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मेरी माँ कामिनी -41

मेरी माँ कामिनी - भाग 41

सुबह के 9:00 बजे 
रमेश अपना ब्रीफकेस लेकर ऑफिस चला गया था, और बंटी स्कूल।
घर के मुख्य दरवाज़े पर ताला लगने की 'खट' की आवाज़ गूंजी, और उसके साथ ही कामिनी के घर में एक ऐसा सन्नाटा पसर गया जो कानों के पर्दों को फाड़ रहा था।
कामिनी डाइनिंग हॉल के बीचों-बीच खड़ी थी।
वह पहले भी अकेली होती थी। रमेश के जाने के बाद यह घर रोज़ ही खाली हो जाता था।

 लेकिन आज का यह अकेलापन... यह बिल्कुल अलग था। यह उस बंजर ज़मीन का अकेलापन नहीं था जिसने कभी बारिश देखी ही न हो। यह उस हरी-भरी फसल का अकेलापन था, जिसे एक रात की बारिश ने सींचा तो ज़रूर, लेकिन सुबह होते ही कोई उस पूरी ज़मीन को ही लूट कर ले गया।

मिलन के बाद बिछड़ने की यह बेला कामिनी के लिए किसी 'मौत' से कम नहीं थी।
वह धीरे-धीरे, अपने भारी और दर्द करते कदमों को घसीटती हुई बेडरूम में आई।
बिस्तर की सिलवटें उसे चिढ़ा रही थीं। उसने आईने में खुद को देखा। मांग में सिंदूर था, लाल साड़ी थी, लेकिन चेहरे का वो सुहागन वाला नूर अब आंसुओं की लकीरों में बह चुका था।
कामिनी का रोम-रोम सुलग रहा था।
रात भर कादर के उस फौलादी और गर्म जिस्म ने कामिनी के अंदर दबी हुई उस 'ज्वालामुखी' को फोड़ दिया था। उसकी नस-नस में हवस और प्यार का जो ज़हर कादर ने घोला था, वह अब अपना असर दिखा रहा था।

कामिनी ने कांपते हाथों से अपने स्तनों को छुआ। उसे अभी भी अपने निप्पल्स पर कादर के गर्म होंठों और खुरदरी जीभ का अहसास हो रहा था। उसे लग रहा था जैसे कादर की उंगलियां अभी भी उसकी कमर को दबोचे हुए हैं।

लेकिन सबसे भयानक आज़ाब (दर्द) तो नीचे था।
उसकी जांघों के बीच, उसकी योनि में एक अजीब सी भट्टी जल रही थी। रात को जो गुफा कादर के 8 इंच के मुसल से 'पूरी तरह भर' गई थी, वह आज सुबह फिर से खाली हो गई थी। वह खालीपन अब कामिनी को खाए जा रहा था।

उसकी चुत के होंठ सूजे हुए थे, उनमें एक मीठी-मीठी टीस उठ रही थी। वह टीस उसे हर पल याद दिला रही थी कि कल रात वह कितनी गहराई तक भेदी गई थी। अंदर ही अंदर कामिनी का जिस्म कादर के वीर्य की उस गर्मी को फिर से महसूस करने के लिए तड़प रहा था।

"उफ्फ्फ्फ... हे भगवान... क्या करूं मैं..." कामिनी बिस्तर पर गिर पड़ी और सिसकने लगी।
चुत जल रही थी, लेकिन प्यास बुझाने वाला कोई नहीं था। समंदर कल रात उसके पास था, और आज वह फिर से एक रेगिस्तान में तड़प रही थी।

कामिनी उठकर पागलों की तरह घर में घूमने लगी।
वह आंगन के उस नल के पास गई जहाँ कादर नहाता था। 
उसने उस ठंडी ज़मीन को छुआ जहाँ कादर के पैरों के निशान हुआ करते थे। उसे वहां अभी भी कादर के पसीने और मर्दानगी की वह 'कच्ची महक' आ रही थी।
फिर उसके कदम अपने आप उस 'तीर्थ' की तरफ बढ़ गए स्टोर रूम।
उसने स्टोर रूम का दरवाज़ा खोला।
अंदर वही पुरानी दरी बिछी थी। कामिनी घुटनों के बल उस दरी पर बैठ गई। दरी के बीचों-बीच एक बड़ा सा गीला धब्बा सूख चुका था, यह उनके प्यार, कामिनी के कामरस और कादर के गाढ़े वीर्य का मिला-जुला निशान था।
कामिनी ने अपना चेहरा उस दरी पर रख दिया।
वह उस निशान को चूमने लगी, उसमें से कादर की महक को अपने फेफड़ों में भरने लगी।

"कामिनी जैसी संस्कारी, घरेलु औरत वासना की तड़प मे क्या क्या हरकत करने लगी थी..." कामिनी के आँखों से गिरी उस दो बून्द ने उस धब्बे को फिर से गिला कर दिया।

उसका लाल ब्लाउज आंसुओं से भीग गया।
वह दरी पर उसी जगह लेट गई जहाँ कल रात कादर ने उसे जम के चोदा था। उसने अपनी दोनों टांगें मोड़कर अपने सीने से लगा लीं।

उसका जिस्म आग की तरह तप रहा था। एक 38 साल की औरत, जिसने अभी-अभी जवानी का असली स्वाद चखा था, वह अब विरह की इस आग में ज़िंदा जल रही थी।
यह वीरानगी, यह सूनापन उसे अंदर से खोखला कर रहा था। आज का दिन उसके लिए किसी युग से भी ज़्यादा लंबा और दर्दनाक होने वाला था।

खुद को इस विरह की आग और खालीपन से बचाने के लिए कामिनी ने खुद को घर के कामों में व्यस्त कर लिया।
वह मशीन की तरह काम कर रही थी। उसने बेडरूम का बिस्तर साफ़ किया, आंगन में झाड़ू लगाई। हालांकि हर कदम पर उसकी जांघों के बीच की वह मीठी टीस उसे रात के तांडव की याद दिला रही थी, लेकिन उसने अपना ध्यान काम में लगाए रखा।

घड़ी देखी तो 2 बजने वाले थे। बंटी के स्कूल से लौटने का वक़्त हो चला था।
कामिनी ने हड़बड़ाहट में रसोई में जाकर फटाफट दोपहर का खाना तैयार कर लिया। उसका शरीर रसोई में था, लेकिन दिमाग अभी भी उस पुलिस की जीप के धुएं के पीछे भाग रहा था।

"डिंग-डॉन्ग..."
ठीक दो बजे दरवाज़े की घंटी बजी।
कामिनी ने जाकर दरवाज़ा खोला। सामने बंटी स्कूल यूनिफॉर्म में, कंधे पर बैग लटकाए खड़ा था।

सुबह जो माँ एक 'नवविवाहिता' की तरह दमक रही थी, जिसकी आँखों में एक नशीली चमक थी, वह अब बिल्कुल बुझ चुकी थी। कामिनी ने बड़े ही औपचारिक और रूखे तरीके से दरवाज़ा खोला। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था, आँखें सूनी थीं।
बंटी ने तुरंत अपनी माँ के चेहरे का यह बदलाव भांप लिया।
"माँ... क्या हुआ?" बंटी ने कुछ पूछना चाहा, लेकिन कामिनी ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बस बिना कुछ कहे पलटी और भारी कदमों से वापस रसोई की तरफ चली गई।

थोड़ी देर बाद, डाइनिंग टेबल पर लंच तैयार था।
बंटी और कामिनी आमने-सामने बैठे थे। बंटी की थाली में गरम रोटियां और सब्ज़ी थी, और कामिनी के सामने भी उसकी थाली परोसी हुई थी। लेकिन कामिनी निवाला तोड़ने के बजाय बस अपनी थाली को उदास आँखों से घूरे जा रही थी। उसका रोम-रोम उस 'फौलादी मुसल' के बिना सूना पड़ा था।

बंटी ने चुपचाप रोटी का पहला निवाला तोड़ा, सब्ज़ी में डुबोया और मुंह में रखा।
निवाला चबाते ही बंटी के चहरे के भाव बदल गए।
"ये क्या माँ.... नमक कहाँ है इसमें?" बंटी ने हैरानी से पूछा।
बंटी की आवाज़ सुनकर कामिनी जैसे अपनी गहरी सोच से एकदम से चौंक कर बाहर आई।
"हैं...? क्या...?"
उसने हड़बड़ाहट में सब्ज़ी की कटोरी की तरफ देखा और फिर अपनी कांपती उंगलियों को आपस में रगड़ा।

"वो... वो... लगता है भूल गई..." कामिनी ने अपनी नज़रें झुका लीं। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी हताशा और बेबसी थी। जिस औरत की ज़िंदगी से 'कादर' नाम का नमक ही चला गया हो, उसे सब्ज़ी के नमक का होश कहाँ रहता।

बंटी समझ गया कि बात क्या है। 
बंटी ने बिना कुछ कहे अपनी कुर्सी पीछे खिसकाई। वह उठा और मेज़ का चक्कर काटकर अपनी माँ के पास आकर खड़ा हो गया।

उसने अपने दोनों हाथ कामिनी के कंधों पर रखे और धीरे से उसे अपने करीब खींचा।
कामिनी कुर्सी पर बैठी थी और बंटी उसके पास खड़ा था। कामिनी का उदास सिर बंटी के पेट पर आकर टिक गया। बंटी ने बड़े ही प्यार से अपने दोनों हाथ अपनी माँ के बालों में डाल दिए और उसके सिर को सहलाने लगा।

"वापस आ जाएगा माँ... कादर। इसमें इतनी उदासी वाली क्या बात है?" बंटी ने वो बात कह दी जो कामिनी किसी से नहीं कह सकती थी।
कामिनी ने झटके से अपना सिर ऊपर उठाया।
उसने बंटी की आँखों में देखा। उसे लगा शायद बंटी मज़ाक उड़ा रहा है या ताना मार रहा है। लेकिन नहीं... बंटी की नज़रों में अपनी माँ के लिए अथाह प्यार, एक पक्का भरोसा और इत्मीनान था। वह अपनी माँ को खुश देखना चाहता था, चाहे वह ख़ुशी किसी गैर मर्द से ही क्यों न मिले।

बंटी की वो समझदार आँखें देखकर कामिनी के अंदर का टूटा हुआ हौसला वापस आने लगा।
"चलो, अब चुपचाप खाना खा लो," बंटी ने कामिनी के गाल को हल्का सा थपथपाया।

फिर उसके चेहरे पर एक बहुत ही शैतानी और कामुक मुस्कान आ गई। उसने अपनी एक आँख मारी और धीमे से बोला
"और वैसे भी माँ... आपको थोड़ा ब्रेक ले ही लेना चाहिए। मशीन थोड़ी हो... अभी कल रात ही तो..." यह सुनते ही कामिनी के उदास चेहरे पर अचानक से 'शर्म' की एक लालिमा दौड़ गई।

"हट बदमाश...!" कामिनी ने अपने आंसू भरी आँखों के बावजूद एक मीठी सी डांट पिलाई। "क्या कल रात को? कुछ भी बोलता है तू..."

"अच्छा जी...?" बंटी ने हंसते हुए अपनी माँ को चिढ़ाया। "आपकी सुबह वाली 'चाल' चीख-चीख कर बता रही थी कि उस 'कुछ भी' का मतलब क्या था। पैर तो सीधे रखे नहीं जा रहे थे मैडम से..."

बंटी की इस बेबाक और बेशर्म बात ने कामिनी के दिल का सारा बोझ हल्का कर दिया।
कामिनी ने कुर्सी पर बैठे-बैठे ही अपने दोनों हाथों से बंटी की कमर को जकड़ लिया और उसे कसकर अपने से चिपका लिया (Hug)।

"तू ना... बहुत बिगड़ गया है बंटी!" कामिनी ने प्यार से उसकी पीठ पर हल्का सा मुक्का मारते हुए कहा।
बंटी भी अपनी माँ के गले लगकर हंस रहा था।

"अच्छा... चलो अब मैं इतना बिगड़ ही गया हूँ, तो बताओ ना... क्या-क्या हुआ था रात को?" बंटी ने कामिनी के कंधे पर ठुड्डी रखते हुए एक आशिक़ की तरह पूछा।
कामिनी ने बंटी को खुद से थोड़ा दूर किया। उसने अपनी नशीली आँखें बड़ी कीं, भौहें सिकोड़ीं और एक बनावटी गुस्से से बंटी को घूरते हुए बोली

"अपनी माँ से कोई ऐसा सवाल पूछता है बेशर्म?"
बंटी ने मासूमियत से कंधे उचका दिए। "राज़दार से तो सब शेयर किया जाता है ना।"

कामिनी के होंठों पर अब एक इत्मीनान और मदहोशी भरी, धीमी सी मुस्कान खिल उठी थी। वह अपने इस 'अजीब' लेकिन प्यारे बेटे को देखकर अंदर से जुड़ रही थी।

उसने बंटी के गाल को प्यार से खींचा और फुसफुसाते हुए बोली
"बताऊंगी... कभी फुरसत में तसल्ली से बताऊंगी। अभी बहुत काम पड़ा है घर का। तू चुपचाप बैठकर खाना खा ले फ़िलहाल।"

कामिनी उठी और किचन से नमक की डिब्बी लाने चल दी।
अब उसकी चाल में वो पहले जैसी भारी उदासी नहीं थी। हालांकि जांघों के बीच का वो दर्द अब हल्का था, लेकिन बंटी के इस प्यार और 'शरारत' ने उसके उस दर्द को एक मीठी याद में बदल दिया था। 

**********************

रात के 9:00 बजे 

दिन का वो सूनापन और उदासी अब एक घुटन भरे माहौल में बदल चुकी थी।
रात के 9 बज चुके थे। घर का बेडरूम, जो एक पति-पत्नी का सबसे निजी कमरा होता है, आज एक 'कसाईखाने' जैसा लग रहा था। हवा में सस्ती शराब, सिगरेट के धुएं और पसीने की बदबू तैर रही थी।

बिस्तर के बीचों-बीच रमेश और पुलिस इंस्पेक्टर शमशेर बैठे थे। दोनों के सामने कांच के गिलास रखे थे और शराब का दौर चल रहा था। रमेश आज कुछ ज़्यादा ही पी चुका था। उसकी आँखें लाल थीं और जबान लड़खड़ा रही थी। शमशेर हमेशा की तरह अपनी 'शिकारी' मुद्रा में था, शराब पी रहा था, लेकिन उसके होश पूरी तरह कायम थे।
"अरे... ओ कामिनी! चखना कहाँ रह गया?" रमेश ने नशे में धुत होकर अपनी कर्कश आवाज़ में चिल्लाया।

