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मेरी माँ कामिनी -36


मेरी माँ कामिनी - भाग 36

दीवार घड़ी की 'टिक-टिक' ने अचानक कामिनी की नींद में खलल डाला।
कामिनी की आँखें झटके से खुलीं।
कमरे में अभी भी ट्यूबलाइट जल रही थी, लेकिन खिड़की के बाहर हल्का-हल्का नीलापन (भोर) दिखाई दे रहा था।
कामिनी का दिमाग कुछ पल के लिए सुन्न था, उसे समझ नहीं आया कि वह कहाँ है।
लेकिन जैसे ही उसे अपनी छाती के नीचे बालों वाली सख्त छाती और अपने पैरों के बीच गीलापन महसूस हुआ, उसकी रूह कांप गई।
उसने हड़बड़ाकर घड़ी देखी— सुबह के 4:30 बज रहे थे।
"हे भगवान..." कामिनी का दिल गले में आ गया।
वह पूरी तरह नंगी, पसीने और वीर्य से लथपथ, अपने नौकर रघु के ऊपर औंधे मुंह लेटी हुई थी।

और ठीक बगल में... बमुश्किल एक हाथ की दूरी पर... उसका पति रमेश अभी भी खर्राटे भर रहा था।
कामिनी ने एक गहरी, राहत की सांस ली।


"बाल-बाल बची..." वह मन ही मन बुदबुदाई।
अगर रमेश मुझ से पहले उठ गया होता तो.... ये सोच के ही कामिनी की रूह कांप गई। इस नज़ारे की कोई सफाई नहीं हो सकती थी।

कामिनी ने रघु के ऊपर से उठना चाहा।
उसने अपने हाथों को गद्दे पर टिकाया और जोर लगाया।
लेकिन जैसे ही उसने अपनी कमर उठाई...
"आआहहहह.... इस्स्स्स..... माँ......"
कामिनी के मुंह से एक दबी हुई, दर्दभरी कराह निकल गई।
उसका पूरा निचला हिस्सा— गांड और चुत—आग की तरह जल रहा था।
शमशेर ने पीछे के रास्ते (गांड) को तोड़ा था, और रघु से उसने खुद अपनी चुत को कुचलवाया था.


उसकी जांघों की मांसपेशियां अकड़ गई थीं।
लेकिन उठना ज़रूरी था। खतरा अभी टला नहीं था।
कामिनी ने होंठ भींचे और अपनी कमर को ऊपर उठाया।
"पूछह... पुच... पॉप..."
एक बहुत ही गीली और गंदी आवाज़ आई।

जैसे कीचड़ में फंसा पैर बाहर निकलता है, वैसे ही रघु का ढीला पड़ा लंड कामिनी की योनि से बाहर फिसला।
हवा का एक बुलबुला अंदर से बाहर आया।
और लंड के निकलते ही...
कामिनी की योनि का मुंह जो पूरी रात खुला रहा था,  खुला ही रह गया।
और वहां से रघु के गाढ़े, सफ़ेद वीर्य और कामिनी के पानी का मिश्रण बह निकला।

वह वीर्य रघु के पेट और नाभि पर एक सफ़ेद तालाब की तरह जमा हो गया।
"आआबबबब....." कामिनी सिसक उठी।
वह वीर्य अभी भी ठंडा नहीं हुआ था।
कामिनी को महसूस हुआ जैसे पिघला हुआ सीसा (Molten Lead) उसकी चुत से रिसकर बाहर आ रहा है।
वह जलन, वह भारीपन... यह सबूत था कि रघु ने उसे कितना अंदर तक भरा था।
कामिनी लड़खड़ाते हुए बिस्तर से नीचे उतरी। उसकी टांगें कांप रही थीं।

उसने रघु के कंधे को पकड़ा और उसे झिंझोड़ा।
"उठ... रघु... ए रघु... उठ जल्दी..." कामिनी ने फुसफुसाते हुए कहा, डर के मारे उसकी नज़रें बार-बार रमेश पर जा रही थीं।
रघु ने अपनी भारी पलकें खोलीं।
"अअअ... क्या... क्या हुआ...?"
उसकी आँखें लाल थीं। सब कुछ धुंधला था।
उसे पहले तो कुछ समझ नहीं आया। बदन में शमशेर की मार का दर्द था।

लेकिन फिर... धीरे-धीरे यादें लौटीं।
शमशेर की बेल्ट... कामिनी का नंगा बदन... और फिर वह तूफानी सवारी।
रघु की नींद एक झटके में उड़ गई।
डर ने उसके चेहरे पर वापस जगह बना ली।
उसने अपनी गर्दन घुमाई—बगल में बड़े साब (रमेश) सो रहे थे।
और उसके ठीक ऊपर...
उसकी मैडम कामिनी बिल्कुल नंगी खड़ी थी। उसके बाल बिखरे थे, स्तन लटक रहे थे, और जांघों के बीच से 'दोनों का प्रेम रस' बह रहा था।

"कक्क.... मै.. मै... मैडम... आ.. आप...." रघु का गला सूख गया। उसे लगा अब उसकी जान गई।
वह हड़बड़ाकर उठने की कोशिश करने लगा, पजामा अभी भी घुटनों तक था।
कामिनी ने उसकी हालत देखी। वह जानती थी कि अगर रघु पैनिक (Panic) हुआ तो गड़बड़ हो जाएगी।
उसने तुरंत अपना 'मालकिन' वाला रौब ओढ़ लिया।
उसने रघु के मुंह पर हाथ रखा।

"श्श्श्श... चुप!" कामिनी ने उसकी आँखों में देखा।
"डरो मत... तुम घर पर ही हो। शमशेर गया "

कामिनी ने उसे सहारा देकर बिस्तर से नीचे उतारा।
"अभी जाओ... जल्दी यहाँ से। कोई देखे नहीं।"
हवस उतरने के बाद पकडे जाने का डर अच्छो अच्छो को होने लगता है.
कामिनी ने उसका पजामा ऊपर खींचने का इशारा किया।
"बाकी बात... बाद में करती हूँ।"
रघु ने जल्दी-जल्दी अपना नाड़ा बांधा।
उसके हाथ कांप रहे थे। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वह ज़िंदा है और उसने अभी-अभी क्या किया है।

उसने एक डरी हुई नज़र रमेश पर डाली और फिर कामिनी के नंगे पैरों को देखा।
वह नींद, नशे और दर्द में लड़खड़ाता हुआ, किसी चोर की तरह पिछले दरवाज़े से बाहर निकल गया।
कामिनी ने दरवाज़ा बंद किया और वहीँ दीवार के सहारे टिक गई।
उसकी छाती धौंकनी की तरह चल रही थी।
रात का खेल ख़त्म हो चुका था... लेकिन निशान अभी बाकी थे।
बिस्तर गीला था, बदन टूटा हुआ था, और एक नया राज़ इस घर की दीवारों में दफ़न हो गया था।
*************


समय: सुबह के 8:30 बजे | डाइनिंग टेबल पर 

रात के तूफ़ान के बाद सुबह की धूप खिड़की से छनकर आ रही थी, लेकिन घर का माहौल अभी भी भारी था।
डाइनिंग टेबल पर सन्नाटा पसरा हुआ था। चाय की प्यालियाँ भाप छोड़ रही थीं, लेकिन किसी ने उन्हें उठाया नहीं था।

कामिनी, जो रात भर की हवस, बेचैनी, चुदाई के बाद अभी भी अंदर से टूटी हुई थी (शारीरिक रूप से), बाहर से पूरी तरह "कड़क पत्नी" बनी हुई थी।
उसने साड़ी को बहुत सलीके से पहना था, ताकि उसकी चाल का लंगड़ापन और गर्दन पर लगे रति-चिन्ह छुप जाएं।

