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कामिनी 2.0 भाग -22

मेरी माँ कामिनी 2.0 - अध्याय 22


हवेली में अभी भी रात का गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था, लेकिन गाँव की घड़ियों के हिसाब से भोर हो चुकी थी। सुबह के लगभग 6 बज रहे थे और बाहर हल्का-हल्का धुंधलका और कोहरा छाया हुआ था। गाँव की पुरानी आदत के मुताबिक़, कमला काकी की नींद सबसे पहले टूट गई।
उसने अपनी भारी पलकें झपकाईं और नींद से भरी आँखें मसलीं। चारपाई से उठते हुए उसने कमरे में आस-पास नज़र दौड़ाई। ज़मीन पर बिछे बिस्तर पर बगल में प्रमिला अभी भी बेसुध सोई हुई थी। लेकिन जैसे ही काकी की नज़र सामने वाले मुख्य बिस्तर पर गई, उसके माथे पर बल पड़ गए। कामिनी का बिस्तर पूरी तरह से खाली था।

"बहू रानी कहाँ गई सुबह-सुबह...?" कमला काकी ने मन ही मन हल्की सी चिंता व्यक्त की।
लेकिन फिर उसने सोचा कि शायद बहू रानी किसी घर के काम से जल्दी उठ गई होंगी। गाँव के माहौल में औरतों का सुबह अँधेरे उठना कोई असामान्य बात नहीं थी, इसलिए उसने इस बात को ज़्यादा सीरियस नहीं लिया और चारपाई से नीचे उतर आई।

वो अपनी सूती साड़ी का पल्लू सिर पर खींचते हुए दबे क़दमों से कमरे का दरवाज़ा खोलकर बाहर निकली। बाहर आँगन में सुबह की ठंडी, सर्द हवा चल रही थी। आँगन के एक कोने में रखे पलंग पर रमेश अभी भी मुँह फाड़े, बेसुध पड़ा खर्राटे ले रहा था। रात की शराब का नशा अभी भी उसके दिमाग़ पर हावी था।

कमला ने पास ही रखे एक पीतल के लोटे को उठाया और बरामदा पार करती हुई सीढ़ियाँ नीचे उतर गई। हवेली के पिछले हिस्से में लगा पुराना हैंडपंप उसकी मंज़िल था।
जैसे ही वो दबे क़दमों से हैंडपंप के पास पहुँची, धुंधलके में उसकी नज़र हैंडपंप के गीले चबूतरे पर पड़ी। कमला काकी के क़दम वहीं ठिठक गए।

"अरे... ये तो बहू रानी की साड़ी है!"
कमला ने वहाँ लावारिस पड़े कामिनी की महँगी साड़ी और पेटीकोट को देखते हुए सोचा, जो कि कल रात कामिनी हवस मे डूबी वहीं छोड़ गई थी और अब रात भर गिरने वाली ओस से हल्के भीग चुके थे।

"बहू रानी इतनी सुबह-सुबह नहा कर कहाँ गई होंगी? और अपने कपड़े यहीं छोड़ गईं?" काकी का दिमाग़ एक पल के लिए सवालो में उलझा।
लेकिन उम्र के उस पड़ाव पर सुबह का वो प्राकृतिक प्रेशर (pressure) इतना तेज़ बना हुआ था कि इंसान का दिमाग़ उसके आगे ज़्यादा देर तक कुछ और सोच ही कहाँ पाता है। पेट में उठती मरोड़ ने उसके सारे सवालों को वहीं दबा दिया।
चरररर... कूप... चररर... कूप...

सुबह के भारी सन्नाटे में हैंडपंप का हत्था चलाने की आवाज़ गूँज उठी। बर्फ़ जैसा ठंडा पानी पीतल के लोटे में गिरने लगा।
लोटा ऊपर तक भरने के बाद, कमला काकी ने उसे उठाया और खेतों की तरफ़ जाने वाली उस कच्ची पगडंडी की तरफ़ चल दी। उसे बस जल्दी से हल्का होना था, लेकिन वो इस बात से पूरी तरह अनजान थी कि वो पगडंडी उसे सीधा उसी पुरानी झोपड़ी की तरफ़ ले जा रही थी, जहाँ रात भर चले बवंडर के बाद कामिनी और ताऊजी बेसुध पड़े थे।

खेतों की पगडंडी पर चलते हुए कमला काकी ठीक उसी पुरानी झोपड़ी के पास से गुज़री। सुबह का सन्नाटा और हल्की धुंध थी। उसे ज़रा भी इल्म नहीं था कि जिस झोपड़ी के बगल से वो गुज़र रही है, उसी के अंदर हवेली की इज़्ज़तदार बहू अपने ससुर समान ताऊजी के साथ एक भयानक और शर्मनाक रात गुज़ारने के बाद बेसुध पड़ी है। कमला बिना रुके आगे बढ़ गई और झोपड़ी से करीब दो सौ मीटर दूर एक घनी झाड़ी के पीछे जाकर बैठ गई।