रसोई में खड़ी कामिनी का दिल इस आवाज़ से कांप उठा। उसने एक गहरी सांस ली, अपने साड़ी के पल्लू को ठीक किया और नमकीन-सलाद की प्लेट लेकर भारी कदमों से बेडरूम की तरफ बढ़ी।
जांघों के बीच कादर की दी हुई वो 'सूजन' अभी भी थी। हर कदम पर उसे उस दर्द का अहसास हो रहा था, लेकिन इस वक़्त उसके दिमाग पर एक अनजाना सा डर हावी था।

कामिनी बेडरूम में दाखिल हुई। उसने नज़रें नीची रखीं।
उसने चुपचाप, बिना कोई शब्द कहे, चखने की प्लेट दोनों गिलासों के बीच बिस्तर पर रख दी। शराब की सड़ांध से उसका जी मिचला रहा था। वह बस किसी तरह उस कमरे से बाहर निकलना चाहती थी।

जैसे ही प्लेट रखकर कामिनी पलटी और दरवाज़े की तरफ जाने लगी... पीछे से रमेश की ज़हरीली और नशे में डूबी आवाज़ ने उसके कदमों को जकड़ लिया।

"अबे कहाँ जा रही है रंडी... बैठ यहाँ पर हमारे साथ!"
यह शब्द... "रंडी"।
रमेश के मुँह से निकली इस गाली ने कामिनी के बदन में सनसनी फैला दी। उसके पैर ज़मीन पर ही जम गए।
यह गाली रमेश ने नशे में अपनी नामर्दी की भड़ास निकालने के लिए दी थी, लेकिन कामिनी के लिए यह शब्द एक बम की तरह फटा। 

कल रात कादर के नीचे उछलते हुए उसने खुद को यही तो महसूस किया था, वो किसी सस्ती रंडी की तरह कादर खान के लंड पर उछल रही थी,

"लेकिन वो हवस की मज़बूरी थी, प्यार था। और रमेश के मुँह से यह शब्द एक नंगी तलवार की तरह उसके सीने में उतर गया।
"कभी तो अपने पति के काम आ..." रमेश ने अपना खाली गिलास हिलाते हुए बदतमीज़ी से कहा, "बस सारा दिन घर में महारानी की तरह घूमती रहती है।"
"देखो साली के कपडे, इतनी महंगी चमचमाती साड़ी पहन के घूमती है, पता नहीं कौन सा यार आता है इसे चोदने " 
कामिनी सन्न रह गई। उसका खून जम गया।

उसका दिल पसलियों को तोड़कर बाहर आने को हो रहा था। उसके दिमाग में एक ही खौफनाक ख्याल बिजली की तरह कौंधा
"हे भगवान... कहीं... कहीं शमशेर ने रमेश को सब बता तो नहीं दिया? क्या उसने रमेश को भड़का दिया है?"

कामिनी का पूरा शरीर थर-थर कांपने लगा। उसकी साँसें भारी हो गईं।
उसने अपनी डरी हुई, फटी-फटी आँखों से धीरे से मुड़कर बिस्तर की तरफ देखा। रमेश तो नशे में झूल रहा था, लेकिन उसकी नज़रें सीधे शमशेर पर जाकर टिक गईं।
शमशेर साला एक नंबर का हरामी और घाघ पुलिसवाला था।
वह बिस्तर पर टेक लगाए बैठा था। उसके हाथ में शराब का गिलास था। कामिनी की उन डरी हुई, कांपती आँखों को देखकर शमशेर समझ गया कि कामिनी के मन में क्या चल रहा है।

शमशेर ऐसा मौका कहाँ जाने देता? वह एक भूखे भेडिये की तरह कामिनी के उस खौफ, उसकी उस बेबसी का रस पी रहा था।
उसने कामिनी के सवालों का कोई सीधा जवाब नहीं दिया। उसने कुछ नहीं बोला।
बस... उसके काले, मोटे होंठों पर एक बहुत ही कमीनी, रहस्यमयी और शैतानी मुस्कान रेंग गई। वह मुस्कान चीख-चीख कर कह रही थी कि वह कामिनी की हर रग, हर राज़ से वाकिफ है।

शमशेर ने अपने गिलास से शराब का एक घूंट भरा। उसने कामिनी के थरथराते हुए गोरे बदन को, उसकी गहरी क्लीवेज को अपनी हवस भरी नज़रों से ऊपर से नीचे तक घूरा और फिर एक बहुत ही 'चिकनी' लेकिन खौफनाक आवाज़ में बोला

"बैठ जाओ ना भाभीजी... रमेश कह रहा है तो।"
शमशेर की इस एक लाइन ने कामिनी के रोंगटे खड़े कर दिए।
"भाभीजी" शब्द में कोई इज़्ज़त नहीं थी, बल्कि एक ऐसा नंगापन था जिसने कामिनी को अंदर तक नंगा कर दिया।
शमशेर की आँखों में एक सीधा 'ब्लैकमेल' और 'हवस' का न्यौता था। वह रमेश की आड़ में कामिनी को अपने जाल में फंसा रहा था।

कामिनी वहीं दरवाज़े के पास खड़ी रह गई। उसके पैर जेली की तरह कांप रहे थे।
भागने का कोई रास्ता नहीं था। अगर वो नहीं बैठती है, तो रमेश हंगामा करेगा, गलियां देगा, मरेगा पिटेगा। और अगर बैठती है... तो शमशेर की वो ठरकी नज़रें उसे ज़िंदा नोच खाएंगी।
*************

बेडरूम की हवा अब पूरी तरह से ज़हरीली हो चुकी थी।
कामिनी दरवाजे के पास बुत बनी खड़ी थी। रमेश शराब के नशे में इतना अंधा हो चुका था कि उसे यह भी होश नहीं था कि सामने उसका ही एक दोस्त बैठा है। 

उसे इस बात की कोई परवाह नहीं थी कि वह अपनी ही बीवी के साथ एक गैर मर्द के सामने कैसे पेश आ रहा है।
वैसे भी, रमेश की नज़रों में कामिनी कभी उसकी 'बीवी' या 'प्रेमिका' थी ही नहीं, वह बस उसके घर की एक इज़्ज़त, एक नौकरानी और उसके बच्चे की माँ भर थी।

"खड़ी क्या है वहाँ मुँह लटकाए? बैठ ना... ये खा थोड़ी जाएगा तुझे?" रमेश ने अपनी लड़खड़ाती ज़बान और भद्दे अंदाज़ में हाथ नचाते हुए कहा।
रमेश का नशा अब उसके सिर चढ़कर बोल रहा था। वह अपनी सारी नामर्दी, अपनी सारी कुंठाओं (Frustrations) का ठीकरा कामिनी के सिर फोड़ रहा था।

"वैसे तुझे आता भी क्या है?" रमेश ने एक घूंट मारा और शमशेर की तरफ देखकर भद्दी सी हंसी हंसा। 
"बिस्तर पर बिल्कुल बर्फ की तरह ठंडी पड़ी रहती है। साला, मर्द को कैसे लुभाते हैं, उसे कैसे खुश करते हैं... तुझे पता ही नहीं है!"

रमेश कामिनी को लगातार सुनाए जा रहा था। वह अपनी नामर्दी का पूरा इल्ज़ाम कामिनी के 'ठंडेपन' पर डाल रहा था।

लेकिन बिस्तर के दूसरी तरफ बैठा शमशेर... वह मन ही मन अपनी एक शैतानी और कमीनी हंसी हंस रहा था।
शमशेर कामिनी का सच जानता था। वह जानता था कि यह लाल साड़ी में लिपटी हुई औरत कोई 'ठंडी बर्फ ' नहीं, बल्कि आग का एक दहकता हुआ गोला है। 

इतनी गर्म कि अगर रमेश को उसकी असलियत पता चल जाए, तो वह साला जलकर राख हो जाए। शमशेर रमेश का बहुत पुराना दोस्त था, वह रमेश की औकात, उसकी कमज़ोरी और उसके ढीलेपन से वाकिफ था।

"आ ना साली... यहाँ बैठ!" अचानक रमेश गुरराया उसने आगे बढ़कर कामिनी का गोरा, नाज़ुक हाथ कसकर पकड़ लिया।

इससे पहले कि कामिनी कुछ समझ पाती या विरोध कर पाती, रमेश ने उसे एक ज़ोरदार झटका दिया और खींचकर बिस्तर पर अपने और शमशेर के ठीक बीच में बिठा दिया।

"धप्प..."
कामिनी बिस्तर पर गिरते ही संभली।
रमेश नशे में बुरी तरह झूम रहा था। उसकी आँखें शराब के नशे में बार-बार बंद हो रही थीं और फिर झटके से खुल रही थीं।

कामिनी का पूरा जिस्म खौफ और अपमान से कांप रहा था, उसके माथे और गर्दन पर पसीने की बूंदें चमकने लगी थीं। वह लाल सूती साड़ी, जो सुबह उसके सुहागन होने का प्रतीक थी, इस पसीने और घबराहट में उसके बदन से चिपक कर और भी मादक लग रही थी।

और कामिनी की बायीं तरफ बैठा शमशेर...
उसकी भूखी नज़रे कामिनी के उस पसीने से नहाए, कांपते हुए गोरे जिस्म को ऐसे निहार रही थीं जैसे कोई गिद्ध मांस के लोथड़े को ताड़ता है। शमशेर को कामिनी की इस बेबसी में अपना 'शिकार' नज़र आ रहा था।

कामिनी का दम घुट रहा था। वह दो दरिंदों के बीच सैंडविच बन गई थी।
उसने अपना हाथ रमेश की पकड़ से छुड़ाने की कोशिश की और कांपती हुई आवाज़ में गिड़गिड़ाई

"छ... छ... छोड़िये ना... क्या कर रहे हैं आप... बंटी यहीं है बाहर, वो आ जाएगा..."
कामिनी की यह बात सुनकर रमेश का पारा और चढ़ गया।

"बच्चा नहीं है साला वो अब...!" रमेश ने खूंखार तरीके से गुर्राते हुए कहा। उसकी आँखें लाल हो गई थीं।

"अभी भी दूध पिला कर सुलाती है क्या उसे तू... हैं?"
रमेश ने गंदी नीयत और गुस्से में अपना हाथ आगे बढ़ाया और कामिनी की छाती पर पड़ा उसकी लाल साड़ी का पल्लू कसकर पकड़ लिया और एक ही झटके में सरका दिया।

"सर्रर्र...!!"
साड़ी का कपड़ा कामिनी के कंधे से खिसक कर उसकी कमर पर जा गिरा।
कामिनी की सांसें गले में ही अटक गईं। उसने अपने दोनों हाथ अपनी छाती को छुपाने के लिए आगे किए, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।

कमरे की दूधिया ट्यूबलाइट की तेज़ रौशनी में कामिनी का वह भरा हुआ, गदराया हुआ हुस्न शमशेर के बिल्कुल सामने पूरी तरह उजागर हो गया।

कामिनी ने जो डीप-नेक, कसा हुआ स्लीवलेस ब्लाउज पहना था, वह उसके विशाल और भारी स्तनों को संभालने में पहले ही नाकाम था। अब पल्लू हटने के बाद... उसके गोरे, पसीने से चमकते हुए स्तन हद से ज्यादा  बाहर की तरफ उफन रहे थे। 
ब्लाउज के गहरे गले के बीच बनी वह गहरी घाटी (Cleavage) इतनी नशीली थी कि किसी भी साधु का ईमान डगमगा जाए।

शमशेर की आँखें फटी की फटी रह गईं।
कल रात कादर की ठुकाई के बाद कामिनी के स्तनों पर जो एक अजीब सा भारीपन और निखार आ गया था, वह शमशेर की हवस को भड़काने के लिए काफी था।
कामिनी के स्तन आज ज्यादा ही फुले हुए लग रहे थे, उस पर कादर के हथेलियों के हलके लाल निशान अभी भी मौजूद थे.

कामिनी के उस बेपर्दा हुस्न, उसके कांपते हुए सीने और पसीने की महक ने शमशेर के अंदर के जानवर को जगा दिया।
शमशेर की साँसें भारी होने लगीं। पैंट के अंदर... उसका लंड एक झटके में अकड़ने लगा। सामने रमेश नशे में धुत्त होकर अपनी बीवी की बेइज़्ज़ती कर रहा था, और बगल में शमशेर का हथियार रमेश की ही बीवी के इस नज़ारे को देखकर फौलाद बन रहा था।

कामिनी ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं। उसकी आँखों से अपमान के दो आंसू छलक कर उसके लाल गालों पर गिर पड़े।
रमेश का सिर नशे में बुरी तरह झूल रहा था। उसे सामने की चीज़ें भी अब धुंधली (Blurry) और दो-दो दिखाई दे रही थीं। 
अपनी ही बीवी का पल्लू गिराकर, उसके दूधिया हुस्न को अपने दोस्त के सामने नंगा करके भी उसे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। उसकी नामर्दी और शराब का नशा उसे अंदर से खा चुका था।
लेकिन शमशेर... शमशेर की भूखी आँखें तो जैसे कामिनी के उन बाहर उफनते हुए, पसीने से चमकते स्तनों पर फेवीकोल की तरह चिपक गई थीं। उसके पैंट में खड़ा फौलाद अब रगड़ खाकर दर्द करने लगा था।

शमशेर ने इस मौके का पूरा फायदा उठाने की ठान ली। वह रमेश का बहुत पुराना दोस्त था और उसकी एक-एक कमज़ोरी से वाकिफ था। वह अच्छे से जानता था कि रमेश जब इतनी पी लेता है, तो उसे अगले दिन कुछ याद नहीं रहता उसका दिमाग पूरी तरह से ब्लैकआउट (Blackout) हो जाता है।

यही सोचकर शमशेर के शैतानी हौसले बुलंद हो गए।
शमशेर ने अपना दाहिना हाथ धीरे से आगे बढ़ाया और कामिनी की लाल साड़ी से ढके हुए घुटने पर रख दिया।

शमशेर का वह चौड़ा, कड़क और मर्दाना हाथ जैसे ही कामिनी के घुटने पर पड़ा, कामिनी के बदन में 440 वोल्ट का करंट दौड़ गया।

"इस्स...!!" कामिनी की साँस गले में ही अटक गई।
नियम और एक 'संस्कारी पत्नी' की मर्यादा के हिसाब से उसे तुरंत शमशेर का हाथ झटक देना चाहिए था। उसे चीखना चाहिए था। 
आज से पहले उसने रमेश के जागते हुए कभी ऐसी जुर्रत करने की सोची भी नहीं थी।
लेकिन... आज वह ऐसा नहीं कर पाई। वह बुत बनी बैठी रही।
सुबह से जो कादर की जुदाई का खालीपन उसे अंदर से नोच रहा था, जो भयंकर प्यास उसकी जांघों के बीच सुलग रही थी, उस आग को शमशेर के इस एक स्पर्श ने हवा दे दी थी।

कामिनी की चुत, जो कादर के जाने के बाद सूखने लगी थी, वह अचानक से फड़कने (Throbbing) लगी। अपने ही पति के सामने, उसी के बगल में बैठकर, एक गैर मर्द के हाथ का अपनी जांघों पर होना... इस ख्याल मात्र (Thrill of the Taboo) ने ही कामिनी के जननांगों में गीलापन ला दिया। वह डर और चरम उत्तेजना के एक अजीब भंवर में फँस गई।

जब कामिनी ने शमशेर का हाथ नहीं हटाया, तो शमशेर समझ गया कोयला सुलग रहा है, वैसे भी शमाशेर घाघ पुलिस वाला था, उठता धुआँ देख के समझ जाता था आग कब और कैसे जलेगी.


