सुबह का सूरज चढ़ आया था और आज की हवा में एक अजीब सी बेचैनी थी। रमेश ने कल रात जो ख़याली महल सजाया था, उसकी नींव ही आज सुबह दरकती नज़र आ रही थी। वो सुबह जल्दी ही उठ गया और सीधा गाँव के बाहर बने मज़दूर चौराहे की तरफ भागता हुआ पहुँचा। उसे डर था कि कहीं सुलेमान जैसे 'हीरे' को कोई और मज़दूरी के लिए न ले जाए।
वो वहाँ पहुँचे तो उसकी साँसें फूल रही थीं, लेकिन चौराहे पर पहुँचते ही उसे जैसे तगड़ा झटका लगा। वहाँ भीड़ तो थी, लेकिन सुलेमान का कहीं नामोनिशान नहीं था। वो इधर-उधर भागकर, हड़बड़ाते हुए हर चेहरे को देख रहा था, पर वो विशालकाय फौलादी जिस्म कहीं नहीं दिखा।
थक-हारकर उसने वहाँ खड़े कुछ मज़दूरों से पूछा, "अरे भाई... सुनो! वो लंबा-चौड़ा आदमी कहाँ है? जो कल तुम लोगों के साथ खड़ा था, सुलेमान नाम है उसका।"
वहाँ खड़े एक मज़दूर ने अजीब नज़रों से देखते हुए कहा, "कौन लंबा-चौड़ा आदमी साहेब? कौन सुलेमान?"
रमेश वहीं सन्न होकर रह गया। उसे लगा जैसे उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई हो। 'साला, मज़दूर है! आज इस गाँव में, कल किसी और गाँव में...' रमेश का सारा मास्टरप्लान कुछ पल भर में मिट्टी में मिलता दिख रहा था।
रमेश की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अब आगे क्या करे। उसमें इतनी हिम्मत ही नहीं थी कि वो अकेले कामिनी को लेकर उस ख़तरनाक डील पर जा सके। उसका लालची दिमाग़, जो रात भर सुलेमान को ले जाने की तरकीबें बुन रहा था, अब पूरी तरह शून्य हो चुका था।
मुँह लटकाए, आँखों में निराशा लिए, रमेश पगडंडी से ढलान की तरफ वापस गाँव की ओर उतर गया। उसे लग रहा था कि शायद उसका नसीब ही फूट गया है।
रमेश मुँह लटकाए आगे बढ़ा ही था कि गाँव के उस धूल भरे रास्ते के किनारे उसे एक चमचमाती, गहरे काले शीशों वाली SUV खड़ी दिखाई दी।
"साला... इस गरीब गाँव में इतना अमीर कौन आ गया?" रमेश मन ही मन बुदबुदाया।
तभी उस विशाल SUV के पीछे से एक जानी-पहचानी, लंबी-चौड़ी फौलादी आकृति बाहर आती दिखाई दी। रमेश के सूखे और लटके हुए चेहरे पर अचानक एक बड़ी सी मुस्कान तैर गई। उसकी अटकी हुई साँस में साँस आई।
सुलेमान शायद अपनी गाड़ी में बैठकर वापस जाने की तैयारी में था, लेकिन जैसे ही उसकी पैनी नज़र सामने से आते रमेश पर पड़ी... उसने झट से अपनी महँगी कार की चाबी अपनी मैले कुर्ते की जेब में डाल ली।
"अरे... साब आ... आप.. यहाँ?" सुलेमान ने अपनी भारी आवाज़ को एक बेबस मज़दूर की तरह नरम करते हुए कहा।
"ये... कार...?" रमेश ने कुछ अजीब नज़रों से सुलेमान और उस करोड़ों की गाड़ी को एक साथ देखते हुए पूछा।
"साब... वो तो बस उधर झाड़ियों में मूतने गया था। लौटते हुए इतनी शानदार कार खड़ी देखी, तो बस ज़रा नज़दीक से निहारने चला गया," सुलेमान ने बड़ी ही मासूमियत से एक झटके में झूठ बोल दिया।
रमेश ने एक गहरी साँस छोड़ी। उसका घमंडी दिमाग़ तुरंत मान गया "बेचारा गरीब आदमी... ऐसी कार कहाँ इसके नसीब में!"