इधर, झोपड़ी के घुटन भरे अँधेरे में कामिनी की बोझिल और सूजी हुई पलकें धीरे से खुलीं। वो चारपाई पर औंधे मुँह लेटी थी, जबकि ताऊजी ज़मीन पर पीठ के बल बेसुध पड़े थे। होश आते ही कामिनी के सुन्न दिमाग़ में बीती रात के मंज़र किसी डरावनी फिल्म की तरह घूमने लगे। महज़ पाँच सेकंड लगे उसे यह एहसास होने में कि कल रात उसने क्या किया था! किस कदर वो हवस और बेशर्मी के गहरे दलदल में उतर चुकी थी। 27475893

घबराहट में उसने झटके से उठने की कोशिश की, लेकिन अगले ही पल  'धड़ाम' से वापस चारपाई पर गिर पड़ी। उसके जिस्म का एक-एक हिस्सा भयानक पीड़ा से चीख रहा था। रात भर चले हवस के कार्यक्रम ने उसकी जाँघों और कमर की सारी ताक़त निचोड़ ली थी। उठने की हिम्मत तक नहीं बची थी।

"आआआहह..... हे भगवान! ये क्या किया मैंने..." कामिनी के होंठों से एक दर्द भरी कराह निकली।
रात भर जिस भगवान और मर्यादा को वो भूल चुकी थी, सुबह के उजाले और पकड़े जाने के खौफ़ ने उसे पल भर में सब याद दिला दिया। कहावत है ना, चोर को भगवान तभी याद आते हैं जब उसके पकड़े जाने का ख़तरा सर पर मंडरा रहा हो।

झोपड़ी की कच्ची दरारों से छनकर आती सुबह की लालिमा और पीली रोशनी कामिनी के चेहरे पर पड़ रही थी। यह रोशनी बता रही थी कि सुबह हो चुकी है और अब छुपने का कोई रास्ता नहीं बचा है। "आअह्ह्ह.... उफ्फ्फफ्फ्फ़...."

कामिनी ने अपने काँपते हाथों का सहारा लिया और भयंकर दर्द को बर्दाश्त करते हुए अपने पैरों पर खड़ी हो गई। उसकी जाँघें थरथरा रही थीं। खड़ी होते ही रात के रंडीपने और बेहयायी के सुबूत उसके जिस्म से रिसकर उसकी जाँघों से होते हुए घुटनों तक बह आए। 22424357 उसे समझ आ गया कि ताऊजी की बरसों की दबी हुई बीमारी कितनी खौफ़नाक थी और कल रात उसने क्या-क्या अपने अंदर समेटा था।

जैसे-तैसे, लड़खड़ाते और दर्द भरे क़दमों से वो झोपड़ी के खुले दरवाज़े तक पहुँची। उसने काँपते हुए बाहर झाँका। आस-पास कोई नहीं था, खेत पूरी तरह शांत थे।
कामिनी ने बाहर निकलने के लिए अपना एक पैर चौखट के पार रखा ही था कि... अचानक उसका कलेजा खौफ़ से काँप उठा।

अगर इस हालत में... पूरी तरह नंगी, बिखरे बालों और जिस्म पर लगे शर्मनाक निशानों के साथ उसे किसी ने देख लिया, तो क्या होगा? क्या मुँह दिखाएगी वो? हवेली में क्या बताएगी? इस भयानक ख़याल ने उसकी रूह कँपा दी। 
उसके स्तन और गांड अभी भी ताऊजी के थप्पड़ो से लाल थे, उसने तुरंत अपना पैर वापस अंदर खींच लिया।
कल रात, हवस के जिस अंधे नशे में वो अपनी पूरी नग्नता के साथ बेख़ौफ़ होकर खेतों से गुज़रती हुई यहाँ तक आई थी, वो सारी बहादुरी अब सुबह के उजाले में एक खौफ़नाक डर में बदल चुकी थी। अब वो एक शेरनी नहीं, बल्कि एक डरी हुई, बेबस औरत थी जो अपने ही बुने हुए पाप और शर्मिंदगी के जाल में बुरी तरह फँस चुकी थी।

कामिनी के पास अब सोचने का कोई वक़्त नहीं था। झोपड़ी में रुकने का मतलब था मौत से भी बदतर रुसवाई और अपनी इज़्ज़त का जनाज़ा उठते हुए देखना। उसने एक गहरी, काँपती हुई साँस ली... चल कामिनी.... भाग....और खुले खेतों की तरफ़ दौड़ पड़ी।

कल रात का और आज सुबह का वो खौफ़नाक अंतर उसके रोंगटे खड़े कर रहा था।
कल रात जब हवस का अंधा, काला नशा उस पर हावी था, तो यही खेतों की ऊबड़-खाबड़ मिट्टी उसके नंगे पैरों को मखमली गलीचे जैसी लग रही थी। रात की ठंडी हवा उसके नंगे बदन को सहला रही थी। लेकिन आज? 
आज सुबह के इस बेरहम उजाले में, यही मिट्टी उसके गुनाहों की सबसे बड़ी गवाह बन गई थी। अब वो ज़मीन रेशम नहीं, बल्कि काँच के टुकड़ों की तरह लग रही थी। खेतों की सूखी घास, कंकड़ और झाड़ियों के नुकीले कांटे उसके नाज़ुक तलवों और टाँगों को बेरहमी से चीर रहे थे, लेकिन कामिनी को वो दर्द महसूस ही नहीं हो रहा था, क्योंकि इज़्ज़त लुट जाने का डर उस शारीरिक दर्द से सौ गुना बड़ा था।

