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कामिनी 2.0, भाग -23

मेरी माँ कामिनी 2.0 - अध्याय 23

धड़... धाड़... धाड़.....
हकीम लकड़द्दीन के दवाख़ाने का पुराना लकड़ी का दरवाज़ा बुरी तरह पीटा जा रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे बाहर खड़ा शख़्स अभी चौखट ही उखाड़ देगा।
"अरे मियाँ... कौन है? दरवाज़ा उखाड़ देगा क्या!" अंदर से हकीम की झुँझलाई हुई आवाज़ आई।

चरररर.... पुरानी कब्ज़ों की आवाज़ के साथ दरवाज़ा खुला।
दरवाज़ा खुलते ही हकीम की नज़र सामने खड़े विशालकाय साये पर पड़ी।
"मैं क्या... मियाँ... ये पहाड़ मेरे दरवाज़े पे कहाँ से आ गिरा?" हकीम ने अपनी आँखों पर चढ़ा मोटा चश्मा उतारा, उसे अपने कुर्ते से साफ़ किया और वापस पहनकर एक बार फिर ऊपर से नीचे तक उस फौलादी जिस्म को हैरत से देखा।

"हम्म्म्म.... मियाँ... कौन हो भाई?" हकीम ने अपनी सफ़ेद दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए पूछा।
"सुलेमान कहते हैं मुझे.... आदाब फरमा रिया हूँ," सुलेमान ने अपनी भारी आवाज़ में नज़ाकत का नाटक करते हुए कहा।

शायद उसे अपनी पैनी नज़र से इल्म हो गया था कि सामने कमर से झुका हुआ ये बूढ़ा शख़्स कोई मामूली इंसान नहीं है। इसके चेहरे की झुर्रियों में भी एक अजीब सी शातिर चमक थी।

"अरे, तुम तो अपनी ज़बान के जान पड़ते हो बरखुरदार... बताओ, क्या मर्ज़ लाए हो?" हकीम ने अपनापन दिखाते हुए पूछा।

"वो... बुखार है..." सुलेमान ने रूखेपन से जवाब दिया।
"तौबा तौबा... मियाँ! इतना बड़ा और मज़बूत शरीर लिए घूमते हो और कहते हो बुखार आ रिया है?" हकीम ने सुलेमान के गठीले बाज़ुओं को देखकर ताना मारा।
"हकीम साब... मुझे नहीं... वो हवेली वाली मालकिन को बुखार है।"

"क्या के रे हो?"
जैसे ही हकीम के कानों में 'हवेली की मालकिन' (कामिनी) का नाम पड़ा, उसके सुन्न पड़े जिस्म में जैसे बिजली दौड़ गई। उसके कान खड़े हो गए और चेहरे पर एक अजीब सी ठरकी चमक आ गई। कामिनी के जिस्म का वो हसीन ख़याल उसके दिमाग़ में नाचने लगा।

"अ..मममम... मियाँ... कामिनी बीबी जी को बुखार आ गिया? ऐसा कैसा हो गिया? रुको मियाँ, मैं अपना झोला लेता हूँ, ख़ुद चलकर हवेली आता हूँ," हकीम ने उतावली दिखाते हुए वापस अंदर मुड़ने की कोशिश की।

"साला ठरकी बूढ़ा..." सुलेमान ने उसकी नीयत भाँपते हुए मन ही मन फुसफुसाया। सुलेमान को ये आदमी एक नज़र में ही खटक गया था।

"ज़्यादा नहीं है हकीम साब... बस बुखार की दवाई दे दो। बड़े बाबू ने सिर्फ़ दवाई लाने को ही कहा था... ये लो पैसे," सुलेमान ने अपनी जेब से निकले मुड़े-तुड़े दस-बीस के नोट हकीम की हथेली पर रख दिए और उसका रास्ता रोक लिया।

पैसे हाथ में आते ही हकीम का खिला हुआ चेहरा एक पल में ही उतर गया। उसे लगा जैसे कोई बहुत बड़ा ख़ज़ाना या हसीन मौक़ा उसके हाथ से फिसल गया हो।
"रुको मियाँ...."
बुझे हुए मन और लटके हुए चेहरे के साथ हकीम अंदर गया और अपनी अलमारी से एक लाल दवा की शीशी निकाल लाया।
"ये लो... बोल देना दो बून्द गरम पानी में मिलाकर पी लें, छूमंतर हो जाएगा सारा मर्ज़।" हकीम ने शीशी सुलेमान के हाथ में थमाई।
धड़ाम....!

अगले ही पल हकीम ने सुलेमान के मुँह पर दरवाज़ा ज़ोर से बंद कर दिया। करता भी क्यों नहीं? सारा मूड जो ख़राब कर दिया था इस पहाड़ जैसे आदमी ने।

"अजीब लोग हैं यहाँ के..." सुलेमान ने दरवाज़े को घूरते हुए बड़बड़ाया और लाल दवा की शीशी अपनी जेब में डालकर वापस हवेली की तरफ़ चल पड़ा।

लाल दवा की शीशी जेब में डाले सुलेमान धूल भरे कच्चे रास्ते पर लंबे-लंबे डग भरता हुआ हवेली की तरफ़ लौट रहा था। 
तभी... ट्रिन.... ट्रिन....
उसकी पैंट की जेब में रखा भारी-भरकम फोन वाइब्रेट होने लगा। सुलेमान ने झल्लाहट में फोन बाहर निकाला, लेकिन स्क्रीन पर चमकता हुआ नाम देखते ही उसके क़दम वहीं ज़मीन पर जम गए।

"बड़ा भाई"
ड्रगवर्ल्ड में सुलेमान के नाम से लोग काँपते थे, लेकिन इस एक नाम को स्क्रीन पर देखते ही सुलेमान जैसे फौलादी और बेख़ौफ़ इंसान के माथे पर भी पसीने की ठंडी बूँदें चमक उठीं। उसने गले में अटके हुए थूक को निगला और फोन कान से लगा लिया।

"ह... हेलो... हाँ, बड़ा भाई..." सुलेमान की भारी आवाज़ में पहली बार एक अजीब सा अदब और हल्की सी घबराहट थी।
"कहाँ है तू सुलेमान? दो दिन से ऑफिस में शक्ल नहीं दिखाई..." दूसरी तरफ़ से एक बेहद ठंडी, लेकिन ख़तरनाक आवाज़ गूँजी।

"बड़ा भाई... बस उसी काम में उलझा था। कादर की गर्दन मरोड़ कर सीधा आपके पास वापस आ जाऊँगा," सुलेमान ने सफाई देते हुए कहा।

"छोड़ उसे! गोली मार कादर को... उसकी गर्दन तो बाद में भी मरोड़ लेंगे," बड़ा भाई ने बीच में ही बात काटते हुए एक कड़क हुक्म दिया।
"सुन... अभी एक बहुत बड़ी विदेशी पार्टी आई है। बहुत मोटा माल चाहिए उन्हें। तू कल शाम की पहली फुर्सत में सैंपल का माल लेकर निकल जा और ये डील फाइनल करके आ। करोड़ों का मामला है सुलेमान, इसमें मुझे कोई चूक नहीं चाहिए। कादर को भूल जा अभी।"
ब्ला... ब्ला... ब्ला.... वहाँ स्टेशन पर ही हरीश मिल जायेगा तुझे, उस से बाकि समझ लेना.
(हरीश 22 साल का सभ्य लड़का, बड़ा भाई का आदमी, गुंडा नहीं है, पढ़ा लिखा लड़का है फर्राटा इंग्लिश बोलता है, पार्टी से कम्युनिकेशन का काम यही करता है )

