मेरी माँ कामिनी 3.0 - अध्याय -4
चरम सुख की भयंकर और मदहोश कर देने वाली लहर के गुज़र जाने के बाद, कामिनी का जिस्म बर्थ पर किसी बेजान गुड़िया की तरह पड़ा था। उसकी साँसें अभी भी तेज़ चल रही थीं और पसीने से भीगे बाल उसके चेहरे पर चिपके हुए थे।
सुलेमान अपनी सीट पर तन कर बैठ गया। उसने अपने कामरस से भीगे हाथ में क़ैद कामिनी की चड्डी को एक बार हवा में उठाया। डिब्बे की नीली रोशनी में उस गीले कपड़े से उठने वाली महक सुलेमान के दिमाग़ को और भी ज़्यादा नशीला कर रही थी। कामिनी ने आधी खुली आँखों से सुलेमान की तरफ़ देखा। सुलेमान ने एक ख़तरनाक, विजयी मुस्कान के साथ कामिनी की आँखों में आँखें डालीं, और चड्डी को तह करके अपनी पैंट की गहरी जेब में खिसका लिया।
कामिनी का दिल धक से रह गया। उसकी सबसे प्राइवेट, सबसे नाज़ुक चीज़ अब इस अनजान मज़दूर के पास गिरवी थी। वो कोई कपड़ा नहीं, बल्कि कामिनी की इज़्ज़त, उसकी लज्जा और उसकी हया थी, जो अब सुलेमान की जेब में क़ैद हो चुकी थी।
कामिनी ने काँपते हाथों से अपनी बिखरी हुई साड़ी को ठीक करना शुरू किया। उसने हड़बड़ाहट में अपना ब्लाउज़ ठीक किया और साड़ी को घुटनों तक नीचे खींचा। लेकिन साड़ी के नीचे... वो खालीपन!
एसी (AC) की ठंडी हवा जब उसकी नंगी जाँघों के बीच से गुज़री, तो कामिनी को अहसास हुआ कि वो अब अंदर से पूरी तरह नंगी है। एक अजीब सी असुरक्षा और शर्म ने उसे घेर लिया, लेकिन उस शर्म में भी एक नशीला सा थ्रिल था।
तभी... इस ख़ौफ़नाक सन्नाटे को चीरती हुई एक आवाज़ गूँजी।
"खों-खों... खों...!!"
ऊपर की बर्थ से रमेश के खाँसने की तेज़ आवाज़ आई। कामिनी के जिस्म का सारा खून जैसे एक पल में सूख गया। उसकी हलक में साँसें अटक गईं।
"कामिनी... ए कामिनी..." रमेश की नींद में डूबी हुई, भारी और शराबी आवाज़ गूँजी। "पानी दो ... गला सूख रहा है..."
कामिनी की आँखें खौफ़ से फटी की फटी रह गईं। रमेश करवट ले रहा था। बर्थ के हिलने की आवाज़ आ रही थी। वो नीचे उतरने या नीचे झाँकने की कोशिश कर रहा था। कामिनी अभी भी हाँफ रही थी, उसका चेहरा लाल था, और अगर इस हालत में रमेश उसे देख लेगा तो... इस ख्याल मात्र से ही कामिनी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया, काँपते होंठों से कोई आवाज़ नहीं निकली, वो पूरी तरह लकवाग्रस्त (paralyzed) सी हो गई थी।
लेकिन इससे पहले कि रमेश का सिर नीचे की तरफ़ झुकता, सुलेमान अपनी सीट से एक झटके में खड़ा हो गया।
सुलेमान का विशाल, चौड़ा और फौलादी जिस्म किसी काले पहाड़ की तरह कामिनी और रमेश के बीच आकर खड़ा हो गया। उसने पलक झपकते ही खिड़की के पास टेबल पर रखी पानी की बोतल अपने भारी हाथ में उठा ली। सुलेमान के पैंट मे बना लंड का उभार ठीक कामिनी के चेहरे के ठीक सामने था, कामिनी कि नजर उस भारी भरकम आकृति पर अटक गई.
उसका गला सुख गया. वो अभी अभी पकडे जाने से बची थी, लेकिन एक औरत कि इत्तेजना तो देखो, मर्दाना अंग को देखते ही सारा डर दूर हो गया.
एक पल को लगा जैसे कामिनी उस उभार को भींच लेगी.
उसे टटोलेगी, और वक़्त होता तो शायद वो कर भी देती.
कामिनी ने एक गहरी सांस खींची.... उस बड़े उभार से बाजु मे ही उसकी पैंटी रखी हुई थी,
दोनों बिल्कुल पास थे, कामिनी कि चड्डी और सुलेमान का लंड शायद रासलीला कर रहे हो अंदर.
"लो साब... पानी ," सुलेमान की भारी, गहरी और एक ख़तरनाक खनक वाली आवाज़ डिब्बे में गूँजी।
रमेश, जो नींद और नशे में आधा धुत्त था, उसने आँखें खोलकर सामने देखा। उस मद्धम नीली रोशनी में सुलेमान का वो डरावना 'डॉन' वाला अक्स देखकर रमेश की नींद आधी वैसे ही उड़ गई। सुलेमान की आँखें रमेश को ऐसे घूर रही थीं, जैसे उसने बहुत बड़ी गुस्ताखी कर दी हो.
"मेमसाब गहरी नींद में सो रही हैं .. " सुलेमान के लहज़े में इज़्ज़त कम और एक ख़ामोश धमकी ज़्यादा थी।
रमेश, जो अपनी पत्नी पर तो बहुत रौब झाड़ता था, इस भारी-भरकम 'मज़दूर' की आँखों की दहशत बर्दाश्त नहीं कर पाया। उसने बिना कोई बहस किए, चुपचाप काँपते हाथों से सुलेमान से बोतल ली, दो घूँट पानी पिया और बोतल वापस सुलेमान के हाथ में थमा दी।
"हम्म... ठीक है," रमेश ने बस इतना बड़बड़ाया और डर के मारे चुपचाप दूसरी तरफ़ मुँह फेर कर वापस सो गया। उसे भनक तक नहीं लगी कि ठीक सुलेमान के नीचे, उसकी बीवी किस हाल में पड़ी थी।
रमेश के खर्राटे वापस शुरू हो गए।
सुलेमान ने बोतल वापस टेबल पर रखी और बहुत इत्मीनान से अपनी सीट पर आकर बैठ गया। उसने एक बार ऊपर सो रहे रमेश को देखा और फिर सामने लेटी हुई कामिनी की आँखों में झाँका।
कामिनी ने एक लम्बी सांस छोडी, अपनी बेबसी कि, अपनी मज़बूरी कि.. उसका जिस्म और कुछ चाहता था, लेकिन उसके हालत ठीक नहीं थे, उसका गरम जिस्म ठंड़ाई मांग रहा था फिर से लेकिन ये अब संभव नहीं था.
रात के अँधेरे में ट्रेन अपनी रफ़्तार से भाग रही थी। कामिनी ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
चुत से निकले पानी ने उसे कब नींद कि खाई मे धकेल दिया उसे खुद को पता नहीं चला,
ट्रेन के एसी (AC) की ठंडक साड़ी के पल्लू को चीरती हुई सीधा उसकी नाज़ुक, नंगी जाँघों से टकरा रही थी।
अंदर का गिलापन सुख के पापड़ी कि शक्ल लड़ चूका था.
खिड़की के शीशे से सुबह की हल्की सलेटी और गुलाबी रोशनी डिब्बे के अंदर झाँकने लगी थी। सुबह के क़रीब 5:30 बज रहे थे।
'खच्चचचच....'
ट्रेन की रफ़्तार अचानक धीमी होने लगी। पहियों की गड़गड़ाहट कम हुई और एक हल्के से झटके के साथ ट्रेन किसी बड़े स्टेशन पर आकर रुक गई। प्लेटफार्म की मद्धम चहल-पहल और चाय वालों की दूर से आती आवाज़ें सन्नाटे को चीर रही थीं।
कामिनी ने अपनी भारी आँखें खोलीं और सामने वाली बर्थ पर नज़र डाली। उसका दिल अचानक धक से रह गया।
सामने वाली सीट खाली थी! सुलेमान वहाँ नहीं था।
कामिनी के दिमाग़ में हज़ारों ख़याल कौंध गए। क्या वो चला गया? क्या वो मेरी वो चीज़... मेरी वो गीली निशानी लेकर ट्रेन से उतर गया? कामिनी हड़बड़ाहट में उठकर बैठने ही वाली थी कि तभी कूपे का परदा हल्का सा सरका।
सुलेमान अंदर दाखिल हुआ।
सुबह की उस हल्की रोशनी में सुलेमान का गठीला, चौड़ा और फौलादी जिस्म और भी ज़्यादा रुतबेदार लग रहा था। उसने रात वाली ही शर्ट पहन रखी थी, जिसके ऊपर के दो बटन खुले थे और उसके चौड़े, रोएँदार सीने की झलक साफ़ दिख रही थी।
कामिनी उसे देखते ही सहम गई। उसने तुरंत अपनी साड़ी को घुटनों के नीचे खींचा और अपनी दोनों जाँघों को कसकर आपस में भींच लिया। उसे ऐसा लग रहा था जैसे सुलेमान की दहकती हुई आँखें उसकी साड़ी के आर-पार देख रही हों और उस नंगेपन का मज़ा ले रही हों।
सुलेमान के दोनों हाथों में प्लेटफार्म वाली मिट्टी के कुल्हड़ की गर्मागर्म चाय थी। कुल्हड़ से उठती हुई इलायची और अदरक की महक ने कूपे की बासी और एसी वाली हवा को एकदम ताज़ा कर दिया।
सुलेमान बिना कुछ बोले अपनी सीट पर आकर बैठा। ऊपर रमेश अभी भी घोड़े बेचकर सो रहा था, उसके खर्राटे पूरे डिब्बे में गूँज रहे थे। साइड वाली बर्थ पर रितु और विकास भी गहरी नींद में थे।
सुलेमान ने अपनी एक अजीब सी ठहरी हुई निगाहों से कामिनी को देखा और अपने भारी, खुरदरे हाथ से चाय का एक कुल्हड़ कामिनी की तरफ़ बढ़ा दिया।
"चाय... कामिनी ।"
कामिनी के रसीले होंठ काँपे। उसने झिझकते हुए अपना हाथ आगे बढ़ाया। जैसे ही कामिनी ने कुल्हड़ पकड़ा, सुलेमान की उन खुरदरी, सख़्त उँगलियों का स्पर्श कामिनी की उँगलियों से हो गया।
ईस्स...
उन उँगलियों का स्पर्श पाते ही कामिनी के पूरे वजूद में रात वाली नशीली बिजली फिर से दौड़ गई। ये वही उँगलियाँ थीं जिन्होंने चंद घंटों पहले कामिनी के जिस्म के एक-एक कतरे को निचोड़ लिया था, जो उस ज्वालामुखी की गहराई तक धँसी थीं।
कामिनी ने घबराकर चाय का कुल्हड़ पकड़ लिया और अपनी नज़रें झुका लीं। उसके गोरे गाल शर्म और रात की उस याद से टमाटर की तरह लाल हो गए थे।
सुलेमान ने अपनी चाय का एक घूँट भरा। कुल्हड़ से चाय सुड़कने की आवाज़ उस ख़ामोशी में बहुत साफ़ सुनाई दी।
"रात को नींद अच्छी आई आपको... ?" सुलेमान ने एक बहुत ही गहरी, कातिलाना और दोहरे मतलब (double meaning) वाली आवाज़ में पूछा। उसकी आँखों में एक अजीब सी कसक जो कामिनी को अंदर तक चीर रही थी।
कामिनी के गले से चाय का घूँट नीचे नहीं उतर रहा था। उसने एक बार डरते हुए ऊपर रमेश की तरफ़ देखा और फिर फुसफुसाती हुई, काँपती आवाज़ में सुलेमान से बोली, "मम... मुझे... मेरी वो चीज़ वापस दे दो।"
सुलेमान ने अपनी चाय का कुल्हड़ होंठों से हटाया। उसने कामिनी को बड़े ही प्यार से देखा.
