Ad Code

कामिनी 2.0 भाग -12

मेरी माँ कामिनी 2.0 - अध्याय-12


झोपड़ी के भीतर का तापमान बाहर की मूसलाधार बारिश से कहीं ज़्यादा गर्म हो चुका था। पीले बल्ब की मद्धम रोशनी कामिनी के भीगे बदन पर पड़कर उसे सोने जैसा चमका रही थी। कामिनी की नज़रें अभी भी ताऊजी की गीली धोती के उस उभरे हुए हिस्से पर गड़ी थीं, जहाँ वह 'विशाल अंग' किसी क़ैद में फँसे जानवर की तरह छटपटा रहा था।
ताऊजी ने बड़ी ही बेशर्मी दिखाते हुए कुर्ते के बटन खोले और एक झटके में उसे उतार दिया "सरररर.....!

कामिनी की आँखें फटी की फटी रह गई। 60 साल की उम्र में भी ताऊजी का बदन किसी जवान कसरती मर्द जैसा था। चौड़ा सीना, जिस पर सफ़ेद बालों की घनी झाड़ियाँ थीं, और मज़बूत बाजू जो मेहनत की गवाही दे रहे थे। ताऊजी ने अपना कुर्ता हाथ में लिया और उसे झोपड़ी के बीचों-बीच खड़े होकर निचोड़ने लगे।

जानबूझकर ताऊजी ने अपने शरीर को ऐसी लय में हिलाया कि हर झटके के साथ धोती के भीतर उनका भारी लंड हिचकोले खाने लगा। सफ़ेद भीगी धोती अब पारदर्शी हो चुकी थी, जिसके पीछे से उस काले और मोटे अंग का एक-एक इंच कामिनी की नज़रों को दावत दे रहा था। 
कामिनी के भीतर जैसे चींटियाँ रेंगने लगीं; उसकी चुत में एक ऐसी टीस उठी जिसने उसकी जाँघों को आपस में भींचने पर मजबूर कर दिया।

"सर्दी न हो जाए बहू... गाँव की बारिश बहुत ज़ालिम होती है," ताऊजी ने बड़ी मासूमियत से कुर्ता रस्सी पर टाँगते हुए कहा। 
फिर वे कामिनी के और करीब आए, उनकी आँखों में कामिनी का भीगा हुस्न चमक रहा था, "बहू, भीग तो तुम भी गई हो। शरीर से पानी नहीं निकाला तो बुखार चढ़ जाएगा। तुम भी अपनी साड़ी निचोड़ लो"

कामिनी सहम गई। उसके भीतर की बची-खुची मर्यादा ने एक आख़िरी चीख़ मारी, उसने 'ना' में सिर हिलाया।
"अरे बहु मुझ बूढ़े से क्या शर्माना, शरीर बहार से ठंडा है लेकिन अंदर से गर्म, पानी निचोड़ना जरुरी है "
ताऊजी कि बाते कामिनी को बहका रही थी, मजबूर कर रही थी, और हुआ भी वही कामिनी का शरीर दगा दे गया.

वह ताऊजी को 'बूढ़ा' सुन रही थी, पर देख एक 'जवान सांड' रही थी। उसे महसूस हुआ कि ताऊजी का लंड अब पहले से भी ज़्यादा मोटा और सख़्त होकर धोती को फाड़ने पर आमादा है।

उस 'भीमकाय' अंग के सम्मोहन के सामने कामिनी के संस्कारों की दीवार ढह गई। उसने कांपते हाथों से अपनी भीगी साड़ी का पल्लू कंधे से हटाया। एक-एक करके उसने साड़ी के लपेटों को अपनी कमर से आज़ाद करना शुरू किया।

जैसे-जैसे भीगा हुआ कपड़ा उसके बदन से अलग हो रहा था, कामिनी का निखरा हुआ गोरा मांस बाहर छलक रहा था। उसने साड़ी को पूरी तरह बदन से उतारा और उसे निचोड़ने लगी। स्लीवलेस ब्लाउज और पेटीकोट में भीगी खड़ी कामिनी किसी जलपरी जैसी लग रही थी।

 भीगा हुआ ब्लाउज उसके उन्नत स्तनों से इस कदर चिपका था कि उसके सख़्त और नुकीले निप्पल कपड़े को चीरकर बाहर आने की कोशिश कर रहे थे। 
पेटीकोट भी उसकी सुडौल जाँघों और मटकती गांड से चिपककर उसके जिस्म के हर उतार-चढ़ाव को नंगा कर चुका था।
ताऊजी के लंड ने कामिनी के इस अप्सरा रूप को देख एक ज़ोरदार झटका लिया। धोती के भीतर हुई उस हरकत को कामिनी ने बखूबी देखा।

