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कामिनी 2.0, भाग -14

मेरी माँ कामिनी 2.0 - अध्याय -14

"जीप यही लगा देते है, सुनसान मे, वरना जीप कि आवाज़ से मामला बिगड़ जायेगा." बिट्टू ने सहारा दे कर लकी को जीप से उतारा.

"अबे यार... कुत्ते ने बहुत बुरा काटा है! साला मांस ही निकाल लिया," लकी अपनी पिण्डली को पकड़े, लँगड़ाते और कराहते हुए कच्ची सड़क पर चला जा रहा था। दर्द के मारे उसका चेहरा पीला पड़ चुका था।
"अब उस कुत्ते का रोना छोड़ बे! मैंने खुद अपनी आँखों से उस औरत को इसी हवेली के अंदर जाते देखा था। चल जल्दी, आज उसे किसी कीमत पर छोड़ना नहीं है,"

 बिट्टू ने लकी को अपने कंधे का सहारा देते हुए लगभग घसीटते हुए कहा। उसकी आँखों में कामिनी के उस भीगे बदन की तस्वीर अभी भी छपी हुई थी।
"साला... आज तो आर-पार का खेल खेलेंगे," लकी ने अपनी पैंट के पीछे खोंसी हुई पिस्तौल को निकाला और मुस्तैदी से अपनी मुट्ठी में जकड़ लिया।

चलते-चलते दोनों उस विशाल हवेली के पिछले हिस्से तक पहुँच गए। हवेली के आँगन की तरफ खुलती एक बड़ी सी खिड़की से पीली रोशनी छनकर बाहर आ रही थी।
लकी और बिट्टू ने दबे कदमों से आगे बढ़कर खिड़की से अंदर झाँका... और अंदर का नज़ारा देखते ही उन दोनों का मुँह खुला का खुला रह गया। लकी अपनी पिण्डली का दर्द और बिट्टू अपनी थकान पल भर में भूल गया।

"कितनी बड़ी रंडी है बे ये! देख... साक्षात अपने पति के सामने जाँघें फैला कर चुद रही है," लकी ने फुसफुसाते हुए कहा, उसकी आँखों में हवस का तूफान उतर आया था।
खिड़की के उस पार, डाइनिंग टेबल पर कामिनी पूरी तरह नंगी पसरी हुई थी। फ़ौजा सिंह उसकी चुत मे अपने विशाल लंड से ज़बरदस्त और वहशी धक्के दिए जा रहा था। कामिनी चरम सुख में मेज़ पर अपना सिर पटक रही थी, और उसके भारी स्तन हवा में बुरी तरह उछल रहे थे।

 उसकी चीखें और सिसकियाँ बाहर तक सुनाई दे रही थीं। और सबसे खौफ़नाक मज़ाक यह था कि ठीक सामने की कुर्सी पर कामिनी का पति रमेश बेसुध पड़ा ऊँघ रहा था।
"चल... साली को। आज हम भी चोदेंगे, और फिर यहाँ से ले चलेंगे," बिट्टू ने अपनी पैंट की ज़िप के पास महसूस हो रही सख़्ती को सहलाते हुए कहा।
दोनों ने अपनी जेब से मैले रुमाल निकाले और अपने चेहरों पर बाँध लिए। पिस्तौल को हाथ में ताने वे दबे कदमों से हवेली के पिछले दरवाज़े से अंदर दाखिल हुए।

अंदर कामिनी और फ़ौजा सिंह अपनी चुदाई और उत्तेजना के चरम सुख के तूफ़ान में इस कदर अंधे और बहरे हो चुके थे कि उन्हें आभास तक नहीं हुआ कि दो अनजान शिकारी उनकी पीठ पीछे मौत बनकर खड़े हैं।

लकी ने बिना कोई आवाज़ किए, डाइनिंग टेबल के पास रखी शराब की खाली, भारी बोतल को अपने हाथ में उठाया। जैसे ही फ़ौजा सिंह ने अपना आख़िरी धक्का मारा, लंड से निकला वीर्य कामिनी कि चुत को भरने लगा तभी लकी ने अपनी पूरी ताकत से वह बोतल फ़ौजा सिंह के सिर पर दे मारी।

"छहाहांन्नाम्म्म्म... छन... छनाक....! बोतल के टुकड़े-टुकड़े हो गए। यह एक ऐसा खौफ़नाक पल था जहाँ फ़ौजा सिंह का खौलता हुआ वीर्य कामिनी की चुत में, और उसके सिर का गाढ़ा खून ज़मीन पर... दोनों एक साथ ही फूट कर निकल पड़े।

फ़ौजा सिंह का भारी शरीर कटे हुए पेड़ की तरह ज़मीन पर जा गिरा। कामिनी अभी उस दर्दनाक आवाज़ और अपने चरम सुख की तंद्रा से बाहर आ भी नहीं पाई थी कि अचानक पीछे से बिट्टू ने उसे अपने खुरदरे हाथों में जकड़ लिया।

कामिनी चीखने ही वाली थी कि बिट्टू ने एक बेहद गंदा और बदबूदार कपड़ा झटके से उसके मुँह में ठूँस दिया और उसके सिर पर एक काला नकाब डाल दिया। कामिनी की आँखों के सामने पूरा अँधेरा छा गया।
"हिलना मत साली, वरना यहीं गोली मार दूँगा!" लकी ने पिस्तौल की ठंडी नली कामिनी की नंगी पीठ पर सटा दी।
बिट्टू के बड़े-बड़े, खुरदरे हाथ कामिनी के उन आज़ाद, पसीने से भीगे स्तनों को पीछे से पूरी ताकत से भींचने लगे। वो दोनों पूरी तरह से नंगी, हाँफती और कामरस से लथपथ औरत को हवा में टाँग कर बाहर आँगन की तरफ घसीट ले गए। कामिनी के पैरों से वीर्य और चुत के रस की बूँदें ज़मीन पर टपक रही थीं।

बाहर हवेली से दूर जाती सडक के मोड़ पर उनकी एक टूटी-फूटी जीप अँधेरे में खड़ी थी।
"ले के चल साली को..." लकी ने कामिनी के पैरो को पकड़ हवा मे टांग लिया, और बिट्टू के हाथ कामिनी कि बगल मे धस गए.
दोनों ने मिल कर कामिनी को हवा मे उठा लिया था.
ऐसे उठाये जाने से कामिनी का पेटीकोट कमर टक चढ़ गया, लकी के सामने कामिनी कि टपकती गीली चुत उजागर हो गई.
"बताओ साला कितनी बेरहमी से चौड़ा है, पूरी चुत खुली पड़ी है " लकी ने अपने दर्द को भुला दिया था पलभर को.
"साली कि गांड भी खोल देंगे, अभी जल्दी यहाँ से निकल " बिट्टू ने खुद पर कंट्रोल कर कहा.

कामिनी बेतहाशा डर और खौफ़ में  "गु... गुम... गुम्म..."  कर रही थी। वह चिल्लाना चाहती थी, रमेश को आज़ाव देना चाहती थी, लेकिन मुँह में ठूँसे हुए उस गंदे कपड़े ने उसकी सारी चीखों को उसके गले में ही घोंट दिया.
दोनों लोग कामिनी को वैसी ही नंगी हालात मे जीप तक ले आये थे, 
जीप का इंजन एक भद्दी सी आवाज़ के साथ चालू हुआ.
वो कामिनी को जीप मे डाल ही पाते कि...


तभी रात के सन्नाटे को चीरती हुई एक भारी, खुरदरी और खौफ़नाक आवाज़ गूँजी।
"उस औरत को वहीं छोड़ दे... वरना बोटी बोटी अलग कर दूंगा!"
जीप के पीछे फैले उस घने अँधेरे से एक विशालकाय साया बाहर निकला। चाँद की हल्की रोशनी में जब वो साया थोड़ा आगे आया, तो लकी और बिट्टू के हलक सूख गए। उस हट्टे-कट्टे आदमी के हाथ में मीट काटने वाला एक भारी और धारदार चापड़ (Meat Cleaver) था, जिससे अभी भी ताज़े खून की बूँदें ज़मीन पर टपक रही थीं।
लकी की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। उसने हड़बड़ाहट में कामिनी के पैरों को छोड़ दिया और अपनी काँपती हुई पिस्तौल उस अँधेरे साये की तरफ तान दी। कामिनी का आधा नंगा जिस्म धड़ाम से जीप के पिछले हिस्से पर जा गिरा।
"गु... गुम्म...!" कामिनी दर्द से कराह उठी, लेकिन मुँह पर बंधे कपड़े और काले नकाब के कारण उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।
"कक... कौन है बे तू? पीछे हट जा वरना खोपड़ी उड़ा दूँगा!" लकी की आवाज़ में पिस्तौल की गर्मी से ज़्यादा खौफ़ की सर्दी काँप रही थी। कुत्ते के काटे हुए पैर ने वैसे ही उसकी आधी जान निकाल रखी थी।

बिट्टू ने भी घबराहट में अपनी जेब से एक नुकीला चाकू निकाल लिया।
कामिनी के मुँह पर भले ही काला कपड़ा था, लेकिन उस आदमी की गूँजती हुई भारी आवाज़,  जानी-पहचानी मर्दाना महक ने कामिनी के रोंगटे खड़े कर दिए। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। क्या ये वही था, जिसके बारे में वो कुछ देर पहले डाइनिंग टेबल पर सोच रही थी?