उसने अपना खुरदरा हाथ अपनी पैंट की जेब पर रखा, ठीक उसी जगह जहाँ कामिनी की गीली लाल चड्डी रखी हुई थी। सुलेमान ने जेब को ऊपर से हल्का सा थपथपाया.
"कौन सी चीज़ कामिनी?" सुलेमान ने पूरी मासूमियत का नाटक करते हुए कहा, लेकिन उसकी आँखें शैतानी से चमक रही थीं। "मज़दूर ने रात मे पूरी ईमानदारी से जो 'मज़दूरी' की है... ये तो उसका इनाम है। और मैं अपनी मज़दूरी कभी वापस नहीं करता।"
सुलेमान के इस बेबाक और ख़तरनाक जवाब ने कामिनी के सीने में हवस और खौफ़ की एक नई आग लगा दी। वो चाहकर भी कुछ नहीं बोल पाई।
ट्रेन ने एक लंबा हॉर्न मारा और एक तेज़ झटके के साथ प्लेटफार्म से आगे खिसकने लगी। सुबह का उजाला अब पूरी तरह से डिब्बे में फैलने लगा था।
कामिनी सिर्फ मुस्कुरा उठी, उसने एक मजदूर कि मजदूरी अदा कर दी थी.
खिड़की से बहार दूर ऊँचे ऊँचे पहाड़ दिखने लगे थे, धुंध कि चादर ओढ़ी हुई थी इस सुबह ने.
कामिनी का पूरा वजूद खील उठा, इसका जिस्म चहक उठा इस खुशनुमा नज़ारे को देख कर.
वो कब से यही यों चाहती थी, उसका सपना था कि वो अपने पति के साथ ऐसी ही किसी जगह पर जाये,
लेकिन अफ़सोस पति नहीं उसका साथ एक अनजान..... ओह sorry अब अनजान कहाँ रह गया था सुलेमान.
कामिनी किसी और मर्द के साथ इस हसीन लम्हे को जी रही थी.
खिड़की के बाहर धुंध की सफ़ेद चादर ओढ़े ऊँचे-ऊँचे पहाड़ अब साफ़ नज़र आने लगे थे। माहौल मे ठंडक बढ़ गई थी.
कामिनी ने कुल्हड़ से चाय की एक गर्म चुस्की ली। सुबह की ताज़गी और सुलेमान की भारी-भरकम मौजूदगी ने उसके अंदर एक अजीब सी आज़ादी भर दी थी।
"कितना सुंदर मौसम है ना, सुलेमान?" कामिनी ने खिड़की के बाहर देखते हुए बहुत ही सहजता से कहा।
सुलेमान की निगाहें बाहर के मौसम से ज़्यादा कामिनी के निखरे हुए, पसीने से धुले गोरे चेहरे पर टिकी थीं।
"हाँ... मैंने सुना है, नैनीताल बहुत सुंदर जगह है," सुलेमान ने अपनी भारी, लेकिन ठहरी हुई आवाज़ में जवाब दिया।
कुछ पलों के लिए सिर्फ़ ट्रेन के पहियों की आवाज़ गूँजती रही। फिर कामिनी ने अपनी नज़रें कुल्हड़ पर गड़ाए हुए, अचानक एक ऐसा बेबाक सवाल दाग़ दिया, जिसकी उम्मीद शायद सुलेमान को भी नहीं थी।
"वैसे... क्या करोगे इसका?"
"किसका?" सुलेमान ने नासमझी का अभिनय करते हुए पूछा।
"वही... जो अपनी जेब में ठूँसे बैठे हो?" कामिनी ने अपनी आँखें उठाईं और सीधे सुलेमान की ख़तरनाक आँखों में झाँकते हुए कहा। उसकी आवाज़ में अब कोई डर नहीं था, बल्कि एक मादक ढिठाई थी।
सुलेमान के खुरदरे होंठों पर एक शैतानी मुस्कान तैर गई। उसने अपनी भारी, फौलादी हथेली अपनी पैंट की गहरी जेब पर रखी, जहाँ कामिनी के जिस्म के रस से सनी हुई लाल चड्डी क़ैद थी। सुलेमान ने अपनी नज़रें कामिनी पर टिकाए रखीं और कपड़े के ऊपर से ही उस चड्डी को अपनी मज़बूत मुट्ठी में कसकर भींच लिया।
ईस्स...!!
कामिनी की जाँघें अचानक एक झटके से आपस में कस गईं। उसकी साँसें हलक में अटक गईं।
ये कोई जादू था या हवस कि इंतेहा कामिनी को ऐसा महसूस हुआ जैसे सुलेमान ने जेब में रखी चड्डी को नहीं, बल्कि साड़ी के नीचे उसकी नाज़ुक, सुलगती हुई फूली चुत को ही अपने फौलादी पंजों में भींच लिया हो। उसके पूरे वजूद में एक मीठी सी झनझनाहट दौड़ गई।
"ऐसी 'मज़दूरी' मुझे पहली बार मिली है मेमसाब.." सुलेमान की आँखों में वही रात वाली बेशरमी थी, "सोच रहा हूँ... इसे अपने घर में फ्रेम करवा के टाँग लूँ।"
कामिनी अपनी हँसी नहीं रोक पाई। एक मीठी, दबी हुई हँसी उसके रसीले होंठों से फूट पड़ी।
"हाहाहा... हट बेशर्म! फेंक देना इसे... गंदी है वो।"
कामिनी ख़ुद अपनी इस आज़ादी पर हैरान थी। ठीक उसके सिर के ऊपर उसका असली पति रमेश सो रहा था, और वो यहाँ नीचे एक निहायती पराये मर्द के साथ इतनी बेशर्मी से अपने सबसे भीतरी कपड़े और अपने जिस्म की बात कर रही थी। बीस साल की शादीशुदा ज़िंदगी में जो आज़ादी और बेबाकी उसे रमेश के साथ कभी महसूस नहीं हुई, वो इस 'मज़दूर' के साथ एक रात में ही मिल गई थी। वो पूरी तरह से सुलेमान के रंग में रंगती जा रही थी।
सुलेमान ने कुल्हड़ को अपने होंठों से लगाया और चाय का आख़िरी घूँट भरते हुए, बिना किसी झिझक के बोला, "वैसे... बहुत अच्छी खुशबू आती है इसमें से।"
सुलेमान के मुँह से निकली इस अश्लील लेकिन सच्ची तारीफ़ ने कामिनी के सीने में फिर से आग लगा दी। उसके गोरे गाल शर्म और एक अजीब सी ख़ुशी से सुर्ख़ लाल हो गए।
"छी... गंदे आदमी!" कामिनी ने बनावटी ग़ुस्सा दिखाते हुए कहा, पर उसकी आँखें मुस्कुरा रही थीं। "ऐसे ही मज़दूरी करने के बहाने... भोली-भाली औरतों को फँसाते हो क्या?"
"लो... अब इस दुनिया में सच बोलना भी गुनाह हो गया।"
सुलेमान की हँसी और कामिनी के चेहरे की सुर्ख़ लालिमा बता रही थी कि इन दोनों के बीच शर्म हया कि दिवार तो कबकी ढह गई है.
चाय की उस मादक और बेबाक बातचीत के बीच ही अचानक उस ख़ामोशी को चीरती हुई एक कर्कश आवाज़ गूँजी...
ट्रिन... ट्रिन.... खर्रर्र...
सुलेमान का फ़ोन बज उठा था। उसने तुरंत अपनी पैंट की दूसरी जेब में हाथ डाला और एक बेहद सस्ता सा, घिसा-पिटा कीपैड वाला मोबाइल बाहर निकाला। स्क्रीन पर 'हरीश कॉलिंग' (Harish Calling) जगमगा रहा था।
स्क्रीन पर वो नाम देखते ही सुलेमान के चेहरे के भाव पलक झपकते ही बदल गए। कामिनी जो अब तक उस 'मज़दूर' के साथ एक ख़ूबसूरत आज़ादी महसूस कर रही थी, अचानक सहम गई। सुलेमान के चेहरे से मज़दूर होने का भाव, वो सस्तापन और वो मासूमियत... सब कुछ एक झटके में भाप बनकर उड़ गया था। अब उसकी आँखों में एक ऐसी गहरी और सर्द ख़ामोशी थी, जिसे देखकर किसी की भी रूह काँप जाए।
"मैं अभी आया... कामिनी।"
सुलेमान के मुँह से निकले इन चार शब्दों ने कामिनी को अंदर तक झकझोर कर रख दिया। कहाँ रात भर का वो 'मेमसाब... मेमसाब' का रट लगाना, और कहाँ सीधा 'कामिनी'!
पहले के कामिनी बोलने और अब के कामिनी बोलने मे जमीन आसमान का अंतर था.
सुलेमान के बोलने और हैंडल करने का अंदाज़ एकदम से बदल गया था। उसने यह नाम इतने रोब, इतने अधिकार और इतनी ठंडी आवाज़ में लिया था, जैसे कामिनी कोई जीती-जागती औरत नहीं, बल्कि उसकी ख़रीदी हुई कोई जागीर (Property) हो।
"अअअ... हाँ..." कामिनी के मुँह से हड़बड़ाहट में सिर्फ़ इतना ही निकल पाया।
सुलेमान तुरंत अपनी सीट से उठा और कूपे का परदा खिसका कर गैलरी से होता हुआ डिब्बे के बाहरी दरवाज़े के पास चला गया। ट्रेन की गड़गड़ाहट के बीच उसने फ़ोन उठाया।
"हेलो..."
"गुड मॉर्निंग बॉस..." दूसरी तरफ़ से हरीश की चौकन्नी आवाज़ आई।
"हाँ हरीश, बोल," सुलेमान ने एक निहायती गंभीर और आदेश देने वाली आवाज़ में कहा।
"मैं पहुँच गया हूँ नैनीताल। होटल में कमरा भी बुक हो गया है। आप कब तक पहुँचोगे?"
"12-1 बजे तक आ जाऊँगा। होटल कौन सा है?" सुलेमान ने अपनी नज़रें बाहर गुज़रते प्लेटफ़ॉर्म्स पर गड़ाए हुए पूछा।
"अरे भाई, मैं आपको स्टेशन पे ही मिलूँगा ना रिसीव करने?" हरीश ने जवाब दिया।
"ठीक है... लेकिन सुन, सीधा मेरे पास मत आ जाना। दूर ही रहना और सिर्फ नज़र रखना," सुलेमान ने हिदायत दी।
"क्यों भाई....? कोई गड़बड़ है क्या?" हरीश कन्फ्यूज़ था।
"समझ हरीश ... मैं अकेला नहीं हूँ। बाकी कहानी बाद में बताऊँगा, अभी जो बोला है उतना कर।"
"ठीक है भाई..."
कट! फ़ोन कट गया। सुलेमान ने फ़ोन वापस अपनी जेब में सरका लिया।
इधर कूपे के अंदर, कामिनी के दिल में शक के कीड़ों ने वापस अपना घर बनाना शुरू कर दिया था। सुलेमान का एकाएक बदला हुआ लहज़ा उसे किसी सुई की तरह चुभ रहा था। एक पल पहले जो आदमी मज़दूरी की बात कर रहा था, वो अचानक इतना खूँखार और रसूखदार कैसे हो गया?