"आपको पता भी है कल रात क्या-क्या हुआ?" कामिनी ने चाय का कप मेज़ पर पटकते हुए कहा।
उसकी आवाज़ में वही कड़वाहट थी जो एक इज़्ज़तदार बीवी की होती है।

"कितनी बदनामी होती हमारी? पुलिस घर के अंदर तक आ गई थी! और वो कमिश्नर... उफ्फ!"
कामिनी रमेश पर बरस रही थी। यह गुस्सा असली नहीं था, यह उसकी अपनी ग्लानि (Guilt) और डर को छुपाने का एक नकाब था।
"ये कैसे दोस्त बना लिए हैं आपने? वो शमशेर... वो तो गुंडा है वर्दी में!"
रमेश, जिसका नशा अब पूरी तरह उतर चुका था और सर दर्द से फटा जा रहा था, एक अपराधी की तरह सिर झुकाए बैठा था।
उसे कल रात का कुछ भी याद नहीं था—सिवाय इसके कि वह बेहोश हो गया था। पूरी घटना बंटी ने सुबह-सुबह उसे (मिर्च-मसाला लगाकर) सुना दी थी।

"वो... वो..." रमेश हकलाया। "शमशेर के कुछ पुराने अहसान हैं मुझपर कामिनी... इसलिए उसकी बातों में आ गया। मुझे नहीं पता था वो बैग... और वो ड्रग्स..."
रमेश ने एक गहरी सांस ली। रमेश मासूम बनने का भरसक प्रयास कर रहा था.

"खैर, जो हुआ सो हुआ। लेकिन अब रिस्क नहीं ले सकते," रमेश ने फैसला सुनाया।
"मैं आज ही कादर को कहीं और शिफ्ट करने का बोलता हूँ। यह सब उसी की वजह से हुआ है। वो यहाँ रहेगा तो पुलिस फिर आएगी।"

कादर के जाने की बात सुनते ही कामिनी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
उसका वह "नकली गुस्सा" पल भर में ही ठंडा पड़ गया।

कामिनी का दिल धक से रह गया। वो उसकी तरफ आकर्षित थी, कामिनी अब पहली जैसी ग्रहणी नहीं रह गई थी, उसने पराये मर्द का रस पी लिया था, शेरनी को खून लग चूका था....
कामिनी ने तुरंत अपनी टोन बदली। उसने चाय का कप उठाया और धीरे से कहा,
"रहने दीजिये..."
रमेश ने चौंककर देखा।
"इंसान ही इंसान की मदद करता है," कामिनी ने एक संत जैसी आवाज़ में कहा। "बेचारा गरीब है, अच्छा आदमी है कहाँ जाएगा? और वैसे भी..."
कामिनी ने बंटी की तरफ देखा। बंटी मंद-मंद मुस्कुरा रहा था।
"वैसे भी वो कमिश्नर विक्रम सिंह... बंटी के दोस्त रवि के पापा हैं। अब उनका ध्यान कभी यहाँ नहीं जाएगा कि हम गलत लोग हैं।"
आप तो मिले ही हुए है विक्रम जी से"

"मामला शांत हो जाये तो चला जायेगा"
कामिनी ने बात संभाल ली थी।

बंटी अपनी माँ की इस चालाकी पर मुस्कुरा दिया। उसने नोटिस किया मेरी माँ अब बेचारी नहीं रही, वो इस समाज मे रहने का नियम सीख गई है, 

जवाब में कामिनी ने भी उसे एक तिरछी नज़र से देखा और मुस्कुरा दी।
माँ-बेटे के बीच अब छुपाने जैसा कुछ था भी नहीं। एक मूक समझौता हो चुका था।
तभी रमेश को कुछ याद आया।
"और वो बैग...?" रमेश ने धीरे से पूछा, इधर-उधर देखते हुए। "वो ड्रग्स वाला बैग कहाँ है? अगर पुलिस दोबारा आ गई तो?"
कामिनी ने प्रश्नवाचक नज़रों से बंटी की तरफ देखा। उसे भी नहीं पता था कि रात को बंटी ने बैग का क्या किया।

"आप चिंता मत करो पापा," बंटी ने पराठा तोड़ते हुए बेफिक्री से कहा।
"वो बैग एकदम सेफ है। जिस दिन कादर यहाँ से जाएगा, या मामला ठंडा हो जाएगा, मैं उसे वापस दे दूंगा। अभी किसी को जानने की ज़रूरत नहीं है कि वो कहाँ है।"

रमेश और कामिनी अपने बेटे की समझदारी और आत्मविश्वास पर हैरान थे।
बंटी वाकई बहुत बड़ा हो गया था, जिम्मेदार हो गया था।
रमेश ने राहत की सांस ली, नाश्ता ख़त्म किया और अपना ब्रीफ़केस उठाकर ऑफिस के लिए निकल गया।


जैसे ही मुख्य दरवाज़ा बंद हुआ और रमेश की गाड़ी की आवाज़ दूर हुई...
कामिनी ने तुरंत कुर्सी घुमाई और बंटी को घूरकर देखा।
"अब तो बता दे... कहाँ है वो बैग?" कामिनी की जिज्ञासा सातवें आसमान पर थी।
"कल रात क्या किया तूने उस बैग का? तूने इतने कॉन्फिडेंस से विक्रम जी को अंदर बुला लिया... अगर मिल जाता तो हम सब जेल में होते!"
बंटी अपनी कुर्सी से उठा। उसके चेहरे पर एक विजेता की मुस्कान थी।
"माँ... वो देखो..." बंटी ने उंगली से इशारा किया।
कामिनी की नज़रें उस दिशा में गईं।
डाइनिंग टेबल के ठीक सामने... जहाँ वाशबेसिन लगा था...
वहां नीचे ज़मीन पर घर के गंदे कपड़े (लॉन्ड्री) का ढेर पड़ा था। कुछ मैली चादरें, पुराने तौलिये और घर की फटी हुई चप्पलें।
और उसी कचरे और गंदे कपड़ों के बीच... वो 50 लाख का ड्रग्स से भरा काला बैग लापरवाही से पड़ा था।
सामने देखते ही कामिनी का दिमाग घूम गया।

"हे भगवान..." उसका मुंह खुला का खुला रह गया।
50 लाख का माल... यूँ ही कचरे में? सबके सामने?
कामिनी सकपका गई। "बंटी... तू पागल है? वहां?"

बंटी हंसा। "ढूंढा उसे जाता है माँ जो छुपा हो। जो चीज़ सबके सामने होती है, उसे कोई कैसे ढूंढ़ सकता है।"
बंटी कामिनी के पास आया।

"ये तो यहीं था, सबके सामने। विक्रम अंकल छुपी हुई चीज ढूंढने आए थे... कचरा नहीं। हेहेहेहेहे...."

कामिनी हैरान थी। बंटी की तेज़ बुद्धि और उसकी समझदारी ने उसे कायल कर दिया था।
"बंटी... मेरा बेटा..." कामिनी का दिल ममता और गर्व से भर गया।

"कितना समझदार हो गया है तू..."
कामिनी अपनी सीट से उठी और ममता के आवेश में बंटी को गले लगा लिया।
बंटी ने भी अपनी माँ को अपनी बांहों में भर लिया।
लेकिन यह मिलन सिर्फ़ 'ममता' का नहीं था।

बंटी के हाथ कामिनी की पीठ को सहलाने लगे।
उसका स्पर्श बहुत ही कोमल लेकिन मज़बूत था।
कामिनी की पीठ (Back) पर बंटी की उंगलियां रेंगने लगीं... नीचे की ओर।

और धीरे-धीरे... बंटी का हाथ कामिनी की कमर से फिसलता हुआ... उसकी विशाल और भारी गांड (Buttocks) के उभार पर जाकर रुक गया।
कामिनी को एक झुरझुरी सी हुई।

