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कामिनी 2.0, भाग -5

मेरी माँ कामिनी 2.0 - अध्याय -5


रात का वो भारीपन और खौफनाक सन्नाटा अब छंट चुका था। सुबह की ताज़ी, सुनहरी धूप हवेली के आँगन में फैल रही थी। गाँव की हवा में एक खुशनुमा ठंडक थी और दूर से आती पक्षियों की चहचहाहट माहौल को सुकून दे रही थी।

कामिनी उठ चुकी थी। कल दिन भर की थकान और शमशेर का दिया दर्द अब हल्का हो चूका था, इस खुली हवा और माहौल ने उसके दिमाग और जिस्म को शांत कर दिया था।
कामिनी ने एक सादी सी साड़ी और ब्लाउज पहने हुए थे अब कपडे कितने ही सादे हो खूबसूरत औरत पर रंगत आ ही जाती है.
कामिनी भी इस हलके गुलाबी रंग मे खील रही थी, उसका गोरा रंग इस हरियाली के बीच दमक रहा था.

उसकी नज़र बीच आँगन में बिछी चारपाई पर गई। बंटी वहाँ बेफिक्र होकर सो रहा था। उसने सिर्फ एक ढीला सा पजामा पहना हुआ था और ऊपर का बदन नंगा था। हवा से पजामा उसकी जांघो से चिपका हुआ था,

कामिनी धीरे से चलते हुए चारपाई के पास आई। उसकी नज़रें अनजाने में ही बंटी की जांघों के बीच चली गईं, जहाँ उस पजामे के कपड़े के नीचे एक अच्छा-खासा, तना हुआ उभार (Morning Wood) साफ़ नज़र आ रहा था।

कामिनी बंटी सर काफ़ी घुलमिल गई थी, लेकिन उसने कभी इस बात पर ध्यान नहीं दिया था, 
 उसने एक हल्की सी मुस्कान के साथ मन ही मन कहा, "मेरा बच्चा... अब सच में बड़ा हो गया है। इतना बढ़ा हो गया फिर भी बेशर्मों की तरह ऐसे ही सो रहा है।"
ये बात सोचते हुए ना जाने क्यों उसे वही अजीब झुर झूरी होने लगी जो वो किसी मर्द के पास होने से महसूस करती थी.

कामिनी ने आगे बढ़कर बंटी के नंगे कंधे को झकझोरा, "उठ बंटी... ये क्या बेशर्मों की तरह सो रहा है। सुबह हो गई है।"

"क्या माँ... कितना अच्छा लग रहा है, सोने दो ना..." बंटी ने आँखें बंद किए-किए ही एक मीठी सी झिड़की दी और करवट ले ली।

"अरे सोने दो कामिनी... ऐसा सुकून और माहौल शहर में कहाँ मिलता है," तभी पीछे से एक भारी आवाज़ गूंजी।
कामिनी ने पलट कर देखा।

 रमेश हवेली के अंदर से चलता हुआ आंगन मे खड़ा था।
 कल रात नशे में धुत, टूट कर रोने वाला रमेश आज सुबह एकदम तरोताज़ा लग रहा था। उसने एकदम टिप-टॉप कपड़े पहने हुए थे, जैसे वो रोज ऑफिस जाने के लिए तैयार होता था, 

कामिनी रमेश को देखकर अंदर से हैरान थी। "यहाँ गाँव में, वो भी इस मातम वाले घर में, सुबह-सुबह कहाँ जाना है आपको? यहाँ कौनसा ऑफिस है?" कामिनी के चेहरे पर हैरानी और सवाल साफ झलक रहे थे।

"आदमी लोगों के काम कभी ख़त्म ही नहीं होते कामिनी... क्या करें? जाना पड़ता है," रमेश ने बहुत ही रूखेपन से दो टूक बात कह दी।

वैसे भी, रमेश और कामिनी के बीच पति-पत्नी वाला वो आत्मीय, प्यार भरा रिश्ता तो कभी था ही नहीं।

रमेश बिना कोई और जवाब दिए, हवेली के भारी लोहे के गेट से बाहर निकल गया। 

रमेश के जाते ही, आँगन के सन्नाटे को चीरती हुई एक बहुत ही चहकती और मीठी सी आवाज़ गूंजी।
"अरे मैडम... अभी तक छोटे बाबू उठे नहीं? कमला काकी ने नाश्ते पर बुलाया था।"
ये फागुन थी।
कामिनी कुछ कहने ही वाली थी कि तभी एक चमत्कार सा हुआ। कामिनी जो पिछले पाँच मिनट से बंटी को झकझोर रही थी, और वो टस से मस नहीं हो रहा था... फागुन की उस एक मीठी आवाज़ को सुनते ही बंटी झटके से बिस्तर पर उठ बैठा!

"अरे... मैं तो कबका उठ गया हूँ! चलो... कहाँ चलना है?" बंटी ने आँखें मलते हुए एकदम फुर्ती से जवाब दिया।

कामिनी अंदर ही अंदर हैरान रह गई। "मेरी इतनी आवाज़, इतना हिलाने से भी ये लड़का नहीं उठा... और इस लड़की की एक आवाज़ पर ऐसे उठ बैठा जैसे कोई अलार्म बजा हो?" कामिनी समझ गई कि दाल में कुछ काला है। वो मंद-मंद मुस्कुरा दी। 

उसे लगा कि शायद बंटी को इस देहाती लड़की में कोई कशिश दिख रही है।
"आप बाथरूम हो आइए छोटे बाबू... फिर चलते हैं," फागुन बंटी के पास आकर खड़ी हो गई। कल के गमगीन माहौल के बाद, आज सुबह फागुन के चेहरे पर एक गज़ब की ताज़गी और इत्मीनान था। 

शायद बंटी का वो "मैं हूँ ना" वाला वादा उसे अंदर से हिम्मत दे गया था।
बंटी तौलिया उठाकर झट से नहाने भाग गया।
अब आँगन में सिर्फ कामिनी और फागुन रह गई थीं।