उसने रमेश की तरफ देखा। "भाभीजी जैसी मेरी बीवी होती तो रोज़ इसकी गांड मारता मै....," शमशेर ने जानबूझकर रमेश को कुरेदा।
कामिनी शमशेर की बात सुन सन्न रह गई, एक अजीब सी उत्तेजना ने उसे घेर लिया, गांड मारने के अहसास से ही कामिनी ने अपनी गांड को कस के सिकोड लिया.. उसे याद आया, लास्ट टाइम शमशेर ने उसकी गांड को ही पेला था.
कामिनी ने रुआसी आँखों से शमशेर को देख, उसने ना मे गर्दन हिलाई... जैसे समझा रही हो plz भगवान के लिए ऐसी बात मत करो...

रमेश ने अपनी भारी, नशे में डूबी पलकें उठाईं "अच्छा है ये तेरी बीवी नहीं है वरना मेरा जैसा नामर्द बन जाता तु भी... हिचहम्म्म... हीच....." उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि उसके बिल्कुल बगल में उसकी बीवी के साथ क्या खेल शुरू हो चुका है।

"क्यों क्या करती है भाभीजी " शमशेर पूरी तरह से कामिनी की इज़्ज़त उतारने पर उतर आया था.
बीच मे बैठी कामिनी अपनी बेबसी, अपने अपमान पर सिहर के रह जा रही थी.
आंखे नम थी, लेकिन साथ ही चुत भी नम थी उसकी चुत कामिनी के अपमान, बेइज़्ज़ती मे अलग मजा ढूढ़ रही थी, उसकी चुत इस अपमान मे आंसू बहा रही थी लेकिन वासना के आंसू.

"शमशेर... ये इतनी ठंडी है कि... कि मेरा लोड़ा भी नहीं खड़ा कर पाती। साला कोई आग ही नहीं है इसमें... बिल्कुल मरी हुई लाश है।"
रमेश अपनी नामर्दी का सारा ठीकरा कामिनी पर फोड़ रहा था, उसे दुनिया की सबसे बेकार औरत साबित कर रहा था।
और यहाँ... रमेश के ठीक बगल में...
शमशेर का हाथ कामिनी के घुटने से सरकता हुआ, उसकी लाल साड़ी के ऊपर से ही उसकी गोरी, मांसल जांघों (Thighs) की तरफ ऊपर बढ़ने लगा था।
"क्या भाभीजी आप ऐसी है क्या, मेरे दोस्त का लंड भी नहीं खड़ा कर पति " शमशेर किसी लकड़बग्घा जैसे हस रहा था, उसका इशारा अपनी पैंट मे बने उभार की तरफ था.

शमशेर की मोटी-मोटी, गुंडों वाली उंगलियां कामिनी की जांघों के नरम मांस को हल्के-हल्के मसल (Squeeze) रही थीं।

यह एक बहुत ही खौफनाक और कामुक विरोधाभास था। पति सामने बैठकर उसे 'ठंडी' और 'बेकार' बता रहा था, और उसी का दोस्त उसके भरे हुए जिस्म की गर्मी से पागल होकर उसे नोच रहा था।

कामिनी इस स्थिति से पागल होने लगी।
रमेश के वो कड़वे ताने और शमशेर की वो गुदगुदाती, मसलती हुई उंगलियां... कामिनी की योनि से अब कामरस छलकने लगा था। साड़ी के नीचे उसकी पैंटी गीली होने लगी थी।

वह कसमसा कर रह जाती। जब उसे रमेश का ख्याल आता और पकड़े जाने का भयानक डर सताता, तो वह सहम कर अपनी जांघें आपस में सिकोड़ लेती। लेकिन जैसे ही शमशेर की उंगलियां उसकी जांघों की अंदरूनी मुलायम त्वचा (Inner Thighs) को रगड़तीं और ऊपर की तरफ बढ़तीं, कामिनी उत्तेजना की लहर में अपनी आँखें कसकर बंद कर लेती और अपने दांतों तले अपना निचला होंठ दबा लेती।

"उफ्फ्फ... मम्म..." कामिनी के मुँह से एक बहुत ही धीमी, ना सुनाई देने वाली सिसकी निकल गई।
शमशेर का हाथ अब कामिनी के घुटनों का सफर तय करके, साड़ी की सिलवटों के बीच से उसकी गहरी और भरी हुई जांघों की जड़ तक पहुँचने वाला था। 

कामिनी की छाती, जो आधे ब्लाउज़ से नंगी बाहर झांक रही थी, अब साँसों की तेज़ी और हवस की वजह से धौंकनी की तरह ऊपर-नीचे हो रही थी। शमशेर की मंजिल अब वो जगह थी, जहाँ सुबह कादर अपना 'लावा' छोड़ कर गया था।

रमेश बिस्तर पर झूल रहा था। उसकी आँखें आधी बंद थीं, सिर भारी होकर सीने की तरफ गिर रहा था, लेकिन वह बेहोश नहीं था। नशे ने उसके दिमाग को सुन्न कर दिया था, लेकिन उसकी बकवास अभी भी चालू थी।

 वह अपनी ही नामर्दी का गुस्सा कामिनी पर निकाल रहा था।
और ठीक उसी के बगल में... शमशेर का वो चौड़ा, खुरदरा हाथ कामिनी की लाल साड़ी को नीचे से पकड़कर धीरे-धीरे ऊपर की तरफ खिसका रहा था।
कामिनी की सांसें अटक गईं। उसने हिम्मत जुटाकर अपने कांपते हुए गोरे हाथ को शमशेर की कलाई पर रख दिया। उसने शमशेर की आँखों में एक बेबस, भीख मांगती हुई नज़र से देखा और लगभग रोते हुए फुसफुसाई
"छो... छोड़िये ना... कम से कम इनके (रमेश) सामने तो ऐसा मत करो... प्लीज़..."
लेकिन शमशेर कोई इंसान नहीं, एक भूखा भेड़िया था। कामिनी का यह डर, यह गिड़गिड़ाना उसे और भी ज़्यादा मज़ा दे रहा था। उसने कामिनी के हाथ को कोई अहमियत नहीं दी, बल्कि उसे एक खौफनाक और शातिर नज़रों से घूरा।

शमशेर जानता था कि इस 'ठंडी' दिखने वाली औरत के अंदर कितनी 'गर्म' आग छुपी है। उसने कामिनी की उस आख़िरी बगावत को तोड़ने के लिए अपना सबसे बड़ा पत्ता फेंका।
शमशेर ने अपना चेहरा थोड़ा घुमाया और नशे में झूमते हुए रमेश की तरफ देखकर, एक बहुत ही दोहरे मतलब (Double meaning) वाली आवाज़ में कहा—
"क्यों रमेश... उस दिन का 'मटन' कितना गर्म और टेस्टी था ना?"
यह शब्द सुनते ही कामिनी का दिल जैसे धड़कना भूल गया। उसके बदन का सारा खून जम गया।

"मटन... गर्म और टेस्टी..." शमशेर का इशारा साफ़ था। वह रमेश से बात कर रहा था, लेकिन उसका निशाना कामिनी का वह 'गर्म जिस्म' था जिसे कल रात कादर ने खाया था। कामिनी बुरी तरह सहम गई। उसकी मुट्ठी जो शमशेर की कलाई पर कसी थी, एकदम ढीली पड़ गई।

रमेश ने नशे में अपना सिर उठाया। उसे शमशेर के इस 'मास्टरमाइंड' खेल की रत्ती भर भी भनक नहीं थी।
"हिच... ह्ह्हम्म... हाँ... साला... मटन ... साला कादर क्या बनाता है..." रमेश अपनी लड़खड़ाती ज़बान से बड़बड़ाया और फिर से अपनी आँखें मींच लीं।

रमेश के मुँह से 'कादर' का नाम सुनते ही शमशेर के होंठों पर एक शैतानी, विजयी मुस्कान आ गई।
उसने अपना चेहरा कामिनी के कान के बिल्कुल करीब लाया। कामिनी को उसकी शराब और सिगरेट से सड़ी हुई सांसें अपनी गर्दन पर महसूस हो रही थीं। शमशेर ने फुसफुसाते हुए, सीधे कामिनी की रूह पर वार किया

"कादर का मटन कैसा था भाभीजी?"

"धक्...!!"
कामिनी की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसका दिमाग सुन्न पड़ गया।

शमशेर का यह शातिर ब्लैकमेल कामिनी को अंदर तक तोड़ रहा था। कादर का ज़िक्र, पकड़े जाने का डर और अपने ही पति के सामने बेइज़्ज़त होने का खौफ... इस सबने कामिनी को पैरालाइज़ (Paralyze) कर दिया।

 उसका सारा विरोध, सारी छटपटाहट एक ही पल में खत्म हो गई। वह एक बेजान गुड़िया की तरह बिस्तर पर सुन्न पड़ गई।
कामिनी के इस समर्पण को देखते ही शमशेर के हौसले आसमान छूने लगे।
उसने बिना किसी डर के, कामिनी की लाल साड़ी को उसके घुटनों से उठाया और सीधे उसकी गोरी, भारी जांघों (Upper Thighs) तक सरका दिया।

ट्यूबलाइट की रौशनी में कामिनी की वो मलाई जैसी गोरी, नंगी जांघें पूरी तरह उजागर हो गईं। और उन जांघों के बीच... कामिनी ने लाल रंग की कच्छी पहनी हुई थी।

कामिनी के भारी स्तन खौफ और एक अनजानी हवस से तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी।

शमशेर की एक मोटी, खुरदरी ऊँगली साड़ी के नीचे घुसी।
उसने कामिनी की जांघों के नरम मांस को छुआ और फिर धीरे-धीरे फिसलते हुए... कामिनी की कच्छी की इनर लाइन (Elastic edge) को टटोलने लगी।

"सस्ससीइइ..."
जैसे ही शमशेर की ऊँगली ने उस वर्जित (Forbidden) जगह को छुआ, कामिनी की सांस गले में ही अटक गई।
कादर के जाने से जो चुत सुबह से प्यासी और सूखी पड़ी थी, इस खौफनाक और बेशर्म स्पर्श ने उसे अचानक से गीला करना शुरू कर दिया।

रमेश बगल में आँखें बंद किए अपनी ही दुनिया में बड़बड़ा रहा था— "साली... ठंडी लाश..."
और वहीं... शमशेर की ऊँगली कामिनी की पैंटी के किनारे को रगड़ रही थी, यह चेक कर रही थी कि यह 'ठंडी लाश' कितनी गर्म और गीली हो चुकी है।

कामिनी डर, ब्लैकमेल और अपने ही जिस्म की इस बागी उत्तेजना के बीच फँसकर रह गई थी। वह चाह कर भी रमेश को आवाज़ नहीं दे सकती थी, और शमशेर को रोक भी नहीं सकती थी। उसे बहकाया जा रहा था, उसे तोड़ा जा रहा था... और सबसे खौफनाक बात यह थी कि उसके जिस्म को इस 'पाप' में मज़ा आने लगा था।

शमशेर की मोटी और खुरदरी ऊँगली कामिनी की लाल कच्छी के इलास्टिक किनारे पर रेंग रही थी।

कामिनी ने अपनी आँखें कसकर बंद कर ली। उसका पूरा गोरा बदन पसीने से भीग चुका था। वह बस यही दुआ कर रही थी कि शमशेर यहीं रुक जाए, लेकिन एक 'शिकारी' खून का स्वाद चखने के बाद कहाँ रुकता है?

शमशेर ने अपनी नज़रे तिरछी करके नशे में झूलते रमेश को देखा। रमेश की आँखें बंद थीं और वह अपने ही लार टपकाते हुए मुँह से बड़बड़ा रहा था— "साली... सूखी लकड़ी... कोई रस नहीं..."

रमेश की इस बात ने शमशेर के होंठों पर एक शैतानी मुस्कान ला दी।
उसने बिना पलक झपकाए, अपनी बीच वाली ऊँगली को कामिनी की पैंटी के इलास्टिक के नीचे धकेल दिया।

"सस्ससीइइ... उइइइ... मम्म..."
कामिनी का शरीर धनुष की तरह तन गया।
शमशेर की खुरदरी ऊँगली सीधे कामिनी की योनि  के उन नाज़ुक, सूजे हुए होंठों (Labia) से जा टकराई, जो कल रात कादर के 8 इंच के मुसल की रगड़ से अभी तक पूरी तरह ठीक नहीं हुए थे।

वो दर्द, वो टीस और अब इस अजनबी, वर्जित स्पर्श का खौफ... कामिनी के जिस्म ने एक भयानक 'करंट' महसूस किया।

रमेश उसे 'सूखी लकड़ी, बर्फ की सिल्ली ' कह रहा था, लेकिन शमशेर की ऊँगली जैसे ही उस गहरी दरार में फिसली, उसे वहाँ बाढ़ का अहसास हुआ।

उसने पैंटी के अंदर ही अपनी ऊँगली को कामिनी की उस गीली, धड़कती हुई दरार पर हल्का सा रगड़ा।

"घिस..."
यह रगड़ इतनी जानलेवा थी कि कामिनी का मुँह खुल गया। एक चीख उसके गले तक आ गई थी, लेकिन अगर वह चीखती, तो बगल में बैठा रमेश जाग जाता।

कामिनी ने अपनी जान बचाने के लिए अपने ही बायीं तरफ के निचले होंठ को अपने दांतों के बीच कसकर दबा लिया। उसने इतनी ज़ोर से होंठ काटा कि खून की एक हल्की सी बूंद छलक आई, लेकिन उसने अपनी आवाज़ को बाहर नहीं निकलने दिया।

शमशेर ने कामिनी के उस तड़पते हुए चेहरे को देखा। उसने अपनी गीली ऊँगली पैंटी से बाहर निकाली और कामिनी के चेहरे के बिल्कुल करीब ले जाकर फुसफुसाया

"रमेश तु तो खामखा भाभीजी पे इल्जाम लगा रहा था की वो सुखी लकड़ी है, बर्फ है, मै कैसे मान लू?" 
शमशेर कामिनी की बेबसी उसकी मज़बूरी का भरपूर फायदा उठा रहा था.