"ईईईस्स्स्स......!"
कामिनी के मुँह से एक मदहोश सिसकारी निकली। उस लंड की एक हरकत ने कामिनी की चुत के कपाट खोल दिए। एक गर्म गाढ़ा रस उसकी जाँघों के बीच से बह निकला।
 वह अब एक साधारण औरत नहीं, बल्कि खुद को चुदासी कुतिया महसूस कर रही थी, जिसे अब सिर्फ़ और सिर्फ़ सामने झटके खाते लंड के अपनी टपकती चुत में समाने का इंतज़ार था।


कामिनी को चुपचाप सामने खड़ा पा कर ताऊजी के हौसले बढ़ते जा रहे थे, कामिनी कि चढ़ती सांसे, आपस मे रगड़ खाती जाँघे ताऊजी को असीम शक्ति दे रही थी.
ताऊजी ने मर्यादा की आख़िरी लकीर भी लाँघ दी।

 उन्होंने बिना किसी झिझक के अपनी धोती की गाँठ पर हाथ रखा और उसे एक झटके में खोल दिया।
'सरररर्रर्र...'  धोती का सूती कपड़ा ताऊजी की कमर से फिसलकर नीचे गिरा।

कामिनी का कलेजा जैसे मुँह को आ गया। उसे चीख़ना चाहिए था, उसे इस बुड्ढे की दरिंदगी और बेशर्मी पर तमाचा जड़कर बाहर बारिश में भाग जाना चाहिए था। लेकिन उसके संस्कारों की जंजीरें उस 'मर्दाना औजार ' को देखते ही पिघल कर बह गईं। ताऊजी ने धोती हाथ में लेकर उसे निचोड़ना शुरू किया, उनके नंगे बदन से पानी की बूंदें फिसलकर उनके पैरों के पास गिर रही थीं।

"ठंडा पानी बीमार कर देता है बहू... अब इस बुढ़ापे में बीमार होना अच्छी बात तो नहीं ना?," ताऊजी ने बहुत ही भारी और वहशी आवाज़ में कहा।
ताऊ ऐसे दिखा रहा था जैसे सब कुछ सामन्य है, आम बात है.

लेकिन कामिनी को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। उसके सामने ताऊजी का विशालकाय, काला और खौफ़नाक मोटा लंड किसी भूखे भेड़िये की तरह सिर उठाए हुंकार रहा था, वह बार-बार झटके ले रहा था, जैसे कामिनी की देह को चीरने के लिए बेताब हो।  28271640

ताऊजी के वे  अमरूद जैसे भारी अंडकोष (टट्टे )नीचे की तरफ लटके हुए थे, जो उनकी असाधारण मर्दानगी की गवाही दे रहे थे।
कामिनी की चुत के भीतर एक ऐसा सैलाब उमड़ा कि उसके पेटीकोट का अगला हिस्सा पूरी तरह तर हो गया। गीला पेटीकोट उसकी जाँघों से इस कदर चिपका था कि उसकी चुत का उभरा हुआ तिकोना उभार साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा था।

 कामिनी के होंठ सूख गए; उसने एक बार अपनी गुलाबी जीभ उन पर फेरी, लेकिन अंदर की उत्तेजना की आग ने उन्हें फिर से खुश्क कर दिया।
अब कामिनी के वश में कुछ नहीं था। वह किसी सम्मोहन में बंधी हुई, धीरे-धीरे अपने कदम ताऊजी की ओर बढ़ाने लगी। उसकी आँखों में सिर्फ़ वो 'लठ' जैसा अंग था। वह ताऊजी के इतना करीब पहुँच गई कि उसके भीगे हुए स्तनों की गर्मी ताऊजी के सीने को महसूस होने लगी।

कामिनी के कांपते हुए, दूध जैसे गोरे हाथ धीरे-धीरे आगे बढ़े और ताऊजी के उस सख़्त, नसदार और गर्म लंड पर जा टिके।
"अअअअअअअह्ह्ह्ह....... ईईईससससससस...!"
जैसे ही कामिनी की मखमली हथेलियों ने उस गर्म लोहे जैसे लंड को छुआ, झोपड़ी की दीवारों में एक साथ दो सिसकारियाँ गूँज उठीं। ताऊजी का जिस्म भी उस कोमल स्पर्श से थर्रा उठा।

"बहू....!" ताऊजी के मुँह से एक कराह निकली।
"ताऊजी...." कामिनी की आवाज़ में सिर्फ़ और सिर्फ़ प्यास थी।
जिस चीज़ के लिए कामिनी सुबह से तड़प रही थी, आखिरकार वो सख़्त मर्दाना चीज उसके हाथों की गिरफ्त में थी। ताऊजी के लंड की मोटाई इतनी थी कि कामिनी की उँगलियाँ उसे पूरी तरह घेर भी नहीं पा रही थीं। लंड कामिनी की मुट्ठी में धड़क रहा था, जैसे उसमें अपनी एक अलग जान हो।

