदलती हो,
पतझड़ का मौसम आ गया था.... खिड़की के बहार अम्लताश के पेड़ से पत्ते झड़ झड़ के जमीन पर गिर रहे थे, उसके साथ की कामिनी के आंसू भी.
(क्रमशः)

1 Comments
Are re ye kya hua
ReplyDeleteKadar to chala gaya
Pehli baar kamini ne ek tagde mard ki mardangi ko mehsus kiya tha
Ab Kamini ka haal to Bina paani machli jaise hoke aur bhi tadpegi
Agar phir se ek hue to ghamasan chudai to banti hai
Jitni kamini tadpegi utna kadar kamini haal behaal kar dega.