शमशेर के इन ज़हरीले शब्दों ने कामिनी को अंदर तक नंगा कर दिया।
उसे खुद पर घिन भी आ रही थी और अपने ही जिस्म पर गुस्सा भी, जो एक गैर मर्द और अपने ब्लैकमेलर की ऊँगली से इतना 'गीला' हो चुका था।
अचानक...
बिस्तर पर झूल रहे रमेश ने अपना सिर झटके से उठाया।

उसकी लाल, नशे में डूबी आँखें आधी खुलीं और उसने शमशेर और कामिनी की तरफ देखा।

"क्या... हिच... अबे तुझे अब दिखाना पड़ेगा क्या? अपने दोस्त की बात पर विश्वास नहीं तुझे, रुक दिखता हूँ तुझे " 
रमेश ने अपनी बेल्ट खोली और एक झटके मे अपनी पैंट को उतार फेंका रमेश नीचे से पूरा नंगा हो गया, उसका 2इंच का झांटो से घिरा लंड दूधिया रौशनी मे उजागर हो गया.
"चल साली रंडी... खड़ा कर के दिखा इसे " रमेश ने नशे मे झूमते हुए कामिनी का हाथ पकड़ अपने लंड पर रख दिया.

कामिनी का दायाँ हाथ रमेश के उस ठंडे और बेजान मांस के टुकड़े पर था।
वह बिना किसी भाव के, बस अपनी दो उँगलियों (अंगूठे और तर्जनी) के बीच उस 2 इंच के 'केंचुए' को पकड़े हुए थी।

 रमेश नशे में बड़बड़ा रहा था— "हिला... खड़ा कर इसे..." और कामिनी मजबूरी में अपनी उँगलियों से उसे सहला रही थी, जिसके छूने से वह बस हल्का सा अकड़ने की नाकाम कोशिश कर रहा था।
लेकिन असली 'तूफ़ान' तो कामिनी के बायीं तरफ उठ रहा था।
शमशेर, जिसकी उँगलियाँ अभी भी कामिनी की साड़ी के नीचे उसकी गीली चुत की दरार को घिस रही थी, लेकिन अंदर घुसने की कोई इच्छा भी नहीं दिखा रही थी, शमशेर मांझा हुआ खिलाडी था.

 उसने अपनी ठरकी आँखों से कामिनी के हाथ में रमेश के उस 2 इंच के लंड को देखा। शमशेर के होंठों पर एक बहुत ही नीच और घमंडी मुस्कान आ गई।
"ज़िप्पप..."
अचानक बायीं तरफ से पैंट की ज़िप खुलने की आवाज़ आई।
शमशेर ने अपने दूसरे हाथ से अपनी खाकी पैंट की ज़िप नीचे खींच दी थी। और अंदर से जो बाहर उछल कर निकला... उसे देखकर कामिनी की साँसें वहीं की वहीं रुक गईं।

एक विशाल, काला, नसों से भरा हुआ 8 इंच का खूंखार मुसल!
यह किसी भी मायने में कादर खान के उस 'हथियार' से कम नहीं था। शमशेर का वह लंड हवस और गर्मी से एकदम पत्थर की तरह सख्त हो चुका था, और उसका लाल मुंडका (Head) गुस्से से फन काढ़े हुए था।


"और इसका क्या करना है भाभीजी...?" शमशेर ने अपनी भारी, शैतानी आवाज़ में कामिनी का ध्यान अपनी खुली पैंट की तरफ खींचा।

इससे पहले कि कामिनी कुछ समझ पाती या अपनी नज़रें हटा पाती, शमशेर ने आगे बढ़कर कामिनी का आज़ाद बायाँ हाथ कलाई से पकड़ा और उसे सीधा अपने उस खौलते हुए, धड़कते लंड पर जमा दिया। 18508031
"धक्...!!"
जैसे ही कामिनी के गोरे, मुलायम हाथ ने शमशेर के उस गर्म और विशाल मुसल को छुआ, उसके पूरे बदन में 440 वोल्ट का करंट दौड़ गया।
कादर का सुपाडा नंगा था, लेकिन शमशेर के लंड ने पल्लू ओढ़ा हुआ था.

एक 'घरेलू औरत' होने के नाते कामिनी को तुरंत अपना हाथ झटक देना चाहिए था। उसे चीखना चाहिए था। लेकिन... हवस, जिस्म की प्यास और उस वर्जित (Taboo) खेल के नशे ने उसके दिमाग पर पूरी तरह कब्ज़ा कर लिया था।

उत्तेजना के इस खौफनाक बवंडर में, कामिनी ने बायाँ हाथ शमशेर के लंड से हटाने के बजाय... अपनी मुट्ठी उस 8 इंच के मोटे फौलाद पर कस ली।
अब बिस्तर का नज़ारा दुनिया का सबसे खौफनाक और कामुक नज़ारा था।
कामिनी अपने दोनों हाथों से... दो अलग-अलग मर्दों के लंड एक साथ हिला रही थी।

एक तरफ, उसके दायें हाथ की सिर्फ दो उँगलियों के बीच रमेश का वह 2 इंच का सिकुड़ी हुई लुल्ली थी, और दूसरी तरफ, उसकी बायीं मुट्ठी शमशेर के उस 8 इंच के नसों वाले लंड से पूरी तरह भरी हुई थी। वह इतना मोटा था कि कामिनी की उँगलियाँ आपस में जुड़ भी नहीं पा रही थीं।

कामिनी सच में पागल हुए जा रही थी।
उसका दिमाग फट रहा था। उसकी नशीली, पसीने से भीगी और आधी खुली आँखें किसी पेंडुलम की तरह घूम रही थीं।
वह कभी घिन और तरस खाकर अपने दायें हाथ में पकड़े रमेश के उस मरे हुए लंड को देखती... और फिर खौफ, हैरानी और बेपनाह हवस के साथ अपने बायीं मुट्ठी में भरे शमशेर के उस 'काले मुसल' को घूरती। यह ज़मीन-आसमान का फर्क कामिनी के अंदर की 'रंडी' को पूरी तरह आज़ाद कर रहा था।

और कोढ़ में खाज (Cherry on top) यह थी कि...
इन दोनों हाथों की कशमकश के बीच, शमशेर का जो दायाँ हाथ कामिनी की साड़ी के नीचे था, वह एक पल के लिए भी नहीं रुका था।
शमशेर की खुरदरी उँगलियाँ लगातार कामिनी की गीली, सूजी हुई चुत के होंठों को कुरेद रही थीं। "घिस... घिस... घिस..." पैंटी के अंदर वह चिपचिपी रगड़ कामिनी को पागल कर रही थी।

"आह्ह्ह... उफ्फ्फ... मम्म..."
कामिनी के मुँह से सिसकियाँ अब रोकी नहीं जा रही थीं। उसके भारी स्तन बाहर उफनते हुए बुरी तरह कांप रहे थे।

कामिनी अब बेहद उत्तेजित हो रही थी, लगता था जैसे किसी ने उसे तंदूर मे झोंक दिया है, कुछ ही पल पहले जिस इंसान की शक्ल देखकर उसे नफरत हो रही थी, अब उसके उस काले, नसों से भरे लंड के सामने उसका जिस्म पूरी तरह बेबस हो चुका था।

कामिनी का हाथ शमशेर के लंड पर इतनी कड़ाई से कस गया था और इतनी तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहा था... मानो वह उत्तेजना के पागलपन में उसे नोच ही लेगी। उसका हर स्ट्रोक शमशेर की साँसों को भारी कर रहा था।
और इस कशमकश के बीच... शमशेर का दायां हाथ अभी भी कामिनी की साड़ी के नीचे था।
शमशेर की मोटी-मोटी उंगलियां कामिनी की लाल कच्छी  के ऊपर से ही उसकी चुत को बेदर्दी से सहला रही थीं। कामिनी की कच्छी कामरस की बाढ़ से पूरी तरह से भीग चुकी थी, इतनी कि साड़ी के नीचे शमशेर की खुरदरी उंगलियां भी उस चिपचिपे पानी में लथपथ हो गई थीं।
"घिस... घिस... घिस..."
शमशेर ने उंगलियों की रगड़ तेज़ करते हुए, नशे में झूलते रमेश की तरफ देखकर मज़े लेने वाले अंदाज़ में पूछा

"कैसा लग रहा है रमेश... खड़ा हुआ?"
रमेश, जिसकी आँखें शराब के नशे में लाल सुर्ख हो रही थीं, उसने अपना सिर झटके से मोड़ा और अपनी 2 इंच की सिकुड़ी हुई 'लुल्ली' को कामिनी के दायें हाथ में बेजान पड़ा देखकर दहाड़ा

"साली... ठंडी औरत है बे ये... हिचहह... हिचहह.... इससे कुछ नहीं होगा!" रमेश अपनी ही नामर्दी का गुस्सा कामिनी पर निकाल रहा था।

रमेश की इस बात ने शमशेर को अपना 'मास्टरस्ट्रोक' खेलने का मौका दे दिया।
शमशेर ने एक बहुत ही गंदी, नीच और ठरकी हंसी हंसते हुए अपनी चाल चली
"तो भाभीजी को बोल ना... कि मुँह में ले के खड़ा कर दे!"
कामिनी की हालत अब सच में खराब हो रही थी। एक 'संस्कारी' घरेलू औरत के लिए इससे बड़ी बेबसी क्या होगी? अपने ही पति के सामने वह मजबूर थी, ज़लील हो रही थी, और एक गैर मर्द उसकी साड़ी के नीचे उसकी गीली चुत में 'चप्पू' चलाकर उसे हवस से पागल कर रहा था।

रमेश को शमशेर का यह आईडिया जम गया। उसने अपनी लड़खड़ाती ज़बान से कामिनी को घूरती आँखों से देखा और उलाहना दी
"हाँ... रंडी... आज तो मुँह में ले कर खड़ा कर ही दे इसे... दिखा दे कि तू भी कोई औरत है"

क्या करती कामिनी? ब्लैकमेल का डर, और साड़ी के नीचे शमशेर की उंगलियों से भड़क रही वो अंधी आग... कामिनी टूट चुकी थी।
उसने कांपते हाथों से शमशेर के लंड को छोड़ा। वह पलंग पर धीरे-धीरे घूमी और घुटनों के बल आ गई।

कामिनी ने अपना सिर झुकाया और अपने कांपते हुए गुलाबी होंठों को रमेश के उस 2 इंच के, शराब और पसीने की बदबू मारते हुए लंड की तरफ ले गई। 20220105-160851
लेकिन... इस पूरी प्रक्रिया का नतीजा वो निकला, जिसके लिए शमशेर ने यह खौफनाक जाल बिछाया था।
शमशेर के तो होश ही उड़ गए। उसकी साँसें सीने में अटक गईं।

जैसे ही कामिनी घुटनों के बल झुककर रमेश के लंड की तरफ मुड़ी, शमशेर के बिल्कुल सामने कामिनी का पिछला हिस्सा आ गया।

लाल साड़ी में लिपटे हुए... दो विशाल, भरे हुए, मादक और खूबसूरत 'पहाड़' (गांड) शमशेर के चेहरे के ठीक सामने तन गए थे।
कामिनी की कमर का वह घुमाव और साड़ी के पतले कपड़े से छलकती उसकी भारी गांड की गोलाई इतनी कातिलाना थी कि शमशेर का अपना 8 इंच का मुसल पैंट के बाहर और भी ज़्यादा फड़फड़ाने लगा।

"श्लोप... चप... श्लोप... चप चप..."
आगे से आवाज़ आने लगी।
कामिनी ने अपनी आँखें कसकर बंद कर ली और रमेश के उस छोटे से, ढीले मांस के टुकड़े को अपने होंठों के बीच दबा लिया था। वह बेमन से, लेकिन रमेश के ताने और शमशेर के डर से उसे चूसने मे लगी थी।

मुँह में रमेश का लंड लेने के बाद, उसे चूसने के लिए कामिनी को अपना सिर और कमर आगे-पीछे करनी पड़ रही थी।
और इसी मूवमेंट ने शमशेर के सामने स्वर्ग का दृश्य दिखा दिया था।
जैसे-जैसे कामिनी आगे की तरफ रमेश के लंड को चूसती... पीछे शमशेर की आँखों के सामने उसकी वो कामुक, मदमस्त और कड़क गांड साड़ी के अंदर ही एक गज़ब की लय (Rhythm) में हिलने लगी।
"बाउंस... बाउंस..."
कामिनी के भारी कूल्हे दाएँ-बाएँ मटक रहे थे। साड़ी का कपड़ा उसकी गांड की गहरी दरार के बीच हल्का-हल्का धंस रहा था।
रमेश नशे में आँखें बंद करके अपनी नामर्दी को भूलने की कोशिश कर रहा था, और कामिनी का सिर उसकी जांघों के बीच ऊपर-नीचे हो रहा था।
लेकिन असली दावत शमशेर उड़ा रहा था।
उसकी आँखें कामिनी की उस हिलती हुई, कातिलाना गांड पर फेवीकोल की तरह चिपक गई। उसके मुँह से राल टपकने लगी। कामिनी की गांड का हर झटका, हर मटक शमशेर की रगों में हवस का लावा भर रहा था।
कामिनी अपनी बेबसी में रमेश का लंड चूस रही थी, अनजान कि उसके पीछे उसकी हिलती हुई गांड ने एक भूखे भेडिये को किस कदर पागल कर दिया है।


रमेश नशे में पूरी तरह अंधा हो चुका था। वह बस अपनी गर्दन पीछे लुढ़काए, आधी खुली लाल आँखों से छत को घूर रहा था और नशे में अजीब सी सिसकियाँ ले रहा था "हिच... आह्ह... हाँ साली... और... हिच..." लेकिन शमशेर इस धीमी रफ़्तार से खुश नहीं था। वह कामिनी को पूरी तरह से उकसाना और उसकी उस दबी हुई 'जंगली औरत' को बाहर निकालना चाहता था।

शमशेर ने बगल में रखी शराब की बोतल उठाई और गिलास में एक 'नीट' (बिना पानी का) पेग बनाया।
"ऐसे नहीं होगा रमेश... ले, एक पेग और पी!" शमशेर ने वो नीट पेग रमेश के कांपते हाथों में थमा दिया और फिर एक बहुत ही शैतानी, उकसाने वाली आवाज़ में कामिनी की तरफ देखकर बोला

"अच्छे से चूसो भाभीजी... आज मेरा दोस्त पूरे मूड में है। साबित कर दो कि आपमें कितनी आग है...!"

