मेरी माँ कामिनी 3.0 - अध्याय 2
ट्रेन तेज़ी से रफ़्तार पकड़ रही थी, और उसके साथ ही कामिनी के सीने में दबी इच्छाएँ भी।
वह अपने पति रमेश के साथ यहाँ आई थी, एक खूबसूरत सफ़र पर... लेकिन उसे पहला झटका लग चुका था। उसका बेकाबू, सुलगता हुआ जिस्म बार-बार सामने बैठे सुलेमान के गठीले बदन को नाप रहा था। कामिनी की नज़रें चोरी-छिपे उसकी कमर की कसावट और बाज़ुओं में फड़कती नसों को महसूस कर रही थीं।
"शाबाश सुलेमान, आओ... बैठ जाओ अब," रमेश ने एक मालिक की तरह आदेश दिया।
सुलेमान ठीक कामिनी के सामने वाली सीट पर आकर बैठ गया। दोनों के घुटनों के बीच बमुश्किल कुछ इंच का फासला था। कामिनी की हिम्मत ही नहीं हो रही थी कि वो आँखें उठाकर सुलेमान से नज़रें मिला सके। वो इधर-उधर देखकर अपनी झेंप और अपने लाल होते चेहरे को छुपाने की नाकाम कोशिश कर रही थी।
एसी डिब्बे की कड़कड़ाती ठंड में भी कामिनी के माथे पर पसीने की बारीक बूँदें छलक आई थीं। और आता भी क्यों ना? ऐसा फौलादी मर्द ठीक सामने बैठा हो, और सुलगते जिस्म में हलचल ना हो... ये तो बेमानी ही थी ना!
शाम के 7 बज चुके थे। बाहर पहाड़ों का अँधेरा घिरने लगा था और ट्रेन की खिड़कियों के काले शीशों पर अब अंदर का अक्स दिखने लगा था।
"खाना-वाना खा के सो लेना भाई सुलेमान। कल दोपहर बाद ही आना है नैनीताल," रमेश ने अपनी सीट पर पैर पसारते हुए कहा। फिर उसने अपना गुरूर और रुतबा झाड़ते हुए ताना मारा, "तू तो शायद पहली बार ही जा रहा होगा ना ऐसे ट्रेन में... ऐसे आलीशान एसी डिब्बे में?"
"हाँ साले... जिस दिन सुलेमान औकात मे आया ना पैंट गीली हो जाएगी..."
सुलेमान का मज़बूत जबड़ा गुस्से से कस गया, लेकिन ये अल्फ़ाज़ बस उसके मन ही मन में घुट कर रह गए।
हालाँकि कामिनी को रमेश का इस तरह बात करना बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। वह इंसान की कद्र करती थी, चाहे वो छोटा हो या बड़ा।
"अजी... ऐसे क्या बोल रहे हैं आप?" कामिनी ने टोकते हुए कहा।
"अरे अच्छी बात है ना, बेचारा थोड़ा दुनिया घूम लेगा। क्यों भाई सुलेमान, कुछ गलत कहा क्या मैंने?" रमेश ने ढीठपन से बोलते हुए साइड में रखे अपने बैग की ज़िप खोली और उसमें से शराब का एक क्वार्टर (Quarter) निकाल लिया। शाम होते ही उसके शराबी लिवर ने अपनी खुराफ़ात शुरू कर दी थी।
"जज... जी साब," सुलेमान ने अपना सारा अपमान पी लिया और अपना खौलता हुआ गुस्सा गटक गया।
ना जाने क्यों? वरना तो ऐसे समय वो सामने वाले की ज़बान एक झटके में उखाड़ लेने वाला खूँखार डॉन था।
लेकिन आज वो शांत था... शायद शायद अपने सामने बैठी इस खूबसूरत औरत के लिए, जिसकी परफ्यूम की महक और जिस्म की गर्मी उसे यहाँ तक महसूस हो रही थी। उसका पत्थर दिल उसे इस ट्रैन मे खिंच लाया था.
वरना तो ना जाने कितनी लड़की, औरते उसने चोद के फेंक दी थी, लेकिन कामिनी मे जो आकर्षण था वो सुलेमान कि बर्बरता पर हावी था, कामिनी कि मादकता ने उसके हाथ पाव मे बेड़िया डाल दी थी.
"साला मर्द भी ना.... कब दिल लगा बैठे पता नहीं "
सुलेमान शायद बर्बादी के रास्ते पर निकल गया था... ये हुस्न कि तलब बड़े बड़े राजाओं, शूरवीरो का बर्बाद कर चुकी, ये सुलेमान क्या चीज हुआ?
"आप सही कह रहे हैं साब... पहली बार बैठा हूँ, ये तो बहुत ठंडी सी लग रही है," सुलेमान ने अपने 'मज़दूर' वाले वजूद को बनाए रखा और कामिनी की तरफ़ देखकर एक फीकी, बेबस सी मुस्कान दे दी।
लेकिन कामिनी को इस मुस्कान में कुछ अजीब लगा। जैसे ये बनावटी हो। जैसे कोई शेर पिंजरे में बैठकर घास खाने का नाटक कर रहा हो।
"क्या ये वाकई एक मज़दूर ही है?" कामिनी के ज़ेहन में शक का एक गहरा बीज घर कर गया था।
तभी कामिनी की नज़र रमेश के हाथों पर गई।
"अजी, क्या ट्रेन में भी शुरू हो गए आप?" कामिनी ने रमेश को क्वार्टर खोलते देख झुँझला कर कहा।
"क्या करूँ? रास्ता लंबा है... तो क्या यहाँ खड़ा होकर नाचूँ?" रमेश ने अपने दो टके के जवाब से कामिनी का मुँह बंद कर दिया। रमेश था ही निर्लज्ज।
उसने अपनी कोल्ड ड्रिंक की बोतल में आधी दारू मिला ली और एक बड़ा घूँट भर लिया। दारू हलक से नीचे उतरते ही उसके सामने उसका सुनहरा भविष्य नाचने लगा। विदेशी पार्टी, 100 करोड़ रुपये, विदेश में आलीशान घर, बड़ी गाड़ी... सब कुछ उसे दारू के पहले ही घूँट में साफ़ दिखने लगा था।
उसे रत्ती भर भी अंदाज़ा नहीं था कि जिस ख़्वाब को वो देख रहा है, उसका सबसे बड़ा रोड़ा (सुलेमान) उसके ठीक सामने बैठा उसे खामोशी से तौल रहा है।
ट्रेन के पहियों की गड़गड़ाहट और बोगियों की ताल के बीच, रमेश अपनी धुन में मस्त था। 15 मिनट और बीत चुके थे। रमेश ने गटागट पहला क्वार्टर खतम करके दूसरा खोल लिया था। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, ख्याली चमक.
