मेरी माँ कामिनी 2.0 - अध्याय 3
धूल उड़ाती हुई टैक्सी किशनगंज के उस विशाल लोहे के गेट से अंदर घुसी। फार्महाउस की आलीशान बनावट, ऊँची दीवारें और वो शाही रुतबा देखकर बंटी और कामिनी की आँखें फटी की फटी रह गईं। रमेश ने शहर में रहकर जो दौलत कमाई थी, उसका असली रूप आज इस गाँव में दिख रहा था।
टैक्सी आँगन में आकर रुकी।
आँगन के बीचों-बीच ताईजी की लाश सफ़ेद कफ़न में लिपटी हुई ज़मीन पर रखी थी। आस-पास गाँव की औरतों की भीड़ थी।
रमेश जैसे ही कार से उतरा, उसके पैर लड़खड़ा गए। वो शहर का खूंखार और बेरहम आदमी, जो किसी की जान लेने, मारने पीटने से पहले दो बार नहीं सोचता था, आज ताईजी की लाश को देखकर एक छोटे बच्चे की तरह टूट गया। वो भागकर लाश के पास गया और घुटनों के बल गिरकर फूट-फूट कर रोने लगा।
वाकई, रमेश आज अंदर तक दुखी था। ताईजी उसके लिए सिर्फ एक रिश्तेदार नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी राजदार, उसकी ढाल और उसके हर पाप की गवाह थीं। उनके रहते रमेश को कभी अपने घर या अपने काले कारनामों की फ़िक्र नहीं करनी पड़ी थी। ताईजी ने 1990 की उस खौफनाक रात से लेकर आज तक सब कुछ बखूबी संभाला था। बंटी ने आगे बढ़कर अपने रोते हुए बाप के कंधे को सहारा दिया।
लेकिन... कामिनी की नज़रें रमेश पर नहीं थीं।
उसकी नज़र लाश के दूसरे छोर पर बैठी एक 18-19 साल की लड़की पर जाकर अटक गई। वो लड़की रमेश से भी ज़्यादा बेतहाशा रो रही थी और ताईजी की लाश से ऐसे लिपटी हुई थी जैसे उसकी पूरी दुनिया उजड़ गई हो।
उसने एक बहुत ही सादा सा सलवार-सूट पहना हुआ था, लेकिन उस सादेपन में भी उसका जिस्म अपनी उम्र से कहीं ज़्यादा भरा हुआ और गदराया सा लग रहा था।
कामिनी उस लड़की को जानती तक नहीं थी, लेकिन उसे इस तरह तड़पता हुआ देखकर कामिनी के अंदर कुछ ऐसा टूटा, जिसे वो खुद भी समझ नहीं पाई। ना जाने क्यों, अनजाने में ही कामिनी के कदम उस अनजान लड़की की तरफ खिंचते चले गए। एक अजीब सी कशिश थी, जैसे कोई अदृश्य धागा उसे अपनी तरफ खींच रहा हो।
कामिनी ने पास जाकर धीरे से अपना हाथ उस लड़की के कांपते हुए कंधे पर रखा।
जैसे ही कामिनी ने उसे छुआ... धड़क! कामिनी का दिल जैसे एक पल के लिए धड़कना भूल गया। उसे एक ऐसा अनजाना और गहरा एहसास हुआ जैसे उसने किसी गैर को नहीं, बल्कि खुद के ही किसी हिस्से को छू लिया हो।
ताईजी की मौत का कामिनी को कोई खास दुख नहीं था, लेकिन इस अनजान लड़की की सिसकियाँ सुनकर कामिनी की आँखों में भी आँसुओं का समंदर उमड़ आया।
"चुप हो जा बेटा... होनी को कौन टाल सकता है," कामिनी ने रुंधे हुए गले से उसे सांत्वना दी।
वो लड़की जैसे किसी सहारे की तलाश में थी। वो तुरंत पलटी और कामिनी के गले से लिपट गई।
"उउउफ्फफ्फ्फ़...!" जैसे ही उन दोनों के जिस्म एक-दूसरे से टकराए, कामिनी के पूरे बदन में रोंगटे खड़े हो गए। एक ऐसा 'अपनापन', एक ऐसी 'ममता' की भयानक लहर कामिनी के सीने में उठी जो उसने इतने सालों में बंटी को पालते हुए भी शायद कभी इतनी शिद्दत से महसूस नहीं की थी।
खून अपनी ही रगों को पहचान रहा था, बस दिमाग इस सच से अनजान था। कामिनी ने उस लड़की को अपने सीने से और कसकर लगा लिया और उसकी आँखों से बेतहाशा आँसू झरने लगे।
मातम के इस सन्नाटे और उन दोनों के इस अनकहे मिलन के बीच... एक बहुत ही भारी, खुरदरी और रोबदार आवाज़ गूंजी।
"बस कर रमेश... शाम होने वाली है। जल्दी चलो..."
65 साल के ताऊजी की आवाज़ गूंज उठी.