'कोई मज़दूर ऐसा क्यों करेगा? वो तो एक अनपढ़ देहाती है ना, फिर वो अलग जाकर, छुपकर क्यों बात करेगा?' कामिनी का दिमाग़ तेज़ी से दौड़ने लगा।
जिस लहज़े में उसने 'कामिनी' बोला था, वो किसी मज़दूर का नहीं, बल्कि किसी बड़े ऑफिस के बॉस का हो सकता था। एक मज़दूर में इतना आत्मविश्वास, इतना रोब और ये ख़तरनाक लहज़ा आया कहाँ से?
'क्या सुलेमान वाक़ई कोई पुलिस वाला है? या कोई अंडरकवर ऑफ़िसर, जैसा उसने कल मज़ाक में कहा था?' कामिनी की साँसें तेज़ होने लगीं।
'नहीं... नहीं... ये मैं क्या फ़िज़ूल सोच रही हूँ! मैंने तो ख़ुद उसे अपने गाँव की हवेली में समान उठाते, मज़दूरी करते देखा है। वो पुलिस वाला या कोई बड़ा आदमी कैसे हो सकता है?'
वैसे भी पुलिस वाले इतने अच्छे नहीं होते, एकाएक कामिनी के जहन मे शमशेर का चेहरा याद आ गया, शमशेर ने बुरी तरह रोंदा था उसे, जानवर था वो बिल्कुल.
सुलेमान ऐसा नहीं था.
कामिनी ने अपना ये विचार त्याग दिया.
कामिनी ख़ुद की बातों को और अपने शक को लगातार नकार रही थी, लेकिन फिर भी उसके मन से वो अजीब सी बेचैनी नहीं जा रही थी।
तभी... कामिनी के ज़ेहन में अपने बेटे बंटी के वो आख़िरी शब्द गूँज उठे। जब वो हवेली से निकल रही थी, तब बंटी ने उसे आख़िरी चेतावनी दी थी
"माँ... थोड़ा सँभल कर रहना।"
कामिनी की रीढ़ की हड्डी में एक ठंडी सिहरन दौड़ गई। 'तो क्या वाक़ई कोई बहुत बड़ी गड़बड़ है? रमेश का अचानक से मुझे ऐसे घुमाने ले आना... बीस साल की शादी में आज तक तो रमेश ने कभी ऐसा नहीं किया! फिर ये शराबी, लालची और रूखा इंसान अचानक इतना मेहरबान क्यों हो गया?'
कामिनी जैसे-जैसे ख़ुद से सवाल पूछती गई, उसे ये पूरा घटनाक्रम, ये अचानक बना नैनीताल का प्लान, और इस अजीब से 'मज़दूर' का उनके साथ आना... सब कुछ एक बहुत बड़ी और गहरी साज़िश का हिस्सा नज़र आने लगा।
'कहीं रमेश कुछ ग़लत तो...' कामिनी ने अपना सिर झिड़का। 'नहीं-नहीं... रमेश घूसखोर है, शराबी है, पैसे का लालची है। शायद वाक़ई नैनीताल में उसे कोई बड़ा काम या कोई डील मिली हो, इसलिए वो मुझे साथ ले आया।'
कामिनी ने तर्क देकर अपने शक को दूर करने की कोशिश तो की, लेकिन एक औरत की छठी इंद्री (Sixth Sense) अब पूरी तरह से जाग चुकी थी।
इतिहास गवाह है औरत कि छठी इंद्री कभी झूठ नहीं बोलती.
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सुलेमान जब बाहर से फ़ोन पर बात करके वापस कूपे में लौटा, तो रमेश अपनी नींद पूरी करके ऊपर की बर्थ से नीचे आ चुका था। सुलेमान को देखते ही रमेश ने अपना वही पुराना रौबदार और कड़क रवैया ओढ़ लिया।
रमेश के जागने के बाद उस सँकरे से डिब्बे में एक नीरस और खामोश सा सफ़र फिर से शुरू हो गया। अगले कुछ घंटों तक सुलेमान और कामिनी के बीच एक भी लफ़्ज़ नहीं बोला गया। रमेश अपने फ़ोन में कुछ चेक करने में लगा था, जबकि कामिनी चुपचाप खिड़की से बाहर देख रही थी।
हाँ, इस ख़ामोशी के बीच जब भी रमेश की नज़रें हटतीं, सुलेमान और कामिनी की नज़रें आपस में टकरा जाती थीं। उन चंद सेकंड्स के आई-कांटेक्ट (Eye-contact) में रात की पूरी मादक कहानी ताज़ा हो जाती।
खिड़की के बाहर का नज़ारा अब पूरी तरह से बदल चुका था। मैदानी इलाके पीछे छूट गए थे और धुंध की चादर लपेटे विशाल पहाड़ियाँ अब बिल्कुल नज़दीक आने लगी थीं। दूर क्षितिज पर बर्फीली चोटियों का धुँधला सा अक्स दिखाई देने लगा था, जिसका मतलब साफ़ था, नैनीताल की वादियाँ अब बस बाहें फैलाए उनका इंतज़ार कर रही थीं।
दोपहर के 12:30 बज चुके थे।
लोहे की पटरियों पर ट्रेन की गड़गड़ाहट अब धीमी होने लगी थी।
चररररररर..... चु.. चु.... खच्चच...
ब्रेक लगने की तेज़ आवाज़ के साथ ट्रेन हिचकोले खाती हुई नैनीताल के प्रवेश द्वार, यानी 'काठगोदाम रेलवे स्टेशन' के प्लेटफार्म नंबर एक पर आकर पूरी तरह रुक गई।
"चल भाई सुलेमान... सामान सँभाल ले, उतरना है अब," रमेश ने अपनी सीट से उठते हुए एक ठेठ मालिक वाले लहज़े में हुक्म दिया।
"जी साब..." सुलेमान ने अपनी आँखें झुकाईं और वापस उसी 'देहाती मज़दूर' वाले रूप में आ गया। उसने पलक झपकते ही दोनों भारी बैग अपने मज़बूत कन्धों पर टाँग लिए।
इधर कामिनी का दिल उमंग से नहा रहा था। बीस साल के नीरस जीवन, घुटन भरी शादी और चार दीवारी के बाद, वो पहली बार किसी खुली और इतनी ख़ूबसूरत जगह पर आई थी। उसका रोम-रोम हिलोरे खा रहा था।
उसके जिस्म पर रोये खड़े हो गए थे.
सुलेमान दोनों बैग लेकर डिब्बे से नीचे उतरा, उसके ठीक पीछे कामिनी थी और सबसे आख़िर में रमेश।
जैसे ही कामिनी ने ट्रेन के डिब्बे से बाहर प्लेटफार्म पर अपना पहला क़दम रखा... एक बेहद ठंडी, ताज़ा और देवदार के पेड़ों की महक से भरी हवा के झोंके ने उसके चेहरे को चूम लिया। कामिनी की आँखें ख़ुशी से बंद हो गईं।
एसी (AC) की बनावटी ठंडक इस प्राकृतिक, बर्फीली हवा के सामने कुछ भी नहीं थी। उस ठंडी हवा ने कामिनी की साड़ी के पल्लू को उड़ाया और उसकी नंगी जाँघों, नंगी गांड को सहलाते हुए गुजरने लगी, एक कामुक मदहोश कर देने वाले अहसास ने कामिनी को घेर लिया, एक मीठी सी गुदगुदी नाभि के आस पास होने लगी थी,
स्टेशन का नज़ारा वाक़ई बहुत जादुई था। काठगोदाम का वो छोटा सा, लेकिन बेहद साफ़-सुथरा स्टेशन चारों तरफ़ से शिवालिक की हरी-भरी और घुमावदार पहाड़ियों से घिरा हुआ था। स्टेशन की टीन की छत के पार सीधे नीले आसमान और बादलों से ढके पहाड़ दिख रहे थे। प्लेटफार्म पर पर्यटकों की भारी चहल-पहल थी। रंग-बिरंगे ऊनी कपड़े पहने हुए लोग, कुलियों की भाग-दौड़, 'चाय-गर्म चाय' की आवाज़ें और बाहर टैक्सी वालों का शोर—सब कुछ एक अजीब सी जीवंतता (liveliness) से भरा हुआ था।
धूप खिली हुई थी, लेकिन हवा में पहाड़ों की मीठी सी सिहरन थी जो इंसान की सारी थकान मिटा देती है।
कामिनी ने एक गहरी साँस ली और अपने फेफड़ों में पहाड़ों की उस ताज़ा हवा को भर लिया। उसका पसीने से उतरा हुआ चेहरा इस ख़ुशनुमा माहौल में एकदम से खिल उठा था। उसके चेहरे पर एक ऐसी आज़ाद और बेपरवाह हँसी आ गई थी, जिसे रमेश ने शायद सालों से नहीं देखा था।
सुलेमान अपने कन्धों पर बैग लटकाए प्लेटफार्म पर खड़ा था। उसकी निगाहें छुपकर कामिनी की इस आज़ाद और निखरी हुई ख़ूबसूरती को ही निहार रही थीं।
"यहाँ से नैनीताल ऊपर पहाड़ पर है, टैक्सी करनी पड़ेगी," रमेश ने अपना चश्मा ठीक करते हुए कहा।
" सुलेमान, चल बाहर चलते है, कोई टैक्सी कर लेते है "
"जी साब," सुलेमान आगे की तरफ़ चल पड़ा।
सुलेमान ने रमेश का हुक्म सुन तो लिया था, लेकिन उसकी तेज़, चील जैसी निगाहें प्लेटफार्म की भीड़ में किसी और को ही तलाश रही थीं।
'कहाँ रह गया साला...?' सुलेमान को हल्की सी बेचैनी होने लगी। कहीं ये हरीश ऐन मौके पर कोई चूक ना कर दे!
"चलो भाई सुलेमान... वहीं खड़े रहोगे क्या? अभी ऊपर जाकर होटल भी ढूँढना है, बुक करना है," रमेश ने अपनी जेब से रुमाल निकालकर पसीना पोंछते हुए थोड़ी खीझ के साथ कहा।
सुलेमान आगे बढ़ने ही वाला था कि तभी पीछे से एक बेहद ही मीठी, सुरीली और नर्म आवाज़ गूँजी—
"सलाम साब... बताइए, कहाँ चलना है?"
कामिनी और रमेश ने एक साथ पीछे मुड़कर देखा। सामने एक 20-22 साल का छरहरा सा लड़का खड़ा था। उसने पहाड़ी टैक्सी ड्राइवरों वाली साफ-सुथरी ख़ाकी वर्दी पहन रखी थी और उसके कंधे पर एक छोटा सा तौलिया रखा हुआ था।
"साब, टैक्सी में चलना है? नैनीताल में जहाँ कहोगे, एकदम बढ़िया से छोड़ दूँगा," लड़के ने हाथ जोड़कर बड़ी ही नम्रता से कहा।
सुलेमान की निगाहें जैसे ही उस लड़के पर पड़ीं, उसके सख़्त और खुरदरे चेहरे पर अंदर ही अंदर एक शातिर, विजयी मुस्कान तैर गई।
'साला हरीश... उम्र ज़रूर छोटी है, लेकिन काम का एकदम पक्का आदमी है! बिल्कुल सही आदमी को अपने साथ रखा है मैंने।' सुलेमान को अपनी पसंद और हरीश की इस फुर्ती पर गुरूर होने लगा था।
सुलेमान ने उसे फ़ोन पर बस इशारों में बात समझाई थी, और हरीश तुरंत एक आम टैक्सी वाले के भेष में उनके सामने हाज़िर था, वो भी बिना किसी को शक होने दिए।
इधर कामिनी की नज़रें उस लड़के पर टिक गई थीं। कामिनी उसकी मासूमियत, उसके भोलेपन और उसकी कोमलता को देखकर उस पर मोहित हुए बिना नहीं रह सकी। बंटी जैसा ही कद काठी का सुंदर लड़का हरीश था ही ऐसा!