"मैडम... आप भी चल रही हैं ना नाश्ते पर?" फागुन ने कामिनी की तरफ बहुत ही मासूमियत से देखकर पूछा।
कामिनी को फागुन के मुँह से ये 'मैडम' शब्द किसी कांटे की तरह चुभा।

"ये क्या 'मैडम-मैडम' लगा रखा है तूने सुबह से? तेरी माँ की उम्र की हूँ मैं... और ये 'मैडम' सुनना मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता," कामिनी यकायक फागुन पर थोड़े प्यार भरे गुस्से से बरस पड़ी।

फागुन एकदम से सकपका गई। वो घबराकर दो कदम पीछे हट गई।
"वो... वो... मैं तो बस..."
कामिनी का दिल पसीज गया। उसने आगे बढ़कर बहुत ही नरमी से कहा, "माँ बोल ले... माँ जी बोल ले... पर मैडम मत बोल।"

 जैसे ही कामिनी ने ये शब्द बोले, ना जाने क्यों उसके खुद के ही अंदर फागुन के मुँह से 'माँ' सुनने की एक बहुत ही तेज़ और अजीब सी इच्छा मचल उठी। एक अनजानी सी तड़प थी।

"ठ... ठ... ठीक है... माँ जी..." फागुन के कांपते हुए हलक से बहुत ही धीरे से वो कोमल शब्द निकले।

उफ्फ्फ्फ़...! फागुन के मुँह से वो शब्द सुनते ही कामिनी जैसे सुन्न पड़ गई। उस मीठी, सुनहरी आवाज़ में कामिनी इस कदर खो गई कि उसके बेचैन दिल में एक अजीब सी, बहुत ही गहरी शांति उतर गई।

 बंटी भी उसे 'मम्मी' या 'माँ' बोलता था, लेकिन फागुन के उस लहज़े में, उसकी उस आवाज़ में एक ऐसा दर्द और ऐसा खिंचाव था जो बंटी की आवाज़ में कभी नहीं था।

"फिर से बोल..." कामिनी चहक उठी। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई।
लेकिन जवाब में फागुन कुछ बोल नहीं पाई। उसकी बड़ी-बड़ी, मासूम आँखों से अचानक आँसुओं की धारा बह निकली।

"अरे... रोती क्यों है पागल?" कामिनी घबरा गई और उसने तुरंत आगे बढ़कर फागुन को अपने हाथों से थाम लिया।
"मैंने... मैंने कभी किसी को 'माँ' बोला ही नहीं है... मेरी तो कोई माँ है ही नहीं..." फागुन फफक-फफक कर रो पड़ी। बस एक ताईजी ही थी....

बरसों पुरानी वो अनाथ होने की टीस, वो खालीपन आज कामिनी के सामने एक ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा।
फागुन का वो दर्द देखकर कामिनी का दिल मोम की तरह पिघल कर उसके पैरों में जमा हो गया। उसने बिना कुछ सोचे, फागुन को अपनी बाहों में भरा और कसकर अपने सीने से लगा लिया।

जैसे ही उन दोनों के जिस्म एक-दूसरे से टकराए... वो एहसास इतना गहरा, इतना अपनापन लिए हुए था कि कामिनी को लगा जैसे उसने किसी गैर को नहीं, बल्कि खुद को ही गले लगा लिया हो।

 कामिनी की बरसों पुरानी एक अधूरी इच्छा थी कि बंटी के अलावा उसकी कोई अपनी बेटी भी होती, जिसे वो सजाती, संवारती, अपना अक्स देखती। लेकिन रमेश की नपुंसकता ने कभी उसे ये मौका ही नहीं दिया था।

आज जब वो मौका मिला... जब फागुन उसके सीने से लगी, तो कामिनी का दिल भर आया। उसकी भी आँखें छलक उठीं।
"चुप हो जा मेरी बच्ची... अब से ऐसा समझ कि तू ही मेरी बेटी है... और मैं तेरी माँ," कामिनी ने फागुन के बालों को चूमते हुए रुंधे गले से कहा।
नये रिश्ते की सुगबुगाहत हवा मे तैरने लगी.
****************


गाँव के बीचों-बीच एक छोटा सा, धूल भरा चौराहा था। एक पुराना बरगद का पेड़, उसके नीचे एक चाय की टूटी-फूटी टपरी, और टपरी के पास खड़ी एक खटारा जीप। माहौल में सुबह की ठंडक और कच्चे कोयले के धुएँ की महक घुली हुई थी।
उसी चाय की टपरी की एक गंदी सी लकड़ी की बेंच पर दो आदमी बैठे थे 'लकी' और 'बिट्टू'।

शहर के ये दोनों गुंडे इस वक़्त एकदम लुटे-पिटे, मैले-कुचैले और किसी आवारा कुत्ते की तरह थके हुए लग रहे थे। उनके चेहरे पर कई दिनों की थकान, कादर की मार के निशान साफ दिख रहे थे, दोनों की आँखों में एक अजीब सी झल्लाहट थी।

"सुड़क... सुड़क..." बिट्टू ने एक बहुत ही ज़ोरदार आवाज़ करते हुए कुल्हड़ से चाय की चुस्की ली। उसकी आँखों में नींद और हताशा दोनों भरी थीं।
"अबे साला... बड़ा भाई ने ये हमें कहाँ भेज दिया यार? इस सड़े हुए गाँव में उस औरत को कहाँ ढूँढेंगे हम?" बिट्टू ने झुंझलाते हुए कहा, और एक और घूंट हलक के नीचे उतार लिया।
लकी अपनी उँगलियों के बीच फंसी आधी जली हुई बीड़ी को घूर रहा था। उसने एक लंबी कश खींची और धुवे का छल्ला बनाने के जुगत मे मुँह गोल किया 

"अबे ढूँढना तो पड़ेगा ही ना! अगर खाली हाथ वापस गए, तो बड़ा भाई वैसे ही जान से मार देगा। साले, वो औरत और वो हरामी कादर दोनों हमारे लिए मौत का फरमान बन गए हैं।"