कामिनी ने अब रमेश को टोकना छोड़ दिया था; वो जानती थी कि इस नशे के दरिया में रमेश को रोकने का मतलब है अपनी ही शाम बर्बाद करना।
रमेश ने नमकीन का पैकेट फाड़ा और एक मूंगफली मुँह में डालते हुए सुलेमान की तरफ देखा।
"हाँ भाई सुलेमान! ऊपर वाली सीट पर चद्दर बिछा दे, मैं ज़रा आराम से अपनी बोतल का मज़ा लूँगा," रमेश ने हुक्म दिया।
"कौन... मैं?"
तभी अचानक सुलेमान की भारी, बेस और रौबदार आवाज़ पूरे कूपे में दहाड़ की तरह गूँज गई। उसका वो अंदाज़ किसी मज़दूर का नहीं, बल्कि किसी ऐसे इंसान का था जिसे हुक्म देने की आदत थी। सुलेमान शायद कुछ पल के लिए भूल ही गया था कि वो कहाँ है और किस हैसियत में है।
उसकी उस दहाड़ से कामिनी और रमेश दोनों एक साथ सिहर गए। पूरा डिब्बा एक पल के लिए जैसे ठंडा पड़ गया।
"ममम... मैं कर देती हूँ," कामिनी ने हड़बड़ाहट में अपनी चुप्पी तोड़ी, उसने हाथ आगे बढ़ाया ही था कि सुलेमान ने बिजली की तेज़ी से चद्दर उसके हाथ से लगभग छीन ली।
"आ.. आप रहने दीजिये मेमसाब, मैं करता हूँ," सुलेमान ने अपनी आवाज़ को फौरन मज़दूरों वाली नरमी में ढाला, लेकिन उसके माथे पर खींची लकीरें गवाही दे रही थीं कि उसने अभी एक बहुत बड़ी चूक कर दी है।
कामिनी वापस अपनी सीट पर बैठ गई, लेकिन अब उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। सुलेमान चद्दर बिछाने के लिए ठीक उसके सामने खड़ा था। इस वक्त सुलेमान और कामिनी के बीच की दूरी महज़ दो इंच थी। सुलेमान की फौलादी मर्दानगी का हिस्सा, उसकी कमर का निचला हिस्सा और सख़्त जाँघें कामिनी की नाक के बिल्कुल करीब थीं।
सुलेमान ने चद्दर बिछाने के लिए हाथ ऊपर उठाए। उसी हरकत के साथ उसके जिस्म की तीखी, कड़क और नशीली 'मर्दाना गंध' कामिनी की साँसों में घुलने लगी।
आअह्ह्ह... ईसससस...
कामिनी के हलक से एक खामोश सी सिसकी गुज़री, जो बाहर नहीं आई, बल्कि उसके ही जिस्म के अंदर कहीं गहरे जाकर समा गई। उसका मन कर रहा था कि वो अभी अपनी जीभ बाहर निकालकर हवा में मौजूद उस मर्दाना खुशबू को चख ले, उस फौलादी जिस्म को छू ले। उसकी आँखों की पुतलियाँ फैल चुकी थीं, जिनमें उसकी हवस साफ़ पढ़ी जा सकती थी।
"लो साब... हो गया।"
थाप... थाड़...
सुलेमान ने ऊपर वाली बर्थ पर हाथ मारकर काम को अंजाम दिया।
उसकी आवाज़ ने जैसे किसी ने कामिनी को जलते हुए ज्वालामुखी के मुहाने से झटके से वापस खींच लिया हो। वो एक पल के लिए अपनी ही हवस में जलकर राख होने से बची थी।
ट्रेन अपनी रफ़्तार में पटरियों को चीरती हुई आगे बढ़ रही थी। एसी डिब्बे में एक अजीब सा, भारी सन्नाटा छा गया था। किस्मत से साइड वाली बर्थ (Side berth) पर भी अभी तक कोई यात्री नहीं आया था, जिसका मतलब था कि इस सँकरी सी जगह में अब बस वो तीनों ही दुनिया से कटे हुए थे।
किसी के पास बात करने के लिए कुछ नहीं था।
"खा... खाना खाओगे सुलेमान?"
कामिनी की मदहोश कर देने वाली, मादक और शहद सी मीठी आवाज़ ने उस भारी सन्नाटे को चाक़ू की तरह काट दिया।
सुलेमान, जो खिड़की के बाहर घने अँधेरे में कहीं खोया हुआ था... या शायद अपने ही अंदर उठ रहे इस नए बदलाव को महसूस कर रहा था, कामिनी की आवाज़ सुनकर एकाएक हड़बड़ा गया। एक अंडरवर्ल्ड डॉन का एक औरत की आवाज़ पर ऐसे हड़बड़ाना, उसके लिए ख़ुद भी एक नई और अजीब बात थी।
"ख.. ख... खाना?" उसके मुँह से हड़बड़ाहट में अल्फ़ाज़ निकले।
"हाँ... आओ खा लेते हैं, भूख लगने लगी है।" कामिनी ने अपने बैग से टिफिन निकालते हुए कहा।
सुलेमान ने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी की तरफ देखा। रात के 8 बज चुके थे। कामिनी के हुस्न और उसके जिस्म की नशीली महक के साए में ये दो-ढाई घंटे कब और कैसे बीत गए, सुलेमान को पता ही नहीं चला।
"साब... साब नहीं खाएंगे?" सुलेमान ने जवाब देने के बजाय एक सवाल पूछ लिया।
कामिनी के रसीले होंठों पर एक फीकी, दर्द और तिरस्कार से भरी मुस्कान तैर गई। "अब कहाँ खाएंगे वो..."
