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कामिनी 2.0, भाग -4

कामिनी, भाग -4


कमला काकी की मिट्टी की झोपड़ी के अंदर पीतल के दीये की मद्धम लौ कांप रही थी, जो दीवार पर अजीब और लंबी परछाइयाँ बना रही थी। बाहर सियारों के रोने की आवाज़ें अब और गहरी और डरावनी हो गई थीं, जो यह बता रही थीं कि रात अब परवान चढ़ चुकी है।

झोपड़ी के टूटे-फूट खटोले पर फागुन और प्रमिला बैठी थीं, लेकिन फागुन उठने का नाम ही नहीं ले रही थी। वो कभी प्रमिला का हाथ थामती, तो कभी दीये की लौ को टकटकी लगाकर देखती, जैसे वो उस अँधेरे रास्ते पर वापस हवेली की तरफ कदम बढ़ाने से डर रही हो।

बंटी सुबह से ही शहर की आपाधापी और फिर गाँव तक के सफर, यहाँ के मरघट जैसे माहौल से बुरी तरह थक चुका था। उसे अब अपनी आँखों में नींद का भारीपन महसूस हो रहा था। आखिर उससे रहा नहीं गया और उसने झुंझलाकर बोल ही दिया

"चले फागुन... रात बहुत हो गई है।"
बंटी की आवाज़ सुनते ही फागुन का चेहरा एकदम से उदास हो गया। उसके लाल होंठ कांपने लगे और आँखों में आँसू छलक आए, जैसे वो अभी फफक-फफक कर रो पड़ेगी। वो उस हवेली में वापस नहीं जाना चाहती थी, जहाँ ताईजी के बिना अब उसे सिर्फ और सिर्फ खतरा नज़र आ रहा था।
उसकी आँखों मे एक डर तैर रहा था.
फिर भी, जाना तो था ही। फागुन ने अपनी सहेली प्रमिला को फिर से कसकर गले लगाया और एक बार फिर रुआंसी आँखों से उसे देखा। प्रमिला ने भी नम आँखों से उसे विदा किया।

बंटी ने उठकर प्रमिला और उसकी माँ कमला काकी को हाथ जोड़कर धन्यवाद कहा।
उस वक्त कमला काकी चूल्हे के पास बैठी बर्तन समेट रही थीं। 

कमला... गाँव की एक 42 साल की खालिस देहाती औरत। उसका रंग साँवला था, लेकिन उस साँवलेपन में एक गज़ब की कशिश और आकर्षण था। उम्र ने उसके जिस्म को ढीला नहीं, बल्कि और ज़्यादा भारी और भरा हुआ बना दिया था। उसने एक बहुत ही सस्ती और पुरानी सूती साड़ी पहनी थी, जो उसके अल्हड़ और बेपरवाह मिज़ाज़ की तरह ही अस्त-व्यस्त थी। 

साड़ी का पल्लू ढलकर उसके कंधे से नीचे सरक गया था।
बंटी जब धन्यवाद कह रहा था, तो उसकी नज़रें कमला पर जाकर ठहर गईं। कमला का वो भारी, भरा हुआ साँवला सीना उस तंग ब्लाउज़ से छलक कर बाहर आने को मचल रहा था। ब्लाउज़ के गले से उसके उन विशाल और ढुलकते हुए स्तनों की गहरी और साँवली घाटी (Cleavage) साफ नज़र आ रही थी, जो उसके हर हिलने-डुलने के साथ एक अजीब सी लय में मटक रही थी। 

साड़ी के नीचे से उसकी वो भारी, मांसल और थुलथुली गांड का उभार भी साफ़ पता चल रहा था, जो उसके चलने पर साड़ी के पर्दे में भी गोते लगाती थी। कमला का वो नंगा, कच्चा देहाती यौवन बंटी के दिमाग पर हावी हो रहा था।

कमला ने एक बेपरवाह और मादक मुस्कान के साथ बंटी को विदा किया, जिससे उसके ब्लाउज़ से झांकते हुए वो भारी स्तन और भी ज़्यादा उभर कर सामने आ गए। बंटी जैसे-तैसे खुद को सँभालते हुए फागुन के साथ झोपड़ी से बाहर निकला।