बिल्कुल दूध जैसा गोरा रंग, साफ़-सुथरा और बिना दाढ़ी-मूँछ का एकदम चिकना चेहरा। उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में एक ऐसी सच्चाई थी जो किसी को भी पिघला दे, और उसकी आवाज़ में तो जैसे शहद घुला हुआ था। एक 40 साल की औरत (कामिनी) के दिल में उस ख़ूबसूरत और मासूम नौजवान को देखकर एक अनजाना सा आकर्षण और एक मीठी सी कशिश अपने आप जाग उठी थी।
अक्सर भूखी शेरनी ऐसे ही कोमल खरगोश का शिकार पसंद करती है.
हरीश की ये मासूमियत दरअसल एक बहुत गहरे दर्द और एक ख़तरनाक अतीत का आवरण थी। वो एक अनाथ था। उसका बाप एक ईमानदार पुलिस वाला था, जो सालों पहले अंडरवर्ल्ड की गोलियों का शिकार होकर मारा गया, उस खूनी रात में सुलेमान को उस छोटे, बेसहारा और रोते हुए बच्चे पर अजीब सी दया आ गई। सुलेमान ने उसे मरने नहीं दिया, बल्कि अपने साये में ले लिया।
हरीश शक्ल से जितना भोला और कोमल दिखता था, दिमाग़ से उतना ही तेज़, शातिर और चालाक इंसान था। वो सुलेमान की आँखों के इशारे बिना कुछ बोले ही समझ जाता था।
हरीश कोई गुंडा नहीं था, बल्कि पढ़ा लिखा सज्जन इंसान था, कीचड़ मे रह कर भी कीचड़ से अछूता था, 'बड़ा भाई' (गैंग के असली आका) के यहाँ सारे काले धंधों का अकाउंट (Account) सँभालता था। पढ़ने-लिखने में होशियार और कई विदेशी, देसी भाषाओं का जानकार हरीश, सुलेमान से एक विशेष और अटूट लगाव रखता था। उसके लिए सुलेमान ही उसका बाप, उसका गुरु और उसका भगवान था।
"गाड़ी कहाँ खड़ी है तुम्हारी? और पैसे कितने लोगे?" रमेश ने हरीश को ऊपर से नीचे तक घूरते हुए, अपने ठेठ अक्खड़ अंदाज़ में मोलभाव शुरू कर दिया।
"पैसे की फिकर मत करो साब, जो वाजिब (सही) होगा वही दे देना। गाड़ी बाहर ही खड़ी है, एकदम नई और साफ़ है। आप मेमसाब को लेकर आइए," हरीश ने कामिनी की तरफ़ एक बेहद मासूम और मीठी मुस्कान उछालते हुए कहा।
कामिनी उस शहद जैसी मुस्कान को देखकर अनजाने में ही मुस्कुरा उठी। मजबूत हट्टे कट्टे मर्दो के नीचे से गुजर चुकी कामिनी को हरीश की ये कोमलता उसके सुलगते हुए दिमाग़ को एक अजीब सा सुकून दे रही थी।
"ठीक है, सुलेमान! चल सामान लेकर इसके पीछे चल," रमेश ने आदेश दिया।
"जी साब," सुलेमान ने बैग उठाए और सिर झुका कर हरीश के पीछे चल पड़ा।
स्टेशन के बाहर के भीड़-भाड़ वाले रास्ते पर हरीश और सुलेमान सबसे आगे-आगे चल रहे थे। दोनों के बीच की दूरी बहुत कम थी और स्टेशन के शोरगुल में उनकी धीमी फुसफुसाहट पीछे आ रहे रमेश या कामिनी तक पहुँचना बिल्कुल नामुमकिन था।
"क्या भाई... इसी औरत के लिए ट्रेन के इतने धक्के खाए हैं क्या?" हरीश ने अपनी मीठी, लेकिन निहायती बेबाक आवाज़ में पूछा। पूरी गैंग में सिर्फ़ उसे ही सुलेमान 'बॉस' से इस तरह बराबरी से बात करने की आज़ादी थी।
"हाँ यार... गया तो मैं क़ादर को ढूँढने था, लेकिन ये मिल गई," सुलेमान ने अपनी भारी आवाज़ में कहा और एक पल के लिए पीछे मुड़कर देखा।
पीछे कामिनी चली आ रही थी। लाल साड़ी में कसा हुआ उसका भारी, गदराया हुआ गोरा जिस्म और उसके तेज़ क़दमों के साथ उसकी चौड़ी, माँसल कमर (गांड) का मादक मटकना... कोई भी आम आदमी उसे देखकर अपना ईमान खो बैठे। सुलेमान की निगाहें उस छलकते हुए हुस्न को पीकर फिर सामने की तरफ़ हो गईं। "एक अजीब सी कसक है यार इसमें..." सुलेमान ने जैसे ख़ुद से ही कहा।
हरीश ने भी एक तिरछी नज़र पीछे डाली और उसके चिकने चेहरे पर एक शरारती मुस्कान आ गई, "माल तो ज़बरदस्त है भाई... तो क्या, दिल आ गया है इस पर?"
सुलेमान ने एक गहरी, हल्की सी हताशा भरी साँस छोड़ी। "कहाँ यार... अपने इस काले धंधे में दिल लगाना मना है, और तू ये जानता है। ये तो बस किस्मत का खेल है कि इसकी और मेरी मंज़िल एक ही थी, तो मैं इसके साथ चला आया।"
"वैसे वो इसका पति ही हमारा कॉम्पीटिटर है," सुलेमान ने राज खोला.
"लो बताओ भाई... खुद ही दुश्मन साथिये घूम रहे हो, टपका दूँ रास्ते मे ही बोलो तो " हरीश मे दाँत ऐसे निपोर जैसे कितनो को मारा हो.
"चल आया बड़ा... आज तक चींटी भी मारी है तूने?"
"भाई मै आपकी तरह गुण से नहीं मारता यहाँ से मारता हूँ.... " हरीश ने दिमाग़ पर ऊँगली रख कहाँ.
कुछ क़दम और चलने के बाद सुलेमान ने काम की बात पूछी, " छोड़ उसे चुतिया शराबी आदमी है, लालच मे यहाँ आ गया है.
इसे कहाँ से डील मिल जाएगी? वैसे... होटल का क्या जुगाड़ किया है तूने?"
हरीश की आँखों में एक शातिर, शैतानी चमक आ गई। "अरे भाई... जब आप इस औरत के लिए इतनी तकलीफ झेल कर यहाँ तक आए हो, तो मैं आपको इससे दूर थोड़ी ना होने दूँगा! आपने बस फ़ोन पर एक इशारा किया था, और मैंने इधर ऐसा सॉलिड जुगाड़ सेट कर दिया है कि आप खुश हो जाओगे। बस देखते जाओ, अभी कैसा चक्कर चलाता हूँ..."
इतना कहकर हरीश ने पलक झपकते ही अपना रूप वापस उसी 'भोले और शरीफ़ टैक्सी वाले' में बदल लिया। उसने पीछे की तरफ़ एक ज़ोरदार, मीठी आवाज़ लगाई,
"आओ साब... वो सामने जो सफ़ेद गाड़ी खड़ी है ना, वही अपनी टैक्सी है!"
उनके पीछे-पीछे चलती आ रही कामिनी की चाल थोड़ी और तेज़ हो गई थी। पहाड़ों की बर्फीली, ताज़ा हवा उसकी साड़ी को चीरती हुई सीधे उसकी रूह तक समा रही थी। रात मे सुलेमान द्वारा चड्डी उतार दिए जाने के बाद से वो अंदर से अभी भी पूरी तरह नंगी थी। जाँघों के बीच की नाज़ुक जगह पर जब नैनीताल की ठंडी हवा का झोंका टकराता, तो कामिनी के तपते हुए जिस्म को एक अजीब सी, गुदगुदाती हुई राहत मिलती।
उसका पूरा जिस्म इस आज़ादी और इस ख़ुशनुमा माहौल में ऐसी हिलोरे खा रहा था कि जैसे वो ख़ुद में ही नहीं समा पा रही हो। बीस साल की घुटन के बाद खुली हवा में साँस लेना उसे आज़ाद चिड़िया होने का अहसास करवा रहा था.
सुलेमान ने सारा सामान SUV की डिक्की में लाद दिया। कामिनी ने जैसे ही पीछे वाली चौड़ी सीट की तरफ़ क़दम बढ़ाया, रमेश की कर्कश आवाज़ ने उसे रोक दिया।
"कामिनी, तुम आगे बैठ जाओ। मुझे सुलेमान से कुछ ज़रूरी बात करनी है।"
रमेश ने सुलेमान को पीछे बैठने का इशारा किया और ख़ुद भी किसी नवाब की तरह पीछे वाली सीट पर पसर गया। उसे इस बात की कोई परवाह नहीं थी कि वो बीवी को यहॉ घुमाने का बोल कर लाया है,
कामिनी ने एक ठंडी साँस ली और आगे वाले दरवाज़े का हैंडल खोलने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि...
एक बेहद कोमल और नाज़ुक सा हाथ उसकी हथेली को हल्के से छूता हुआ आगे बढ़ा।
"मैं हूँ ना मैडम... आप क्यों तकलीफ करती हैं।"
हरीश ने अपनी उसी शहद घुली आवाज़ में कहते हुए झटके से कार का दरवाज़ा कामिनी के लिए खोल दिया।
कामिनी उस लड़के के इस प्यारेपन और सलीके पर हैरान रह गई। बीस साल में रमेश ने कभी उसके लिए कार का दरवाज़ा नहीं खोला था। 'आजकल के लड़के वाक़ई औरत की कद्र करना जानते हैं,' कामिनी ने मन ही मन सोचा और एक हल्की सी मुस्कान के साथ आगे की सीट पर बैठ गई। हरीश ने फुर्ती से ड्राइविंग सीट सँभाल ली।
खर्रर्र... वूम... गाड़ी का इंजन स्टार्ट हुआ और नैनीताल की घुमावदार वादियों का वो सफ़र शुरू हो गया।
पीछे की सीट पर रमेश ने अपनी आवाज़ को एकदम फुसफुसाहट में बदल लिया।
"देख भाई सुलेमान... जिस काम के लिए तुझे यहाँ तक लाया हूँ, वो अब शुरू होता है।"
रमेश ने अपनी जेब से एक मुड़ी-तुड़ी पर्ची निकाली और सुलेमान की तरफ़ बढ़ा दी। उस पर लिखा था
'The Naini Retreat' (द नैनी रिट्रीट)।
वो नाम पढ़ते ही सुलेमान की भौंहें सिकुड़ गईं। उसकी आँखों में एक ख़तरनाक चमक आ गई। उसकी मंज़िल भी यही थी.
"यहाँ चल के मुझे पेड्रो डिकोस्टा (Pedro Decosta) नाम के एक आदमी से मिलना है," रमेश ने अपनी योजना समझाई।
"तुझे कुछ नहीं करना है, बस मेरे साथ रहना है। कोई ऊँच-नीच हो तो तेरा ये भारी शरीर देखकर सामने वाला वैसे ही दब जाएगा।"
सुलेमान अंदर ही अंदर हँस पड़ा। 'पेड्रो डिकोस्टा... साला मौत के कुएँ में कूदने आया है ये शराबी।'
"समझ गया साब..." सुलेमान ने अपना देहाती रूप बनाए रखते हुए पूछा, "मतलब हमें इसी होटल में रुकना है?"
