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कामिनी 3.0 भाग -1

मेरी माँ कामिनी 3.0 - अध्याय 1

 

"हेलो पाठको... मैं कामिनी।
आपने मेरे बारे में पढ़ा ही होगा। कैसे मैं शहर की उस घुटन भरी चारदीवारी से निकलकर गाँव के इस खुले माहौल में पहुँची, और इस बीच मैंने अपनी ज़िंदगी को पूरी तरह से बदलते हुए पाया। मेरा ढलता और मुरझाता हुआ जिस्म अब वापस से जवानी की वो दहक महसूस करने लगा है। मेरे अंग-अंग में अब एक अजीब सी मादक सुगंध घुल चुकी है, और सच कहूँ तो... मर्द ही अब मेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी बनते जा रहे हैं।

और इन सब का ज़िम्मेदार अगर कोई है, तो वो है मेरा अपना पति रमेश! उसकी बेतहाशा मार-पीट, उसकी अनदेखी, उसकी नामर्दी और हर रात होने वाले उस घिनौने अपमान ने मुझे अंदर से पूरी तरह तोड़कर एक नई औरत में ढाल दिया है।

मैं अब वो पुरानी, डरी-सहमी, पति के अत्याचार सहने वाली 'कामिनी' नहीं रह गई थी। मेरा जिस्म अब हर वक़्त एक अनजानी प्यास में सुलगता था।
कल रात मैंने फिर एक पाप किया... अपने ससुर समान ताऊजी के साथ इस कदर सम्भोग में लिप्त हुई कि मेरे जिस्म की नस-नस दुखने लगी थी। उस बूढ़े जानवर ने मुझे इस तरह रौंदा कि मेरा पूरा जिस्म टूट कर रह गया था। लेकिन हकीम की दवा ने... उफ्फ! उस दवा ने सुबह तक मेरे जिस्म को वापस से तरोताज़ा कर दिया।"

आज की सुबह कुछ अलग थी। हवेली के कमरे में एक अजीब सी शांति थी, और कामिनी खुद को कमरे के बड़े से आदमक़द शीशे में निहार रही थी।
शीशे में जो अक्स उभर कर सामने आ रहा था, वो किसी संस्कारी, सताई हुई बहू का नहीं, बल्कि हवस और यौवन से लबरेज़ एक मुकम्मल 'औरत' का था। कामिनी ने अपने ब्लाउज़ से बाहर झाँकते हुए अपने गोरे और भारी स्तनों को देखा। उसे साफ़ महसूस हो रहा था कि ये पहले से कहीं ज़्यादा बड़े, सुडौल और कड़क हो गए हैं।

 कल रात की जानवरों वाली चुदाई ने उसके जिस्म को तोड़ा नहीं था, बल्कि उसके दबे हुए हुस्न को और ज़्यादा निखार दिया था। उसकी नाभि के ठीक नीचे एक मीठी-मीठी सी हलचल, एक अजीब सी फड़कन अभी भी महसूस हो रही थी।

खैर, कामिनी नैनीताल जाने के लिए बेहद उत्साहित थी। उसने अब तक जो भी पाप किया, जो भी बेशर्मी की हदें पार कीं, आज उसके चेहरे पर उस बात का रत्ती भर भी अफ़सोस या गिल्ट (guilt) नहीं था।
उसने नैनीताल की वादियों के लिए अपना सारा ज़रूरी सामान पैक कर लिया था। तभी उसकी नज़र मेज़ पर रखी हकीम की  नीली दवा की शीशी पर गई।

"ये दवा ख़ास औरतों के लिए ही है... औरत को हमेशा जवान बनाये रखती है..."
हकीम की ठरक भरी आवाज़ कामिनी के ज़ेहन में बिजली की तरह कौंध गई। कामिनी के लाल होंठों पर एक कामुक मुस्कान आ गई। उसने बिना एक पल गँवाए झट से वो नीली दवा की शीशी उठाई और अपने हैंडबैग के एक ख़ुफ़िया कोने में छुपा ली। शायद जरुरत पड़ जाये.
दिन कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला। शाम घिर आई थी और हवेली के बाहर टैक्सी हॉर्न मार रही थी।
"जल्दी चलो कामिनी! ट्रेन छूट ना जाए..." बाहर से रमेश की उतावली आवाज़ आई।
"आई... बस एक मिनट!" कामिनी ने अंदर से जवाब दिया।