ताऊजी के आदेश पर ताईजी की अर्थी को कंधा दिया गया। "राम नाम सत्य है" की गूंज के साथ रमेश और बंटी अर्थी के पीछे-पीछे श्मशान की तरफ चल दिए। आखिर रमेश उसका बाप था और इस वक़्त वो सच में सदमे में था।
मर्द सारे श्मशान की तरफ जा चुके थे। पीछे फार्महाउस के उस बड़े से आँगन में अब सिर्फ औरतों की भीड़ रह गई थी... और उसी भीड़ के बीच, वो नाज़ुक सी लड़की अभी भी कामिनी के सीने से लिपटी हुई सुबक रही थी।
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सूरज ढल चुका था और किशनगंज के उस आलीशान फार्महाउस पर एक वीरान, उजड़ा हुआ सा सन्नाटा पसर गया था। श्मशान से लौटने के बाद सब लोग अपने-अपने घर जा चुके थे। आँगन में अब सिर्फ रमेश का परिवार और गाँव की वो दो-चार महिलाएँ बैठी थीं, जो शायद इन्हीं के खेतों में काम करती थीं।
मातम वाले घर में आज चूल्हा नहीं जलना था।
तभी एक अधेड़ उम्र की महिला ने बंटी की तरफ देखते हुए कहा, "छोटे बाबू... आज हमारे घर आ जाना खाना खाने। बच्चा है, भूखा कैसे रहेगा रात भर?"
बंटी, जो इस देहाती माहौल और इस अजीब सी हवेली में खुद को एकदम फंसा हुआ महसूस कर रहा था, उसने बिना कुछ बोले बस धीरे से हाँ में सिर हिला दिया।
कामिनी भी यहाँ एकदम अनजान और गुमसुम सी बैठी थी।
तभी रमेश ने पास ही एक बड़ी सी चारपाई पर बैठे उस भारी-भरकम इंसान की तरफ इशारा किया।
"कामिनी... ये ताऊजी हैं।"
कामिनी एक घरेलू और संस्कारी औरत थी। उसने अपने आँसुओं को पोंछा और उठकर ताऊजी के पैर छूने के लिए आगे बढ़ी। कामिनी जैसे ही उनके खुरदरे पैरों को छूने के लिए नीचे झुकी... शाम के उस मद्धम अँधेरे में उसकी साड़ी का पल्लू उसके कंधे से सरक कर थोड़ा नीचे गिर गया।
कामिनी के वो गोरे, उन्नत और सुडौल स्तन उस गहरे गले वाले ब्लाउज़ से एकदम छलक कर ताऊजी की नज़रों के सामने आ गए।
65 साल के उस घाघ ताऊजी की भूखी आँखें एक ही सेकंड में कामिनी की उस गहरी घाटी (Cleavage) में उतर गईं। मातम का घर था, सामने लाश जल कर आई थी, लेकिन ताऊजी के अंदर का वो 'ठरकीपना' कामिनी के उस भरे हुए जिस्म को देखकर जाग उठा था।
ताऊजी ने आशीर्वाद देने के बहाने अपना भारी, लोहे जैसा खुरदरा हाथ कामिनी की गोरी, नंगी पीठ पर रखा... और उसे बहुत ही अजीब और मादक तरीके से सहला दिया।
"खुश रहो बहू..." ताऊजी की खुरदरी आवाज़ में एक अजीब सी हवस थी।
कामिनी के बदन में एक सिहरन सी दौड़ गई। वो अचानक बहुत असहज (Uncomfortable) हो गई। उस छुअन में बड़ों वाला आशीर्वाद नहीं, बल्कि एक मर्द वाली 'पकड़' थी। लेकिन कामिनी ने खुद को सँभाला और उस बात पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। उसने सोचा कि शायद पत्नी (ताईजी) के गुज़र जाने के गम में ये बुज़ुर्ग होश में नहीं हैं।
कामिनी वापस आकर पलंग पर बैठ गई। उसकी नज़रें अभी भी उस लड़की पर अटकी थीं, जो एक कोने में गुमसुम सी बैठी थी।
"त... तुम कौन हो बेटा?" कामिनी ने बेहद प्यार से पूछा।
रमेश ने एक ठंडी साँस छोड़ते हुए कहा, "ये फागुन है। अनाथ थी बेचारी... ताईजी को कहीं खेत मे बेसहारा मिली थी ये नवजात.