वो आदमी एक कदम और आगे बढ़ा। 
जैसे ही जीप की बैकलाइट की लाल रोशनी उस शख्स के चेहरे पर पड़ी, लकी और बिट्टू के वजूद सूखे पत्तों की तरह काँप गए।
कुर्ता-पजामा पहने, हल्की सुतवाँ दाढ़ी और 6 फुट ऊँचा वो चौड़ा, गठीला जिस्म किसी चट्टान की तरह तन कर खड़ा था। हाथ में भारी चापड़ और आँखों में मौत का सन्नाटा तैर रहा था।

लकी की उँगलियाँ सुन्न पड़ गईं और  " ठक" से पिस्तौल उसके काँपते हाथों से छूटकर नीचे ज़मीन पर गिर पड़ी। बिट्टू के घुटने आपस में टकराने लगे। उन्हें लगा जैसे साक्षात यमराज उनका रास्ता रोक कर खड़ा है।
"कककक... कककक.... कादर... कादर खान!" लकी के सूखे हलक से खौफ़ में डूबी एक काँपती हुई फुसफुसाहट निकली।

'कादर खान' ये नाम सुनते ही कामिनी के कानों में जैसे किसी ने अमृत घोल दिया। पल भर पहले डर से कांपती कामिनी के जिस्म मे हिम्मत और ताकत का संचार हुआ, उसके हाथ अब आज़ाद थे। उसने झट से अपने सिर पर पड़ा वो बदबूदार काला नकाब नोच कर फेंक दिया और मुँह से कपड़ा निकाल दिया।

उसकी धुंधली और डबडबाई आँखों के ठीक सामने उसका वो पुराना आशिक़, खूँखार लेकिन रक्षक... कादर खान खड़ा था। कामिनी की आँखें छलक गईं। उस खौफ़नाक रात में, इतने बड़े सदमे और दरिंदगी के बाद, कादर को सामने पाकर उसका सुलगता और डरा हुआ जिस्म सुकून की एक गहरी ठंडक में डूब गया।

वह बिना कुछ सोचे-समझे जीप से कूदी। उसे इस बात का रत्ती भर भी होश नहीं था कि वह कमर के ऊपर नंगी है, पेटीकोट भी अस्त व्यस्त हालात मे जैसे तैसे कमर पर झूल रहा है।
 वह पागलों की तरह दौड़ती हुई 'धप्प'..... से सीधे कादर खान के चौड़े और मज़बूत सीने से जा टकराई और उससे लिपट गई।
"कादर... कहाँ चले गए थे तुम!" सुबुक... सुबुक... कामिनी फूट-फूट कर रो पड़ी। उसका नंगा, कामरस और पसीने से सना जिस्म कादर के कुर्ते से इस कदर चिपक गया था कि दोनों के बीच हवा गुज़रने की भी एक इंच जगह नहीं बची थी।

"एक मिनट मैडम जी..." कादर खान ने उस नंगे और मादक जिस्म के अपनी छाती से टकराने पर भी कोई कामुक प्रतिक्रिया नहीं दी। उसकी आँखों में हवस नहीं, बल्कि उन गुंडों को चीर देने वाला खून सवार था। उसका चेहरा गुस्से से तमतमा कर लाल हो चुका था।

उसने कामिनी को बड़े ही आदर से हल्का सा पीछे किया। उसकी मुट्ठियाँ लोहे की तरह कस गईं।
और फिर शुरू हुआ कादर खान का वो खौफ़नाक तांडव!
"धाड़... धड़क... धाड़क... धम... धम.... धम..!"
घूँसों और लातों की वो बरसात इतनी भयानक थी कि कड़क... कड़ाक.... चरररर.... रात के सन्नाटे में हड्डियाँ टूटने की आवाज़ें गूँजने लगीं।
 कादर ने किसी हथियार का इस्तेमाल नहीं किया, उसके नंगे हाथ ही उन दोनों के लिए काफी थे। कोई दो मिनट भी नहीं बीते होंगे कि लकी और बिट्टू खून की उल्टियाँ करते हुए ज़मीन चाट रहे थे। वो दोनों अधमरी लाशों में तब्दील हो चुके थे, जिनमें उठने की कोई ताकत नहीं बची थी।
अपनी भड़ास निकालने के बाद कादर खान हाँफता हुआ पीछे पलटा।
उसके ठीक सामने, जीप की लाल बैकलाइट की मद्धम रोशनी में, कामिनी पूरी तरह से नंगी, ठंडी हवा में खड़ी थी। लाल रोशनी उसके दूधिया जिस्म को एक ऐसा नशीला और जादुई रूप दे रही थी कि कादर भी एक पल के लिए सन्न रह गया। उसके भारी स्तन हवा में हल्के-हल्के काँप रहे थे।

"अअअ.. आप.. यहाँ कैसे? और ये हालत..." कादर खान कुछ पूछना चाहता था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि शहर की 'बड़े घर की मैडम' इस गाँव की हवेली के पीछे, इस नंगी और खौफ़नाक हालत में कैसे पहुँच गई?

लेकिन... कादर के होंठों से शब्द पूरे निकल भी नहीं पाए थे कि कामिनी ने एक कदम आगे बढ़ाया और अपने काँपते, प्यासे होंठ सीधे कादर के खुरदरे होंठों पर पूरी शिद्दत से जमा दिए।
perfect kiss indian 'म्म्म्ममम.....'चप... चू....इससससस..
यह कोई आम चुंबन नहीं था। इसमें कामिनी का डर, उसकी तड़प, उसका शुक्रिया, और आज रात की वो भयंकर हवस सब कुछ शामिल था। इतने सारे सवालों का, इस सन्नाटे में, इससे अच्छा और क्या जवाब हो सकता था!

कादर के मज़बूत, खुरदरे हाथ कामिनी की ठंडी, नंगी पीठ पर एक अजीब सा सुकून बनकर रेंग रहे थे। कादर भी ना जाने कब से इस मादक छुअन और मिलन के लिए तरस रहा था। जी भर के कादर खान के खुरदरे होंठों की तपिश पीने के बाद, अचानक रात की एक ठंडी हवा कामिनी के नंगे जिस्म से टकराई और उसे यकायक हकीकत का होश आ गया।

वह एक झटके से कादर के सीने से अलग हुई। रात की सर्द हवा ने उसे अपनी पूरी नग्नता और हवेली के अंदर पसरे खौफ़नाक सन्नाटे का आभास करा दिया।

"कक्क.. कादर... जल्दी... जल्दी डॉक्टर... मेरा मतलब गाँव के हकीम को बुला कर लाओ! अंदर सरपंच जी के सिर से बहुत खून बह गया है..." कामिनी हकीकत के धरातल पर आ गिरी थी। उसके पसीने से भीगे चेहरे पर अब हवस की जगह दहशत ने पूरी तरह कब्ज़ा कर लिया था। उसकी आवाज़ बुरी तरह काँप रही थी।

"ममम... मैं ले कर आता हूँ," कादर ने स्थिति की नज़ाकत को समझा। अभी वक़्त सवालों का नहीं था। वह तुरंत पलटा और उसी टूटी-फूटी जीप को स्टार्ट कर मेन सड़क की तरफ अँधेरे में दौड़ गया।
कादर के जाते ही कामिनी नंगे पाँव पागलों की तरह हवेली के अंदर भागी।
अंदर का नज़ारा किसी डरावने सपने जैसा था। हवा में महँगी शराब और ताज़े खून की एक घिनौनी और तीखी गंध घुली हुई थी। डाइनिंग टेबल के पास ज़मीन पर फ़ौजा सिंह का विशाल शरीर लहूलुहान पड़ा था, और कुछ ही दूरी पर रमेश अभी भी नशे में धुत्त कुर्सी पर गर्दन लटकाए बेहोश था।

कामिनी के हाथ-पैर काँप रहे थे। उसने सबसे पहले ज़मीन पर पड़ा अपना लाल ब्लाउज उठाया और हड़बड़ाहट में हुक फँसाए। फिर ज़मीन पर बिखरी साड़ी को किसी तरह अपने जिस्म पर लपेटा। अपनी मादकता को परदे में ढकते ही वह सीधे रसोई की तरफ दौड़ी।

रसोई से वह एक ठंडे पानी की बोतल लेकर आई और ज़मीन पर पड़े फ़ौजा सिंह के पास घुटनों के बल बैठ गई। उसने पानी अपनी हथेली में लिया और फ़ौजा सिंह के खून से सने चेहरे पर ज़ोर-ज़ोर से छींटे मारे।
"सरपंच जी उठिये.... उठिये... आँखें खोलिए!" कामिनी की साँसें धौंकनी की तरह चल रही थीं।

"आअह्ह्ह... हमफ़्फ़्फ़... हमफ्फफ्फ्फ़...." फ़ौजा सिंह वाकई एक जीवट और मज़बूत आदमी था। सिर पर इतना गहरा घाव लगने के बावजूद, उसने अपना भारी हाथ सिर पर रखा और कराहते हुए आँखें खोल दीं।

"बहू... बहू.... क्या हुआ था आअह्ह्ह...?" फ़ौजा सिंह की आवाज़ लड़खड़ा रही थी, उसकी आँखों में अभी भी गहरा नशा और चोट का दर्द था।
"वो... वो.... सरपंच जी, आप पहले अपनी धोती पहनिये... मैं रमेश को जगाती हूँ," कामिनी ने नज़रें चुराते हुए, फ़ौजा सिंह के उस नंगे हिस्से की तरफ बिना देखे कहा।
फ़ौजा सिंह को सँभलने का वक़्त देकर कामिनी झटके से उठी और रमेश की कुर्सी के पास पहुँची।
छप... छप.....!
कामिनी ने बचे हुए पानी के छींटे रमेश के चेहरे पर मारे... लेकिन रमेश टस से मस नहीं हुआ। दारू उसके खून में इस कदर घुल चुकी थी कि उसे किसी बात का होश नहीं था।
गुस्से, नफ़रत और खौफ़ से कामिनी का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। जिस आदमी की नामर्दी और जाहिलियत ने आज उसे इस दलदल में धकेला था, वो अभी भी मुर्दों की तरह सो रहा था।
"साहाररर.....!
कामिनी ने बिना कुछ सोचे, गुस्से में पूरी की पूरी ठंडे पानी की बोतल रमेश के सिर पर उड़ेल दी।
"उठ भी जा शराबी... उठ जा!" कामिनी के गले से एक घुटी हुई, गुस्से से भरी चीख निकल पड़ी।
****************

"अल्लाह रहम करे... मियाँ फ़ौजा ये क्या हो गिया! क्या सुन रिया हूँ मैं, कोई लफंगा पीट गया तुम्हें?"
हवेली के दरवाज़े से हकीम लकड़द्दीन अपनी कमर झुकाए, घबराए हुए कदमों से अंदर दाखिल हुए। उनके ठीक पीछे कादर खान अपनी चौड़ी छाती ताने, हकीम का चमड़े का पुराना बैग पकड़े हुए खड़ा था।

सामने सोफे पर फ़ौजा सिंह अपना खून से सना सिर पकड़े बैठा था। उसकी आँखों में दर्द से ज़्यादा अपनी बेइज़्ज़ती का गुस्सा उबल रहा था।
 "आअह्ह्ह.... लकड़द्दिन, धोखे से... साले ने पीछे से वार किया। वरना किसी माई के लाल की क्या मज़ाल कि फ़ौजा सिंह को सामने से... आअह्ह्ह!"