कामिनी शीशे के सामने खड़ी ख़ुद को आख़िरी टच दे रही थी। आज उसका रूप ऐसा था कि जो भी उसे देख ले, वो अपनी सुध-बुध खो बैठे।
उसने आज एक बेहद चटक लाल रंग की शिफॉन की साड़ी पहनी थी। यह रंग उसके गोरे, दूधिया बदन पर आग की तरह खिल रहा था। साड़ी को उसने इतनी नीची और कसी हुई बाँधी थी कि उसकी गद्दाराई, लचकती हुई कमर और गहरी नाभि पूरी तरह से नुमाया हो रही थी।
लेकिन सबसे ज़्यादा क़ातिलाना था उसका स्लीवलेस ब्लाउज़।
काले रंग का डीप-नेक (deep-neck) ब्लाउज़ उसके गदराए हुए स्तनों को सँभालने में पूरी तरह से नाकाम साबित हो रहा था। ब्लाउज़ का गला इतना गहरा था कि उसके दोनों स्तनों के बीच की गोरी और गहरी घाटी साफ़ नज़र आ रही थी। और उसी घाटी के बीचों-बीच झूल रहा था उसका वो 'मंगलसूत्र' जो अब किसी पवित्र रिश्ते का प्रतीक नहीं, बल्कि उसके इस नए और आज़ाद जिस्म का एक महज़ गहना बन कर रह गया था।

उसके गोरे, भरे हुए नंगे कंधे और पीठ का गहरा कट उसे और भी ज़्यादा मादक बना रहा था। हाथों में खनकती लाल काँच की चूड़ियाँ उसके हर इशारे पर एक खुरदरी सी झंकार पैदा कर रही थीं।
उसने आँखों में गहरा काजल लगाया था, जिसमें अब खौफ़ की जगह एक आत्मविश्वास और हवस की चमक थी। होंठों पर साड़ी से मेल खाती हुई गहरी लाल लिपस्टिक उसके चेहरे की कामुकता को सौ गुना बढ़ा रही थी।

पुरानी कामिनी जब साड़ी पहनती थी, तो पल्लू से अपना सिर और छाती ढकने की कोशिश करती थी ताकि किसी की नज़र ना पड़े। लेकिन आज की यह नई कामिनी... आज वो चाहती थी कि लोग उसे देखें। उसका जिस्म इतना खिल गया था, इतना भर गया था कि वो लाल साड़ी में जैसे समा ही नहीं पा रहा था। उसकी भारी और चौड़ी गांड साड़ी के कड़क फोल्ड्स (folds) को चीर कर बाहर आने को बेताब थी। उसके चलने पर उसकी जाँघों और कमर का जो मादक घुमाव पैदा हो रहा था, वो किसी भी तपस्वी का तप भंग करने के लिए काफ़ी था।

उसने अपने खुले, काले और घने बालों को एक तरफ़ कंधे पर गिराया, शीशे में ख़ुद को देखकर एक बेहद कातिल और कामुक मुस्कान के साथ अपना बैग कंधे पर लटका कर कमरे से बाहर निकल पड़ी।
आज वो रमेश के पीछे चलने वाली एक डरी हुई बीवी नहीं थी। आज वो नैनीताल की वादियों में आग लगाने जा रही एक आज़ाद, सुलगती हुई औरत थी.
******************

स्टेशन पहुँचते-पहुँचते दोनों को करीब 6:30 बज गए थे और ट्रेन का समय 6:45 था। वक़्त रेत की तरह हाथों से फिसल रहा था।
"मैंने कहा था ना कामिनी, जल्दी करो! देखो... सिर्फ़ 15 मिनट में ट्रेन आने वाली है," रमेश ने हड़बड़ाहट में टैक्सी वाले को किराया थमाते हुए झुँझला कर कहा। उसने झटपट दोनों भारी बैग अपने हाथों में उठाए और स्टेशन के अंदर की तरफ़ तेज़ क़दमों से चल पड़ा।
यह शहर का एक छोटा सा स्टेशन था, जहाँ आस-पास के देहाती और मज़दूर तबके के लोगों की ही ज़्यादा भीड़ थी। नैनीताल जाने वाली वह ट्रेन यहाँ महज़ 2 मिनट के लिए ही रुकने वाली थी, इसलिए रमेश की धड़कनें तेज़ हो रही थीं।