एक कोमल सा, लेकिन स्पष्ट अहसास।
यह स्पर्श 'बेटे' का नहीं, एक 'मर्द' का था।

"क्या कर रहा है..." कामिनी ने धीमी आवाज़ में पूछा, लेकिन उसने बंटी का हाथ नहीं हटाया।
"कादर पसंद है मतलब आपको?" बंटी ने धीरे से, उसके कान के पास फुसफुसाया।
जवाब में बंटी ने सवाल दाग दिया।
कामिनी सकपका कर अलग हुई। उसका चेहरा शर्म और घबराहट से लाल हो गया।

"ये.. ये.... क्या बोल रहा है तू?" कामिनी हकलाने लगी। उसकी चोरी पकड़ी गई थी।

"हॉस्पिटल में..." बंटी ने उसकी आँखों में देखा।
 "जब आपने कादर को देखा था... आपकी नज़रें... तभी मैं समझ गया था। हाहाहाहा...." बंटी हंस पड़ा।
उस हंसी में कोई मज़ाक नहीं, बल्कि एक स्वीकृति थी।

कामिनी को समझ नहीं आया कि वह क्या कहे। उसे शर्म आ रही थी, लेकिन बंटी के सामने अब पर्दा रखने का कोई मतलब नहीं था। वो तो बहुत पहले ही गिर चूका था.
बंटी अपनी माँ का राज़दार था.

"बहुत बदमाश हो गया है तू..." कामिनी ने बनावटी गुस्सा दिखाया और वापस से बंटी के गले जा लगी।
इस बार उसने खुद को बंटी के सीने में भींच दिया।

"आपका ही बेटा हूँ माँ... बदमाश तो होना ही था।"
दोनों इस बार ऐसे गले लगे जैसे बिछड़े हुए प्रेमी हों।
माँ-बेटे का यह रिश्ता कुछ अलग ही था।
इसमें वासना नहीं थी, लेकिन कुछ तो था ही जिसे दोनों ही नहीं समझ सकते थे,... एक सूक्ष्म खिंचाव था, जिसे इस समाज मे कभी भी खुल कर स्वीकार नहीं किया जा सकता।

बंटी माँ को खुश देखना चाहता था, चाहे वह खुशी कादर से मिले या किसी और से।

दोनों गले लगे आपस में खो गए।
बंटी ने अपनी नाक कामिनी की गर्दन के पास गड़ा दी।
वह अपनी माँ के पसीने, उसकी महक, और उस 'कामुक गंध' (Scent of Sex) को अपनी सांसों के साथ पी रहा था, जो रात भर के खेल के बाद अभी भी उसके बदन से आ रही थी।
कामिनी ने आँखें मूंद लीं। उसे बंटी की बांहों में एक अजीब सा सुरक्षा कवच महसूस हो रहा था, जो रमेश या किसी और मर्द के पास नहीं था।
ये वो अहसास था "हाँ मै यहाँ सुरक्षित हूँ, दुनिया खत्म भी हो जाये ये आगोश मुझे संभाल लेगा "
********************

 घड़ी 11 बजा रही थी 
घर में सन्नाटा था। घड़ी की टिक-टिक के अलावा कोई आवाज़ नहीं थी।
बंटी स्कूल जा चुका था और रमेश ऑफिस।
कामिनी ने चैन की सांस ली। रात का तूफ़ान थम चुका था, लेकिन उसके अंदर की हलचल अभी भी बाकी थी।
उसने किचन में दो स्टील की प्लेटों में गरमा-गरम पराठे और सब्जी परोसी।

उसकी चाल में एक अजीब सी मस्ती थी। कल रात रघु के साथ हुए सम्भोग ने उसकी रूह को तृप्त कर दिया था। कामिनी मुस्कुरा रही थी, चेहरे पे कोई सिकन नहीं थी.
सब कुछ सही था....
कामिनी थालियां लेकर पीछे के आंगन से होती हुई स्टोर रूम की तरफ बढ़ी।
धूप खिली हुई थी, लेकिन कामिनी का मन उन अंधेरे कोनों की तरफ भाग रहा था जहाँ उसके 'खास मेहमान' छुपे थे।
उसने दरवाज़े पर धीरे से नॉक किया।
"खट... खट..."
अंदर से कुंडी खुलने की आवाज़ आई।
दरवाज़ा कादर खान ने खोला।
जैसे ही दोनों की नज़रें मिलीं, एक पल के लिए सन्नाटा छा गया।
कल रात की यादे  कादर के साथ मटन पकाना, उसका अधूरा प्यार, और कामिनी की तड़प—सब कुछ ताज़ा हो गया।

कामिनी की नज़रों में हल्की सी शर्म थी। अक्सर रात के अंधेरे में किए गए बेशर्म काम, दिन के उजाले में औरत को नज़रें झुकाने पर मजबूर कर देते हैं।
लेकिन कादर... उसकी आँखों में शर्म नहीं, बल्कि एक सवाल और भूख थी।
"आइये... आइये मैडम..." कादर पीछे हट गया।
उसकी नज़र सबसे पहले कामिनी के चेहरे पर नहीं, बल्कि उसके हाथों पर गई, और फिर उसकी आँखों में।

"वो... उस बैग का क्या हुआ?" कादर की आवाज़ में बेचैनी थी।
उसकी जान उस काले बैग में अटकी हुई थी। होती भी क्यों ना? 50 लाख का माल था, इसी वजह से तो पुलिस से भागा फिर रहा था,

कामिनी बेफिक्री से स्टोर रूम में दाखिल हुई।
अंदर अंधेरा था और एक अजीब सी पुरुष-गंध (Male Scent) थी—बासी पसीने, बीड़ी और मर्दानगी की मिली-जुली महक।
कोने में खटिया पर रघु पड़ा था। वह भी जाग चुका था, लेकिन शमशेर की मार और कल रात की 'सवारी' ने उसे तोड़ दिया था। वह सुस्त सा पड़ा था।

"ममम... मैडम... आप?" रघु हड़बड़ाकर उठने की कोशिश करने लगा।
कामिनी ने कुछ नहीं कहा। उसने बस थालियां आगे बढ़ा दीं।
"पहले खा लो। भूखे होगे।"
कादर और रघु, दोनों ने थालियों पर ऐसे झपट्टा मारा जैसे बरसों के भूखे हों।
पराठे खाते-खाते कादर ने फिर पूछा, "मैडम... माल... मतलब बैग?"
कामिनी ने दीवार से टेक लगा ली और इत्मीनान से कहा,
"बैग सेफ है कादर। ये मामला निपट जाने दो, फिर ले लेना।"
कादर ने राहत की सांस ली। "शुक्र है अल्लाह का... और आप का, अपने मुझ पर बहुत बड़ा अहसान किया ।"

तभी कामिनी का चेहरा सख्त हो गया। वह रघु की तरफ मुड़ी।
"और तुम रघु..." कामिनी की आवाज़ में हल्की डांट थी।
"शमशेर जो कल रात कह रहा था... वो सच है? तुमने ही दारू पीकर बताया था कि कादर खान यहाँ है?"