"रुको मियाँ, देखने दो... तौबा-तौबा, पूरा सिर ही फाड़ दिया कम्बख्त ने," लकड़द्दीन ने अपना बैग खोला और उसमें से रुई, लाल दवा और पट्टियाँ निकालने लगे। कमरे में शराब, मटन और खून की गंध के साथ अब आयोडीन और दवाओं की तेज़ महक भी घुल गई थी।
इस पूरी गहमागहमी के बीच, पीछे खड़ा कादर खान सिर्फ और सिर्फ कामिनी को निहार रहा था, और कामिनी की पलकें भी कादर पर ही टिकी थीं।
 कुदरत की ये कैसी अजीब और ज़ालिम बिसात थी! दोनों प्रेमी इतने लंबे अरसे बाद मिले थे, लेकिन मज़बूरी ऐसी कि एक-दूसरे को छू कर महसूस भी नहीं कर सकते।
कादर को सामने देखते ही कामिनी के जिस्म में फिर से एक मादक और नशीली मस्ती छा गई। अभी कुछ देर पहले ही फ़ौजा सिंह ने डाइनिंग टेबल  पर उसके वजूद को बेदर्दी से रौंदा था, उसका पूरा जिस्म दर्द और चरम सुख की थकान से चूर था।
 लेकिन कादर की वो सुतवाँ, मर्दाना आँखों की तपिश पड़ते ही, कामिनी की नाभि के नीचे एक मीठी सी टीस फिर से उठने लगी। उसकी देह की राख में एक नई चिंगारी सुलग गई थी। सच है, एक औरत की गहराई और उसकी चाहत को शायद दुनिया का कोई शास्त्र नहीं समझ सकता।
"ये... ये सब क्या हुआ था यहाँ?"
अचानक रमेश की भारी और लड़खड़ाती आवाज़ गूँजी। उसे होश में आने और इस खौफ़नाक नज़ारे को समझने में थोड़ा वक़्त लगा। उसका नशा अब खौफ़ में बदल रहा था।
"वो... वो.... हम लोग डाइनिंग टेबल पर खाना खा रहे थे कि तभी किसी ने सरपंच जी के सिर पर पीछे से हमला कर दिया। और... और वो मुझे उठा कर बाहर ले जाने लगे," कामिनी ने अपनी साड़ी का पल्लू उँगलियों में लपेटते हुए कहा। लेकिन बोलते वक़्त उसकी नज़रें रमेश पर नहीं, बल्कि कादर की आँखों में थीं, जैसे वह इन शब्दों के ज़रिये कादर के अनकहे सवालों का जवाब दे रही हो कि वो बाहर नंगी हालत में कैसे पहुँची।

"कक्क... क्या....?" रमेश का चेहरा पीला पड़ गया और वह बुरी तरह चीख पड़ा। अपनी पत्नी के अपहरण की बात सुनकर उसकी रही-सही दारू भी उतर गई।
"वो तो... कादर सही समय पर आ गया, तो मैं बच गई," कामिनी ने अपनी पलकें झुका लीं और कादर की तरफ देखकर बहुत ही नज़ाकत से एक मूक, आभार भरी मुस्कान दे दी।
"मियाँ कादर, तुम तो अल्लाह के फ़रिश्ते निकले भाई! बीवी जी हमारी मेहमान हैं, अगर इन्हें कुछ हो जाता तो पूरे गाँव में हमारी नाक कट जाती," हकीम लकड़द्दीन ने फ़ौजा सिंह के सिर पर पट्टी का आख़िरी सिरा बाँधते हुए कहा और फिर अपने बैग में दवाइयाँ वापस रखने लगा.

रमेश हड़बड़ा कर कादर के पास गया और उसके हाथ पकड़ लिए। "थैंक यू... थैंक यू भाई कादर.... तुमने आज मेरी इज़्ज़त रख ली।"
रमेश की इस बात पर कामिनी को मन ही मन एक कड़वी हँसी आ गई। जो पति अपनी आँखों के सामने अपनी पत्नी की 'इज़्ज़त' लुटते हुए नहीं देख पाया, वो आज एक दूसरे आशिक़ को इज़्ज़त बचाने के लिए शुक्रिया कह रहा था।

"रमेश बाबू, आपके अहसान हैं मुझ पर। ऐसा मत बोलिये, ये तो मेरा फ़र्ज़ था," कादर ने बड़ी ही शालीनता से अपने हाथ पीछे खींच लिए।
"थे कौन वो साले?" फ़ौजा सिंह ने सोफे से उठने की कोशिश करते हुए, एक खूँखार और दर्द भरी आवाज़ में पूछा।
"बड़ा भाई के आदमी थे सरपंच जी... ये पहले भी मार खा चुके हैं मुझसे," कादर की कसरती बाज़ुओं की नसें ग़ुस्से से फड़कने लगीं। "मैं अभी घसीट कर लाता हूँ सालों को अंदर।"
कादर खान बिना एक पल गँवाए तेज़ कदमों से हवेली के पीछे वाले दरवाज़े से बाहर अँधेरे बगीचे की तरफ निकल गया। वह उस जगह पहुँचा जहाँ उसने लकी और बिट्टू को अधमरा छोड़ा था।
लेकिन वहाँ पहुँचते ही कादर के कदम ठिठक गए।
"साले... कहाँ चले गए? इतनी मार खा कर भी...?" कादर हैरानी से बुदबुदाया।
ज़मीन पर सिर्फ खून के ताज़े धब्बे और घिसटने के निशान थे। कादर का खौफ़नाक तांडव और वो लोहे जैसे घूँसे खाकर तो एक आम आदमी महीनों तक बिस्तर से नहीं उठ पाता। लेकिन लकी और बिट्टू वाकई बहुत मोटी और ढीठ चमड़ी के इंसान थे। मौत को इतने करीब से देखकर जान बचाने की तड़प ने उन्हें वो ताकत दे दी थी कि वे किसी तरह ज़मीन पर रेंगते हुए, अपनी जान बचाकर वहाँ से सरक लिए थे। वरना आज रात इस बगीचे की ज़मीन पर उनकी क़ब्र खुदी होती.
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रात का एक बज चुका था। हवेली के उस विशाल कमरे में खून, दवाइयों और शराब की गंध आपस में मिलकर एक अजीब सा घुटन भरा माहौल बना रही थी।
"चलिए... मैं आप लोगों को घर छोड़ आता हूँ," कादर खान की भारी और रोबदार आवाज़ ने उस सन्नाटे को तोड़ा। उसके लहज़े में एक ऐसा अधिकार था, जो महज़ एक इल्तज़ा नहीं बल्कि एक ऐलान था।

"साला... पूरा मज़ा ही ख़राब हो गया," रमेश ने सोफे से उठते हुए झल्लाहट में कहा और फिर पूरी बेशर्मी से फ़ौजा सिंह की तरफ मुड़ गया, "सरपंच जी, वो... थोड़ी बची है क्या?"
रमेश का इशारा उस विदेशी शराब की बोतल की तरफ था जो अब डाइनिंग टेबल के पास चकनाचूर पड़ी थी।

 यह सुनकर कामिनी का खून खौल उठा। इतनी बड़ी दहशत, खून-खराबे और उसकी इज़्ज़त के दाँव पर लगने के बावजूद, इस जाहिल इंसान को सिर्फ़ अपनी शराब की तलब सता रही थी। कामिनी ने अपने नाखून अपनी हथेलियों में गड़ा लिए।

"हाँ... रमेश बाबू, अब तो मुझे भी इसकी बहुत ज़रूरत है," फ़ौजा सिंह ने एक कड़वी मुस्कान के साथ कहा। वह दर्द से कराहते हुए उठा और अपनी पुरानी अलमारी से शराब का एक 'पव्वा' (Quarter) निकालकर रमेश के हाथों में थमा दिया।
शराब रमेश को देते वक़्त फ़ौजा सिंह की नज़रें कामिनी के मादक और थके हुए जिस्म पर गड़ी थीं। साड़ी की सिलवटों के पीछे छिपे कामिनी के हुस्न को देखकर फ़ौजा सिंह की आँखों में हवस अभी भी किसी नंगे नाच की तरह थिरक रही थी।

"तुम आई बहू... तो बहुत अच्छा लगा," फ़ौजा सिंह ने अपनी भारी आवाज़ में सीधे कामिनी की आँखों में झाँकते हुए कहा, "इस बूढ़े की सूनी हवेली की रौनक बढ़ गई। आते रहना..."
यह कोई साधारण न्योता नहीं था। 'आते रहना' के पीछे छिपे उम्मीद, उत्तेजना और हवस छिपी थी, जिसे कामिनी बहुत अच्छी तरह समझ रही थी।

"जी.. जी सरपंच जी... मुझे भी बहुत अच्छा लगा आपसे मिल कर," कामिनी ने अपनी पलकें हल्का सा झुकाते हुए जवाब दिया।
यह जवाब सुनकर रमेश भले ही कुछ ना समझा हो, लेकिन कामिनी और फ़ौजा सिंह के बीच सरेआम एक 'खामोश और अश्लील गठबंधन' जुड़ चुका था।

शायद एक औरत के मनोविज्ञान की यही सबसे बड़ी पहेली है। उसका दिल और जज़्बात भले ही कादर खान के लिए धड़कते हों, लेकिन उसकी दबी हुई वासना, देह की गहराइयाँ  मर्दानगी के आगे घुटने टेक ही देती हैं।

"एक बार मर्यादा कि दहलीज पार कर गई औरत वापस आंगन मे नहीं लौटती", कामिनी इस बात का जीता जगता उदाहरण थी,

कामिनी को नाभि के नीचे, जांघो के बीच अभी भी मसालो कि जलन और फ़ौजा सिंह के लंड कि रगड़ महसूस हो रही थी.

"चलें मैडम जी?" कादर ने अपनी बात दोहराते हुए हवेली के मुख्य दरवाज़े की तरफ कदम बढ़ाया।
"अरे... अंम्म्म्म...  मियाँ! मुझे भी छोड़ते चलो," हकीम लकड़द्दीन हड़बड़ाते हुए अपनी जगह से उठा,  उसे डर था कि कहीं कादर उसे यही ना छोड़ जाए।

हकीम साहब अपनी कमर झुकाए, अपना बैग सीने से लगाए तेज़ चाल से कादर के पीछे-पीछे दरवाज़े की तरफ लपके, "ध्यान रखना फ़ौजा... मैं सुबह आकर देखता हूँ।"
कादर, कामिनी, रमेश और हकीम बहार निकल गए, पीछे रह गया फ़ौजा सिंह... जो अपने सिर के दर्द को भूलकर, डाइनिंग टेबल पर गिरे कामिनी के कामरस और अपने गाढ़े वीर्य के निशानों को एक शैतानी मुस्कान के साथ घूर रहा था।
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रमेश जीप में आगे बैठा और बिना कोई वक़्त गँवाए उस पउवे (Quarter) को सीधा मुँह से लगा लिया।
"गट... गट... गटक... आअह्ह्ह.... ईस्ससस...!" कड़क दारू की वो भभकती हुई गर्मी रमेश के गले को चीरती हुई सीधे उसके पेट में उतर गई। दारू ने अंदर जाते ही उसके जिस्म को जला सा दिया।

"मटन बड़ा अच्छा बनाया था भाई कादर तुमने बभाऊऊऊ...." नशे में झूलते हुए रमेश ने एक अजीब सी डकार लेते हुए कहा।
"शुक्रिया बड़े बाबू," कादर ने स्टीयरिंग घुमाते हुए बहुत ही शांत और सधे हुए लहज़े में जवाब दिया।
रास्ते में हकीम लकड़द्दीन को उनके घर उतारने के बाद, जीप अब सीधा उस पुरानी हवेली की ओर बढ़ चली,  हवा में ठण्डापन, रूहानियत, सन्नाटा और मिट्टी की महक थी।

"कैसा लग रहा है यहाँ गाँव में आ कर?" कादर ने जीप के शीशे (Rear View Mirror) से पीछे बैठी कामिनी की आँखों में देखते हुए एक गहरा सवाल पूछा।
"अब... अब अच्छा लग रहा है," कामिनी ने कादर की आँखों में आँखें डालते हुए एक बेहद मादक और नशीली मुस्कान के साथ जवाब दिया। उस एक छोटी सी मुस्कान में बहुत कुछ छुपा हुआ था, ये ठंडी रूहानी हवा कामिनी के जिस्म के पोर पोर को सहला रही थी.

