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मेरी माँ कामिनी -38


मेरी माँ कामिनी - भाग 38

कामिनी ने बंटी के जाने के बाद अपनी गांड और चुत पर वह तेल अच्छी तरह से रगड़ लिया था।
कादर खान का दिया वह तेल वाकई कोई साधारण तेल नहीं था।
लगाते ही एक मीठी सी गर्माहट ने उसके रोम-रोम को सेक दिया। वह जलन, वह टीस, जो कल रात की बर्बरता और आज दिन के स्कूटर के झटकों से हुई थी... वह किसी चमत्कार की तरह गायब होने लगी।

मांसपेशियों में जो अकड़न थी, वह पिघल गई।
जिस्म में वापस से एक स्फूर्ति (Agility) छा गई।
दिन भर की थकान, डर और फिर उस तेल की नशीली राहत ने अपना असर दिखाया।

कामिनी बिस्तर पर, तौलिये के ऊपर ही औंधे मुंह लेटी और कब नींद के आगोश में समा गई, उसे पता ही नहीं चला।
कमरे में सन्नाटा था, और कामिनी के सपने में अब दर्द नहीं, बल्कि कादर की वह मज़बूत बाहें थीं।
अचानक...
"टिंग... टोंग... टिंग... टोंग...."
घंटी की कर्कश आवाज़ ने घर की शांति और कामिनी का ध्यान तोड़ा।
कामिनी झटके से उठी। उसकी आँखें एकदम से खुल गईं।
उसने दीवार घड़ी की तरफ देखा, शाम के 7 बज रहे थे।
खिड़की के बाहर सूरज ढल रहा था और कमरे में हल्का अंधेरा छाने लगा था।

"हे भगवान... मैं कब तक सोती रही?" कामिनी बुदबुदाई। "रमेश के आने का वक़्त हो गया है, और मैंने अभी तक कपड़े भी नहीं बदले!"
कामिनी बिस्तर से किसी हिरणी (Doe) की तरह फुदक कर खड़ी हो गई।

हैरानी की बात थी—उसके पैरों में, उसकी कमर में या उसके नीचे... कहीं कोई दर्द नहीं था।
वह तेल अपना जादू दिखा चुका था। उसका बदन अब कल रात की तरह ही ताज़ा और तैयार था।
घंटी लगातार बज रही थी।
हड़बड़ाहट में कामिनी ने कमर पर लिपटा हुआ वह सफ़ेद तौलिया एक झटके में निकालकर फेंक दिया।
एक पल के लिए वह शाम के धुंधलके में पूरी तरह नग्न खड़ी थी।

उसका भरा हुआ बदन, भारी स्तन और चौड़ी कमर... सब कुछ आज़ाद था।
समय नहीं था।
उसने पास पड़े कुर्सी से अपना सिल्क का गाउन उठाया और उसे अपने जिस्म पर टांग लिया।
जल्दबाज़ी में उसने न तो ब्रा पहनी और न ही पैंटी।
गाउन का कपड़ा बहुत ही मुलायम और फिसलन भरा था।

जैसे ही गाउन उसके बदन से नीचे फिसला, वह उसके उभरे हुए अंगों से चिपक गया।
अंदर से वह सम्पूर्ण नग्न थी, और यह बात गाउन के बाहर साफ़ झलक रही थी।
ठंडक और हड़बड़ाहट की वजह से उसके स्तनों के निप्पल (Nipples) तनकर खड़े हो गए थे, जो गाउन के कपड़े को भेदकर बाहर की तरफ अपनी हाज़िरी लगा रहे थे।

कामिनी दौड़ती हुई बाहर आई।
उसके गाउन की ज़िप बस गले तक बंद थी, लेकिन चलते वक़्त उसके स्तन हिल रहे थे और गाउन की रेशमी सरसराहट उसके नंगे बदन को गुदगुदा रही थी।
उसने कांपते हाथों से दरवाज़ा खोला।
"खट..."
सामने बंटी और उसका दोस्त रवि खड़े थे।
बंटी के चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान थी, लेकिन रवि...
रवि की हालत देखने लायक थी।