आगे बात ताऊजी ने बढ़ाई " तेरी ताईजी ने ही इसे सहारा दिया, इस घर में रखा और पाला-पोसा। ताईजी ही इसकी माँ-बाप, सब कुछ थीं।"
कामिनी ने जी भर के एक बार फागुन के उस मासूम, लेकिन गदराए हुए चेहरे को देखा।
"कितना सुंदर नाम है तुम्हारा... फागुन। बिल्कुल तुम्हारी तरह।" कामिनी के मुँह से बेतहाशा प्यार छलक रहा था।
फागुन कुछ ना बोली। वो बस अपनी नम आँखों से कभी कामिनी को देखती, तो कभी हवेली के ऊपर उस खुले, सूने आसमान को... जैसे ताईजी के जाने से उसका पूरा जहान उजड़ गया हो।
तभी ताऊजी की भारी आवाज़ ने उस सन्नाटे को तोड़ा।
"जा बेटा बंटी... रात हो जाएगी। यहाँ गाँव में सब जल्दी खाना खा कर सो जाते हैं। कमला के घर जा और खाना खा आ।"
बंटी हैरान रह गया। वो शहर का लड़का क्या जाने कि कमला कौन है, उसका घर कहाँ है, और गाँव की इन भूलभुलैया जैसी कच्ची पगडंडियों पर कैसे जाना है?
बंटी घबराहट में कभी कामिनी को देखता, तो कभी ताऊजी को।
तभी... उस सन्नाटे में एक बहुत ही सुरीली आवाज़ गूंजी।
"छोटे बाबू... मैं ले चलती हूँ आपको।"
ये फागुन थी। आज के दिन उसने पहली बार अपना मुँह खोला।
उफ्फ्फ्फ़...! कामिनी तो जैसे सुन्न रह गई। फागुन की आवाज़ में इतनी मिठास, इतनी नज़ाकत और इतनी कशिश थी कि कामिनी का ध्यान फागुन के चेहरे से हट ही नहीं रहा था। लगता था जैसे कोई माँ अपनी ही बेटी की आवाज़ सुन रही हो, कामिनी का दिल अंदर ही अंदर मोम की तरह पिघल रहा था।
फागुन अपनी जगह से उठी और हवेली के भारी लोहे के गेट की तरफ चल दी। बंटी चुपचाप उसके पीछे-पीछे हो लिया।
"आइए ताऊजी... छत पर चलते हैं।" रमेश ने ताऊजी की तरफ इशारा किया। दोनों मर्द हवेली के अंदर सीढ़ियों की तरफ बढ़ गए। आज रात छत पर शराब के साथ कई पुराने राज़ और नए पाप खुलने वाले थे।
अब नीचे आँगन में कामिनी अकेली रह गई थी।
रमेश के जाते ही, आस-पास बैठी गाँव की वो महिलाएँ खिसक कर कामिनी के बिल्कुल पास आ गईं और उन्होंने कामिनी को चारों तरफ से घेर लिया।
शहर की इतनी गोरी, खूबसूरत और भरे-पूरे जिस्म वाली औरत को वो पहली बार इतने करीब से देख रही थीं। उनकी आँखों में एक अजीब सा कौतूहल (Curiosity) था।
"कैसी है? कौन है? इतने सालों में पहले कभी गाँव क्यों नहीं आई?" औरतों की वो कानाफूसी और उनके चुभते हुए सवाल अब कामिनी को घेरने वाले थे।
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हवेली के बाहर कच्चे रास्ते पर सिर्फ चाँद की ठंडी रौशनी बिछी हुई थी और दोनों तरफ ऊंचे-ऊंचे खेतों का सन्नाटा था। फागुन आगे-आगे चल रही थी और शहर का पला-बढ़ा बंटी उसके ठीक पीछे।
चाँदनी रात में फागुन की वो भरी हुई, मटकती हुई देहाती चाल बंटी के दिमाग की नसें ढीली कर रही थी। फागुन के हर कदम के साथ उसकी चौड़ी गांड की वो गोलाई एक अजीब सी लय में हिल रही थी। बंटी की नज़रें फागुन के उस गदराए हुए पिछले हिस्से से हट ही नहीं पा रही थीं। वो मन ही मन इस गाँव की आबोहवा और फागुन के इस कुदरती हुस्न को सराह रहा था। आज बंटी के जिस्म में एक अजीब सी बिजली दौड़ रही थी, कुछ ऐसा जो उसने शहर की मॉर्डन लड़कियों को देखकर भी कभी महसूस नहीं किया था।
अपनी इस हवस और दिमाग में उठ रही उलझन को सुलझाने के लिए बंटी ने अचानक पूछा
"अच्छा फागुन... तुम हो कौन? मेरा मतलब... इस फार्महाउस में कैसे?"
फागुन के कदम एकदम से ठिठक गए। वो अचानक से चौंक गई, जैसे किसी गहरी सोच से बाहर आई हो।
"वो... वो... छोटे बाबू..." फागुन बोलते-बोलते रुक गई, जैसे उसे अपने वजूद का कोई बहुत गहरा खालीपन याद आ गया हो।
"मैं बचपन से ही यहाँ हूँ। इसी गाँव की हूँ," फागुन ने बिना पलटे, एक बहुत ही सीधा और छोटा सा जवाब दिया।
"मतलब तुम्हारे माँ-बाप कौन हैं? और ताईजी तुम्हारी क्या लगती थीं?" बंटी भी अपनी जगह पर रुक गया। दोनों अब उस सुनसान पगडंडी पर आमने-सामने खड़े थे।
बंटी जानना चाहता था फागुन ताईजी की क्या लगती है?