सुलेमान ने अपनी गर्दन उठाकर ऊपर वाली बर्थ की तरफ देखा। रमेश अपनी ही दुनिया में, अपनी दारू की बोतल से बेपनाह मोहब्बत में लिप्त था। उसने अपना दूसरा क्वार्टर भी लगभग ख़त्म कर दिया था और अब आधी बेहोशी की हालत में था। उसे इस बात की रत्ती भर भी परवाह नहीं थी कि नीचे उसकी ख़ूबसूरत बीवी एक अनजान मर्द के साथ अकेली है।
अब नीचे की दो आमने-सामने वाली सीटों पर सिर्फ़ कामिनी और सुलेमान थे। डिब्बे की मद्धम लाइट में कामिनी का लाल साड़ी में लिपटा गदराया बदन और सुलेमान का फौलादी वजूद एक-दूसरे के बेहद करीब थे, और दोनों के भीतर सुलग रही थी एक खामोश, अनकही आग।
कामिनी ने बैग से स्टील का टिफिन निकाला। जैसे ही उसने टिफिन का ढक्कन खोला, घर के बने लज़ीज़ खाने की महक और देसी घी की सोंधी खुशबू पूरे एसी डिब्बे में फैल गई। कामिनी के बदन से उठने वाले मादक परफ्यूम और मसालों की इस खुशबू ने मिलकर एक ऐसा नशीला माहौल बना दिया था कि सुलेमान के अंदर का सोया हुआ इंसान और जानवर, दोनों एक साथ जाग उठे।
कामिनी ने एक प्लेट में खाना परोसा और सुलेमान की तरफ़ बढ़ाया। प्लेट देते वक़्त कामिनी को थोड़ा आगे की तरफ़ झुकना पड़ा। इस झुकाव की वजह से उसके स्लीवलेस डीप-नेक ब्लाउज़ में क़ैद भारी और गोरे स्तन सुलेमान की नज़रों के ठीक सामने आ गए। सुलेमान ने अपनी जलती हुई आँखों से एक पल के लिए उस गहरी घाटी को देखा और फिर प्लेट थाम ली।
सुलेमान ने रोटी का एक निवाला तोड़ा और उसे अपने मुँह में रखा।
निवाला चबाते ही सुलेमान की आँखें पल भर के लिए बंद हो गईं। "क्या स्वाद है "
उसके ख़ूँख़ार और खून-खराबे से भरे जीवन में यह एक अजूबा था। उसे याद भी नहीं था कि आख़िरी बार उसने किसी औरत के हाथों से बना, प्यार से परोसा हुआ खाना कब खाया था। वो बड़े-बड़े होटलों और महँगे रेस्टोरेंट्स में ऐशो-आराम की ज़िंदगी जीता था, लेकिन वहाँ के बेजान खाने में यह सोंधापन, यह जादू कहाँ था? इस खाने में सिर्फ स्वाद नहीं था, बल्कि एक औरत के हाथों की छुअन थी, एक ऐसी गर्माहट थी जिसने सुलेमान के पत्थर दिल में एक दरार पैदा कर दी थी।
"कैसा बना है?" कामिनी की धीमी और रसीली आवाज़ ने सुलेमान का ध्यान तोड़ा।
"ब... बहुत बढ़िया है मेमसाब। ऐसा खाना तो मैंने बरसों से नहीं खाया," सुलेमान की भारी आवाज़ में इस बार कोई बनावट नहीं, बल्कि एक अजीब सी सच्चाई थी।
"मेरा नाम कामिनी है, भूल गए?"
कामिनी के होंठों पर एक कातिल सी मुस्कान आ गई।
"जज.. जी वो सब ऊपर..?" सुलेमान ने एक बार उलर देख कहाँ.
"साब को सिर्फ अपनी बोत्तल से प्यार है.
अब बताओ कैसा बना है खाना?
"बहुत शानदर कामिनी "
इस बार सुलेमान पुरे जोश मे बोला, जी तक नहीं लगाया, उसने कामिनी द्वारा दी गई छूट का पूरा इस्तेमाल किया.
कामिनी ने टिफिन से एक और घी लगी हुई रोटी निकाली और सुलेमान की प्लेट में रखने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया।
सुलेमान ने भी प्लेट की तरफ़ हाथ बढ़ाया। और इसी बीच... ट्रेन ने एक हल्का सा हिचकोला खाया।
दोनों के हाथ आपस में टकरा गए।
कामिनी की नर्म, गोरी और काँच की लाल चूड़ियों से सजी उँगलियाँ सुलेमान के खुरदरे, सख्त और फौलादी हाथ से छू गईं। वो छुअन महज़ एक सेकंड की थी, लेकिन उस एक छुअन ने दोनों के जिस्म में 440 वोल्ट का करंट दौड़ा दिया।
सुलेमान का हाथ वहीं ठहर गया। वो चाहता तो अपना हाथ पीछे खींच सकता था, लेकिन वो वहीं जमा रहा। कामिनी की उँगलियों के पोर सुलेमान के अँगूठे को हल्के से सहला रहे थे।
कामिनी ने अपनी नज़रें ऊपर उठाईं। उसकी कजरारी आँखों में अब कोई शर्म या झिझक नहीं थी, बल्कि एक आत्मीयता थी, सुलेमान को पहली बार जब देखा था तभी से उसका जिस्म सुलग रहा था।
सुलेमान की आँखें भी कामिनी की आँखों से टकराईं। डिब्बे की मद्धम पीली रोशनी में दोनों की निगाहें आपस में उलझ गईं।
ऊपर वाली बर्थ से रमेश के खर्राटे गूँज रहे थे। पति ठीक उनके सिर के ऊपर बेसुध पड़ा था, और नीचे उसकी बीवी एक अनजान मर्द की आँखों में आँखें डालकर, उसकी उँगलियों को अपनी उँगलियों से महसूस कर रही थी।
सुलेमान की साँसें भारी होने लगीं। उसका चौड़ा सीना तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहा था। वो खाना खा रहा था, लेकिन हकीकत में उसकी भूख अब इस खाने से कहीं ज़्यादा, अपने सामने बैठी लाल साड़ी वाली औरत के गदराए जिस्म के लिए भड़क उठी थी।
कामिनी ने धीरे से अपनी उँगलियाँ पीछे खींचीं और अपनी साड़ी का पल्लू, जो थोड़ा खिसक गया था, उसे जानबूझकर थोड़ा और नीचे कर दिया।
"आराम से खाइए सुलेमान... इतना बड़ा जिस्म लेंकर घूमते हो 10,15 रोटी तो खा ही जाते होंगे?"