टिक....
दूसरी तरफ़ से फोन झटके से कट गया।
सुलेमान अपने कान से फोन हटाकर स्क्रीन को घूरता रह गया। पल भर में ही उसके चेहरे के भाव पूरी तरह से बदल चुके थे। जो आँखें कुछ देर पहले कादर के खून की प्यासी थीं, उनमें अब करोड़ों की डील की चमक और एक अजीब सी बेबसी तैरने लगी।

लेकिन फोन जेब में रखने के बाद, ना जाने क्यों, आज पहली बार सुलेमान के चेहरे पर किसी करोड़ों की डील की ख़ुशी नहीं थी। उसका फौलादी जिस्म और शातिर दिमाग़ एक अजीब सी कशमकश में फँस गया था। कहीं ना कहीं कामिनी के गदराए और दहकते हुए हुस्न का आकर्षण उसे इस गाँव में रुकने के लिए बुरी तरह बाध्य कर रहा था। कल उसने उस हुस्न की जो झलक देखी थी, वो उसके दिमाग़ से उतर ही नहीं रही थी।

लेकिन सुलेमान कोई गली का आवारा आशिक़ नहीं था; वो एक खूँखार क्रिमिनल था। उसने अपने भटकते दिमाग़ को झकझोरा और खुद को समझाया, 

"काम तो करना ही पड़ेगा... इस काम कि वजह से ही तो दुनिया में मेरी इज़्ज़त है, रुतबा है। पावर रहेगी तो ऐसी औरतें तो आती-जाती रहेगी।"

सुलेमान ने हताश मन से अपनी जेब में हाथ डाला और हकीम की दी हुई लाल दवा की शीशी को बाहर निकाला। उसने उस शीशी को एक गहरी नज़र से देखा, एक बुझी हुई साँस छोड़ते हुए उसने शीशी वापस जेब में डाल ली और बुझे मन से भारी क़दमों के साथ हवेली की तरफ़ बढ़ चला।

हवेली के आँगन में दाखिल होते ही, काला और कांडी उसकी तरफ़ लपके। उनकी आँखों में कादर के सुराग़ की ख़ुशी और पैसे की चमक साफ़ दिख रही थी।
"भाई... भाई.... बहुत बड़ी ख़बर है!" काला ने उतावलेपन में फुसफुसाते हुए कहा।

लेकिन सुलेमान का दिमाग़ पहले से ही बड़ा भाई के हुक्म और कामिनी के ख़यालों में उलझा हुआ था।

"रहने दो अब..." सुलेमान ने हाथ के इशारे से उसे टोकते हुए पूरी तरह अनसुना कर दिया। अभी उसे कोई ख़बर नहीं सुननी थी।
तभी सामने से रमेश आता हुआ दिखाई दिया। उसने बढ़िया इस्त्री किए हुए कपड़े पहने थे, बालों में कंघी थी और चेहरे पर रौनक थी,

"हाँ भाई सुलेमान..... ले आए दवाई?" रमेश ने सुलेमान को देखते ही बड़ी बेपरवाही से कहा।
सुलेमान ने जेब से वो लाल शीशी निकालकर रमेश की तरफ़ बढ़ानी चाही।

"मुझे मत दे, जाकर अंदर मालकिन को दे आ," रमेश ने हाथ हिलाकर टालते हुए कहा। "और हाँ, ताऊजी आएँ तो अपना आज का हिसाब उनसे समझ लेना।"
इतना कहकर रमेश ने अपने जूते पहने और बिना एक पल गँवाए, हवेली के मुख्य दरवाज़े से बाहर निकल गया

सुलेमान दबे क़दमों से उस शांत और भारी सन्नाटे में डूबे कमरे के दरवाज़े पर पहुँच गया था।
"मैडम.... ममम... मतलब कामिनी जी..." सुलेमान की भारी, लेकिन दबी हुई आवाज़ कमरे में गूँजी।
उसने देखा कल तक चाहकने वाली कामिनी जिसे देखकर कल उसकी नीयत डोल गई थी, आज एक बेसुध और निर्जीव पुतले की तरह बिस्तर पर पड़ी है। उसका गोरा चेहरा बुखार की तपन से लाल हो रहा था।
सुलेमान ने धीरे से दरवाज़ा धकेला और अंदर दाखिल हो गया।
"ससससस.... सुलेमान... तुम?"
कामिनी अचानक किसी अनजान मर्द की आवाज़ सुनकर खौफ़ से चौंकी। उसने हड़बड़ा कर पलटने की कोशिश की, लेकिन बीती रात की बर्बरता ने उसके जिस्म का ऐसा हाल कर दिया था कि ज़रा सा हिलते ही वो दर्द के मारे दोहरी हो गई। उसकी रीढ़ और जाँघों के बीच से एक भयानक टीस उठी।

"लेटे रहिये.... कल वाकई आपने बहुत काम किया है, बुखार आना लाज़मी था।"
सुलेमान ने करीब आते हुए कहा। उसकी हमेशा खौफ़ पैदा करने वाली आवाज़ में आज वो कड़कपन नहीं था, बल्कि एक अजीब सी नरमी थी।
सुलेमान की ये बात सुनकर दर्द से कराहती कामिनी के सूखे होंठों पर एक बेबस और तंज़ भरी मुस्कान तैर गई। 
"इतने बड़े पहाड़ जैसे फौलादी जिस्म के मालिक को ये समझ ही नहीं आया कि मुझे ये बुखार किस मेहनत और किस काम से आया है..." कामिनी ने मन ही मन सोचा।

सुलेमान ने पास ही रखी मेज़ से काँच का गिलास उठाया, उसमें जग से पानी डाला और अपनी जेब से हकीम की दी हुई लाल दवा की शीशी निकालकर उसकी दो बूँदें उसमें टपका दीं।
"रमेश बाबू ने हकीम के पास से दवा मँगवाई थी... पी लीजिये," सुलेमान ने गिलास कामिनी की तरफ़ बढ़ाते हुए कहा।
कामिनी में उठकर बैठने की ताक़त नहीं थी। सुलेमान ने अपना भारी, खुरदरा और फौलादी हाथ कामिनी की पीठ के नीचे लगाया और उसे सहारा देकर हल्का सा ऊपर उठा दिया।
"ईईईस्स्स्स....."

कामिनी के मुँह से एक सिसकी निकल गई। उसका पूरा जिस्म बुखार से भट्टी की तरह जल रहा था, लेकिन फिर भी सुलेमान के गर्म, मर्दाना और मज़बूत स्पर्श ने उसके अंदर की सुन्न पड़ी नसों में एक अजीब सी सिहरन दौड़ा दी। 
गट.. गट... गटक....

कामिनी ने बिना कुछ सोचे-समझे एक ही साँस में वो पूरा लाल पानी पी लिया।
पानी हलक के नीचे उतरा ही था कि अचानक कामिनी का दिमाग़ झन्ना गया। उसे एकदम से याद आया कि हकीम से तो वो ख़ुद भी वही दवा लेकर आई थी! रात भर चले वहशीपन, दर्द और बेशर्मी ने उसके दिमाग़ के सारे फ्यूज़ उड़ा दिए थे। पकड़े जाने के खौफ़ और गिल्ट में उसे याद ही नहीं रहा, वो सुबह से बेवजह दर्द मे डूबी हुई थी.