थोड़ी ही देर में हवेली आ गई। चारों तरफ एक भारी सन्नाटा पसरा हुआ था।
"अच्छा रमेश बाबू, मैं चलूँ अब," कादर के मुँह से 'चलने' का नाम सुनते ही कामिनी का मुस्कुराता हुआ चेहरा पल भर में उतर गया।

रमेश जैसे ही जीप से नीचे उतरा, दारू ने अपना पूरा असर दिखा दिया। उसके पैर लड़खड़ाए और वो धड़ाम से ज़मीन पर गिरने ही वाला था कि कादर के मज़बूत, लोहे जैसे हाथों ने उसे हवा में ही थाम लिया। कादर उसे अपने चौड़े कंधे का सहारा देकर हवेली के अंदर ले गया। पीछे खड़ी कामिनी अपने पति की इस नादानी और बेबसी पर मंद-मंद मुस्कुरा रही थी।

कादर ने रमेश को बाहर आँगन में बिछी चारपाई पर लिटा दिया।
"थैंक... यू... कादर भाई..." खरं... खरररम... अगले ही पल रमेश खर्राटे मारते हुए पूरी तरह बेसुध हो गया। दुनिया इधर की उधर हो जाए, पर अब रमेश सुबह से पहले आँख नहीं खोलने वाला था।

अब उस आँगन में कोई तीसरा नहीं था। ऊपर खिली हुई रुपहली चांदनी रात, जिस्म को छूकर गुज़रती हुई सर्द ठंडी हवा और कामिनी का सुलगता हुआ बदन।
कामिनी की नशीली आँखों में हवस के लाल डोरे तैरने लगे थे। सामने कादर खड़ा था, जिसका दिल भी अब अपनी चौड़ी पसलियों में बेतहाशा धड़कने लगा था। एक अजीब सा रूहानी और मादक मौसम उन दोनों के जिस्मों को अपने घेरे में ले चुका था। 

कादर से अब ये हुस्न देखा नहीं जा रहा था, कब्जे मे ले लेना चाहता था, जैसे ही अपना पहला कदम कामिनी कि ओर बढ़ाया...
"रुको... मैं अभी आई..." कामिनी हाँफती हुई वहाँ से भागी और सीधे हवेली के बाथरूम में घुस गई।
बाथरूम के अंदर जाते ही कामिनी ने अपनी लाल साड़ी और पेटीकोट को एक ही झटके में अपनी कमर के ऊपर तक खींच लिया और फर्श पर उकड़ूँ बैठ गई।

"सससससररररर..... ससससस..... पपुरररररर....!
कभी देर से रोकी हुई पेशाब की एक तेज़ और गर्म धार कामिनी की सूजी हुई चुत से फूट पड़ी। उस तेज़ धार के साथ-साथ डाइनिंग टेबल पर फ़ौजा सिंह का जो गाढ़ा, सफेद वीर्य कामिनी की बच्चेदानी में लबालब भर गया था, वो भी अब घुलकर बाहर बहने लगा। पेशाब की उस तेज़ धार ने कामिनी की चुत की पूरी तरह से सफाई कर दी थी। पीले पानी के साथ वो सफ़ेद गाढ़ा रस ज़मीन की नाली में बह गया।
फ़ौजा सिंह कि निशानी पेशाब के साथ बहती जा रही थी,
टप... टप... टापाक... के साथ आखिरी बून्द भी चुत से छलक कर फर्श पर पड़ी, कामिनी का बदन झंझना गया, 
खड़े होते ही कामिनी के हाथ फेववारे के हैंडल पर घूम गए, 
फररर.... ससससररर.......
बाथरूम के अंदर ठंडे पानी की धार कामिनी के जिस्म पर गिर रही थी। वह अपनी हथेलियों से रगड़-रगड़ कर अपनी देह से फ़ौजा सिंह के उस वहशी और खुरदरे स्पर्श की आख़िरी छाप को भी मिटा देना चाहती थी। पानी उसके पैरों से होता हुआ नाली में जा रहा था और अपने साथ आज रात की सारी गंदगी बहा ले जा रहा था। 

यह महज़ देह की सफाई नहीं थी, कामिनी अपने जिस्म से पाप को धो रही थी.
या यूँ कहिये पुराने निशान, फ़ौजा सिंह का स्पर्श, उसकी दी उत्तेजना सब धो रही थी.
अपने वजूद को पवित्र कर रही थी, फिर से अपवित्र होने के लिए.

नहाने के बाद कामिनी ने कोई साड़ी या भारी कपड़ा नहीं चुना। उसने एक बेहद महीन, सूती सफ़ेद रंग का गाउन अपने बदन पर डाल लिया। इस गाउन के अंदर कोई ब्रा नहीं थी, कोई पैंटी नहीं थी। आज कामिनी ने अपनी देह को हर उस बंदिश, हर उस मर्यादा और घुटन से पूरी तरह आज़ाद कर दिया था जिसने उसे इतने सालों तक कैद करके रखा था। वह अंदर से बिल्कुल आज़ाद और हवा की तरह हल्की महसूस कर रही थी।

बाहर आँगन के मद्धम अँधेरे में कादर खान बेताबी से खड़ा था। उसकी कसरती छाती तेज़ साँसों के कारण ऊपर-नीचे हो रही थी। वो एक प्यासे मुसाफिर की तरह उस दरवाज़े के खुलने का इंतज़ार कर रहा था।

लकड़ी के पुराने दरवाज़े की हल्की सी 'चर्रर्र...' आवाज़ हुई और कामिनी बाहर आई।
आसमान से छनकर आती चाँद की उस दूधिया और ठंडी रोशनी में कामिनी को देखते ही कादर की साँसें जैसे उसके हलक में ही अटक गईं। कादर मुँह बाये, बिना पलक झपकाए बस अपनी जगह पर पत्थर की तरह जम गया।
कामिनी के घने, काले और गीले बालों से पानी की बूँदें टपक-टपक कर उसके सफ़ेद गाउन के कंधों और सीने को भिगो रही थीं। पानी लगते ही वो बारीक सूती कपड़ा पारदर्शी (Transparent) हो गया था,  कामिनी के भारी स्तनों की गोलाई गीले कपड़े में साफ़ छलक रही थी, हल्की सी ठंडक व अंदर की भभकती उत्तेजना के कारण उसके दोनों निप्पल तन कर उस कपड़े को चीर कर बाहर आने को बेताब थे।

सफ़ेद गाउन में, भीगे बालों के साथ कामिनी सच में स्वर्ग से उतरी किसी अप्सरा जैसी लग रही थी। उसके चेहरे पर अब कोई खौफ़ नहीं था, बल्कि एक अजीब सी आज़ादी, एक सम्मोहक शांति और अपनी हवस की खुली, बेशर्म स्वीकृति थी।
रात का सन्नाटा, दूर झींगुरों की आवाज़ और हवा में घुली कामिनी के गीले जिस्म की ताज़ा, मादक महक... कादर उस नज़ारे को बस पी लेना चाहता था।
कादर अपने सूखे होंठों पर जीभ फेरते हुए कुछ कहने के लिए आगे बढ़ा ही था कि...
कामिनी ने बिना कोई लफ़्ज़ कहे, आगे बढ़कर अपने नरम, गोरे और ठंडे हाथों से कादर के उस मज़बूत, खुरदरे, गर्म हाथ को अपनी गिरफ़्त में ले लिया। कामिनी के उस हलके से स्पर्श ने कादर की नसों में बिजली दौड़ा दी।

कामिनी ने अपनी नशीली आँखों से कादर की आँखों में झाँका, उसकी नज़रों में एक गहरा, खामोश आमंत्रण था। उसने कादर का हाथ पकड़ा और आँगन के एक कोने से हवेली की छत की तरफ जाती उन घुमावदार, पुरानी सीढ़ियों की ओर चल दी।
नीचे रमेश अपनी चारपाई पर खर्राटे ले रहा था, और सीढ़ियों पर सिर्फ कामिनी के गीले पैरों की 'छप... छप...' और जिस्मों से टकराते कपड़ो की हल्की सी सरसराहट गूँज रही थी। कादर एक पूरी तरह से सम्मोहित आशिक़ की तरह, कामिनी की उँगलियों में अपनी उँगलियाँ फँसाए उसके पीछे-पीछे उस चाँदनी से नहाई हुई छत की ओर खिंचा चला जा रहा था।


सीढ़ियों का  घुमावदार और अँधेरा रास्ता खत्म हुआ और दोनों हवेली की खुली छत पर आ गए। छत पर पहुँचते ही एक अलग ही दुनिया का अहसास हुआ। नीचे आँगन में जहाँ एक घुटन भरा सन्नाटा था, वहीं इस खुली छत पर रात की सर्द हवा आज़ादी से बह रही थी। आसमान एकदम साफ़ था और पूरा चाँद अपनी दूधिया रोशनी में नहाया हुआ था।
​कामिनी ने कादर का हाथ छोड़ा और सीधे छत की उस पुरानी ईंटों वाली मुंडेर (Parapet Wall) की तरफ गई। उसने अपने दोनों नरम हाथ उस ठंडी मुंडेर पर रखे और नीचे आँगन की तरफ झाँका।
​नीचे आँगन में ठीक मुंडेर के सीध में रमेश अपनी चारपाई पर पड़ा था। 'खुर्र... फुर्र...' उसके खर्राटों की भद्दी आवाज़ ऊपर छत तक आ रही थी।
​रमेश को इस तरह बेसुध सोते देख कामिनी के चेहरे पर एक अजीब सी, ख़तरनाक और नशीली मुस्कान तैर गई।

 आज उसके अंदर कोई शर्म या डर नहीं था। नीचे एक जाहिल और नामर्द पति मुँह फाड़े सो रहा था, और ठीक उसके सिर के ऊपर, उसकी ही पत्नी अपने आशिक़ के साथ खड़ी थी।

 रमेश का ये खोखलापन, उसकी बेसुध मौजूदकी ने कामिनी की रगों में हवस का एक ऐसा खौलता हुआ लावा भर दिया, जो किसी भी 'सभ्य' समाज की समझ से बाहर था। कामिनी को बहुत ज्यादा उत्तेजना महसूस होने लगी थी ऐसी परिस्थिति मे. एक रोमांच सा जग उठता था.