रवि, जो पहले से ही कामिनी के हुस्न का दीवाना था, आज उसे इस अवतार में देखकर मंत्रमुग्ध हो गया।
शाम की हल्की रौशनी कामिनी के पीछे से आ रही थी, जिससे उसके गाउन का 'सिलहूट' (Silhouette) बन गया था।
रवि की नज़रें सीधे कामिनी की छाती पर जा टिकीं।
वहाँ, गाउन के कपड़े के नीचे... दो नुकीले उभार (Nipples) साफ़ दिख रहे थे।

रवि का गला सूख गया। उसे लगा जैसे उसने साक्षात् मेनका को देख लिया हो।
"न... नमस्ते आंटी..." रवि ने बड़ी मुश्किल से हाथ जोड़े, लेकिन उसकी आँखें जुड़ने को तैयार नहीं थीं।
वह कामिनी को ऊपर से नीचे तक 'स्कैन' कर रहा था।
उसे साफ़ पता चल रहा था कि अंदर कुछ नहीं पहना गया है।
कामिनी ने रवि की उस 'X-Ray' नज़र को महसूस कर लिया।
एक औरत की छठी इंद्री (Sixth Sense) उसे बता देती है कि सामने वाला मर्द उसकी आँखों में देख रहा है या जिस्म में।
और रवि... रवि तो उसे अंदर तक देख रहा था।
"ननन... म... नमस्ते बेटा..." कामिनी हकला गई।
उसे अपनी गलती का अहसास हुआ।
ठंडी हवा का झोंका आया और उसके गाउन को उसकी टांगों के बीच चिपका गया, जिससे उसकी जांघों की गोलाई और योनि का उभार (Camel toe) हल्का सा उभर आया।

कामिनी ने तुरंत अपने दोनों हाथों को अपनी छाती पर बांध लिया।
"आओ... अंदर आओ..."
उसने अपनी नंगता को छुपाना चाहा, लेकिन वह जानती थी कि तीर कमान से निकल चुका है।
रवि ने वह देख लिया था जो उसे नहीं देखना चाहिए था।
बंटी, जो यह सब देख रहा था, पीछे से मुस्कुराया।
उसने रवि को कोहनी मारी।
"चल भाई... अंदर चल।, खा जायेगा क्या मेरी माँ को?।"


ड्राइंग रूम में चाय का दौर चल रहा था। कामिनी सोफे पर एक तरफ पैर सिकोड़कर बैठी थी। उसने अपना गाउन बदला नहीं था। रेशमी कपड़ा उसके शरीर के उतार-चढ़ाव को पूरी तरह पकड़ रहा था। उसे पता था कि रवि की नज़रें बार-बार उसकी ढीले गले और गाउन के नीचे बिना किसी सहारे के आज़ाद झूलते उसके भारी स्तनों पर टिक रही हैं। ताज्जुब की बात थी कि कामिनी को अब इससे शर्म नहीं, बल्कि एक अजीब सा आत्मविश्वास महसूस हो रहा था। उसे अपनी देह की इस नुमाइश में एक तीखा मज़ा आने लगा था।

बंटी ने चाय की चुस्की ली और मुद्दे पर आया। "हाँ तो माँ, बात ये है कि रवि के घर में कुछ पेंटिंग और सफ़ाई का काम है। आंटी (सुनैना ) परेशान हो रही हैं, कोई भरोसे का आदमी नहीं मिल रहा। तो मैंने कहा कि रघु को दो दिन के लिए वहां भेज देते हैं।"

रवि ने तुरंत बात को आगे बढ़ाया, "हाँ आंटी, मम्मी ने बहुत कोशिश की। हम रघु को एक्स्ट्रा पैसे भी दे देंगे।"

बंटी खिलखिलाकर हंसा, "अबे क्या एक्स्ट्रा पैसे! बस दो बोतल एक्स्ट्रा दारू दे देना, साला तेरी माँ का सारा काम चुटकियों में कर देगा।"

बंटी का यह मज़ाक कामिनी के सीने में सुई की तरह चुभा। 'काम कर देगा...' इस जुमले के पीछे जो कामुक अर्थ था, वह कामिनी से बेहतर कौन जानता था? उसे तुरंत कल रात का वो मंजर याद आ गया जब इसी रघु ने उसे बिस्तर पर बुरी तरह कुचला था। रघु भले ही शराबी और गरीब था, लेकिन उसके 'देसी औजार' ने कामिनी को वो सुख दिया था जो रमेश कभी नहीं दे पाया।

कामिनी को अचानक सुनैना से जलन होने लगी। साथ ही एक अजीब सी गुदगुदहट भी महसूस हुई, सुनैना की छुवन मे एक अजीब सा अहसास था जो कामिनी को सुकून दे रहा था, लेकिन ये भावना उसकी समझ से परे थी.