"कहाँ 10,15 मजदूर आदमी को क्या मिलता है "
"अच्छा मुझे तो नहीं लगते तुम कहीं से मजदूर?" कामिनी ने भले ही मज़ाक मे लेकिन दिल कि बात कह दी.
"वो.... वो... मै मजदूर ही तो हूँ, खड्डा खोदना काम है मेरा "
सुलेमान एकाएक सहम गया कि ये कैसा सवाल है, फिर भी खुद को संभाल लिया.
"हाँ देखा मैंने, वहाँ हवेली मे खड्डे तो गहरे खोद देते हो "
कामिनी का जिस्म पिघल रहा था ऐसी बात करते हुए.
फिर भी उसने खुद को संभाला.
"अच्छा जी, मज़दूरी कर के ऐसा क्या खाते हो जो इतना भारी-भरकम जिस्म बना रखा है?" कामिनी ने अपनी कजरारी आँखों से उसे सिर से पाँव तक नापते हुए आत्मीयता से पूछा।
"जो मिल जाता है... जैसे आज आपने खिला दिया तो खा लिया," सुलेमान ने रोटी का टुकड़ा तोड़ते हुए बहुत ही सादगी से जवाब दिया।
"अच्छा... तो कितनी औरतों को खा चुके हो...?" कामिनी रुकी। "मम... मतलब... कितनी औरतों के हाथ का खाना खा चुके हो?"
कामिनी की जीभ बुरी तरह फिसल गई थी। उसे अपनी ही बात का डबल-मीनिंग समझ आ गया। अचानक हुए इस अहसास से उसका गोरा चेहरा शर्म से लाल हो गया और उसने झट से अपनी जीभ दाँतों तले दबा ली।
सुलेमान ने एक गहरी साँस ली, उसकी आँखों में एक अजीब सा ठहराव आ गया।
"यकीन मानिए कामिनी... माँ के गुज़रने के बाद, आज पहली बार किसी औरत के हाथ का बना खाना खा रहा हूँ।" उसकी भारी आवाज़ में एक ऐसा दर्द और सच्चाई थी जिसने पल भर में माहौल की सारी हवस को एक गहरे अपनेपन में बदल दिया।
कामिनी का दिल पसीज गया। उसने देखा सुलेमान की प्लेट लगभग खाली थी। उसने अपनी प्लेट की आख़िरी घी लगी रोटी उठाई और बिना कुछ सोचे सुलेमान की प्लेट में रख दी।
"मेरा हो गया... आप क्या खाओगी फिर?" सुलेमान ने थोड़ा संकोच करते हुए पूछा।
"तुम खाओ ना... तुम्हें ज़्यादा ज़रूरत है। आख़िर बड़े-बड़े खड्डे जो खोदते हो!" कामिनी ने मस्ती भरे अंदाज़ में ताना मारते हुए कहा।
सुलेमान बस मुस्कुरा कर रह गया। उन दोनों के बीच एक अनजानी सी दोस्ती परवान चढ़ रही थी। एक अंडरवर्ल्ड का खूँखार बादशाह और एक सुलगती हुई आज़ाद औरत—दोनों के बीच का अनकहा पर्दा गिर रहा था।
"अब सच-सच बताओ ना... कौन हो तुम?" कामिनी का लहज़ा एकाएक सीरियस हो गया। वो थोड़ा आगे खिसक आई, उसकी आँखों में एक पारखी चमक थी।
"पक्का सच बताऊँ?" सुलेमान के चेहरे पर भी एक रहस्यमयी गंभीरता आ गई।
"हाँ बताओ... वही तो जानना है मुझे।" कामिनी ने पलकें झपकाए बिना पूछा।
सुलेमान ने बिल्कुल सपाट चेहरे के साथ उसकी आँखों में देखा और बोला, "मैं... मैं एक पुलिस वाला हूँ। सीक्रेट मिशन पर निकला हूँ।"
एक पल को पूरे एसी कूपे में सन्नाटा छा गया। ऊपर रमेश के खर्राटों की आवाज़ गूँज रही थी और नीचे कामिनी की आँखें हैरानी से फटी की फटी रह गईं।
फिर...
"हाहाहाहा... हाहाहाहाहा!"