"अच्छा, मैं जाता हूँ..."
सुलेमान ने शीशी वहीं मेज़ पर रखते हुए कहा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी उदासी और बेबसी थी। "इस गाँव में मेरा काम ख़त्म हुआ। अब कहीं और ढूँढूँगा कुछ काम।"

सुलेमान ने जैसे अपनी आख़िरी विदा लेनी चाही। 
बड़ा भाई का हुक्म उसे यहाँ से जाने पर मजबूर कर रहा था।
ये सुनते ही कामिनी का दिल जैसे अचानक किसी ने मुट्ठी में भींच लिया। उसकी आँखों में एक अजीब सी नमी आ गई। ना जाने क्यों, उसे सुलेमान का इस तरह हमेशा के लिए जाना बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा था। अभी कल ही तो उसने सुलेमान कि मर्दानगी को महसूस किया था (स्टोर रूम मे ).

औरत की फितरत और हवस की गहराई भी कितनी अजीब होती है। अभी रात भर वो एक बूढ़े के फौलादी लंड से बुरी तरह चुदी थी, उसका जिस्म दर्द से चीख रहा था, लेकिन उसके बावजूद...  उस बेशर्म 'औरत' को अब इस नए, गठीले और ताक़तवर मर्द का साथ चाहिए था। एक नया मर्द, कामिनी बहुत बदल चुकी थी, मर्द उसकी कमजोरी बनते जा रहे थे.

सुलेमान ने एक आख़िरी बार कामिनी के उदास और दहकते हुए चेहरे को देखा, और भारी क़दमों से कमरे के दरवाज़े की तरफ़ बढ़ गया।
सुलेमान दरवाज़े की चौखट तक पहुँच चुका था। उसने बाहर निकलने के लिए अपना क़दम उठाया ही था कि न जाने किस अनजानी कशिश ने उसे एक आख़िरी बार पीछे मुड़कर देखने पर मजबूर कर दिया।
और जैसे ही उसने पीछे मुड़कर देखा... उसके भारी क़दम वहीं चौखट पर पत्थर की तरह जम गए।
कामिनी अब करवट बदलकर पेट के बल लेट चुकी थी। दर्द और बुखार की वजह से उसका जिस्म निढाल था, लेकिन इस अवस्था में उसका गदराया हुआ, भरा-पूरा जिस्म किसी तिलिस्म की तरह पूरी तरह से नुमाया हो रहा था। बिस्तर पर बेचैनी से हिलने की वजह से उसका ढीला-ढाला नाइट गाउन खिसक कर घुटनों तक चढ़ गया था। गाउन के नीचे से उसकी गोरी, सुडौल और गदराई हुई पिंडलियाँ बाहर झाँक कर मद्धम रोशनी में चमक रही थीं।
पेट के बल लेटने की वजह से उसकी कमर का गहरा घुमाव और उसके भारी नितंबों (गांड) का उभार बिल्कुल ऊपर की तरफ़ उभर आया था। 
कामिनी का बेसुध, निढाल और अनजाने में बना कातिलाना पोज़ इतना मनमोहक और मादक था कि सुलेमान जैसा खूँखार और पत्थर-दिल आदमी भी अपनी सुध-बुध खो बैठा।

 कमरे के सन्नाटे में कामिनी का गदराया हुआ वजूद किसी चुंबक की तरह काम कर रहा था। सुलेमान की चील जैसी नज़रें भारी उभार और गोरी पिंडलियों पर ऐसी गड़ गईं कि वो चाह कर भी पलकें नहीं झपका पा रहा था।

सुलेमान का मन हुआ कि अभी आगे बढ़कर उस गदराए हुस्न को दबोच ले। उसके अंदर का सोता हुआ जानवर पूरी ताक़त से फन उठा रहा था। उसका दिल किया कि अपने बुलडोज़र जैसे भारी कद-काठी के नीचे कामिनी  के नाज़ुक जिस्म को मसल कर रख दे, रोंद डाले इस हुस्न को अपनी आदिम मर्दानगी से...

लेकिन सुलेमान अपने धंधे के ईमान का पक्का था। वो अपनी हवस के हाथों बिकने वाला मामूली आवारा नहीं था। उसने एक गहरी, सुलगती हुई साँस खींची और अपनी जाँघों के बीच अंगड़ाई लेते बेकाबू पौरुष को हाथ से थपथपाकर नीचे दबाया।
 "पहले काम सुलेमान.... फिर दूसरा काम।"

उसने खुद को एक ठंडी और बेरहम घुड़की दी। उसके लिए दोनों कामों में बहुत बड़ा अंतर था। सुलेमान ने झटके से अपना मुँह मोड़ा और भारी डग भरता हुआ कमरे से बाहर चल दिया।

थोड़ी ही देर में दिन पूरी तरह ढल गया और गाँव के बाहरी छोर पर स्याह अँधेरा छा गया। सन्नाटे को चीरते हुए सियार रो रहे थे। गाँव से दूर, झाड़ियों के पीछे छुपी अपनी काली SUV के बोनट पर पैर लटकाए सुलेमान बैठा हुआ था। मद्धम अँधेरे में उसकी महँगी सिगार की लाल चिंगारी सुलग रही थी, जिससे उसका चेहरा रह-रह कर खौफ़नाक तरीके से चमक उठता था।

तभी साए की तरह रेंगते हुए काला और कांडी गाड़ी के पास पहुँचे।
"भाई... कादर फ़ौजा सिंह की हवेली पर है। वहीं छुपा रहता है आजकल। और वो जो हवेली वाले बड़े बाबू (रमेश) हैं, वो भी अभी-अभी सज-धज कर वहीं गए हैं," काला ने हाँफते हुए पूरी लोकेशन सुलेमान के सामने उगल दी।
"हम्म्म्म....."
सुलेमान ने सिगार का एक लंबा कश खींचा। धुएँ का घना बादल हवा में छोड़ते हुए उसका शातिर दिमाग़ तेज़ी से नफ़ा-नुक़सान का हिसाब लगाने लगा।

"डील के लिए कल शाम को निकलना है, यानी मेरे पास अभी पूरी रात का वक़्त है। जब कादर मिल ही गया है, तो उसे ज़िंदा छोड़ने का कोई तुक बनता ही नहीं है, 
क्या फ़र्क़ पड़ जाएगा," सुलेमान की आँखों में मौत की ठंडी चमक कौंध गई।

उसने अपनी पैंट की गहरी जेब में हाथ डाला और नोटों की एक मोटी, कड़कती हुई गड्डी निकाली। उसने वो गड्डी सीधे काला और कांडी की तरफ़ उछाल दी।
"लो... जाओ, ऐश करो!"