बिट्टू ने फिर से चाय का कुल्हड़ होंठों से लगाया ही था कि अचानक... उसकी नज़रें चौराहे से गुज़रने वाली कच्ची पगडंडी पर जाकर अटक गईं।
जैसे समय रुक गया हो।
गर्म चाय की वो चुस्की बिट्टू के हलक में ही जम गई। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।

"अबे साले... वो देख..." बिट्टू के मुँह से हकलाते हुए बस इतना ही निकला। उसने अपना हाथ पगडंडी की तरफ उठाया।
लकी ने मुड़कर देखा।
किस्मत सच में आज इन दोनों कुत्तों पर मेहरबान थी। सामने से कोई और नहीं... बल्कि कामिनी, बंटी और फागुन चले जा रहे थे। 

कामिनी उसी हल्के गुलाबी रंग की साड़ी में थी, और उसका वो भरा हुआ, गोरा शहरी जिस्म गाँव की उस पगडंडी पर एकदम अलग ही दमक रहा था।
"हाँ बे... ये तो वही है! कादर खान की औरत!" लकी की आँखें चमक उठीं। उसने बिना सोचे-समझे, कुल्हड़ की बची हुई गरम चाय को एक ही बार में 'सुड़क' करके हलक से नीचे उतार दिया।

"अगर ये कुतिया यहाँ है... तो वो हरामी कादर भी पक्का यहीं कहीं छुपा बैठा होगा। साला... आज तो लॉटरी लग गई!" लकी ने बीड़ी ज़मीन पर फेंक कर उसे जूते से कुचल दिया।

 "चल... इसके पीछे चल। देखते हैं ये जा कहाँ रही है।"
दोनों अपनी जगह से झटके से उठे और पगडंडी की तरफ बढ़ने लगे।

"बाबूजी... पैसा तो देते जाओ!" पीछे से चाय वाले ने अपनी कर्कश आवाज़ में उन्हें टोका।
ये टोकना बिट्टू को किसी गाली जैसा लगा। उसका पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया।
"ईईई... हट मादरचोद! लगा दी ना टोक सुबह-सुबह!" बिट्टू ने खीज कर जेब से कुछ मुड़े-तुड़े नोट निकाले और चाय वाले की गंदी टेबल पर ज़ोर से दे मारे। "ले मर... साले भिखारी!"

लकी ने भी मुड़कर चाय वाले को खूंखार नज़रों से घूरा, "और सुन बे मादरचोद... ये चाय बनाना बंद कर दे तू। साला गरम पानी पिला दिया सुबह-सुबह!" लकी गुस्से से गुर्राया और फिर तेज़ कदमों से बिट्टू के पीछे हो लिया।

तब तक कामिनी, बंटी और फागुन पगडंडी पर काफी दूर निकल चुके थे।
******************

"आइए... आइए बहुरानी! घर पधारिए..." कमला ने अपनी चौखट पर खड़े होकर बहुत ही गर्मजोशी और देहाती अपनेपन के साथ कामिनी, बंटी और फागुन का स्वागत किया।
अंदर झोपड़ी को गोबर और मिट्टी से एकदम साफ लीपा गया था। एक कोने में पुरानी खटिया बिछी थी और दूसरे कोने में चूल्हे पर चाय उबल रही थी।
कामिनी जब अंदर आई तो प्रमिला और कमला से मिलकर उसे एक अजीब सी ख़ुशी महसूस हुई। शहर के उस दिखावे और हवेली के उस घुटन भरे मातम से दूर, इस छोटी सी झोपड़ी में एक सच्चा सुकून था। 

कामिनी के उस गोरे, भरे-पूरे और शहरी रूप को देखकर आस-पास की दो-चार और औरतें भी वहाँ जमा हो गई थीं।

"अरे वाह... शहर की हवा ही अलग होती है, देखो तो सही कितनी गोरी-चिट्टी हैं," एक औरत ने कानाफूसी की।
कामिनी मुस्कुराती रही। वहाँ देहाती नाश्ता (गरमा-गरम रोटियां, गुड़ और चाय) परोसा गया। बंटी और कामिनी ने मज़े से नाश्ता किया और औरतों के बीच पंचायत और हँसी-मज़ाक का दौर चलने लगा।
ऐसा स्वाद शहर मे कहाँ मिलता है भला,


अंदर जहाँ कामिनी और बंटी नाश्ते के चटकारे ले रहे थे, वहीं बाहर बबूल के एक कँटीले पेड़ के नीचे शहर के दो खूंखार गुंडों की 'कुत्ते वाली हालत' हो रखी थी।
"सुड़क शनिफग....... सुड़क...शनिफ्फ्फ्फफ्फ्फ़... ससससईई....
बिट्टू ने माचिस की तीली से अपनी बीड़ी सुलगाई और एक लंबा कश खींचते हुए झुंझलाकर बोला, "अबे यार... ये साला सबसे बुरा काम लगता है मुझे!"

लकी जो पास ही एक पत्थर पर उकड़ूँ बैठा एक डंडे से मिट्टी खोद रहा था, उसने मुड़कर घूरा, "क्या बुरा लग गया बे? बैठ ना शांति से।"

"अरे साला शांति कहाँ से मिले!" बिट्टू ने बीड़ी का धुंआ छोड़ते हुए अपना दुखड़ा रोया, "ना बैठने की जगह, ना चाय, ना पानी। ऊपर से गाँव की ये धूल और मच्छर...