ताईजी का नाम सुनते ही फागुन के चेहरे के भाव एकदम बदल गए। उसका दिल रुआंसा हो गया।
"सुबुक... ताईजी ही तो सब कुछ थीं मेरा... मेरे माँ-बाप, मेरा जहान, सब वही थीं..." फागुन फूट-फूट कर रोने लगी।
उसने रोते हुए अपनी चुन्नी (दुपट्टे) को उठाया और अपने आँसू पोंछने लगी। चुन्नी हटने की वजह से उसके वो उन्नत और सुडौल स्तन उस सादे से कुर्ते को फाड़कर बाहर झांकने को बेताब हो गए।
चाँद की रौशनी में उन भारी गोलाइयों का वो उभार देखकर बंटी की साँसें अटक गईं। बंटी के दिल और दिमाग में फागुन का वो मासूम, रोता हुआ चेहरा और उसका वो कातिलाना, कामुक जिस्म गहराई तक उतरता जा रहा था।
फागुन ने आँसू पोंछे और वापस आगे की तरफ चल दी। बंटी ने फिर से उसे कुरेदना शुरू किया।
"तो... इसका मतलब ये फार्महाउस, ये ज़मीन... ये सब कुछ तुम्हारा है?" बंटी कुछ और ही राज़ जानना चाहता था।
फागुन पलटी और एक अजीब सी बेबसी के साथ मुस्कुराई।
"क्या छोटे बाबू... पहले खाना तो खा लो, बहुत सवाल करते हैं आप। मुझे क्या पता ये ज़मीन किसकी है? पता है... मैंने तो आज तक शहर देखा ही नहीं है। बस इसी हवेली की चारदीवारी, यहाँ के खेत, और ताईजी की सेवा... यही मेरा सब कुछ था।"
फागुन के चेहरे पर अचानक एक गहरी चिंता की लकीर तैर गई... ना जाने कल क्या होगा? हवेली में अब ताईजी नहीं थीं, और ताऊजी की वो गंदी नज़रें फागुन को भी डराती थीं। बंटी ने फागुन के चेहरे पर वो डर साफ़ महसूस किया।
बंटी शायद आगे कुछ और पूछता कि फागुन ने सामने इशारा किया।
"लो... कमला काकी का घर आ गया। वो सामने..."
सामने ही एक कच्चा-पक्का मकान था जिसके बाहर दालान में एक पीला सा बल्ब जल रहा था। दोनों जैसे ही पास पहुँचे...
"फागुन... मेरी बहन... तू ठीक तो है ना?" घर के अंदर से एक जवान लड़की आँधी की तरह भागती हुई आई और सीधा फागुन के गले से जा लगी।
उन दोनों लड़कियों के आपस में टकराते ही, उनके भरे हुए स्तन एक-दूसरे से कसकर दब गए और उनकी गोलाइयाँ कुर्ते के बाहर की तरफ उछल पड़ीं। बंटी की आँखें फटी की फटी रह गईं।
"साला... इस गाँव की तो हर लड़की एकदम माल है बे!" बंटी ने मन ही मन खुद से बात करते हुए अपने पैंट के ऊपर से ही अपने उस कड़े हो चुके लंड को थोड़ा एडजस्ट किया। गाँव के इस नंगे यौवन ने बंटी का सारा शहरी गुरूर चूर-चूर कर दिया था।
"मैं ठीक हूँ प्रमिला..." फागुन ने अपनी सहेली को गले से लगाया।
फिर उसने मुड़कर अपनी चहकती हुई, सुरीली आवाज़ में कहा, "आइए छोटे बाबू... ये मेरी पक्की सहेली है प्रमिला। और प्रमिला, ये हैं छोटे बाबू... शहर से आए हैं, रमेश बाबू के बेटे।"
पीले बल्ब की उस मद्धम रौशनी में बंटी को फागुन की कोई बात सुनाई नहीं दे रही थी। उसकी नज़रें सिर्फ फागुन के उन लाल, रसीले होंठों पर जमी हुई थीं।
असल में... बंटी के दिमाग में एक भयानक साइकोलॉजिकल खेल चल रहा था। वो हमेशा से अपनी 'माँ' कामिनी की उस गदराई हुई जवानी और उसके चौड़े जिस्म की तरफ आकर्षित था। और आज, वही मादकता, वही कशिश और कामिनी का वही अक्स उसे फागुन में साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा था। फागुन बिल्कुल कामिनी की ही परछाई लग रही थी।
उसी हवस और सम्मोहन में डूबा हुआ बंटी, किसी चाबी भरे रोबोट की तरह फागुन के पीछे-पीछे उस देहाती झोपड़ी के अंदर चला गया।
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हवेली की उस चौड़ी और अँधेरी छत पर सिर्फ चाँद की मद्धम रौशनी और हवा की सनसनाहट थी। छत के एक कोने में रमेश और ताऊजी बैठे थे। बीच में कच्ची शराब की बोतल और दो गिलास रखे थे।
"सुबुक... मेरी सुगंधी... मेरी बीवी चली गई..." 65 साल का वो भारी-भरकम ताऊजी अपने हाथों में मुँह छुपाकर घड़ियाली आँसू बहा रहा था।
"गुटूक... गटक... आआह्ह..." रमेश ने बिना पानी मिलाए शराब का एक कड़वा घूंट सीधे हलक के नीचे उतारा और गिलास ज़मीन पर पटक दिया।
"अबे बस कर अपना ये ढोंग... साले मादरचोद!" रमेश की आँखें नशे और गुस्से से लाल सुर्ख हो गईं। "साले ताऊ... क्या मैं तुझे जानता नहीं हूँ? जब ताईजी को तेरी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, जब वो बच्चा पैदा नहीं कर पाई थी, तब तो तूने और तेरे खानदान ने उसे धक्के मार कर घर से निकाल दिया था! मरने के लिए छोड़ दिया था उसे सड़कों पर... और आज साले रो रहा है?"