"जल्दी... जल्दी कामिनी... भाग...!" वो अपने आप से बडबडा रही थी।
उसका भारी, निर्वस्त्र शरीर हर कदम पर एक बोझ लग रहा था। रात भर चले वहशीपन के कारण उसकी जाँघों के बीच से उठती भयंकर टीस उसे ठीक से दौड़ने भी नहीं दे रही थी। हर कदम पर उसके जिस्म पर पड़े ताऊजी के दिए निशान (नीले धब्बे और खरोंचें) उसे उसकी नीचता का एहसास दिला रहे थे।

उधर, दूसरी तरफ़...
करीब दो सौ मीटर दूर, झाड़ियों के पीछे से कमला काकी फारिग होकर उठ खड़ी हुई थी। उसने अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा, लोटा उठाया और हाथ-मुँह धोने के लिए सीधे हैंडपंप की तरफ़ अपने कदम बढ़ा दिए।

दोनों की मंज़िल एक ही थी—वो पुराना हैंडपंप!
कामिनी और कमला काकी के बीच अब मुश्किल से 5 मिनट का फासला बचा था। एक तरफ़ अपनी इज़्ज़त, अपना वजूद बचाने की एक नंगी, अंधी और हताश दौड़ थी, तो दूसरी तरफ़ एक अनजान औरत के सधे हुए धीमे कदम, जो किसी भी पल हवेली की इज़्ज़त को तार तार कर सकते थे।

कमला काकी के कदमों के नीचे चरमराती सूखी पत्तियों की आवाज़ "चर्र... चर्र... खेतों के सन्नाटे में गूँज रही थी।

कामिनी हाँफती, बदहवास सी, सीने में धड़कते हुए दिल को संभाले किसी तरह हवेली के पिछले हिस्से तक पहुँच गई। उसकी साँसें धौंकनी की तरह चल रही थीं। सामने ही हैंडपंप के गीले चबूतरे पर उसकी साड़ी और पेटीकोट वैसे ही लावारिस पड़े थे।

उसने पागलों की तरह उन कपड़ों पर झपट्टा मारा। उसके हाथ इस कदर काँप रहे थे कि कपड़े पकड़ना भी मुश्किल हो रहा था। उसने जल्दी से पेटीकोट को पैरों में डाला, लेकिन उँगलियाँ इतनी सुन्न और काँप रही थीं कि नाड़ा बाँधना पहाड़ जैसा लग रहा था।

तभी... हवा के साथ एक आवाज़ कामिनी के कानों से टकराई।
खड़-खड़... चर्र...

कदमों की आहट! कमला काकी हवेली के पिछले अहाते में दाखिल होने ही वाली थी। मुश्किल से 50 कदम का फासला रह गया था।

कामिनी की साँस गले में अटक गई। मौत बस सामने खड़ी थी। ब्लाउज़ तो था नहीं, उसने उसी नंगे बदन पर, बेतरतीब और बदहवास तरीके से पेटीकोट को अपने स्तनों के ऊपर ला कर कस लिया

"बहू रानी...?  आप यहाँ, कब आई?
पीछे से कमला काकी कि आवाज़ से कामिनी का पूरा वजूद हिल गया, उसका पूरा जिस्म सफ़ेद पड़ गया.
लीन गनीमत थी कामिनी ने अपने स्तनों और गांड को पेटीकोट से ढक लिया था.
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हवा में गूँजती क़दमों की आहट से कामिनी की साँस गले में ही अटक गई। मौत बस सामने खड़ी थी। उसके पास सोचने का एक सेकंड भी नहीं था। साड़ी लपेटने का वक़्त जा चुका था और ब्लाउज़ वहाँ था नहीं। उसने बदहवास, काँपते हाथों से अपने पेटीकोट को उठाया और अपनी कमर से ऊपर खींचते हुए अपने भारी स्तनों के ऊपर तक ला कर कसकर बाँध लिया। पेटीकोट ने किसी तरह उसकी छाती और उसकी भारी गांड को ढँक लिया था, लेकिन उसके गोरे, नंगे कंधे और पीठ अभी भी सुबह की सर्द हवा में खुले थे।

"बहू रानी...? आप यहाँ? इतनी सुबह कब आईं?"
कमला काकी की आवाज़ ठीक उसके पीछे से आई। वह आवाज़ कामिनी के कानों में किसी बम के धमाके की तरह गूँजी। उसका पूरा वजूद हिल गया। उसके नसों में दौड़ता खून जैसे पल भर में बर्फ़ बन गया और चेहरे का रंग एकदम सफ़ेद पड़ गया। धड़कनें इतनी तेज़ थीं कि उसे लगा उसकी पसलियाँ टूट जाएँगी।

कामिनी धीरे से पलटी। उसके होंठ काँप रहे थे।
"वो... वो... काकी..." कामिनी को समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या कहे। उसके दिमाग़ ने काम करना बंद कर दिया था। क्या काकी ने उसके जिस्म पर वो खरोंचें देख लीं? क्या उसे रात के गुनाह की महक आ गई?