 कामिनी अपने वजूद को संभाल पाने मे असमर्थ थी, उत्तेजना मे उसके पैर कांप रहे थे, खड़ा रहना मुश्किल था, कामिनी के घुटने धीरे-धीरे मुड़ने लगे, उसका रेशमी पेटीकोट जांघो पर चढ़ने लगा। वह तब जाकर रुकी, जब उसके थरथराते गुलाबी होंठ ठीक ताऊजी के उस काले, सख़्त और नसदार लंड के सामने आ गए।

ताऊजी के पैरों के बीच घुटनों के बल बैठी कामिनी किसी पुजारिन जैसी लग रही थी, जो अपने आराध्य के सामने नतमस्तक हो। ताऊजी अपनी साँसें रोककर नीचे देख रहे थे, उनके लिए यह सब किसी अजूबे से कम नहीं था। 
ऐसा कुछ उन्होंने आज से पहले नहीं देखा था.
कामिनी ने अपने कोमल हाथों से उस मज़बूत लंड को थामा और उसकी खाल को धीरे-धीरे पीछे की ओर धकेला। जैसे-जैसे चमड़ी पीछे हटी, लंड का वह गुलाबी, सख़्त और चमकता हुआ सुपाड़ा पूरी तरह उजागर हो गया।
  एक तीखी, मदहोश कर देने वाली मर्दाना गंध निकली, जिसने कामिनी के दिमाग के नसों को झकझोर दिया। कामिनी ने एक लंबी साँस खिंचते हुए सस्नेन्नीफ्फ्फ्फफ्फ्फ़.... सससन्नीफ्फ्फ्फफ्फ्फ़...  पसीने और मर्दानगी की खुशबू को अपने फेफड़ों में भर लिया।
वह अब पूरी तरह बेकाबू थी। कामिनी के होंठ गोल हुए और 'पच...! ' उसने उस सुपाड़े के ठीक मुहाने पर एक गहरा चुंबन जड़ दिया।

ताऊजी का पूरा बदन एक झटके के साथ सिहर उठा। उनके पैरों के अंगूठे मुड़ गए और रीढ़ की हड्डी में बिजली दौड़ गई। उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि किसी महिला के होंठों की मखमली छुअन उनके इस हिस्से को इतनी शिद्दत से महसूस होगी। 

ताऊजी का सिर दीवार से जा लगा और उनकी आँखें ऊपर चढ़ गईं।
पर कामिनी अभी रुकी नहीं थी। उसकी गुलाबी और गीली जीभ बाहर निकली और उसने उस सख़्त सुपाड़े को नीचे से ऊपर तक चाट लिया 'ससससल्लप्प्पप्प..... चट!'
जैसे स्वाद ले रही हो लंड का.
कामिनी ने वापस जीभ बहार निकाली इस बार जीभ लार से भरी हुई थी.
कामिनी की गीली और गुलाबी जीभ सुपाड़े के चारों ओर बनी उभरी हुई लकीर को बड़े ही प्यार से चाटने लगी, 'ससससल्लप्प्पप्प..... चट!' gif-blowjob-hugecock-huge-cock-bigcock-big-sucking-cocksucker-001

​जीभ का वह रेशमी अहसास जब ताऊजी के सख़्त अंग पर पड़ा, तो उन्हें लगा जैसे उनके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई हो। उनका मुँह आधा खुला रह गया और उनकी आँखें छत की लकड़ियों को घूरने लगीं।

कामिनी ने सुपाड़े के उस छोटे से छेद पर अपनी जीभ की नोक रख दी और उसे गुदगुदाने लगी। ताऊजी का लंड एक ज़ोरदार झटका लेकर हवा में उछला। cock-sucking-via-hot-girls-suck-dick
​"अअअअअहहहह... बहु... ये... ये क्या कर रही है तू?" ताऊजी की आवाज़ में एक मीठा दर्द और अकल्पनीय सुख मिला हुआ था।

कामिनी ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने अपने मुँह को और बड़ा खोला और उस भीमकाय सुपाड़े को धीरे-धीरे अपने मुँह के गर्म अंधेरे में उतार लिया। 'चप... चप... चप...' की आवाज़ झोपड़ी की दीवारों से टकराने लगी। Hot-sexy-asian-sucking-long-dick-blowjob-high-resolution कामिनी ने अपनी जीभ को ताऊजी के  गुलाबी हिस्से के इर्द-गिर्द घुमाना शुरू किया। जैसे-जैसे उसकी लार सुपाड़े को गीला कर रही थी, ताऊजी का होश उड़ते जा रहे थे.