गाँव का रास्ता एकदम सुनसान और घुप्प अँधेरे में डूबा हुआ था। चाँद की बहुत ही मद्धम रौशनी बस खेतों की लकीरें दिखा रही थी। दोनों बिना कुछ बोले पगडंडी पर चल रहे थे।
बंटी को फागुन की वो खामोशी और उसका डर अजीब लग रहा था। उसने आखिर पूछ ही लिया

"क्या हुआ फागुन... तुम वापस नहीं जाना चाहती उस घर में?" फागुन को जैसे इसी सवाल का इंतज़ार था। बंटी की आवाज़ सुनते ही वो अपना मुँह चुन्नी (दुपट्टे) में छुपाकर फफक-फफक कर रोने लगी। उसका पूरा बदन उस अँधेरे में कांपने लगा। कदम वही जमीन मे गड़ गए, 

बंटी चौंक गया। फागुन को इस तरह तड़पता हुआ देखकर उसके अंदर एक अनजानी सी हमदर्दी और प्यार की अनुभूति जाग उठी। वो फागुन के और करीब आया और बिना कुछ सोचे-समझे, उस ठंडी रात में फागुन के उस कांपते हुए जिस्म को अपने सीने से लगा लिया।

"अरे... चुप हो जा यार। अब होनी को कौन टाल सकता है, ताईजी अब चली गई हैं... चुप हो जाओ," बंटी ने बहुत ही प्यार और सांत्वना भरी आवाज़ में फागुन के सिर को सहलाते हुए कहा।

बंटी की वो हमदर्दी और उसका सीना पाकर फागुन का डर और भी ज़्यादा फट पड़ा। वो अपनी चुन्नी हटाकर बंटी के सीने से और ज्यादा कसकर लिपट गई।

उस एक पल में... जैसे समय रुक गया हो। हवा अचानक रुक गई हो.
बंटी के शरीर में 440 वोल्ट का करंट दौड़ गया। उसके पैर कांपने लगे और साँसें अटक गईं।
 हाँ स्कूल मे लड़किया दोस्त जरूर थी, लेकिन उनके मॉर्डन शहरी जिस्म मे भी ये अनुभव नहीं था,
  ऐसा शानदार, कोमल और मुलायम अनुभव उसे कभी नहीं हुआ था। फागुन का वो गदराया हुआ, जवान देहाती जिस्म बंटी के सीने से इतनी बुरी तरह कस गया था कि बंटी को लग ही नहीं रहा था कि उसने किसी हाड़-मांस की लड़की को छुआ है। उसे ऐसा लगा जैसे किसी रुई के कोमल, गुदगुदे और गरम ढेर को उसने अपने सीने से दबोच लिया हो।

बंटी अंदर तक हैरान था कि गाँव की एक मामूली लड़की, जो घर, खेत में काम करती है, उसका जिस्म इतना कोमल, इतना मुलायम और इतना मादक कैसे हो सकता है? फागुन के उस भरे हुए यौवन ने बंटी के सारे होश उड़ा दिए थे।

बंटी के सीने से चिपकी हुई फागुन ने रोते-रोते अपनी भरराई और डरी हुई आवाज़ में वो राज़ खोला, जिसने बंटी के खून को बर्फ बना दिया—
"वो... वो... ताईजी के जाने की बात नहीं है छोटे बाबू... वो... वो ताऊजी..." फागुन ने अपने दोनों हाथों से बंटी के सीने को और कसकर जकड़ लिया, जैसे वो उस दरिंदे (ताऊजी) के खौफ से बंटी के अंदर ही समा जाना चाहती हो। 

बंटी के चौड़े और गरम सीने से लिपटी हुई फागुन बुरी तरह कांप रही थी। बंटी के नथुनों में फागुन के बालों से आती चमेली के तेल की वो सोंधी महक और उसके गदराए जिस्म की वो कच्ची खुशबू भर गई थी। बंटी का मन तो कर रहा था कि वो इस कोमल, रुई जैसे गुदगुदे जिस्म को उम्र भर के लिए अपनी बाहों में जकड़ ले, लेकिन फागुन की वो डरी हुई सिसकियाँ उसे वापस होश में ले आईं।

