कामिनी किसी तरह ख़ुद को सँभालती हुई अपनी सीट तक पहुँच गई थी। यह इत्तेफ़ाक़ ही था कि जो युवा कपल अभी वाशरूम के पास से गुज़रा था, उनकी सीटें इसी कूपे में थीं। साइड लोअर और साइड अपर (Side Lower & Upper) बर्थ उन्हीं की थी।
कामिनी को अपनी सीट पर बैठते देख उस लड़की ने चहकते हुए पूछा, "अरे... ये आपकी ही सीट है?"
"ह... हाँ... हाँ, हमारी ही है," कामिनी ने अपनी साँसों को क़ाबू करते हुए कहा। उसकी जाँघों के बीच अभी भी गीलापन और झुरझुरी महसूस हो रही थी।
लड़की ने तुरंत अपने पति की तरफ़ देखा और ताना मारते हुए बोली, "देखा विकास! शादी के इतने साल बाद भी इनका रोमांस नहीं छूट रहा। एक तुम हो..."
"क्या रितु! कहीं भी शुरू हो जाती हो? ऐसे बोलते हैं क्या किसी अनजान से?" विकास ने अपनी बीवी को झिड़कते हुए कहा। कामिनी इस अजीब से सवाल और उस 'रोमांस' वाले ताने से बुरी तरह असहज हो गई थी।
लेकिन रितु बड़ी बड़बोली और बेबाक किस्म की लड़की थी। उसने कामिनी की झेंप को नज़रअंदाज़ करते हुए अपनी बात जारी रखी, "लो, इसमें गलत क्या है? अच्छी ही तो बात है ना! मेम, हम लोग भी नैनीताल ही जा रहे हैं। अभी साल भर ही हुआ है हमारी शादी को। वैसे... आपकी शादी को कितने साल हो गए?"
"ब... ब... बीस साल..." कामिनी लगभग हकलाती हुई बोली। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या जवाब दे। ऊपर उसका असली पति रमेश सो रहा था, और ये लड़की सुलेमान को उसका पति समझ रही थी।
तभी कूपे की मद्धम पीली रोशनी में अचानक एक गहरा साया छा गया। रितु और विकास ने एक साथ नज़र उठाकर देखा। सामने से गैलरी को चीरता हुआ सुलेमान चला आ रहा था। उसके विशाल, चौड़े और फौलादी जिस्म ने जैसे डिब्बे की सारी रोशनी ही रोक ली थी।
"लो... आ गए आपके 'वो'..." रितु फिर से चहकी।
लेकिन जैसे ही सुलेमान उनके करीब आया, रितु की नज़रें सुलेमान के कड़क, गठीले सीने और उसकी ख़तरनाक मर्दानगी पर टिक गईं। रितु ने अपने पति विकास (जो कि एक सिंगल पसली और कमज़ोर सा आदमी था) की तरफ़ एक तिरछी नज़र डाली और फिर कामिनी को देखकर फुसफुसाई—
"अब... ऐसा फौलादी मर्द होगा, तो रोज़ ही हनीमून होता होगा ना!"
रितु की इस बात में एक अजीब सी जलन और हवस दोनों छुपी हुई थीं। वो अपने पति विकास को सीधे-सीधे ताना मार रही थी। विकास यह सुनकर खून का घूँट पीकर रह गया, वहीं भरपूर भरी जवानी की मालकिन रितु की आँखों में सुलेमान के लिए एक साफ़ लालच दिख रहा था।
सुलेमान बिना किसी की तरफ़ देखे, अपनी सीट पर आकर कामिनी के ठीक सामने बैठ गया।
सुलेमान के बैठते ही उस कूपे में एक खौफ़नाक सन्नाटा छा गया। सुलेमान का 'औरा' (Aura) ही कुछ ऐसा था, उसकी आँखों में दहशत ऐसी थी कि सामने वाले की घिग्घी बँध जाती थी। विकास और रितु ने भी सुलेमान की उस भारी-भरकम मौजूदगी को भाँप लिया और चुपचाप अपना सामान जमाकर, बिना कोई और बात किए अपनी-अपनी सीटों पर धराशाई हो गए (इनकी कहानी हम फिर कहीं पढ़ेंगे, ये बस यहीं तक थे)।
लेकिन रितु की वो आख़िरी बात... "ऐसा आदमी होगा तो रोज़ हनीमून होगा".. कामिनी के दिल में किसी शूल की तरह गहराई से चुभ गई थी।
कामिनी अपनी सीट पर बैठी, ख़ामोशी से सुलेमान को देख रही थी। उसके दिमाग़ में एक भयंकर तूफ़ान चल रहा था।
'क्या वाक़ई हर औरत ऐसा ही मर्द चाहती है? अगर आज की इस नई उम्र की लड़की (रितु) भी सुलेमान के जिस्म को देखकर लार टपका रही है... तो इसका मतलब सुलेमान के प्रति मेरा आकर्षण कोई पाप या ग़लत बात नहीं है! यह तो एकदम स्वाभाविक (natural) है।'
कामिनी अपने मन ही मन में, वाशरूम के बाहर की गई अपनी उस हरकत और अपनी सुलगती हवस को जायज़ ठहरा रही थी। उसे अब कोई गिल्ट नहीं था। उसे समझ आ गया था कि एक औरत का जिस्म आख़िर क्या माँगता है।
ट्रेन ने वापस से अपनी पूरी रफ़्तार पकड़ ली थी। पहियों की गड़गड़ाहट के अलावा पूरे डिब्बे में एक अजीब सी मुर्दानगी (सन्नाटा) छाई हुई थी। रात के 9 बज चुके थे। डिब्बे की मेन लाइटें बंद कर दी गई थीं और सिर्फ़ नाईट-लैंप की नीली रोशनी बची थी।
ऊपर रमेश बेसुध पड़ा था, साइड में वो नया कपल खुद मे व्यस्त था।
अब नीचे की दो सीटों पर सिर्फ़ कामिनी और सुलेमान बचे थे। दोनों एक-दूसरे के आमने-सामने लेटे हुए थे। और कामिनी की जाँघों के बीच गीली, लसलसी चड्डी अभी भी उसे चैन से लेटने नहीं दे रही थी।
"ससससस.... सुलेमान..."