लेकिन तभी, कमला काकी ने एक लंबी साँस छोड़ी और अपने ही लहज़े में बडबडाते हुए बोली,
"रहने दो बहू रानी... मुझे पता है। हम औरतों की यही तो समस्या है। सुबह अँधेरे उठ कर फारिग हो जाओ, फिर नहा-धो कर घर के काम पे लग जाओ। और इन मर्दों को देखो... साले जब मन चाहे उठेंगे, हगने जाएँगे, नहाएँगे। घर का सारा बोझ तो औरतों के ही कंधों पर है।"

कमला काकी जैसे अपने दिल का सारा गुबार निकाल रही थी। उसे कामिनी की इस बदहवासी में कोई हवस या राज़ नज़र नहीं आया, बल्कि एक संस्कारी बहू की मज़बूरी और घर की ज़िम्मेदारी नज़र आई। उसे लगा कामिनी सुबह जल्दी उठकर फारिग होने आई थी और अब नहाने की तैयारी कर रही है।
कमला का ये वाक्य कामिनी के लिए किसी संजीवनी बूटी से कम नहीं था। कामिनी के सूखे हलक में जैसे थूक वापस आ गया।

"थैंक यू भगवान... हे मेरे भगवान!" कामिनी ने मन ही मन चीखते हुए ऊपर वाले का शुक्रिया अदा किया।
"चलो, तुम नहा लो बहू रानी, मैं पानी चला देती हूँ," कमला काकी ने आगे बढ़ते हुए हैंडपंप का भारी हत्था पकड़ लिया।
चरररर... कूप.... चररर.... कूप....

हैंडपंप से पानी गिरने की तेज़ आवाज़ सन्नाटे को चीरने लगी। बर्फ़ जैसा ठंडा, साफ़ पानी धार बनकर गिरने लगा।
कामिनी ने बिना एक पल गँवाए लोटा उठाया और भर-भर कर अपने सुलगते, दर्द करते जिस्म पर डालना शुरू कर दिया। ठंडा पानी जब उसके नंगे कंधों और पीठ पर पड़ा, तो एक सिहरन सी दौड़ गई। वो बेतहाशा, पागलों की तरह पानी अपने ऊपर उँड़ेल रही थी। वो अपने हाथों से अपने ही बदन को इतनी ज़ोर-ज़ोर से रगड़ रही थी जैसे चमड़ी छील देना चाहती हो।
हंफ... छपक... छापम्म... हंफ...

वो पानी से सिर्फ़ रात का पसीना, मिट्टी और ताऊजी का गाढ़ा, कसैला वीर्य ही नहीं धो रही थी, बल्कि अपने दिमाग़ में बसे पाप को, बेशर्मी को भी रगड़-रगड़ कर साफ़ करने की कोशिश कर रही थी। लेकिन क्या रूह पर लगे दाग़ पानी से धुलते हैं?
कभी नहीं, आत्मा ही मैली हो जाये तो, जिस्म को कितना ही धूल लो, चमका लो, कोई फर्क नहीं.
कामिनी कि आत्मा मे हवस बस चुकी थी, नये नये मर्द उसे पसंद आने लगे थे.
कारण सिर्फ एक था उसका "शराबी पति "

"आराम से बहू... चमड़ी छीलोगी क्या?" कमला काकी ने उसे इस तरह पागलों की तरह नहाते देख हँसते हुए कहा।
"बस... नहा ली काकी... काफ़ी है..." कामिनी ने हाँफते हुए और लोटा एक तरफ रखते हुए कहा। पानी की ठंडक से उसके होंठ नीले पड़ रहे थे। "आप चलो, मैं कपड़े पहन कर आती हूँ।"

कमला काकी ने भी हैंडपंप के उसी पानी से अपने हाथ धोए और हवेली के आँगन की तरफ चल दी।
काकी के पीठ मोड़ते ही कामिनी के जिस्म में जैसे प्राण लौट आए। उसने एक बहुत गहरी और काँपती हुई राहत की साँस ली। पास ही चबूतरे पर पड़ी साड़ी को उसने उठाया और अपने भीगे हुए जिस्म पर जल्दी-जल्दी लपेट लिया। पानी टपकते बालों के साथ वो दबे क़दमों से हवेली के अंदर की ओर चल दी।

हवेली में अभी भी सन्नाटा पसरा हुआ था। रमेश उसी तरह बाहर खर्राटे ले रहा था।
कामिनी दबे क़दमों से अपने कमरे में पहुँची। प्रमिला तब तक उठकर बाहर जा चुकी थी। अब कमरे में सिर्फ़ कामिनी अकेली थी। उसने झट से दरवाज़ा अंदर से बंद किया और सिटकनी चढ़ा दी।
कमरा बंद करते ही वो सीधे कमरे के कोने में रखे बड़े से आदमक़द शीशे (Mirror) के सामने जाकर खड़ी हो गई।