"चलो जल्दी... पैर बढ़ाओ कामिनी!" रमेश तेज़ी से स्टेशन के ओवरब्रिज की सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।
पीछे-पीछे कामिनी भी अपनी लाल शिफॉन की साड़ी को हल्का सा ऊपर उठाए, ऊँची हील की सैंडल में हाँफते हुए भाग रही थी। लेकिन इस भाग-दौड़ में कामिनी का गदराया हुआ हुस्न और भी ज़्यादा क़ातिलाना हो गया था।
आस-पास सीढ़ियों पर बैठे और खड़े देहाती लोगों की नज़रें तो जैसे बस उसी पर जाकर ठहर गई थीं। सीढ़ियाँ तेज़ी से चढ़ने की वजह से कामिनी का भारी जिस्म बुरी तरह हिल रहा था। उसके स्लीवलेस ब्लाउज़ में क़ैद भारी स्तन हर क़दम के साथ बेतहाशा उछल रहे थे। और सबसे ज़्यादा मादक नज़ारा था पीछे से सीढ़ी चढ़ती कामिनी की चौड़ी और भारी गांड का, जो इस कदर हिचकोले खा रही थी मानो पानी से भरे दो बड़े गुब्बारे आपस में टकरा रहे हों।

"साला... क्या माल है बे!"
"रंडी की तो गांड में ही मुँह मार दूँ... आहा हा!"
आस-पास खड़े मनचले और देहाती लोग गंदी नज़रों से उसे घूरते हुए आपस में फुसफुसा रहे थे। असल में देखा जाए तो उन भूखे मर्दों के लिए यह उस औरत के हुस्न की तारीफ़ ही थी, बस उनका तरीका बहुत भद्दा और अलग था। एक अनपढ़ और देहाती इंसान आख़िर हुस्न की तारीफ़ का और क्या सलीका जानता है?

आगे-आगे सीढ़ी चढ़ते हुए रमेश की नज़रें बेचैनी से इधर-उधर भीड़ को चीर रही थीं। वह किसी को ढूँढ रहा था। उसकी नज़रें उस फौलादी मज़दूर सुलेमान को तलाश रही थीं।
"साला... कहीं धोखा तो नहीं दे गया? वो 10 हज़ार रुपये लेकर चम्पत तो नहीं हो गया? साला गँवार मज़दूर... इन पर भरोसा करना ही ग़लती है," रमेश के लालची और डरपोक मन में तरह-तरह के ख़याल आ रहे थे। सुलेमान के बिना ख़तरनाक माफ़ियाओं से डील करने के ख्याल मात्र से ही रमेश की रूह काँप रही थी।

इधर, भागती-दौड़ती कामिनी भी रमेश के पीछे-पीछे आख़िरकार प्लेटफॉर्म पर पहुँच ही गई। ट्रेन को आने में अब बमुश्किल 10 मिनट ही बचे थे।
इस हड़बड़ाहट और भागने की वजह से कामिनी की साँसें बुरी तरह फूल गई थीं। *हंफ़... हंफ़...*
गहरी साँसें लेने की वजह से उसके दूधिया स्तन उसके डीप-नेक ब्लाउज़ से और भी ज़्यादा बाहर निकल आए थे। माथे और क्लीवेज (घाटी) के बीच चमकती पसीने की बूँदें और तेज़ी से ऊपर-नीचे होता उसका सीना... आस-पास खड़े लोग जैसे अपनी प्यासी आँखों से ही कामिनी का सारा यौवन रस पी लेना चाहते थे।
तभी अचानक...
"ऐ.... मैडम... पैसे देना..."

एक मैले-कुचले, बदबूदार भिखारी ने अचानक से कामिनी के पास आकर उसके साड़ी के पल्लू को ज़ोर से खींचते हुए कहा। कामिनी बुरी तरह चौंक गई—"ऐ! छोड़ो..."
भिखारी के इस अचानक खिंचाव से कामिनी के कंधे पर टिका वो लाल पल्लू सरक कर नीचे गिर गया। पल्लू गिरते ही कामिनी के भारी, दूधिया और पसीने से भीगे स्तन उस भरी भीड़ में पूरी तरह उजागर हो गए।

कामिनी बुरी तरह झेंप गई। शर्म और घबराहट से उसका चेहरा लाल पड़ गया। प्लेटफॉर्म पर खड़े हर मर्द की हवसी नज़रें एकटक उसी के उभरे हुए, नंगे और कामुक हुस्न पर गड़ गई थीं।

लेकिन इससे पहले कि कामिनी ख़ुद को सँभाल पाती...
"हट मादरचोद पीछे...!!"
धड़... धाड़क....!