"अच्छा सुन... एक बहुत बड़ा काम है तेरे लिए। बोल, करेगा?" रमेश ने सीधे मुद्दे पर आते हुए पूछा।
"ननन... नहीं साब, मुझे दूसरे गाँव जाना है। वहाँ काम मिल गया है मुझे," सुलेमान ने जानबूझकर भाव खाते हुए कहा। वैसे भी उसका काम इस गाँव में ख़त्म हो चुका था।
"अरे गोली मार उस मज़दूरी को! आख़िर कब तक ये गारा-मिट्टी ढोएगा, खड्डे खोदता रहेगा?" रमेश ने अपना रुतबा दिखाते हुए कहा। "सुन... मैं और कामिनी नैनीताल जा रहे हैं किसी काम से। मैंने सोचा कि तुझे भी अपने साथ ले चलूँ।"
सुलेमान ये बात पहले से ही जानता था। आख़िर उसे भी तो उसी डील के लिए वहीं जाना था। लेकिन किस्मत का खेल तो देखो, साला रमेश ख़ुद उसे न्योता देने आ गया था। वो भी कामिनी के साथ!
"मममम... मैं... मैं क्या करूँगा साब आप लोगों के बीच?" सुलेमान ने अपना देहातीपन का नाटक जारी रखा।
"अबे घोंचू! हमारे बीच नहीं, मेरे साथ रहना है तुझे। ऐसा समझ कि काम थोड़ा पेचीदा है। तू हट्टा-कट्टा और भारी-भरकम आदमी है, साथ खड़ा रहेगा तो सामने वालों पर थोड़ा वज़न पड़ेगा... समझा?" रमेश ने उसे समझाते हुए कहा।
सुलेमान ने एक बेवकूफ़ देहाती की तरह गर्दन हिला दी। "कक्क... कब चलना है साब?"
"आज शाम को शहर के स्टेशन पर मिलना। ये ले 10 हज़ार रुपये... अपने लिए कुछ ढंग के कपड़े ले लेना, और ये अपना हुलिया थोड़ा ठीक कर लेना। मेरे साथ चल रहा है तू नैनीताल," रमेश ने अपनी जेब से कड़क नोटों की गड्डी निकालकर सुलेमान के हाथ में थमा दी।
सुलेमान के चेहरे पर एक अजीब सी ख़ुशी आ गई थी, आँखों में एक हल्की सी लालिमा चमक उठी थी। रमेश को लगा कि साला ये मज़दूर 10 हज़ार रुपये एक साथ देखकर ख़ुशी से पागल हो गया है।
लेकिन हकीक़त कुछ और ही थी। सुलेमान की आँखों के सामने वो 10 हज़ार नहीं, बल्कि कामिनी का गदराया हुआ जिस्म, उसका कामुक और मासूम चेहरा दौड़ गया था। हालाँकि सुलेमान मन ही मन यही चाहता था कि कामिनी जैसी औरत को इस ख़तरनाक अंडरवर्ल्ड के खेल में ना घसीटा जाए, लेकिन अब जब रमेश ख़ुद अपनी बीवी का इस्तेमाल कर रहा है तो वो कर भी क्या सकता है.
"चल, मिलना ज़रूर शाम को," रमेश ने ताकीद की।
"सुलेमान वादे का पक्का है साब... आ जाऊँगा," सुलेमान ने नोट जेब में रखते हुए कहा।
रमेश ख़ुशी-ख़ुशी वहाँ से निकल गया... आज तो जैसे उसके क़दम ज़मीन पर पड़ ही नहीं रहे थे। उसे लग रहा था कि उसने 100 करोड़ की सुरक्षा मात्र 10 हज़ार में ख़रीद ली है।
रमेश के आँखों से ओझल होते ही, सुलेमान का मज़दूर वाला मुखौटा उतर गया। वो वापस अपने असली अवतार में आ गया।
उसने अपनी जेब से अपना महँगा फोन निकाला और नंबर डायल किया।
"सुन हरीश... मैं कार से नहीं, ट्रेन से आ रहा हूँ... और हाँ, स्टेशन पर सारा इंतज़ाम तैयार रखना। सुलेमान हरीश को सारी बात समझाने लगा.