कामिनी ज़ोरों से हँस पड़ी। क्या शानदार नज़ारा था वो! ट्रेन के डिब्बे में कामिनी की खनकती हुई, आज़ाद हँसी गूँज उठी। कामिनी ना जाने ज़िंदगी में आख़िरी बार कब ऐसे खुल कर हँसी थी। रमेश के साथ तो उसका हर दिन खौफ़, मार-पीट और घुटन में बीता था। आज, एक अनजान मर्द के सामने वो एक आज़ाद परिंदे की तरह चहक रही थी।
सुलेमान तो बस अपनी पलकें झपकाना ही भूल गया। वो बस एकटक उस हँसती हुई, खिलखिलाती हुई परी को देखता ही रह गया। हँसते वक़्त कामिनी का गदराया हुआ जिस्म, उसके लाल साड़ी में छुपे भारी स्तन भी उसी ताल में ऊपर-नीचे हो रहे थे, लेकिन इस बार सुलेमान की नज़रें उसके जिस्म पर नहीं, उसकी मासूम और बेबाक हँसी पर टिकी थीं।
"अरे सच में पुलिस वाला हूँ! ये देखो बॉडी..." सुलेमान ने अपना चौड़ा सीना हल्का सा फुलाया, अपनी टाइट शर्ट के अंदर से बाज़ुओं के कड़क डोले दिखाते हुए मज़ाक को आगे बढ़ाया।
"अच्छा? पुलिस वाले ऐसे होते हैं? तुम तो शक्ल से ही कोई गुंडे दिखते हो... एकदम खूँखार वाले! हाहाहाहा..." कामिनी फिर से अपनी हँसी नहीं रोक पाई। एक अंडरवर्ल्ड डॉन को उसके मुँह पर कोई 'गुंडा' कह रहा था और वो बस मुस्कुरा रहा था।
"तो फिर वही समझ लो... मत मानो सच बोलने का तो जमाना ही नहीं रहा " सुलेमान ने एक बनावटी मायूस चेहरा बनाते हुए कहा।
लेकिन अंदर ही अंदर सुलेमान खुद हैरान था। वो ना जाने आख़िरी बार कब ऐसा था, उसे तो ठीक से याद भी नहीं था। उसने कभी किसी के साथ ऐसे हँसी-मज़ाक में बात भी की थी या नहीं? गोलियों की गूँज, माफ़ियाओं की धमकियों और खून-खराबे के बीच ऐसी मज़ाक-मस्ती उसकी ज़िंदगी में थी ही नहीं।
कामिनी ने महज़ कुछ ही घंटों में उसके बेरंग और खौफ़नाक जीवन में एक बिल्कुल अलग ही रंग घोल दिया था। अगर सुलेमान का कोई गुर्गा या पिट्ठू उसे आज एक औरत के सामने ऐसे हँसते, मज़ाक करते और 'गुंडा' का ताना सुनते हुए देख लेता, तो ना जाने क्या समझता!
लेकिन सच तो यही है कि मर्द बाहर से कितना ही खूँखार, कितना ही बड़ा पत्थर क्यों ना हो, उसके दिल के किसी कोने में एक ऐसा चेहरा भी छुपा होता है जिसे बस प्यार, आत्मीयता और सुकून की तलाश होती है... बस शर्त यह है कि उसे उस चेहरे का अहसास दिलाने वाली कोई होनी चाहिए।
और सुलेमान की इस स्याह, अंधेरी ज़िंदगी में, कामिनी बिल्कुल वही रौशनी बन कर आई थी।
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खाना ख़त्म हुआ। कामिनी ने टिफिन समेट कर वापस अपने बैग में सलीके से रख दिया। डिब्बे की मेन लाइट अब बंद हो चुकी थी और पूरे कोच में सिर्फ़ नीली नाईट-लैंप (Night lamp) की मद्धम, रहस्यमयी रोशनी फैली हुई थी।
थोड़ी ही देर में कामिनी अपनी सीट पर कुछ बेचैन सी दिखने लगी। वो बार-बार करवट बदल रही थी, अपनी जाँघों को कस रही थी और साड़ी का पल्लू ठीक कर रही थी। ट्रेन के एसी की ठंडक भी उसे राहत नहीं दे पा रही थी।
सुलेमान से कामिनी की यह बेचैनी देखी नहीं गई। वो जो अब तक ख़ामोशी से उसे ही निहार रहा था, आख़िर पूछ बैठा—
"क्या हुआ कामिनी? कोई तकलीफ़ है क्या?"
"वो... वो ज़रा..." कामिनी ने हल्की सी झिझक के साथ, बिल्कुल एक मासूम बच्ची की तरह अपनी छोटी उँगली दिखाते हुए पेशाब का इशारा किया।
"हाँ तो हो आओ... इसमें पूछना क्या है, कौन रोक रहा है?" सुलेमान ने अपने सहज और सीधेपन में जवाब दिया। एक डॉन जिसे किसी से इजाज़त लेने की आदत नहीं थी, उसे लगा कामिनी उससे पूछ रही है।
कामिनी ने एक बार ऊपर वाली बर्थ की तरफ़ देखा। रमेश दारू के भारी नशे में मुर्दे की तरह पड़ा था और उसके भद्दे खर्राटे गूँज रहे थे। वहाँ से कोई हरकत होने की उम्मीद नहीं थी। कामिनी ने वापस सुलेमान की आँखों में देखा और एक अजीब से अधिकार के साथ बोली, "तुम... तुम चलो ना मेरे साथ।"
"लेकिन... मुझे तो नहीं आई है!" सुलेमान ने बिल्कुल सपाट और सीधे लहज़े में जवाब दिया।
सुलेमान का यह जवाब सुनकर कामिनी अपनी हँसी नहीं रोक पाई।
"अरे बुद्धू...!" कामिनी ने एक प्यारा सा बनावटी गुस्सा दिखाते हुए कहा, "इतना बड़ा फौलादी शरीर लेकर घूमते हो, और इस खोपड़ी में कुछ नहीं है क्या?"