ताऊजी ने डरते हुए अपना रोना बंद किया और कांपते हाथों से अपना पेग बनाते हुए बोला, "रमेश बेटा... ऐसा मत बोल। सच में दुख तो बहुत हो रहा है... आख़िर बीवी थी मेरी वो।"
"हट साले! बीवी थी...?" रमेश ने ज़मीन पर थूकते हुए कहा।
रमेश के सामने ताऊजी की हैसियत इस हवेली के एक मामूली नौकर से ज़्यादा कुछ नहीं थी। वो जो चौड़ा सीना, सफेद मूंछें और भारी आवाज़ थी... वो सब सिर्फ गाँव वालों को डराने के लिए एक खोखला दिखावा था। असलियत में ताऊजी एक बुज़दिल चूहा था।
सालों पहले, जब ताऊजी एकदम कंगाल और बेसहारा हो गया था, तब उसे कहीं से भनक लगी थी कि उसकी वो निकाली हुई बीवी सुगंधा (ताईजी) अब कोई बेचारी औरत नहीं रही। उसने सुना था कि किशनगंज में उसका एक आलीशान फार्महाउस है और उसके पास बहुत माल आ गया है। ये सुनकर वो लालची कुत्ता अपनी दुम दबाकर इस हवेली तक उसे ढूंढता-खोजता चला आया था।
लेकिन ताईजी अब वो पुरानी, भोली-भाली सुगंधा नहीं रह गई थी। 1990 की उस खौफनाक रात के बाद से ताईजी का जीवन पूरी तरह बदल गया था।
रमेश और शमशेर के साथ मिलकर उन्होंने जो दौलत और रुतबा कमाया था, उससे ताईजी का गाँव में बहुत बड़ा नाम हो गया था। सरपंच से लेकर गाँव का हर बड़ा आदमी ताईजी को इज़्ज़त की नज़र से देखता था। सब यही मानते थे कि ताईजी बाहर से आई कोई बहुत बड़ी हस्ती हैं।
जब आज से 4 साल पहले ताऊजी इस हवेली की चौखट पर भिखारी बनकर आया था, तो रमेश उसे देखकर आगबबूला हो गया था। वो तो उसे उसी वक़्त गोलियों से भून देना चाहता था। लेकिन वो ताईजी की ही विनती और उनका बड़कपन था कि उन्होंने अपने उस पापी पति को इस हवेली के एक कोने में टुकड़े तोड़ने के लिए रख लिया था।
रमेश ने सिगरेट सुलगाई और ताऊजी को घूरते हुए बोला, "तेरी ये गंदी नज़रें शुरू से ही उस फागुन पर हैं ना? साले बुड्ढे... भूल गया कि ताईजी ने तुझे क्या चेतावनी दी थी?"
ताऊजी का सिर शर्म और डर से झुक गया।
पूरा गाँव जानता था कि ताईजी को फागुन से कितना विशेष प्रेम था। फागुन इस हवेली की जान थी और ताईजी ने उसे एक ढाल की तरह छुपा कर रखा था।
किसी की भी हिम्मत नहीं थी कि फागुन की तरफ एक गलत नज़र भी उठा ले। लेकिन अब... अब ताईजी नहीं रही थीं। ताऊजी के अंदर का वो भूखा भेड़िया आज़ाद हो चुका था और फागुन का वो डर एकदम जायज़ था।
"अच्छा... अब ये पुरानी बकवास बंद कर और काम की बात सुन बे ताऊ..." रमेश ने अपनी आवाज़ को एकदम खूंखार और नीचा करते हुए एक कड़क आर्डर मारा।
"वो तहखाने की चाबी कहाँ रखी है!"