रात के उस भारी सन्नाटे में कामिनी के काँपते, रसीले होंठों से एक बेहद धीमी और मादक आवाज़ निकली।
सुलेमान तो जैसे अपनी आँख और कान वहीं लगाकर बैठा था। इस मद्धम रोशनी में भी उसकी पूरी चेतना कामिनी पर ही केंद्रित थी।
"हह.. हाँ... क्या हुआ?" सुलेमान ने तुरंत जवाब दिया।
"वो... नीचे से बैग निकाल दो... कुछ लेना है।"
"क्या लेना है...?" सुलेमान ने बैग की तरफ देखते हुए पूछा।
"अरे... निकालो तो सही!" कामिनी की आवाज़ में एक अजीब सी बेचैनी थी। उसकी चड्डी उसकी जाँघों और गहरी दरार के बीच पेशाब और हवस के पानी से बुरी तरह गीली होकर फँस चुकी थी। हर एक सेकंड उस गीलेपन के साथ लेटना या बैठना उसे तड़पा रहा था। उससे अब और बर्दाश्त नहीं हो रहा था।
सुलेमान अपनी बर्थ पर से उठा, नीचे फ़र्श पर अपने घुटने टिकाए और एक ही झटके में वो भारी बैग बाहर खींच लिया।
कामिनी अपनी लोअर बर्थ पर बैठे-बैठे ही नीचे की तरफ़ झुकी और बैग की ज़िप खोलकर अंदर कुछ टटोलने लगी। लेकिन जैसे ही कामिनी नीचे झुकी, उसके स्लीवलेस डीप-नेक ब्लाउज़ का क़ातिलाना नज़ारा पूरी तरह से उजागर हो गया। उसके भारी और दूधिया स्तन घुटनों से दबकर लगभग उसके गले तक ऊपर आ गए थे। वो गहरी गोरी घाटी सुलेमान की आँखों के ठीक सामने थी, और सुलेमान की पलकें झपकना भूल गई थीं।
कामिनी ने हड़बड़ाहट में अपनी साड़ी का पल्लू इधर-उधर किया, और बैग के अंदर अपने कपड़े टटोलने लगी। लेकिन जो चीज़ वो ढूँढना चाहती थी... वो उसे कहीं नहीं मिली।
कामिनी के माथे पर पसीने की एक ठंडी लकीर तैर गई। उसका गोरा चेहरा एकदम शून्य पड़ गया।
"हे भगवान! मैं जल्दी-जल्दी में एक्स्ट्रा पैंटी रखना ही भूल गई!'"
सुलेमान, जो अब तक नीचे घुटनों के बल बैठा कामिनी की हर एक हरकत और उसके उछलते हुस्न को पी रहा था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर माजरा क्या है।
"क्या ढूँढ रही हो...? क्या नहीं मिल रहा?" सुलेमान ने आख़िर पूछ ही लिया।
"वो... वो... पप... पेन...मतलब, कुछ नहीं। रख दो वापस," कामिनी ने बात को टालते हुए बैग की ज़िप बंद कर दी।
सुलेमान ने चुपचाप बैग को वापस सीट के नीचे सरका दिया। लेकिन कामिनी की बेचैनी कम होने का नाम नहीं ले रही थी। वो गीली पैंटी उसकी जाँघों के बीच छिल रही थी, उसकी चौड़ी गांड और नाज़ुक दरार में बुरी तरह फँस कर उसे एक अजीब सी मीठी चुभन दे रही थी। एक बहुत ही असहज सी स्थिति बन गई थी।
"बताओ भी सही, क्या नहीं मिला?" सुलेमान ने इस बार थोड़ा ज़ोर देकर पूछा।
"वो.. वो... मुझे बाथरूम जाना है," कामिनी हकलाती हुई बोली। शायद उसने कोई उपाय निकाला हो अपनी उस गीली पैंटी को ठीक करने का या उससे निजात पाने का।
"बाथरूम? अभी तो गई थीं आप?" सुलेमान ने हैरानी से पूछा।
"समझा करो सुलेमान... ठीक नहीं लग रहा कुछ। औरत की दस मुसीबतें होती हैं," कामिनी ने अपनी झेंप मिटाने के लिए 'औरत' होने का ढाल बनाया।
अब सुलेमान क्या समझे? साला, अंडरवर्ल्ड का खूँखार डॉन... जो औरतों को सिर्फ़ अपनी हवस बुझाने के लिए बिस्तर पर लाता था और एक झटके में उनकी चड्डी फाड़कर फेंक दिया करता था, उसे एक आम औरत की 'दस मुसीबतों' के बारे में आख़िर क्या पता?
"बताओगी तो समझूँगा ना...?" सुलेमान ने फिर से अपनी मासूमियत (और थोड़ी सी ज़िद) दिखाते हुए कहा।
"कुछ नहीं... रहने दो..." कामिनी मुँह फुलाए हलके गुस्से मे अपनी सीट पर वापस लेट गई, लेकिन वो अभी भी बुरी तरह असहज थी। वो अपनी जाँघें बार-बार आपस में रगड़ रही थी।
'लो साला... मैंने क्या कर दिया अब? ये औरतें समझाना ही मुश्किल है,' सुलेमान ने ख़ुद ही ख़ुद में बड़बड़ाते हुए बोला।
कुछ पल की ख़ामोशी के बाद, सुलेमान ने हिम्मत जुटाकर वापस पूछ लिया, "बताओ ना... आख़िर क्या करना है? बाथरूम चलना है या सोना है?"