 कामिनी को याद आया कि कैसे शमशेर ने इसी छत पर सुनैना की इज़्ज़त के परखच्चे उड़ाए थे। अगर रघु वहां गया, तो क्या प्यासी सुनैना उसे बख्शेगी?

"क्या हुआ आंटी? रघु को नहीं भेजना क्या?" रवि ने कामिनी के चेहरे पर छाई गहरी सोच को भांपते हुए पूछा। उसकी नज़रें अभी भी कामिनी के गाउन के उस हिस्से पर थीं जहाँ से उसके निप्पल का उभार कपड़े को फाड़कर बाहर आने को बेताब था।

"वो... वो... नहीं बेटा, ऐसी बात नहीं है," कामिनी ने हकलाते हुए अपनी नग्नता को छुपाने के लिए गाउन को ऊपर से भींचा। "बस... वो शराबी है, कहीं तुम्हारे घर में कोई उल्टी-सीधी हरकत ना कर दे। पुलिस का घर है तुम्हारा..."

"अरे आंटी, बस दो दिन की बात है। कौन सा दूर है हमारा घर? कुछ गड़बड़ हुई तो तुरंत बता देंगे," रवि ने एक ललचाई हुई मुस्कान दी,

कामिनी बेबस थी। वह मना नहीं कर सकती थी क्योंकि बंटी पहले ही हाँ कह चुका था। "ठीक है... ले जाओ। पर ध्यान रखना, उससे ज़्यादा भारी काम मत करवाना," कामिनी ने भारी मन से कहा। उसके शब्द रघु के लिए उसकी 'ममता' नहीं, बल्कि उसकी मलिकियत (Ownership) जता रहे थे।

"टिंग... टोंग..."
तभी बाहर की घंटी बजी। बंटी ने दरवाज़ा खोला और सामने रघु खड़ा था। वही पुराना रघु—मैले कपड़े, उलझे बाल और आँखों में कल रात की मार का खौफ़।
"लो, शैतान का नाम लिया और शैतान हाज़िर!" रवि ने चुटकी ली।

"हट बदमाश, उसे शैतान मत कह," कामिनी ने रवि को हल्का सा डांटा, लेकिन उसकी आवाज़ में एक रेशमी गर्माहट थी जो सिर्फ रघु के लिए थी। "क्या हुआ रघु?"

रघु ने अपनी फटी हुई आवाज़ में कहा, "ममम... मैडम... वो बात करनी थी... वो कल रात..."

'कल रात' सुनते ही कामिनी के शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई। उसे लगा रघु सबके सामने वो सब उगल देगा कि कैसे मालकिन नंगी होकर उसके ऊपर चढ़ी थी, कैसे उसने मालकिन की चुत में अपना गर्म लावा भरा था।

 कामिनी का चेहरा डर और शर्म से तमतमा उठा।
"क्या कल रात!" कामिनी चिल्ला उठी। उसे अपनी इज़्ज़त नीलाम होने का डर सताने लगा। एक औरत भले ही सौ मर्दों के साथ सो जाए, पर वह कभी नहीं चाहेगी कि एक की खबर दूसरे को हो।

"वो... कल रात... शमशेर साब... ने... मुझे मारा..." रघु ने रोते हुए अपना दर्द सुनाना चाहा।
"कौन शमशेर? क्या हुआ?" रवि ने कामिनी की तरफ सवालिया नज़रों से देखा।

कामिनी को तुरंत वो मंजर याद आया जब शमशेर ने सुनैना को चोदा था। "हाँ... वही... कल रात पुलिस आई थी ना, उसी में इसने मार खाई।"
रवि ने रघु के कंधे पर हाथ रखा और उसे बाहर की तरफ अपने साथ खिंचा। "अबे रोता क्या है मामूली बात पर? शमशेर को हम देख लेंगे। अभी चल मेरे साथ, घर पर बहुत काम है। मम्मी इंतज़ार कर रही हैं।"

रवि ने रघु को कुछ कहने का मौका ही नहीं दिया, उस गरीब की सिसकियों में रईसज़ादे को कोई दिलचस्पी नहीं थी। रवि ने बंटी की स्कूटर की चाबी ली और रघु को पीछे बिठाकर रवाना हो गया।

कामिनी बरामदे की दहलीज़ पर खड़ी, एकटक रघु को जाते देखती रही। स्कूटर की आवाज़ जैसे-जैसे दूर हो रही थी, कामिनी के दिल की धड़कनें तेज़ हो रही थीं। उसे अपनी जांघों के बीच फिर से वही टीस महसूस हुई। उसे गुस्सा आ रहा था सुनैना पर।

जैसे रघु उसकी चुत से निकल कर दूर जा रहा हो.