रघु के हाथ से निवाला छूट गया। वह डर गया।
"मममम... मैडम मुझे सच में नहीं पता..." रघु ने गिड़गिड़ाते हुए कहा। "मैं तो बस ठेके पर दारू पीने बैठा था... मुझे क्या पता वो साला मुखबिर था। गलती हो गई मैडम।"

कादर, जो मज़े से खा रहा था, एकदम से गुस्से में आ गया।
"जाने दो मैडम... इन शराबियों का ऐसा ही है," कादर ने रघु के सिर पर एक ज़ोरदार चपत (Slap) रसीद की।
"चटाक!!"
"साले को कुछ याद ही नहीं रहता। कब क्या करना है, कब मूतना है, कब बकना है... कोई होश ही नहीं रहता।"
कादर ने रघु को घूरा, "शुक्र मना मैडम का, वरना आज तू शमशेर के डंडे खा रहा होता और मैं जेल में चक्की पीस रहा होता।"

फिर कादर ने कामिनी की तरफ देखा। उसकी आँखों में कृतज्ञता थी।
"थैंक यू कामिनी जी... कल आप ना होती, तो मैं गया था काम से।"
कामिनी मुस्कुरा दी।
उसकी मुस्कान में एक राज था।
"जाने दो... तुम दोनों बच गए, वो ही काफी है।"

एक अजीब सी सिहरन उसके बदन में दौड़ गई।
कामिनी जाने के लिए पलटी ही थी कि कादर की आवाज़ ने उसे रोक लिया।
"मैडम... एक बात और..."
कामिनी रुकी और मुड़ी। "क्या?"
कादर ने हिचकिचाते हुए खुद की तरफ इशारा किया।
"वो... कुछ कपड़े मिल जाते तो... बहुत गंदे हो रहे हैं।"
कामिनी की नज़रें कादर के बदन पर गईं।
कादर की हालत वाकई खराब थी।
उसने एक कसी हुई, गंदी और मैली टी-शर्ट पहन रखी थी, जो पसीने से चिपक गई थी और जिसमें से उसकी छाती के बाल झांक रहे थे।
और नीचे...
उसने रमेश की एक पुरानी, चेकदार लुंगी लपेट रखी थी।
कादर खटिया के किनारे बैठा था, और लुंगी उसके घुटनों से ऊपर चढ़ी हुई थी।
और उस लुंगी के बीचो-बीच...
कादर के विशाल, भारी-भरकम लंड का उभार (Bulge) साफ़ दिख रहा था।
लुंगी का कपड़ा वहाँ तंबू की तरह तना हुआ था।
साफ़ पता चल रहा था कि अंदर कोई 'अजगर' कुंडली मारकर बैठा है, जो कामिनी को देखते ही जागने लगा है।
कामिनी की नज़रें उस उभार पर अटक गईं।

वह उभार उसे याद दिला रहा था कि कल रात यह 'औज़ार' उसके मुंह तक आया था, लेकिन अंदर नहीं जा पाया था।
वह प्यास अभी भी बाकी थी।
कादर ने कामिनी की नज़रों को अपने लंड पर टिके हुए देख लिया। उसने बेशर्मी से अपने पैर थोड़े और चौड़े कर दिए।
कामिनी ने अपने होंठों पर जीभ फेरी।
उसने अपनी नज़रों को वापस कादर के चेहरे पर उठाया।
उसकी आँखों में अब मालकिन वाला रौब नहीं, बल्कि एक 'प्यासी औरत' का निमंत्रण था।

"ठीक है..." कामिनी की आवाज़ थोड़ी भारी हो गई।
"नाश्ता करके घर के अंदर आ जाना..."
उसने 'अंदर' शब्द पर जोर दिया।
"मैं तुम्हारे लिए कुछ कपड़े निकालती हूँ।"
कामिनी ने एक कामुक और तिरछी मुस्कान दी।

कामिनी पलटी और अपनी भारी कमर को मटकाती हुई, धीरे-धीरे वहां से निकल गई।
कादर उसके पीछे उसकी हिलती हुई गांड को देखता रह गया, और लुंगी के अंदर उसका लंड और भी अकड़ गया।
"साला यहाँ पड़े पड़े दम घुट रहा है मेरा " कादर रघु की तरफ बड़बड़या..
इन शब्दों को जाती हुई कामिनी ने बखूबी सुना...
**************

नाश्ता ख़त्म करके कादर ने दोनों झूठी प्लेटें उठाईं और दबे पांव घर के पिछले दरवाज़े की तरफ बढ़ा।
उसके दिल में अजीब सी हलचल थी। पेट तो भर गया था, लेकिन मन में एक अलग ही भूख थी।
उसने दरवाज़े पर दस्तक दी।
"ठाक... ठाक... ठक..."
दरवाज़ा खुला।
सामने कामिनी खड़ी थी।
लाल रंग की शिफॉन की साड़ी, गले में चमकता हुआ मंगलसूत्र, और मांग में भरा हुआ गहरा लाल सिंदूर।

सुबह की ताज़ा धूप उसके चेहरे पर पड़ रही थी, जिससे उसकी त्वचा सोने की तरह दमक रही थी। वह मुस्कुरा रही थी—एक ऐसी मुस्कान जो कादर ने आज तक किसी औरत के चेहरे पर अपने लिए नहीं देखी थी।
"ममम... मैडम..." कादर खान पल भर को कामिनी की इस खूबसूरती को देखकर सकपका गया।
उसके हलक में आवाज़ जाम होने लगी। वह नज़रें झुकाकर खड़ा हो गया, जैसे कोई मुजरिम अदालत में खड़ा हो।
कामिनी ने मुस्कुराते हुए कादर के हाथ से प्लेटें ले लीं और उन्हें सिंक में रख दिया।
फिर वह मुड़ी और एक छोटा सा बॉक्स कादर की तरफ बढ़ा दिया।
"ये लो..."
कादर ने झिझकते हुए वह बॉक्स थाम लिया।
"ययय... ये क्या है मैडम?"
"शेविंग किट है..." कामिनी ने अपनी कमर पर हाथ रखते हुए कहा। "ऐसे ही बाहर जाओगे क्या? कोई पहचान लेगा तो मुसीबत हो जाएगी।"
कामिनी ने कादर की बढ़ी हुई, बेतरतीब दाढ़ी और मूछों की ओर इशारा किया।

"बबब... बाहर क्यों जाना है?" कादर के चेहरे पर आश्चर्य था। उसे लगा था उसे यहीं कैद रहना है।
"अभी तुमने ही तो कहा था कि यहाँ दम घुट रहा है," कामिनी की आँखों में चमक थी। "चलो, तुम्हारे लायक कुछ कपड़े ले आते हैं। रमेश के कपड़े तो तुम्हें आएंगे नहीं, उनका सीना तुमसे आधा है।"

कादर हैरान था। वह अवाक रह गया।
आज तक किसी ने उसकी इतनी परवाह नहीं की थी।
जब से उसने होश संभाला था, उसका पाला सिर्फ़ गली-गलौज, शराबी, गँजेड़ियों और पुलिस के डंडों से ही पड़ा था।
लोग उसे 'कादर भाई' या 'गुंडा' कहते थे। लोग उससे डरते थे, नफरत करते थे।
उसने अपना रौब, अपना यह डरावना लुक (बढ़ी दाढ़ी, मैलै कपड़े) सिर्फ़ लोगों को डराने-धमकाने के लिए ही बनाया था। यह उसका कवच था।
लेकिन आज... यह औरत... यह शरीफ घर की मालकिन उससे डर नहीं रही थी।
उल्टा, वह उसकी परवाह कर रही थी। उसकी छोटी सी इच्छा (दम घुटने) को तवज्जो दे रही थी।
कादर भाव-विभोर हो उठा। उसका कठोर दिल पिघलने लगा।
आँखें भर आईं, लेकिन वह साला गुंडा ही था... कमज़ोर कैसे पड़ता?
उसने अपनी भावनाओं को दबाया। मजाल है कि आँखों में आंसू आने दे।
"ठ.. ठ... ठीक है मैडम..." कादर ने भारी आवाज़ में कहा।
वह कामिनी के हाथों से शेविंग बॉक्स लेकर डाइनिंग हॉल में लगे वाशबेसिन की ओर बढ़ गया।