"अरे... पैंटी भूल आई हूँ अपनी! ये जो पहन रखी है, वो गीली हो गई है पेशाब से... मुझे दूसरी पहननी थी, पर मैं भूल गई! समझ ही नहीं आता तुम्हें एक बार में!"
कामिनी एकाएक भड़क गई और फ्रस्ट्रेशन में बिना कुछ सोचे-समझे एक ही साँस में सब कुछ बक गई।
डिब्बे में जैसे साँप सूँघ गया। एक ख़ौफ़नाक सन्नाटा छा गया।
अगर इस टोन में, इस तरह चिल्लाकर किसी और ने सुलेमान से बात की होती, तो सुलेमान अब तक उसकी ज़बान खींचकर उसके हाथ में दे चुका होता। लेकिन ये कामिनी थी... सुलेमान, जिसकी आवाज़ से ही बड़े से बड़ा गुंडा पैंट मे मूत देता था, वो इस औरत की डाँट सुनकर एक बच्चे की तरह सहम कर रह गया।
शायद आज सच में शेर को उसकी शेरनी मिल गई थी।
चंद सेकंड बीते। कामिनी को अचानक अपनी बात का अहसास हुआ। उसे समझ आया कि उसने क्या कह दिया है। उसने एक अनजान मर्द के सामने इतनी बेशर्मी, इतनी बेहयाई से अपनी 'गीली पैंटी' और पेशाब का ज़िक्र कर दिया था!
"सॉरी... वो... मुझे अच्छा नहीं लग रहा था... इसलिए ग़ुस्सा आ गया," कामिनी ने अपनी नज़रें झुकाते हुए बेहद धीमी आवाज़ में कहा। वो वापस अपनी सीट पर सीधी बैठ गई पैर नीचे लटकाये.
एक पल को फिर सन्नाटा सा छा गया। सिर्फ़ ट्रेन के पहियों की खड़खड़ाहट गूँज रही थी।
तभी मद्धम नीली रोशनी में सुलेमान की भारी, लेकिन एक बेहद कातिलाना आवाज़ गूँजी...
"तो उतार दो ना... कौन देख रहा है?"
सुलेमान के इस बेबाक और ख़तरनाक प्रस्ताव ने कामिनी का सीना धक से कर दिया। उसकी धड़कनें बेतहाशा तेज़ हो गईं।
"ऊऊऊ... उतार दूँ? यहाँ...? सबके सामने?" कामिनी का गला सूख गया।
"कौन सब...? कोई भी तो नहीं है।" सुलेमान ने ऊपर रमेश कि तरफ देख कहा।
"तुम तो हो..." कामिनी ने घबराहट और हवस के मिले-जुले भाव से अपनी लाल साड़ी को मुट्ठी में भींचते हुए कहा।
"मैं...? मैं तो मज़दूर हूँ ना?" सुलेमान ने इतनी मासूमियत से ये बात कही, जैसे उसे कुछ पता ही ना हो।
कामिनी की नज़रें सुलेमान की दहकती हुई आँखों और उसके फौलादी सीने पर जाकर टिक गईं। उसके रसीले होंठ काँपे और उसके मुँह से बस इतना निकला...
"मज़दूर हो तो क्या....?"
"हाँ... मज़दूर हो तो क्या...?" कामिनी सकपकाते हुए बोली, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक तैर गई थी।
"मतलब यही कि... मैं मज़दूरी करने ही तो लाया गया हूँ मेमसाब। आपका हुक्म मानना मेरा फ़र्ज़ है, आख़िर इसी बात के तो साब ने पैसे दिए हैं मुझे।" सुलेमान ने अपनी दहकती आँखों से कामिनी को घूरते हुए एक बहुत ही ख़तरनाक, लेकिन ऊपर से बिल्कुल भोला सा विचार रख दिया था। "आपको ख़ुद उतारने में शर्म आ रही है... तो मैं उतार दूँ?"
कामिनी का दिल और दिमाग़ एक पल के लिए सन्नाटे में आ गया। एक बिल्कुल अनजान पुरुष उसकी पैंटी उतारने की बात कर रहा था! लेकिन इस बेहूदा और ख़ौफ़नाक अहसास ने उसकी नाभि के नीचे जैसे एक मीठी सी आग सुलगा दी। उसकी जाँघों के बीच की नाज़ुक कली एक झटके से खुली और बंद हो गई...
पच...
हवस के रस की एक और गर्म धार ने उस पेशाब से भीगी पैंटी को और भी ज़्यादा गीला कर दिया।
कामिनी एक दहकती, सुलगती हुई औरत थी। सुलेमान जैसा गठीला, फौलादी और रोबदार मर्द उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी थी। वो कोई संस्कारी या सती-सावित्री औरत बिल्कुल नहीं रह गई थी, फिर भला इस मौके पर कैसे हिचकिचाती?