एक भारी और खौफ़नाक आवाज़ गूँजी और तभी उस भिखारी की कमर पर बूटों वाली एक इतनी ज़ोरदार लात पड़ी कि वह भिखारी हवा में उड़ता हुआ सीधा पटरियों के पास जाकर गिरा।

इस अचानक हुए हमले से एकाएक पूरे स्टेशन पर एक खौफ़नाक सन्नाटा छा गया। जो मनचले कामिनी को घूर रहे थे, उनकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई।
रमेश और कामिनी दोनों ने झटके से पलट कर पीछे देखा...
सामने खड़े उस शख़्स को देखते ही रमेश के सूखे चेहरे पर एक बड़ी सी राहत भरी मुस्कान तैर गई। उसकी जान में जान आ गई।
लेकिन वहीं दूसरी तरफ़... कामिनी उस विशाल और फौलादी शख़्स को अपने ठीक सामने देखकर हैरानी, शर्म और एक अनजाने खौफ़ से बेहाल हो गई। उसने हड़बड़ाहट में अपना पल्लू छाती पर लपेटा।
कामिनी के काँपते होंठों से बस इतना ही निकला...
"तत्तत...... तुम.... ससससस.... सुलेमान... तुम यहाँ?"

"वो.. वो... मेमसाब... मैंने..."
सुलेमान को तुरंत अपनी गलती का अहसास हुआ कि वो यहाँ कोई माफ़िया नहीं, बल्कि रमेश का ख़रीदा हुआ एक मामूली दिहाड़ी मज़दूर बनकर आया है। इस बात का अहसास होते ही उसने तुरंत अपने चेहरे पर एक बनावटी घबराहट ओढ़ ली और अपनी आवाज़ में मज़दूरों वाली नरमी ले आया।

"अरे कामिनी, घबरा मत! इसे मैंने ही बुलाया है," रमेश ने सीना चौड़ा करते हुए जवाब दिया। उसका लहज़ा ऐसा था जैसे उसने सुलेमान को ख़रीद कर कोई बहुत बड़ा तीर मार लिया हो। "बेचारा गरीब आदमी है। आख़िर कब तक ये गाँव-खेड़ों की धूल फाँकता रहेगा? मैंने सोचा नैनीताल में अपना ही काम है, अपने साथ रहेगा तो दो पैसे ज़्यादा कमा लेगा और अपनी मदद भी हो जाएगी।"

कामिनी को सुलेमान का इस तरह अचानक आना थोड़ा अजीब तो लगा, लेकिन फिर उसने ख़ुद को समझाया कि रमेश जब शराब के नशे में नहीं होता, तो अक्सर ऐसा ही दरियादिल होता है। उसे रमेश की यह बात वाज़िब लगी।

कामिनी ने एक नज़र पटरी के पास पड़े उस भिखारी की तरफ़ डाली, जो अभी भी दर्द से कराह रहा था। कामिनी के मन में एक हल्की सी शिकायत उठी 'इतने ज़ोर से मारने की क्या ज़रूरत थी? इस मज़दूर के अंदर कितनी बर्बरता भरी है...'

कामिनी अभी कुछ और सोच पाती कि तभी...
"कू... कउउउउउउउउउउउउउ....."

स्टेशन पर ट्रेन का तेज़ हॉर्न गूँज उठा। नैनीताल जाने वाली ट्रेन धड़धड़ाती हुई प्लेटफॉर्म पर आ रही थी। रमेश ने 2nd AC का टिकट कराया था। ट्रेन का AC कोच लगभग उनके ठीक सामने ही आकर रुका।

स्टेशन पर रुकने का समय बहुत कम था। रमेश हड़बड़ाहट में वो भारी बैग उठाने के लिए झुका।
"अरे आप छोड़ो साब, आप मेमसाब को लेकर अंदर चलो। मैं लाता हूँ सारा सामान," सुलेमान ने आगे बढ़कर कहा।