"भाई... भाई... भाई.... आप तो हमारे माई-बाप हो भाई!"
नोटों की वो भारी गड्डी हाथ में आते ही काला और कांडी के चेहरे ख़ुशी से पागल हो गए। वो दोनों सुलेमान के पैरों में इस कदर गिर पड़े जैसे वो उनका भगवान हो।

"बस... बस... ज़्यादा चापलूसी मत करो," सुलेमान ने अपनी भारी, कड़क आवाज़ में डाँट पिलाई। "चलो, फुटो अब यहाँ से! कोई काम रहा तो खुद फोन करूँगा।"

सुलेमान की घुड़की सुनते ही काला और कांडी तुरंत नोटों की गड्डी सँभालते हुए अँधेरे में चम्पत हो गए।
अब उस सुनसान रास्ते पर सुलेमान अकेला था। उसने अपनी सिगार को पैर से कुचला और अँधेरे में विलीन हो गया। उसकी काली, SUV वहीं झाड़ियों के बीच किसी सोए हुए दैत्य की तरह छुपी हुई थी, 
***************
रात का गहरा और स्याह साया फ़ौजा सिंह की हवेली पर उतर चुका था। हवेली के पिछवाड़े बने एक बड़े और एकांत बाग़ीचे (गार्डन) में आज एक ख़ास महफ़िल सजी हुई थी।
धीमी आँच पर पकते गोश्त और मसालों की तीखी, जानी-पहचानी खुशबू पूरे बाग़ीचे की हवा में तैर रही थी।भट्टी की कमान कादर खान के हाथों में थी, जो गोश्त पकाने में अपने हुनर का आख़िरी कतरा मिला रहा था।

"वाह कादर... वाह! क्या खुशबू उठ रही है! क्या बनाते हो यार तुम..."
रमेश ने अपने हाथ में पकड़े काँच के गिलास से शराब का एक बड़ा घूँट भरते हुए बेपरवाही से कहा। शराब के नशे ने उसे खुसबू लेने कि अतिरिक्त ताकत दे दी थी, 

"शुक्रिया बड़े बाबू, बस मुझे ये बनाने का शौक है," कादर ने भट्टी की आँच तेज़ करते हुए एक मुस्कान के साथ जवाब दिया।
लेकिन इस जश्नी माहौल के बीच फ़ौजा सिंह का चेहरा थोड़ा तनाव में था। वो बार-बार हवेली के बड़े लोहे के गेट की तरफ़ देख रहा था।

"ये शमशेर कहाँ मर गया साला... अभी तक आया क्यों नहीं?" फ़ौजा सिंह ने अपनी बेचैनी व्यक्त की।
"आ जाएगा फ़ौजा जी, आप तब तक अपना जाम तो पियो," रमेश ने हँसते हुए कहा। साले पियक्कड़ रमेश को शराब के अलावा कुछ और सूझता ही कहाँ था।
सर्र... खड़-खड़...

तभी बाग़ीचे की बाउंड्री से लगी घनी झाड़ियों में एक तेज़ सरसराहट की आवाज़ हुई।
रमेश की नज़र झटके से उस तरफ़ गई।
"कुत्ता होगा कोई... ऐ हट! हट... भाग यहाँ से!" फ़ौजा सिंह ने ज़मीन से एक कंकड़ उठाया और उसी दिशा में ज़ोर से फेंक मारा। "साले मटन की खुशबू सूँघ कर आ जाते हैं," फ़ौजा सिंह बड़बड़ाया और वापस अपनी मेज़ की तरफ़ मुड़कर अपना पेग बनाने में व्यस्त हो गया।
लेकिन वो कोई कुत्ता नहीं था।

उसी अँधेरी झाड़ी के ठीक पीछे मौत का सौदागर घात लगाए बैठा था। अँधेरे के बीच से चमकती हुई सुलेमान की चील जैसी आँखें सीधे उस महफ़िल पर गड़ी हुई थीं।

"साला कादर... यहाँ सुकून से मटन बना रहा है। बड़ा भाई का माल हथिया कर यहाँ दावत उड़ा रहा है साला..."

झाड़ियों के पीछे छिपे सुलेमान के मज़बूत जबड़े गुस्से से कसमसा उठे। उसके दाँत आपस में बुरी तरह भींच गए। उसकी आँखों के ठीक सामने उसका शिकार ज़िंदा खड़ा था, लेकिन अंडरवर्ल्ड के तजुर्बे ने सुलेमान को सिखाया था कि शिकार पर छलाँग लगाने का वक़्त एकदम सही होना चाहिए। अभी वक़्त सही नहीं था।
तभी दूर से सन्नाटे को चीरती हुई एक भारी आवाज़ गूँजी..

"धड़... धड़... धड़... धड़..."
"लो... आ गया शमशेर!" रमेश ने बुलेट की जानी-पहचानी आवाज़ सुनकर खुशी से कहा।
अँधेरे को चीरती हुई बुलेट की तेज़ पीली हेडलाइट ने एक पल के लिए पूरे बाग़ीचे को जगमगा दिया और फिर झटके से बुझ गई।
बूटों की भारी आवाज़ के साथ शमशेर बाग़ीचे में आ पहुँचा।

"नमस्ते फ़ौजा सिंह जी, कैसे याद किया आज?"
शमशेर ने अपनी रौबदार आवाज़ में मुछो पर ताव देते हुए पास रखी एक खाली कुर्सी खींच कर सँभाल ली।
झाड़ियों में छिपे सुलेमान की आँखें शमशेर को देखते ही ख़ून से लाल हो गईं।

शमशेर को यहाँ देख एक पल को सुलेमान का दिमाग़ घूम गया, लेकिन थोड़ी ही देर मे उसे सारा माजरा समझ आ गया,

"साला हरामी पुलिस वाला कुत्ता... पैसा हर महीने मुझसे लेता है, और चाकरी यहाँ इन दोगलों की कर रहा है!"

सुलेमान की भारी मुट्ठियाँ गुस्से से इस कदर भींच गईं कि उँगलियों की हड्डियाँ कड़कड़ा उठीं। उसने मन ही मन फैसला कर लिया "अब कादर अकेला नहीं मरेगा। इस दोहरे चरित्र वाले कुत्ते शमशेर का किस्सा भी आज रात ही निपटा दूँगा। सुलेमान को धोखेबाज़ बर्दाश्त नहीं!"

इधर महफ़िल में शराब का दौर तेज़ हो गया था।
"और भाई रमेश... अब क्या प्लान है आगे का?" शमशेर ने अपने लिए एक कड़क पेग बनाते हुए पूछा।
"प्लान क्या है भाई... कल सुबह पहली फुरसत में वापस शहर निकल जाना है। अपनी नौकरी भी तो देखना है। यहाँ गाँव का काम सँभालने के लिए फ़ौजा जी हैं ना," रमेश ने, बड़ी ही लापरवाही और गुरूर से जवाब दिया।
सब कुछ सामान्य लग रहा था, लेकिन तभी...

"नहीं रमेश..."
फ़ौजा सिंह के मुँह से निकली एक बेहद ठंडी, सपाट और ख़तरनाक आवाज़ ने महफ़िल के सारे सन्नाटे को जमा कर रख दिया।
"तुम कल नहीं जा पाओगे..."