रमेश के साथ बिताई बेस्वाद ज़िंदगी ने उसका स्वभाव ही ऐसा बना दिया था कि एक असली मर्द को देखकर वो बहक जाती थी, पिघल जाती थी।
कामिनी ने सतर्क निगाहों से आस-पास देखा। डिब्बे में सिर्फ नीली बत्ती जल रही थी। साइड वाले नए कपल (रितु और विकास) लगभग सो चुके थे, उनकी साँसें सामान्य हो गई थीं। ऊपर रमेश शराब के नशे में मुर्दे सा पड़ा खर्राटे ले रहा था।
कामिनी के मुँह से कोई शब्द नहीं निकला, लेकिन उसके जिस्म ने बहुत कुछ बोल दिया। उसने अपनी दोनों गोरी और गदराई टाँगें उठाईं, और सीट के बीच के फासले को पार करते हुए... सामने वाली सीट पर बैठे सुलेमान की दोनों फैली हुई चौड़ी जाँघों के ठीक बीच में रख दिया।
सुलेमान ने कह तो दिया था कि "मैं उतार दूँ?" लेकिन अब, जब कामिनी के नाज़ुक पैर उसकी जाँघों के बीच थे, तो सुलेमान का दिल किसी इंजन की तरह धड़क रहा था।
यह वही सुलेमान था जिसके लिए औरतें सिर्फ़ गोश्त का एक टुकड़ा हुआ करती थीं। आज तक उसने किसी भी औरत के नखरे नहीं सहे थे। उसे जब भूख लगती, वो बिस्तर पर औरतों के कपड़े एक झटके में फाड़कर उन पर किसी भूखे भेडिये की तरह टूट पड़ता था। प्यार, नज़ाकत जैसी चीज़ें उसकी डिक्शनरी में थीं ही नहीं।
लेकिन आज... आज इस लाल साड़ी वाली औरत के सामने वो बेबस था। कामिनी की चड्डी उतारने के ख़याल भर से ही इस खूँखार डॉन का कलेजा काँप रहा था। उसके फौलादी, रफ़-टफ़ हाथ, जिन्होंने अनगिनत जानें ली थीं, आज कामिनी के हुस्न को छूने से पहले थरथरा रहे थे।
सुलेमान ने एक गहरी, काँपती हुई साँस ली और अपने खुरदरे, सख़्त हाथों को कामिनी की नाज़ुक एड़ियों पर रख दिया।
ईईस्स्स्स.....
सुलेमान के भारी और गर्म हाथों का स्पर्श पाते ही कामिनी के मुँह से एक खामोश सी सिसकी निकल गई। खुरदरे हाथ जब कामिनी की मखमली त्वचा से टकराए, तो जैसे दोनों के जिस्म में हज़ारों वोल्ट का करंट दौड़ गया।
सुलेमान ने जल्दबाज़ी नहीं की। उसने कामिनी की लाल शिफॉन की साड़ी के किनारों को टखनों (ankles) के पास से पकड़ा और बेहद धीमी गति से... इंच-दर-इंच... ऊपर की तरफ़ सरकाने लगा।
साड़ी के ऊपर खिसकते ही, उसके नीचे से कामिनी की गोरी, सुडौल और गदराई पिंडलियाँ (calves) उभर कर सामने आने लगीं। नीली रोशनी में वो पिंडलियाँ किसी तराशे हुए संगमरमर की तरह दमक रही थीं।
सुलेमान के हाथों की उँगलियाँ साड़ी के साथ-साथ कामिनी की पिंडलियों को सहलाते हुए ऊपर बढ़ रही थीं। सुलेमान के अँगूठे कामिनी की त्वचा को हल्के से दबा रहे थे।
कामिनी की मनोदशा इस वक़्त किसी ज्वालामुखी जैसी हो रही थी। एक तरफ़ पति के जागने का खौफ़, और दूसरी तरफ़ एक पराये, गठीले मर्द के हाथों का नशीला स्पर्श! कामिनी ने अपनी आँखें कसकर मींच लीं और अपना सिर पीछे सीट पर टिका दिया। उसने अपने निचले होंठ को दाँतों तले इतनी ज़ोर से दबा लिया कि जैसे अभी खून निकल आएगा, ताकि उसके हलक से कोई आवाज़ बाहर न आ जाए।
सुलेमान के हाथ अब कामिनी के घुटनों को पार कर चुके थे। साड़ी अब जाँघों तक आ गई थी।
और जाँघों का वो स्पर्श... उफ्फ़!
सुलेमान ने जैसे ही कामिनी की भारी, दूधिया और माँसल जाँघों पर अपने हाथ रखे, उसका दिमाग़ सुन्न पड़ गया। कामिनी की जाँघें किसी सुलगती हुई भट्टी की तरह तप रही थीं। सुलेमान की उँगलियाँ उस गोरे जिस्म में हल्की सी धँस गईं। उसने आज तक किसी औरत के जिस्म में इतनी गर्मी, इतनी आग महसूस नहीं की थी।
सुलेमान का हाथ साड़ी के अंदर अँधेरे में रेंगता हुआ और ऊपर बढ़ा।
और आख़िरकार... उसकी फौलादी उँगलियों ने उस गीली, चिपचिपी और पेशाब की गर्माहट से भरी चड्डी के इलास्टिक को छू लिया।
चड्डी के इलास्टिक पर सुलेमान की उँगलियों की छुअन पाते ही कामिनी का पूरा वजूद एक तीर की तरह तन गया। उसकी साँसें अटक गईं। उस नाज़ुक दरार के इतने करीब सुलेमान के हाथ होने का अहसास ही कामिनी को पागल कर रहा था। गीली चड्डी से उठने वाली कसैली (musky) और नशीली महक सीधे सुलेमान के नथुनों में घुस रही थी, उसके अंदर के जानवर को आज़ाद कर रही थी।
सुलेमान चाहता तो एक झटके में उस चड्डी को फाड़ सकता था, लेकिन उसने ख़ुद पर काबू रखा। वो जानता था कामिनी उसकी खरीदी हुई रंडी नहीं है, बल्कि इस वक़्त वो यहाँ पर खरीद के लाया गया इंसान है.
उसने उस गीली चड्डी के किनारों को अपनी दोनों तरफ की उँगलियों में फँसाया।
कामिनी कि दोनों जाँघे आपस मे भींची हुई थी.