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हवेली पहुँचकर रमेश किसी हवा में उड़ रहे परिंदे की तरह बर्ताव कर रहा था। 100 करोड़ के ख़्वाब ने उसके अंदर एक नई ऊर्जा भर दी थी। उसने झटपट अपने कपड़े पैक किए और हवेली के सारे ज़रूरी कामों की ज़िम्मेदारी सौंपने लगा।
"ताऊजी, पीछे से हवेली का ध्यान रखना... और उस तहखाने का भी," रमेश ने ताऊजी के पास जाकर धीमी आवाज़ में हिदायत दी।
इसके बाद रमेश आँगन में खड़े अपने बेटे बंटी के पास गया। आज उसे अपने अंदर का पिता भी जागता हुआ महसूस हो रहा था।
"बेटा बंटी... अपना ध्यान रखना। हम कुछ ही दिनों में ज़रूरी काम निपटा कर वापस आ जाएँगे," रमेश ने बड़े प्यार से बंटी के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।
लेकिन बंटी ने उसकी इस बात को बिल्कुल सुनी-अनसुनी कर दिया। उसने बस एक हल्की सी तिरछी नज़र से अपने बाप को देखा और कंधे झटक कर वहाँ से हट गया। बंटी के लिए रमेश की कोई अहमियत नहीं थी। बचपन से ही उसने रमेश को सिर्फ़ एक गैर-ज़िम्मेदार, शराब में धुत और अपनी माँ पर हाथ उठाने वाले इंसान के रूप में देखा था। उसके दिल में रमेश के लिए ना कोई इज़्ज़त थी और ना ही कोई तवज्जो। ऊपर से रमेश उसकी माँ का हत्यारा था, ना जाने कैसे बंटी ने खुद को रोके हुआ था.
हालांकि ये सुनहरा अवसर मिल गया था रमेश को बर्बाद कर देने का.
बंटी के दिमाग़ मे कुछ और ही चल रहा था.
सब कुछ तैयार था।
धीरे-धीरे दिन ढलने लगा और हवेली के आँगन में शाम का गहरा साया उतर आया। हवेली के मुख्य दरवाज़े पर शहर जाने के लिए एक पीली टैक्सी आकर खड़ी हो गई।
कामिनी एक बेहद खूबसूरत और शालीन सूती साड़ी पहने, हाथ में एक छोटा सा बैग लिए बाहर आई। उसके चेहरे पर एक अजीब सी कशमकश थी, ज़िंदगी में पहली बार घर की चारदीवारी से बाहर, वो भी इतनी दूर वादियों में घूमने जाने की ख़ुशी, और साथ ही किसी अनजाने ख़तरे का हल्का सा डर। रमेश अपनी पूरी चौड़ में, सीना ताने टैक्सी के पास खड़ा था।
"चलो कामिनी..." रमेश ने दरवाज़ा खोला और कामिनी के साथ टैक्सी में बैठ गया।
इंजन की आवाज़ गूँजी और टैक्सी धूल उड़ाती हुई, नैनीताल के उस लंबे और रहस्यमयी सफ़र के लिए निकल पड़ी।
टैक्सी की लाल बत्तियाँ जैसे ही आँखों से ओझल हुईं, हवेली का माहौल एकदम से बदल गया। हवेली का वो भारीपन, जो रमेश की मौजूदगी और उसके शराबी आतंक से बना रहता था, वो अब पूरी तरह छँट चुका था।
पीछे इस विशाल और शांत हवेली में अब सिर्फ़ तीन लोग ही रह गए थे—बंटी, उसकी उम्र के आस-पास की वो अल्हड़ और कच्ची जवानी वाली फागुन, और शातिर ताऊजी।
ताऊजी आज पुरे दिन कामिनी कि फिराक मे रहे, उसे लगा कल रात के बाद से कामिनी को रोज़ भोगेगा.
लेकिन उसकी किस्मत मे सिर्फ एक रात का ही सम्भोग सुख लिखा था.
कामिनी उसके सामने से उड़ती चली जा रही थी.
कामिनी एक आज़ाद चिड़िया.
समाप्त...
जल्द ही मिलेंगे
कामिनी कि नैनीताल यात्रा मे
कामिनी 3.0

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