फ़ौजा सिंह के चेहरे पर अब कोई मेज़बान वाली मुस्कान नहीं थी। उसकी आँखों में एक लालच और कोई गूढ बात तैर रही थी जिसने एक ही पल में हवा का रुख़ बदल दिया।

"कक्क... क्यों... कक्क.... क्या हुआ फ़ौजा जी?"
शमशेर और रमेश... दोनों के हाथों में पकड़े काँच के गिलास वहीं हवा में जम गए। रमेश के हलक से एक हकलाती हुई, घबराई हुई आवाज़ निकली।

"सुनो रमेश... क्या तुम मोटा पैसा कमाना चाहते हो?" फ़ौजा सिंह ने आगे की तरफ़ झुकते हुए अपनी आवाज़ को इस कदर धीमा और रहस्यमयी कर लिया, जैसे उसे कोई बहुत बड़ा ख़ज़ाना हाथ लग गया हो।

"अरे फ़ौजा जी... पैसा किसको प्यारा नहीं होता?" रमेश की आँखों में लालच की एक नंगी चमक साफ़ दिखाई दे रही थी। शमशेर भी अपना काँच का गिलास होंठों से लगाए आश्चर्यचकित होकर फ़ौजा सिंह को देख रहा था।
"कल रात मेरे एक करीबी का फ़ोन आया था... नैनीताल से...
रात के उस सन्नाटे में फ़ौजा सिंह की भारी आवाज़ गूँजी।
'नैनीताल!'
ये नाम सुनते ही घनी झाड़ियों के पीछे घात लगाए बैठे सुलेमान के कान कुत्तों की तरह खड़े हो गए। उसके शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई। ये शब्द वो आज दूसरी बार सुन रहा था। दिन में 'बड़ा भाई' के मुँह से, और अब इस बूढ़े फ़ौजा सिंह के मुँह से! सुलेमान का शातिर दिमाग़ तेज़ी से कड़ियाँ जोड़ने लगा।

"तो... क्या बात हुई?" शमशेर ने गिलास नीचे रखते हुए अपनी जिज्ञासा दिखाई।
"सुनने में आया है कि विदेश से कोई बहुत बड़ी पार्टी आई है। उन्हें नंबर एक क्वालिटी का कच्चा माल चाहिए," फ़ौजा सिंह ने बोलना जारी रखा।
रमेश और शमशेर दोनों के कान खड़े हो गए।

"आखिर कब तक हम ये एक किलो-दो किलो माल चुप्पे-चोरी बेचते रहेंगे? रमेश... तुम्हारी हवेली का पूरा तहखाना कच्चे माल से भरा पड़ा है। सोचो, अगर वो सारा का सारा माल एक ही बार में उस विदेशी पार्टी को बिक गया, तो कितना पैसा आएगा हम लोगों के पास!" फ़ौजा सिंह लगभग फुसफुसाता हुआ बोला, लेकिन उसकी आवाज़ में लालच का पूरा तूफ़ान था।

झाड़ियों में छिपे सुलेमान के जबड़े गुस्से से कसमसा उठे। "मादरचोद! तो ये बात है... ये चिंदी चोर साले बड़ा हाथ मारने का सपना देख रहे है, सुलेमान का खून खौलने लगा।
इधर मेज़ पर, रमेश की तो जैसे साँसें ही रुक गई थीं। उसका बनिया दिमाग़ मन ही मन पैसों का हिसाब लगाने लगा था।
"कक्क... क्या सच में ऐसा हो सकता है?" शमशेर ने कौतूहल से पूछा।
"हो क्यों नहीं सकता! बिल्कुल होगा... बस उस पार्टी को अपना माल दिखाना होगा, उन्हें मनाना पड़ेगा, उनके साथ उनके ही तरीके से डील करनी पड़ेगी। अब ज़ाहिर सी बात है, ये काम कोई अनपढ़ गँवार तो कर नहीं सकता। ये काम कोई पढ़ा-लिखा, सूट-बूट वाला आदमी ही कर सकता है," फ़ौजा सिंह ने एक सवालिया निगाह से दोनों को देखा।
शमशेर और रमेश एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे।
"सोच क्या रहे हो? रमेश है ना! अपना ऑफिस लाइन का आदमी... पढ़ा-लिखा, शहर का बाबू," फ़ौजा सिंह ने आख़िरकार अपना पासा फेंक ही दिया।

"कक्क.... क्या... ममम... मैं...?"
रमेश का सारा नशा एक पल में काफ़ूर हो गया। "मैं कैसे...??" रमेश के हाथ-पाँव फूलने लगे। उसका दिल पसलियाँ तोड़कर बाहर आने को हो गया। वो अंदर से एक डरपोक शराबी था, अंडरवर्ल्ड माफ़ियाओं के साथ डील करना उसके बस की बात कहाँ थी!
उसकी क्या यहाँ बैठे किसी के बस कि बात नहीं थी.

लेकिन शमशेर को ये बात बिल्कुल सटीक जची।
"भाई रमेश, ये सुनहरा मौका है! ये डील अगर एक बार हो गई ना, तो वो पार्टी हमेशा हम से ही माल लेगी। आख़िर कब तक ये साला पुलिस की वर्दी पहनकर, सरकारी नौकरी करके और चिंदी रिश्वत लेकर हम लोग अपना काम चलाएंगे?" शमशेर की आँखों में अपना सुखद भविष्य नज़र आने लगा था। उसे अपने रिटायरमेंट के बाद विदेश में एक आलीशान घर दिखने लगा था।

"लललल.... लेकिन मैं... मैं कैसे कर सकता हूँ ये सब?..."
रमेश की सच में गांड फटी पड़ी थी। वो एक सीधा-सादा, लालची लेकिन डरपोक इंसान था। ये गोलियों और माफ़ियाओं का खेल उसके बस की बात नहीं थी।
ये सब उसकी औकात से बड़ा खेल था.

"समझो रमेश! यही मौका है। बहुत से बड़े-बड़े लोग उस विदेशी पार्टी को पटाने में जुटे हुए हैं। भाई... कम से कम 100 करोड़ तक का पैसा मिल सकता है इस माल का!" फ़ौजा सिंह ने जैसे रमेश के दिमाग़ में एक बम फोड़ दिया।

"कक्क... कक... क्या... 100 करोड़??" रमेश के होश फाख्ता हो गए।
"हाँ! और क्या? विदेशी लोग हैं, उनके पास खूब पैसा होता है। सुनने में आया है कि जो बंदा ये डील करने आ रहा है, वो दुनिया के सबसे बड़े ड्रग बादशाह का दायाँ हाथ है," फ़ौजा सिंह ने अपनी बात को और मज़बूत करते हुए कहा।
कुछ तो नाम है उसका पप्लू.. नहीं पाबलो... हाँ हाँ.... पाबलो एस्कॉबर ( Pablo Escobar)
उसका राइट हैंड ये डील करने आया है.
रमेश और शमशेर ने इस नाम पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, शायद वो इस नाम से परिचित नहीं थे, या सोच के बैठे थे सब नाम एक जैसे होते है विदेशियों के 

गरीब और लालची आदमी सपने ऐसे ही देखता है, वो एक छोटी सी चिंगारी को भी पकड़ता है ताकि पूरे जंगल में आग लगा सके। लेकिन रमेश अभी भी काँप रहा था।
"लललल... लेकिन... मैं... मैं.. कैसे..." उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि ये सब हकीकत में कैसे मुमकिन है।
"रमेश बेटा, देख... मैं अब बूढ़ा हो चला हूँ," फ़ौजा सिंह ने एक गहरा और जज़्बाती कार्ड खेलते हुए कहा