बंटी पीछे से आया और अपनी माँ के कंधे पर हाथ रखा। "चिंता मत करो माँ, रघु ठीक रहेगा। छोटा मोटा काम है बस " 
***************

रात के 8:30 बज रहे थे। घर में सन्नाटा पसरा था,
कामिनी किचन मे काम निपटा रही थी, आज शमशेर नहीं आया था, वही रमेश हमेशा की तरह नशे मे धुत्त बैडरूम मे पड़ा हुआ था, 

​कामिनी के दिमाग में दोपहर की वो घटना घूम रही थी। उन दो गुंडों का उसे नोचना, उसकी साड़ी खींचना और उसे घसीटना... उस समय वह डर से कांप रही थी, लेकिन अब अकेले में उन यादों ने उसके अंदर एक अजीब सी वहशी उत्तेजना भर दी थी।
कादर के तेल ने उसके जख्मो को, दर्द को छूमंतर कर दिया था.
अब फिर से उसकी उत्तेजना लौट आई थी, कामिनी अजीब सा महसूस कर रही थी, आज दिन भर से उसने कादर को देखा नहीं था, पता नहीं उसने खाना खाया भी होगा या नहीं.
कामिनी की नजर बात बार खिड़की से बहार झाँक लेती, उस नल को देखती जहाँ कादर रात मे नहा रहा था.
लेकिन हर बार निराशा ही पल्ले आती.
कामिनी शाम से ही उसी रेशमी गाउन में थी। गाउन के नीचे उसका बदन अभी भी कादर की छुवन और बंटी की मालिश की गर्माहट महसूस कर रहा था।

 रमेश शराब के नशे में धुत होकर घर लौटा था। उसकी आँखों में लाल डोरे थे और जुबान लड़खड़ा रही थी, हमेशा की तरह नशे ने उसके दिमाग में एक झूठी मर्दानगी भर दी थी।


जैसे ही कामिनी बेडरूम में दाखिल हुई, रमेश ने किसी भूखे जानवर की तरह उस पर छलांग लगा दी।
रमेश की आँखों में शराब का नशा था, लेकिन आज कामिनी को उससे डर नहीं लगा।
उल्टा, रमेश का यह वहशीपन, उसका यह खुरदरा व्यवहार कामिनी के अंदर की दबी हुई आग को हवा दे रहा था।

दोपहर में जब गुंडों ने उसे नोचा था, तब वह डरी हुई थी। लेकिन अब, घर की चारदीवारी में, वही 'नोचना-खसोटना' उसे एक अजीब सी उत्तेजना दे रहा था।
"आज... आज तो तुझे कच्चा चबा जाऊंगा..." रमेश गुर्राया।

उसने कामिनी को बांहों में जकड़ लिया और उसकी गर्दन पर अपने दांत गड़ा दिए।
"आअह्ह्ह...."
कामिनी कसमसा उठी। दर्द हुआ, तीखा दर्द।
लेकिन आज उसने रमेश को धक्का नहीं दिया। उसने अपनी गर्दन और पीछे झुका दी, जैसे वह उस दर्द को आमंत्रित कर रही हो।

उसे मज़ा आ रहा था। उसे महसूस हो रहा था कि वह सिर्फ़ एक मांस का टुकड़ा है जिसे कोई जानवर नोच रहा है। यह अहसास उसकी योनि को गीला कर रहा था।
रमेश ने आव देखा न ताव, कामिनी के रेशमी गाउन को कंधों से पकड़ा और एक ही झटके में नीचे खींच दिया।
"चर्रर्र..."
गाउन उसके पैरों में गिर गया।
कामिनी रमेश के सामने सम्पूर्ण नग्न खड़ी थी। उसके भारी स्तन, चौड़ी कमर और भरी हुई जांघें—सब कुछ उस शराबी के सामने परोसा हुआ था।