"मैं अंदर से कुछ सामान और पर्स ले लेती हूँ," कामिनी ने कहा और उसे वहीं छोड़कर अपने बेडरूम की तरफ चली गई।
डाइनिंग हॉल में लगा बड़ा आईना कादर का इंतज़ार कर रहा था।
कादर ने लुंगी को कसकर बांधा और शेविंग क्रीम निकाली।
उसने बरसों बाद खुद को आईने में गौर से देखा।
आज वह इस "नकाब" को उतारने जा रहा था।
करीब 5-8 मिनट गुज़र गए।
कामिनी अपने बेडरूम से तैयार होकर, पर्स लटकाए बाहर आई।
वह कुछ गुनगुना रही थी।
जैसे ही वह डाइनिंग हॉल में दाखिल हुई, उसके कदम अपने आप रुक गए।
सामने का नज़ारा देखकर वह दंग रह गई।
उसके हाथों ने मजबूती से पास पड़ी डाइनिंग टेबल की कुर्सी के हत्थे (Handle) को जकड़ लिया। उसकी पकड़ इतनी तेज़ थी कि पोर सफ़ेद पड़ गए।

उसके सामने वाशबेसिन के पास कोई 'गुंडा' नहीं, बल्कि एक ग्रीक देवता (Greek God) खड़ा था।
अर्ध-नग्न अवस्था में... कमर के नीचे सिर्फ़ वही रमेश की पुरानी चेकदार लुंगी थी।
लेकिन कमर के ऊपर?
कामिनी की साँसें अटक गईं।

कादर का वह मैला-कुचैला रूप गायब हो चुका था।
उसके सामने एक सम्पूर्ण मर्द खड़ा था।
उसकी चौड़ी छाती (Broad Chest) किसी चट्टान की तरह मज़बूत थी, जिस पर काले, घने बालों का जंगल था। वे बाल पसीने और पानी की बूंदों से चमक रहे थे, जो उसकी मर्दानगी की गवाही दे रहे थे।
उसके कंधे (Shoulders) विशाल थे।
उसकी बाहों के डोले (Biceps) किसी लोहे के गोले की तरह फूले हुए थे।
और पेट? पेट पर कोई चर्बी नहीं थी, बल्कि सख्त मांसपेशियां (Abs) थीं जो लुंगी के नाड़े (V-line) में गायब हो रही थीं।

लेकिन असली झटका तो तब लगा जब कादर ने तौलिये से मुंह पोंछकर कामिनी की तरफ देखा।
ये... ये क्या?
कादर का चेहरा... जहाँ कल तक घनी, जंगली दाढ़ी-मूंछें थीं, और भागमभाग की धूल-मिट्टी जमी थी...
वह अब बिल्कुल गोरा-चिट्टा, उजला और चमकता हुआ निकल आया था।
दाढ़ी का कोई नामोनिशान नहीं था। गाल एकदम चिकने (Clean Shaven) थे।
उसकी तीखी नाक, मज़बूत जबड़ा (Jawline) और काली गहरी आँखें अब साफ़ दिखाई दे रही थीं।

कोई कह ही नहीं सकता था कि यह वही वांटेड मुजरिम कादर खान है।
कामिनी के सामने किसी बॉलीवुड फिल्म का हीरो खड़ा था—सख्त, मादक और बेइंतहा खूबसूरत।
उसका वह "रफ एंड टफ" (Rugged) शरीर और वह "मासूम" सा चिकना चेहरा—यह कॉन्बिनेशन जानलेवा था।
कामिनी की योनि में एक बिजली कौंध गई।
उसने अपने निचले होंठ को दांतों तले दबाया।
"इईईस्स्स्स....."
कामिनी के मुंह से न चाहते हुए भी एक कामुक सिसकी निकल गई।
उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
उसे लगा जैसे उसने किसी छुपे हुए खज़ाने को खोज लिया है।
कल रात तो सिर्फ़ अंधेरे में टटोला था, लेकिन आज उजाले में देख रही थी कि वह किस "हीरे" को अपने घर में पनाह दे रही है।
कादर ने तौलिया कंधे पर डाला और अपनी मज़बूत छाती को फुलाते हुए कामिनी की तरफ देखा।
उसकी आँखों में अब शर्म नहीं, बल्कि एक नया आत्मविश्वास था।
"कैसा लग रहा हूँ मैडम?" कादर ने अपनी गहरी, मर्दाना आवाज़ में पूछा।
कामिनी के पास कोई शब्द नहीं थे।
उसकी आँखें कादर की छाती के बालों से होती हुई, उसके पेट की मांसपेशियों पर, और फिर उस लुंगी के उभार पर जा टिकीं।

कामिनी जानती थी कि यह वक़्त अभी सही नहीं है। बंटी कभी भी आ सकता था, 
सामने खड़ा कादर, अपने नए और चिकने अवतार में, उसे चुम्बक की तरह खींच रहा था। उसका मन कर रहा था कि अभी इसी वक़्त उस चौड़ी छाती से लिपट जाए और उन गोरे गालों को चूम ले।

उसने एक गहरी सांस ली और न चाहते हुए भी कादर के उस आकर्षक और मांसल जिस्म के सम्मोहन से खुद को बाहर खींचा।
"तुम... तुम स्कूटर चला लेते हो ना?" कामिनी ने अपनी आवाज़ को संयमित करते हुए पूछा।
उसने पास पड़ी टेबल से चाबी उठाई और हवा में उछाल दी। 
कादर ने हवा में ही चाबी लपक ली। उसके रिफ्लेक्सेस (Reflexes) बहुत तेज़ थे।
"जी मैडम... स्कूटर क्या, ट्रक भी चला लेता हूँ," कादर मुस्कुराया। उसकी मुस्कान में अब वहशीपन नहीं, एक मासूमियत थी।

कामिनी अपने साथ रमेश की एक पुरानी, थोड़ी ढीली-ढाली टी-शर्ट निकाल लाई थी, 
"ये पहन लो..." कामिनी ने वह टी-शर्ट कादर की तरफ बढ़ा दी।
उसने वह टी-शर्ट अपने सिर से डाली और नीचे खींची।
टी-शर्ट रमेश के नाप की थी, और कादर का शरीर रमेश से कहीं ज्यादा चौड़ा और गठीला था।

जैसे ही टी-शर्ट उसके बदन पर चढ़ी, वह उसकी छाती और बांहों पर बुरी तरह कस गई।
उसके डोले और छाती के उभार कपड़े के नीचे से साफ़ झलक रहे थे। वह टी-शर्ट उसे और भी ज्यादा हॉट बना रही थी।

दो मिनट बाद, दोनों घर के बाहर थे।
कादर ने बंटी का स्कूटर स्टार्ट किया।
"डुग-डुग-डुग..."
इंजन की आवाज़ के साथ स्कूटर कांपने लगा।
कादर आगे बैठा, अपनी मज़बूत बाहें हैंडल पर जमाए।
और कामिनी...
कामिनी ने अपनी साड़ी का पल्लू संभाला और पीछे की सीट पर बैठ गई।
उसने झिझकते हुए अपने दोनों हाथ कादर के कंधों पर रखे, लेकिन फिर धीरे से नीचे खिसका कर उसकी कमर के दोनों तरफ जमा लिए।
"चलें मैडम?"
"हम्म्म..."
कादर ने एक्सीलरेटर दिया और स्कूटर हवा से बातें करने लगा।
शहर की सड़कें थोड़ी ऊबड़-खाबड़ थीं। ट्रैफिक भी था।
जैसे ही पहला चौराहा आया, कोई सामने आ गया।
कादर ने अनजाने में ब्रेक दबा दिए।
"चiiiक.....!!"
स्कूटर के रुकते ही, पीछे बैठी कामिनी का भारी शरीर, गती के कारण आगे की तरफ झुका।
और... "धप्प..."
कामिनी की विशाल, नरम और गद्देदार स्तन कादर की सख्त और चौड़ी पीठ से जा टकराये.