उसने काँपते हाथों से अपने ऊपर लपेटी हुई गीली साड़ी और पेटीकोट को खोलकर नीचे गिरा दिया। शीशे में जो अक्स (Reflection) उभर कर सामने आया, उसे देखकर कामिनी की रूह तक काँप गई। शीशे के सामने खड़ी वो औरत इज़्ज़तदार हवेली की संस्कारी बहू रानी कहीं से नहीं लग रही थी; वो किसी खूँखार जानवर के चंगुल से बचकर आई हुई एक शिकार लग रही थी।

कल रात के कारनामे उसके गोरे जिस्म पर चीख-चीख कर अपनी गवाही दे रहे थे।
उसके दोनों भारी स्तन बुरी तरह सूज गए थे और लाल पड़ चुके थे। निप्पल्स पर ताऊजी के दांतों के काटे हुए गहरे निशान थे। उसकी गर्दन, कंधों और कमर पर जगह-जगह लाल और नीले खरोंच के निशान छपे थे, जहाँ ताऊजी की खुरदरी उँगलियाँ पूरी ताक़त से धँसी थीं। और सबसे ज़्यादा खौफ़नाक दर्द उसकी जाँघों के बीच से उठ रहा था। उसकी सूजी हुई जाँघों के बीच वो भयंकर पीड़ा उसे सीधे खड़े भी नहीं होने दे रही थी।

ये निशान सिर्फ़ जिस्म पर नहीं थे, ये उसकी आत्मा पर लगे वो दाग़ थे जिन्हें अब वो किसी से छुपा नहीं सकती थी। ताऊजी ने अपना बरसों पुराना ज़हर उसके अंदर उतार कर उसे हमेशा के लिए अपना गुलाम बना लिया था।
लेकिन क्या वाकई औरत कभी किसी कि गुलाम हो सकती है?
ये इस ब्रह्माण्ड का सात्विक सवाल है. जवाब शायद भगवान के पास भी नहीं होगा.

कामिनी खुद को इस भयानक अवस्था में ज़्यादा देर तक देख ना सकी। शीशे में अपनी ही आँखों से आँखें मिलाना उसके लिए असंभव हो रहा था। उसकी आँखों से आँसू छलक पड़े। उसने झट से शीशे से नज़रें चुराईं, अलमारी से एक ढीला-ढाला नाइट गाउन निकाला और उसे पहन लिया।
चलने की ताक़त अब बिल्कुल ख़त्म हो चुकी थी। वो लड़खड़ाते हुए बिस्तर तक पहुँची और एक निर्जीव लाश की तरह बिस्तर पर औंधे मुँह ढेर हो गई।
कामिनी का दिमाग़ शून्य मे सामने लगा.
खररर.... खरररर.... खररर.... कामिनी कि सांसे आवाज़ करने लगी.
********************

दिन पूरी तरह चढ़ आया था। सूरज की तीखी किरणें अब गाँव की पगडंडियों को तपाने लगी थीं। गाँव से दूर, धूल का एक बड़ा गुबार उड़ाते हुए एक महँगी, काले शीशों वाली SUV कच्ची सड़क पर तेज़ी से दौड़ी चली आ रही थी।
"क्यों बे... समझ गए ना क्या करना है?"
गाड़ी के ठंडे एसी (AC) वाले सन्नाटे में सुलेमान की भारी और रौबदार आवाज़ गूँजी।
पीछे बैठे काला और कांडी ने बिना कुछ बोले, बस सिर हिलाकर मूक सहमति दी। उनके चेहरों पर खौफ़ और इज़्ज़त दोनों थी।
"समझ गए भाई... इस गाँव में 'कादर' नाम के आदमी को ढूँढना है," काला ने अदब से कहा।
"Good..."
सससररर... फूऊस्स्स.....सुलेमान ने अपने उँगलियों में दबे महँगे क्यूबन सिगार का एक लंबा कश लिया और होंठ गोल करके धुएँ का एक घना छल्ला हवा में छोड़ दिया। उसकी आँखों में एक विश्वास दिख रहा था, 
इतिहास गवाह है सुलेमान ने कभी किसी मुद्दे को निपटाने मे 2 दिन से ज्यादा वक़्त नहीं लिया.
आज दूसरा दिन था उसका इस गांव मे, आज निश्चित ही कादर कि मौत थी, 

थोड़ी ही देर बाद, वो महँगी SUV गाँव के बाहर, घनी झाड़ियों और पेड़ों के झुरमुट के बीच खड़ी कर दी गई, जहाँ से वो किसी की नज़र में ना आ सके।
सुलेमान ने अपना वो रईस और खूँखार बॉस वाला रूप वहीं छोड़ दिया। उसने कल वाले वही पुराने, पसीने और मिट्टी से सने मज़दूरों वाले कपड़े वापस अपने गठीले जिस्म पर चढ़ा लिए। महँगे सिगार की जगह अब उसके दाँतों के बीच एक सस्ती बीड़ी सुलग रही थी।

"चलो भाई... हवेली में काम भी करना है। दिहाड़ी कमानी है या नहीं?" सुलेमान ने एक शातिर मुस्कान के साथ वापस से एक मामूली मज़दूर के रूप में गाँव के कच्चे रास्ते पर पैदल चल पड़ा।