 साला बड़ा भाई खुद एसी (AC) कमरे में बैठकर हमें यहाँ कुत्तों की तरह झाड़ियों में बैठा दिया है। साला जासूसी कम और 'मोगली' की ट्रेनिंग ज़्यादा लग रही है।"

लकी ने उसे चुप रहने का इशारा किया। उसकी नज़रें टकटकी लगाए कमला की झोपड़ी पर ही गड़ी थीं।
तभी लकी को दूर से एक देहाती आदमी आता हुआ दिखा, जो अपने एक बड़े से सींग वाले बैल को हाँकते हुए उसी पगडंडी से गुज़र रहा था। लकी के अंदर का वो शहरी गुंडा जाग गया।

"ओए! इधर आ बे..." लकी ने अपने उसी टपोरी और बदतमीज़ लहज़े में उस आदमी को आवाज़ लगाई।
वो आदमी अपनी जगह पर रुक गया। उसने अपने बैल की रस्सी खींची और पलट कर इन दोनों को देखा।

 गाँव के सीधे-सादे माहौल में ऐसी बदतमीज़ी से बुलाए जाने पर वो आदमी एकदम आगबबूला हो गया। उसकी बड़ी-बड़ी मूँछें गुस्से से फड़कने लगीं।

वो आदमी अपना लठ (डंडा) ज़मीन पर ठोकते हुए उनके बिल्कुल करीब आ गया।

"कौन हो बे तुम दोनों? और ये 'इधर आ बे' क्या होता है? आज से पहले तो कभी ना देखा यहाँ इस गाँव में... शक्ल से तो चोर-उचक्के लग रहे हो!" आदमी का वो 6 फुट का गठीला शरीर और हाथ में मोटा लठ देखकर लकी की हवा टाइट हो गई। उसे समझ आ गया कि ये शहर नहीं है जहाँ कोई भी डर जाएगा; यहाँ गाँव वाले लठ गाड़ देते हैं।

बिट्टू ने तुरंत बात संभाली। उसने अपने चेहरे पर एक झूठी और लाचार सी मुस्कान चिपकाई, "अरे... अरे... माफ़ करना भाईसाब! वो क्या है ना, हम शहर से आए हैं। रास्ता भटक गए थे। इस धूप में दिमाग खराब हो गया है, इसलिए इसके मुँह से ऐसा निकल गया।" आदमी का गुस्सा थोड़ा शांत हुआ।

"हाँ, तो पूछना क्या है?" आदमी ने कड़क आवाज़ में पूछा।
लकी ने डरते-डरते सामने कमला की झोपड़ी की तरफ इशारा किया, "वो... वो सामने जो घर है, जहाँ वो औरतें जमा हैं... वो किसका घर है?"

आदमी ने अपनी मूँछों पर ताव दिया और सीना चौड़ा करके बोला, "अरे... वो तो हमारा ही घर है! हम राम खिलावन हैं... कमला के घरवाले।"

ये सुनते ही लकी और बिट्टू ने एक-दूसरे की शक्ल ऐसे देखी जैसे उनकी पैंट ढीली हो गई हो। जिस आदमी के घर की वो जासूसी कर रहे थे, उसी आदमी से वो दादागिरी दिखा रहे थे!

"अच्छा... अच्छा... राम खिलावन जी! बहुत बढ़िया घर है आपका। हम तो बस ऐसे ही पूछ रहे थे।
वो धुप ज्यादा थी तो रुक गए थोड़ी छाव मे. हेहेहेहेहे.... लकी ने भी दाँत निपोर दिए.
अभी वो लोग कादर खान की मार से उबरे नहीं थे, और मार खाना किसी भी स्थति मे मौत को गले लगाना ही था.


सूरज अब सिर पर आ चुका था। बबूल के पेड़ के नीचे छांव कम और धूप ज़्यादा हो गई थी।
लकी और बिट्टू सुबह से वहीं उस पेड़ के नीचे भूखे-प्यासे बैठे थे। नाश्ते की तो दूर, उन्हें एक घूंट पानी तक नसीब नहीं हुआ था। 

गर्मी और भूख से दोनों की आँखें झपकने लगी थीं और वो बैठे-बैठे ही ऊंघ रहे थे। बिट्टू का सिर बार-बार लकी के कंधे पर गिर रहा था।

"अबे साले सोने आया है यहाँ?" लकी ने उसे कोहनी मारी।
लेकिन थोड़ी ही देर बाद...

दोनों एक-दूसरे के ऊपर सिर रखकर, मुँह फाड़कर ऐसे खर्राटे ले रहे थे जैसे किसी फाइव-स्टार होटल के गद्दे पर सो रहे हों। इसी गहरी नींद और बेवकूफी के बीच...

 कामिनी, बंटी और फागुन कब कमला काकी की झोपड़ी से निकल कर हवेली की पगडंडी पर आगे बढ़ गए, इन दोनों 'महान जासूसों' को भनक तक नहीं लगी।

कामिनी के लिए गाँव की इन ऊबड़-खाबड़, कच्ची पगडंडियों और खेतों की मेड़ पर चलना आसान नहीं था। वो शहर की पक्की सड़कों की आदी थी और आज उसने साड़ी के नीचे सैंडल पहन रखी थी। दोनों तरफ खेतों की हरियाली थी और वो धीरे-धीरे बातें करते हुए चल रहे थे।

तभी... एक जगह जहाँ थोड़ी सी गीली मिट्टी और गड्ढा था, कामिनी का सैंडल फिसला।
"अअअअअ... आआह्ह्ह...!!" कामिनी के मुँह से एक ज़ोरदार और दर्दनाक चीख निकल गई।

वो धड़ाम से ज़मीन पर गिरने ही वाली थी कि बंटी ने फुर्ती दिखाते हुए उसे अपनी मज़बूत बाहों में थाम लिया।
"क्या हुआ माँ?" बंटी घबरा गया।

"आह्ह... उफ्फ्फ... मेरा पैर... पैर मुड़ गया बंटी..." कामिनी दर्द से बुरी तरह कराह रही थी। उसका दायां पैर उस गड्ढे में बहुत बुरी तरह से मुड़ गया था। उसके गोरे चेहरे पर दर्द के मारे पसीने की बूंदें छलक आईं। पैर ज़मीन पर रखा ही नहीं जा रहा था।

किस्मत अच्छी थी कि किशनगंज की वो बड़ी हवेली वहाँ से बस कुछ ही कदमों की दूरी पर थी। फागुन ने कामिनी का एक हाथ अपने कंधे पर रखा और बंटी ने उसे कमर से सहारा दिया। दोनों उसे लंगड़ाते हुए, जैसे-तैसे खींचकर हवेली के भारी गेट तक ले आए।