​तभी पीछे से दबे कदमों से चलता हुआ कादर आया।
​कामिनी को मुड़ने का मौका ही नहीं मिला। कादर का चौड़ा, कसरती और भभकता हुआ गरम सीना पीछे से आकर कामिनी की ठंडी और भीगी हुई पीठ से सट गया।
 गीले सफ़ेद गाउन के आर-पार कादर के जिस्म की मर्दाना गर्मी जब कामिनी की रीढ़ की हड्डी से टकराई, तो कामिनी की आँखें अपने आप बंद हो गईं।
​"स्स्स्स्स्साआआआह्ह्ह..." कामिनी के मुँह से एक गहरी, काँपती हुई सिसकी निकली।

​कादर ने अपने दोनों मज़बूत हाथ आगे बढ़ाए और कामिनी की नाज़ुक कमर को अपनी गिरफ़्त में ले लिया। उसने अपना चेहरा कामिनी की गर्दन के पास झुकाया। कामिनी के गीले बालों से अभी भी पानी की एकाध बूँद टपक रही थी। कादर के खुरदरे होंठों ने कामिनी की उस ठंडी गर्दन को छुआ। यहाँ कोई जल्दबाज़ी, कोई वहशीपना व नहीं था, एक ठहराव था, एक बरसों की प्यास थी।

​कादर ने कामिनी को धीरे से अपनी तरफ मोड़ा।
​चाँद की रोशनी सीधे कामिनी के चेहरे और उसके मादक जिस्म पर पड़ रही थी। कादर की आँखें उस हुस्न को देखकर जैसे ठहर सी गईं। उसने अपने काँपते हुए हाथों से कामिनी के कंधो पर बँधी सूती गाउन की डोरी को पकड़ा और बहुत ही नज़ाकत से उसे खोल दिया।

​'सससससररर... ससस...'
​वो बारीक और गीला सफ़ेद कपड़ा कामिनी के गोरे कंधों से फिसला, उसके भारी तने हुए स्तनों को आज़ाद करता हुआ सीधा छत के ठंडे फर्श पर जा गिरा।
​कामिनी अब पूरी तरह से नंगी, बेपर्दा और आज़ाद थी। चाँद की वो मद्धम रोशनी उसके धुले हुए और सुलगते जिस्म पर ऐसे पड़ रही थी जैसे संगमरमर की कोई तराशी हुई मूरत खड़ी हो। रात की ठंडी हवा जब उसके नंगे जिस्म और कड़क निप्पलों से टकराई, तो कामिनी का पूरा शरीर सिहर उठा।
कामिनी नंगी खड़ी कादर के जिस्म से आती पसीने और मर्दाना गंध को महसूस कर रही थी, उसे जरा भी इल्म नहीं था कि वो एक पराये मर्द के सामने सम्पूर्ण नग्न खड़ी है.
उसके होंठ कांप रहे थे, जिस्म के रोये खड़े हो गए थे.
लेकिन सामने कादर ऐसे देख रहा था जैसे किसी देवी कि मूर्ति हो, बनाने वाले कलाकार कि मन ही मन तारीफ कर रहा ही, एक एक घुमाव, गोलाईया सब अपनी जगह कायदे से थी.
कादर ने चेहरा आगे बढ़ाया और अपने गर्म, खुरदरे होंठ कामिनी के ठंडे और काँपते होंठों पर रख दिए।
​'म्म्म्म्म्म.....'
दोनों के होंठ आपस मे मिल गए, बीड़ी कि गंध कामिनी के महकते मुँह मे घुलने लगी, कामिनी के होंठ खुद से खुल गए, कादर के काले होंठ कामिनी के रसीले लाल होंठो पर छाते चले गए...
​यह कोई आम चुंबन नहीं था। कादर कामिनी के होंठों को बस चूम नहीं रहा था, बल्कि उन्हें अपनी साँसों में घोल रहा था। उसने कामिनी के निचले होंठ को अपने दाँतों में हल्का सा दबाया और अपनी गर्म ज़बान कामिनी के मुँह के अंदर उतार दी।

 कामिनी का पूरा जिस्म इस रूहानी छुअन से पिघलने लगा। उसके नाज़ुक हाथ अपने आप उठे और कादर की चौड़ी पीठ को कसकर जकड़ लिया। दोनों की जीभ आपस में ऐसे उलझ रही थीं जैसे बरसों से बिछड़ी हुई दो रूहें मिल रही हों। थूक और लार एक दूसरे के मुँह मे घुल गई थी.
कामिनी अपने स्तन कादर कर सीने से घिस रही थी, रह रह के उत्तेजना कि बिजली निप्पल मे रास्ते पुरे जिस्म मे फ़ैल रही थी.

​चुंबन की उस गहराई में खोए-खोए ही, कादर के मज़बूत हाथों ने कामिनी के भारी और आज़ाद स्तनों को नीचे से थाम लिया।
 उसकी खुरदरी हथेलियाँ कामिनी के नरम और गोरे उभारों को बहुत ही धीमी लय में, एक इबादत की तरह मसलने लगीं। कादर के अँगूठे कामिनी के तने हुए कड़क निप्पलों के चारो ओर गोल-गोल घूम रहे थे।

​"आआआआह्ह्ह.... कादर... ईस्ससस..." कामिनी एक मीठी सी सिहरन से कसमसा उठी। उसका सिर पीछे की तरफ लटक गया।
औरत का यूँ गर्दन पीछे झुका लेना बहुत कुछ कहता है, जिसे कादर ने भली भांति समझा 
 कादर का चेहरा नीचे झुका और उसने कामिनी के एक कड़क गुलाबी निप्पल को अपने गरम होंठों में भर लिया। वो उसे अपनी जीभ से सहलाते हुए इस तरह चूसने और पीने लगा, जैसे सदियों का कोई प्यासा अमृत पी रहा हो।

 एक स्तन को चूसते हुए कादर का दूसरा हाथ कामिनी के दूसरे स्तन को सहला और मसल रहा था।
​कादर के इस प्यार भरे, धीमे और मादक स्पर्श ने कामिनी को अंदर तक झकझोर दिया। एक औरत जब किसी मर्द के हाथों में खुद को पूरी तरह सुरक्षित महसूस करती है, तो उसका समर्पण देखने लायक होता है।
​"उउफ्फ्फ... कादर... पागल... पागल हो क्या... मत... आह्ह!"
​कामिनी ने काँपते हुए लफ़्ज़ों में एक झूठा सा विरोध किया। वो कसमसाते हुए कादर को रोकना चाह रही थी, लेकिन उसके दोनों हाथ कादर के घने बालों में उलझे हुए थे और उसे रोकने के बजाय, कादर के सिर को अपनी छाती से और कसकर चिपका रहे थे। वो ना जाने कितने समय से इस प्यार भरे छुअन के लिए तरस रही थी।
​कादर के होंठ अब कामिनी के स्तनों से फिसलते हुए उसकी छाती के बीच की घाटी से होते हुए धीरे-धीरे नीचे सरकने लगे। कादर के घुटने जमीन को छू गए.
​वो कामिनी के गोरे पेट को चूमता हुआ उसकी गहरी नाभि तक जा पहुँचा। कादर ने अपनी गर्म और गीली ज़बान कामिनी की नाभि के अंदर डाल दी और उसे गोल-गोल घुमाने लगा।

​"ससस्स्ससाआआआह्ह्हह... उईईई माँ..." कामिनी के मुँह से एक लरज़ती हुई सिसकी निकल पड़ी। नाभि में कादर की ज़बान की वो फड़कन कामिनी की नाभि के ठीक नीचे एक मीठा सा दर्द और भयंकर उत्तेजना पैदा कर रही थी। कामिनी का जिस्म हवा में किसी कमान की तरह तन गया।
​कादर का चेहरा अब और नीचे जा रहा था। कामिनी के जिस्म पर चलती जीभ उसे अहसास करा रही थी कि कादर कि अगली मंजिल क्या है..
"ईईस्स्स..... कादर नहीं... कामिनी ने उसके बालो को पकड़ रोकना चाहा, लेकिन विरोधाभास देखिये, उसके हाथ कादर को रोक रहे थे लेकिन जाँघे खुद से ही थोड़ी खुल गई.

​अब वो कामिनी की नंगी जाँघों के ठीक सामने था। कामिनी की साँसें धौंकनी की तरह चल रही थीं। उसकी टाँगें अपने आप थोड़ी चौड़ी हो गईं। कादर ने अपने दोनों हाथ कामिनी की कमर के पीछे ले जाकर उसे अपने चेहरे के और करीब खींच लिया।
सससन्नणीयफ्फ्फ्फफ्फ्फ़...... आअह्ह्ह.... हुम्म्मफ्फ्फ्फफ्फ्फ़.... कादर ने एक गहरी सांस ले कर छोड़ दिया.
कामिनी कि प्राकृतिक मादक गंध लौट आई थी, रिसती चुत किसी कस्तूरी जैसी महक रही थी.

​कादर ने अपनी गर्म साँसें कामिनी की उस नाज़ुक, गीली और फड़कती हुई पंखुड़ी पर छोड़ीं। साँसों की वो गर्माहट लगते ही कामिनी की जाँघें काँप उठीं। और फिर... कादर की नरम, गर्म ज़बान कामिनी की चुत के नाज़ुक दाने (Clitoris) पर बहुत ही धीमे और प्यार से रेंगने लगी।

​"आआआआह्ह्ह्ह्ह... कादर... मउउउउफ्फ्फम... कादर..."
​कामिनी पूरी तरह टूट गई। यह सिर्फ वासना नहीं प्यार कि छुवन थी. असली मर्दानगी थी.
 कादर की ज़बान कभी दाने को चूमती, कभी चुत की गीली दीवारों को सहलाती।
​कामिनी का समर्पण अब पूरी तरह मुकम्मल हो चुका था। वो अपने हाथों से अपनी ही जाँघों को पकड़े, कादर के उस जादुई स्पर्श में डूबती जा रही थी। उसकी आँखों से इस बेइंतहा सुकून, आज़ादी और प्यार के भारीपन में दो खामोश आँसू छलक कर गालों पर बह निकले।
एक औरत दुख मे भी आंसू बहाती है और असीम आनंद मे भी.