 कामिनी ने अब उस पूरे अंग को अपनी मुट्ठी में लिया, उसे मुँह के करीब लाई। और धीरे धीरे जितना हो सकता था अपने होंठो को लंड के ऊपर धकेलने लगी, प्यार से नजाकत से अपना सर पीछे करती, फिर आगे को धकेल देती.
ताऊजी तो ऐसा सुख पा कर मरा जा रहा था, होश उड़ चुके थे.
आज तक उसने अपनी मर्दानगी से, अपने लंड से सिर्फ औरतों को सुख दिया था.
आज पहली बार कोई औरत उसे सुख दे रही थी और ऐसा जो कि कल्पना मे भी नहीं था. gifcandy-black-and-white-19
"आआहहहह...... बहु, ऐसा भी होता है" 
ताऊजी का हाथ बेसाख्ता कामिनी के भीगे बालों में जा फँसा। उनके लिए यह अनुभव किसी स्वर्ग से कम नहीं था।
"हे भगवान इस बुढ़ापे मे बिन मांगे ये क्या दे दिया?" ताऊ ऊपर मुँह किये बड़बड़ा रहा था.
नीचे कामिनी गो.. गो... वेक... वेक.... करती ताऊजी के लंड को निगल रही थी, चाट रही थी.
बूढ़े लंड के स्वाद ने उसे पागल कर दिया था, उसकी आंखे बंद हो कर खुल जाती, 
थूक और लार कि एक लकीर से बन गई थी.
ताऊजी का लंड कामिनी के थूक से साना हुआ था.
ताऊ कामिनी के बालो को सहला रहा था, कमर हिला रहा था.
कामिनी लंड को और अंदर लेने का सोचती लेकिन उसे महसूस हुआ कि ताऊजी का लंड और भी मोटा हो गया है, मुँह कि चमड़ी खींचने लगी थी.
लंड कि एक एक नस साफ दिख रही थी.
हमफ्फ्फ्फफ्फ्फ़... उउउफ्फ्फ.... हमफ्फफ्फ्फ़.... कामिनी ने एक झटके मे लंड को बहार निकाल दिया, होंठो के कोने जैसे फट गए थे.

जैसे ही कामिनी ने ताऊजी के लंड को अपने मुँह से आज़ाद किया, चट.. टट.. कि आवाज़ के साथ लंड ताऊजी के पेट से जा चिपका। कामिनी की लार और थूक से सना हुआ वह काला मूसल बल्ब की पीली रोशनी में किसी चिकने पत्थर की तरह चमक रहा था।

 लार की एक महीन और रेशमी लकीर लंड के सुपाड़े से रिसती हुई ताऊजी के अंडकोषों की गहरी घाटी तक जा रही थी।
कामिनी की नज़रें अब उन  दो विशालकाय टट्टों पर जम गई थीं। उसने आज तक किसी मर्द के अंडकोष इतने बड़े, इतने भारी और इतने सख़्त नहीं देखे थे। उसे कुत्ते के लंड के नीचे वाली वह गाँठ याद आ गई, जो कुतिया के भीतर फँस जाती है। कामिनी का हाथ अनजाने में ही आगे बढ़ा और उसने उन दोनों भारी गोलों को अपनी हथेली में भर लिया।
29722496
"ईईईस्स्स्स...... अअअअहहहह" ताऊजी का शरीर धनुष की तरह तन गया।
कामिनी ने अपनी आँखें मूंद लीं और अपनी गुलाबी जीभ बाहर निकाली। उसने उन अंडकोषों की झुर्रियों वाली काली त्वचा को बड़े ही चाव से चाटना शुरू किया 'ससससल्लप्प्पप्प..... सल्लप!'  जीभ का वह गर्म और गीला अहसास जब उन भारी अंडों पर पड़ा, तो ताऊजी के मुँह से ऐसी चीख़ निकली जैसे उनकी रूह निकल गई हो।  42578661

कामिनी अपनी नाक उन टट्टों के बीच घुसाकर उस तीखी मर्दाना महक को सूंघ रही थी। उसने एक टट्टे को अपने पूरे मुँह में भरने की कोशिश की, जैसे वह कोई रसीला फल हो।
ताऊजी की हालत अब ऐसी थी कि वे न तो खड़े रह पा रहे थे और न ही गिर पा रहे थे। 21548219 उनका हाथ कामिनी के भीगे कंधों को कसकर पकड़े हुए था। "बहू... तू तो... तू तो जादूगर है... मेरा दम निकल जाएगा... आआहहह!"
आज पाई बार ताऊजी को अहसास हुआ कि उसका लंड फट पड़ेगा, बरसो से जमा वीर्य नस फाड़ कर बहार आ जायेगा.
हमफ्फ्फ्फफ्फ्फ़... हमफ्फ्फ्फफ्फ्फ़.... ताऊजी हांफ रहे थे जीवन मे पहली बार.
कामिनी का मुरीद हो गया था ये बूढ़ा.
कामिनी अब पागलपन की हद तक उत्तेजित थी। उसने टट्टों को छोड़कर अपनी उंगलियों को ताऊजी के लंड के निचले हिस्से, जहाँ से वो पहाड़ जैसा लंड शुरू होता था, वहाँ रगड़ना शुरू किया।