कादर को लगा जैसे किसी ने उसकी रीढ़ की हड्डी में बिजली का नंगा तार लगा दिया हो।
वह स्पर्श... वह नरमी...
कामिनी के स्तनों के निप्पल, जो ब्लाउज़ के अंदर तने हुए थे, कादर की पीठ में चुभ गए।
कादर का पूरा शरीर सनसना उठा। उसके रोंगटे खड़े हो गए।
कामिनी तुरंत पीछे नहीं हटी।
उसने उस दबाव को महसूस किया। उसे मज़ा आ रहा था।
कादर की पीठ की गर्मी उसके स्तनों को सेंक रही थी।
उसने अपनी पकड़ कादर की कमर पर और कस दी।

"धीरे चलाओ..." कामिनी ने उसके कान के पास फुसफुसाया, लेकिन उसकी आवाज़ में शिकायत नहीं, मस्ती थी।
कादर का दिल बाग-बाग हो रहा था।
उसे आज नया जीवन मिला था।
कल तक वह इस सहारा का गुंडा था, एक बदनाम ढाबा चलाता था, उसका रोज़ का काम था गुंडे मावली, दो टके के शराबीयो से निपटना, और आज... आज वह शहर की सड़कों पर एक खूबसूरत औरत के साथ घूम रहा है।

हवा उसके बालों को उड़ा रही थी।, उसके चेहरे को छू कर निकल जा रही थी, उसे याद भी नहीं लास्ट टाइम उसने कब अपने मुँह पर ऐसी ठंडी हवा का झोंका खाया था,.
सही मायनो मे कादर खान, गुंडा बदमाश खुद को ही नहीं पहचान पा रहा था.
उसे लगा जैसे वह कोई हीरो है और कामिनी उसकी हीरोइन।
"जी मैडम... वो ब्रेक लग गया था," कादर ने शीशे में कामिनी को देखते हुए कहा।
"मैडम..." कामिनी ने उसे टोक दिया।
हवा के शोर के बीच कामिनी ने अपना चेहरा कादर के कंधे पर रखा।
"कादर..."
"जी?"
"मुझे मैडम मत कहो..." कामिनी की आवाज़ गंभीर लेकिन मीठी थी।
"सिर्फ कामिनी कहो "
कादर के हाथ कांप गए। स्कूटर थोड़ा लहराया।

"लेकिन... मैडम... आप..."

"तुम मेरे नौकर थोड़ी हो, कुछ दिन के मेहमान हो मेरे घर मे, मुझे सिर्फ कामिनी कहो।"

कामिनी पूरी तरह से मोहित हो चुकी थी कादर पर, अपने यौवन के सबसे खूबसूरत पलो को जी रही थी.
वो कभी रमेश के साथ ऐसे नहीं बैठी, उसने कभी इस तरह खुली हवा मे सांस नहीं ली.

"ठीक है... कामिनी जी..." कादर ने शर्माते हुए कहा।
कामिनी खिलखिलाकर हंस पड़ी। उसकी हंसी हवा में संगीत की तरह गूंज गई।
कादर ने कभी इस प्यार, इस भावना को महसूस नहीं किया था, बचपन से ले कर अब तक सिर्फ गलियां, मांस कटाई, नशा यही सब बेचा, यही देखा.
ये प्यार क्या होता है उसे कोई इल्म ही नहीं था.
लेकिन आज एक पत्थर दिल, जानवर, गुंडा इंसान उस मोहब्बत को महसूस कर रहा था, एक स्त्री का होना कितना जरुरी है ये अहसास कादर को हो चला था.
कादर के रोंगटे खड़े थे, हवा उसे सुखद अहसास दिला रही थी, 


दिन का समय था। बाज़ार में भीड़-भाड़ थी।
कादर ने स्कूटर पार्क किया और दोनों पैदल चलने लगे।
लोग उन्हें मुड़-मुड़ कर देख रहे थे।
एक तरफ कादर—लंबा, चौड़ा, मज़बूत, टी-शर्ट में कसे हुए डोले।
और दूसरी तरफ कामिनी—लाल साड़ी में दमकती हुई, भरी हुई जवानी।
वे दोनों किसी सम्पूर्ण प्रेमी युगल की तरह लग रहे थे।

कादर भीड़ में कामिनी को बचाकर चल रहा था।
जैसे ही कोई पास से गुज़रता, कादर अपना मज़बूत हाथ कामिनी की पीठ के पीछे लगा देता, उसे सुरक्षा देता।
कामिनी को यह अधिकार (Possessiveness) बहुत पसंद आ रहा था।

 रमेश तो कभी बाज़ार में उसका हाथ भी नहीं पकड़ता था, और यह "पराया मर्द" उसे दुनिया से बचा रहा था।
उन्होंने एक कपड़े की दुकान में प्रवेश किया।

"भैया, इनके लिए कुछ अच्छे कपड़े दिखाओ," कामिनी ने दुकानदार से कहा। "जीन्स और शर्ट... एकदम बढ़िया वाले।"
कादर चुपचाप खड़ा था, बस कामिनी को निहार रहा था।
कामिनी उसके सीने पर शर्ट लगाकर नाप ले रही थी। उसकी उंगलियां बार-बार कादर की छाती को छू रही थीं।
दुकानदार को भी लगा कि यह "नई-नई शादीशुदा जोड़ी" है।

"भैया पर यह रंग बहुत जंचेगा भाभीजी," दुकानदार ने एक नीली शर्ट दिखाई।
"भाभीजी" सुनकर कामिनी और कादर ने एक-दूसरे को देखा।
कामिनी ने नकारा नहीं।
उसने बस मुस्कुरा कर कादर की आँखों में देखा।

"हाँ... जच तो रहा है।" कामिनी ने कादर की आँखों मे देख मुस्कुरा दिया.
कादर उस पल मर मिटने को तैयार था।
उसने कामिनी के प्यार, इज़्ज़त और उस "स्पर्श" को पाकर खुद को दुनिया का सबसे खुशनसीब मर्द मान लिया था।
*********************

बाज़ार से लौटते वक़्त स्कूटर के झटकों ने कामिनी की हालत ख़राब कर दी थी।
स्कूटर जब भी किसी गड्ढे में गिरता, कामिनी की गांड और चुत में एक तीखी लहर दौड़ जाती। कल रात रघु और शमशेर ने उसके निचले हिस्से को इतना तोड़ा था कि अब वहां सूजन और दर्द था।
"कादर... प्लीज, किसी मेडिकल स्टोर पर रोक लेना, कमर मे दर्द हो रहा है, दर्द की दवाई लेनी है," कामिनी ने कादर के कंधे को भींचते हुए अपनी असली दर्द की जगह को छुपा लिया।

कादर ने शीशे में देखा। कामिनी के चेहरे पर दर्द साफ़ था।
"दवाई से कुछ नहीं होगा कामिनी जी," कादर ने अपना पुराना नुस्खा बताया। "मेरे दादाजी हकीम हुआ करते थे। मेरे ढाबे पर एक खास तेल रखा है। उसे जहाँ लगाओगे, दर्द चुटकियों में गायब हो जाएगा।"

कामिनी को याद आया, जब उसने पहली बार रघु ने उसे चोदा था, तब भी रघु उसके लिए वही तेल लाया था। पल भर मे दर्द उड़नछू हो गया था.

कादर ने स्कूटर को शहर के बाहरी इलाके में अपने पुराने ढाबे की तरफ मोड़ दिया।
लेकिन वहां पहुँचते ही देखा कि ढाबे के सामने पुलिस की जीप खड़ी है और दो हवलदार चाय पी रहे हैं।
कादर रिस्क नहीं ले सकता था।
उसने स्कूटर को घुमाया और ढाबे के बिल्कुल पीछे वाले सुनसान रस्ते पर ले गया।
"कामिनी ने विरोध करना चाहा, कहाँ पीछे से जाना? 
मेडिकल की दवाई ही ले लेनी चाहिए थे "  लेकिन कादर के साथ ने उसे कुछ कहने से रोक लिया.