तहखाने का नाम सुनते ही ताऊजी के चेहरे का वो बचा-खुचा रोब भी मुरझा कर झड़ गया।
"ये... ये ले बाबू... मेरे पास ही है।" ताऊजी ने कांपते हुए अपनी धोती की डब (कमर) से एक पुरानी, भारी और जंग लगी लोहे की चाबी निकाली।
"आज सुबह ही... तेरी ताई ने मरने से पहले मुझे दी थी... ताकि मैं तुझे दे सकूँ।"
रमेश ने चील की तरह झपट्टा मारा और उस चाबी को अपने कब्ज़े में ले लिया। चाबी मुट्ठी में आते ही रमेश के चेहरे पर एक शैतानी और लालची मुस्कान तैर गई। उसने फिर से शराब की बोतल मुँह से लगा ली।
वो रोबदार, भारी-भरकम ताऊजी अब सच में रमेश के सामने एक भीगी बिल्ली बना बैठा था। हवेली के नीचे बने उस अँधेरे 'तहखाने' में ऐसा कौन सा पाप, ऐसा कौन सा राज़ दफ्न था... जिसकी चाबी ताईजी आख़िरी साँस तक अपने सीने से लगा कर रखती थीं?
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फार्महाउस के विशाल आँगन से गाँव की वो इक्का-दुक्का औरतें भी अब धीरे-धीरे अपने घरों की तरफ लौट चुकी थीं। पूरे फार्महाउस पर एक वीरान, उजड़ा हुआ और काटने वाला सन्नाटा पसर गया था। बंटी और फागुन पहले ही जा चुके थे, और रमेश छत पर ताऊजी के साथ शराब में डूबा था।
नीचे आँगन में अब कामिनी बिल्कुल अकेली थी।
दिन भर की गहमागहमी और अर्थी के उस मातम में कामिनी का दिमाग भटका हुआ था, लेकिन अब... जैसे ही वो सन्नाटा छाया, कामिनी के पूरे जिस्म की नसें ढीली पड़ने लगीं। कल रात शमशेर के उन वहशी धक्कों और उस जानवर जैसी चुदाई की वो 'मीठी और गहरी टीस' अब लौट आई थी।
कामिनी उसी पलंग पर बैठी थी। जैसे ही उसने थोड़ा हिलने की कोशिश की, उसके बदन के निचले हिस्से और उसकी भारी गांड के पोर-पोर में एक ऐसा दर्द उठा कि उसके मुँह से सिसकी निकल गई "आह्ह... उफ्फ्फ!"
कल रात शमशेर ने उसके उस भरे हुए जिस्म को जिस बेदर्दी से रौंदा था, गांड खोल के रख दी थी, उसका एहसास अब इस सन्नाटे में उसे पूरी तरह जकड़ रहा था।
नाभि के नीचे उसे भारीपन महसूस हो रहा था, सुबह से वो पेशाब करने ही नहीं जा पाई थी.
कामिनी को बहुत तेज़ पेशाब करने की तलब महसूस हुई।
उसे इस हवेलीनुमा बिल्डिंग के बाथरूम का कुछ अंदाज़ा नहीं था, कौन चीज कहाँ है, मालकिन तो मर गई, ये रमेश छत पे उस बूढ़े के साथ बैठा है.
कामिनी को ताऊजी की याद आते ही वो स्पर्श भी याद गया जब वो पैर छूने झुकी थी, तब ताऊजी उसके स्तनों को घूर रहे थे, उसे अजीब तरिके से छुवा भी था.
कामिनी के चेहरे पे अजीब सी मुस्कान तैर गई.
चूरररर.... चरररर.... उसने चारपाई से उठकर आँगन के चारों तरफ नज़र दौड़ाई।
उफ्फ्फ्फ़... चत.. कमर को सीधा किया और आस पास का जायजा लेने लगी.