शमशेर के इन शब्दों ने कामिनी के अंदर एक अजीब सी झनझनाहट पैदा कर दी। वह अपने पति का लंड चूस रही थी, लेकिन उसके दिमाग में और उसकी रगों में शमशेर के शब्द गूंज रहे थे।
और इसी बीच... शमशेर ने अपना असली खेल शुरू कर दिया।
कामिनी का ध्यान पूरी तरह से आगे रमेश पर था, और उसकी मदमस्त, भारी गांड पीछे शमशेर के बिल्कुल सामने तनी हुई थी।
शमशेर ने अपना खुरदरा हाथ आगे बढ़ाया और कामिनी की लाल साड़ी के निचले हिस्से को पकड़ लिया।
"सर्रर्र... सर्रर्र..."
बिना कोई आवाज़ किए, शमशेर ने बहुत ही धीरे-धीरे, एक कातिलाना रफ़्तार से कामिनी की साड़ी को नीचे से उठाना शुरू कर दिया।
साड़ी कामिनी की पिंडलियों से उठी... फिर उसके गोरे, भरे हुए घुटनों के पीछे से होती हुई... उसकी भारी जांघों को नंगा करती हुई... सीधे उसकी कमर तक आ गई।
आअह्ह्ह..... उफ्फ्फफ्फ्फ़.... शमशेर लगभग चीख पड़ा, स्वर्ग का दरवाजा खुल गया था, बस एक कच्छी रुपी पर्दा ही रह गया था,

ट्यूबलाइट की तेज़ दूधिया रौशनी में... कामिनी की वो विशाल, गोरी और गदराई हुई गांड एक छोटी सी लाल रंग की कच्छी में फंसी हुई बुरी तरह चमक रही थी।

 कामिनी के भारी कूल्हों ने उस छोटी सी कच्छी को लगभग निगल ही लिया था।
लेकिन शमशेर की आँखें उस गांड से फिसलकर नीचे उस जगह पर जाकर टिक गईं, जहाँ से अभी भी कामिनी की हवस बह रही थी।
कामिनी की चुत का वो पूरा हिस्सा... कच्छी के बीचों-बीच... एक गहरे, चिपचिपे गीलेपन से सना हुआ था।

 उस गीलेपन की वजह से कामरस की एक-दो बूंदें रिसकर उसकी जांघों पर चू रही थीं । उस नज़ारे और उस जगह से उठती हुई एक औरत की 'कच्ची, मदमाती महक' ने शमशेर को पागल कर दिया।

शमशेर ने अपना चेहरा कामिनी की उस नंगी, कांपती हुई गांड की गहरी दरार के बिल्कुल करीब ले जाकर... एक बहुत ही लंबी और गहरी सांस (Deep Inhale) भरी। "सुंघघघ... संन्नीफ्फ्फ्फफ्फ्फ़ग्ग    ससससम्म्म्म....आह्ह्ह..."
उसने कामिनी की चुत से उठ रही उस कामुक महक को अपने पूरे फेफड़ों में भर लिया।

जैसे ही शमशेर की वह गर्म सांस कामिनी की नंगी जांघों और उसकी गीली कच्छी पर पड़ी...
"सस्ससीइइ...!!" कामिनी का पूरा जिस्म एक झटके में सिहर उठा। उसके रोंगटे खड़े हो गए। उसके मुँह से रमेश का लंड पल भर के लिए छूट गया।

अपनी ही साड़ी का यूं कमर तक उठ जाना, अपनी गांड का एक अजनबी के सामने पूरी तरह बेपर्दा हो जाना, और उसकी सांसों का अपनी गीली चुत पर महसूस होना... यह सब कामिनी के लिए बिल्कुल नया था।

ज़िंदगी में पहली बार वह ऐसा कोई 'गंदा' और 'वर्जित' काम कर रही थी। अपने ही पति के सामने वह किसी और के लिए नंगी हो रही थी।

उसे शर्म से मर जाना चाहिए था। उसे रोना चाहिए था।
परन्तु... अगले ही पल कामिनी ने अपने अंदर एक खौफनाक सच का अनुभव किया।
उसे इस बेइज़्ज़ती में, इस नंगेपन में और एक दूसरे मर्द की हवस का शिकार बनने में... एक ऐसा भयानक मज़ा (Extreme Pleasure) आ रहा था, जिसे वह शब्दों में बयान ही नहीं कर सकती थी।

डर और हया की जगह अब एक 'पागलपन' ने ले ली थी।
कामिनी ने अपनी आँखें बंद कीं, एक गहरी आह भरी, और अपनी उस नंगी, बेपर्दा गांड को हल्का सा पीछे की तरफ मटकाते हुए... वापस रमेश के लंड को अपने मुँह में भर लिया।


शमशेर ने एक बार तिरछी नज़रों से रमेश की तरफ देखा। रमेश नशे में पूरी तरह झूल रहा था, उसकी आँखें लाल होकर पलट रही थीं और गर्दन ढलक गई थी। वह किसी भी पल बेहोश हो सकता था।
वैसे भी शमशेर को रमेश का रत्ती भर भी डर नहीं था। अगर वो इस वक़्त अपनी आधी खुली आँखों से शमशेर की हरकतें देख भी लेता, तो भी उसे सुबह 'घंटा' कुछ याद नहीं रहने वाला था। 

यही बात शमशेर को इस कमरे का सबसे निडर और खूंखार जानवर बना रही थी।
कामिनी आगे झुकी हुई थी, उसके होंठों में रमेश का ढीला लंड था।
शमशेर ने पीछे से एक गंदी सी मुस्कान बिखेरी और बोला
"क्या भाभीजी... ऐसे थोड़ी ना चूसते हैं? बताओ, मेरे दोस्त का लंड तो अभी तक खड़ा ही नहीं हुआ!"
और यह कहते ही... शमशेर ने कामिनी की कमर पर फंसी उस छोटी सी लाल कच्छी  के किनारों को अपने दोनों खुरदरे हाथों से कसकर पकड़ा।
बिना किसी चेतावनी के... "सर्रर्रर्र... झटाक!"
शमशेर ने एक ही झटके में उस गीली, कामरस से लथपथ कच्छी को कामिनी की भारी गांड से नीचे सरका दिया और सीधे उसके घुटनों तक ले जाकर छोड़ दिया।
अब कामिनी का निचला हिस्सा पूरी तरह से,सम्पूर्ण नंगा था। 20210809-151528

कमरे के सीलिंग फैन की हल्की सी ठंडी हवा का झोंका जैसे ही कामिनी की उस नंगी, पसीने से चमकती हुई गांड और उसकी गहरी दरार से टकराया... कामिनी के रोंगटे खड़े हो गए।

इस अचानक हुए नंगेपन के अहसास से कामिनी ने पल भर के लिए डर और उत्तेजना में अपनी गांड के छेद (Sphincter) को एकदम कसके सिकोड़ लिया... और फिर धीरे से ढीला छोड़ दिया।
यह एक प्राकृतिक शारीरिक प्रतिक्रिया थी, लेकिन इस एक हरकत ने कमरे का पूरा माहौल ही बदल दिया। कामिनी की गांड के सुकड़ने और ढीला होने से... एक औरत के बदन की वो कसीली, पसीने और कामरस में सनी हुई 'कच्ची और मदमाती गंध' (Musky Scent) एक झटके में कमरे की हवा में फैल गई।

शमशेर, जो बिल्कुल पीछे बैठा था, वह साक्षात् इस गंध को सूंघ रहा था। 20220105-171037
"सुंघघ... सससन्नीफ्फफ्फ्फ़.... उउउफ्फ्फ्फ़...आआह्ह..."
कामिनी की चुत के गीलेपन और गांड के पसीने की उस नशीली महक ने शमशेर के दिमाग की नसें फाड़ दीं। वह इस हसीन और 'वर्जित' नज़ारे को देखकर पूरी तरह पागल हो गया।

शमशेर की पैंट के बाहर निकला उसका 8 इंच का काला मुसल अब बेकाबू होकर फड़फड़ाने लगा,  वह इतना तन गया था कि लग रहा था जैसे अभी उछल कर सीधा कामिनी की गांड को चीरता हुआ अंदर घुस जाएगा।
लेकिन शमशेर कोई नौसिखिया नहीं था। वह इस पल को धीरे-धीरे पीना चाहता था।

उसने अपने धड़कते हुए लंड को अपने ही हाथ से कसकर पकड़ा और उसे अपनी जांघ पर नीचे की तरफ दबा दिया।
"रुक भाई... सब्र कर... तेरा नंबर भी आएगा," शमशेर ने अपने ही हथियार से फुसफुसाते हुए कहा।
और फिर... शमशेर ने अपना सिर आगे बढ़ाया और कामिनी की उस नंगी, चमकती हुई गांड पर टूट पड़ा।
यहाँ कोई जल्दबाज़ी नहीं थी। शमशेर ने अपनी मोटी, खुरदरी और गीली जीभ बाहर निकाली।

"स्लर्प..."
शमशेर की जीभ की पहली छुअन कामिनी की गांड की दरार के बिल्कुल निचले हिस्से (जहाँ से चुत की शुरुआत होती है) पर पड़ी।

वह गीलापन, जो कामिनी की चुत से रिसकर उसकी गांड की दरार तक आ गया था, शमशेर ने उसे अपनी जीभ से चाटना शुरू किया।
शमशेर की जीभ बहुत ही हौले-हौले (Slowly), एक सांप की तरह रेंगती हुई... कामिनी की गांड की गहरी दरार के बीचों-बीच ऊपर की तरफ बढ़ने लगी।
"चप... चप... स्लर्प..."
कमरे में सिर्फ़ शमशेर के चाटने की गीली आवाज़ें गूंज रही थीं।

वह उस पूरी दरार को किसी आइसक्रीम की तरह चाट रहा था। पसीने का नमकीन स्वाद और कामिनी के कामरस की मिठास... शमशेर सब पी रहा था।
और फिर... शमशेर की जीभ कामिनी के उस कसे हुए, गुलाबी 'गांड के छेद' (Anus) पर आकर रुक गई। शमशेर ने अपनी जीभ की नोक को हल्का सा नुकीला किया और उस छेद के चारों तरफ गोल-गोल घुमाने लगा।

"सस्सीइइ... उइइइ... मम्मम..."
कामिनी का शरीर करंट खाकर धनुष की तरह तन गया।
जब शमशेर ने उस छेद पर अपने होंठ रखे और उसे धीरे-धीरे चूसना शुरू किया... तो कामिनी के दिमाग की सारी नसें सुन्न हो गईं। यह एक ऐसा चरम सुख था जो उसने ज़िंदगी में कभी महसूस नहीं किया था।
अत्यधिक उत्तेजना के पागलपन में... कामिनी अपनी गांड के छेद को कभी शमशेर की जीभ के इर्द-गिर्द कसकर बंद करती (Clenching), तो कभी और मज़ा लेने के लिए उसे ढीला छोड़ देती। उसकी वो भारी गांड शमशेर के चेहरे पर एक अजीब सी लय में थिरक रही थी।

आगे... रमेश का लंड चूसना तो कामिनी कब का बंद कर चुकी थी। वह बस घुटनों के बल झुकी हुई थी और रमेश का वह ढीला, 2 इंच का मांस का टुकड़ा बस उसके खुले होंठों के बीच बेजान पड़ा था। कामिनी के मुँह में कोई हरकत नहीं थी, क्योंकि उसकी रूह तो पीछे से शमशेर चाट रहा था।

वह बस अपने पति का लंड मुँह में लिए... एक गैर मर्द से अपनी गांड चटवा रही थी।
"उउउफ्फ्फ्फ... क्या सुकून था... क्या आनंद था..."
कामिनी की आँखें पलट गई थीं। उसके जिस्म का रोम-रोम एक मीठी आग में जल रहा था।

"आअह्ह्ह..." कामिनी के मुँह से सिसकियाँ निकल रही थीं। इन सिसकियों में कोई डर नहीं था। अब उसे न तो रमेश की कोई फ़िक्र थी, न पकड़े जाने की चिंता, और न ही समाज की मर्यादा का खौफ।
वह पूरी तरह से शमशेर की जीभ की गुलाम बन चुकी थी, वह इस नर्क जैसी रात में भी 'स्वर्ग' का अनुभव कर रही थी,

बेडरूम के उस पलंग पर कामिनी का जिस्म अब पूरी तरह से हवस की भट्टी बन चुका था।
पीछे से शमशेर की खुरदरी जीभ उसकी गांड की दरार और उस कसे हुए छेद पर जो कहर ढा रही थी, उसने कामिनी के अंदर की सारी मर्यादाओं को जलाकर राख कर दिया था।
कामिनी गांड चटवा कर इतनी बुरी तरह तड़प रही थी कि उसकी आगे की घाटी, उसकी सूजी हुई, प्यासी चुत पूरी तरह से कामरस की बाढ़ छोड़ रही थी। 

वह रस इतना ज़्यादा था कि उसकी जांघों से बह-बह कर बिस्तर की चादर पर टपक रहा था, और वहां एक बड़ा सा गीला धब्बा बन गया था।

लेकिन... शमशेर ने उस बहती हुई चुत की तरफ एक बार भी ध्यान नहीं दिया। उसका मुद्दा वो था ही नहीं; वो तो कामिनी को तड़पाना चाहता था, उसकी गांड का दीवाना था, 
कामिनी अब हवस से सचमुच पागल हो रही थी।
गांड के मज़े ने उसकी चुत की प्यास को हजार गुना बढ़ा दिया।
 उसे लगने लगा था कि अब शमशेर की वो लपलपाती जीभ उसकी चुत के होंठों पर भी फेरे लागए, उस कामरस को चाटे, या फिर अपना वो 8 इंच का खौलता हुआ फौलाद एक ही झटके में उसके अंदर उतार दे।

इस बेकाबू उम्मीद में... कामिनी घुटनों के बल झुकी-झुकी ही अपनी भारी कमर को थोड़ा और ऊपर की तरफ (हवा में) उठाती, अपनी गांड को मटकाती, ताकि शमशेर की जीभ फिसलकर सीधा उसकी गीली चुत तक आ जाए।
लेकिन शमशेर साला एक नंबर का हरामी और घाघ खिलाड़ी था।
जैसे ही कामिनी अपनी चुत को उसकी जीभ से छुआने के लिए कमर उठाती... शमशेर भी जानबूझकर अपना सिर थोड़ा और ऊपर कर लेता। उसकी जीभ बस गांड के छेद तक ही रहती। कामिनी एक दर्द भरी सिसकी के साथ वापस नाउम्मीद लौट जाती। उसकी चुत हवा में ही फड़क कर रह जाती।