कुछ ही देर बाद, तीनों हवेली के मुख्य दरवाज़े पर खड़े थे।
"क्या भाई... कहाँ रह गए थे? पता है ना कितना काम है आज! सब कुछ समेटना है," ताऊजी ने बरामदे से उन तीनों को दरवाज़े से अंदर आते देख अपनी रौबदार आवाज़ में घुड़की दी। ताऊजी के चेहरे पर रात की भयंकर थकान का कोई नामोनिशान नहीं था, बल्कि उनका जिस्म हल्का हो गया था, वो हवा मे उड़ रहे थे.
वे वापस अपने उसी कड़क, ज़मींदार वाले अंदाज़ में थे।

"अभी कर देते हैं साब..." सुलेमान ने बड़ी ही आज्ञाकारिता से जवाब दिया। उसने अपनी बीड़ी ज़मीन पर फेंकी, उसे पैर से कुचला और काम में जुट गया।
लेकिन सुलेमान के हाथ भले ही काम कर रहे थे, उसकी चील जैसी नज़रें हवेली के कमरों और मुख्य दरवाज़े पर ही गड़ी हुई थीं। वो उस गदराए हुए हुस्न को ढूँढ रहा था जिसे देखकर कल उसकी नीयत डोल गई थी। लेकिन सब तरफ एक अजीब सा सन्नाटा और सूनापन था।
 कामिनी कहीं नहीं दिख रही थी.

"ऐ... ज़रा इधर आओ..."
तभी सामने आँगन में आराम कुर्सी पर बैठकर अख़बार पढ़ते हुए रमेश ने सुलेमान को आवाज़ दी। रात की शराब का नशा उतरने के बाद रमेश अब हवेली के मालिक वाले गुरूर में था।
सुलेमान अपने गठीले, फौलादी बदन के साथ रमेश के सामने आकर खड़ा हो गया।
"इतने हट्टे-कट्टे हो, फिर भी ये मिट्टी-गारे की मज़दूरी का काम कर रहे हो?" रमेश ने अख़बार से नज़रें हटाकर सुलेमान के चौड़े सीने और बाज़ुओं की मछलियों (Biceps) को ऊपर से नीचे तक घूरते हुए जैसे उलाहना दी।

"क्या करें बड़े बाबू... और कोई काम भी तो नहीं आता," सुलेमान ने अपनी आँखों की चालाकी को छुपाते हुए, एक बेबस मज़दूर की तरह सिर खुजाते हुए कहा।
"अच्छा? कभी कोई और काम पड़ा तो करोगे?" रमेश ने अख़बार को मोड़कर मेज़ पर रखते हुए जायज़ा लेना चाहा।

रमेश का लालची और शातिर दिमाग़ इस वक़्त पूरे जोश में काम कर रहा था। आजकल जिस दो-नंबर के ख़तरनाक काम (तस्करी या हेराफेरी) में वो उलझा हुआ था, उस काम में हर वक़्त ख़तरा सर पर ही मँडराता रहता था। रमेश अंदर से एक डरपोक इंसान था। उसे ऐसे ही किसी हट्टे-कट्टे और वफ़ादार आदमी की तलाश थी जो उसके आस-पास रहे, ताकि उसका काम आसानी से बन जाए और कोई उस पर आँख उठाने की जुर्रत ना करे।

रमेश की नज़र में सुलेमान एक कम पैसे का, अनपढ़ मज़दूर था, जो दिखने में 5 आदमियों का काम अकेला कर सकने के काबिल था। एक सस्ता और मज़बूत बॉडीगार्ड!

"क्यों नहीं साब... पैसे से मतलब है मुझे, चाहे जो काम हो," सुलेमान ने एक नई बीड़ी निकालते हुए उसे माचिस की तीली से सुलगाया और धुएँ के साथ अपना जवाब भी रमेश के चेहरे की तरफ़ उछाल दिया।

"ठीक है... चलो अभी ये वाला काम ख़त्म करो। आगे जब काम पड़ा तो मैं बोलूँगा," रमेश ने एक गहरी संतुष्टि के साथ कहा, ये सोचकर कि उसने बहुत सस्ते में एक तगड़ा मोहरा ढूँढ लिया है।
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तभी आँगन में पायल की हल्की झंकार गूँजी। फागुन हाथों में खाने की सजी हुई थाली लिए रमेश की तरफ़ आ रही थी।
"बड़े बाबू, खाना खा लीजिए," फागुन ने अपनी मीठी और अल्हड़ आवाज़ में कहा और थाली को मेज़ पर रखने के लिए आगे की तरफ़ झुकी।
जैसे ही फागुन झुकी, रमेश की नज़रें अचानक वहीं ठहर गईं। फागुन के सूती कुर्ते का गला काफ़ी गहरा था, और उसके झुकने से उसके कच्चे, गदराए हुए सीने का उभार और दोनों स्तनों की गहरी घाटी पूरी तरह से रमेश की आँखों के सामने बेपर्दा हो गई। फागुन के जिस्म का अल्हड़पन और जवानी की कसक किसी भी मर्द की नीयत डिगा सकती थी।