इस एक ख़याल ने ही उसके अंदर एक अजीब सा रोमांच, और उसके फौलादी हाथों में एक अनजाना सा सब्र पैदा कर दिया था।
उसने गीली चड्डी के किनारों को अपनी दोनों तरफ़ की उँगलियों में फँसाया।
कामिनी की दोनों गोरी, गदराई जाँघें शर्म और हवस के मारे आपस में कसकर भिंची हुई थीं। सुलेमान के खुरदरे, सख़्त अँगूठे चड्डी के दोनों किनारों पर मज़बूती से कस गए। कामिनी को अपनी कमर और जाँघों के आस-पास मर्दाना हाथों का भारी दबाव साफ़ महसूस हो रहा था।
उसका दमकता हुआ गोरा चेहरा पसीने से भीगने लगा था। किसी भी पल उसके सुलगते नाज़ुक अंगों को इस गीली घुटन से आज़ादी मिलने वाली थी। कामिनी ने आने वाले चरम सुकून के लिए अपनी आँखें बंद कीं और अपने दाँत कसकर भींच लिए।
सुलेमान के फौलादी हाथ नीचे की तरफ़ कसते चले गए... चड्डी अभी आधा इंच ही नीचे सरकी थी कि...
सुलेमान अचानक रुक गया।
साड़ी के अंदर घने अँधेरे में उसे अपने हाथों की पीठ पर एक अजीब सी, दहकती हुई गर्मी महसूस हुई। वो गर्मी किसी खौलते हुए ज्वालामुखी के भभके जैसी थी, जो कामिनी की जाँघों के बीच से उठ रही थी। सुलेमान की उँगलियों ने चड्डी को और नीचे खींचने के बजाय, ख़ुद-ब-ख़ुद उस भड़कती हुई गर्मी का पीछा करना शुरू कर दिया। उसकी उँगलियाँ कमर से नीचे उतरीं और सीधे कामिनी की दोनों भिंची हुई जाँघों के बीच जाकर टिक गईं...
"आआआआह्हः.... ईसससस... सुलेमान...."
कामिनी के मुँह से एक बेकाबू, काँपती हुई सिसकी फूट पड़ी। उसने तुरंत अपनी हथेली उठाई और कसकर अपने मुँह पर रख ली ताकि रमेश के कानों तक उसकी ये मदहोशी न पहुँच जाए।
सुलेमान की सख़्त उँगली कामिनी की फूली हुई, सुलगती कली (चुत) के ठीक ऊपर दबाव बना रही थी। चड्डी के गीले कपड़े के ऊपर से ही सही, लेकिन वो प्रेसर इतना सटीक और मादक था कि कामिनी का पूरा जिस्म वासना की एक मीठी ऐंठन में अकड़ गया।
सुलेमान रुका नहीं।
उसकी उँगली उस कपड़े के किनारे से फिसलकर, कामिनी की दोनों चिपकी हुई जाँघों की गहरी और नाज़ुक दरार के बीच उतरने लगी। सुलेमान को ऐसा लगा जैसे उसकी उँगली किसी खौलते हुए लावे में झुलस जाएगी। कामिनी ने झटके से अपनी आँखें खोलीं और सामने बैठे सुलेमान को देखा।
उस मद्धम नीली रोशनी में दोनों की निगाहें टकराईं। आँखों ही आँखों में जैसे कोई ख़ामोश, लेकिन बेहद गहरी बात हो गई। एक मूक इज़ाज़त, एक बेशर्म आज़ादी।
लेकिन असली भाषा तो साड़ी के अंदर चल रही थी। सुलेमान की मज़बूत उँगलियाँ कामिनी की गदराई जाँघों के बीच गहराई तक धँस गईं और फिर उन्होंने दोनों जाँघों को विपरीत दिशा में (बाहर की तरफ़) धकेलना शुरू किया। हालाँकि सुलेमान ने कोई ख़ास ज़ोर नहीं लगाया था, लेकिन उसके हाथों की छुअन में एक ऐसा जादू था कि कामिनी का जिस्म पिघल गया और उसकी जाँघें ख़ुद-ब-ख़ुद थोड़ी सी खुल गईं।
जाँघों का खुलना था कि...
सुलेमान की उँगलियाँ कामिनी के जिस्म से रिसते हुए गर्म, लसलसे और चिपचिपे 'शहद' से पूरी तरह भीग गईं। उस हवस के रस में आग इतनी थी कि पूछो मत! कोई आम आदमी होता, तो शायद उसी वक़्त अपनी उँगलियाँ कामिनी के इस कामुक ज्वालामुखी में हमेशा के लिए स्वाहा कर बैठता, लेकिन सुलेमान तो ख़ुद आग से खेलने वाला खिलाड़ी था।
एसी कोच की ठंडक भी अब कामिनी के सुलगते जिस्म की आँच को कम नहीं कर पा रही थी। ट्रेन के पहियों की 'खट-खट... खट-खट' की एकरस आवाज़ के बीच, डिब्बे में अगर कुछ सबसे तेज़ सुनाई दे रहा था, तो वो थी कामिनी की भारी होती साँसें। हमफ़्फ़्फ़... हमफ़्फ़्फ़....
सुलेमान के हाथों में कोई जल्दबाज़ी नहीं थी। वो एक माहिर शिकारी की तरह, अपनी शिकार की इस तड़प और बेबसी का पूरा मज़ा ले रहा था। साड़ी के अंदर गहरे अँधेरे में, उसकी खुरदरी और फौलादी उँगलियों ने गीली, चिपचिपे चड्डी के ऊपर से ही बहुत आहिस्ता से कुछ टटोलना शुरू किया। उसका हर एक स्पर्श कामिनी की नसों में पिघला हुआ सीसा घोल रहा था।
और फिर... सुलेमान की उँगलियों की वो धीमी हरकत अचानक एक जगह आकर ठहर गई।
थोड़ी सी मशक्कत के बाद उसे वो बिंदु मिल ही गया। अति-उत्तेजना मे कामिनी कि चुत का दाना फूल कर बहार आ गया था, जिसे चड्डी के ऊपर से साफ महसूस किया जा सकता था, कामिनी के जिस्म का सबसे नाज़ुक और संवेदनशील केंद्र (कली) एक छोटे से दाने की तरह पूरी तरह से उभर कर तन चुका था।
सुलेमान ने अपनी सख़्त, मर्दाना उँगली को उस उभरे हुए नाज़ुक दाने पर रखा और बेहद आहिस्ता से एक हल्का सा दबाव बनाया।
"आअह्ह्ह.... सुस्स्स... सुलेमान... नहींम्म्म..."