"उफ्फ्फ... मम्म... आअह्ह्ह..." कामिनी तड़पकर चादर नोच रही थी।
और तभी... अचानक शमशेर ने कामिनी की गांड से अपना मुँह हटा लिया।
कामिनी का शरीर झटके से सूना पड़ गया।
शमशेर ने अपनी जीभ पर लगा कामिनी का रस चाटा और नशे में झूल रहे रमेश की तरफ देखकर ज़ोर से बोला
"क्यों भाई रमेश... सो गया क्या? भाभीजी की चुत नहीं मारेगा क्या?"
शमशेर की इस भारी और गंदी आवाज़ ने कमरे का सन्नाटा चीर दिया।
"चुत मारने का नाम" सुनते ही रमेश के अंदर का वो सोता हुआ, नामर्द और शराबी जानवर जैसे अचानक होश में आ गया।
"हिच... ह्ह्हम्म... हाँ... हाँ... क्यों नहीं!" रमेश नशे में दहाड़ा।
उसने अपनी लाल, सूजी हुई आँखें खोलीं और कामिनी को घूरते हुए अपना हुक्म सुनाया

"चल रंडी... कपड़े खोल पूरे... नंगी हो जा और आ जा... मेरे लंड की सवारी कर!" रमेश ने आदेश दिया, जैसे वह दुनिया का सबसे बड़ा सिकंदर हो।
यह सुनकर शमशेर के होंठों पर एक विजयी, नीच मुस्कान तैर गई।

शमशेर पलंग पर पीछे खिसका और बिस्तर के सिरहाने (Headboard) से अपनी चौड़ी पीठ टिका कर बैठ गया। उसकी दोनों टांगें फैली हुई थीं। उसने साइड टेबल से शराब की बोतल उठाई और इत्मीनान से अपने लिए एक और पेग बना लिया।

वह एक हाथ में शराब का गिलास लिए और दूसरे हाथ से अपनी पैंट के बाहर निकले उस 8 इंच के नसों वाले, धड़कते हुए लंड को सहलाने लगा।
उसका अंदाज़ बिल्कुल ऐसा था जैसे कोई सामने लाइव 'पॉर्न फ़िल्म' शुरू होने का इंतज़ार कर रहा हो, और उसे वीआईपी (VIP) सीट मिल गई हो।

रमेश का हुक्म सुनकर कामिनी बिस्तर से धीरे-धीरे उठ खड़ी हुई।
और जैसे ही कामिनी अपने पैरों पर सीधी खड़ी हुई...
"स्प्लैट..."
वह लाल रंग की छोटी सी कच्छी, जो पहले से ही कामिनी के घुटनों तक सरकी हुई थी और कामरस के भारीपन से पूरी तरह लथपथ थी... वो सरक कर सीधा कामिनी की एड़ियों पर आ गिरी। 2ff285106d29e565fb0ec345d8da5384
कामिनी अब नीचे से सम्पूर्ण नंगी थी। उसकी साड़ी भी कमर पर आधी उलझी हुई थी और ब्लाउज़ से उसके भारी स्तन लगभग पुरे ही बाहर उफन रहे थे।

कामिनी की आँखों में अब कोई शर्म या हया नहीं थी। उन आँखों में सिर्फ प्योर हवस (Pure Lust) तैर रही थी, एक ऐसी आग जो किसी को भी भस्म कर दे। 0388f92e70ba616ea301d36fde69184e
कामिनी ने अपनी नशीली आँखों से पलंग का नज़ारा देखा।
एक नज़र उसने शमशेर की तरफ डाली... जो सिरहाने टिका हुआ, अपने विशाल, काले और फौलाद जैसे सख्त 8 इंच के लंड को मुट्ठी में भरकर सहला रहा था। वह मुसल इतना बड़ा था कि शमशेर के हाथ से भी बाहर निकल रहा था।

और फिर... कामिनी की नज़रें नीचे बिस्तर पर पड़े अपने पति रमेश की तरफ गईं।
रमेश टांगें फैलाकर चित पड़ा था। और उसकी जांघों के बीच... वो 2 इंच का सिकुड़ा हुआ, मरा हुआ लोड़ा उल्टी करके पड़ा था। उस पर ज़रा सी भी जान नहीं थी। वह बिल्कुल एक मरी हुई छिपकली जैसा लग रहा था।
यह विरोधाभास देखकर कामिनी का दिमाग भन्ना गया। 20240514-144545

उसका वो सुलगता हुआ, आग से तपता हुआ जिस्म... जो अभी-अभी शमशेर की जीभ से एक भयंकर बाढ़ छोड़ चुका था, उसे अब इस 'मरे हुए केंचुए' की सवारी करनी थी?
कामिनी के होठों पर एक कड़वी, घिन और हवस से भरी मुस्कान आ गई।
वह मन ही मन कुलबुला उठी, उसके अंदर की वो 'रंडी ' चीख उठी—
"इस से... इस से चुत मारेगा मेरी? .!"
***********************

 
बेडरूम की हवा में अब साँस लेना भी मुश्किल हो रहा था। कमरे में सस्ती शराब, सिगरेट के धुएं और एक औरत के पसीने में घुली हुई हवस की ऐसी गाढ़ी महक थी, जो किसी भी मर्द का ईमान डिगा दे।

रमेश के उस भद्दे आदेश के बाद कामिनी पलंग से उठी।
कुछ घंटों पहले तक जो औरत एक संस्कारी पत्नी के खोल में छुपी थी, आज रात शमशेर की उस खौफनाक और लपलपाती हवस ने उसके अंदर की सारी बेड़ियाँ तोड़ दी थीं। कामिनी अब महज़ मजबूर नहीं थी; उसकी आँखों में एक अजीब सी बगावत, एक नशीला 'जंगलीपन' उतर आया था।

उसने बिस्तर पर बेसुध पड़े अपने पति की तरफ एक बार भी नहीं देखा। उसकी वो बड़ी-बड़ी, सुलगती हुई आँखें सीधा पलंग के सिरहाने बैठे शमशेर की आँखों में गड़ गईं। शमशेर एक दम ढीठ और बेखौफ बना हुआ था।

 वह अपनी जगह पर पीछे पीठ टिकाए, टांगें फैलाए बैठा था। उसके एक हाथ में शराब का आधा भरा गिलास था और उसकी दरिंदगी भरी, वहशी नज़रें कामिनी के जिस्म के हर एक इंच को किसी भूखे लकड़बग्घे की तरह चाट रही थीं, दूसरा हाथ उसके लंड को तसल्ली दे रहा था.

"क्लिक..."
कमरे के सन्नाटे में कामिनी के ब्लाउज़ का पहला हुक खुलने की आवाज़ गूंजी।
कामिनी ने शमशेर की आँखों में देखते हुए ही अपने दोनों हाथ पीछे किए । यह कोई मजबूरी में उतारे जा रहे कपड़े नहीं थे; यह कामिनी का शमशेर को रिझाना, उसे चिढ़ाना और उसकी उस 8 इंच की अकड़ती हुई हवस को सीधे चुनौती देना था।

"क्लिक... क्लिक..."
उसकी उंगलियां बहुत ही धीमी, कातिलाना रफ़्तार से एक-एक हुक खोल रही थीं। जैसे-जैसे हुक खुल रहे थे, कामिनी की भारी और उफनती हुई छाती आज़ाद होने के लिए मचल रही थी। 

ब्लाउज़ पूरी तरह खुला और कामिनी ने अपने गोरे कंधों को हल्का सा झटका दिया।
वह लाल रंग का कसा हुआ कपड़ा उसके कंधों से फिसलता हुआ सीधे फर्श पर जा गिरा।
ब्लाउज़ गिरते ही, कामिनी के वो भारी, गदराये हुए और पसीने से चमकते हुए स्तन आज़ाद होकर हल्का सा झूल गए। 

उनकी वो गोलाई, वो भारीपन और उन पर उभरी हुई हल्की-हल्की नीली नसें दूधिया रौशनी में चमक रही थीं।
कामिनी मे स्तनों मे ज्यादा लचक नहीं थी, वो चट्टान की तरह कड़क और ताने हुए थे, शमशेर ने यह नज़ारा देखकर शराब का एक बड़ा घूंट अपने गले के नीचे उतारा। उसकी साँसें भारी होने लगी थीं।

इसके बाद कामिनी के हाथ अपनी कमर पर गए।
साड़ी की बची-खुची सिलवटों को उसने अपनी उंगलियों में फंसाया और एक ही झटके में खोल दिया। रेशमी लाल साड़ी सरसराती हुई उसकी भारी जांघों को चूमती हुई ज़मीन पर एक लाल ढेर की तरह गिर पड़ी।

अब कामिनी सम्पूर्ण नंगी थी। एक 38 साल की औरत का वो परिपक्व, भरा हुआ और मादक जिस्म किसी संगमरमर की मूरत जैसा लग रहा था, जिसमें अभी-अभी हवस की आग फूंक दी गई हो। उसकी चौड़ी कमर, बाहर की तरफ निकले हुए उसकी भारी गांड और पसीने से चमकती उसकी गोरी त्वचा... शमशेर बिना पलक झपकाए उस 'तिलिस्म' को निहार रहा था।

कामिनी ने बिल्कुल देर नहीं की, मदमस्त चाल, चेहरे पे कामुकता लिए धीरे से पलंग पर चढ़ी।
वह किसी शेरनी की तरह घुटनों के बल चलते हुए आगे बढ़ी। उसकी भारी गांड हर एक मूवमेंट शमशेर को पागल कर रहा था। उसकी गांड के दोनों हिस्से आपस मे टकरा के दूर हो जाते, फिर वापस चिपक जाते.

कामिनी ने अपने दोनों पैर रमेश की कमर के अगल-बगल रख दिए। रमेश नशे में पूरी तरह धुत्त था, आँखें बंद किए बस अपनी भारी और बदबूदार साँसें ले रहा था।
कामिनी अब रमेश के बिल्कुल ऊपर थी।
लेकिन नीचे बैठने से पहले, उसने अपनी गर्दन मोड़कर पीछे शमशेर की तरफ देखा। शमशेर के ठीक सामने कामिनी की वो भारी, कातिलाना गांड और कमर का वो गहरा घुमाव पूरी तरह से उजागर था। कामिनी ने शमशेर की आँखों में देखते हुए अपनी जांघों को धीरे-धीरे...

 बहुत ही धीरे-धीरे और चौड़ा किया। शमशेर के सामने वो नज़ारा अब पूरी तरह खुल रहा था जिसके लिए वो तड़प रहा था।
कामिनी की गांड के दोनों पल्ले एक दूसरे से दूर होने लगे, गांड की गोलाईया बहार को आने लगी, साथ ही दिखा उस दरार से बहार झाँकते दो गीले छेद.

और तभी... कामिनी ने अपने घुटने मोड़े और अपने पूरे शरीर का भारी वज़न नीचे की तरफ छोड़ दिया।
"धप्प...!!"
एक बहुत ही भारी, मांस के मांस से टकराने की आवाज़ कमरे में गूंजी।
कामिनी बहुत ही जानबूझकर, पूरी ताकत और एक नफरत भरे झटके के साथ रमेश के ऊपर बैठी थी।

"आअह्ह्ह... उफ्फ्फ..." रमेश के मुँह से दर्द और घुटन से भरी एक कराह निकल गई। उसका सिर झटके से पीछे की तरफ पलट गया। कामिनी की उस भारी, गदराई हुई गांड और जांघों के वज़न के नीचे रमेश का वो सिकुड़ा हुआ लंड और टट्टे  बुरी तरह दब कर कुचल गये, कामिनी अब रमेश की बेइज़्ज़ती (Humiliation) करने पर उतारू थी।
कामिनी ने एक बार फिर अपनी गर्दन घुमाकर पीछे शमशेर को देखा।
उसकी आँखों में एक शैतानी और हवस से भरी चमक थी। उसने शमशेर को देखते हुए ही अपनी गांड को हल्का सा ऊपर उठाया... और वापस पूरी ताकत से रमेश पर पटक दिया।
"स्मैक... स्मैक...धप.. धप..."
वह जानबूझकर बार-बार ऐसा कर रही थी। दोनों के जिस्मों के बीच चुत रस और पसीने की वजह से इतनी फिसलन हो गई थी कि कामिनी की गोरी, भारी गांड रमेश की काली टांगों पर बुरी तरह रपट रही थीं।

 वो उस बेजान, मरे हुए मांस के टुकड़े पर अपना मदमास्ता हुआ जिस्म रगड़ कर शमशेर को दिखा रही थी कि उसकी आग कितनी भयंकर है।

लेकिन शमशेर... शमशेर अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ।
वह सिर्फ मुस्कुरा रहा था। एक बहुत ही नीच, विजयी और शैतानी मुस्कान। उसने अपने गिलास से शराब का आख़िरी घूंट भरा और बर्फ के टुकड़ों को चबाते हुए बोला
"चोदो भाभीजी... और ज़ोर से चोदो मेरे दोस्त को! दिखा दो आप मे कितनी आग है, तु कितनी बड़ी रंडी है " 

 शमशेर ने अपनी भारी और खुरदरी आवाज़ में उसे और उकसाया। शमशेर आप से सीधा तु पर आ गया था, भाभीजी से सीधा रंडी पर आ गया था.
कामिनी ने इस बात का कोई बुरा नहीं मना, उल्टा ये शब्द उसे उकसा रहे थे, उत्तेजित कर रहे थे,.