उसने बहुत ही नरमी से फागुन की नंगी, कांपती हुई पीठ को सहलाया और एक भारी, लेकिन सुकून देने वाली आवाज़ में बोला
"डरो मत... मैं हूँ ना? बताओ, क्या बात है?"
"मैं हूँ ना..." बंटी के मुँह से निकले इन तीन शब्दों में फागुन को एक अजीब सा अपनापन महसूस हुआ।

 सालों से इस हवेली में एक अनाथ की तरह पलने वाली फागुन ने ताईजी के अलावा कभी किसी से इतनी हमदर्दी नहीं पाई थी। फागुन को लगा जैसे शहर से आया ये 'छोटे बाबू' सच में उसकी ढाल बन सकता है।

फागुन धीरे से बंटी के सीने से अलग हुई। उसने अपनी चुन्नी से अपनी नम आँखें पोंछीं और चाँद की उस मद्धम रौशनी में बंटी की आँखों में देखते हुए वो खौफनाक सच उगलना शुरू किया।

"ताऊजी... जब से वो उस हवेली में भीख मांगते हुए आए थे, उनकी नीयत कभी ठीक नहीं रही छोटे बाबू," फागुन की आवाज़ में एक गहरा खौफ था। "ताईजी ने उन पर तरस खा कर उसे यहाँ रहने दिया लेकिन वो हमेशा मुझ पर अपनी गंदी और भूखी नज़र रखते हैं।

 बात-बात पर... कभी रसोई में, कभी आँगन में... मुझे छूने की कोशिश करते हैं। मैंने कई बार उन्हें बाथरूम के दरवाज़े की दरार से मुझे नहाते हुए घूरते पकड़ा है।"
ये सुनते ही बंटी के जबड़े कस गए। उसकी मुट्ठियां अपने आप भिंच गईं।

फागुन ने एक गहरी साँस ली और आगे बताया, "एक बार... रात के अँधेरे में जब मैं पानी लेने जा रही थी, तो उस बूढ़े शैतान ने मुझे पीछे से दबोच लिया था। उस दिन अगर मैंने हिम्मत करके उन्हें ये चेतावनी ना दी होती कि मैं चीख कर ताईजी को सब बता दूँगी... तो ना जाने वो मेरे साथ क्या कर गुज़रते। ताईजी के नाम से वो डर गए थे... और तब से मुझसे दूर ही रहते थे। लेकिन... लेकिन अब ताईजी नहीं रहीं। मेरा वो साया उठ गया है। वो शैतान अब आज़ाद हो गया है... वो मुझे नहीं छोड़ेगा छोटे बाबू!" फागुन फिर से रुआंसी हो गई।

ताऊजी की इन नीच हरकतों को सुनकर बंटी के दाँत गुस्से से पिसने लगे। बंटी जिसका दिमाग हमेशा दो कदम आगे चलता था। उसके अंदर का वो तेज़, शातिर दिमाग अब हरकत करने लगा था।
बंटी ने फागुन के कंधे पर हाथ रखा और उसके चेहरे पर उसकी वही तीखी, चिर-परिचित और शातिर स्माइल (Smirk) दौड़ गई।

"तुम बिल्कुल चिंता मत करो फागुन... दुनिया में हर चीज़ का इलाज होता है, इस ताऊजी की बीमारी का पक्का इलाज भी हम कर देंगे।" बंटी की आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जैसे उसने उस बुड्ढे को सबक सिखाने का कोई खतरनाक प्लान सोच लिया हो।

माहौल बहुत भारी हो चुका था और रात की ठंडक अब हड्डियों को चुभने लगी थी। बंटी ने माहौल को थोड़ा हल्का करने की कोशिश की।
"चलो अब चलते हैं, मुझे तो बहुत तेज़ ठंड लग रही है," बंटी ने मुस्कुराते हुए कहा। फिर उसने फागुन की नाक को हल्का सा खींचते हुए एक शरारती मज़ाक किया, "और वैसे भी... ये रोती हुई ना, तुम कितनी गंदी लगती हो!"
बंटी का ये मज़ाक काम कर गया। फागुन के उस उदास और डरे हुए चेहरे पर एक बहुत ही प्यारी और मासूम सी हँसी खिल उठी। चाँदनी रात में फागुन की वो हँसी देखकर बंटी एक पल के लिए फिर से उसके उस हुस्न में खो सा गया।

दोनों वापस हवेली की उस कच्ची पगडंडी पर आगे बढ़ गए। हवा फिर से तेज़ चलने लगी थी, जो खेतों की घास को सरसरा रही थी।

"अच्छा सुनो फागुन... आज रात तुम अकेले अपने कमरे में नहीं सोगी। तुम मेरी माँ (कामिनी) के कमरे में, उन्हीं के पास सोना अब से.. बाकी का मैं देख लूँगा..."