रमेश का दिल जैसे एक पल के लिए ज़ोर से धड़क उठा।
"अअअअअ... हाँ... हाँ, रख दो," रमेश ने हड़बड़ाते हुए अपनी नज़रें चुराईं और खुद को सँभालने की कोशिश की।
असल में, बिना शराब के नशे के रमेश आमतौर पर एक सीधा और सज्जन दिखने वाला इंसान ही रहता था। होश-ओ-हवास में उसके अंदर इस तरह की ग़लत भावनाएँ जल्दी नहीं पनपती थीं। लेकिन आज कुछ ऐसा हुआ जिसने खुद रमेश को भी अंदर तक चौंका दिया। फागुन के कच्चे और महकते हुए जिस्म की झलक देखते ही उसके शरीर के बेजान और मुर्दा हिस्से, उसके लंड में अचानक एक हल्की सी हरकत, एक फड़कन सी महसूस हुई।

रमेश अंदर ही अंदर बुरी तरह चौंक गया। जो अंग सालों से एक बेजान माँस के लोथड़े की तरह सुन्न पड़ा रहता था, उसमें आज बिना किसी दवा या शराब के ये हरकत कैसे हुई? क्या किसी कमसिन और कच्चे जिस्म की महज़ एक झलक ही उसके उस सोए हुए पौरुष को जगाने के लिए काफ़ी थी? रमेश का लालची दिमाग़ इस नए और चौंकाने वाले एहसास में उलझ गया।
उसने अपनी इस अचानक जागी हुई शारीरिक हलचल को छुपाने और अपना ध्यान भटकाने के लिए तुरंत बात बदली।
"वो... वो.... कामिनी कहाँ है? दिखाई नहीं दे रही सुबह से?" रमेश को आख़िरकार अपनी बीवी का ख़याल आ ही गया।
फागुन ने सीधे खड़े होते हुए अपने कुर्ते को हल्का सा ठीक किया और बड़ी मासूमियत से बोली, "वो... माँ जी तो अभी सो रही हैं। मैं उन्हें खाना देने गई थी, लेकिन वो बेसुध पड़ी हैं। शायद कल की बहुत ज़्यादा थकान हो गई है, और उनका बदन भी तप रहा है... उन्हें तेज़ बुखार आ गया है।"

दूसरी तरफ़, बाहर आँगन और हवेली के दरवाज़े पर भी अब तक काफी हलचल हो चुकी थी। कल के जलसे और टेंट का सारा सामान समेट लिया गया था। लोहे के भारी पाइप, कुर्सियाँ, दरियाँ और तिरपाल सब कुछ एक महिंद्रा टेम्पू (लोडिंग ऑटो) पर लाद दिया गया था।

"चल भाई, मैं ये सामान टेंट वाले और हलवाई को वापस देकर आता हूँ," बंटी ने टेम्पू स्टार्ट करते हुए आवाज़ दी। अगले ही पल, इंजन की तेज़ आवाज़ के साथ वो भारी सामान को लेकर हवेली के मुख्य दरवाज़े से बाहर निकल गया।
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दिन ढलने लगा था और हवेली के बड़े से कमरे में दीवार घड़ी शाम के 4 बजा रही थी।
कामिनी बिस्तर पर बेसुध पड़ी थी। उसका गोरा जिस्म किसी जलती हुई भट्टी की तरह तप रहा था। कल रात की बेतहाशा और वहशी चुदाई, हवस के खौफ़नाक तूफ़ान और जिस्म के ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल ने उसके एक-एक जोड़, उसके रोम-रोम को तोड़ कर रख दिया था। समय गुज़रने के साथ-साथ अब उसमें हिलने-डुलने तक की ताक़त नहीं बची थी।

"क्या हुआ कामिनी? ठीक तो हो...?"
रमेश कमरे में कामिनी के सिरहाने खड़ा था और बड़े प्यार से उसके सिर पर हाथ फेर रहा था। रमेश वाकई एक अजीब सा मर्द था। रात के वक़्त भले ही वो शराब के नशे में धुत एक नामर्द और लापरवाह पति बन जाता हो, लेकिन दिन के उजाले में उसे अपनी बीवी की फ़िक्र भी होती थी। आज वो एक फिक्रमंद पति लग रहा था, जो इस बात से पूरी तरह अनजान था कि जिस बीवी के माथे को वो सहला रहा है, उसे पिछली रात उसी के ताऊजी ने किस बर्बरता से रौंदा था।

"अअअ... हाँ... हाँ... ठ ... ठीक हूँ..."
रमेश की छुअन महसूस होते ही कामिनी एकदम से हड़बड़ा कर सीधी होने की कोशिश करने लगी। उसके अंदर का चोर और गिल्ट उसे हर छुअन पर डरा रहा था।

"क्या ख़ाक ठीक हो! पूरा जिस्म तो गर्म भट्टी जैसा तप रहा है," रमेश ने उसके माथे और गर्दन को छूते हुए चिंता से कहा। "उस बूढ़े हकीम लकड़द्दीन को बुलवा लूँ क्या? वो देखकर बढ़िया दवा दे देगा।"