रमेश ने उसे धकेल कर बिस्तर पर गिरा दिया।
वह उसके ऊपर चढ़ गया और पागलों की तरह उसके स्तनों को मुंह में भरकर काटने लगा, चूसने लगा।
कामिनी की आँखें बंद थीं। वह अपनी मुट्ठियों में चादर भींच रही थी।

उसके दिमाग में रमेश नहीं था।
अंधेरे में उसे लग रहा था कि वह दोपहर वाले गुंडे हैं जो उसे झाड़ियों में घसीट रहे हैं। यह 'बलात्कार जैसा अहसास' (Rape Fantasy) उसे पागल कर रहा था।

रमेश ने अपनी लुंगी हटाई और कामिनी की टांगें फैलाकर बीच में आ गया।

वह कामिनी के ऊपर लेटा, अपना लंड उसकी गीली चुत पर रगड़ने लगा।
लेकिन...
हकीकत कड़वी थी।
कामिनी का जिस्म आग की भट्टी बना हुआ था, लेकिन रमेश का लंड... वह एक मरा हुआ सांप था।

शराब ने रमेश की नसों को इतना सुन्न कर दिया था कि लाख कोशिशों के बाद भी उसका लंड खड़ा नहीं हो रहा था। वह बस एक मांस का लोथड़ा था जो कामिनी की जांघों के बीच लटक रहा था।
कामिनी को गुस्सा आया, लेकिन हवस उससे ज्यादा तेज़ थी।

उसने झटके से रमेश को पलटा और खुद उसके ऊपर चढ़ गई।
"लाओ... मैं करती हूँ..." कामिनी ने फुसफुसाते हुए कहा।
कामिनी ने ये बदलाव अचानक नहीं आया था, ये परिणाम था अब तक की कामिनी की कहानी का, उसके जीवन मे आये मर्दो का.

कामिनी ने रमेश के उस छोटे, सिकुड़े हुए और ढीले लंड को अपने हाथ में ले लिया।
कामिनी हैरान थी, उसने कभी रमेश के लंड पर इतना ध्यान नहीं दिया था, रमेश का लंड इतना छोटा और मुरझाया हुआ था की वह उसकी हथेली में ही खो गया। xv-26-p

कामिनी ने उसे अपनी मुट्ठी में भरकर रगड़ना शुरू किया। दो तीन बार झटके दिए, जैसे उसे जगा रही हो, होश मे ला रही हो.
लेकिन... कोशिश नाकाम रही. रमेश ना जाने जिस उत्तेजना मे, या फिर नशे मे ही कल्पना कर रहा था, उसका सर मजे से इधर उधर हो रहा था.

कोशिश नाकाम होते देख कामिनी झुकी और उस बेजान चीज़ को अपने मुंह में भर लिया।
"स्लप... चप... चप..."
वह उसे चूसने लगी, चाटने लगी।
वह अपनी जीभ से उसकी सुपारी को गुदगुदा रही थी, उसे खड़ा करने की हर मुमकिन कोशिश कर रही थी।
कामिनी की आँखें बंद थीं।

बंद आँखों में वह कल्पना कर रही थी कि उसके मुंह में रमेश की 'लुल्ली' नहीं, बल्कि कादर खान का वह 8 इंच का काला, सख्त और नसों वाला मुसल लंड है।
वह उस ख्याली लंड को गले तक उतार रही थी।

लेकिन हकीकत में, उसके मुंह में सिर्फ़ रमेश का ढीला मांस था जो बार-बार उसके होंठों से फिसल रहा था। 7093595
जब बहुत देर तक चूसने के बाद भी रमेश का लंड खड़ा नहीं हुआ, तो कामिनी हताश हो गई।

उसकी चुत इतनी गीली हो चुकी थी कि वहां से पानी बहकर रमेश के पेट पर गिर रहा था।
उसने हार मानकर रमेश के लंड को सीधा किया और अपनी गांड उठाकर उसके ऊपर बैठ गई।
उसने निशाना साधा और अपनी गीली चुत को उस ढीले लंड पर रख दिया।

वह धीरे-धीरे नीचे बैठी।
रमेश का लंड अंदर जाने की बजाय मुड़ गया और कामिनी की जांघों के बीच दब गया।
लेकिन कामिनी को परवाह नहीं थी।
वह पागलों की तरह रमेश के पेट और पेडू (Groin) पर उछलने लगी।