"अअअअअ... आराम से... आह्ह..." कामिनी की कराहने की आवाज़ सन्नाटे वाले आँगन में गूंज उठी।
ये आवाज़ सुनकर हवेली के बाहर अपनी उसी झोपड़ीनुमा कुटिया में लेटा ताऊजी हड़बड़ा कर बाहर आ गया।

"क्या हुआ छोटे बाबू... अरे! क्या हुआ बहुरानी को?" ताऊजी की आँखें कामिनी को इस हालत में देखकर एकदम से चौड़ी हो गईं।

दरअसल, दर्द और उस ऊबड़-खाबड़ रास्ते से चलकर आने की वजह से कामिनी के कपड़े एकदम अस्त-व्यस्त हो चुके थे। उसके कंधे से साड़ी का पल्लू खिसक कर उसकी कमर तक आ गिरा था। दर्द की वजह से कामिनी भारी-भारी साँसें ले रही थी, जिससे उसके उस हल्के गुलाबी ब्लाउज़ में कसे हुए वो गोरे, भारी स्तन तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहे थे। वो ब्लाउज़ के गहरे गले से छलक कर जैसे बाहर आने को मरे जा रहे थे।


ताऊजी के अंदर का वो 'बुड्ढा भेड़िया' फिर से जाग गया। उसकी लालची आँखें कामिनी की उस गहरी और पसीने से भीगी घाटी (cleavage) पर जाकर चिपक गईं।

"माँ जी का पैर गड्ढे में मुड़ गया है ताऊजी, शायद बहुत गहरी मोच आई है," फागुन ने घबराते हुए कहा।
ताऊजी ने तुरंत अपनी हवस भरी नज़रों को चुराया और एक हमदर्द नौकर का नाटक करते हुए बोला, "अरे राम-राम... आप लोग बहुरानी को अंदर पलंग पर लिटाओ। मैं अभी जाता हूँ... गाँव के हकीम को लेकर आता हूँ।"

ताऊजी ने खूंटी से अपना मैला गमछा उठाया, कंधे पर रखा और अपनी पुरानी साइकिल उठाकर गाँव की धूल भरी सड़क की तरफ पैडल मारता हुआ निकल गया।

कामिनी अब अंदर फागुन वाले कमरे में बिस्तर पर लेटी थी। बंटी ने धीरे से उसका सैंडल निकाला।
पाँव की एड़ी अब तक बुरी तरह सूज कर लाल हो चुकी थी। पैर का वो हिस्सा बिल्कुल मुड़ गया था और सीधा करने पर कामिनी की जान निकल रही थी। फागुन एक बर्तन में गर्म पानी लाने के लिए रसोई की तरफ भाग गई।

कोई 15 मिनट ही बीते होंगे कि आँगन में ताऊजी की आवाज़ गूंजी।

"लो... आ गया इलाज!" ताऊजी ने ऐसे ऐलान किया जैसे कोई बहुत बड़ा डॉक्टर ले आया हो।

ताऊजी के पीछे-पीछे कमरे में एक बहुत ही अजीब सी शक्ल और हुलिए वाला आदमी दाखिल हुआ।
उम्र करीब 70 साल। सिर पर एक पुरानी, मैली सी जालीदार टोपी। बदन पर एकदम ढीला-ढाला और कई जगह से पीला पड़ चुका सफ़ेद कुर्ता-पजामा। कमर 30°पर झुकी हुई.
लगता था कोई सीधा कब्र से उठ के चला आया है.

हाथ में एक काले रंग का फटा-पुराना चमड़े का बैग। चेहरे पर एक अजीब सी लटकती हुई 'बकरा दाढ़ी'। और सबसे घिनौनी चीज़, उसका मुँह, जो पान और जर्दे से पूरी तरह भरा हुआ था और होंठों के किनारों से पान की लाल पीक चू रही थी।

"बन्दे को... हकीम लकड़द्दीन कहते हैं मियाँ," उसने अपने मुँह का पान एक तरफ दबाते हुए अपनी भारी और खरखराती आवाज़ में अपना परिचय दिया। "कौन है? किसको मर्ज़ है? "

सामने से फागुन हटी और उसने बिस्तर की तरफ इशारा किया, "जी काका... ये माँ जी का पैर मुड़ गया है।"

हकीम लकड़द्दीन की नज़रें जैसे ही बिस्तर पर गईं... उसके कदम वहीं ज़मीन में गड़ गए।
सामने बिस्तर पर जो नज़ारा था, उसने 70 साल के इस बूढ़े हकीम के दिमाग की नसें सुन्न कर दी थीं।
लकड़द्दीन ने ज़िंदगी भर इस गाँव की औरतों का ही इलाज किया था, वही धूप में जली हुई, काली-कलूटी, खुरदरी और बेढंगी सी औरतें, जिनके जिस्म में कोई कशिश नहीं होती थी। लेकिन आज... आज उसके सामने बिस्तर पर शहर की एक मादक, गोरी और गदराई हुई औरत लेटी थी।

गुलाबी साड़ी में लिपटी कामिनी दर्द से कराहते हुए इधर-उधर मचल रही थी। दर्द के मारे वो अपना होंठ चबा रही थी। उसका वो मोम जैसा गोरा और भरा हुआ बदन, पसीने से चिपके हुए बाल, और ब्लाउज़ से झांकता वो उफनता हुआ यौवन, हकीम लकड़द्दीन को लगा जैसे आसमान से कोई अप्सरा सीधे उसके सामने इस चारपाई पर आकर गिर गई हो।

कामिनी की उस नंगी, गोरी और सुडौल पिंडली (calf) को देखकर, जहाँ मोच आई थी, लकड़द्दीन की आँखें फटी रह गईं। उसने कभी इतना साफ़ और चिकना जिस्म किसी औरत का देखा ही नहीं था।

हकीम लकड़द्दीन उस सुंदरता और कामुकता को निहारते हुए इतना मदहोश हो गया कि वो बाहर थूकना ही भूल गया। उसने एक ज़ोरदार 'गटक्क... गड़ब...' की आवाज़ के साथ वो मुँह में भरी पूरी पान की पीक अपने हलक के नीचे उतार ली। 