वहां झाड़ियां थीं, टूटी हुई दीवारें थीं और कचरे के ढेर थे। दूर-दूर तक कोई इंसान नहीं था।

"आप यहीं रुकिए," कादर ने स्कूटर खड़ा किया। "मैं दीवार फांदकर अंदर से वो तेल की शीशी ले आता हूँ। बस दो मिनट।"

कादर ने दीवार पर चढ़ाई की और फुर्ती से दूसरी तरफ कूद गया।

कामिनी अब वहां अकेली खड़ी थी।
दोपहर के 3 बज रहे थे। सूरज सिर पर था और धूप बहुत तेज़ थी।
कामिनी का लाल साड़ी में लिपटा हुआ बदन पसीने से भीग रहा था।
स्कूटर के इंजन की गर्मी और सूरज की तपिश ने उसका बुरा हाल कर दिया था।
उसके ब्लाउज़ के अंदर पसीने की बूंदें रेंग रही थीं।
यह गंदा और सुनसान इलाका उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था।

"मैं भी पागल हूँ... कहाँ आ गई इस कादर के चक्कर में," कामिनी खुद को कोस रही थी।
"छी कितनी गंदी जगह है, चारो तरफ गंदगी " 
उसकी गांड में स्कूटर की 'धरधराहट' की वजह से अभी भी टीस उठ रही थी। वह अपनी साड़ी को बार-बार ठीक कर रही थी।

तभी झाड़ियों के पीछे से सूखे पत्तों के कुचलने की आवाज़ आई।
"खड़-खड़..."
कामिनी चौंकी।
सामने से दो आदमी, जो शक्ल से ही मवाली और नशेड़ी लग रहे थे, लड़खड़ाते हुए बाहर निकले।
शायद अपना नशे का काम निपटा कर वापस गली की तरफ आ रहे थे.
उनके कपड़े मेले थे, आँखें लाल थीं और मुंह में गुटखा भरा था।
सुनसान में खड़ी ऐसी मादक और सजी -धजी औरत को देखकर उनके ईमान डोल गए।
"अरे वाह..." एक ने अपनी गंदी हंसी हंसी। उसके दांत पीले थे।
"देख साला... क्या माल है। यहाँ सुनसान में क्या कर रहा है?"
दूसरे ने अपनी लुंगी को ठीक किया, उसकी नज़रें सीधे कामिनी की छाती पर गड़ गईं।

"चल देखते हैं... आज तो मज़ा आ जाएगा। लगता है भगवान ने छप्पर फाड़ के दिया है।"
कामिनी का दिल धक से बैठ गया।
वह पीछे हटने लगी, लेकिन पीछे स्कूटर और दीवार थी।

"क्या हुआ मैडम? कोई समस्या है?" एक आदमी ने पास आते हुए पूछा। उसकी आवाज़ में एक गंदा इशारा था।
कामिनी का गला सूख गया।

"मममम.. मममम.. मै.... " वह कुछ बोलना चाहती थी, लेकिन डर के मारे सिर्फ हवा निकली।
उन दोनों आदमियों के पास से सस्ती शराब और पसीने की भयंकर बदबू आ रही थी। तेज़ भभका कामिनी की नाक में घुस गया।

"लगता है कुछ हेल्प चाहिए मैडम को," दूसरा आदमी थोड़ा और पास आया और उसने अपना हाथ बेशर्मी से स्कूटर की सीट पर रख दिया, कामिनी की कमर से बस कुछ इंच दूर।

कामिनी बुरी तरह घबरा गई।
उसे कुछ नहीं सूझा। वह कादर का नाम नहीं ले सकती थी।
उसने अपनी छोटी ऊँगली उठा दी, पेशाब वाली।
उसे लगा शायद ये लोग शर्म करके चले जाएंगे।

"वो... वो... मै... मै... पेशाब..." कामिनी हकला रही थी।
गुंडों ने एक-दूसरे को देखा और ठहाका मार कर हंस पड़े।

"अच्छा... तो मूतने आई है?"
पहले वाले ने अपनी जीभ होंठों पर फेरी।

"तो... मूत लो ना... हम भी देखें आप जैसी खूबसूरत और गोरी औरत का पेशाब किस रंग का होता है।"
दूसरा आदमी कामिनी के बिल्कुल नज़दीक आ गया।

"सुना है अमीर घरों की औरतों का मूत भी खुशबूदार होता है..."
कामिनी बुरी तरह फंस गई थी।
भागने का रास्ता नहीं था। चिल्लाने की हिम्मत नहीं थी।
लेकिन जब उसे लगा कि अब ये उसे छूने वाले हैं, उसने अपनी पूरी ताकत जमा की।
उसने चिल्लाने के लिए अपना मुंह खोला—
"काद......"
लेकिन आवाज़ निकलने से पहले ही...
सामने खड़े आदमी ने अपना गंदा, बदबूदार और खुरदरा हाथ कामिनी के मुंह पर जमा दिया।

"गु... गु... गु....!!"
उसकी चीख उसके गले में ही घुट गई।
उस आदमी की हथेली से तंबाकू और पसीने की गंध आ रही थी।
उसी वक़्त, पीछे खड़े दूसरे आदमी ने कामिनी को कमर से जकड़ लिया।
उसने कामिनी को हवा में उठा लिया।

"जल्दी कर... उधर झाड़ी में ले चल।"
कामिनी हाथ-पैर मार रही थी। उसकी लाल साड़ी और पेटीकोट ऊपर उठ गए थे।
उसकी टांगें हवा में चल रही थीं।
लेकिन उन दोनों की ताकत के आगे वह बेबस थी।
वे दोनों कामिनी को लगभग घसीटते हुए, स्कूटर से दूर, पीछे की घनी और कांटेदार झाड़ियों की तरफ ले जाने लगे।
कामिनी की आँखों से आंसू बह निकले।
उसे अपनी गलती का अहसास हो रहा था।
उसकी इज़्ज़त... उसकी जवानी... आज इन दो गंदे जानवरों का शिकार बनने वाली थी।
दीवार के उस पार कादर तेल ढूंढ रहा था, और इस पार उसकी 'कामिनी' लुटने जा रही थी।

********

कादर के हाथ में तेल की पुरानी, धूल भरी शीशी थी। उसके चेहरे पर एक सुकून वाली मुस्कान थी। बहार आते आते उसने अपने दो पठानी कुर्ते पाजामे भी उठा लिया थे, आखिर उसे ऐसे ही कपडे पसंद थे, वो तो कामिनी का मन रखने के लिए उसने जींस t-shirt ले लिए थे.


उसने फुर्ती से दीवार पर हाथ रखा और एक ही झटके में शरीर को हवा में उछालकर दूसरी तरफ कूद गया।
"धप्प..."
उसके मज़बूत पैर ज़मीन पर टिके।

"कामिनी जी... मिल ग..."
कादर के शब्द हवा में ही जम गए।
सामने स्कूटर खड़ा था, इंजन अभी भी गर्म था और 'टिक-टिक' कर रहा था।

लेकिन स्कूटर के पास... कामिनी नहीं थी।
वहां सन्नाटा था। सिर्फ दोपहर की गरम हवा चल रही थी।
कादर का दिल एक पल के लिए रुक गया।
"कामिनी जी?" उसने इधर-उधर देखा।

तभी उसकी नज़र ज़मीन पर गई।
स्कूटर के ठीक पास, धूल भरी ज़मीन पर...
लाल कांच की चूड़ियों के टूटे हुए टुकड़े बिखरे पड़े थे।
और वहां की मिट्टी खुदी हुई थी, जैसे किसी ने एड़ियां रगड़ी हों। घसीटने के ताज़ा निशान झाड़ियों की तरफ जा रहे थे।

कादर का खून खौल उठा। उसकी आँखों के आगे अंधेरा छा गया।
उसका गोरा, चिकना चेहरा अब लाल अंगारे की तरह दहक उठा।
उसकी नसों में दौड़ता हुआ खून किसी लावे का रूप ले चूका था।
उसने तेल की शीशी और अपने कपडे की थैली को स्कूटर की सीट पर पटका और किसी भूखे शेर की तरह, बिना आवाज़ किए, उन झाड़ियों की तरफ लपका।