"अरे नहीं पागल! पास में ही कोई दूसरा सस्ता और अच्छा होटल लेंगे, ये रिट्रीट तो बहुत महँगा है," रमेश ने अपनी कंजूसी दिखाते हुए कहा। फिर उसने आगे की तरफ़ आवाज़ लगाई, "भाई ड्राइवर... क्या नाम है तेरा? चल जाने दे नाम को, ये नैनी रिट्रीट के आस-पास कोई बढ़िया सा होटल हो तो वहाँ रोकना।"
"जी साब, बिल्कुल," आगे से हरीश ने शीशे में सुलेमान की तरफ़ एक रहस्यमयी नज़र डालते हुए जवाब दिया।
इधर आगे की सीट पर, कामिनी अपनी ही दुनिया में मदहोश थी। अब उसे पीछे बैठे रमेश से कोई मतलब नहीं रह गया था। उसकी नज़रें बाहर की ख़ूबसूरत वादियों, ऊँचे देवदार के पेड़ों और गहरी खाइयों पर टिकी थीं। नैनीताल की ठंडी हवा आधी खुली खिड़की से छनकर आ रही थी और कामिनी के जिस्म में एक अजीब सी मादकता घोल रही थी।
सीट चौड़ी थी, लेकिन कामिनी का भारी और गदराया हुआ जिस्म कुछ इस तरह पसरा हुआ था कि उसकी बाईं जाँघ गियर-बॉक्स के बिल्कुल पास आ गई थी। साड़ी के नीचे किसी भी तरह के अंतर्वस्त्र (पैंटी) का ना होना उसे पल-पल एक नशीली आज़ादी का अहसास करा रहा था।
तभी... गाड़ी एक तीखे मोड़ पर घूमी।
ईससससस....!!
कामिनी के रसीले होंठों से अचानक एक मीठी, काँपती हुई सिसकी निकल गई। उसके पूरे जिस्म के रोंगटे एक झटके में खड़े हो गए।
हुआ यूँ कि मोड़ पर गियर बदलते वक़्त, हरीश का बेहद गोरा, कोमल और चिकना हाथ कामिनी की नंगी जाँघ (जिस पर सिर्फ़ साड़ी की एक पतली सी परत थी) पर पूरी ताक़त से रगड़ खा गया था। कामिनी की जाँघों के बीच की सुलगती हुई गर्मी और कोमल हाथ का गहरा घर्षण... किसी बिजली के झटके जैसा था।
"ओह्ह्ह... आई एम सॉरी मैडम... वो गियर थोड़ा अटक गया था," हरीश ने तुरंत अपना हाथ हटाते हुए, इतनी मासूमियत और मिठास से कहा, जैसे किसी ने कामिनी के चेहरे पर कोई गुलाब का फूल दे मारा हो।
हरीश की बोलने में इतना भोलापन था कि कोई उस पर शक कर ही नहीं सकता था (हालाँकि ये हरीश की कोई ग़लती भी नहीं थी, कामिनी की गदराई जाँघें ही इतनी फैली हुई थीं कि वो गियर बॉक्स को टच कर रही थीं)।
"कक्क... कोई बात नहीं..." कामिनी ने हकलाते हुए जवाब दिया।
लेकिन बात तो थी! हरीश की अनजाने में हुई छुअन ने कामिनी के शांत पड़ चुके जिस्म में फिर से आग लगा दी थी। सुलेमान के हाथ फौलादी और खुरदरे थे, जिनमें एक ख़ौफ़नाक जंगलीपन था, लेकिन इस लड़के के हाथों में एक ऐसी नर्म और रेशमी छुअन थी, जो सीधा रूह में उतर रही थी। कामिनी की नज़र एक पल के लिए ड्राइविंग कर रहे हरीश के उस ख़ूबसूरत चेहरे पर गई।
'ना जाने क्या अजीब सी बात है इस लड़के में...' कामिनी ने मन ही मन सोचा, और उसकी नाभि के नीचे एक बार फिर वो मीठी सी ऐंठन उठने लगी।
काठगोदाम से नैनीताल का घुमावदार और पहाड़ी सफ़र लगभग डेढ़ दो घंटे का था। गाडी ज्यों-ज्यों ऊपर वादियों में चढ़ रही थी, हवाओं में ठंडक और मादकता बढ़ती जा रही थी।
दिन के 3.30 बजने को आये थे.
समय बीतता गया, सफ़र अब अपने अंतिम चरणों पर था। आगे बैठी कामिनी इस पूरे रास्ते एक अजीब सी कशिश में डूबी रही। वो रह-रह कर कभी खिड़की के बाहर गहरी खाइयों और देवदार के पेड़ों को देखती, तो कभी शीशे में या कनखियों से हरीश के हसीन, कोमल चेहरे को निहारने लगती। गियर बदलते वक़्त हुई वो अनजानी सी छुअन कामिनी के दिमाग़ में बस गई थी।
गाड़ी नैनीताल शहर की भीड़-भाड़ वाली माल रोड (Mall Road) के पास एक तंग और व्यस्त इलाके में आकर रुकी।
"लो साब आ गाये " हरीश ने अपनी मीठी आवाज़ में कहा और इंजन बंद कर दिया।
कामिनी ने खिड़की से बाहर देखा। सामने ही था
Hotel kurmanchal।
ये किसी शांत वादी या पहाड़ी के किनारे नहीं, बल्कि एक घनी जगह पर बना हुआ होटल था, जिसके आस-पास पूरा बाज़ार और शोरगुल था।
"लो जी साब आ गए बजट फ्रिन्ड्ली होटल है, सस्ता सुंदर टिकाऊ " हरीश ने गाड़ी से उतरते हुए रमेश की तरफ़ देखकर कहा।
कामिनी का खिला हुआ चेहरा एकदम से उतर गया। उसने सपने सजाए थे कि वो किसी शानदार होटल में रुकेगी, जहाँ खिड़की खोलते ही सिर्फ़ वादियाँ और कोहरा हो, लेकिन ये तो किसी आम बाज़ार का डिब्बा लग रहा था।
"क्या हुआ मैडम पसंद नहीं तो कहीं और चलते है " हरीश ने कामिनी के उतरे हुए चेहरे को देखते हुए बड़ी ही मासूमियत से पूछा।
इससे पहले कि कामिनी कुछ बोलती, पीछे से रमेश ने अपना अक्खड़पन और कंजूसी दिखाते हुए बात काट दी।
"क्यों नहीं पसंद भाई... काम से आये है, होटल मे सोना ही तो होता है, घूमना तो बहार ही है, क्यों कामिनी?" रमेश ने अपनी कलाकारी दिखा दी और सारा फैसला कामिनी पर थोप दिया।
कामिनी को अपने पति की इस नीरसता पर अंदर ही अंदर बहुत ग़ुस्सा आ रहा था। बीस साल से यही तो हो रहा था।
"हाँ.... ठीक है..." कामिनी मन मसोस कर रह गई।
हरीश ने पीछे खड़े सुलेमान की तरफ़ देखा। सुलेमान ने आँखों ही आँखों में उसे जैसे कोई इशारा किया.
हरीश तुरंत कामिनी की तरफ़ घूमा और अपनी शहद जैसी आवाज़ में बोला, "अरे मैडम मै हूँ ना... सब सेट कर के दूंगा। अपने मेरी बोनी कराई है।"
इतना कहकर हरीश तेज़ी से होटल के अंदर गया। सुलेमान और रमेश सामान बाहर निकाल ही रहे थे कि महज़ 5 मिनट में हरीश वापस बाहर आ गया। उसके चेहरे पर एक शानदार मुस्कान थी।
"आओ साब मात्र 2000rs पर day मे शानदार कमारा करवा दिया है मैंने," हरीश ने चाबियाँ घुमाते हुए कहा।
रमेश 2000 रुपये का सस्ता दाम सुनकर ख़ुश हो गया और सब लोग अंदर चले गए।
होटल सामने से और रिसेप्शन से वाक़ई कुछ ख़ास नहीं था, बिल्कुल आम सा लग रहा था। लेकिन जैसे ही हरीश ने दूसरी मंजिल के पीछे वाले कमरे का दरवाज़ा खोला... नज़ारा ही पलट गया!
कमरा अंदर से बहुत ही शानदार और लकड़ी की नक़्क़ाशी से बना हुआ था। लेकिन सबसे ख़ूबसूरत चीज़ थी उस कमरे की बालकनी। पीछे की तरफ़ से कोई बाज़ार नहीं था, बल्कि बालकनी से नैनी झील (Naini Lake) का गहरा हरा पानी और बादलों से ढके पहाड़ों का एक अद्भुत, मनमोहक दृश्य साफ़ दिखाई पड़ रहा था।
"Wow.... Thank you हरीश...."
कामिनी ख़ुशी के मारे लगभग भागती हुई बालकनी में गई। उसका रोम-रोम खिल उठा था।
वाह! क्या दृश्य था! कामिनी ने बालकनी की रेलिंग के पास पहुँचकर अपने दोनों हाथ हवा में फैला दिए और बाहर से आती बर्फीली, ताज़ा हवा को ख़ुद में समेट लिया।
तेज़ हवा के झोंके ने कामिनी की लाल साड़ी को पीछे की तरफ़ उड़ा दिया। साड़ी कामिनी के भारी, गदराए हुए जिस्म, उसकी चौड़ी पीठ और उसकी गोल जाँघों से पूरी तरह चिपक गई। हवा के झोंके ने साड़ी के नीचे के नंगेपन को सहलाया, जिससे कामिनी की नाभि के नीचे एक नशीली सिहरन दौड़ गई।
उसे इस वक़्त इस बात की कोई परवाह नहीं थी कि कमरे के अंदर उसके पति रमेश के अलावा... वहाँ दो और मर्द मौजूद हैं।
कमरे का मुआयना करने के बाद रमेश अब हरीश की तरफ़ मुख़ातिब हुआ।
"हाँ भाई, कितने हुए पैसे तुम्हारे?" रमेश ने कोई भाव नहीं दिया कि इतने कम पैसो मे इतना सुंदर कमरा मिल गया.
"2 हज़ार रुपये दे दो साब," हरीश ने बड़ी ही मासूमियत से कहा।
"कक्क... क्या? दो हज़ार?" रमेश ऐसे चौंका जैसे किसी ने उससे उसकी आधी जायदाद माँग ली हो।
"अरे साब, बहुत ऊपर तक आना पड़ता है। मैं तो नया हूँ, बोनी का टाइम है इसलिए कम ही माँग रहा हूँ। और फिर इतना शानदार कमरा भी तो दिलाया है आपको सस्ते में," हरीश ने अपनी भोली आवाज़ में सफ़ाई दी।
"ठीक है... ठीक है..." रमेश बड़बड़ाया। उसने अपनी जेब से पुराना सा पर्स निकाला और अपनी उँगलियों में थूक लगा-लगाकर नोट गिनने शुरू किए, ताकि कहीं ग़लती से एक नोट भी एक्स्ट्रा ना चला जाए।
"ये पकड़... और वो सामान उधर अलमारी के पास रख दे।"
हरीश ने फुर्ती से बैग उठाए और उन्हें कोने में करीने से जमा दिया।
"रमेश वो... थोड़ा मार्केट से कुछ लेना था," कामिनी पीछे से बोल पड़ी
"अरे अभी तो आए हैं! नहा-धो लो, फिर आराम से चलते हैं मार्केट," रमेश ने बिना उसकी तरफ़ देखे सीधा और रूखा जवाब दे दिया। "इन औरतों का मार्केट कभी ख़त्म ही नहीं होता भाई।"
"बहुत ज़रूरी चीज़ है रमेश... मैं कुछ भूल आई हूँ घर पर," कामिनी ने ये बात कही तो रमेश से, लेकिन उसकी नज़रें तिरछी होकर सीधे सुलेमान को घूर रही थीं। और घूरती भी क्यों ना, उसकी वो 'ज़रूरी चीज़' अभी भी उसी मज़दूर की जेब में जो क़ैद थी।
"अभी मुझे काम है थोड़ा। तुम नहाओ, मैं आता हूँ तो शाम को चलेंगे।" रमेश ने बात ख़त्म की और मुड़ा।
"चल भाई सुलेमान... और हरीश भाई, एक काम और कर दे यार। कहीं छोड़ना है," रमेश ने कंजूसी के मारे अपनी आवाज़ में बनावटी मिठास घोलते हुए कहा।
"उसका अलग से किराया लूँगा साब," हरीश ने भी एकदम पक्के टैक्सी वाले की तरह सीधा जवाब दिया।
"हाँ-हाँ, ले लेना बाबा..."