उस एक सटीक स्पर्श के पड़ते ही कामिनी का पूरा जिस्म किसी कमान की तरह तन गया। उसके रसीले होंठों से एक छटपटाती हुई, काँपती सिसकारी फूट पड़ी। उसने बेबस होकर अपना सिर पीछे बर्थ की दीवार पर पटक दिया और अपनी ही हथेलियों से अपना मुँह कसकर दबा लिया, ताकि उसकी उत्तेजना, उसकी वासना का कोई गवाह ना बन पाए.
लेकिन सुलेमान रुका नहीं। उसने उस नाज़ुक उभार को भीगी हुई पैंटी के कपड़े के ऊपर से ही सहलाना शुरू कर दिया।
इसससस.... हमफ़्फ़्फ़... आह्हः....
सुलेमान की उँगली चुत के संवेदनशील दाने पर गोल-गोल, बेहद धीमी और एक जादुई लय में घूमने लगी। उस खुरदरी उँगली और भीगे हुए कपड़े के बीच पैदा होने वाला धीमा घर्षण... उफ़्फ़! कामिनी को ऐसा लग रहा था जैसे उसे मीठे ज़हर का इंजेक्शन दिया जा रहा हो।
हर गुज़रते सेकंड के साथ कामिनी की हालत ख़राब होने लगी। दर्द, सुख और हवस की एक ऐसी ऐंठन उसके निचले हिस्से में उठ रही थी कि उसकी दोनों गोरी जाँघें रह-रह कर काँप उठती थीं। उसका दिमाग़ और उसकी बची-खुची हया चीख रही थी कि वो अपनी जाँघों को आपस में कसकर भींच ले, इस मज़दूर के हाथों को झटक दे... लेकिन उसका जिस्म पूरी तरह से बगावत कर चुका था।
सुलेमान के हाथों की मादक चाल इस कदर क़हर ढा रही थी कि कामिनी की देह ख़ुद-ब-ख़ुद ऊपर की तरफ़ उठने लगी, ताकि उस मर्दाना उँगली का दबाव अपने नाज़ुक दाने पर और भी गहराई से महसूस कर सके, वो चाहकर भी उसे रोक नहीं पा रही थी, बल्कि उसकी प्यास और बढ़ती जा रही थी।
"उफ्फ्फ्फ़... ईसससस..."
आँखों से आँसू, माथे पर पसीने की बूँदें और होंठों पर दाँतों के निशान। कामिनी ने उस चरम सुख के मीठे दर्द को बर्दाश्त करने के लिए अपने दोनों हाथों को नीचे किया और बर्थ की रेक्सीन वाली गद्दी में अपने नाख़ून पूरी ताक़त से गाड़ दिए।
सुलेमान की निगाहें लगातार कामिनी के तड़पते, सिसकते और पसीने से नहाए हुए चेहरे पर टिकी थीं। एक संस्कारी घरेलु औरत को बिना उसके कपड़े उतारे, सिर्फ़ अपनी उँगलियों के एक धीमे इशारे पर इस तरह तड़पाना, सुलेमान के अंदर के 'डॉन' को एक अजीब सा गुरूर और ख़ुशी दे रहा था।
नीली रोशनी में कामिनी का जिस्म अब सुलेमान की उँगलियों की लय पर पूरी तरह से एक कठपुतली की तरह नाच रहा था,
ट्रेन की 'खट-खट... छुक-छुक' की लय के साथ सुलेमान की उँगलियों का जादुई घुमाव अब पूरी तरह से तालमेल बिठा चुका था। डिब्बे के सन्नाटे में, जहाँ एक तरफ रमेश के बेसुध खर्राटे गूँज रहे थे, वहीं नीचे कामिनी के जिस्म में एक भयंकर तूफ़ान खामोशी से उफ़ान ले रहा था।
सुलेमान की खुरदरी उँगली लगातार गीली चड्डी के ऊपर से कामिनी के नाज़ुक, उभरे हुए दाने को सहला रही थी। चड्डी अब कामिनी की हवस के गाढ़े रस से इतनी तरबतर हो चुकी थी कि सुलेमान की उँगली और उस संवेदनशील दाने के बीच का वो घर्षण बेहद रपटला (slippery) और कामुक हो गया था।
साड़ी के नीचे, उन दोनों गदराई जाँघों के बीच से अब एक बेहद खामोश, लेकिन मदहोश कर देने वाली लसलसी आवाज़ आने लगी थी 'पच... पच... श्श्श...'