 "सुगंधा के साथ मिलकर मैंने ये छोटा सा धंधा शुरू किया था। वो अब रही नहीं। अब थोड़े-थोड़े माल बेच-बेच के भी कितना कर लेंगे हम? जीवन भर अफीम उगा-उगा कर इन छोटे, चिंदी लोगों में बेचेंगे, तो क्या कभी सुकून की और रईसी की ज़िंदगी जी पाएंगे?"
फ़ौजा सिंह आज अपने जीवन के पूरे तजुर्बे और शातिरपन का इस्तेमाल कर रहा था।

"रमेश, इस भारत में क्या रखा है? पूरी ज़िंदगी गधों की तरह कमाओ और फिर एक दिन कुत्ते की मौत मर जाओ। सोच... अगर ये डील हो गई, तो एक-दो साल में हम इतना पैसा कमा लेंगे कि सब कुछ समेट कर हमेशा के लिए विदेश में सेटल हो जाएंगे..."
और आख़िरकार... '100 करोड़' और 'विदेश में सेटलमेंट' के तिलिस्म ने अपना काम कर दिया।

रमेश का काँपता हुआ दिल काबू में आने लगा। बेशुमार दौलत का ख़याली सुख, जो कुछ देर पहले तक उसे डरा रहा था, अब उसकी रगों में एक ख़तरनाक हिम्मत का संचार करने लगा था। उसकी आँखों से डर की धुंध छँटने लगी और उसकी जगह एक अंधे, वहशी लालच ने ले ली।

"ठ... ठीक है... मैं कोशिश करूँगा। जाऊँगा माल का सैंपल लेकर," आख़िरकार रमेश ने काँपती आवाज़ में हाँ भर ही दी।
शराब के गहरे नशे और 100 करोड़ की बेशुमार दौलत के लालच ने उसकी सारी कायरता को निगल लिया था। एक डरपोक इंसान जब लालच की दलदल में उतरता है, तो वो मौत को भी भूल जाता है। रमेश के साथ भी ठीक वैसा ही हो रहा था।

लेकिन फिर भी, उसके अंदर का डर पूरी तरह ख़त्म नहीं हुआ था। उसने गिलास को मेज़ पर पटकते हुए एक शर्त रखी, "लेकिन मैं अकेला नहीं जाऊँगा... मुझे मेरे साथ कोई मज़बूत आदमी चाहिए।"
"कादर को साथ ले जा, उसमें क्या समस्या है?" शमशेर ने भट्टी के पास खड़े कादर खान की चौड़ी पीठ और गठीले जिस्म की तरफ़ इशारा करते हुए कहा। "हट्टा-कट्टा और चौड़ा बंदा है। रास्ते में कोई मुसीबत आई तो अकेला ही दस लोगों से निपट लेगा।"
"नहीं शमशेर... तूने शायद पूरी बात ध्यान से नहीं सुनी," फ़ौजा सिंह ने तुरंत इस सुझाव को ख़ारिज करते हुए एक गहरी और गंभीर आवाज़ में कहा।

फ़ौजा सिंह वाक़ई एक बेहद काबिल, शातिर और समझदार इंसान था। उसकी नज़रें बहुत दूर तक का ख़तरा भाँप लेती थीं। उसने माहौल को और संगीन बनाते हुए कहा, "वहाँ नैनीताल में सिर्फ़ विदेशी पार्टी नहीं होगी, वहाँ और भी कई बड़े ड्रग माफ़िया भी आएँगे। और समझ कर चल कि...'बड़ा भाई' के आदमी भी वहाँ ज़रूर होंगे।"

'बड़ा भाई' का नाम सुनते ही झाड़ियों में बैठे सुलेमान के होंठों पर एक क्रूर मुस्कान आ गई।
"मैंने तो यहाँ तक सुना है कि आज तक उस 'बड़ा भाई' को किसी ने देखा तक नहीं है। कौन जानता है वो कौन है, कैसा दिखता है, या वो ख़ुद वहाँ होगा या नहीं?"

 फ़ौजा सिंह ने बीड़ी सुलगाते हुए कहा। "कादर पहले से ही उनके निशाने पर है। अगर कादर वहाँ धोखे से भी 'बड़ा भाई' के किसी आदमी के हाथ लग गया या किसी ने उसे पहचान लिया... तो समझो हमारा ये सपना शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो जाएगा। वो लोग कादर के साथ-साथ तुम्हारी भी बोटियाँ काट देंगे।"
फ़ौजा सिंह की इस दलील में इतना वज़न था कि महफ़िल में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया।
रमेश कि रीढ़ मे डर कि सिरहन दौड़ गई.
"ये तो हमने सोचा ही नहीं था..." शमशेर ने अपना माथा खुजाते हुए कहा।

"मतलब कादर को साथ ले जाना ख़तरे से खाली नहीं है... बल्कि वो ख़ुद एक चलता-फिरता ख़तरा है," रमेश ने दारू का एक और बड़ा घूँट भरते हुए अपनी घबराहट ज़ाहिर की।

"हम्म्म्म...... ठीक समझे," फ़ौजा सिंह ने हामी भरी।
"तो फिर किसे ले जाऊँ अपने साथ? कोई तो ऐसा चाहिए जो बॉडीगार्ड की तरह मेरे साथ खड़ा रहे!" रमेश अब पूरी तरह से फ़ौजा सिंह पर निर्भर हो चुका था।
फ़ौजा सिंह के झुर्रियों वाले चेहरे पर एक बेहद शातिर और शैतानी मुस्कान उभर आई।

"देखो रमेश... मेरे पास एक आईडिया है। अगर हमने उस तरीके को इस्तेमाल किया, तो हमारा काम बनने के, और उस विदेशी पार्टी को अपनी तरफ़ खींचने के चांस सौ गुना बढ़ जाएँगे।"
"कक्क... क्या आईडिया है?"
रमेश और शमशेर के साथ-साथ भट्टी पर गोश्त भून रहे कादर के कान भी फ़ौजा सिंह की तरफ़ झुक गए।
और सिर्फ़ वही नहीं... बाग़ीचे की घनी झाड़ियों के पीछे, अँधेरे में घात लगाए बैठे सुलेमान के भी कान पूरी तरह से चौकन्ने हो गए। सुलेमान को भी अब ये जानने की भयंकर बेताबी हो रही थी कि ये बूढ़ा आखिर ऐसा कौन सा मास्टरप्लान बनाने जा रहा है.

"रमेश... तुम्हें किसी भी बॉडीगार्ड या गुंडे की ज़रूरत नहीं है। तुम ठहरे शहरी, ऑफिस लाइन के पढ़े-लिखे बाबू। तुम जैसे हो, बिल्कुल वैसे ही जाओ... एक शरीफ़ टूरिस्ट (Tourist) बनकर," फ़ौजा सिंह ने अपनी सबसे ख़तरनाक चाल चलते हुए कहा। "और अगर मेरी बात का बुरा ना मानो तो... इस ट्रिप पर कामिनी बहू को अपने साथ ले जाओ।"
'कामिनी!'