रमेश और हरीश दरवाज़े की तरफ़ आगे बढ़े। सुलेमान भी उनके पीछे-पीछे मुड़ा ही कि...
"ससससस.... सुलेमान...."
कमरे के मद्धम सन्नाटे में कामिनी के काँपते होंठों से एक सरसराती हुई फुसफुसाहट निकली। सुलेमान के क़दम वहीं ठिठक गए। वो दरवाज़े के पास ही रुक गया, जबकि रमेश और हरीश बाहर गैलरी में जा चुके थे।
"प्लीज़... मार्केट से एक जोड़ी लेते आना," कामिनी ने अपनी नज़रें झुकाते हुए, अपनी साड़ी के ऊपर से ही अपनी कमर के नीचे इशारा किया। साड़ी के नीचे का खालीपन और माहौल कि ठंडक उसे पल-पल बेबस कर रही थी।
"कक्क... क्या?" सुलेमान ने अपनी भारी आवाज़ में बिल्कुल ऐसे पूछा जैसे उसे कुछ पता ही ना हो। वो जानबूझकर भोला बन रहा था। एक मालकिन जैसी औरत को इस तरह एक मज़दूर के सामने अपनी उस 'चीज़' के लिए गिड़गिड़ाते हुए देखना सुलेमान को बहुत सुकून दे रहा था।
कामिनी के गोरे गाल शर्म से टमाटर की तरह सुर्ख़ लाल हो गए। उसने अपने रसीले होंठों को दाँतों तले दबाया और गहरी साँस लेते हुए बोली—
"वही... जिसे तुमने अपनी जेब में किडनैप करके रखा है।"
इतना कहकर कामिनी अपनी हया और शर्म को समेटती हुई, अपनी भारी जाँघों को आपस में भींचकर लगभग भागती हुई वापस बालकनी की तरफ़ चली गई।
सुलेमान के खुरदरे होंठों पर एक बहुत ही शैतानी और विजयी मुस्कान तैर गई। उसकी मंजिल अब नजदीक ही थी, सुलेमान ने दरवाज़ा बंद किया और बाहर निकल गया।
****************
होटल के बाहर आते ही हरीश ने कार स्टार्ट कर दी।
"कहाँ चलना है साब?" हरीश ने अपना टैक्सी वाला रूप बरकरार रखते हुए पूछा।
"द नैनी रिट्रीट (The Naini Retreat)... ले ले सीधा," रमेश ने पीछे की सीट पर नवाबों की तरह पसरते हुए हुक्म दिया।
पीछे सुलेमान उसके साथ खामोश बैठा था।
"भाई सुलेमान, तू बस साथ रहना, बाकी डील मैं देख लूँगा," रमेश ने अपनी बनावटी हिम्मत दिखाते हुए कहा।
नैनीताल के घुमावदार रास्तों से होती हुई टैक्सी लगभग आधे घंटे में उस आलीशान होटल के भव्य दरवाज़े पर पहुँच गई। ये होटल किसी महल से कम नहीं था।
रमेश ने जेब से पैसे निकालकर हरीश का किराया चुकाया और उसे विदा कर दिया।
हरीश ने भी सलाम ठोका और गाड़ी लेकर आगे बढ़ गया।
रमेश जैसे ही होटल के शानदार शीशे वाले दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा, सुलेमान ने उसे रोक दिया।
"साब... मैं आया 5 मिनट में," सुलेमान ने अपनी छोटी उँगली (पेशाब का इशारा) दिखाई और बिना रमेश के जवाब का इंतज़ार किए साइड की तरफ़ हो लिया।
रमेश का दिल वैसे ही अंदर जाते वक़्त काँप रहा था। एक अंडरवर्ल्ड डॉन से डील करना कोई बच्चों का खेल नहीं था। वो अपनी घबराहट छुपाते हुए वहीं दरवाज़े के पास खड़ा होकर सुलेमान का इंतज़ार करने लगा।
इधर सुलेमान तेज़ क़दमों से घूम कर होटल की एक बाहरी दीवार के पीछे पहुँचा। वहाँ हरीश पहले से ही गाड़ी खड़ी करके उसका इंतज़ार कर रहा था।
"क्या हुआ बॉस? रुकने का इशारा क्यों किया?" हरीश ने चौकन्ने होकर पूछा।
"सुन... अभी के अभी बाज़ार जा। एक सबसे शानदार और महँगी ब्रा-पैंटी (Lingerie) खरीद और जाकर कामिनी को दे आ," सुलेमान ने बिना किसी लाग-लपेट के सीधा आदेश दाग़ दिया।
हरीश का चिकना चेहरा एक पल के लिए सुन्न पड़ गया। ये किस तरह का काम था ? उसका काम तो पार्टी से बात करना, इंतेज़ाम देखना, पैसो का लेखा जोखा, डील करवाना यही सब था.
"कक्क... क्या? कैसी... बॉस, मैं... मैं कैसे?" हरीश पूरी तरह से सकपका गया। उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि उसका बॉस उसे किसी औरत के अंडरगारमेंट्स ख़रीदने का काम सौंपेगा।
"मैं... मैं क्या कर रहा है? टाइम नहीं है बिल्कुल, जा बाज़ार निकल!" सुलेमान ने अपनी ख़तरनाक आँखों से उसे घूरते हुए कहा और बिना हरीश की कोई और बात सुने वापस रमेश की तरफ़ लौट आया। हरीश पसीना पोंछता हुआ बाज़ार की तरफ़ भाग खड़ा हुआ।
"चलो साब... अंदर," सुलेमान ने रमेश के पास पहुँचकर कहा।
दोनों उस भव्य होटल के अंदर घुसे। अंदर का नज़ारा किसी फाइव-स्टार महल जैसा था। विदेशी झूमर, कीमती कालीन और शानदार सजावट। रमेश इस चकाचौंध को देखकर अंदर ही अंदर और भी छोटा महसूस कर रहा था, लेकिन उसने ख़ुद को सँभाला।
रिसेप्शन पर एक बेहद ख़ूबसूरत युवती खड़ी थी। रमेश ने अपना सीना चौड़ा किया और एक बनावटी अकड़ के साथ बोला—
"पेड्रो डिकोस्टा (Pedro Decosta) से मिलना है।"
उस युवती के चेहरे पर कोई भाव नहीं आए, वो एकदम पेशेवर (Professional) अंदाज़ में बोली, "कौन पेड्रो सर? आप मुझे उनका कमरा नंबर बताइए।"
पीछे खड़े सुलेमान ने मन ही मन अपना माथा पीट लिया।
"साला... ये ख़ुद भी मरेगा और मुझे भी मरवाएगा! किसी इंटरनेशनल माफिया सरगना का नाम ऐसे रिसेप्शन पर सीधे-सीधे कौन पूछता है बेवकूफ़?"
सुलेमान को रमेश की इस बेवकूफ़ी पर भयंकर ग़ुस्सा आ रहा था।
इससे पहले कि रमेश कोई और बेवकूफ़ी करता, पीछे से एक बेहद शालिनी और ठंडी आवाज़ आई।
"हैलो सर... आप आइए मेरे साथ।"
एक युवक, जो बिल्कुल कड़क सूट-बूट में था, उनके पीछे खड़ा था। उसकी आँखों में एक ऐसी ख़ामोशी थी जो बता रही थी कि वो कोई आम होटल स्टाफ़ नहीं है।
"आपको सर पेड्रो डिकोस्टा से मिलना है ना?" उस युवक ने धीमी आवाज़ में पूछा।
"हाँ भाई, उसी लिए आए हैं," रमेश ने फौरन तपाक से जवाब दिया।
"आइए..."
वो सूट वाला आदमी उन्हें अपने साथ एक लंबी, शांत गैलरी से होता हुआ एक ख़ुफ़िया और आलीशान वेटिंग रूम (Waiting Room) की तरफ़ ले गया। उसने एक कमरे की तरफ़ इशारा किया और उन्हें वहाँ सोफे पर बैठने को कहा।
"आप यहीं रुकिए। आपका काम हो जाएगा। चाय या जूस... क्या लेंगे आप?"
"चाय ही ले आओ भाई," रमेश ने अपनी औक़ात के हिसाब से जवाब दिया।
"जी सर..." वो आदमी वहाँ से चल दिया। सुलेमान सोफे पर खामोश बैठा इस पूरी जगह की रेकी (Reece) कर रहा था।
उसी होटल की सबसे ऊपरी मंज़िल के एक ख़ुफ़िया और सबसे शानदार सुईट (Suite) में... नज़ारा बिल्कुल अलग था।
कमरा सिगार के गाढ़े धुएँ और महँगी विदेशी शराब की महक से भरा हुआ था। कमरे में अय्याशी के सारे साधन मौजूद थे, लेकिन कमरे का माहौल बेहद खौफ़नाक था।
"ये क्या वाहियात मज़ाक है, कार्लोस (Carlos)?"
पेड्रो डिकोस्टा दहाड़ रहा था। वो एक लंबा-चौड़ा, ख़तरनाक मैक्सिकन माफिया था, जिसकी आँखों में हवस और क्रूरता कूट-कूट कर भरी थी।
"जी... जी... पेड्रो बॉस... मैं जल्द ही कुछ और इंतज़ाम करता हूँ," कार्लोस पसीने से लथपथ, काँपते हुए जवाब दे रहा था।
"क्या इंतज़ाम? मुझे इंडिया आए ये दूसरा दिन हो गया है! और तुम अब तक मेरे लिए एक ढंग के 'माल' का इंतज़ाम नहीं कर सके?" पेड्रो ने अपने हाथ में पकड़ा शराब का गिलास टेबल पर पटक दिया।
"सॉरी सर... मैंने जो लड़कियाँ भेजी थीं, आपको वो पसंद ही नहीं आईं..."
"साले बास्टर्ड (Bastard)! उनमें पसंद करने लायक कुछ था भी? वो सब तो बाज़ारू रंडियाँ थीं," पेड्रो चिल्लाया।
"मैंने भारतीय औरतों के बारे में इतना कुछ सुना था। उनके हुस्न की गर्मी, उनके जिस्म का भरीपन... जो तूने लड़कियां भेजी उनमे था ऐसा कुछ, साली सब बेशर्म रंडिया भेजी तूने। मुझे एक 'घरेलू', 'संस्कारी' और 'भरी-पूरी' औरत चाहिए! मैं यहाँ भारत का असली स्वाद चखने आया हूँ, और तुम से एक ऐसी औरत नहीं खोजी जा रही?"