"चप... चप... चप... चप..."
उसकी भारी गांड रमेश के जांघों से टकरा रही थी।
कामिनी ने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं।
वह एक मानसिक भंवर (Mental Vortex) में फंस गई थी।
वह उछल रही थी, अपनी चुत रगड़ रही थी, और उसका दिमाग अलग-अलग मर्दों की तस्वीरों में उलझ गया था। 34504721

 कभी उसे लगता कि वह रघु के ऊपर बैठी है, वही रघु जिसने कामिनी की हवास और उत्तेजना को जगा दिया था, उसके निरस जीवन मे उन्माद घोल दिया था, उसे रघु के धक्के महसूस होने लगते।

 अगले ही पल चेहरा बदल जाता। उसे शमशेर की वर्दी और उसकी बेल्ट याद आती। उसे लगता शमशेर उसे अपनी ताकत से दबा रहा है।

 फिर अचानक कादर खान का चेहरा सामने आता, उसका नंगा बदन, तेल लगा शरीर और वहशीपन। कामिनी की रूह कांप जाती।

 और कभी-कभी उसे वो दो गुंडे दिखते, जो उसे नोच रहे थे।
कामिनी का दिमाग स्थिर नहीं था।
वह दुविधा में थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसे किसका लंड चाहिए।
उसे सबका चाहिए था।
वह एक साथ उन सभी मर्दों को भोगना चाहती थी।
वह रमेश के पेट पर अपनी चुत रगड़ते हुए सिसक रही थी, 
"आह्ह्ह... कादर... रघु... मारो... और ज़ोर से..."
वह अपनी हवस में इतनी अंधी थी कि उसे पता ही नहीं चला कि नीचे लेटा रमेश सो चुका है।

उसका लंड अभी भी ढीला और छोटा सा पड़ा था, जिस पर कामिनी अपनी चुत घिस-घिस कर लाल कर रही थी।
रमेश के खर्राटे गूंज रहे थे, और कामिनी अपनी अतृप्त प्यास के साथ उसके ऊपर उछल रही थी, पसीने से लथपथ, और अंदर से बिल्कुल खाली।
*****************

कामिनी किसी मशीन की तरह रमेश के ऊपर उछल रही थी। खाली मशीन जो सिर्फ चल रही थी, होना जाना कुछ नहीं था.
उसका दिमाग सुन्न था, लेकिन जिस्म सुलग रहा था।
कमरे में सिर्फ़ दो ही आवाज़ें गूंज रही थीं—रमेश के भारी खर्राटे और कामिनी की गीली चुत के रमेश के पेट से टकराने की आवाज़।
"पच... पच... पच... चप... चप..."
उसकी चुत से निकला हुआ कामरस और तेल मिलकर एक लसलसा कीचड़ बना चुके थे, जिसमें रमेश का वह ढीला और बेजान लंड पिस रहा था।

कामिनी की आँखें बंद थीं, वह ख्यालों में कभी रघु तो कभी कादर के नीचे दबी हुई थी।
तभी...
अचानक कामिनी की आँखें एक झटके से खुल गईं।
बाहर के सन्नाटे में एक जानी-पहचानी आवाज़ ने उसके कानों में दस्तक दी।
"छपाक... छप... छप... छपाक..."
पानी गिरने की आवाज़!
वही आवाज़...  जब उसने पहली बार कादर को आंगन में नंगा नहाते देखा था।

कामिनी का दिल "धक्" से रह गया। उसकी चुत जो अब तक सिर्फ़ रगड़ खा रही थी, अचानक उम्मीद से फड़कने लगी।
बिना एक पल गंवाए, कामिनी बिजली की रफ़्तार से रमेश के ऊपर से उतरी।
वह सम्पूर्ण नग्न थी। उसके भारी स्तन पसीने से चमक रहे थे, और जांघों के बीच चिपचिपापन था।

कामवासना में भीगी हुई कामिनी ने नंगे पैर खिड़की की तरफ दौड़ लगा दी।
उसने कांपते हाथों से परदा हटाया और बाहर अंधेरे में झांका।
सामने का नज़ारा देखकर कामिनी के मुंह से एक दबी हुई चीख निकल गई।
वहां, आंगन की पीली और धुंधली रोशनी में... कादर खान जा रहा था।
वह नहा चुका था और अपने स्टोर रूम की तरफ बढ़ रहा था।