अति उत्तेजना की उस दहलीज पर पहुँचकर कामिनी के जिस्म का सारा संयम, सारी हया टूट गई। बेतहाशा हवस और उस मीठे दर्द से तड़पते हुए, उसने अपना एक गोरा, नंगा पैर हवा में उठाया और उसे सामने घुटनों के बल बैठे कादर के चौड़े कंधे पर रख दिया। पैर के इस तरह उठते ही कामिनी की गीली,  फड़कती हुई चुत अब पूरी तरह से चौड़ी होकर ठीक कादर के चेहरे के सामने खुल गई। चाँद की रोशनी सीधे उसकी उस नाज़ुक गहराई पर पड़ रही थी। 35927501

कामिनी के दोनों हाथ कादर के घने बालों में बुरी तरह उलझ गए। वो पागलों की तरह कादर के सिर को पकड़कर अपनी खुली जाँघों के बीच, अपनी गहराई की ओर पूरी ताकत से धकेलने लगी। उसका बस चलता तो वो अपनी इस बेकरारी में कादर के पूरे चेहरे को ही अपनी उस सुलगती हुई गुफा के अंदर समा लेती।

कादर ने भी अब अपनी वो धीमी इबादत छोड़कर अपनी दीवानगी को आज़ाद कर दिया। उसकी गर्म और मखमली जीभ एक भूखे और जन्मों के प्यासे आशिक़ की तरह कामिनी की सूजी हुई घाटी के हर कोने पर चलने लगी।
"पच... पच्च... चप... पच्च..."
छत के उस रूहानी सन्नाटे में गीले माँस के टकराने और जीभ के फिसलने की मादक आवाज़ें गूँजने लगीं। कामिनी की चुत से उफन कर बहने वाला वो गाढ़ा, गर्म और नमकीन कामरस सीधा कादर के मुँह में भर रहा था और वो उसे बिना एक बूँद बर्बाद किए अपने हलक में उतारता जा रहा था। कादर के लिए यह महज़ एक औरत का पानी नहीं था, वो जैसे सच में स्वर्ग की किसी अप्सरा का अमृत पी रहा था और उसकी हर बूँद से अपनी प्यास बुझा रहा था।

रात की सर्द ठंडी हवा जब कामिनी के सुलगते जिस्म से टकराती, तो उस बहते हुए रस की 'कस्तूरी' जैसी एक मीठी, प्राकृतिक और नशीली गंध को अपने साथ उड़ाकर चाँदनी रोशनी में दूर-दूर तक फैला देती। पूरा माहौल कामवासना कि गंध से मादक हो उठा था।

"आअह्ह्ह.... अस्स्स्स..... कादर... उईईईई माँ.... आह्ह्ह..."
कामिनी की सिसकियाँ अब बेकाबू हो रही थीं। कादर इस कदर पागलपन से कामिनी की चुत को चाट रहा था, उस नाज़ुक गुलाबी दाने को अपने होंठों में खींच कर चूस रहा था, जैसे आज अपनी जीभ की रगड़ से उसे छील ही देगा।

कामिनी अब पूरी तरह से बदहवास हो चुकी थी। वो आँखें भींचे, दर्द और चरम सुख के उस बवंडर में कादर के सिर को अपनी जाँघों के बीच और गहराई में दबा रही थी। वो अपने पैरों के पंजों पर ज़ोर डालते हुए अपनी नंगी कमर को हवा में उठा-उठा कर कादर के मुँह पर बुरी तरह घिस रही थी।
कामिनी का जिस्म मादक सुख से लरजता हुआ चरम सुख की आख़िरी दहलीज़ पर काँप रहा था। कादर की जीभ की लगातार, पागल कर देने वाली रगड़ और नाज़ुक दाने पर होंठों कि चुभन कामिनी के दिमाग़ की नसें सुन्न कर रही थी.

"आआआआह्ह्ह्ह..... कादर... बस... मैं... मैं झड़ने वाली हूँ... ईईईस्स्स्स!" कामिनी का पूरा शरीर अचानक किसी कसी हुई कमान की तरह हवा में तन गया। उसकी जाँघें कादर के चेहरे के दोनों ओर लोहे की तरह कस गईं और उसके मुँह से एक लंबी, काँपती हुई सिसकी निकल पड़ी। उसी पल, कामिनी की नाभि के नीचे खौलता हुआ वो ज्वालामुखी एक भयंकर वेग से फट पड़ा।
आआआह्हः...... इस्स्स्स..... फच... फच....

चरम सुख की लहर ने कामिनी को पूरी तरह से निढाल कर दिया। उसकी चुत के अंदर से कामरस का एक गर्म, गाढ़ा और मीठा फव्वारा फूट पड़ा। कादर ने अपना मुँह नहीं हटाया  बल्कि उसने अपने होंठों को उस फड़कती हुई घाटी से और कसकर चिपका लिया और कामिनी के जिस्म से निकले उस पूरे 'अमृत' को अपनी जीभ पर लेकर सीधे अपने हलक में उतार लिया।

कामिनी हाँफते हुए, पसीने में तर-बतर होकर पीछे की तरफ गिर पड़ी। उसकी साँसें धौंकनी की तरह चल रही थी, उसकी नंगी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी।

ये भी गजब बात थी कामिनी मात्र चाटे जाने से ही झड़ गई थी.
कादर ने अपने मुँह पर लगे कामिनी के रस को अपनी जीभ से चाटा और गहरी साँस लेते हुए खड़ा हो गया।
कुछ पलों तक उस ठंडी छत पर सिर्फ़ दोनों की तेज़ साँसों का शोर गूँजता रहा।

कामिनी ने अपनी भारी आँखें खोलीं। सामने चाँद की दूधिया रोशनी में कादर का वो चौड़ा और मर्दाना जिस्म खड़ा था। कामिनी के दिल में इस वक़्त कोई खौफ़ या बेबसी नहीं थी, बल्कि कादर के लिए बेइंतहा प्यार और एक गहरा समर्पण था। 

कामिनी खुद को काबू कर रही थी। फर्श की ठंडक उसकी जांघो को वापस खड़ा होने का हौसला दे रही थी।

कादर अब रुक नहीं सकता था, उसने अपना कुर्ता निकाल फेंका, अपनी काँपती उँगलियों से अपने पाजामे का नाड़ा खोला और उसे झटके से नीचे खिसका दिया। पाजामा गिरते ही, कादर का वो साँवला, नसों से भरा, सुडौल और लोहे सा सख़्त 'लंड ' आज़ाद होकर चाँदनी रात में पूरी शान से तन गया।
यही तो वो लंड था जिसका डिजाइन दुसरो से अलग था, गुलाबी मोटा सुपाडा हमेशा आज़ाद रहता था,

 जो कि सीधे ऊपर की ओर तन कर कामिनी के चेहरे को छूने को बेताब था.
कामिनी ने अपनी नशीली और डबडबाई हुई आँखों से ऊपर कादर की आँखों में देखा। उसकी उस एक नज़र में प्यास थी, चाहत थी जैसे बताना चाह रही हो यही तो चाहिए था,
कादर मे भी आँखों मे झाँकते हुए पलके झपका दी.

कामिनी ने दोनों नरम और ठंडे हाथों को आगे बढ़ाया और कादर के खौलते हुए, सख़्त मूसल को अपनी हथेलियों में ऐसे भर लिया जैसे कोई बहुत कीमती मूरत हो।
कामिनी के ठंडे हाथों का स्पर्श पाते ही कादर की रगों में करंट सा दौड़ गया।
कामिनी ने अपना चेहरा आगे किया और अपनी लाल, गीली जीभ निकालकर कादर के मोटे, गर्म सुपाड़े को बिल्कुल वैसे ही चूमा, जैसे कोई शहद चख रहा हो।

"ससस्स्साआआआह्ह्ह.... मैडम जी ..."कादर के मुँह से बेतहाशा सुकून की एक भारी सिसकी निकल पड़ी। उसने अपने दोनों हाथ कामिनी के सिर और उसके खुले, घने बालों पर रख दिए।
कामिनी ने अपने होंठों को गोल किया और कादर के सख़्त माँस को धीरे-धीरे, बिना किसी जल्दबाज़ी के अपने मुँह की गहराई में उतार लिया।
'स्लर्प्प... चप... चप... उम्म्म्म...कामिनी का मुँह पसीने और मर्दाना कैसेली गंध से भर गया.
मुँह के अंदर की  गीली, गर्म और मखमली पकड़ कादर के होश उड़ा रही थी। कामिनी का सिर एक बेहद मादक और सधी हुई लय में आगे-पीछे होने लगा। वो कादर के लंड को सिर्फ चूस नहीं रही थी, बल्कि अपनी जीभ से उसकी एक-एक नस को सहला रही थी। कादर की आँखें बंद हो गईं, उसकी गर्दन पीछे की तरफ लटक गई और वो कामिनी के उन गीले बालों को अपनी मुट्ठी में भींच कर उस जन्नत के अहसास में डूबता चला गया।

कादर के जिस्म की नसें अब फटने को तैयार थीं। कामिनी के मुँह की  गर्म और मखमली पकड़ उसकी सारी बर्दाश्त को ख़त्म कर रही थी। इससे पहले कि वो उसी के मुँह में झड़ जाता, कादर ने अपने दोनों हाथ कामिनी के गालों पर रखे और उसे बहुत ही प्यार से पीछे किया।
"आअह्ह्ह....बस मैडम जी ...मेरी बारी ..." कादर की आवाज़ कांप रही थी.
कुदरत ने ये तोहफा सिर्फ औरतों को ही दिया है कि वो एक बार झड़ने के बाद तुरंत उत्तेजित हो जाती है, लेकिन मर्द बेबस हो जाता है.
कादर नहीं चाहता था कि मंजिल तक पहुंचने से पहले उसका लंड दम तोड़ दे.

कादर ने अपना सूती कुर्ता, जो उसने मुंडेर के पास उतारा था, छत के ठंडे फर्श पर बड़े ही सम्मान से बिछा दिया। यह महज़ एक कपड़ा नहीं था, बल्कि अपनी रानी के लिए बिछाई गई एक इबादत की चादर थी। उसने कामिनी को बाहों में उठाया और बहुत ही नज़ाकत से उस कुर्ते पर लिटा दिया।
नीचे फर्श की सर्द ठंडक और ऊपर कादर के कसरती जिस्म की दहकती, पसीने से भीगी हुई गर्मी ने कामिनी को झकझोड़ दिया, उसकी रीढ़ मे करंट दौड़ने लगा.