 कामिनी की चुत से निकलता मदहोश कर देने वाला रस अब उसके पेटीकोट को पार कर पैरों से होता हुआ नीचे की मिट्टी को कीचड़ में तब्दील कर चुका था। कामिनी का दूसरा हाथ बेसाख्ता उसकी जाँघों के बीच जा धँसा, जहाँ मांस की वो दो पंखुड़ियाँ किसी पके हुए फोड़े की तरह कसक रही थीं। उत्तेजना और दवा के असर ने उसे उस मुकाम पर पहुँचा दिया था जहाँ जिस्म दर्द और आनंद के बीच की लकीर भूल जाता है।
​"आआहहहह....!"
​कामिनी के मुँह से एक चीख़ निकली। उसकी नाभि के नीचे जैसे कोई ज्वालामुखी फटने को तैयार था। उसने अपनी ऊपर चढ़ी हुई आँखों से ताऊजी के चेहरे को देखा, जहाँ वहशीपन और मर्दानगी का सैलाब उमड़ रहा था। कामिनी ने उस भारी, गर्म और धड़कते हुए लंड को अपनी मुट्ठी में और कस लिया, उसे अपने गुलाबी गालों पर रगड़ा और अपनी सारी मर्यादा को बारिश के पानी में बहाते हुए फुसफुसायी:
​"ताऊजी... ये... ये डाल दो मेरे अंदर! फाड़ दो मुझे... अब और बर्दाश्त नहीं होता!"
कामिनी इतनी मजबूर इतनी बेशर्म कभी ना थी.
हवस ने आज उस से वो बुलवा दिया था जो किसी भी संस्कारी औरत, बड़े घर कि बहु के लिए पाप था.
लेकिन हवस मे डूबी कामिनी ने ये पाप कर ही दिया.

ताऊजी ने जैसे ही ये सुना, उनका सब्र का बाँध टूट गया। ताऊजी खुद फटना चाहते थे, उसे भी अपनी मंजिल नजर आ रही थी.

उन्होंने कामिनी की बाहों को पकड़ा और उसे झटके से खड़ा किया। कामिनी का भीगा सुलगता बदन ताऊजी के नंगे और गर्म सीने से जा टकराया। कामिनी के सख़्त निप्पल ताऊजी की छाती पर ऐसे चुभे जैसे कोई काँटा धँस गया हो। ताऊजी का हाथ जैसे ही कामिनी के पेटीकोट के नाड़े तक पहुँचा कि तभी........

धड़ाम.... धाड़... धमममममम....!
​झोपड़ी के कच्ची लकड़ी के दरवाज़े से किसी के ज़ोरदार तरीके से टकराने की आवाज़ आई। पूरा छप्पर हिल गया। अभी कामिनी और ताऊजी अपनी साँसें सँभालते कि बाहर से भौ... भौ... भौ... और कीचड़ में तेज़ भागते क़दमों का शोर सुनाई दिया।

​हवस का वो मायाजाल पल भर में कांच की तरह टूट कर बिखर गया। दोनों धरातल पर आ गिरे। ताऊजी ने बिजली की फुर्ती से अपनी धोती उठाई और उसे कमर पर लपेट लिया। जैसे ही उन्होंने दरवाज़ा खोला, सामने का नज़ारा देख उनके होश उड़ गए।

​नीचे कीचड़ में लथपथ लकी पड़ा हुआ था, उसका चेहरा खौफ से सफ़ेद था। "आआहहम.. बचाओ काका!" खेत की रखवाली करने वाले उस खूँखार कुत्ते ने लकी की पिण्डली को अपने जबड़ों में दबोच रखा था। 

दूसरी तरफ बिट्टू कीचड़ में पागलों की तरह दौड़ रहा था और उसके पीछे खेत की वही कुतिया लगी हुई थी जिसे कुछ देर पहले कामिनी ने देखा था। 
जानवर चोर बदमाशों को सूंघ लेते है, 

​"हट.. हट.... शु... सु....!" ताऊजी ने अपना भारी लठ हवा में लहराया और कुत्ते की तरफ दौड़े।
​डंडे की मार के डर से कुत्ते ने लकी का पैर छोड़ा और खेतों की तरफ भागा। कुत्ते का हटना था कि लकी लँगड़ाता, गिरता-पड़ता बिट्टू के पीछे अपनी जान बचाकर भाग खड़ा हुआ। 