इस एक नाम के महफ़िल में गूँजते ही जैसे वक़्त एक पल के लिए ठहर गया। रमेश बुरी तरह सकपका गया। लेकिन महफ़िल में और झाड़ियों के पीछे मौजूद हर मर्द के जिस्म में जैसे 440 वोल्ट का करंट दौड़ गया।
यहाँ मौजूद हर शख़्स उसके पति के अलावा कामिनी के गदराए हुस्न और उसके दहकते यौवन का अँधा दीवाना था।

"क्या फ़ौजा जी... कामिनी किसी काम की नहीं है। उसे सिर्फ चौके चूल्हे से ही मतलब है, उल्टा कुछ काम ना बिगड़ दे वो साथ जा कर?" रमेश ने हताशा में अपना पेग बनाते हुए कहा। उसका बनिया दिमाग़ खेल में अपनी बीवी को शामिल करने के इस आईडिया को पूरी तरह से ख़ारिज करने की दहलीज़ पर खड़ा था। उसकी नजर मे कामिनी कुछ भी नहीं थी, शून्य, किसी काम कि नहीं.

"अरे समझो रमेश... तुम वहाँ नैनीताल सिर्फ़ घूमने जा रहे हो! अब कोई पति इतनी दूर हसीन वादियों में अकेला थोड़ी ना जाएगा, उसकी पत्नी भी तो साथ जाएगी ना," फ़ौजा सिंह ने एक मंझे हुए खिलाड़ी की तरह पासा फेंका।

"अगर बीवी साथ होगी, तो सैंपल के माल के पकड़े जाने का ख़तरा बिल्कुल शून्य (Zero) हो जाएगा। पुलिस या किसी को लगेगा कि कोई शरीफ़ जोड़ा छुट्टियाँ मनाने आया है। इतनी खू... खूबसूरत औरत अगर साथ हो तो..."
फ़ौजा सिंह बोलते-बोलते अचानक रुक गया, जैसे उसने अपने मुँह में आया कोई रस निगला हो।
"...खूबसूरत औरत साथ हो तो बड़े-बड़े काम आसान हो जाते हैं रमेश। भला कौन शक कर सकता है उस पर?"
वैसे भी कामिनी को कहाँ कुछ पता है, उसे तो यही लगेगा ना वो घूमने आई है.

फ़ौजा सिंह रमेश को समझा रहा था, लेकिन हकीक़त ये थी कि ये बात कहते हुए बूढ़े फ़ौजा के ज़ेहन में कामिनी का गोरा, नंगा जिस्म नाच रहा था। उसे याद आ रहा था कि कैसे कुछ समय पहले इसी हवेली के सूने आँगन में रमेश कि मौजूदगी मे ही उसने कामिनी के गदराए हुस्न का लुत्फ़ उठाया था, उसकी टाँगें चौड़ी करके उसकी चुत फाड़ी थी. 

रमेश को धीरे-धीरे फ़ौजा सिंह की बात समझ में आने लगी थी।
"और कामिनी बहू को क्या ही पता चलेगा कि तुम वहाँ असल में क्या करने जा रहे हो? वैसे भी, औरत की काबिलियत को कभी कम नहीं समझना चाहिए रमेश... औरत तो साक्षात लक्ष्मी का रूप होती है"  फ़ौजा सिंह ने अपनी बात पूरी की।

शमशेर ने भी तुरंत हाँ में हाँ मिलाई। आखिर शमशेर भी तो कामिनी के जिस्म का एक कद्रदान रहा है। हालांकि कामिनी जब से गांव आई है मौका हाथ ही नहीं लगा उसके जिस्म को चखने का.

लेकिन इस रात के अँधेरे में दो लोग ऐसे ऐसे भी थे, जिन्हें कामिनी के नाम पर हो रहा ये सौदा बिल्कुल नागवार गुज़रा था।

पहला था कादर
भट्टी के पास खड़े कादर के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गईं। वो दिल ही दिल में कामिनी की बहुत फ़िक्र करता था। उसे डर सताने लगा कि इतने बड़े माफ़ियाओं के बीच, इस ख़तरनाक खेल में कहीं उस मासूम औरत पर कोई भयंकर मुसीबत ना आ जाए।
साला ये तो शराबी है, पी के पड़ गया तो मामला ख़राब हो जायेगा.

और दूसरा था... झाड़ियों के पीछे बैठा सुलेमान!

"साले हरामखोर... कैसे नीच और लालची लोग हैं ये! पैसों के लालच में अपनी ही औरत का ढाल की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। साले हरामी, इनमें रत्ती भर भी ईमान नहीं बचा है!"
आज सुलेमान के जहन मे एक बात तो साफ हो गई थी कि इस पुरे झमेले मे कामिनी का कहीं कोई लेना देना नहीं है.

सुलेमान का एक उसूल था, धंधे में औरतों और बच्चों को मोहरा नहीं बनाया जाता। रमेश की इस नीचता को देखकर सुलेमान का चेहरा ग़ुस्से से लाल हो गया और उसकी आँखें अंगारे की तरह सुलग उठीं।
सुलेमान ने एक गहरी साँस ली और अपनी कमर मे धसी बंदूक की ग्रिप ढीली कर दी। अब यहाँ उसका रुकने का कोई मतलब नहीं बचा था। कादर और शमशेर का हिसाब ये दोनों अब उसकी प्राथमिकता नहीं रहे थे।

"जिओ सालों... कुछ दिन और जिओ, लौट के देखूंगा तुम्हे " सुलेमान ने मन ही मन एक खौफ़नाक फैसला करते हुए कादर और शमशेर को आख़िरी मोहलत दे दी।
वो दबे क़दमों से पीछे हटा और अँधेरे में अपनी SUV की तरफ़ लौट गया।

​सुलेमान ने अपनी गाड़ी स्टार्ट की। उसका शातिर दिमाग़ अब एक नई बिसात बिछा रहा था। उसकी और कामिनी की मंज़िल अब एक ही थी—

नैनीताल की सर्द और हसीन वादियाँ!

और कहावत है ना... जब दो लोगों की मंज़िल एक ही हो, तो अक्सर रास्तों में वो टकरा ही जाते हैं।
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रमेश ने 100 करोड़ के लालच में नैनीताल जाने की हाँ तो भर दी थी, लेकिन अभी भी उसके दिमाग़ में एक भयंकर भूचाल मचा हुआ था।
रात के अँधेरे में, शराब के गहरे नशे में चूर रमेश पैदल ही लड़खड़ाता हुआ हवेली के कच्चे रास्ते पर बढ़ा जा रहा था। उसके क़दम ज़मीन पर कम और हवा में ज़्यादा पड़ रहे थे।
"साले... कह रहे हैं कोई ख़तरा नहीं है... आराम से हो जाएगा!" रमेश ने हवा में हाथ झटकते हुए खुद से ही बड़बड़ाना शुरू किया।
"अबे कैसे हो जाएगा? मैं... मैं कोई गुंडा हूँ क्या? क्या मैं हाथापाई कर सकता हूँ कभी? कुछ गोली वोली किसी ने चला दी तो, मेरा तो मूत निकल जाएगा... नहीं... नहीं... मैं अकेला नहीं जाऊँगा। मुझे किसी और को भी अपने साथ लेकर चलना चाहिए।"
रमेश का दिमाग़ शराब की खुमारी में भी तेज़ी से दौड़ रहा था।
"कोई ऐसा आदमी चाहिए... जो हट्टा-कट्टा हो... लंबा-चौड़ा, रौबदार आदमी। जिसे देखकर ही सामने वाले की हवा टाइट हो जाए..."
जैसे-जैसे रमेश ऐसे किसी मज़बूत इंसान के बारे में सोचता गया, अँधेरे में उसके दिमाग़ में एक विशालकाय और फौलादी जिस्म की छवि उभरने लगी।
"ससससस.... ससस.... सुलेमान!" रमेश के मुँह से अचानक वो नाम निकल पड़ा।