कादर ने बड़ी ही नजाकत से कामिनी की जांघो को खोल दिया, मोटी सुडोल जांघो का एक दूसरे से अलग होना था कि उसके बीच कि खूबसूरती झाँकने लगी, जन्नत का दरवाजा खुला हुआ था, जहाँ से शहद चु रहा था.

हालांकि फ़ौजा सिंह ने इस दरवाजे पर ठोंकर मार मार के उसे फैला दिया था, कादर ने अपने दोनों हाथों की उँगलियों को कामिनी की उँगलियों में फँसा कर उन्हें ज़मीन से सटा दिया। दोनों की निगाहें एक-दूसरे से ऐसे उलझी थीं जैसे दुनिया में अब कोई तीसरा बचा ही ना हो। चाँद की दूधिया रोशनी उन दोनों के सुलगते जिस्मों पर पड़ रही थी।
कादर ने अपनी कमर को हल्का सा आगे किया और अपने कड़क, गर्म और सुडौल मर्दानेपन को कामिनी की उस सूजी हुई, रस से भीगी घाटी के ठीक मुहाने पर टिका दिया।
कादर ने कामिनी की आँखों में देखते हुए, एक बहुत ही धीमा , गहरा और प्यार भरा धक्का दे दिया.
"आआआआह्ह्ह्ह..... कादर...."

​"आआआआह्ह्ह्ह..... उईईईई... कादर...."
​कादर का वो सख़्त और तपता हुआ सिरा जैसे ही कामिनी की उन तंग और गीली दीवारों के अंदर फिसला, कामिनी का पूरा जिस्म एक मीठे दर्द से तन गया। कादर आधा अंदर जाकर रुक गया, ताकि कामिनी का जिस्म उस चौड़ाई और गर्माहट को अपना सके।
पहले से खुली और गीली चुत मे लंड बिल्कुल आराम से समा गया, लेकिन लंड कि गर्माहट ने कामिनी को सिसकने पर मजबूर कर दिया.

​"दर्द हो रहा है?" कादर ने कामिनी के माथे से पसीने की बूँदें हटाते हुए फुसफुसाया।
"नहीं... और अंदर आओ... पूरा अंदर..." कामिनी ने सिसकते हुए अपने दोनों पैरो को और ज्यादा फैला लिया.
​कादर ने एक गहरी साँस ली और अपनी कमर को आगे की तरफ पूरी ताकत से धकेल दिया।
​'गच्चच्च....!'
​कादर का पूरा का पूरा मूसल कामिनी की गहराई को नापता हुआ उसकी बच्चेदानी के मुहाने से जा टकराया। कामिनी की साँसें उसके हलक में अटक गईं। उसकी नाभि से लेकर गले तक एक तेज़ करंट सा दौड़ गया। यह जुड़ाव इतना मुकम्मल था कि कामिनी को लगा जैसे उसके अंदर का सारा सूनापन हमेशा के लिए भर गया हो।
जब कादर पूरी गहराई तक कामिनी के अंदर समा गया, तो दोनों के जिस्म बिल्कुल एक हो गए। उसी पल, कामिनी की बंद आँखों से सुकून का एक खामोश आँसू छलक कर कादर के हाथों पर आ गिरा।
कादर ने कामिनी के माथे को चूमा और अपनी कमर को एक धीमी, मादक और रूहानी लय में चलाना शुरू किया।
"थप... पच्च... थप... पच्च...'

​कादर ने कामिनी के होंठों को अपने होंठों में कैद किया और अपनी कमर को एक बेहद मादक, धीमी और गहरी लय में चलाना शुरू किया।
​'स्लिश... पच्च... थप... पच्च...'
​शुरुआत में धक्के बहुत धीमे थे। कादर का लंड पूरा बाहर आता, कामिनी की चुत की पंखुड़ियाँ उस खिंचाव से बाहर की तरफ मुड़ जातीं, और फिर वो वापस पूरी ताकत से अंदर समा जाता। कामिनी का हर एक रोम इस सुख को पी रहा था।
​"उउउउफ्फ्फ.... आआह्ह्ह... कादर... ऊफ्फफ्फ्फ़... कादर..." कामिनी की कामुक सिसकियाँ हवा में गूँज रही थीं। 

​जैसे-जैसे वक़्त बीतता गया, कादर की रफ़्तार और जंगली होती गई।
​'थपाक्क... चपाक... थपाक्क...!'

कादर ने अपनी रफ़्तार बढ़ा दी। उसके झटके अब किसी आशिक़ के नहीं, बल्कि एक उत्तेजित मर्द के थे। कादर का प्रचंड रूप अब सामने आ रहा था।
"गच्च... गचाक्क... गच्च...!'

कादर का कड़क और नसों से भरा लंड पूरी बेरहमी और गहराई से कामिनी की चुत को चीरता हुआ सीधा उसकी बच्चेदानी पर प्रहार कर रहा था। हर धक्के पर कामिनी को ऐसा लग रहा था जैसे उसकी कोख आज अंदर से फट जाएगी, लेकिन दर्द की वो इंतिहा उसे एक ऐसा पागलपन और नशा दे रही थी जिसकी वो बरसों से प्यासी थी।
कादर के हर भयानक धक्के के साथ कामिनी के भारी, दूधिया और आज़ाद स्तन हवा में बेतहाशा उछल रहे थे। वो कभी दाईं तरफ गिरते, तो कभी बाईं तरफ। 
कादर से कामिनी के स्तनो कि बेक़रारी देखी ना गई, उसने अपने दोनों लोहे जैसे मज़बूत हाथों से कामिनी के उछलते हुए स्तनों को पूरी ताकत से अपनी मुट्ठी में भींच लिया। उन्हें किसी स्पंज की तरह बुरी तरह मसलते हुए अपनी कमर को आगे पीछे चलाने लगा.
धच... धच... पच.... पच... आअह्ह्हम...
जोर से... कामिनी कि चुत पानी फेंक रही थी.
सम्भोग का संगीत दूर दूर तक फ़ैल रहा था.

इसी बीच कादर का चेहरा कामिनी की गर्दन में धँस गया। उसकी गर्म, खुरदरी ज़बान कामिनी की पसीने से भीगी गर्दन को चाट रही थी, चूम रही थी और बीच-बीच में अपने दाँतों से उसकी गोरी खाल को हल्का-हल्का काट रही थी।
कामिनी का चेहरा इस वक़्त देखने लायक था। उसकी आँखें ऊपर की तरफ पलट गई थीं, मुँह आधा खुला हुआ था और उसके काँपते होंठों से लार की एक महीन तार बह रही थी। वो अब सुबक नहीं रही थी, बल्कि पूरी तरह से खुलकर, बेखौफ़ होकर चीख रही थी।

"आआआआह्ह्ह्ह.... और ज़ोर से... फाड़ दो मुझे... हाँ कादर... और अंदर... ईईईईस्स्स्स!" उसे अब कोई परवाह नहीं थी कि वो हवेली की खुली छत पर है, या नीचे उसका पति सो रहा है। इस वक़्त अगर नीचे सो रहा रमेश अचानक उठकर उसके सामने भी आ खड़ा होता, तब भी कामिनी के ये झटके, ये कामुक चीखें और ये चुदाई रुकने वाली नहीं थी। वो दुनिया, समाज, हया और डर... सब कुछ भूलकर हवस के उस समंदर में पूरी तरह डूब चुकी थी।

तभी, उस चरम की गर्मी के बीच, कादर ने कामिनी की कमर को अपने हाथों में कसकर जकड़ा और एक ही झटके में उसे हवा में पलट कर अपने ऊपर ले लिया।
अब कादर नीचे फर्श पर बिछे कुर्ते पर लेटा था और कामिनी उसके ठीक ऊपर थी।

पीछे से चाँद की उस दूधिया रोशनी में कामिनी की चौड़ी और भारी गांड का वो नज़ारा किसी को भी पागल कर देने वाला था। कामिनी जब हवा में ऊपर उठ कर पूरी ताकत से कादर के सख़्त खूँटे पर वापस नीचे धँसती, तो उसकी मोटी और भारी गांड के दोनों मांसल हिस्से (Cheeks) कादर की मज़बूत जाँघों से ज़ोर से टकराते।
, "धप... ढाओ... थप... थाओ....!' माँस के टकराने की ये भारी, गूँजती मादक आवाज़ें रात के सन्नाटे को पूरी तरह चीर रही थीं। जब कामिनी ऊपर की ओर उठती, तो उसकी गांड का तंग और गुलाबी छेद (Anus) लंड के खिंचाव के कारण हल्का सा खुल जाता, और जैसे ही वो पूरी ताकत से नीचे बैठती, वो छेद वापस कसकर बंद हो जाता।
चुदाई की इस अंधी रफ़्तार में कामिनी की चुत से इतना रस बहने लगा था कि वो कादर के लंड से होता हुआ, पानी की धार की तरह नीचे छत के फर्श पर टपक रहा था "टप... टपाक्क... टप...!" 
कामिनी पूरी सिद्दत से कादर के लंड पर उछल रही थी... पट... पट.... थप.. थप...
 कामिनी आगे की तरफ झुकी और उसने अपने होंठ कादर के होंठों पर रख दिए। इस झुकाव से कामिनी के दोनों भारी, पसीने से भीगे स्तन कादर की बालों से भरी चौड़ी छाती से पूरी तरह दब गए।

 जब कामिनी ऊपर-नीचे होती, तो कादर की छाती के खुरदरे बालों की रगड़ कामिनी के तने हुए निप्पलों पर बिजली सी गिरा देती, एक झुंझुनी सी चुत तक पहुंच जाती,
कामिनी कादर के होंठों को पागलों की तरह चूसते हुए सिसक रही थी।
"उउउम्मम्म.... आआह्ह्ह... कादर... स्स्स्स्स्स..."
कुछ देर ऐसे ही होंठ चूसने और रगड़ खाने के बाद, कामिनी पूरी तरह से सीधी होकर बैठ गई। कादर का पूरा का पूरा 10 इंच का लंड अब जड़ तक कामिनी की चुत में धँसा हुआ था, और उसके अंडकोष कामिनी की गांड से टकरा रहे थे।

कामिनी ने अब ऊपर-नीचे होने के बजाय, कादर के लंड पर अपनी कमर को आगे-पीछे (Grinding) चलाना शुरू कर दिया। उसकी चुत की दीवारें कादर के लंड की एक-एक नस को पूरी गहराई से रगड़ रही थीं।
कादर के दोनों हाथ कामिनी के स्तनों पर थे, वो उन्हें नीचे से उठाकर पागलों की तरह मसल रहा था, Sad-Satisfied-Gadwall   गुलाबी निप्पलों को अपनी उँगलियों के बीच मरोड़ रहा था।