'हकीम' का नाम सुनते ही कामिनी का सुलगता हुआ जिस्म एक बार फिर खौफ़ से काँप उठा। ये हकीम और उसकी दवा ही तो इस सारी बर्बादी और बेशर्मी की जड़ थी। कामिनी में अब इतनी ताक़त और हिम्मत नहीं बची थी कि वो उस हकीम का सामना कर सके।

"ननन... नहीं... रहने दीजिये," कामिनी ने अपनी भारी पलकें बंद करते हुए बेहद कमज़ोर आवाज़ में कहा।
"अच्छा रुको, मैं किसी को उसके घर भेज कर बुखार की दवाई मँगवा लेता हूँ," रमेश ने कहा और कामिनी को उसी हाल में छोड़कर कमरे से बाहर आ गया।

बाहर आँगन में टेंट का बचा-खुचा काम समेटा जा रहा था। रमेश की नज़र सुलेमान पर पड़ी। सुलेमान ज़मीन में गहराई तक गड़ी हुई लकड़ी की भारी बल्लियों को उखाड़ रहा था। सुलेमान की ताक़त सच में गज़ब की थी साला एक ही झटके में पूरी की पूरी बल्ली को ज़मीन से ऐसे उखाड़ कर पटक रहा था जैसे कोई गाजर मूली हो।

 उसके बाज़ुओं की नसें तन गई थीं और पसीने से उसका गठीला बदन चमक रहा था।
"अरे भाई सुलेमान... सुनो ज़रा..." रमेश ने उसे आवाज़ दी।
"जी साब..." सुलेमान ने बल्ली ज़मीन पर फेंकते हुए कहा।
"वो मालकिन को तेज़ बुखार है। गाँव में उस हकीम का घर देखा है तुमने?"
"नहीं देखा साब..."
"तो किसी से रास्ते में पूछ लेना... जाओ जाकर एक खुराक लेते आना बुखार की।"

रमेश ने अपनी जेब से कुछ मुड़े-तुड़े दस-बीस के नोट निकाले और सुलेमान की चौड़ी हथेली पर रख दिए।
सुलेमान ने नोटों को मुट्ठी में भींचा। 

उसके दिमाग़ में गुस्सा खौलने लगा। "साला... बताओ, मेरे नाम से पूरा शहर खौफ खाता है, और इस चूतिये ने मुझे दो कौड़ी का नौकर बना के रखा है!" वो मन ही मन भुनभुनाता हुआ हवेली के मुख्य दरवाज़े से बाहर की तरफ़ चल दिया।

सुलेमान के जाते ही रमेश वापस अंदर जाने के लिए मुड़ा ही था कि...
ट्रिन.... ट्रिन.... ट्रिन....
रमेश के मोबाइल की घंटी बजी। उसने फोन उठाया।
"हेलो... हाँ... कौन?" रमेश की आवाज़ गूँजी। "अच्छा हाँ कादर! बताओ, क्या बात है?"
'कादर'

रमेश के मुँह से ये नाम निकलते ही, पास ही में कुछ सामान उठा रहे 'काला' और 'कांडी' के कान कुत्तों की तरह खड़े हो गए।
यही तो वो नाम था! यही तो वो शख़्स था जिसे ढूँढने के लिए सुलेमान ने उन्हें पैसे देने का वादा किया था,  

काला और कांडी ने चुपके से अपने काम की रफ़्तार धीमी कर दी और अपने कान रमेश की तरफ़ लगा दिए। इसे कहते हैं किस्मत! उन नामुरादों को कुछ ढूँढना ही नहीं पड़ा, ख़ुद कादर का सुराग़ चलकर उनकी झोली में आ गिरा था।

रमेश फोन पर थोड़ा परेशान लग रहा था, शायद नेटवर्क की दिक्कत थी।
"क्या...? अरे आवाज़ कट रही है... ज़ोर से बोलो... क्या कहा...?" रमेश लगभग चिल्लाते हुए बोल रहा था, जिससे काला-कांडी को सब साफ़ सुनाई दे रहा था।
"अच्छा... फ़ौजा सिंह जी की हवेली पर...? क्या... हाँ... हूँ... समझ गया। आज रात!"
ये कहकर रमेश ने फ़ोन काट दिया और तेज़ क़दमों से अंदर चला गया।
शराब और कबाब उसकी आँखों के सामने नाचने लगे थे.

लेकिन बाहर, काला और कांडी का काम बन चुका था। उन दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा। उनकी आँखों में ख़ुशी और पैसे की चमक साफ़ दिखाई दे रही थी।

"भाई... याद रखना... फ़ौजा सिंह की हवेली... और आज रात..." काला ने कांडी को फुसफुसाते हुए कहा।
"हाँ भाई... बस अब सुलेमान भाई के लौटने की देर है। पैसा ही पैसा होगा"


क्या वाकई आज रात कादर और सुलेमान आमने सामने होंगे.
दोनों ही शेर है....  क्या होगा जब दोनों शेर आपस मे टकराएंगे?
दोनों मे से एक तो सवा शेर साबित हो कर रहेगा.

मतलब आज रात एक कि मौत पक्की है.


क्रमशः 



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