कामिनी का दिमाग़ सुन्न हो चुका था। वो एक ऐसी ट्रांस (trance) में जा चुकी थी जहाँ उसे सिर्फ और सिर्फ वो मीठा दर्द और अपनी जाँघों के बीच सुलेमान का फौलादी हाथ महसूस हो रहा था। सुलेमान ने अपनी उँगली का दबाव हल्का सा और बढ़ा दिया। अब वो सिर्फ गोल-गोल घुमा नहीं रहा था, बल्कि बीच-बीच में फूल कर तन चुके दाने को हल्का सा दबा (press) देता।
"आआह्ह्ह... ऊईई माँ..." कामिनी का गला रुँध गया।
उसकी कमर में अचानक एक ज़बरदस्त झटका लगा। उसकी भारी गांड बर्थ की गद्दी से पूरी तरह हवा में उठ गई, जैसे वो खुद सुलेमान के हाथ की तरफ खिंची जा रही हो। कामिनी के पाँव की उँगलियाँ कसकर सिकुड़ गई थीं, उसके गोरे पैर सुलेमान की चौड़ी जाँघों पर रगड़ खा रहे थे। वो दर्द और सुख के ऐसे दोराहे पर खड़ी थी जहाँ से वापसी नामुमकिन थी। उसे लग रहा था कि उसकी कोख के अंदर कोई आग का गोला फूटने वाला है।
सुलेमान कामिनी की इस तड़प को बहुत नज़दीक से देख रहा था। उसने देखा कि कैसे इस औरत का ग़ुरूर, इसकी हया, सब कुछ उसकी एक उँगली की नोक पर आकर पिघल चुका है। सुलेमान अपनी सीट से थोड़ा और आगे झुका। उसका चौड़ा सीना लगभग कामिनी के घुटनों को छू रहा था।
उसने अपना चेहरा कामिनी के चेहरे के बिल्कुल करीब लाया। कामिनी की आँखें बंद थीं, उसका चेहरा पसीने से नहाया हुआ था और वो भारी-भारी साँसें ले रही थी।
"पसंद आ रही है ना... ये मज़दूरी?" सुलेमान ने एक खौफ़नाक, लेकिन बेहद मादक फुसफुसाहट में कामिनी के कान के पास कहा। उसकी गर्म साँसें कामिनी की गर्दन को झुलसा रही थीं।
कामिनी के पास कोई अल्फ़ाज़ नहीं बचे थे। वो बस अपना सिर 'हाँ' में हिला पाई। उसका पूरा जिस्म काँप रहा था।
"प्प्प्... प्लीज़... सुलेमान... आअह्ह्ह..." कामिनी के होंठों से बस एक टूटी हुई मिन्नत निकली। वो चाह रही थी कि सुलेमान अब उसे आज़ाद कर दे, उस चरम सुख तक पहुँचा दे जिसके लिए वो तड़प रही है।
लेकिन सुलेमान इतनी जल्दी उसे छोड़ने वाला कहाँ था। उसने अचानक से अपनी उँगली की गति को एकदम धीमा कर दिया। जहाँ कामिनी को अब तेज़ झटकों की ज़रूरत थी, सुलेमान जानबूझकर उसे तड़पाने लगा। वो उँगली को बस हल्का सा दाने के किनारे पर रगड़ता और फिर हटा लेता।
कामिनी इस अचानक आए ठहराव से छटपटा उठी। "नहीं... रोको मत... ईससस... प्लीज..."
वो पूरी तरह से पागल हो चुकी थी। अपनी आख़िरी शर्म को भी ताक पर रखते हुए, कामिनी ने अपने दोनों हाथ बर्थ से उठाए और सुलेमान की कलाई को कसकर पकड़ लिया जो उसकी साड़ी के नीचे, जाँघों के बीच थी।
उसने सुलेमान के हाथ को अपनी तरफ़ ज़ोर से खींचा, ताकि वो उँगली वापस उस दाने पर पूरी ताक़त से दब जाए।
एक औरत का इतना नंगा और हवस से भरा हुआ समर्पण देखकर सुलेमान की नसों में भी आग लग गई। उसने कामिनी की उस बेकरारी को महसूस किया और अगले ही पल... सुलेमान की उँगलियों ने उस गीली चड्डी को आख़िरकार एक किनारे से साइड मे सरका ही दिया।
अब बीच में कोई कपड़ा नहीं था। कामिनी कि चुत नंगी हो गई थी, बस गांड कि दरारा मे अभी भी पैंटी फसी हुई थी, लेकिन अब किसे परवाह थी, कि कच्छी कहाँ है? है भी या नहीं?
इस्स्स.... Ac का ठंडा झोंका गीली नंगी चुत से टकरा गया.
आआआहहहहह...... सुलेमान उउउफ्फ्फ्फ़....
कपड़े की वह आख़िरी दीवार हटते ही, सुलेमान की सख़्त और खुरदरी उँगली के और कामिनी के नंगे, सुलगते हुए केंद्र के बीच अब कोई पर्दा नहीं बचा था।
नंगी और नाज़ुक त्वचा पर एक फौलादी मर्द के खुरदरेपन का पहला सीधा स्पर्श कामिनी के वजूद पर किसी आसमानी बिजली की तरह गिरा।
"आआआह्ह्ह...!!"
कामिनी की देह किसी कमान की तरह हवा में तन गई। उसकी भारी कमर बर्थ की गद्दी से लगभग आधा फुट ऊपर उठ गई। वह झटका इतना तीव्र और नशीला था कि कामिनी की आँखें पूरी तरह पीछे की तरफ़ पलट गईं। उसने अपने मुँह को साड़ी के पल्लू से कसकर दबा लिया, ताकि उसकी चीखें रमेश के कानों तक ना पहुँच जाएँ।
स्तन तो पसीने से लबालब थे, उस पर कोई पर्दा नहीं था, वो कामिनी कि हर सांस के साथ हिचकोले खा रहे थे.
सुलेमान को अब साफ़ महसूस हो रहा था कि कामिनी कि चुत गाढ़े , मादक रस से पूरी तरह तरबतर हो चुकी है। उसकी उँगली अब बिना किसी रुकावट के उस संवेदनशील दाने पर फिसल रही थी। सुलेमान ने अपनी उँगली की गति को एकदम धीमा रखा, लेकिन दबाव थोड़ा और बढ़ा दिया।
उसकी उँगली का हर एक गोल घुमाव, कामिनी की नसों में पिघला हुआ लावा भर रहा था।
"सु... सुलेमान... मैं... मैं मर जाऊँगी... आअह्ह्ह..."