उसकी बकरा दाढ़ी कांपने लगी और आँखों में एक भूखी, लालची चमक तैर गई।
"ह... हाँ... हाँ... अभी... अभी देखते हैं मर्ज़ को," लकड़द्दीन ने हकलाते हुए अपना फटा हुआ चमड़े का बैग नीचे रखा। उसके कांपते हुए हाथ अब कामिनी के उस गोरे, चिकने पैर को छूने के लिए बेताब हो रहे थे।

"सलाम करते है बीवी जी, कबूल हो तो मर्ज का इलाज करे?"
कामिनी को कुछ समझ नहीं आ रहा था, वो बूढ़ा क्या कहना चाह रहा है.
"नन. न... नन... नमस्ते आअह्ह्हम्म्म्म...." कामिनी जितना समझी जवाब मे बोल पड़ी.

हकीम लकड़द्दीन की लालची आँखें कामिनी के उस गोरे, सूजे हुए पैर पर गड़ी थीं। उसने अपना फटा हुआ बैग ज़मीन पर रखा और अपने मैले पजामे को थोड़ा ऊपर खिसकाते हुए बिस्तर के बिल्कुल किनारे पर आकर बैठ गया।
सामने ही कामिनी दर्द से तड़प रही थी, उसके पैर लकड़द्दिन के पैरो को छू रहे थे.

"ज़रा पैर को ढीला छोड़िए... घबराने की कोई बात नहीं है," लकड़द्दीन ने अपनी बकरा दाढ़ी खुजाते हुए कहा।
कामिनी दर्द से बेहाल थी। फागुन उसके पास बैठी उसका हाथ पकड़े हुए थी और बंटी दरवाज़े के पास खड़ा सब कुछ बहुत गौर से देख रहा था।

लकड़द्दीन ने अपने खुरदरे और झुर्रियों वाले दोनों हाथों से कामिनी के उस नाज़ुक, गोरे पैर को टखने (ankle) के पास से पकड़ा। कामिनी के उस चिकने जिस्म को छूते ही हकीम के पूरे शरीर में एक गंदी सी बिजली दौड़ गई।
उसका बूढ़ा जिस्म पल भर को जवान महसूस करने लगा.
उसने जानबूझकर कामिनी के पैर को अपनी तरफ खींचा और अपनी दोनों जांघों के बीच में, बिल्कुल अपनी गोद के पास फंसा लिया। 

कामिनी दर्द से तड़प उठी, "आआह्ह... आराम से... दर्द हो रहा है।"
"बस... बस एक पल मोहतरमा," लकड़द्दीन ने कामिनी के चेहरे को देखा और फिर अचानक, बिना कोई मौका दिए... 'कट्ट!' एक बहुत ही तेज़ आवाज़ के साथ लकड़द्दीन ने कामिनी के पैर को एक झटके से खींच कर सीधा कर दिया।

"अअअअअअ... उफ्फ्फ्फ़ माँ!!" कामिनी के मुँह से एक चीख निकली और वो बिस्तर पर पीछे की तरफ गिर गई। फागुन ने उसे तुरंत सँभाला।
ऐसा लगा जैसे कामिनी की चीख से ये पूरी हवेली गिर पड़ेगी, 

वो झटका इतना तेज़ था कि कामिनी की आँखों से आँसू छलक आए, उसकी जिस्म मे गुस्से की तेज़ लहर कोंध गई, वो उस बूढ़े पर चिल्लाने ही वाली थी की........  अगले ही पल उसे उस भयंकर और चुभने वाले दर्द से एक अजीब सी राहत भी महसूस हुई। मुड़ी हुई हड्डी अपनी जगह पर बैठ चुकी थी। दर्द बहुत ज्यादा कम हो गया था, लेकिन वो लाल सूजन अभी भी वैसे ही थी।

"हड्डी बैठ गई है बीवी जी... बस अब इस पर थोड़ा मलहम और तेल लगा देते हैं," लकड़द्दीन ने अपने बैग से शीशे की एक पुरानी सी बोतल निकाली जिसमें कोई लाल रंग का तेल भरा था।

"ऐसा इलाज सिर्फ ये लकड़द्दिन ही कर सकता है" हकीम अपनी शान मे खुद ही क़सीदे पढ़ रहा था.

उसने अपनी हथेली पर वो तेल रगड़ा और कामिनी की उस लाल हो चुकी एड़ी और पिंडलियों (calves) पर बहुत ही धीमे-धीमे मलना शुरू कर दिया।

लकड़द्दीन वहीं सबके सामने बैठा था, लेकिन उसके हाथ का वो स्पर्श एक वैद्य या डॉक्टर वाला नहीं था। वो मालिश करने के बहाने कामिनी की उस भरी हुई और गोरी पिंडली को अपने अंगूठों से धीरे-धीरे सहला रहा था, दबा रहा था। उसका एक हाथ कामिनी की एड़ी पर था और दूसरा हाथ धीरे-धीरे खिसकता हुआ कामिनी के घुटने के बिल्कुल करीब पहुँच गया था।

कामिनी, जो अब तक दर्द के मारे आँखें बंद किए हुए थी, उसे धीरे-धीरे उस राहत का एहसास हो रहा था। लेकिन जैसे-जैसे हकीम के हाथों की वो रगड़ बढ़ रही थी, कामिनी को एक अजीब सी बेचैनी महसूस होने लगी।

उसे अचानक एहसास हुआ कि उसका पैर कहाँ रखा है। उसका वो नंगा पैर लकड़द्दीन की दोनों जांघों के बीच, बिल्कुल उसके उस हिस्से के पास मचल रहा था। हकीम जानबूझकर मालिश करते हुए कामिनी के तलवे को अपनी जांघों के बीच पर रगड़ रहा था।

ना जाने कितने बरसो बाद ये बहार आई थी, लकड़द्दिन के लंड ने कब ऐसी हरकत की थी उसे याद ही नहीं था.
हकीम का लंड एक उभार सा बनाने लगा, 
जहाँ कामिनी के तलवे उसे दबा रहे थे.