दोनों की आवाज़ें धीरे-धीरे उस ठंडी और सुनसान रात में धीमी होती चली गईं, और वो दोनों उस खौफनाक हवेली के लोहे के गेट के करीब पहुँच गए... जहाँ अंदर ताऊजी कामिनी के मदमस्त यौवन को देख हवस की आग मे पहले से ही पागल हो चुका था।
**************


जब बंटी और फागुन हवेली के भारी लोहे के गेट से अंदर दाखिल हुए, तो चारों तरफ एक मुर्दा सन्नाटा पसरा हुआ था। श्मशान की राख और रात की ओस ने पूरे माहौल को और भी भारी बना दिया था।

बंटी फागुन को लेकर अंदर पहुँचा ही था और कुछ कहने ही वाला था कि तभी कामिनी ने खुद ही आगे बढ़कर बोल दिया, "फागुन बेटा... आज रात तुम मेरे पास ही सो जाना।"
बंटी मुस्कुरा दिया, क्योंकि उसका काम आसान हो गया था। दूसरी तरफ, कामिनी के दिमाग में भी एक अलग ही कशमकश चल रही थी। वो इस अजनबी घर में एकदम अनजान थी। ताईजी के गुज़र जाने के बाद, उसे फागुन ही एक ऐसा मोहरा लग रही थी जिससे वो बात करके इस घर और यहाँ के लोगो के बारे मे जान सकती थी।

 उसे इस घर को और यहाँ के लोगों को समझने का मौका चाहिए था, और फागुन से बेहतर इसके लिए कोई नहीं था।
रमेश का तो कोई अता-पता ही नहीं था। वो आज अपनी 'राजदार' ताईजी के जाने के गम में, ऊपर वाले एक अलग कमरे में कच्ची शराब पीकर पूरी तरह चित (बेहोश) पड़ा हुआ था। उसे दुनिया की कोई सुध नहीं थी।


वहीं दूसरी तरफ, हवेली के मेन घर के बाहर, आँगन के मुख्य चबूतरे से नीचे उतरकर बनी एक छोटी सी झोपड़ीनुमा कुटिया में ताऊजी पैर पसारे पड़ा था।
ये हवेली का मालिक नहीं, बल्कि एक नौकर का ठिकाना था। 

कुछ देर पहले कामिनी के उस गोरे जिस्म और उस 'खुशबू' ने ताऊजी के अंदर जो आग लगाई थी, वो अब तक ठंडी नहीं हुई थी। रात के उस घने अँधेरे में ताऊजी अपनी खाट पर पड़ा, अपनी धोती के ऊपर से ही अपनी उस बेकाबू हवस और कड़े हो चुके लंड को बुरी तरह मसल रहा था।
"साले बैठ जा... सोने दे मुझे!" वो हाँफते हुए और अपने ही लंड पर झुंझलाते हुए बड़बड़ाया।

ये ताईजी (सुगंधा) का इंसाफ था या कह लो 'कर्मों का फल'। एक वक़्त था जब इसी ताऊजी और इसके घरवालों ने बांझपन का ताना मारकर ताईजी को धक्के मार कर घर से निकाल दिया था। 

आज जब कर्म लौट कर आए, तो दौलत और रुतबा ताईजी के कदमों में था। ताईजी ने अपने इस पापी पति को भीख में पनाह तो दी, लेकिन हवेली के अंदर नहीं, बल्कि घर के बाहर इस कुटिया में। उसका काम सिर्फ खेत-खलिहान और जानवरों की देखभाल करना था, जिसके बदले उसे हवेली से दो वक़्त की रोटी और ये कुटिया मिल गई थी।


अंदर हवेली में, फागुन ने बंटी को उसका कमरा दिखा दिया। ये कमरा पुरानी रसोई के ठीक बगल में था। और उसके बाजू वाला कमरा फागुन का था, जहाँ इस वक़्त कामिनी और फागुन एक ही बिस्तर पर गहरी नींद में जा चुकी थीं।