रमेश के लिए जो बैग उठाना भारी पड़ रहा था, सुलेमान ने उन दोनों बैग्स को अपने फौलादी हाथों से ऐसे उठा लिया जैसे वो रुई से भरे हों।
तीनों जल्दी-जल्दी ट्रेन में चढ़ गए। 2nd AC कोच की गैलरी काफी सँकरी (narrow) थी। आगे-आगे रमेश चल रहा था, उसके ठीक पीछे लाल साड़ी में कयामत ढाती हुई कामिनी, और कामिनी के बिल्कुल पीछे दोनों हाथों में बैग थामे सुलेमान। उनके पीछे कुछ और कपल और यात्री भी ट्रेन में चढ़ रहे थे।

"जल्दी चलो भाई... ट्रेन ज़्यादा नहीं रुकती यहाँ!" पीछे से चढ़ रहे एक यात्री ने उतावली में धक्का दिया।
उस धक्के की वजह से सुलेमान का विशालकाय और फौलादी जिस्म आगे की तरफ़ लुढ़का और सीधे कामिनी के गदराए हुए जिस्म से जा टकराया।
ट्रेन की सँकरी गैलरी में, सुलेमान का चौड़ा और सख़्त सीना कामिनी की नंगी पीठ से रगड़ खा गया। लेकिन जो चीज़ कामिनी को सबसे ज़्यादा चौंका गई, वो था सुलेमान की जाँघों के बीच का सख़्त और मांसल उभार, जो पीछे से हुए धक्के के कारण सीधे कामिनी की भारी गांड और उसकी पतली कमर की दरार के बीच गहराई से जा लगा था।
"ईससससस....."

कामिनी के मुँह से अचानक एक मदहोश कर देने वाली, काँपती हुई सिसकी निकल गई। अनजाने, मर्दानी और बेतहाशा सख़्त छुअन ने कामिनी की सुन्न पड़ी नसों में पल भर में एक तेज़ सिहरन दौड़ा दी। 

"ससस... सुलेमान... ज़रा आराम से..." कामिनी ने पीछे मुड़े बिना, अपनी धड़कनों को काबू करते हुए एक धीमी और काँपती हुई आवाज़ में कहा।

ट्रेन के 2nd AC कोच के अंदर पहुँचकर रमेश ने अपना टिकट चेक किया।
"ये रही हमारी सीटें... 21 और 22 लोअर बर्थ (Lower Berth) अपनी हैं कामिनी, और 23 अपर (Upper) बर्थ..." रमेश ने सुलेमान की तरफ़ देखते हुए कहा।
रमेश और कामिनी आमने-सामने वाली नीचे की सीटों पर बैठ गए, जबकि सुलेमान गैलरी में उनके पास खड़ा रहा।
कामिनी सीट पर बैठकर अपनी साँसों को काबू करने की कोशिश कर रही थी। ट्रेन के एसी की ठंडक उसके जिस्म पर मोती कि तरह उभरे पसीने को सूखा रही थी। उसने नज़रें उठाकर सामने खड़े सुलेमान को देखा।

रमेश के दिए उन 10 हज़ार रुपयों ने सुलेमान का पूरा हुलिया ही बदल कर रख दिया था। उसने एक बेहद शानदार, टाइट फिटिंग वाली काली कमीज़ और एकदम साफ़ सफ़ेद पैंट पहनी हुई थी। कमीज़ के ऊपर के दो बटन खुले हुए थे, जिनमें से उसका चौड़ा, फौलादी सीना और छाती के घने काले बाल साफ़ झाँक रहे थे। उसकी दाढ़ी अब किसी मज़दूर की तरह बेतरतीब नहीं, बल्कि एकदम करीने से सेट की हुई थी। उसके चेहरे पर एक अजीब सा रौब और ख़तरनाक आकर्षण था।

'ये आदमी... एक मज़दूर कैसे हो सकता है?'
कामिनी मन ही मन सोचने लगी। उसकी नज़रें सुलेमान के चौड़े कंधों और उस रसूखदार चेहरे पर टिक गईं।

 "अच्छे कपड़े पहनने के बाद तो ये कोई बहुत बड़ा रईस और खानदानी आदमी लग रहा है... इसका रुतबा किसी मज़दूर का तो क़तई नहीं हो सकता।'"
कामिनी अभी सुलेमान के इस नए और कातिलाना अवतार में खोई ही हुई थी कि तभी रमेश की गुरूर भरी आवाज़ गूँजी।
"ऐ सुलेमान! खड़ा क्या है? ये दोनों भारी बैग उठाकर ऊपर वाली सीट पर रख दे!" रमेश ने एक बाबू की तरह आदेश दिया।