कामिनी के जिस्म में अचानक एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई। दर्द से राहत के उस पल में, एक मर्द के इस अनचाहे और इतने करीब वाले स्पर्श ने कामिनी के अंदर एक उलझन पैदा कर दी

 ये कोई ऐसा एहसास नहीं था जिसे वो चाहती थी, लेकिन उस बूढ़े की वो गंदी नीयत और वो रगड़ कामिनी के दिमाग को सुन्न कर रही थी। उसे वहाँ एक अजीब सा 'भारीपन' महसूस हो रहा था, जो उसे बहुत असहज (uncomfortable) कर रहा था।

कामिनी ने घबराकर अपनी आँखें खोलीं। उसने देखा कि लकड़द्दीन की वो भूखी और गंदी नज़रें उसके पैर से होती हुई उसकी छाती तक आ रही थीं।

कामिनी ने तुरंत अपने पैर को पीछे खींचने की कोशिश की, "ह... हो गया काका... अब आराम है मुझे।"
कामिनी खुद को इस दलदल मे गिरने से बचाना चाहती थी.
अब तक जो हुआ सो हुआ, लेकिन अब वो वापस से ये सब नहीं चाहती थी.
उसका दिमाग़ इसे रोकना चाहता था, लेकिन जिस्म का क्या वो तो चिंगारी पकड़ चूका था.

लेकिन लकड़द्दीन ने उसका पैर अपनी जांघों के बीच से नहीं छोड़ा। "अरे... अभी कहाँ आराम? अभी तो नस को और खोलना है बहुरानी," लकड़द्दीन ने अपनी पीक भरी मुस्कान के साथ कहा और अपने हाथों की पकड़ कामिनी के पैर पर और मज़बूत कर दी।
और थोड़ा आगे को खसक गया, जिस से कामिनी का पैर उसकी जांघो के बीच बुरी तरह से धस गया.

आअह्ह्ह.... इससससस..... कामिनी सिसक उठी उस बेलनाकार मजबूत अंग की गर्मी महसूस कर के.
"कक्क... क्या हुआ माँ जी दर्द है अभी?" फागुन ने चिंता से पूछा.
"ननन... नहीं...वो.. वो... हाँ थोड़ा दर्द है अभी.
दरवाजे पर खड़ा बंटी मुस्कुरा दिया, और पलट के बहार को चल दिया.
आखिर बंटी अपनी माँ को अच्छे से जानता था.
*******************

कमरे की हवा एकदम भारी और गर्म हो चुकी थी। उस पुराने, लाल रंग के तेल की एक अजीब सी, नशीली और तीखी महक अब हवेली के उस कमरे के कोने-कोने में बस चुकी थी।

हकीम लकड़द्दीन के खुरदरे, झुर्रियों वाले हाथ कामिनी की गोरी, सूजी हुई एड़ी पर किसी लोहे के शिकंजे की तरह कसे हुए थे।

"ये तेल सीधा नसों में उतरता है बीवी जी... दर्द को जड़ से खींच लेगा," लकड़द्दीन ने अपनी पीक भरी आवाज़ में फुसफुसाते हुए कहा, लेकिन उसकी नज़रें कामिनी के चेहरे पर पसरी हुई उस अजीब सी बेचैनी को पढ़ रही थीं।

कामिनी का दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। उसकी आँखें आधी बंद थीं। जैसे-जैसे हकीम के हाथ उसकी एड़ी से ऊपर पिंडलियों (calves) की तरफ बढ़ रहे थे, उस तेल की गर्माहट कामिनी की त्वचा को जलाते हुए अंदर तक एक अजीब सी सिहरन पैदा कर रही थी।

 हकीम के हाथों में एक बहुत ही सधा हुआ और पुराना तजुर्बा था। वो नसों को इस तरह दबा रहा था कि दर्द की वो टीस अब एक बहुत ही अजीब और मीठे से भारीपन में बदल रही थी।

लकड़द्दीन की उँगलियाँ किसी मंझे हुए शिकारी की तरह कामिनी के चिकने जिस्म पर रेंग रही थीं। कामिनी का दिमाग बार-बार उसे चेतावनी दे रहा था। वो उस 70 साल के बूढ़े की उन भूखी और लालची आँखों की तपिश को अपने जिस्म पर साफ़ महसूस कर रही थी।

 उसे महसूस होने लगा, ये बूढ़ा अभी ऐसा ही करता रहा तो पक्का वो अपनी टांगे फैला देगी, उसकी जांघो के बीच गिलापन महसूस होने लगा.
कल सुबह से वहाँ सूखा पड़ा था, लेकिन अब जैसे मानसून की पहली बून्द रेगिस्तान मे पड़ी हो.

उसका पैर अभी भी लकड़द्दीन की दोनों जांघों के बीच में फंसा हुआ था। कामिनी खुद को इस दलदल में गिरने से बचाना चाहती थी। 
वहाँ शहर मे घर की चारदीवारी मे रमेश की नपुंसकता और तीन तीन मर्दो के स्पर्श ने उसे बेकाबू कर दिया था.

अब उसका जिस्म किसी भी मर्द की छुअन पर एक अजीब सा, बागी रिएक्शन देने लगा था।

वो बूढ़ा हकीम जानबूझकर अपने हाथों का दबाव बढ़ा रहा था,  हर बार जब हकीम आगे की तरफ झुककर मालिश का दबाव बढ़ाता, कामिनी के तलवों पर उस 'अजीब सी कठोरता' की रगड़ साफ़ महसूस होती।

ये कोई ऐसा एहसास नहीं था जिसे कामिनी चाहती थी। उसका दिमाग चीख रहा था कि इस बूढ़े को अभी लात मारकर दूर फेंक दे, लेकिन वो लाल तेल की जलन, वो लगातार होती रगड़ और उस दर्द में छिपा हुआ वो नशा... उसके जिस्म ने जैसे उसके दिमाग से बगावत कर दी थी।

"आअह्ह्ह.... इस्सससस....." कामिनी के मुँह से दर्द और एक अनजानी सी घुटन में लिपटी हुई सिसकी निकल गई। उसके माथे पर पसीने की बारीक बूँदें चमकने लगी थीं और साँसों की गति तेज़ होने से उसका भरा हुआ सीना तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहा था।

पास ही बैठी फागुन, जो दुनियादारी और मर्दों की इस गंदी नीयत से बिल्कुल अनजान थी, वो कामिनी का पसीने से तर चेहरा देखकर घबरा गई।

"कक्क... क्या हुआ माँ जी? दर्द बढ़ गया क्या?" फागुन ने बहुत ही मासूमियत और चिंता से पूछा।
"मोहतरमा का दर्द बहार निकल रहा है बिटा, चिंता ना करो... बस दो पल और " जवाब लकड़द्दिन ने दिया.