रात के 1 बज रहे थे।
बंटी का शरीर थकान से चूर था, लेकिन उसकी आँखों से नींद कोसों दूर थी। शायद ये जगह नई थी, या फिर उसका शातिर दिमाग इस हवेली के अनसुलझे सवालों में उलझ गया था।
वो बिस्तर पर करवटें बदल रहा था।
"साला... ये इतनी बड़ी प्रॉपर्टी, इतने खेत, ये हवेली... ये सब इस बुढ़िया (ताईजी) का कैसे हो सकता है?" बंटी का दिमाग तेज़ी से दौड़ रहा था। 

"अगर ये सब सच में ताईजी का होता, तो वो बूढ़ा ताऊ अपना हक़ जताता, सीना तान कर हवेली के अंदर सोता। लेकिन उस चूतिये बूढ़े को देख के लग तो नहीं रहा था कि वो मालिक है यहाँ का... वो तो किसी नौकर की तरह बाहर झोपड़ी में पड़ा है।"

बंटी ने छत को घूरते हुए खुद से कहा, "बेटा बंटी... मामला कुछ और है। दाल में कुछ काला नहीं, पूरी दाल ही काली है। पता करना पड़ेगा।"
ये सोच-सोच कर उसका दिमाग सुन्न होने लगा। "थोड़ा टहल के आता हूँ, शायद खुली हवा से नींद आ जाए,"

 बंटी ने मन ही मन सोचा और चुपचाप अपने कमरे का दरवाज़ा खोलकर बाहर की ओर चल दिया।

बंटी दबे पाँव चलकर हवेली के उस विशाल आँगन में पहुँचा।
बाहर आते ही उसे लगा जैसे वो किसी दूसरी ही दुनिया में आ गया हो। वाकई, क्या शानदार माहौल था! आसमान में पूरा चाँद खिला हुआ था, जिसकी मद्धम, दूधिया रौशनी पूरे आँगन को एक सुकून भरी ठंडक दे रही थी। हवेली के पीछे फैले हुए अनगिनत खेतों से टकराकर आने वाली ठंडी और ताज़ी हवा ने बंटी के उलझे हुए दिमाग को एकदम से शांत कर दिया।

"उफ्फ्फ्फ़... साला ये होता है ना गाँव! कहाँ मैं उस घुटन भरे कमरे में पड़ा हुआ था। असली सुकून तो ये है," बंटी ने एक गहरी साँस ली और गाँव की उस ताज़ी हवा को अपने फेफड़ों में भर लिया।

पास ही आँगन के बीचों-बीच सन की रस्सी से बुनी हुई एक बड़ी सी चारपाई (खाट) बिछी हुई थी। बंटी बिना कुछ सोचे उस चारपाई पर अपने दोनों पैर फैला कर, आसमान के चाँद को निहारते हुए आराम से लेट गया।

अभी बंटी चारपाई पर लेटे हुए गाँव के इस हसीन, चाँदनी नज़ारे का लुत्फ़ उठा ही रहा था कि यकायक हवा के झोंके के साथ उसके कानों में एक धीमी, लेकिन बहुत साफ़ आवाज़ टकराई...
"आअह्ह्ह..... धीरे... आअह्ह्ह... रुक जाओ ना..."
"अबे ये क्या है?" बंटी के कान एकदम से खड़े हो गए। उसकी तंद्रा टूट गई।
रात के इस सन्नाटे में एक औरत की आवाज़? वो भी ऐसी दर्द और मज़े में डूबी हुई? बंटी इस से पहले भी अपनी माँ की चुदाई को छुप-छुप कर देख चुका था। उसे एक सेकंड नहीं लगा ये समझने में कि एक औरत इस तरह की आवाज़ें कब और किस हालत में निकालती है।

उसने तुरंत चारपाई छोड़ी और दबे पाँव, एक शिकारी कुत्ते की तरह उस आवाज़ का पीछा करने लगा।
वो दबी हुई सिसकियाँ और कराहने की आवाज़ें उसे आँगन के उस पार, ताऊजी की उसी अँधेरी झोपड़ी की तरफ ले गईं।

जैसे-जैसे बंटी उस कुटिया के पास पहुँचा, वो आवाज़ें और वो अजीब सी बिस्तर के चरमराने की गूंज और भी साफ़ होने लगी। बंटी ने अपनी साँसें रोक लीं और झोपड़ी की उस छोटी सी, आधी खुली खिड़की के पास पहुँच कर अपनी नज़र अंदर दौड़ा दी...