ताऊजी का चेहरा गुस्से से लाल था, उनकी आँखों में उस 'अधूरे मिलन' की खीझ साफ़ दिख रही थी। बाहर बारिश अब थम चुकी थी, सिर्फ पेड़ों से पानी टपकने की आवाज़ आ रही थी।
​ताऊजी जब पीछे पलटे, तो देखा कि कामिनी वापस अपनी भीगी साड़ी पहन चुकी थी। उसका सिर शर्म और आत्मगीलानी के बोझ से झुका हुआ था। जिस औरत ने अभी-कुछ पल पहले खुद को पूरी तरह नंगा कर दिया था, अब वो अपनी ओढ़नी के पीछे अपनी रूह को छुपाने की नाकाम कोशिश कर रही थी।

​"मममम... मुझे माफ़ कर देना ताऊजी," कामिनी की आवाज़ कांप रही थी। वो ताऊजी की नज़रों से बचती हुई झोपड़ी के दरवाज़े से बाहर निकल गई।

​दूर से आवाज़ आई—"माँ.. माँ....!"
​पगडंडी के मोड़ पर बंटी और फागुन चले आ रहे थे। कामिनी ने अपने बिखरे बाल सँभाले और खुद को सामान्य करने की कोशिश की।

कामिनी का दिल इस वक्त क्रोध और हवस की दोहरी आग में जल रहा था। वह खुद से नफ़रत कर रही थी कि उसने ताऊजी के सामने घुटने टेक दिए, लेकिन उसका अतृप्त शरीर अब भी उस भीमकाय लंड की छुअन के लिए तड़प रहा था।

  वह रूहानी और कामुक वक़्त बीत चुका था,  सुहाना मौसम एकाएक उमस और कामिनी को खीज से भर गया था, 
कामिनी धीमे कदमो से बंटी और फागुन के साथ हवेली कि ओर चल दी, पीछे ताऊजी अपने खड़े लंड के साथ खड़े रह गए.
********************

हवेली लौटते ही कामिनी की हालत किसी ऐसी हिरणी जैसी थी जो अभी-अभी किसी शिकारी के चंगुल से छूटकर आई हो। उसने रसोई में जाकर लोटे से गटा-गट दो गिलास पानी गले के नीचे उतार लिया, जैसे वह किसी तपते रेगिस्तान से बरसों बाद लौटी हो। लेकिन वह पानी उसके गले की खुश्की तो दूर कर सकता था, पर जाँघों के बीच सुलगती उस आग को बुझाने में पूरी तरह नाकाम था।
कामिनी बिना किसी से बात किए, बदहवास सी सीधे बाथरूम की तरफ भाग खड़ी हुई। उसे अपने शरीर पर लगे ताऊजी कि मर्दानगी की गंध को धोना था।

"ये माँ जी को क्या हुआ बंटी? इतनी गुस्से में क्यों लग रही हैं?" फागुन ने अपनी मासूम आँखों से बंटी की ओर देख कर पूछा।
बंटी ने एक शरारती मुस्कान अपने होंठों पर दबाई। वह देख चुका था कि झोपड़ी से निकलते वक्त कामिनी के बाल बिखरे थे और चेहरा सुर्ख लाल था। "अरे कुछ नहीं पगली, साड़ी खराब हो गई ना माँ की कीचड़ में, बस उसी बात पर भड़क रही हैं।"

बंटी जानता था कि फागुन को सच समझाना नामुमकिन है। और वैसे भी, हवस और क्रोध में डूबी औरत से पंगा लेना अपनी सेहत खराब करने जैसा है।


सेहत तो कहीं और भी बुरी तरह खराब हो चुकी थी। गाँव की तंग गलियों में लकी और बिट्टू एक-दूसरे के कंधे पर हाथ धरे, लंगड़ाते और कराहते हुए चले जा रहे थे।

"आअह्ह्हब.... आउच.... उउफ्फ्फ! हरामखोरों ने दौड़ा-दौड़ा के काटा है यार। मेरा तो मांस ही निकाल लिया साले ने," लकी अपनी फटी हुई पैंट को पकड़कर रो रहा था।
"साला सबसे बड़ा हरामी तू है! तुझे क्या ज़रूरत थी उन कुत्तों को पत्थर मारने की?" बिट्टू ने चिढ़ते हुए लकी को झिड़का। "आराम से अपना काम हो जाता, पर नहीं, तुझे तो उँगली करनी थी।"

"अबे! वो साले कुत्ते चुदाई करके बीच रास्ते में चिपके पड़े थे। रास्ता रोक रहे थे मेरा, तो मैंने हटाना चाहा। मुझे क्या पता था कि वो साले इतना बुरा मान जाएँगे," लकी ने सिसकते हुए सफाई दी।