कामिनी पूरी तरह से बदहवास और उत्तेजित हो चुकी थी। उसने अपने दोनों हाथ हवा में ऊपर उठा लिए। उसकी उँगलियाँ उसके अपने ही खुले, पसीने से भीगे बालों में उलझ गईं और वो उन्हें सहलाते हुए, किसी नागिन की तरह कादर के ऊपर मचलने लगी। 27070861

उसका सिर पीछे की तरफ लटक गया था, आँखें बंद थीं, और छाती गर्व से आगे की ओर तनी हुई थी। चाँदनी रात में वो इस कदर पागल हो रही थी जैसे आज अपने जिस्म का सारा रस, अपनी सारी हवस इसी छत पर निचोड़ कर ही मानेगी।

कामिनी अब इंसान नहीं, हवस में अंधी हुई एक नागिन बन चुकी थी। वो पागलों की तरह कादर के सख़्त लंड पर अपनी नंगी कमर को गोल-गोल घिस रही थी, और अगले ही पल किसी जंगली घोड़ी की तरह उस मूसल पर बेतहाशा कूदने लगती।

उसकी चीखें और चिल्लाहट अब रात की उस सर्द हवा में बेखौफ़ गूँज रही थीं। इस वहशी रगड़ से कामिनी को अपनी चुत के ठीक ऊपर और नाभि के नीचे एक अजीब सी खौलती हुई आग, एक भयंकर सुलगन महसूस होने लगी थी। उसे लग रहा था जैसे वो बस अब फटने ही वाली है, उसका वो नाभि के नीचे का खौलता ज्वालामुखी किसी भी पल फूट पड़ेगा।

कामिनी इतनी तेज़ और जंगली तरीके से कूद रही थी कि हर गहरे धक्के पर कादर के टट्टे उसकी भारी, गोल गांड के नीचे बुरी तरह दब जा रहे थे। कामिनी की गांड की गहरी लकीर पसीने और कामरस से पूरी तरह भीग चुकी थी और चाँद की रोशनी में चाँदी की तरह चमक रही थी। 19492281
'ठप... ठप... धड़... धड़...!'

माँस के टकराने की ये भयानक आवाज़ें छत पर गूँज रही थीं। इतनी तेज़ी से कूदने के कारण कामिनी की गोरी जाँघें अब दर्द से ऐंठने लगी थीं, लेकिन रुकना अब उसके बस में नहीं था। कादर का वो नसों से भरा, खुरदरा लंड कामिनी की चुत की गहराई में मौजूद एक-एक नस को पूरी बेदर्दी से रगड़ रहा था।
कामिनी अपने घुटनों के बल हवा में पूरा ऊपर उठती, और जैसे ही कादर के लंड का मोटा, गुलाबी सुपाड़ा चुत के होंठों से बस बाहर झाँकने लगता... वो बिना कोई रहम किए एक भयंकर झटके के साथ—'थाड़...!' पूरी ताक़त से वापस उस लंड पर बैठ जाती। पूरा का पूरा लंड एक ही झटके में बच्चेदानी से जा टकराता।

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"आआआआह्हः... कादर.... हंफ... हमफ़्फ़्फ़... आह्ह... उईईईई माँ!" कामिनी की सिसकियाँ और हाँफती हुई साँसें काबू से बाहर थीं।

नीचे लेटे कादर की हालत भी कामिनी के इस खौफ़नाक और मादक हमले से ख़राब होने लगी थी। कोई भी मर्द इतने भयानक सुख को ज़्यादा देर तक नहीं सँभाल सकता था। कामिनी की चुत की फड़कती हुई, गर्म और तंग गिरफ़्त ने कादर के दिमाग़ की नसें झनझना दी थीं।

"ईईईस्सस्स.... मैडम जी.... उउउफ्फ्फ्फ...." कादर ने अपने दाँत पीसते हुए, कामिनी के उछलते हुए भारी कूलहों (Hips) को अपने लोहे जैसे हाथों में और कसकर जकड़ लिया। कादर की साँसें भी अब उखड़ने लगी थीं। कामिनी की इस वहशी घुड़सवारी ने कादर को भी उसके चरम के बिल्कुल मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया था। उसका सुलगता हुआ वीर्य अब उसके लंड की नसों में उफन कर आज़ाद होने के लिए बेताब हो उठा था।
दोनों का चरम सुख अब बस एक आख़िरी, सबसे गहरे और भयानक झटके का मोहताज था।

"हमफ.... हमफ.... आअह्ह्ह... आअह्ह्ह.."
कामिनी की साँसें अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुकी थीं। वो बुरी तरह हाँफ रही थी, सिसक रही थी। कादर के लोहे जैसे हाथों में उसके दूधिया स्तन बुरी तरह रगड़ खा रहे थे, बेदर्दी से मसले जा रहे थे। कादर का पागलपन भी अब अपनी आख़िरी हदें पार कर रहा था, वो अपनी उँगलियों के बीच कामिनी के कड़क निप्पलों को फँसाकर उन्हें एक मीठे और कामुक दर्द के साथ नोचने पर उतारू हो चुका था।

 ये मदमस्त और रूहानी चुदाई दोनों की शारीरिक बर्दाश्त से बाहर हो चुकी थी।
"आआआह्ह्ह... कादर..." कामिनी ने हवा में उठकर एक आख़िरी, सबसे ऊँचा झटका लिया और अपनी पूरी ताक़त के साथ "धड़ाम...! कादर के नसों से भरे सख़्त लंड पर वापस बैठ गई।

"आआआआह्ह्ह..... ईईईईस्स्स्स...." ये वो आख़िरी और सबसे गहरी टक्कर थी, जिसने कामिनी की कोख तक झकझोर दिया और उसकी चुत के, उसके सब्र के सारे बाँध एक साथ तोड़ दिए। कामिनी किसी उफनती हुई नदी की तरह भलभला कर झड़ने लगी। चरम सुख के उस तूफ़ान में, उसकी कमर अपने आप आगे-पीछे होकर कादर के लंड पर रेंगने लगी, पागलों की तरह घिसटने लगी।
लेकिन इस रात के सन्नाटे में सिर्फ़ कामिनी की चीखें ही नहीं गूँज रही थीं, बल्कि कादर की एक भारी, मर्दाना सिस्कारी भी इसमें शामिल हो गई। कामिनी को इस कदर बदहवास होकर झड़ता देख कादर का भी सारा संयम टूट गया। उसने नीचे से अपनी कमर उठाई और कामिनी की बच्चेदानी के मुहाने पर धड़... धड़.... धड़... करके तीन सबसे गहरे, भयानक और तेज़ झटके लगा दिए।
जैसे तैसे कादर ने अपने सब्र को बचा रखा था लेकिन कामिनी को झाड़ता देख ये सब्र भी टूट गया.
"पच्च... फच्च... हंफ... हम्म्म्म...!' कादर का पूरा शरीर अकड़ गया और उसके तपते हुए लंड से गाढ़े, सफ़ेद वीर्य की मोटी धारें कामिनी की गहराई में छूटने लगीं। कादर का खौलता हुआ वीर्य कामिनी की खुली चुत को लबालब भरने लगा।

अपने अंदर कादर के वीर्य कीआग जैसी गर्मी पाकर  "फच्च.. फच्च...'—करती कामिनी की चुत एक बार फिर से फड़क उठी। उसकी अंदरूनी दीवारें अपने आप सिकुड़ने लगीं और कादर के लंड को चूस-चूस कर उसकी आख़िरी बूँद तक निचोड़ने लगीं।

इस अकल्पनीय चरम सुख के बाद कामिनी के जिस्म की रही-सही जान भी निकल गई। किसी कटे हुए पेड़ की तरह कामिनी का निढाल और पसीने से नहाया हुआ जिस्म, कादर के चौड़े सीने पर भरभरा कर धाराशायी हो गया। दोनों के जलते हुए जिस्म एक-दूसरे से चिपक गए और उनकी तेज़, हाँफती हुई साँसें आपस में टकराने लगीं।

धीरे-धीरे साँसों का वो तूफ़ान शांत होने लगा।
कादर ने अपने मज़बूत हाथ कामिनी की नंगी पीठ पर रख दिए और उसके पसीने से भीगे बालों को सहलाने लगा। कामिनी का रोम-रोम आज शांत हो चुका था। 

कादर के सीने की धड़कन सुनते हुए कामिनी की भारी आँखें धीरे-धीरे बंद होती चली गईं।
नीचे आँगन की चारपाई पर रमेश बेख़बर और बेसुध सो रहा था। और ऊपर छत के ठंडे फर्श पर कामिनी की फट चुकी चुत में कादर का सख़्त लंड अभी भी पूरी गहराई तक फँसा हुआ था।

इस हवस, वासना और 'मुकम्मल इबादत' के अनोखे संगम का गवाह सिर्फ़ ऊपर चमकता हुआ पूरा चाँद और रात की सर्द हवा थी, जो उनके नंगे जिस्मों को सहला रही थी।
 एक-दूसरे की रूह में उतरकर चरम सुख पाने के बाद, दोनों प्रेमी उसी छत के फर्श पर एक-दूसरे की बाहों में समाए, बेहोशी और एक बेहद गहरे, सुकून भरे आग़ोश में डूब गए।

क्रमशः 


Buy me a wine 
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4 Comments

  1. Ye mamuli si rashi sirf aapko support karne aur aapki mehnat ki sarahana ke liye hai. Aap jis lagan aur khoobsurti se har update dete hain, uske liye meri taraf se yeh ek chhota sa yogdan samajhiye. Aane wale har update par main isi tarah hamesha aapka saath aur support karta rahunga.

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    Replies
    1. कामुक वाइनApril 27, 2026 at 10:30 PM

      थैंक यू दोस्त.
      आपका सहयोग और सुझाव दोनों अनमोल है मेरे लिए.

      Delete
  2. Har bar ki tarha shandar update tha.. kadar ne ake kamini ko bacha diya aur ab kamini ko chodke maze bhi de Raha hai... Itne dino se kamini chudne ke liye tadap rahi thi aur ab ek hi raat mai kamini 2 logo ne chod diya kamini ko

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  3. Ye kamini ke jivan ki yadgaar chudai thi
    Kamini to kadar pe havi ho gayi
    Pathak ab kamini aur kadar ke milan se santusht ho chuke honge
    Ab sirf gaon me 2 din hi bache hai
    Kadar baad me shehar bhi aa sakta hai
    to aap ab gaon ke baki character se kamini ko shant karwa dijiye
    Jane se pehle sarpanch ko aur ek mauka jarur milna chahiye

    Kamini sambhog se pehle jo mardo ko lalchati hai usme bahot maja aa raha hai
    Aise hi kamini apna green signal deti rahe apne andaaz se

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