"जी साब..." सुलेमान ने अपनी आवाज़ को नरम करते हुए कहा और भारी बैग्स की तरफ़ झुका।
सुलेमान कामिनी के ठीक सामने, बिल्कुल सट कर खड़ा था। उसने जैसे ही दोनों भारी बैग्स को एक साथ उठाकर ऊपर वाली बर्थ पर धकेलने के लिए अपने फौलादी हाथ ऊपर की तरफ़ खींचे... उसकी टाइट फिटिंग वाली काली कमीज़ खिंचाव की वजह से सरक कर ऊपर खिसक गई।
कमीज़ के ऊपर खिसकते ही जो नज़ारा कामिनी की आँखों के सामने आया, उसने कामिनी की साँसों को उसके हलक में ही अटका दिया।

सुलेमान का कड़क, गठीला और पत्थरों सा तराशा हुआ पेट (Abs) पूरी तरह से नंगा होकर कामिनी की आँखों के ठीक सामने आ गया था। उसकी सफ़ेद पैंट उसकी नाभि से काफ़ी नीचे बँधी हुई थी। पैंट इतनी नीचे थी कि वो बस उसके गुप्त अंगों (लंड) के ठीक ऊपर टिकी हुई थी। नाभि के नीचे से काले, मर्दाने बालों का एक घना गुच्छा (treasure trail) सीधे उस सफ़ेद पैंट के अंदर गहराई में जा रहा था।

लेकिन जिसने कामिनी के पूरे जिस्म को हिला कर रख दिया, वो था सफ़ेद पैंट में बना खौफ़नाक और भारी-भरकम उभार!

सुलेमान के हाथ ऊपर होने की वजह से पैंट का कपड़ा खिंच गया था, और उसकी जाँघों के बीच का विशाल, सोता हुआ अजगर पूरी तरह से सफ़ेद कपड़े के पीछे से उभर कर बाहर आ रहा था। वो भारी और सख़्त उभार कामिनी की आँखों के बिल्कुल समानांतर (eye level) था। दोनों के बीच बमुश्किल कुछ इंच का ही फ़ासला था।
कामिनी का पूरा जिस्म उस नज़ारे को देखकर दहलने लगा। उसकी रीढ़ की हड्डी में एक अजीब सी बिजली दौड़ गई और पूरा बदन थरथरा उठा। पिछले दिनों मे जो कुछ भी हुआ था, मर्दो के कड़क अंग उसे लालचते थे, उसके जिस्म मे ज्वालामुखी पैदा कर देते थे।

 कामिनी मजबूर थी अपने मन से, अपने तन से, अपनी चाहत से, वो चाह कर भी उस भारी उभार से अपनी नज़रें नहीं हटा पा रही थी।
और सोने पे सुहागा... सुलेमान के उस फौलादी, पसीने से हल्के भीगे जिस्म से उठती हुई एक बेहद कड़क, नशीली और मर्दाना गंध (Musk) सीधे कामिनी की नाक से टकराई। वो खुशबू इतनी मादक थी कि कामिनी का सिर घूमने लगा। उसकी जाँघें आपस में कस गईं और नाभि के नीचे एक तेज़ और मीठा दर्द उठने लगा। उसे महसूस हुआ कि उसकी लाल साड़ी के नीचे, उसकी पैंटी मर्दाना गंध और उभार को देखकर बुरी तरह गीली होने लगी है।

रमेश अपनी जगह पर बैठा हुआ बेख़बर था। वैसे भी उसे इल्म था कि उसकी बीवी ठंडी है, किसी काम कि नहीं है, वो हमेशा कामिनी कि तरफ लापरवाह ही रहता था.

सुलेमान ने बैग ऊपर रखे और आहिस्ता से अपने हाथ नीचे किए। कमीज़ वापस नीचे आ गई, लेकिन तब तक कामिनी के दिमाग़ के फ्यूज़ पूरी तरह उड़ चुके थे।
कामिनी का जिस्मानी मोम पिघलने कि शुरुआत कर चूका था.
क्रमशः 

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1 Comments

  1. भाई मस्त मौसम बना देना ट्रेन में ही दोनों का

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