घनी झाड़ियों के बीच, एक पुराने पेड़ की आड़ में कामिनी ज़मीन पर चित पड़ी थी। उसकी लाल साड़ी और पेटीकोट घुटनों से ऊपर तक उठ चुके थे।
एक गुंडा उसके ऊपर चढ़ा हुआ था, और अपने गंदे घुटनों से कामिनी के हाथों को ज़मीन पर दबा रहा था।

"साली... बहुत फड़फड़ा रही है..." वह गुर्राया।
दूसरा गुंडा कामिनी के पैरों के बीच घुसने की कोशिश कर रहा था, वह उसकी साड़ी को फाड़ने के लिए खींच रहा था।
"छोड़ो... हरामखोरों... भगवान के लिए..plz....छोड़ दो " कामिनी रो रही थी, उसका गला बैठ चुका था।
औरत कितनी ही कामुक क्यों ना हो, कितनी ही प्यासी कई ना हो वो सम्भोग सिर्फ अपने पसंदीदा मर्द के साथ ही करती है वो भी अपनी मर्ज़ी से, जबरजस्ती सम्भोग उसे कतई पसंद नहीं होता.
कामिनी की हालात भी ऐसी ही थी.
कल रात वो तीन तीन लंडो से हो कर गुजरी थी, लेकिन वो उसकी मर्ज़ी थी, ये बदबूदार शराबी उसे बर्दाश्त नहीं थे.

उसकी आँखों से आंसू बहकर कानों में जा रहे थे। उसने आँखें बंद कर लीं, अपनी नियति को स्वीकार करते हुए।
तभी...
हवा का रुख बदला।
झाड़ियों के पत्तों में सरसराहट नहीं हुई, बल्कि एक तूफ़ान आया।

कामिनी के पैरों के पास खड़े गुंडे को अचानक लगा जैसे सूरज की रौशनी छुप गई हो।
उसने पीछे मुड़कर देखा।
उसके ठीक पीछे... कादर खान खड़ा था।
6 फुट का विशाल शरीर, टी-शर्ट में तनी हुई मांसपेशियां, और आँखों में साक्षात यमराज।

इससे पहले कि वह गुंडा कुछ समझ पाता...
कादर ने अपना लोहे जैसा भारी हाथ उस गुंडे के जबडे पर दे मारा।
"कड़क़क़क़.....कदाक्क्क.....!!"
जबरजस्त हड्डी टूटने की सूखी आवाज़ आई।
गुंडा चीख भी नहीं पाया। वह किसी कटी हुई पतंग की तरह वही कामिनी के पैरो के पास धाराशाई हो गया,

कामिनी के ऊपर चढ़ा दूसरा गुंडा हड़बड़ा गया।
"कौन है बे..."
जैसे ही उसने सिर उठाया, कादर ने उसकी गिरेबान पकड़ी और उसे कामिनी के ऊपर से ऐसे खींचा जैसे कोई मरियल कुत्ता हड्डी चूसने के कोशिश कर रहा हो, और अचानक से बब्बर शेर ने कुत्ते की गार्डन दबोच ली हो।

कादर ने उसे हवा में उठाया और पास खड़े पेड़ के तने पर दे मारा।
"धड़ाम!!"
कादर रुका नहीं।

उसका "सभ्य" इंसान वाला नकाब उतर चुका था।
उसने उस गुंडे को ज़मीन पर गिरने से पहले ही दोबारा दबोच लिया। 
"साला तुम जैसे लोग शरीफ बनने कहाँ देते हो.... मादरचोद...!!"
हर शब्द के साथ कादर का भारी मुक्का उस गुंडे के चेहरे पर पड़ रहा था।
"धुम... धुम... खचाक..."
गुंडे का नाक, जबड़ा, दांत... सब कादर के लोहे जैसे मुक्कों के नीचे चकनाचूर हो रहे थे।
"सोचा था सब कुछ छोड़ के शरीफो वाला जीवन जीऊंगा, अब कोई गुंडा गर्दी नहीं...
लेकिन नहीं... धड... धड... धाम... धाम.... लेकिन नहीं तुम जैसे सूअर कादर खान को गुंडा ही बनाये रखोगे."

कादर खान गुस्से मे बड़बड़ाए जा रहा था, उसकी नस नस फड़क रही थी, शायद पल भर मे ही उसने कामिनी के प्यार को महसूस कर अच्छे जीवन की कल्पना कर ली थी,
लेकिन इस वारदात ने उसके अंदर का हैवान, कसाई वो गुंडा फिर से जगा दिया था.
कामिनी आँखों मे आंसू और हैरानी लिए कादर की एक एक बात को सुन रही थी, उसे देखे जा रही थी.
कादर का चेहरा गुस्से से लाल था.

धाम... धम... धाड़.. धाड़.... हर एक मुक्के के साथ खून की पिचकारियां कादर की उस नई, साफ़-सुथरी टी-शर्ट पर उड़ रही थीं, लेकिन उसे कोई परवाह नहीं थी।

वह गुंडा अब बेहोश हो चुका था, उसका चेहरा मांस का लोथड़ा बन गया था, लेकिन कादर का गुस्सा शांत नहीं हो रहा था।
वह उसे जान से मार देता, अगर...
"कादर...!!"
पीछे से एक कांपती हुई, रोती हुई आवाज़ आई।
कादर का हाथ हवा में रुक गया।

उसने भारी सांसों के साथ पीछे मुड़कर देखा।
कामिनी उठी हुई थी।
वह पेड़ के सहारे बैठी थी, अपनी फटी हुई साड़ी को छाती से लगाए हुए।

वह कादर को देख रही थी—डर से नहीं, बल्कि अविश्वास और राहत से।
उसने पहली बार कादर का ये रूप देखा था, गुंडा गर्दी क्या होती है कामिनी ने महसूस किया..
ये सब फिल्मो मे ही देखा था आजतक कामिनी ने, लेकिन... ये... ये... आज सच था, एक गुंडा, जो बमुश्किल दो दिन पहले ही उस से मिला था, वो उसकी इज़्ज़त बचाने के लिए कसाई बना हुआ था.


कादर का चेहरा खून के छींटों से सना था, मुट्ठियाँ लाल थीं, छाती धौंकनी की तरह चल रही थी।
कादर ने उस अधमरे गुंडे को कचरे की तरह फेंक दिया।
वह लंबे डग भरता हुआ कामिनी के पास पहुँचा।
उसका गुस्सा पल भर में चिंता में बदल गया।

वह कामिनी के सामने घुटनों के बल बैठ गया।
"कामिनी जी... आप... आप ठीक हैं?"
कादर ने अपने गंदे हाथ कामिनी से दूर रखे, उसे डर था कि कहीं उसका खून कामिनी को न लग जाए।
कामिनी ने कुछ नहीं कहा।
उसने बस झपटकर कादर को गले लगा लिया।

"कादरررر....!!"
वह फूट-फूट कर रो पड़ी।
उसने अपना चेहरा कादर की उस खून से सनी, पसीने से भीगी टी-शर्ट में छुपा लिया।

"मैं डर गई थी... मुझे लगा आज सब ख़त्म..."
कादर ने धीरे से, बहुत ही नाजुकता से अपने मज़बूत हाथ कामिनी की पीठ पर रखे।

"मैं हूँ ना..मै आपको यहाँ लाया था, मुझे माफ़ कर दो मेरी गलती से हुआ ये सब." कादर ने उसकी पीठ सहलाई।

धूप तेज़ थी, लेकिन उस झाड़ी की छांव में, दो जिस्म एक-दूसरे से लिपटे हुए थे।

कादर की टी-शर्ट पर लगा गुंडों का खून और कामिनी के आंसुओं ने मिलकर आज उनके रिश्ते पर पक्की मुहर लगा दी थी।
(क्रमशः)

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