कामिनी दिखा भी रही थी कि वह कितनी गर्म है।
उसने अपनी आँखें बंद कर लीं और अपने दोनों हाथों से अपने भारी, नंगे स्तनों को बेदर्दी से मसलना शुरू कर दिया। उसका सिर पीछे की तरफ लुढ़क गया था, काले बाल उसकी नंगी पीठ पर झूल रहे थे। वह रमेश के उस मरे हुए, बेजान हिस्से पर अपनी गांड को किसी मशीन की तरह आगे-पीछे घिस रही थी। उसकी साँसों की तेज़ी और उसके गले से निकलती धीमी सिसकियाँ पूरे कमरे में गूंज रही थीं।

लेकिन यह गर्माहट, यह जंगलीपन, यह नंगा नाच... वह रमेश के लिए नहीं कर रही थी। रमेश तो नशे में दर्द से कराहता हुआ बस एक गद्दा बना हुआ था।

कामिनी की यह सारी आग, उसकी यह सारी मादकता, और उसके जिस्म का वो हर एक कतरा सिर्फ़ और सिर्फ़ पलंग के सिरहाने बैठे उस ढीठ पुलिसवाले, शमशेर के लिए था। यह उन दोनों के बीच एक ऐसा खौफनाक और हवस भरा 'साइकोलॉजिकल खेल' बन चुका था, जिसमें पति सिर्फ एक तमाशा बनकर रह गया था।

कमरे का सन्नाटा अब सिर्फ कामिनी की भारी साँसों और रमेश के कराहने की आवाज़ों से टूट रहा था।
कामिनी अब पूरी तरह से मदहोशी और एक अजीब सी उत्तेजना में डूब चुकी थी। वह आगे की तरफ रमेश के सीने पर झुक गई। उसके बिखरे हुए काले बाल रमेश के पसीने से भीगे चेहरे पर गिर रहे थे। कामिनी की आँखें बंद थीं, और वह एक मादक महिला की तरह रमेश के बेसुध जिस्म पर हावी थी। लेकिन उसका पूरा ध्यान, उसके जिस्म की हर एक नस,  पीछे पलंग के सिरहाने की तरफ खिंची हुई थी।

कामिनी का नंगी,  तपती, चिकनी गांड शमशेर के बिल्कुल सामने एक खुली किताब की तरह हिल रही थी, 7EC1777  
पलंग के सिरहाने बैठा शमशेर, जो अब तक खुद को एक बहुत बड़ा 'कंट्रोलर' और ढीठ शिकारी समझ रहा था, उसका सब्र अब जवाब दे चुका था। कामिनी की खुलती बंद होती गांड की दरार और कमरे में फैली उस मदमाती महक ने शमशेर के दिमाग की नसें सुन्न कर दी।

तभी... कमरे के सन्नाटे में एक आवाज़ गूंजी।
"ससससररर..... खट..."
चमड़े की बेल्ट के बकल (Buckle) के खुलने और कपड़ों के ज़मीन पर गिरने की आवाज़।

यह आवाज़ सुनते ही कामिनी के होठों पर एक बहुत ही रहस्यमयी, विजयी और कामुक मुस्कान तैर गई। उसने अपनी गर्दन धीरे से पीछे की तरफ घुमाई।

शमशेर अब कमर के नीचे पूरी तरह से नंगा हो चुका था। उसका वो गुरूर, वो शिकारी वाला नकाब अब पूरी तरह से उतर चुका था। शमशेर की आँखें हवस से लाल हो चुकी थीं और उसकी साँसें किसी जंगली जानवर की तरह धौंकनी खा रही थीं।

कामिनी बस मंद-मंद मुस्कुरा दी।
आज इस बेडरूम में, अपने ही नामर्द पति के ऊपर बैठकर, उसने वो कर दिखाया था जो वो करना चाहती थी। वह पूरी तरह से सफल हुई थी। जैसे किसी युग में स्वर्ग की अप्सरा 'मेनका' ने अपने हुस्न के तिलिस्म से तपस्वी विश्वामित्र की सदियों की तपस्या भंग कर दी थी... ठीक वैसे ही आज कामिनी के इस नंगेपन ने शमशेर जैसे घाघ और पत्थर दिल पुलिसवाले का सारा गुरूर चकनाचूर कर दिया था। 

शमशेर कामिनी की गांड की तरफ खिंचा चला जा रहा था, बल्कि कामिनी के हुस्न का गुलाम बन चुका था।
शमशेर से अब एक पल भी और दूर नहीं रहा गया।

वह पलंग पर घुटनों के बल रेंगता हुआ, किसी भूखे भेडिये की तरह कामिनी के बिल्कुल पीछे आ पहुँचा। शमशेर के भारी जिस्म की गर्मी और उसकी वो शराब से सनी हुई गर्म साँसें कामिनी को अपनी नंगी पीठ पर महसूस होने लगीं।

शमशेर का लंड कामिनी की गांड की दरार से लगभग सट गया। उसका वहसी नसो से भरा लंड कामिनी की पीठ और गांड की उस गहरी दरार को छूने लगी, रेंगने लगा, जैसे सांप अपने बिल का रास्ता ढूंढ़ रहा हो.

"आअह्ह्ह.. इस्स्स....."
लोहे जैसे सख्त और गरम लंड को महसूस करते ही कामिनी के मुँह से एक गहरी, कांपती हुई सिसकी निकल गई।
कामिनी ने आने वाले उस खौफनाक पल की प्रतीक्षा में अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं। उसने अपनी गांड हलकe से उठाया दिया, उसे अपनी चुत देखने का पूरा मौका दिया, ताकि शमशेर उसकी चुत मे समा सके.

उसके दोनों हाथों ने रमेश के सीने के पास पड़ी बिस्तर की चादर को अपनी मुट्ठियों में पूरी ताकत से जकड़ लिया। उसकी रगों में खून किसी तूफ़ान की तरह दौड़ने लगा.
नीचे उसका पति रमेश बेसुध पड़ा था, और ठीक उसके पीछे शमशेर एक खूंखार साये की तरह उस पर छा चुका था।

कमरे की दूधिया रौशनी अब कामिनी को किसी भट्टी की तरह चुभ रही थी।

जैसे ही शमशेर के जिस्म की वो धधकती हुई 'आग', उसका लंड कामिनी की गांड से टकराया, उसके मुँह से एक कांपती हुई, बेबस सिसकी निकल गई। वह तपती हुई छुअन इतनी जानलेवा थी कि कामिनी के रोंगटे एक झटके में खड़े हो गए।

शमशेर ने कोई जल्दबाज़ी नहीं की। एक मंझे हुए शिकारी की तरह, उसने अपने दोनों चौड़े और खुरदरे हाथ आगे बढ़ाए और कामिनी की उस गोरी, पसीने से चमकती हुई गांड को दोनों तरफ से कसकर अपनी मुट्ठियों में जकड़ लिया।

शमशेर की उंगलियां कामिनी की कमर के मांस में धंसने लगीं। वह कामिनी को अपने और करीब खींच रहा था, ताकि दोनों के नंगे जिस्मों के बीच हवा गुज़रने की भी कोई जगह न बचे।

पीछे से शमशेर का वो सख्त, फौलादी और आग उगलता हुआ लंड कामिनी की गांड की उस गहरी, कामरस से भीगी हुई दरार पर पूरी तरह से टिका हुआ था। वह अंदर जाने के लिए बेताब था, फड़फड़ा रहा था, लेकिन शमशेर ने उसे वहीं रोक रखा था।

यह 'इंतज़ार' (Anticipation)... यह एक-एक सेकंड का फासला कामिनी के दिमाग की नसें फाड़ रहा था।
वह जानती थी कि अगले ही पल क्या होने वाला है। वह जानती थी कि यह इंसान उसके जिस्म को किस कदर चीरने वाला है। 

उसने अपना चेहरा कामिनी के कान के बिल्कुल करीब लाया और एक बहुत ही भारी, कांपती हुई और वहशी आवाज़ में फुसफुसाया
"तैयार हो जाओ भाभीजी...  जो रमेश ना दे सका उसका दोस्त होने के नाते मेरा फर्ज़ बन गया है, की वो सुख आपको मिले..."

कामिनी का पूरा गोरा, गदराया हुआ जिस्म किसी सूखे पत्ते की तरह कांपने लगा। चादर में दबी उसकी मुट्ठियां और भी कस गईं। उसने आने वाले उस खौफनाक 'प्रहार' के लिए अपने पूरे बदन को ढीला छोड़ दिया और अपनी आँखें हमेशा के लिए मींच लीं...
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शमशेर की वो गर्म, वहशी फुसफुसाहट कामिनी के कान में घुसते ही उसके पूरे जिस्म में एक बिजली सी दौड़ गई।  
“तैयार हो जाओ भाभीजी… 

कामिनी की साँसें एक पल के लिए थम सी गईं। उसकी आँखें कसकर बंद थीं। दोनों मुट्ठियाँ रमेश की चादर को इतनी ज़ोर से नोच रही थीं कि नाखून चादर के अंदर तक धंस गए थे। नीचे रमेश बेसुध पड़ा था, उसकी छाती पर कामिनी का भारी, पसीने से तर बदन लहरा रहा था। लेकिन कामिनी का पूरा ध्यान, उसकी सारी रूह… पीछे गांड के छेद पर टिकी हुई थी।

शमशेर ने एक गहरी, भूखी साँस ली। उसका चौड़ा, काला, नसों से पटा हुआ 8 इंच का लंड कामिनी की गांड की गहरी दरार में बिल्कुल सटकर फड़फड़ा रहा था। लंड की गरमाई, उसकी नब्ज़, उसकी कठोरता… कामिनी हर चीज़ महसूस कर रही थी। शमशेर ने अपना दाहिना हाथ कामिनी की कमर से हटाया, थूक की एक मोटी लार अपने लंड के मुंडके पर थूकी और धीरे-धीरे उसे फैलाने लगा।

“स्लर्प… स्लर्प…”

लार की चिकनाई लंड पर चमकने लगी। फिर शमशेर ने लंड का सिरा कामिनी की गांड की दरार में ऊपर-नीचे रगड़ना शुरू कर दिया। 21644159 बहुत ही धीरे… बहुत ही सुस्त… जैसे बकरी काटने से पहले चाकू मे धार लगा रहा हो.

कामिनी की गांड के दोनों भारी, गोरे पल्ले थर-थर काँप रहे थे। हर बार जब शमशेर का गरम मुंडका उसके कसे हुए, गुलाबी गांड-छेद को छूता, कामिनी का पूरा बदन सिहर जाता।  
“इस्स्स्स… उफ्फ्फ…”  
एक बहुत ही धीमी, दबी हुई सिसकी उसके होंठों से फिसल गई।

शमशेर मुस्कुराया। उसने लंड का सिरा ठीक उसी छेद पर टिका दिया। हल्का-हल्का दबाव डाला। बस सिरा ही… बस थोड़ा सा।

कामिनी की गांड का छेद पहले तो कसकर बंद हो गया, जैसे कोई डरी हुई छोटी सी लड़की राक्षस देख कर दरवाज़ा बंद कर ले। लेकिन शमशेर रुका नहीं। उसने अपनी कमर को सिर्फ़ एक इंच आगे किया।

“आआआह्ह्ह्ह्ह…!!   पूककक..... पचमममममम...”

कामिनी की आँखें चौड़ी हो गईं। दर्द… एक तीखा, जलता हुआ दर्द। जैसे कोई मोटा, गरम लोहे का सलाख उसके अंदर घुस रहा हो। उसका sphincter पहले तो पूरी ताकत से विरोध कर रहा था, लेकिन शमशेर का मुंडका इतना मोटा, इतना कठोर था कि धीरे-धीरे… बहुत धीरे-धीरे… वह अंदर सरकने लगा।

“स्लो… स्लो… बस थोड़ा सा भाभीजी… बस गया ही समझो…” शमशेर की आवाज़ में शैतानी मिठास थी।

कामिनी के मुँह से लगातार सिसकियाँ निकल रही थीं—  
“उफ्फ्फ… मम्म… आह्ह… धीरे… प्लीज़… धीरे… उइइइइ…मै मर जाउंगी ”

हर इंच के साथ उसकी गांड फैल रही थी। वह मोटा, काला लंड उसके अंदर घुसता जा रहा था। दर्द के साथ-साथ एक अजीब सी भराई… एक अजीब सी तृप्ति भी महसूस हो रही थी। 
सुबह से जो खालीपन कादर के जाने के बाद उसके अंदर था, वह अब भर रहा था… लेकिन कहीं ज़्यादा गहराई से, कहीं ज़्यादा बेशर्मी से।

शमशेर ने एक पल रुककर कामिनी की कमर सहलाई।  
“देख बे रमेश ऐसे मारते है औरतों की गांड प्यार से,”  
सामने से रमेश का कोई रिस्पांस नहीं था, बस नशे मे सर हिला कर वापस ढह गया, हालांकि उसने कोशिश की सर उठाया के देख ले, लेकिन सब नाकाम... शराब ने उसे अपाहिज बना दिया था.

शमशेर ने फिर से दबाव डाला।

अब आधा लंड अंदर था। कामिनी की आँखों से आँसू बहने लगे, नहीं नहीं दर्द के नहीं, जिस्मानी दर्द की तो वो आदि हो चुकी थी, रमेश लगभग हर रात ही उसे मारता पीटता था, परन्तु उस अजीब से सुख की। 
इतने बरसो की मार पिट का अंजाम था की कमीनी को इस दर्द मे सुख मिल रहा था, उत्तेजना का अहसास हो रहा था. 3e5989295b2deb9a7a060360be2efe45

उसकी गांड अब पूरी तरह फैल चुकी थी। शमशेर का लंड उसके अंदर धड़क रहा था। हर धड़कन के साथ कामिनी को लग रहा था जैसे उसके अंदर कोई ज्वालामुखी फटने वाला हो।

“अब… पूरा… ले लो…” शमशेर ने फुसफुसाया।

और फिर… एक ही धीमा, लेकिन अटल झटका।

“धप्प…!”

“आआआआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह…!! मम्मा… मर गई… उफ्फ्फ्फ्फ…!!”
हालांकि रमेश ने ये काम बड़े ही इत्मीनाना से किया था.

फिर भी कामिनी का पूरा बदन एक झटके से तन गया। शमशेर का पूरा 8 इंच का फौलादी लंड एक ही बार में उसके गांड के सबसे गहरे हिस्से तक उतर गया था।

 उसकी गांड के दोनों पल्ले अब पूरी तरह शमशेर की जांघों से चिपक गए थे। कामिनी की सांसें फूल रही थीं। उसकी गोरी पीठ पसीने से लथपथ थी। बाल बिखरे हुए थे।

शमशेर ने दोनों हाथों से कामिनी की कमर को कसकर पकड़ा और धीरे-धीरे अपनी कमर पीछे खींची… 
कामिनी को ऐसा महसूस हुआ जैसे उसका पेट ही बहार को खिंच रहा हो, 
पूररररर..... पचंम्म्म्म..... अंदर की हवा लंड के साथ खिंच के बहार आने लगी.

तभी... धप.... फाट....फिर वापस अंदर…पीरा जड़ तक अंदर, शमशेर के टट्टे कमीनी की गीली चुत से टकरा गए,

“चुप… चुप… चुप…”
शमशेर ने धीमे धीमे धक्के शुरू कर दिए.
धीमे, गहरे, लयबद्ध धक्के। .

हर धक्के के साथ कामिनी की भारी गांड हिलती। दोनों पल्ले आपस में टकराते, फिर अलग होते। चिकनाई, लार और कामिनी के अपने रस की वजह से आवाज़ें बहुत ही गंदी और मादक हो रही थीं।

“प्लप… प्लप… प्लप…”

कामिनी अब पूरी तरह टूट चुकी थी। दर्द अब सुख में बदल चुका था। वह खुद अपनी कमर हिलाने लगी, पीछे की तरफ धकेलने लगी,  जैसे शमशेर के लंड को और गहरा चूसना चाहती हो।

“हाँ… हाँ… और… उफ्फ्फ… और गहरा… आह्ह्ह… शमशेर… तुम… तुम… बहुत… बहुत मोटा है… उइइइइ…”

रमेश नीचे बिल्कुल बेसुध था। उसकी छाती पर कामिनी का बदन बार-बार पटक रहा था। उसकी चुत से बहता कामरस रमेश की जांघों पर टपक रहा था। लेकिन कामिनी को अब रमेश की कोई परवाह नहीं थी।

वह पूरी तरह शमशेर की थी।  
उसकी गांड पूरी तरह शमशेर के लंड की गुलाम बन चुकी थी।

शमशेर ने अब रफ़्तार थोड़ी बढ़ाई। लेकिन अभी भी हर धक्के को महसूस कराते हुए। वह हर बार पूरा लंड बाहर निकालता, मुंडके तक… फिर एक ही जोरदार लेकिन धीमा धक्का मार के अंदर कर देता।
थाप... ठप... की कामुक आवाज़ से कमरा गूंज उठता.
आआआहहहह.... आउच.... कामिनी अपनी चुत पर पढ़ते भारी टट्टो को महसूस कर के चीख उठती.