कामिनी ने हड़बड़ा कर अपनी आँखें खोलीं। फागुन का वो मासूम और डरा हुआ चेहरा देखकर कामिनी को खुद पर घिन सी आई। वो एक माँ होने का फ़र्ज़ निभाना चाहती थी, लेकिन अपना ही जिस्म उसके कंट्रोल से बाहर हो रहा था।

 कामिनी ने जैसे-तैसे खुद को सँभालते हुए अपने कांपते हाथों से साड़ी के पल्लू को खींचकर अपनी छाती पर ठीक किया।

लकड़द्दीन की उँगलियाँ रुकने का नाम नहीं ले रही थीं। वो कामिनी के बदलते हुए हाव-भाव, उसकी भारी होती साँसों और उसकी आँखों में तैरती उस बेबसी को बहुत अच्छे से पहचान रहा था। एक उम्र गुज़ारी थी उसने औरतों की कमज़ोरी टटोलने में।

"बीवी जी, वो क्या है ना... कि जब तक कस के ना दबाओ, तो दर्द अंदर ही बना रहता है। और ये लकड़द्दीन दर्द को अंदर नहीं रहने देता," हकीम ने अपनी बकरा दाढ़ी खुजाते हुए एक बहुत ही शातिर बात कही।

उसने कामिनी की एड़ी को अपनी पकड़ में और मज़बूत कर लिया और अपने जिस्म को थोड़ा और आगे खिसका दिया, जिससे कामिनी का पैर उसकी उस 'गर्माहट' में और गहराई तक धंस गया।

"ये दर्द पानी की तरह बहार बहकर निकल जायेगा " लकड़द्दिन जैसे सब देख रहा हो.
पानी बहार निकलने की बात सुनते ही कामिनी की आंखे चौड़ी हो गई, उसने अपनी जांघो को कस कर भींचना चाहा.
"अंम्म्म्म... बीवी जी ढीला छोडो, बहार निकलने दो दर्द को, जितना कसोगी उठी ही तकलीफ होंगी.
कामिनी हैरान थी ये आदमी कैसे उसके जिस्म की बात को समझ रहा है.

कामिनी ने अपने होंठों को दाँतों तले कसकर दबा लिया ताकि उसके मुँह से कोई और सिसकी या कराह ना निकल जाए। कमरे का सन्नाटा सिर्फ कामिनी की भारी साँसों और तेल के रगड़ने की 'चप-चप' आवाज़ से टूट रहा था।
कामिनी ने जिस्म को ढीला छोड़ दिया, उसका जिस्म जवाब दे गया था.....
उसने स्वीकार कर लिया था, ईईस्स्स्स......
की तभी....
लो हो गया बीवी जी...
"कामिनी ने हैरानी से हकीम लकड़द्दिन को घुरा, जब उसने चाहा की वो मालिश करे तो उठ के चल दिया.
कामिनी की आँखों मे सुनापन दिख रहा था.
"बीवी जी... एक मालिश रात मे भी करनी पड़ेगी " लकड़द्दिन के शब्द कामिनी के जिस्म को भेदने लगे.
वो अजीब परिस्थिति मे थी.
अभी जहाँ उसे हकीम का मालिश छोड़ना बुरा लग रगु था, वही दूसरे ही पल उसका रात मे वापस मालिश करने की बात से दिल धड़कने लगा "नहीं वापस नहीं..."
"ये लो बीवी जी दो चम्मच गर्म पानी मे डाल के पी लेना आराम आएगा " लकड़द्दिन ने एक कांच की शीशी फागुन की तरफ बढ़ा दी.
पीला सा कुछ भरा पड़ा था.
"अच्छा चलता हूँ सलाम कर रिया हूँ बीवी जी को " हकीम पान चबाता मुड़ के चल दिया, कमर झुकाये, कमर पर हाथ रखे, धीमी चल से.
कामिनी उसे देखती ही रह गई.
"क्या जादुई इंसान था " कामिनी ने महसूस किया दर्द अब नाम मात्र का ही था.
बस सूजन नजर आ रही थी.
"माँ जी बहुत पुराने हकीम है यहाँ के " फागुन ने कामिनी का हैरान चेहरा देख कर कहाँ.
"अच्छा आप आराम करो मै काम कर लू थोड़ा"
फागुन बहार चल दी.
कमरे मे बचे सिर्फ कामिनी और उसकी उत्तेजना, उसका सुलगता जिस्म.
ना जाने उसे क्या हो गया था, अपने जिस्म पर काबू भी नहीं राख पा रही थी.
चिपचिपापन महसूस हो रहा था जांघो के बीच.
एक बूढ़े बे उसे उत्तेजित कर दिया था.

क्रमशः.....


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3 Comments

  1. To agla number hakim ka hai
    Bahot maja ayega
    Ye hakim kamini ki faad dale to kya baat hai
    Raat ka scene dhamakedar ho
    Koi kadar nahi chodna

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  2. लकड़द्दिन to hakim hai
    Wo dard dega to dard to dawai bhi uske pass hogi
    Raatvko maalish kamini ki yaadgaar raat bana do

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    1. Mast update
      Kamini ek baar kadar ko jhel chuki hai to is bakri dhadhi wale ko khush kar degi

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