"तू है ही मनहूस... ले आ गया हकीम साहब का घर।"
धड़... धाड़... धाड़!
बिट्टू ने लकड़ी के पुराने दरवाज़े पर ज़ोर-ज़ोर से दस्तक दी। 
चरररररर..... दरवाज़ा खुला और सामने हकीम लकड़द्दिन प्रकट हुआ। मुँह में पान दबाए, आंखों पर मोटा चश्मा चढ़ाए हकीम ने उन्हें ऊपर से नीचे तक निहारा।
"अंम्म्म्म... मियाँ! ये क्या हुलिया बना रखा है? कुश्ती लड़ के आ रहे हो या किसी के बाग से अमरूद चुराते पकड़े गए?" हकीम ने पीक थूकते हुए पूछा।

"हकीम साहब बचा लो! मर जाऊँगा मैं... ज़हर चढ़ जाएगा!" लकी आव देखा न ताव, सीधा हकीम के पैरों में गिर पड़ा और बिलखने लगा।
"अबे होशियार! कुत्ते ने काटा है, सांप ने नहीं। इतना नाटक क्यों कर रहा है?" बिट्टू ने लकी के पिछवाड़े पर एक लात जमाई।

"कुकुर... काट गिया? मसला वाकई गंभीर है मियाँ। आओ, अंदर तशरीफ़ लाओ," हकीम ने रास्ता छोड़ा।
अंदर का नज़ारा किसी कबाड़खाने से कम नहीं था। पुरानी पीली पड़ चुकी किताबें, जड़ी-बूटियों की पोटलियाँ और कांच की हज़ारों शीशियाँ यहाँ-वहाँ फैली पड़ी थीं। धूल और पुरानी दवाइयों की एक तीखी गंध हवा में तैर रही थी।

"वो क्या है ना मियाँ, अकेले रहते हैं। बुढ़ापे में क्या-क्या देखें, क्या-क्या समेटें," हकीम बड़बड़ाया।
लकी बिना कुछ सोचे पास पड़ी एक धूल भरी मेज़ पर पेट के बल लेट गया। हकीम अपनी कुर्सी पर बैठा और अपनी धुंधली आँखें मलीं। उसने गौर से दोनों के चेहरों को देखा और अचानक उसकी भौहें तन गईं।

"अंम्म्म्म... मियाँ! तुम तो वही हो ना, जिसने उस दिन हवेली पर छोड़ा था हमें?" हकीम ने उन्हें पहचान लिया।
बिट्टू सकपका गया। वह नहीं चाहता था कि कोई भी उनकी पहचान हवेली से जोड़े। 

"अबे हकीम! कितनी बात करता है बे... दवा कर जल्दी," बिट्टू बुदबुदाया।
"कुछ कहा मियाँ?"
"नहीं, नहीं... मेरा मतलब, हाँ हम वही हैं। आपने सही पहचाना। अब ज़रा इसका घाव देखिये," बिट्टू ने बात पलटी।
हकीम ने लकी के जख्म पर एक काला लेप लगाना शुरू किया। काम करते-करते हकीम के दिमाग में हवेली की वो रात घूमने लगी। "बीबी जी कैसी हैं?" हकीम ने अचानक पूछा।
"कौन बीबी? किसकी बीबी? हमारी शादी कब हुई बे?" बिट्टू चिढ़कर बोला।
"अम्मा... मियाँ! मेरा मतलब वो हवेली वाली सुगंधा की बहू... कामिनी जी?" हकीम की आवाज़ में एक अजीब सी चमक थी।
कामिनी का नाम सुनते ही बिट्टू के सीने में जलन का तूफान उठा। उसी औरत की वजह से तो ये दिन देखने पड़ रहे है। 

"ठीक है... ठीक है... मज़े में है वो। हम वहीं से आ रहे थे कि इस मनहूस को कुत्ते ने काट लिया।"
"हाय मर गया! हकीम साहब आराम से... सुई मत चुभोना!" लकी फिर से चीख पड़ा.
*************************

शाम के 7 बज चुके थे। आसमान का रंग गहरा नीला हो गया था और गाँव की गलियों में मेलों के ढोल-नगाड़ों की हल्की आवाज़ गूँजने लगी थी। हवेली के भीतर कामिनी खुद को कमरे में कैद किए हुए दिन के उस झकझोर देने वाले हादसे से बाहर आने की नाकाम कोशिश कर रही थी।
बाथरूम में ठंडे पानी की बौछार के नीचे उसने अपनी उस उत्तेजना को शांत करने की कोशिश तो की थी, लेकिन ताऊजी के उस 'भीमकाय मर्दाने लंड' का ख्याल किसी साये की तरह उसके ज़हन से चिपका हुआ था। नाभि के नीचे अब भी एक मीठी सी हरारत और टीस बाकी थी।