कामिनी पल्लू के भीतर ही सिसक रही थी। उसका सिर दाएँ से बाएँ पागलों की तरह तड़प रहा था।
सुलेमान की आँखें अँधेरे में भी किसी शिकारी जानवर की तरह चमक रही थीं। उसे यह देखकर एक अजीब सा वहशी गुरूर हो रहा था, आज तक ना जाने कितनी औरतों को उसने चोदा था, भोगा था, लेकिन किसी औरत का तड़पता देख ये सुकून मिल सकता है यूज़ पता ही नहीं था.
असल मे सम्भोग सुख देने का नाम है, लेने का नहीं.
लगता था जैसे कामिनी मामूली मज़दूर की एक उँगली की नोक पर अपनी आख़िरी साँसें गिन रही है।
सुलेमान ने अपने अँगूठे को कामिनी की गोरी जाँघ पर जमाया और अपनी खुरदरी उँगली को उस रसीले दाने पर एक जादुई लय में ऊपर-नीचे सहलाना शुरू किया।
स्लप... श्श्श... पच... पचक...
बिना कपड़े के, अब वो खामोश आवाज़ और भी मादक और स्पष्ट हो गई थी। उस सँकरी सी जगह में कामिनी के जिस्म की कसैली और नशीली महक इतनी गाढ़ी हो चुकी थी कि सुलेमान का ख़ुद का नशा भी बेकाबू हो रहा था।
"ये मजदूर गढ़ा भी खोद लेता है मेमसाब " ना जाने क्यों सुलेमान को खुद को मजदूर मान लेने मे मजा आ रहा था.
कामिनी अब किसी भी बात का जवाब देने की हालत में नहीं थी। वो सुख के उस ख़तरनाक मुहाने पर खड़ी थी जहाँ से नीचे सिर्फ़ मदहोशी की खाई थी। सुलेमान के हाथों की गति अब थोड़ी सी तेज़ हो गई। वो घर्षण, वो गर्माहट, वो खुरदरापन... कामिनी के दिमाग़ की नसें फटने को हो रही थीं।
"ईससस... प्लीज... सुलेमान... हाँ... और... और तेज़..."
कामिनी ने अपनी बची-खुची सारी शर्म को ताक पर रख दिया। उसने अपनी दोनों टाँगों को सुलेमान की जाँघों पर और चौड़ा कर दिया, ताकि वो फौलादी हाथ उसके जिस्म में और गहराई से समा सके।
और फिर... वो पल आ ही गया।
सुलेमान ने अपनी उँगली से उस नाज़ुक दाने पर एक आख़िरी, मज़बूत और गहरा दबाव बनाया।
"आआआआअअअअह्ह्ह्ह...!!!!"
कामिनी के मुँह से पल्लू के अंदर ही एक गूँजती हुई, लंबी और बेकाबू सिसकी निकली। उसका पूरा जिस्म एक भयंकर ऐंठन में जकड़ गया। उसकी दोनों गोरी जाँघें बेतहाशा काँपने लगीं और उसने सुलेमान की चौड़ी जाँघों को अपने पैरों से कसकर भींच लिया। उसके नाख़ून बर्थ की रेक्सीन को चीरने लगे।
एक के बाद एक... चरम सुख की कई मीठी लहरें कामिनी के जिस्म से गुज़रने लगीं। उसके दहकते हुए ज्वालामुखी ने आख़िरकार अपना सबसे गर्म और नशीला रस छोड़ दिया, जिसने सुलेमान के पूरे हाथ को भिगो दिया।
कुछ पलों तक कामिनी का जिस्म हवा में ही काँपता रहा, और फिर किसी कटे हुए पेड़ की तरह उसकी कमर वापस बर्थ पर आ गिरी।
वो पूरी तरह से निढाल हो चुकी थी। उसकी आँखें आधी खुली थीं, सीना धौंकनी की तरह तेज़-तेज़ चल रहा था, और उसका पूरा जिस्म पसीने से नहाया हुआ था। उसे ऐसा लग रहा था जैसे वो अभी-अभी जन्नत का दरवाज़ा छूकर लौटी हो।
सुलेमान ने धीरे से अपने कामरस से भीगे हाथ मे कामिनी कि चड्डी का अगला हिस्सा मजबूती से पकड़स और सरररर..... करता हुआ हाथ बाहर खिंच लिया.
सुलेमान का हाथ आज़ाद था लेकिन जिस मकसद से वो खाई मे उतरा था वो पूरा हुआ, कामिनी कि प्रशाब और चूतरस से भीगी चड्डी सुलेमान के मजबूत हाथो मे फड़फड़ा रही थी.
सुलेमान ने एक बार कामिनी के पसीने से तरबतर और बिखरे हुए हुस्न को देखा, और उसके खुरदरे होंठों पर एक ख़तरनाक, विजयी मुस्कान तैर गई।
कामिनी निढाल अपनी सीट पर चित पढ़ी हुई थी, उसके बाल, स्तन साड़ी सब बिखरा हुआ था.
लगता था जैसे बेहोश हो गई हो.
होती भी कई ना उसकी आत्मा तो चुत के रास्ते निकल सुलेमान कि हथेली पर किसी शहद कि तरह लिपटी हुई थी.
क्रमशः...
Sorry दोस्तों समय कि कमी कि वजह से image नहीं क्रिएट कर पा रहा हूँ.
Image search करने उसे कहानी के अनुसार बनाने मे बहुत वक़्त चला जाता है.
यदि कोई दोस्त image के मामले मे हेल्प कर सकता है तो प्लीज टेलीग्राम ( @andypndy) पर सम्पर्क करे.
बाकि आप पाठको का सहयोग मुझे मिल ही रहा है.
आपका योगदान इस कहानी को आगे बड़ा रहा है.
सभी पाठको का दिल से धन्यवाद.
पंकज और गौरव भाई का विशेष धन्यवाद
andywine@ptyes (फॉर डोनेशन?)

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