पेड्रो एक ऐसा भेड़िया था जिसे बिकाऊ जिस्मों से नफरत थी, उसे किसी इज़्ज़तदार औरत को नोचने और बर्बाद करने में मज़ा आता था।
"ससस... सॉरी बॉस। मैं... मैं जल्दी ही किसी अच्छी और फ्रेश औरत का इंतज़ाम करता हूँ," कार्लोस ने डरते हुए कहा।
"अरे भाई, जब भारत आया हूँ, तो यहाँ का असली स्वाद तो चखूँ!" पेड्रो ने अपने सिगार का एक लंबा कश खींचा।
"जी.. जी पेड्रो सर... समझ गया मैं।" कार्लोस अपनी जान बचाकर कमरे से बाहर जाने को ही हुआ था कि पेड्रो की भारी आवाज़ ने उसे फिर रोक लिया।
"अच्छा सुन..." पेड्रो की आँखों में एक बेहद शैतानी और दरिंदगी भरी चमक आ गई। "आज जो भी बिज़नेस पार्टनर मुझसे डील करने आ रहे हैं, उन्हें एक पैग़ाम दे दे। उनसे बोल दे कि 'माल' (चरस, अफीम) के साथ जो मुझे सबसे 'शुद्ध माल' (औरत) दिलाएगा... हमारी फाइनल डील उसी के साथ होगी।"
ये कहते हुए पेड्रो के चेहरे पर एक वहशीपन छा गया। "समझ गया ना? हाहाहाहा..." उसकी भयानक हँसी पूरे कमरे में गूँज गई।
तभी...
ट्रिन... ट्रिन... ट्रिन....
कमरे में रखे फोन की घंटी बजी।
क्लिक..."हाँ, बोलो," कार्लोस ने फ़ोन उठाया।
"सर... बाहर वेटिंग रूम में एक बिज़नेस पार्टनर आए हैं। नाम रमेश है," रिसेप्शनिस्ट की आवाज़ आई।
"आता हूँ अभी..." कार्लोस ने फ़ोन रखा।
"सर, मैं आया... मीटिंग लेकर," कार्लोस ने पेड्रो की तरफ़ सिर झुकाकर कहा।
पेड्रो ने अपना सिगार ऐशट्रे में मसला और अपनी हवस भरी आँखों से कार्लोस को घूरते हुए बोला—
"शर्त याद रहे मेरी कार्लोस... मुझे वो 'शुद्ध माल' चाहिए।"
Pedro और carlos कि बातचीत स्पेनिश मे हुई थी, हालांकि ये दोनों ही टूटी फूटी हिंदी बोल लेते है.
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मेरी माँ कामिनी 3.0 अध्याय-5
दूसरी तरफ़, शहर के व्यस्त और महँगे बाज़ार के बीचों-बीच, हरीश के होश पूरी तरह उड़े हुए थे। वो एक आलीशान लाँजरी (Lingerie) की दुकान के काउंटर पर खड़ा था और पसीने पोंछ रहा था।
"अबे ये क्या आफत बोल दी भाई ने! कौन सी लेनी है? कैसी लेनी है? साइज क्या है? कुछ बताया ही नहीं..." हरीश बड़बड़ाते हुए दुकान के अंदर घुस गया था।
"अरे भाई, वो दिखाना जरा !" हरीश ने थोड़ा सकपकाते हुए काँच के शोकेस की तरफ़ इशारा किया।
दुकानदार, जो किसी रहीसज़ादे की तरह तमीज़ से काउंटर पर खड़ा था, ने हरीश को ऊपर से नीचे तक घूरा उसकी ख़ाकी वर्दी और उसकी कम उम्र को देखकर उसे लगा कि कोई आवारा लड़का मुफ़्त में तमाशा देखने आ गया है।
"क्या दिखाना है?" दुकानदार ने थोड़ा अकड़ कर पूछा।
"बाहर टंगी तो हैं इतनी सारी..." हरीश ने बाहर स्टैंड पर टंगे हुए कुछ सैम्पल्स की तरफ़ इशारा किया।
"तू पहनेगा क्या?" दुकानदार ने व्यंग्य करते हुए एक भद्दा मज़ाक कर दिया।
दुकानदार की उस एक बात ने पलक झपकते ही हरीश के चेहरे से वो 'मासूम बच्चे' वाला भोलापन पूरी तरह गायब कर दिया। उसकी जगह चेहरे पर एक ऐसी खौफ़नाक और दहशतगर्दी आ गई, जिसे देखकर कोई भी काँप जाए।
"मादरचोद... तेरी बीवी के लिए चाहिए, चल दे अब"
हरीश के हाथ बिजली की तेज़ी से अपनी कमर के पीछे गए। 'खट!' की एक तीखी आवाज़ के साथ, उसके हाथ मे एक भारी-भरकम लोहे की चीज़ बाहर आ चुकी थी एक खतरनाक, चमचमाती हुई पिस्टल!
"साले, औकात में रहकर मज़ाक किया कर किसी से! ये दुकान आज रात भर में मिट्टी में मिल जाएगी, पता भी नहीं चलेगा!"
हरीश की दहाड़ इतनी खौफ़नाक और भारी थी कि दुकान में मौजूद हर एक सेल्समैन, कैशियर और वहाँ खड़े दूसरे ग्राहक... सबकी साँसें जैसे एक पल के लिए थम गईं।
"ससस... सॉरी भाई! ग़लती हो गई... मैं तो बस..." दुकानदार का रंग पीला पड़ गया, उसके होंठ काँपने लगे।
"क्या बस, भड़वे! अभी एक चड्डी के चक्कर में तुझे यमराज दिख जाता!" हरीश ने आसपास के सहमे हुए माहौल को देखकर खुद को थोड़ा शांत किया और पिस्टल वापस अपनी कमर में खिसका ली।
दुकानदार की सिट्टी-पिट्टी गुम हो चुकी थी। उसने तुरंत अपनी सेल्सगर्ल को आवाज़ दी, "ऐ... नेहा! सर जो माँग रहे हैं, वो तुरंत निकालकर दे!"
हालाँकि हरीश ने आज तक अपनी ज़िंदगी में कभी किसी पर गोली नहीं चलाई थी, लेकिन वो अच्छी तरह जानता था कि असली हथियार बंदूक नहीं उसका 'डर' होता है।
"आइए सर, आप इधर आइए..." एक काँपती हुई, मीठी सी आवाज़ तुरंत गूँजी। नेहा (सेल्सगर्ल) डरते हुए आगे आई।
हरीश उसके पीछे-पीछे हो लिया। उसके चेहरे पर एक सेकंड के भीतर वापस वही मासूमियत लौट आई थी, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
"बताइए सर, किसके लिए लेना है? गर्लफ्रेंड के लिए या वाइफ के लिए?" नेहा ने थोड़ा सहज होने की कोशिश करते हुए पूछा।
"अरे यार..." हरीश ने अपना सिर खुजाया। "गर्लफ्रेंड ही समझो..." उसने सुलेमान के नजरिये को ध्यान में रखकर जवाब दिया।
नेहा ने दो-चार छोटी-छोटी ब्रा और पैंटी काउंटर पर निकाल कर रख दीं।
उन्हें देखते ही हरीश के ज़ेहन में कामिनी का भारी-भरकम और गदराया हुआ जिस्म नाचने लगा।
"साला, इतनी छोटी चीज़ में कैसे आएगी उसकी?"
"नहीं... थोड़ी बड़ी दिखाओ," हरीश ने सिर हिलाते हुए कहा।
"कितनी बड़ी सर?" नेहा ने पूछा।
"अब कितनी क्या... इतनी बड़ी कि उसमें पूरी आ जाए!" हरीश ने अपनी दोनों हथेलियों को चौड़ा करके हवा में एक बड़े आकार का इशारा किया।
"हे-हे-हे... सर, आप पहली बार ले रहे हैं क्या?" नेहा उसकी मासूम और देहाती हरकत पर मुस्कुराए बिना नहीं रह सकी।
"हह... हाँ... ऐसा ही समझो," हरीश ने अपना कान खुजाया।
"आपकी गर्लफ्रेंड उम्र में बहुत बड़ी है क्या?" नेहा ने उत्सुकतावश पूछ लिया।
"हह... हाँ... है तो..."
"कितनी बड़ी...?"
"अब... ये तो कैसे बताऊँ... हाँ... 38-40 साल की तो होगी ही!"
"है...?" नेहा बुरी तरह चौंक गई। क्योंकि हरीश खुद महज़ 20-22 साल का एक नौजवान लड़का था। "मतलब आपसे दुगुनी उम्र की...?" नेहा के मुँह से बेसाख्ता निकल पड़ा।
"ससस... सॉरी सर! मैं समझी... मैं अभी कुछ और दिखाती हूँ!" नेहा को अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने तुरंत पुश-अप ब्रा और बेहद बोल्ड डिज़ाइन के कुछ नए सेट निकाल कर रख दिए। "यह ठीक रहेगा सर..."
हरीश ने नज़र डाली लाल रंग का ब्रा और पैंटी का सेट बेहद भड़कीला और कामुक था।
"है तो मस्त... लेकिन ये आ जाएगा क्या?" हरीश ने खुद से ही सवाल किया, लेकिन थोड़ा ज़ोर से बोल पड़ा।
"साइज क्या है, बता सकते हैं आप?" नेहा ने पूछा।
"पप्प... पता नहीं..."
"ऑफफ़फ़.. हो......" नेहा ने अपनी कमर पर हाथ रखा और काउंटर के पास सीधी खड़ी हो गई। "सर, आपको ये लेना भी है या बस मज़े ले रहे हैं?"
कमर पर हाथ रखकर खड़े होने से नेहा के स्तन कसकर बाहर की तरफ़ तन गए थे। हरीश की नज़र अनजाने ही उसकी उस अदा पर चली गई, लेकिन उसका दिमाग़ तुरंत कामिनी के जिस्म पर वापस लौट आया।
"हाँ... वो... आपसे डबल वाला दे दो," हरीश तपाक से बोल पड़ा, क्योंकि उसके ज़ेहन में उस वक्त सिर्फ कामिनी का भरा-पूरा जिस्म घूम रहा था।
"ससस... सर...?" नेहा सकपका गई और उसे बड़ी संशय भरी नज़रों से देखने लगी।
"साइज़ पूछा ना, तो बता तो दिया मैंने!" हरीश के बोलने में इतनी मासूमियत थी कि नेहा चाहकर भी उस पर गुस्सा नहीं हो पाई।
"ननन... निकलती हूँ..... देती हूँ..."
नेहा पलटी और 38 साइज के कई सारे शानदार सेट निकालकर काउंटर पर रख दिए।
हरीश ने एक नज़र डाली और उंगली उठाई— "ये एक ब्लैक और रेड वाला दे दो।"
"और पैंटी...?" नेहा ने पूछा।
"जो इसके साथ है, वो दे दो।"
"सर, आप समझे नहीं! लड़कियाँ अपनी पसंद के हिसाब से अलग-अलग स्टाइल पहनती हैं—जैसे ये फुल कवरेज है, ये हाफ है, और ये थॉन्ग (Thong) है... आपको क्या पसन्द है?" नेहा ने पूछा।
"मुझे... म्म... मुझे क्या पसंद..."
"अरे, जब आप गिफ्ट देने के लिए ले रहे हैं, तो अपनी पसंद का ही तो पहनेगी अपनी गर्लफ्रेंड?"