रमेश दावत के लिए तैयार हो रहा था,
"पापा! आप और माँ जाओ सरपंच की दावत में," बंटी ने चारपाई से उठते हुए रमेश की तरफ देखा।
रमेश ने आईने में अपनी मूंछें ताव देते हुए पूछा, "क्यों? तू नहीं चलेगा? सरपंच साहब ने खास तौर पर बुलाया है।"

"अरे पापा, गाँव के दूसरे छोर पर मेला लगा है। मैं और फागुन वहाँ जा रहे हैं। सरपंच के घर आप बूढ़ों की बातों के बीच मैं तो बोर ही हो जाऊँगा ना," बंटी ने बड़ी चालाकी से फागुन की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए कहा। फागुन के चेहरे पर भी मेले के नाम से एक चमक आ गई थी।

रमेश खिलखिला कर हँसा, "ठीक है भाई... मजे करो! सही कह रहा है, हमारे बीच क्या करेगा तू। जा, फागुन को भी घुमा ला।"

बंटी और फागुन ने चोर नज़रों से एक-दूसरे को देखा।  जैसे ही वे दोनों बाहर निकले, रमेश ने अंदर की तरफ आवाज़ लगाई:
"कामिनी.... ओ कामिनी! तैयार हो जाओ भई, सरपंच साहब के यहाँ चलना हैं ना?"

कामिनी बिस्तर पर लेटी छत के पंखे को घूमते हुए देख रही थी। रमेश की आवाज़ उसके कानों में किसी आदेश की तरह पड़ी। उसका बिल्कुल भी मन नहीं था कि वह कहीं बाहर जाए। ताऊजी के साथ जो कुछ हुआ, उसकी ग्लानि अब उसके मन पर हावी हो रही थी। लेकिन वह जानती थी कि रमेश को मना करने का मतलब है, आग को हवा देना,

उसने एक लंबी साँस ली और भारी कदमों से अलमारी की तरफ बढ़ी। जैसे ही उसने अलमारी खोली, उसकी नज़रें अपनी साड़ियों पर थमीं। रह-रहकर उसकी जाँघों के बीच वही थरथराहट हो रही थी। 

"मन तो नहीं है, पर जाना तो पड़ेगा ही," उसने बुदबुदाते हुए एक गहरे लाल रंग की साड़ी निकाली।
 कामिनी ने साड़ी के लपेटे अपने बदन पर चढ़ाने शुरू किए, पर उसके हाथ अब भी कांप रहे थे।

क्रमशः 

Buy me a wine 

kamukwine@ptyes
andywine@ptyes




Post a Comment

7 Comments

  1. Kamuk update bhai
    Naso me pura ufan la diya
    Ye sala Ramesh ke ghar me atom bomb har din fatne ko tayyar hai par isko sutli bomb fodna hai
    Sahi kaha hai kisi ne Ghar ki murgi daal barabar
    Haweli me kuch ghamasan ho jaye
    Agle kamuk update ka intezar hai

    ReplyDelete
  2. Sammohit kar dene wala update
    Fir bhi 12 update ho gaye kamini abhi bhi pyasi hai
    Please uski pyas bhujne do
    Yaha kamini nahi pathak tadap rahe samja karo yaar

    ReplyDelete
  3. Ekdam majedar update tha
    Ab bas haweli ka nazara dekhna
    Jaldi se raha nahi jata

    ReplyDelete
  4. एकदम शानदार और रोमांचक अपडेट.
    बस इतना सा अफसोस है कि ताऊजी के हाथ से मौका चला गया.

    ReplyDelete
  5. Ek dam land fadu update tha bhai maza agaya ab bas chudai ho jati to aur maza ajata

    ReplyDelete
    Replies
    1. कामुक वाइनApril 22, 2026 at 9:03 AM

      मुझे ताज्जुब हो रहा है, कामिनी वासना मे जल रही है या आप लोग?
      खेर जो अब होगा आप पाठको के मन मुताबिक ही होगा.
      कादर के कहानी मे आने का वक़्त आ गया है.
      अब वो कैसे आएगा? कामिनी कि प्यास कैसे बुझेगी,? बस उस चीज के लिए धैर्य रखे, जो होगा आपकी सोच से दुगना होगा

      Delete
  6. Is baar jab kadar aur kamini ka milan hoga to yaadgar ho
    Do bichde premi milenge
    to ek dusre ka khoob sath denge
    Sab laaj sharm chodke hawas ka khel chalega
    pehli baar se bhi ghamasan aur haiwaniyat bhara
    Soch ke hi rongte khade ho rahe hai

    ReplyDelete