"अबे तेरी... ये क्या है बे?" बंटी की आँखें फटी की फटी रह गईं। वो बुरी तरह चौंक गया, लेकिन वो पीछे नहीं हटा। उसे इस तरह छुप-छुप कर दूसरों के राज़ और हवस के खेल देखने की एक गंदी आदत सी पड़ चुकी थी।

अंदर का नज़ारा बंटी के दिमाग की नसें हिलाने के लिए काफी था।
मातम की इस रात में, जहाँ अभी चंद घंटे पहले ताईजी की लाश जली थी, वहाँ ताऊजी पूरी तरह से नंगा हो कर उसके सामने घोड़ी बनी औरत की चुत मे लंड डाल कर धमाधम धक्के लगा रहा था.

बंटी की नजर उस सांवली औरत पर गई, उसे देखकर बंटी का मुँह खुला का खुला रह गया।
"आअह्ह्ह.... मालिक... बाबू... अब बस करो ना... आज ही तो आपकी बीवी मरी है, सारा बदला आज ही मुझ से निकालोगे क्या..." वो औरत दर्द और मज़े के बीच झूलते हुए, अपना सिर इधर-उधर पटकते हुए कराह रही थी।

वो कोई और नहीं, बल्कि वही 'कमला काकी' थी जिसके घर बंटी कुछ घंटे पहले फागुन के साथ खाना खाने गया था!

"साला... इसके हाव-भाव देखकर तो मुझे उसी वक़्त समझ जाना चाहिए था कि ये चुदाई की कितनी भूखी है," बंटी ने उस पल को याद किया जब वो विदा लेते वक़्त झोपड़ी से निकल रहा था और कमला अपने अस्त-व्यस्त ब्लाउज़ से अपना वो भारी, साँवली घाटी उसे जानबूझकर दिखा रही थी।

अंदर ताऊजी उस साँवली देहाती औरत के जिस्म पर किसी वहशी जानवर की तरह चढ़ा हुआ था। वो उसे घोड़ी बनाकर उसके उस थुलथुले और भरे हुए जिस्म को बेरहमी से रौंद रहा था। ताऊजी का वो 65 साल का खुरदरा और भारी भरकम शरीर कमला पर ताबड़तोड़ कहर बरपा रहा था। bbw-doggystyled-jschnaxel-001

बंटी खिड़की से उस हैवानियत और हवस के खेल को टकटकी लगाए देख रहा था। बंटी ने नोटिस किया ताऊजी के टट्टे किसी सामान्य आदमी से कहीं ज्यादातर बड़े है, जैसे दो संतरे लंड के नीचे लटका रखे हो.
"आअह्ह्ह..... बाबू जी... Aaahhh... अब बस भी करो मार ही डालोगे क्या, पिछले आधे घंटे से चोदे जा रहे है क्या हो गया है आपको " कमला काकी दुहाई मांग रही थी, उसकी चुत से पानी निकल निकल कर जांघो तक फ़ैल गया था.
ना जाने कमला कितनी बार झाड़ी होंगी...
आअह्ह्ह.... हंफ... हंफ.... कमला तुझे पता है औरत कितनी अजीब होती है.
ताऊजी इस चुदाई मे पहली बार बोला. 24614258
"हुम्म्म.... आअह्ह्ह..." थाड थाड... ताऊजी आंखे बंद किये बुरी तरह धक्के मार रहा था, जैसे किसी और के ख्यालो मे डूबा हुआ हो.
"औरत को जो मिलता है, उसे वो नहीं चाहिए होता " ठाक... ठप... थप.. थप....
कमला कुछ समझी नहीं, वो बस सर पटक रही थी, उसकी चुत घिसने लगी थी अब.
"सुगंधा को भी ऐसे ही चोदता था मै, लेकिन उसे बच्चा चाहिए था चुदाई का सुख तो मिल चूका था उसे.
और तुझे चुदाई का सुख चाहिए बच्चे तो तेरे पति ने दे ही दिए है "
ताऊजी ने गुस्से से आंखे खोली....
थाड... थाड... थाद..... पूछ... पूछ.... पुच....
ताऊजी के धक्के इतने तेज़ हो गए की कोई सामन्य औरत होती तो दम ही तौड़ देती.
आआहब्ब.....बस   अब.... रुक जाओ.... आआहहहह....
थाड... ताऊजी के टट्टे पूरी तरह से कमला की जांघो पर जा चिपके... 27714740
उसका मुँह खुला रह गया.
ताऊजी रुक गए.....
कमला धीरे से बिस्तर पर आगे को जा गिरी, ताऊजी का लंड धीरे धीरे बहार आने लगा.
बंटी हैरान था... इतनी देर चुदाई के बाद भी ताऊजी का लंड वैसा का वैसा ही तना हुआ था, 
बस लंड के सुपाड़े से पानी जैसे दो बून्द टपक पड़ी.