"हाँ! वो मज़दूर! गरीब आदमी है बेचारा... दिहाड़ी पे काम करता है। पैसे की तो सख्त ज़रूरत होगी ही उसको। क्यों ना उसे ही थोड़े से पैसों का लालच देकर बॉडीगार्ड बनाकर साथ ले चलूँ? साला दिखने में ही 50 आदमियों पर भारी है!" रमेश के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान आ गई।

लेकिन अगले ही पल उसके क़दम ठिठक गए।
"लल्ल... लेकिन कामिनी को क्या बोलूँगा? वो पूछेगी ना कि ये मज़दूर हमारे साथ नैनीताल क्यों जा रहा है?"
रमेश का दिमाग़ दारू पीने के बाद ज़बरदस्त तरीके से काम कर रहा था। वो रास्ते के बीचों-बीच खड़ा हो गया और सिर खुजाने लगा।

"सोच... रमेश... सोच... साली मेरी बीवी को अगर थोड़ा सा भी सच मालूम पड़ गया, तो वो कभी नहीं जाएगी ऐसे काम के लिए। फिर भले मैं उसे कितना ही मार-पीट लूँ।"
तभी पेट के निचले हिस्से में एक तेज़ दबाव महसूस हुआ।

"रुक... पहले ज़रा पेशाब कर लेता हूँ... "हिच्च..."
रमेश ने पगडंडी के किनारे ही अपनी पैंट की ज़िप खोली और अँधेरे में झाड़ियों की तरफ़ मुँह करके धार मारनी शुरू कर दी।
ससससरररर.....

पेशाब करते हुए भी वो खुद से ही बातें कर रहा था।
और कमाल की बात ये थी कि जैसे-जैसे पेशाब का दबाव कम हुआ, वैसे-वैसे रमेश के शराबी दिमाग़ की बत्ती जलने लगी।

"हाँ! बताना ही क्यों है उसे?" रमेश की आँखों में एक शातिर चमक आ गई। "सुलेमान को काम चाहिए, मैं उसे काम दिला रहा हूँ! कामिनी से कह दूँगा कि नैनीताल में मज़दूरी अच्छी मिल रही है... 6 महीने का कॉन्ट्रैक्ट है, कर लेगा बेचारा। अपना भी काम हो जाएगा और गरीब का भला भी हो जाएगा... इस से ज़्यादा और क्या चाहिए?"
रमेश को अपना ये मनगढ़ंत बहाना इतना परफेक्ट लगा कि वो वहीं खड़े-खड़े हँसने लगा।
"वाह... वाह... रमेश बाबू! क्या बात है! क्या दिमाग़ पाया है तुने... वाह!"

रमेश लड़खड़ाते क़दमों से हवेली में दाखिल हुआ। चारों तरफ़ एक भारी सन्नाटा था। उसने सीधे कामिनी के कमरे का दरवाज़ा ढकेला। कामिनी उसी तरह ओंधे मुँह बिस्तर पर पड़ी थी। रमेश उसके पास गया और अपना हाथ उसके माथे पर रखा। बुखार उतर चुका था, माथा ठंडा था।
"कामिनी... ओह कामिनी... मेरी जान, सो गई क्या?" रमेश ने बड़ी ही नरमी से पुकारा।
कामिनी झटके से सकपका कर उठी। उसके जहन में तुरंत एक खौफ़ ने हुंकार भरी, उसे लगा कि रमेश शराब के नशे में आया है, मार पीट और बेमतलब sex करने कि कोशिश करेगा.
कल रात की बर्बरता से उसका जिस्म अभी तक पूरी तरह उबर भी नहीं पाया था। वो डर से काँप उठी।
"अब कैसी तबीयत है कामिनी?" रमेश ने बड़े ही प्यार से पूछा। उसकी आवाज़ में कठोरता नहीं थी, बल्कि एक मीठापन था।
"ठ... ठ... ठीक हूँ अब। दवाई ले ली थी," कामिनी ने आँखें मसलते हुए उसे अजीब नज़रों से देखा। वो यकीन नहीं कर पा रही थी कि ये वही रमेश है जो अक्सर शराब के नशे में उसे नोचता-खसोटता था। इतने प्यार से बात करने वाला रमेश? यह उसके लिए किसी चमत्कार जैसा था।

"अच्छा सुन..." रमेश ने बड़े प्यार से कामिनी के माथे पर बिखरे बालों को कान के पीछे किया।
"कक्क... क.. क्या?" कामिनी पूरी तरह हैरान थी।

"ऑफिस का एक ज़रूरी काम निकल आया है। पता है कहाँ जाना है?
"कक्क... कहाँ?"

"नैनीताल! कुछ दिन के लिए जाना है," रमेश ने बड़ी सादगी से कहा।
कामिनी ने उदास मन से कहा, "हाँ... तो जाओ, ज़रूरी है तो..."
"अरे पगली! तू भी साथ चल रही है," रमेश ने अपनी योजना पर अमल करना शुरू किया.

कामिनी की आँखें फटी की फटी रह गईं। "कक... क्या? मैं भी?" उसके मन में दबी हुई हसरतें एक पल में चहक उठीं। रमेश आज तक उसे कहीं घुमाने तक नहीं ले गया था।
"हाँ, हमेशा काम में ही उलझा रहा, कभी तुझपे ध्यान ही नहीं दिया। तो सोचा कि इस बार मौका मिल रहा है, तो साथ में घूम आते हैं," रमेश ने उसे हसीन सपने दिखाने शुरू कर दिए.

साला रमेश गज़ब का धूर्त आदमी था। कामिनी के जज़्बातों से ऐसे खेल रहा था जैसे कोई शतरंज का खिलाड़ी। उसे अपनी बीवी के सुख से कोई मतलब नहीं था, उसे तो बस लम्बा हाथ मारने कि योजना को अंजाम तक पहुँचाने के लिए एक 'ढाल' की ज़रूरत थी।
"क्या सच में हम साथ चल रहे हैं?" कामिनी की आँखों में चमक थी।

"हाँ, सिर्फ तू और मैं। कल शाम को निकलना है, कल सुबह ही सब तैयारी कर लेना," इतना कहकर रमेश वापस लड़खड़ाते हुए  मन ही मन कुछ सोचता कमरे से बाहर निकल गया।

कामिनी वहीं सन्न बैठी रही। उसे एक पल के लिए शक हुआ—क्या ये सब सिर्फ दारू के नशे में बोल गया है?
 लेकिन उसने गौर किया, नशे में तो रमेश उसका जिस्म नोचता था, आज तो उसने एक उंगली तक नहीं छुई!

कामिनी की तबीयत जैसे एक पल में हरी हो गई। एक औरत को और क्या चाहिए उसके पति का साथ ही ना? उसके दो मीठे बोल ही ना?
यही काम रमेश पहले कर लेता तो कामिनी इस अंजाम तक पहुँचती ही नहीं.
कामिनी ख़ुश थी, नैनीताल के बारे मे अपनी सहेलियों से खूब सुना था, बहुत अच्छी जगह है.
लेकिन अब उसे भी मौका मिल गया था.
खूबसूरत वादिया, ठंडी हवाएं कामिनी के जहन मे दौड़ने लगी थी.

क्रमशः....

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