सुलेमान चौंक गया। आज तक किसी की जुर्रत नहीं हुई थी कि सुलेमान को बुद्धू कह दे, लेकिन कामिनी के मुँह से निकली ये गाली भी उसे किसी मीठे गीत की तरह लग रही थी।
"रात के वक़्त औरत को ट्रेन में ऐसे अकेले नहीं जाने देते। पता नहीं कैसे-कैसे लोग होते हैं बाहर। चलो मेरे साथ... तुम बस वाशरूम के बाहर खड़े रहना," कामिनी ने उसे समझाते हुए एक पत्नी जैसा हक़ जताया।
सुलेमान को वाक़ई औरतों का यह लॉजिक समझ नहीं आया। उसे लगा कि वो ख़ुद इतना ख़तरनाक है कि कोई उसकी परछाईं के आस-पास भी नहीं फटक सकता, फिर डर कैसा? लेकिन वो बिना कोई बहस किए, हल्का सा अपना सिर खुजाते हुए चुपचाप अपनी सीट से खड़ा हो गया। उसके भारी-भरकम जिस्म ने उस सँकरी गैलरी को पूरी तरह घेर लिया।
कामिनी के दिल में एक अजीब सी ठंडक और सुकून छा गया। एक औरत को जो सुरक्षा, जो परवाह और जो अहसास अपने पति से चाहिए होता है... वो सब आज उसे रमेश से नहीं, बल्कि एक अनजान सुलेमान से मिल रहा था। रमेश ने तो कभी उसकी इस छोटी सी ज़रूरत की भी परवाह नहीं की थी।
वहीं दूसरी तरफ़, सुलेमान के भीतर भी कुछ टूट और बदल रहा था। उसने आज तक अपनी पूरी ज़िंदगी में औरतों को सिर्फ़ 'भोग की वस्तु' और जिस्मानी भूख मिटाने का ज़रिया ही समझा था। औरतों को ख़रीदना, उन्हें रौंदना और फेंक देना—यही उसका उसूल था। एक औरत असल में दिल से क्या चाहती है? उसकी छोटी-छोटी ज़रूरतें क्या होती हैं? उसके नखरे क्या होते हैं? ये सब सुलेमान को आज तक किसी ने सिखाया ही नहीं था।
आज पहली बार, एक औरत के लिए वाशरूम के बाहर 'पहरेदार' बनकर खड़े होने का यह खयाल उसे छोटा नहीं कर रहा था, बल्कि उसके अंदर एक अजीब सा गुरूर और ख़ुशी पैदा कर रहा था।
कामिनी अपनी सीट से उठी। वो आगे-आगे चल रही थी और सुलेमान एक साए की तरह उसके ठीक पीछे-पीछे। ट्रेन के हिचकोलों के बीच, कामिनी की लाल साड़ी में लिपटी लचकती कमर और सुलेमान की मर्दाना गंध... दोनों नीली रोशनी में नहाए हुए वाशरूम के सँकरे और सुनसान रास्ते की तरफ़ बढ़ चले।
वाशरूम आ गया था। ट्रेन अपनी पूरी रफ़्तार में थी और रह-रह कर ज़ोरदार हिचकोले खा रही थी। गैलरी के सुनसान और मद्धम रोशनी वाले हिस्से में सिर्फ़ वो दोनों थे।
"तुम यहीं रुको, मैं आती हूँ," कामिनी ने सुलेमान को एक मीठा सा आदेश दिया और वाशरूम का हैंडल पकड़ कर घुमाया। वाशरूम खाली था। कामिनी अंदर घुस गई।
खटाक...की आवाज़ के साथ हैंडल वापस अपनी जगह पर आ गया।
सुलेमान बाहर गैलरी की दीवार से सटकर, ठगा सा वहीं दरवाज़े के पास खड़ा रह गया। एक खूँखार अंडरवर्ल्ड डॉन, जिसके इशारे पर दर्जनों गुर्गे लोगों की लाशें बिछा देते थे, आज अपनी ज़िंदगी में पहली बार किसी औरत के वाशरूम के बाहर एक 'गार्ड' की तरह तैनात था। यह घटना उसके लिए अजीब भी थी और अंदर ही अंदर उसे एक मीठी सी ख़ुशी भी दे रही थी।
अंदर वाशरूम में...
कामिनी को बहुत ज़ोर का पेशाब लगा था। जबसे वो हवेली से निकली थी, तबसे उसने ख़ुद को रोक रखा था, और ऊपर से जिस्म कि गर्मी ने उसके पेट के निचले हिस्से में तेज़ाब जैसी जलन और भारीपन पैदा कर दिया था।
अंदर घुसते ही कामिनी ने जल्दबाज़ी में अपनी लाल शिफॉन की साड़ी को एक ही झटके में समेट कर अपनी कमर तक उठा लिया। उसके दूधिया, गदराए हुए गोरे जाँघों के बीच फँसी उसकी छोटी सी चड्डी को उसने दोनों अँगूठों से फँसाकर सीधा अपने घुटनों तक सरका दिया और बिना एक पल गँवाए कमोड(देसी सीट )पर उकडू बैठ गई।
सससससरररर...... सससऊऊऊऊ....
वाशरूम की उस तंग जगह में एक बेहद कामुक, तेज़ और लगातार पेशाब गिरने की आवाज़ गूँजने लगी। यह आवाज़ इतनी साफ़ थी कि बाहर खड़े सुलेमान के कानों से सीधे उसके दिमाग़ की नसों तक पहुँच रही थी।
"उउउफ्फ्फ्फ़... ईसससस.... आअह्ह्ह..." कामिनी के रसीले होंठों से राहत और चरम सुख की एक सिस्कारी सी निकल गई। उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसके सुलगते हुए जिस्म से कोई उबलता हुआ तरल बाहर निकल कर उसे एक अजीब सी मदहोशी दे रहा हो।
खड़... खड़... खटाक...
तभी ट्रेन के हिचकोलों से वाशरूम का दरवाज़ा बुरी तरह हिलने लगा। सुलेमान का ध्यान अचानक दरवाज़े पर गया, और जैसे ही उसकी नज़र वहाँ पड़ी... उसके दिल की धड़कन जैसे वहीं जाम हो गई। उसके हलक का पानी सूख गया।
शायद कामिनी को इतनी तेज़ तलब लगी थी कि उसने अंदर जाते ही जल्दबाज़ी में सिर्फ़ हैंडल घुमाकर छोड़ दिया था, अंदर की 'चिटकनी' (लॅच) ठीक से लॉक नहीं की थी!