वह बिल्कुल नंगा था।
कामिनी को उसका चेहरा नहीं दिखा, लेकिन जो दिखा उसने कामिनी की बची-खुची सांसें भी छीन लीं।
कादर का पिछला हिस्सा किसी राक्षस जैसा विशाल और मज़बूत लग रहा था।
उसकी चौड़ी पीठ पर पानी की बूंदें मोतियों की तरह चमक रही थीं।
नीचे... उसकी पतली कमर और उसके नीचे...
पत्थर जैसे सख्त और मांसल कूल्हे।
चलते वक़्त उसके कूल्हों की मांसपेशियां थिरक रही थीं, "मटक... मटक..."
हर कदम के साथ उसके जांघों और कूल्हों का वह कसाव साफ़ दिख रहा था।

 रमेश की ढीली त्वचा को छूने के बाद, कादर का यह कसा हुआ, फौलादी बदन कामिनी के लिए किसी दावत से कम नहीं था।
कामिनी उस हसीन दृश्य को देखकर चित्कार उठी।
वह खिड़की के कांच पर अपनी हथेलियां और नंगे स्तन दबाकर खड़ी हो गई।

"हाय... काश थोड़ी देर पहले आती..."
कामिनी का मन मसोस कर रह गया।
अगर वह थोड़ी जल्दी आती, तो शायद कादर को सामने से देख पाती। वह उस 'अजगर' को झूलते हुए देख पाती जिसके लिए वह अभी बिस्तर पर तड़प रही थी।

सिर्फ़ कादर की पीठ देखकर ही उसकी चुत में बाढ़ आ गई। उसे लगा जैसे कादर का लंड उसकी कल्पना में उसके अंदर घुस रहा है।
कादर स्टोर रूम का दरवाज़ा खोलकर अंदर चला गया।
अंधेरे ने उस 'देवता' को निगल लिया।

कामिनी ने एक गहरी, हताश सांस छोड़ी।
वह मुड़ी और बिस्तर की तरफ देखा।

वहां रमेश बेसुध पड़ा था।
मुंह खुला हुआ, टांगें फैली हुईं।
और उसके पैरों के बीच... वह छोटा सा, सिकुड़ा हुआ लंड पड़ा था।
उसके सुपारी के छेद पर दो बूंद गाढ़ा, चिपचिपा पानी लगा हुआ था।
वीर्य के नाम पर... बस एक थका हुआ, पानी जैसा डिस्चार्ज।
कामिनी ने घिन से मुंह फेर लिया।
"नपुंसक..." उसने मन ही मन कहा।

कहाँ वो दो बूंद पानी, और कहाँ कादर के जिस्म की वो आग। ज़मीन-आसमान का फर्क था।
कामिनी की नज़र वापस खिड़की की तरफ गई।
कादर अब वहां नहीं था। स्टोर रूम का दरवाज़ा बंद हो चुका था।

लेकिन तभी कामिनी के दिल में हवस के साथ-साथ एक और जज़्बा जागा— ममता और फ़िक्र।
"बेचारा... दिन भर से भागा-दौड़ा है। दोपहर में गुंडों से भी लड़ा। पता नहीं कुछ खाया भी होगा या नहीं?"
कामिनी का दिल पसीज गया।

"शायद भूखा हो..."
यह सिर्फ़ भूख की चिंता नहीं थी, यह कादर के पास जाने का एक बहाना भी था।
कामिनी ने फ़ौरन ज़मीन पर पड़े अपने उसी रेशमी गाउन को उठाया।
उसने उसे अपने पसीने और कामरस से भीगे नंगे बदन पर डाला।
ज़िप ऊपर खींची, जो उसके स्तनों को कसती हुई गले तक आ गई।

अंदर कुछ नहीं था—न ब्रा, न पैंटी। बस उसकी नंगी प्यास थी।
उसने अपने बालों को एक झटके से पीछे किया और नंगे पैर ही बेडरूम से बाहर निकल गई।
उसके कदम अब किचन की तरफ बढ़ रहे थे।
भूख तो दोनों को ही लगी थी.

(क्रमशः)

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1 Comments

  1. कामिनी को रवि और बंटी दोनों के साथ एक साथ मज़े दिलाए.

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