हवेली के ठीक पीछे की तरफ एक हल्की सी ढलान थी, जहाँ हरी-हरी जंगली घास उगी हुई थी और उसके आगे घने खेत शुरू हो जाते थे। वहाँ एकदम घुप्प अँधेरा और सुनसानपन था।
"कोई नहीं है... जल्दी से यहीं ढलान के पास फारिग हो लेती हूँ," कामिनी ने मन ही मन सोचा।
वो अपने दर्द को दबाते हुए, भारी कदमों से उस ढलान की तरफ बढ़ गई। रात की ठंडी हवा उसके पसीने से भीगे चेहरे को छू रही थी। घास पर पहुँचकर कामिनी ने एक बार फिर पीछे मुड़कर देखा हवेली की तरफ से कोई रौशनी या आवाज़ नहीं आ रही थी।
फार्महाउस के पीछे वो ढलान एकदम सुनसान और घुप्प अँधेरे में डूबी हुई थी। रात की सर्द हवा खेतों की लंबी-लंबी जंगली घासों के बीच से सरसराती हुई गुज़र रही थी।
कामिनी अपने जिस्म के उस भारीपन और कल रात के उस खौफनाक दर्द को सहते हुए ढलान के पास पहुँची। उसने चारों तरफ देखा कहीं कोई आहट नहीं थी, बस दूर झींगुरों की आवाज़ें गूंज रही थीं। शहर की वो सुरक्षित चारदीवारी अब बहुत पीछे छूट चुकी थी, और इस अजनबी गाँव का ये अँधेरा उसे अंदर तक डरा रहा था।
खुद को उस अँधेरे में पूरी तरह सुरक्षित मानकर, कामिनी ने कांपते हाथों से अपनी सूती साड़ी को थोड़ा ऊपर किया और उस लंबी घास के बीच बैठ गई। चाँद की वो बहुत ही मद्धम, पीली सी रौशनी बादलों के पीछे से छनकर आ रही थी। उस धुंधली रौशनी में कामिनी का वो गोरा, भरा हुआ अक्स उस हरी घास के बीच बिल्कुल अलग ही चमक रहा था।
कामिनी ने आँखें बंद कर लीं। ठंडी हवा के झोंके उसके पसीने से भीगे चेहरे और खुली गर्दन को छू रहे थे। वो इस पल दुनिया से बेखबर, अपनी उस टीस और दर्द को हल्का कर रही थी।
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थोड़ी देर पहले हवेली की छत पर
"गुटूक... गटक..." रमेश अपनी बोतल में मगन था।
तभी ताऊजी अपनी उस खुरदरी कुर्सी से उठा। उसने अपनी धोती को थोड़ा ढीला किया और अपनी भारी आवाज़ में रमेश से बोला
"रमेश बाबू... हम आते हैं ज़रा। बहुत तेज़ पेशाब लगा है।"
रमेश ने बिना देखे बस हाथ हिला दिया।
ताऊजी अपने भारी, खुरदरे कदमों से हवेली की सीढ़ियां उतर कर नीचे आँगन में आ गया। आँगन पूरा खाली था।
ताऊजी ने अपनी धोती का एक सिरा पकड़ा और वो उसी दिशा में मुड़ गया जहाँ से ताज़ी हवा आ रही थी... फार्महाउस के पीछे वाली उसी ढलान की तरफ!
ताऊजी की वो लालची, शिकारी आँखें अँधेरे को चीरने की आदी थीं। जैसे ही वो ढलान के पास पहुँचा, उसके कदम अचानक रुक गए।
सामने, कुछ ही मीटर की दूरी पर... हरी घास के बीच कामिनी खड़ी थी, बेचैन सी... उसने गर्दन इधर उधर घुमाई लेकिन हाय रे जल्दबाज़ी पीछे ना देख सकी.
कामिनी धीरेधीरे अपनी साड़ी उठाने लगी, पीछे ताऊजी की तो सांसे ही अटक गई, वो मूर्ति की तरह जड़ हो गया था, कामिनी ने अपनी साड़ी पूरी एक बार मे कमर तक उठाया ली,
उसकी वो नंगी, गोरी और भारी जांघें चाँदनी में किसी सफेद संगमरमर की तरह चमक रही थीं।
एक 65 साल का वो घाघ और ठरकी बूढ़ा, जो अभी कुछ देर पहले ही कामिनी की पीठ पर अपना गरम हाथ फेर चुका था... अब अपनी ही बहू को इस आधी रात में, इस हालत में देख रहा था।
इसकी नजरें पिंडलियो से शुरू हो कर ऊपर चढ़ने लगी, चढ़ती गई सांसे और नजरें दोनों.
नजरें वहाँ रुकी जहाँ जांघो के ठीक ऊपर दो सुडोल गोल गांड के हिस्से एक छोटी सी चड्डी मे कसे हुए तड़प रहे थे.
"उउउफ्फफ्फ्फ़.... " कामिनी कर मुँह से एक हलको सी सिस्कारी निकली, उसके दोनों हाथ के अंगूठे, पैंटी के इलास्टिक मे फसे....
और फिर गया.... सररररररररर...... चड्डी घुटनो पर जा टिकी.
और कामिनी झुकती चली गई, गांड के पाट एक दूसरे से दूर जाने लगे....
कामिनी पैरो के बल बैठ गई... कोई 2सेकंड बाद ही चरररररर... छररररर.... ससससर.. पिस्स्स्स... की तेज़ सिटी उस सुनसान मे ऐसे गुंजी जैसे ट्रैन ने छूटने से पहले संकेत दिया हो.
पीछे ताऊजी मरने की हालात मे जा चूका था, ऐसा करिश्मा ऐसी खूबसूरती उस गवार ने कभी ना देखी थी.
शराब ना पिया होता तो पक्का दिल की धड़कन रुक ही जाती.
कामिनी की चुत से निकलता पीला पेशाब चांदनी रौशनी मे पिघले सोने की तरह चमक रहा था.
हवा के झोंके के साथ कामिनी की चुत से निकली वो नशीली, कच्ची खुशबू सीधा ताऊजी के नथुनों से टकराई।
ताऊजी के अंदर का वो जानवर पूरी तरह से बौखला गया। उसने अपनी धोती को आगे से अपनी मुट्ठी मे बुरी तरह जकड लिया.