"बस कमला यही तो समस्या है मै बच्चे नहीं दर सका सुगंधा को, उसने मुझे नौकर बना कर रखा इस हवेली मे, साला औरत सम्भोग के लिए मरती है उसे बच्चा चाहिए था... आआककक... थु....
ताऊजी ने जमीन पर ऐसे थूका जैसे सुगंधा के ऊपर थूका हो.
कमला ने आंखे खोली, उसके हाथ आगे बड़े और ताऊजी के लंड को धीरे धीरे सहलाने लगे, उसके बड़े टट्टो को मसलने लगे.
जैसे वो ताऊजी का दर्द समझती हो.
"जाने दो बाबू जी.... मै हूँ ना आपके लिए " 
"क्या तु है... हाँ क्या तु है... साली आज तक तुझे चोद कर मेरे लंड को शांति नहीं मिली, कभी ठंडा नहीं हुआ मै "
ताऊजी गुस्से मे बड़बड़ा रहा था...
बहार बंटी हैरान था...
"क्या करू मै इस बीमारी का, मेरे लंड की नस बंद है तो क्या करू मै, तु बता कमला क्या करू, मेरी क्या गलती थी की मै बच्चा पैदा नहीं कर सकता, 
सारा वीर्य इन टट्टो मे जमा हो जाता है, फिर खुद ही नष्ट हो जाता है.
ताऊजी आज वाकई दुखी लग रहा था.
अजीब बीमारी थी ताऊजी की.
"हेहेहेहे.... अबे ऐसा भी होता है?" बहार बंटी हस रहा था.
अंदर कमला काकी नंगी ही ताऊजी के साथ लेती उसे शांत कर रही थी...
बंटी धीमे कदमो से वापस आ कर आंगन मे बिछि चारपाई पर लेट गया.
वो एक और राज जान चूका था, उसके चेहरे पे स्माइल थी, उसकी आंखे बंद होती चली गई.
अब उसका मन शांत था.

क्रमशः....

Buy me a Wine
kamukwine@ptyes

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6 Comments

  1. कहानी अच्छी बिल्डअप करते हो आप

    कमाल 👏👏

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  2. Bhai kal se to roj de dena update

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  3. Wah kya baat hai bahut dino baad
    Part 2 Kahani patari par aa chuki hai
    Bas ek baar kamini garam ho jaye to maja doguna ho jaye ga
    Tauji to damdar lag rahe hai
    Kamani ko thanda karke hi manenge

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  4. Plz thoda jaldi jaldi update diya kre.

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  5. Wah bhai gajab ka update hai yaha tau to kamla kaki ko chod diya par abhi bhi wo santusht nahi hai ab tau ke land ko shant sirf kamini hi kar sakti hai aur tau ke performance se to kamini bhi santusht ho jayegi...
    Aur ye tau ki ajib bimari hai jisse sun jar shayad bunty ke dimag mai kuch chal raha hai .. waise agar miracle se tau ka virya normal hua to wo pakka kamini ko pregnant karne ke firak mai hoga but wo bohot age ki baat hai

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  6. Nice kamuk update
    Shyad Tauji ko jara bhi idea nahi hai ki Kamini kitni garm aurat hai
    Bas ek baar aag sulgane ki der hai
    Buddha to bilkul pagal ho jayega

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