ट्रेन के तेज़ झटकों से वो दरवाज़ा हल्का सा बाहर की तरफ़ खुलता और फिर बंद हो जाता। दरवाज़े और चौखट के बीच लगभग एक से दो इंच की एक पतली सी 'झिरी' (slit) बन गई थी।
और उस झिरी से सुलेमान को जो नज़ारा दिखा, उसने उसके फौलादी जिस्म को लकवा मार दिया।
कमोड पर उकडू बैठी कामिनी की गोरी, चमकती और बेतहाशा भारी गांड के दोनों हिस्से झिरी से बिल्कुल सुलेमान की आँखों के सामने फैले हुए थे। साड़ी ऊपर कमर तक उठी हुई थी, और गदराया, नंगा और दूधिया हुस्न मद्धम रोशनी में किसी संगमरमर की तरह दमक रहा था।
ट्रेन की धड़कन के साथ दरवाज़ा बंद होता, और अगले ही झटके में फिर वो झिरी बन जाती। सुलेमान का कलेजा काँप रहा था। एक झलक... फिर अँधेरा... फिर एक और झलक! ऐसी मादक, सुडौल और विशाल गांड उसने अपनी पूरी ज़िंदगी में किसी औरत की नहीं देखी थी। सुलेमान का पूरा जिस्म तवे की तरह जलने लगा, उसके शरीर का सारा खून तेज़ी से संचार करता हुआ सीधे उसकी जाँघों के बीच जा पहुँचा। उसकी सफ़ेद पैंट के अंदर सोता हुआ अजगर अब पूरी तरह फन फैलाए, कड़कड़ा कर लोहे का रॉड बनने लगा था। अचानक खून प्रवाह ने उसके लंड मे दर्द भर दिया, ऐसा लगा जैसे नसे ही फट जाएगी,
अंदर कामिनी इस बात से बिल्कुल बेफ़िक्र थी कि बाहर खड़ा उसका 'पहरेदार' ही उसकी नंगी गांड का दीदार कर रहा है। वो तो आँखें बंद किए, होंठों को काटे हुए अपने अंदर से निकलती गर्म धार के आनंद का मज़ा ले रही थी।
धच... खड़... खच्च...!!
अचानक ट्रेन ने पटरियों पर एक बेहद ज़ोरदार और तिरछा झटका लिया।
अंदर कमोड पर बैठी कामिनी का पूरा वजूद हिल गया। उसका संतुलन बिगड़ा और वो मुँह के बल आगे गिरने ही वाली थी कि उसने अपने दोनों हाथ वाशरूम की दीवार पर टिका दिए। लेकिन इस हड़बड़ाहट और झटके में... उसके पेशाब की धार का आख़िरी हिस्सा सीधा घुटनों पर लटकी उसकी चड्डी पर जा गिरा।
"उफ्फ... सत्यानाश!" कामिनी ने झल्लाते हुए कहा। उसकी छोटी सी चड्डी गर्म पेशाब से भीग चुकी थी।
लेकिन कामिनी अब कर भी क्या सकती थी। उसने बिना उसे पोंछे, उसी गीली और गर्म चड्डी को वापस अपनी जाँघों के बीच फँसा कर अपनी कमर तक खींच लिया। हल्की गर्म, पेशाब की चंद बूँदों से भीगी हुई चड्डी जब उसके सबसे नाज़ुक और सुलगते हुए अंग (योनि) से जाकर चिपकी, तो कामिनी के बदन में एक तेज़ झुरझुरी सी दौड़ गई। उसने अपनी साड़ी ठीक की, गहरी साँस ली और दरवाज़े का हैंडल घुमा दिया।
खींचक...
दरवाज़ा खुला। कामिनी वाशरूम से बाहर निकली।
और दरवाज़ा खुलते ही... कामिनी के परफ्यूम, उसके पसीने, ताज़ा गर्म और कसैली (sharp musky) पेशाब की जो एक तेज़ गंध बाहर आई, उसने सुलेमान को झकझोर कर रख दिया। वो गंध इतनी नशीली, इतनी जानवरियत (animalistic) से भरी थी कि सुलेमान को लगा जैसे उसका दिमाग़ सुन्न हो गया हो।
कामिनी को देखते ही सुलेमान की आँखें उस सफ़ेद पैंटी की तरफ गईं जो अब लाल साड़ी के नीचे छुपी थी, लेकिन सुलेमान जानता था कि वो अंदर से गीली है। कामिनी की छाती तेज़ साँसों से ऊपर-नीचे हो रही थी। दोनों एक-दूसरे के बेहद करीब उस सँकरी गैलरी में खड़े थे, और हवा में घुली वो कसैली महक उनके बीच की रही-सही दूरियों को भी मिटा रही थी।
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कामिनी वाशरूम का दरवाज़ा खोलकर जैसे ही गैलरी में बाहर आई...
चरररररर.... धाड़....!!
अचानक ट्रेन को एक बेहद ज़ोरदार और खौफ़नाक झटका लगा, जैसे ड्राइवर ने अचानक से इमरजेंसी ब्रेक मार दिए हों।
"आउच.... उफ्फ्फ्फ़...!"