"हम्म...मेरी पसन्द...’ हरीश ने ज़ेहन पर जोर डाला। उसे अचानक वो दृश्य याद आया जब होटल के कमरे में कामिनी भाग कर बालकनी की तरफ़ गई थी और उसकी चौड़ी गांड साड़ी के नीचे पूरी तरह से आज़ाद हिल रही थी।
‘मतलब वो ढीली-ढाली चीज़ें तो बिल्कुल नहीं पहनती होगी! साड़ी के नीचे कोई निशान या खिंचाव भी नज़र नहीं आ रहा था... इसका मतलब फुल पैंटी का तो सवाल ही पैदा नहीं होता!’
गांड पूरी तरह कमर से ले कर जाँघ तक हिल रही रही, मतलब हाफ पैंटी भी नहीं पहनती होंगी.
हरीश की नज़र काउंटर पर रखी बेहद बारीक 'थॉन्ग' (Thong) पर गई।
"साला, ये तो गज़ब चीज़ है!" उसे देखते ही कामिनी की मटकती हुई गांड हरीश के दिमाग में कौंध गई।
"पक्का! यही पहनती होगी वो!"
"ये ब्लैक और रेड वाला सेट दे दो...!" हरीश ने पूरी शान से फैसला सुना दिया।
हालाँकि, हरीश इस बात से पूरी तरह अनजान था कि कामिनी ने असल में उस वक़्त कोई पैंटी पहनी ही नहीं थी, लेकिन उसने अपनी शातिर बुद्धि से जो अंदाज़ा लगाया था, वो उस हॉट सिचुएशन के बिल्कुल करीब था।
बाहर काउंटर पर बिल चुकाया गया।
जाते-जाते हरीश ने मुड़कर उस दुकानदार को देखा और अपनी मासूम सी आँखों से एक आखिरी धमकी दी
"और सुन बे... चड्डी खरीदने वालों को कभी छोटा मत समझना, वरना किसी दिन इस शहर में चड्डी पहनने लायक नहीं छोडूंगा!"
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दूसरी तरफ,
'द नैनी रिट्रीट' (The Naini Retreat) के आलीशान और ख़ुफ़िया वेटिंग रूम में रमेश बड़े ही नवाबों वाले अंदाज़ में सोफे पर पसर कर चाय सुड़क रहा था।
तभी... कमरे का भारी शीशे वाला दरवाज़ा खुला।
रमेश की नज़र जैसे ही सामने गई, उसके हलक में चाय का घूँट वहीं का वहीं अटक गया।
सामने से एक बेहद भयानक और विशालकाय अश्वेत (Black) आदमी अंदर चला आ रहा था। लगभग साढ़े 6 फ़ीट का हट्टा-कट्टा और पहाड़ जैसा शरीर किसी भी आम इंसान का दिल दहलाने के लिए काफ़ी था। वो कार्लोस (Carlos) था।
रमेश की तो सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई, लेकिन ना जाने क्यों... सोफे के पास खड़े सुलेमान के चेहरे के भाव अचानक बदल गए। उसके खुरदरे हाथों की मुट्ठियाँ कसकर भिंच गईं। उसकी आँखों में कोई खौफ़ नहीं था, बल्कि एक ऐसी ठंडी और ख़तरनाक चमक थी, जो सिर्फ़ तब आती है जब जंगल का एक शेर दूसरे इलाके के शेर को देखता है। सुलेमान के तेवर कुछ अलग ही थे,
"हैलो माय फ्रेंड... हैलो! यू आर रमेश, राइट?"
कार्लोस ने अपनी भारी और विदेशी लहज़े वाली आवाज़ में कहा और आगे बढ़कर हाथ मिलाया।
"न-नाइस टू मीट यू सर..." रमेश ने भी हड़बड़ा कर खड़े होते हुए अपना काँपता हुआ हाथ आगे बढ़ा दिया।
"बताइए... क्या लाए हैं आप हमारे लिए?" कार्लोस बिना किसी औपचारिकता के सीधा मुद्दे पर आ गया।
रमेश ने इधर-उधर देखा और फिर अपनी पैंट की जेब में हाथ डालकर एक छोटी सी, कसकर बंधी हुई पुड़िया निकाली और सामने काँच की टेबल पर रख दी।
कार्लोस ने वो पुड़िया उठाई और उसे खोला। अंदर गहरे काले रंग का एक चिपचिपा सा पदार्थ था— 'काला सोना', यानी बेहतरीन क्वालिटी की चरस!
स्निफ़्फ़... स्निफ़्फ़्फ़...
कार्लोस ने उसे गहरी साँस खींचकर सूँघा। फिर अपनी मोटी उँगली से ज़रा सा हिस्सा निकालकर अपनी ज़बान पर रख लिया। उसने आँखें बंद कीं और स्वाद को महसूस किया।
"वाओ... कड़क माल है मिस्टर रमेश!" कार्लोस की आँखों में चमक आ गई। "आप हमें कितना दे सकते हैं?"
रमेश को लगा जैसे उसकी लॉटरी लग गई हो। पहली ही बार में बात इतनी आसानी से पक्की हो गई? उसका सारा डर अब छूमंतर हो गया था।
"सर, हमारे तो खेतों में ही उगती है! बिल्कुल घर की खेती है, जितना माल आप बोलेंगे, उतना मिलेगा," रमेश ने अपना सीना चौड़ा करते हुए एक बेबाक प्रस्ताव रख दिया।
कार्लोस वाक़ई उस माल की क्वालिटी से बहुत ख़ुश था। तभी उसकी नज़र रमेश के पीछे खड़े सुलेमान पर पड़ी। कार्लोस ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। सुलेमान की डील-डौल, उसका वो चौड़ा सीना और उसकी आँखों का वो ख़ौफ़नाक ठहराव... वो कहीं से भी कार्लोस से कम नज़र नहीं आ रहा था।
"ये साथ में कौन है?" कार्लोस ने संशय भरी नज़रों से पूछा।
रमेश ये नज़ारा देखकर मन ही मन फूला नहीं समा रहा था। सुलेमान को साथ लाने का अपना आईडिया उसे बहुत पसंद आ रहा था, वो खुद की पीठ थपथपाना चाहता था।
"बॉडीगार्ड है मेरा!" रमेश के अंदर अब पूरा आत्मविश्वास आ चुका था।
कार्लोस ने एक हल्की सी मुस्कान दी। "मिस्टर रमेश, कुछ ज़रूरी बात करनी है। क्या हम अकेले में बात कर सकते हैं?"
"कक्क... क्यों नहीं?" रमेश की गांड एक पल को फटी तो ज़रूर, लेकिन कार्लोस का व्यवहार बिल्कुल एक साधारण बिजनेसमैन जैसा था, किसी खूँखार माफिया जैसा नहीं। इससे रमेश को तसल्ली मिल गई।
उसने पीछे मुड़कर हुक्म दिया, "सुलेमान, तुम बाहर जाओ।"
सुलेमान करता भी क्या? यहाँ तो उसे एक 'मज़दूर' और 'बॉडीगार्ड' का ही नाटक करना था। वो बिना कुछ कहे चुपचाप कमरे से बाहर निकल गया, लेकिन उसका शातिर दिमाग़ अंदर चल रहे खेल को पढ़ने की कोशिश कर रहा था।
सुलेमान के बाहर जाते ही कार्लोस थोड़ा रिलैक्स होकर सोफे पर बैठ गया।
"मिस्टर रमेश... यहाँ अब तक 50 लोग आ चुके हैं हमसे मिलने। सभी का माल बहुत अच्छा था, 'खेतों' का ही था। हमें भारत का माल बहुत पसंद है।" कार्लोस ने अपनी आँखें रमेश पर गड़ा दीं, "तो बताइए... हम आपका ही माल क्यों लेंगे?"
कार्लोस के इस सीधे सवाल से रमेश का दिल दहल गया।
उसे तो इस तरह की इंटरनेशनल डीलिंग का कोई तजुर्बा ही नहीं था। वो तो एक मामूली सरकारी इंजीनियर था। वो क्या कहता? क्या बोलता?
"हम... हम सबसे कम रेट पर आपको माल दे देंगे!" रमेश को और कुछ नहीं सूझा तो उसने रेट गिराना ही ठीक समझा।
साला रिश्वतखोर जो था! अगर कोई काम करने के 10 हज़ार माँगता था और सामने वाला 5 हज़ार भी देता, तो रमेश मान जाता था। उसका पूरा अनुभव और उसकी सोच बस यहीं तक सीमित थी। लेकिन यहाँ... इंटरनेशनल सिंडिकेट में सिर्फ़ पैसे गिराने से बात नहीं बनती थी।
"मिस्टर रमेश... लगता है आप इस धंधे में नए हैं," कार्लोस ने एक ठंडी हँसी हँसते हुए कहा। "यहाँ सब अपना माल कौड़ियों के भाव देने को तैयार बैठे हैं, क्योंकि सारा रिस्क तो हमारा ही होता है।"
अब रमेश को लगने लगा था कि बात बुरी तरह फँस गई है। उसके पास कार्लोस की बात का कोई जवाब नहीं था। माल और दाम कम करने के अलावा वो कर भी क्या सकता था? रमेश का चेहरा बुरी तरह मुरझा गया।
"लेकिन... तुम चाहो तो ये डील तुम्हें मिल सकती है," एकाएक कार्लोस बोल पड़ा।
"कक्क... कैसे?" रमेश की आँखों में फिर से उम्मीद की किरण जागी।
कार्लोस थोड़ा आगे की तरफ़ झुका और अपनी भारी आवाज़ में बोला, "हमारे बॉस को एक देसी, 'घरेलू' औरत माँगता है... एक रात के लिए। तुम उसका इंतज़ाम कर सकता है, तो ये डील हम सिर्फ़ तुम्हारे साथ ही करेगा।"
भड़म्म्म...!
रमेश के दिमाग़ में जैसे कोई बड़ा बम फट गया। उसका चेहरा सफेदी की तरह पीला पड़ गया।
"ये कहाँ से लाऊँ मैं? घरेलू औरत? साला... मैं तो यहाँ सिर्फ़ चरस बेचने आया था! ये विदेशी साले यहाँ रंडीबाज़ी करने आए हैं क्या?" रमेश अंदर ही अंदर काँप गया।
साला मै कोई रंडियो का दलाल हूँ क्या?
"मिस्टर रमेश, 2 दिन का वक़्त दे रहे हैं हम तुम्हें। अगर इंतज़ाम कर सको तो डील तुम्हारी... वरना रास्ता नापो," रमेश को गहरी सोच और सदमे में डूबा देखकर कार्लोस ने अपना आख़िरी फैसला सुना दिया।
"नाइस टू मीट यू, मिस्टर रमेश," कार्लोस ने हाथ मिलाया और बिना रमेश के जवाब का इंतज़ार किए कमरे से बाहर चला गया।
रमेश वहीं सोफे पर धड़ाम से बैठ गया। उसे अपनी आँखों के सामने ये करोड़ों की डील पानी में बहती नज़र आ रही थी। साले रंडीबाज़ लोग! अगर चरस लेनी ही नहीं थी तो यहाँ बुलाया ही क्यों? रमेश पूरी तरह हताश हो चुका था। उसके हाथ से ये डील हमेशा के लिए निकल चुकी थी।
दरवाज़ा खुला।
"साब... हो गई बात? हो गया काम?" सुलेमान अंदर आया।
रमेश ने खीझते हुए अपना सिर पकड़ा और उठा।
"क्या खाक डील! साले विदेशी लोग बहुत हरामी हैं। चलो... कल-परसों में वापस लौट जाएँगे घर। यहाँ बेकार में पैसा और वक़्त ख़र्च करने का कोई मतलब नहीं रह गया है।"
रमेश गुस्से में पैर पटकता हुआ कमरे से बाहर निकल गया।
क्रमशः....

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