कामिनी की गांड अब पूरी तरह खुल चुकी थी। हर बार लंड बाहर निकलते ही उसका छेद थोड़ा सा खुला रह जाता, फिर वापस कस जाता। यह नज़ारा शमशेर को पागल कर रहा था। 23089586

“देख रमेश क्या गांड है तेरी बीवी की.....कितनी टाइट… कितनी भूखी है, मेरा लंड खा रही हैं.."
शमशेर कामिनी ओर ज्यादा उकसा रहा था.
जिसका असर कामिनी के चेहरे पे साफ दिख रहा रहा, वो अपने नीचे पड़े रमेश के चेहरे को हिकारात से देख रही थी, जो उसे करना चाहिए था वो उसका दोस्त कर रहा था.

कामिनी सिर्फ सिर हिला रही थी। बोलने की हिम्मत नहीं थी। बस सिसकियाँ निकल रही थीं
“हाँ… हाँ… तुम… तुम सबसे बड़े… सबसे मोटे… आह्ह्ह… फाड़ दो… फाड़ दो मेरी गांड… उफ्फ्फ…”

शमशेर ने एक हाथ आगे बढ़ाकर कामिनी के बाल पकड़ लिए। हल्का सा खींचा। कामिनी का सिर पीछे झुक गया। उसकी आँखें आधी खुलीं। मुँह खुला। लार टपक रही थी। 3115

और धक्के जारी रहे… धीमे… गहरे… लगातार…  

कामिनी की गांड अब पूरी तरह शमशेर के लंड की आदी हो चुकी थी। हर धक्के के साथ वह खुद पीछे धकेल रही थी। उसकी भारी गांड शमशेर की जांघों से टकरा-टकरा कर लाल हो रही थी।

“प्लप… प्लप… प्लप… चुप… चुप…”

कमरे में सिर्फ यही आवाज़ें गूंज रही थीं।  
रमेश की बेसुध साँसें… कामिनी की तड़पती सिसकियाँ… और शमशेर की भारी, विजयी हुंकार…
धड... धड.... ठप.. ठप.... चप... चप....

शमशेर अब पूरी तरह कामिनी के ऊपर सवार हो चुका था।  
उसका भारी, पसीने से तर बदन कामिनी की पीठ से चिपका हुआ था। उसकी चौड़ी छाती कामिनी की पीठ को दबाए हुए थी। दोनों हाथों से उसने कामिनी की कमर को कसकर जकड़ रखा था, जैसे कोई जंगली जानवर अपनी मादा को पकड़े हो। उसका 8 इंच का काला, नसों वाला लंड कामिनी की गांड के अंदर पूरी तरह समाया हुआ था—गहरे तक, जड़ तक।

“पचा… पच… पचा… पच…!”

हर धक्के के साथ शमशेर की मोटी, बालों वाली जांघें कामिनी की गोरी, भारी गांड से टकरा रही थीं। वह आवाज़… वह मधुर, कामुक संगीत… कमरे की हवा में गूंज रही थी। गांड के मांस का वह नरम-गरम टकराव, पसीने की चिकनाई, कामरस की फिसलन… सब मिलकर एक ऐसी धुन बना रहा था जो किसी चुदाई के राग की तरह थी।
"इसे ही कहते है चुदाई की धुन "
इसे वही औरत समझ सकती है, जिसने ऐसी चुदाई झेली हो.
कामिनी आज नया म्यूजिक सीख रही थी.

कामिनी का पूरा जिस्म थर-थर काँप रहा था।  
आज उसने वो अहसास महसूस किया जो कभी सपने में भी नहीं सोचा था।  
गांड चुदाई का आनंद… अलग ही था।  
हर धक्के के साथ पूरा जिस्म हिल रहा था। रोम-रोम खड़ा हो गया था। उसकी उँगलियाँ चादर नोच रही थीं। उसके भारी स्तन रमेश की छाती पर रगड़ खा रहे थे। उसकी चुत… जो अभी भी खाली थी, प्यास से तड़प रही थी… लेकिन बोल नहीं पा रही थी।

“आअह्ह्ह्ह… हाह्ह्ह… उउफ्फ्फ्फ… जोर से… आह्ह्ह… और अंदर…!”

कामिनी खुद अपनी गांड पीछे ले जा रही थी।  
हर बार जब शमशेर पीछे खींचता, कामिनी अपनी कमर उठाकर गांड पीछे धकेल देती। जैसे उसका लंड और गहरा उतर जाए। उसकी आँखें आधी बंद थीं। मुँह खुला था। लार टपक रही थी। सिर पीछे झुका हुआ था।

शमशेर ने रफ्तार बढ़ाई… लेकिन अभी भी धीमी… अभी भी गहरी… अभी भी एक एक इंच महसूस कराते हुए।  
वह पूरा लंड बाहर निकालता—सिर्फ मुंडका अंदर रहता फिर एक जोरदार, लेकिन सुस्त धक्का। पूरा 8 इंच एक ही बार में अंदर।

“पचाक्क… पचाक्क… पचाक्क…!”

कामिनी की गांड अब पूरी तरह लाल हो चुकी थी। दोनों गोल पल्ले हर टकराव के साथ हिलते, लहराते। शमशेर का लंड अंदर-बाहर होते ही उसका गांड-छेद थोड़ा खुलता, फिर कस जाता। वह दृश्य शमशेर को पागल कर रहा था।

कामिनी के दिमाग में एक ही ख्याल घूम रहा था—  
“चुत… मेरी चुत भी… प्लीज… कोई मेरी चुत भी तो मारे… इतनी प्यासी है… इतनी गीली है… लेकिन… आह्ह्ह… बोल नहीं सकती… उफ्फ्फ… बस आहें ही निकल रही हैं…”

वह बोलना चाहती थी, चीखना चाहती थी, 
“शमशेर… मेरी चुत में भी डाल दो… लंड ना सही उंगलियां ही डाल दो…  ये खालीपन… सहन नहीं हो रहा…”  
लेकिन उसके मुँह से सिर्फ सिसकियाँ निकल रही थीं।

“आआह्ह्ह… हाँ… हाँ… और… और जोर से… उइइइइ… फाड़ दो… मेरी गांड फाड़ दो… आह्ह्ह्ह!”

शमशेर ने एक हाथ आगे बढ़ाया और कामिनी के बाल पकड़कर हल्का सा खींचा। दूसरा हाथ उसकी कमर से हटाकर आगे आया और उसके एक स्तन को बेदर्दी से मसलने लगा। निप्पल को उँगलियों में दबाया, खींचा।

कामिनी की चुत अब बेकाबू हो रही थी।  
हर गांड-धक्के के साथ उसकी चुत फड़क रही थी। कामरस की बूँदें रमेश की जांघों पर टपक रही थीं। वह चाहती थी कि शमशेर का हाथ नीचे आए… उसकी चुत को सहलाए… उँगलियाँ अंदर डाले… लेकिन शमशेर जानबूझकर सिर्फ गांड पर ही ध्यान दे रहा था।

रफ्तार अब तेज़ हो गई थी।  
“पच… पच… पच… पचा… पचाक्क…!”

शमशेर पूरी ताकत से ठोक रहा था। उसका पसीना कामिनी की पीठ पर गिर रहा था। उसका साँस कामिनी के कान में गरम हवा की तरह फूँक मार रहा था।

“ले रंडी… ले पूरा लंड खा जा… कितनी टाइट है तेरी… कितनी भूखी है… कादर ने भी इतनी नहीं चोदी होगी ना… बोल… बोल ना… रंडी ?”
शमशेर उत्तेजन मे गुर्रा रहा था, दाँत भींच कर लंड को पूरी ताकत से अंदर मार रहा था.

कामिनी सिर्फ सिर हिला रही थी। बोलने की शक्ति नहीं बची थी। उसका पूरा जिस्म अब चरम सीमा पर था।  
गांड के अंदर शमशेर का लंड बार-बार प्रोस्टेट के पास टकरा रहा था। हर टकराव के साथ उसके जिस्म में बिजली दौड़ रही थी। उसकी चुत बिना छुए ही सिकुड़-फैल रही थी।

शमशेर का 8 इंच का काला, नसों वाला लंड कामिनी की गांड के सबसे गहरे हिस्से तक धँसा हुआ था। हर धक्के के साथ लंड की जड़ तक की मोटाई कामिनी की गांड को फैला रही थी, और उसकी चुत के अंदर से एक-एक ठोकर महसूस हो रही थी। जैसे कोई अंदर से उसकी चुत को मुक्के मार रहा हो।

“पचाक्क… पचाक्क… पचाक्क…!”

कामिनी की गोरी, भारी गांड अब पूरी तरह लाल हो चुकी थी। दोनों पल्ले शमशेर की जांघों से बार-बार टकराने की वजह से चमकदार लाल रंग के हो गए थे। शमशेर लगातार रगड़ रहा था, रोंद रहा था। बाहर निकालता, फिर पूरी ताकत से अंदर ठोंकता। उसके मोटे टट्टे हर बार कामिनी की सूजी हुई, गीली चुत पर सीधे चटाक-चटाक टकरा रही थीं।

“धड़… धड़… पाव्ह… पच… पचाक्क…!”

कामिनी का पूरा जिस्म हिल रहा था। उसके भारी स्तन रमेश की छाती पर रगड़ खा रहे थे। उसकी आँखें आधी बंद। मुँह खुला। लार टपक रही थी।  
हर धक्के के साथ उसकी चुत के अंदर से एक अजीब सी ठोकर लग रही थी। गांड के अंदर लंड की मोटी जड़ चुत की दीवार को दबा रही थी, सहला रही थी। कामिनी की चुत बिना छुए ही पागल हो रही थी।

“आह्ह्ह… आह्ह्ह… उफ्फ्फ… अंदर… बहुत अंदर… आह्ह्ह… मेरी चुत… मेरी चुत भी… उइइइइ…”

वह बोल नहीं पा रही थी। सिर्फ आहें निकल रही थीं। लेकिन अंदर से उसकी चुत चिल्ला रही थी—  
“प्यासी हूँ… भर दो… लेकिन… आह्ह्ह… बोल नहीं सकती…”

अचानक कामिनी का पूरा बदन तन गया।  
उसकी गांड शमशेर के लंड को जकड़ ली। उसकी चुत सिकुड़ी… फिर फैली… और फिर…

“आआआआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह… मम्मा…!!”

एक जोरदार झटके के साथ कामिनी झड़ गई।  
उसकी चुत से पेशाब की एक गरम धार फूट पड़ी। वह बर्दाश्त नहीं कर सकी। पेशाब और कामरस मिलकर रमेश की जांघों पर, चादर पर फव्वारे की तरह छूटने लगा। 22972481 “फुश्श्श… फुश्श्श…”  
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कामिनी की आँखें उलट गईं। उसका पूरा जिस्म काँप रहा था। गांड के अंदर शमशेर का लंड अभी भी ठोक रहा था, और हर ठोकर के साथ उसकी चुत और ज़ोर से फड़क रही थी।

लेकिन शमशेर नहीं रुका।  
वह और ज़ोर से पेलने लगा। तीन मिनट… लगातार… बिना रुके… बिना साँस लिए।

“धड़धड़धड़… पचाक्क… पचाक्क… फच… फच… फाचक…!”
 हर धक्के के साथ उसकी गांड हिल रही थी, लहरा रही थी। शमशेर का पसीना उसकी पीठ पर बह रहा था। उसकी साँसें कामिनी के कान में गरम हवा की तरह फूँक मार रही थीं।

कामिनी लगातार सिसक रही थी—  
“आह्ह्ह… नहीं… और… उफ्फ्फ… फाड़ दो… आह्ह्ह… मैं… मर रही हूँ… आह्ह्ह्ह…”

तीन मिनट बाद शमशेर की रफ्तार और तेज़ हो गई।  
उसने कामिनी की कमर को और कसकर पकड़ा। आखिरी 10-12 धक्के… पूरी ताकत से… गहरे तक…

“फच… फच… फाचक… फाचक… फााााचक्…!!”

और फिर… गहरे तक अंदर घुसकर रुक गया।  
शमशेर का गाढ़ा, गरम, मोटा वीर्य कामिनी की गांड की सबसे गहराई में, आंतों तक छूटने लगा।   
“उफ्फ्फ्फ… ले रंडी… ले मेरा पूरा माल… भर ले अपनी गांड मे … पी ले मेरे रस को…!”

कामिनी को लगा जैसे उसके अंदर गर्म लावा बह रहा हो।  
उसकी आंतों की गहराइयों में वह जलता हुआ, चिपचिपा वीर्य फैल रहा था। गर्मी… भयानक गर्मी… हर जगह फैलती जा रही थी।

“अअअअअअअह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह…!!!!”

कामिनी ने एक जोरदार, लंबी चीख मारी।  
उसकी आँखें बंद हो गईं। पूरा जिस्म रमेश के ऊपर निढाल होकर गिर गया। उसके हाथ ढीले पड़ गए। सिर रमेश की गर्दन में छिप गया।

लेकिन वीर्य की उस गर्मी ने फिर से उसकी चुत को झकझोर दिया।  
कामिनी एक बार फिर झड़ गई।  
इस बार और ज़ोर से। उसकी चुत से कामरस और पेशाब का एक मोटा फव्वारा छूटा। “फुश्श्श्श… फुश्श्श्श…!”  
चादर पूरी तरह भीग गई। रमेश की जांघें, पेट… सब तर हो गया। कामिनी का बदन लगातार काँप रहा था। उसकी गांड अभी भी शमशेर के लंड को चूस रही थी, हर स्पास्म के साथ और वीर्य अंदर खींच रही थी।

दोनों का बदन एक साथ थर-थर काँप रहा था।  
कमरे में सिर्फ उनकी भारी साँसें और चादर पर टपकते रस की आवाज़ गूंज रही थी।

कामिनी की आँखें बंद थीं। चेहरा आनंद और थकान से लाल।  
उसकी गांड अभी भी शमशेर के लंड से भरी हुई थी… और उसकी चुत… अब पूरी तरह संतुष्ट… लेकिन अभी भी हल्के-हल्के फड़क रही थी।

(क्रमशः)


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