इससे पहले कि कामिनी कुछ समझ पाती, वो किसी कटे हुए पेड़ की तरह सीधे सामने खड़े सुलेमान से बुरी तरह जा टकराई। सुलेमान भी इस अचानक आए झटके को सँभाल नहीं पाया। कामिनी के भारी जिस्म का वज़न और ट्रेन का धक्का... सुलेमान का विशाल और फौलादी जिस्म पीछे वाशरूम की दीवार पर जा लगा और कामिनी पूरी तरह से सुलेमान के चौड़े सीने में धँस गई।
"आआआह्हः..... सुलेमान...!" कामिनी के मुँह से एक काँपती हुई सिसकी निकल गई।
उस सँकरी गैलरी में अब उन दोनों के जिस्मों के बीच हवा गुज़रने तक की कोई जगह नहीं बची थी। दोनों एक-दूसरे में ऐसे चिपक गए थे जैसे दो चुंबक आपस में जुड़ गए हों।
सुलेमान की सफ़ेद पैंट में फन फैलाए खड़ा उसका विशाल, कड़क और बेकाबू लंड अब सीधा कामिनी की साड़ी को चीरता हुआ, उसकी नाभि और जाँघों के बीच के हिस्से में गहराई से चुभ रहा था। वहीं कामिनी के डीप-नेक ब्लाउज़ में क़ैद उसके गोरे और भारी स्तन सुलेमान के सख़्त सीने के ठीक नीचे पूरी तरह से दब कर पिचक गए थे।
उस एक पल के टकराव ने सुलेमान और कामिनी, दोनों के जिस्मों को झनझना कर रख दिया।
कामिनी का तो जैसे दिमाग़ ही सुन्न पड़ गया। उसे सुलेमान के खौफ़नाक लंड की लंबाई और मोटाई अपनी दोनों जाँघों के बीच से लेकर अपनी नाभि के ऊपर तक साफ़ महसूस हो रही थी। उस फौलादी अंग का अहसास होते ही कामिनी का दिल दहल उठा और उसकी नाभि के नीचे एक मीठा दर्द उठने लगा।
पेशाब की चंद बूँदों से गीली हुई उसकी चड्डी, अब हवस के गाढ़े और लसलसे पानी से सरोबर होने लगी।
इधर सुलेमान की हालत भी कोई कम ख़राब नहीं थी। उसने कामिनी के जिस्म की दहकती हुई गर्मी को अपने सीने पर महसूस किया। उसके स्तनों की रुई जैसी कोमलता, उनकी गोलाई और सुडौलता सुलेमान के सीने पर पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो चुकी थी।
ट्रेन अभी भी हिचकोले खा रही थी और धीरे-धीरे रुकने की कोशिश कर रही थी। ट्रेन के हर झटके के साथ... कामिनी और सुलेमान के जिस्म आपस में रगड़ खाते और एक-दूसरे में और ज़्यादा गहराई से चिपक जाते। वो दोनों बेबस थे, लेकिन अंदर ही अंदर इस घर्षण का पूरा आनंद ले रहे थे। दोनों एक-दूसरे के कामुक और सुलगते अंगों को महसूस कर रहे थे।
"ईईस्स्स्स..... सुलेमान..." कामिनी ने अपना चेहरा ऊपर उठाया और अपनी नशीली आँखों से सुलेमान की आँखों में देखा।
"आआआह्हः... कामिनी..." सुलेमान के मुँह से एक भारी और गर्म साँस निकली। उसकी लाल आँखें कामिनी के काँपते, रसीले होंठों पर गड़ी थीं।
माहौल इतना मादक और नशीला हो चुका था कि दोनों अपनी सुध-बुध खो बैठे थे। सुलेमान का चेहरा कामिनी के चेहरे की तरफ़ झुकने लगा। होंठ नज़दीक आने लगे।
सुलेमान बस उन कामुक लाल होंठों को चूस लेने से महज़ 1 इंच की दूरी पर था। दोनों की गर्म साँसें एक-दूसरे से टकरा रही थीं। कामिनी ने कोई विरोध नहीं किया... बल्कि उसकी आँखें ख़ुद-ब-ख़ुद बंद हो गईं, उसका जिस्म ढीला पड़ गया और उसके होंठ सुलेमान का स्वागत करने के लिए स्वतः ही थोड़े से खुल गए...
कि तभी...
धड़ाक....!!
ट्रेन के गैलरी का भारी लोहे का दरवाज़ा झटके से खुला।
"अरे भाई... अंदर तो आने दो! नैनीताल पहुँच कर कर लेना ये सब..."
एक युवा कपल ट्रेन में धड़धड़ाते हुए चढ़ गया। ट्रेन शायद किसी छोटे से स्टेशन या आउटर पर रुकी थी। उस अचानक आई आवाज़ से सुलेमान और कामिनी बुरी तरह सकपका गए। कामिनी जैसे किसी गहरे सम्मोहन से झटके से बाहर आई और उसने सुलेमान के सीने पर हाथ रखकर ख़ुद को पीछे धकेला।
कामिनी को अचानक अहसास हुआ कि वो अभी क्या करने जा रही थी! उसका जिस्म खुलेआम बगावत करने पर उतारू था, वो एक अनजान मर्द के होंठों को चूमने के लिए पूरी तरह तैयार खड़ी थी।
"वो.. वो... हम... वो ट्रेन रुकी तो..." कामिनी ने घबराहट में हकलाते हुए सफाई देनी चाही। उसका चेहरा शर्म और उत्तेजना से लाल टमाटर हो चुका था।
"रोमांटिक कपल है ना विकास! छोड़ो उन्हें..." वो मॉडर्न सी लड़की आगे बढ़ते हुए अपने पति से हँसकर बोली और दोनों उन्हें एक 'खास' नज़र से देखते हुए गैलरी से गुज़र कर अपनी सीटों की तरफ़ चले गए।
सुलेमान और कामिनी के बीच एक अजीब सी, भारी ख़ामोशी छा गई।
"आ... आप... आप चलिए, मैं आता हूँ," सुलेमान ने अपनी झेंप और अपने तने हुए खौफ़नाक उभार को छुपाने के लिए तुरंत मुड़कर वाशरूम का रास्ता नाप लिया।
कामिनी अपने लाल चेहरे के साथ, तेज़-तेज़ साँसें लेती हुई गैलरी से अपनी सीट की तरफ़ बढ़ गई। लेकिन जैसे-जैसे वो क़दम बढ़ा रही थी... उसे अपनी ही जाँघों के बीच से आती हुई एक धीमी और लसलसी आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी।
पच.... पच.... पच....
क्रमशः
नोट :- गौरव भाई का बहुत बहुत धन्यवाद.
उन्होंने बहुत प्रोत्साहित किया मुझे आगे बढ़ने के लिए.
थैंक यू गौरव भाई
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Buy me a wine
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