कामिनी आंखे बंद किये मूत्र विसर्जन का आनंद ले रही थी.
इस्स्स्स.... उउउफ़फ़फ़फ़.... क्या राहत थी, पेशाब की हर एक बून्द के साथ उसका जिस्म खाली हो रहा था, हल्का महसूस कर रही थी.
1,2 मिनिट तक कामिनी मूतती ही रही, सिटी बजती ही रही... चुत से निकले पेशाब ने जमीन को तृप्त कर दिया था.
कुछ ही देर बाद कामिनी उठी, पैंटी ऊपर चढाई और पलट जर चल दी.
अँधेरे मे बूढ़ा ताऊ कहाँ गया पता ही नहीं, कामिनी जिस रास्ते गई थी, वापस उसी रास्ते आ कर आंगन मै बैठ गई...
"अरे बहु रानी कहाँ चली गई थी " आंगन मे गांव की ही रखा औरत बैठी थी.
"वो... ववो... कामिनी ने छोटी ऊँगली दिखा दी.
"ये लीजिये गांव का शुद्ध दूध पी लीजिये, भूख मे राहत मिलेगी "
कामिनी को वाकई भूख लगी थी.
गट... गट... गटक... दूध पीने लगी.
गला सूखा था, भूख थी, लेकिन दिमाग कहीं और भटक रहा था। कल रात शमशेर की वहशी चुदाई की टीस अभी भी उसके निचले हिस्से में थी,
अभी थोड़ी देर पहले ढलान पर पेशाब करके आई थी तो बदन में कुछ राहत तो हुई थी, मगर अंदर ही अंदर एक अजीब सी बेचैनी थी।
दूसरी तरफ उसी ढलान पर... वहाँ अब अंधेरे से एक भारी-भरकम साया निकला।
ताऊजी।
65 साल का वो घाघ बूढ़ा, धोती को कमर से ढीला करके, आँखें लाल-लाल, साँसें फुली हुई। उसकी भारी तोंद हिल रही थी।
ताऊ ठीक उसी जगह खड़ा था, जहाँ कामिनी के पेशाब से जमीन मे खड्डा बन गया था, चाँदनी की हल्की रोशनी में उसका चेहरा विकृत हो चुका था।
उसने एक हाथ से अपनी धोती का आगे वाला हिस्सा उठाया। उसके लंड पहले से ही पूरा खड़ा था मोटा, काला, नसों वाला, सिरा चमकता हुआ। उसने अपनी मुट्ठी में उसे कसकर पकड़ लिया और धीरे-धीरे मसलने लगा।
"उफ्फफ्फ्फ़... बहू रानी..." वो फुसफुसाया।
अचानक ताऊ घुटनों के बल बैठ गया। उसकी हथेली उस गीली मिट्टी पर गई जहाँ कामिनी का पेशाब अभी भी ताज़ा था। हरी घास और मिट्टी दोनों जगह गीली-गीली, चमकती हुई। ताऊजी ने अपनी भारी हथेली भर ली मिट्टी, पानी, कामिनी की चूत का वो गर्म तरल... सब कुछ।
और फिर...
सिंफ्फ्फ्फ्फ्फ़... शनिफ्फ्फ्फ्फ़... कस-कस कर...
उसने उस गीली मिट्टी को अपनी नाक से चिपका लिया और जोर-जोर से सूंघने लगा। आँखें बंद कर उस मिट्टी से निकलती कामिनी के पेशाब और उसकी चुत की खुसबू को महसूस करने लगा, अपने जिस्म मे उतारने लगा.
"आअह्ह्ह्ह... बहू रानी... क्या खुशबू है तेरी चूत की... उफ्फ्फ्फ़....."
उसकी आवाज़ काँप रही थी। एक हाथ में मिट्टी पकडे सूंघ रहा था, तो दूसरे हाथ से अपना लंड कस-कस कर हिला रहा था..
"आअह्ह्ह.... बहुरानी... आअह्ह्ह..... उउफ्फफ्फ्फ़.... अगर तेरी चूत का ये पानी पीने को मिल जाए... तो... तो पक्का स्वर्ग नसीब हो जाये"
आअह्ह्ह.... बहुरानी... आअह्ह्ह..... उउफ्फफ्फ्फ़.... उस पर उत्तेजना इस कद्र हावी हो गई की हाथ मे पकड़ी मिट्टी अपने चेहरे पर पोतने लगा,
वहसी दरिंदा था ताऊ एक नंबर का, आज ही उसकी पत्नी मरी थी और वो अपनी बहु की चुत चाटने का सपने देख रहा था.
क्रमशः...

1 Comments
Thanks lord haram bhai is update ke liye
ReplyDeleteHum to kamini ke liye taras gaye the
Fagun ke sanskar umar se bade hai kahi ye tharki tauji ne to.........
Tauji ko bhi kamini ka swad chakne do
Uske jalwe dekh liye to ye bhudau pagal ho jayega