कमरे के भीतर शाम का धुंधलका गहराने लगा था। बाहर रमेश के जूतों की खट-खट और बंटी-फागुन की खिलखिलाहट दूर होती जा रही थी। कामिनी अकेले कमरे में खड़ी अपनी देह की उस आग से जूझ रही थी, जिसे दोपहर की बारिश ने बुझाने के बजाय और भड़का दिया था।
उसने अपने शरीर से सारे कपड़े उतार दिए और आईने के सामने खड़ी हो गई। पीली रोशनी में उसका दूध जैसा निखरा बदन दमक रहा था, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी बेबसी थी।
कामिनी ने अलमारी से काले रंग की एक लेस वाली ब्रा निकाली। जैसे ही उसने उसे अपने भारी और उन्नत स्तनों पर चढ़ाया, उसके सख्त और तने हुए निप्पल कपड़े के साथ रगड़ खाकर सिहर उठे। उसने पीछे हाथ कर हुक लगाया, जिससे उसके स्तनों का उभार और भी गहरा होकर बाहर की तरफ छलकने लगा।
अब बारी थी पैंटी की। कामिनी ने रेशमी पैंटी उठाई और उसे अपनी जांघो पर ऊपर चढ़ाया। लेकिन जैसे ही पैंटी का महीन कपड़ा उसकी चुत के होंठों से टकराया...
"आआआहहहह.... आउच!"
कामिनी के मुँह से एक दर्दभरी सिसकारी निकली और उसने झटके से पैंटी खिंच के निकाल दी, उसकी चुत दोपहर की बेतहाशा उत्तेजना से बुरी तरह सूज गई थी। पंखुड़ियाँ किसी पके हुए अंगूर की तरह लाल और संवेदनशील हो चुकी थीं। ज़रा सा स्पर्श भी उसे बिजली के झटके जैसा लग रहा था।
"उउफ्फ्फ... कितनी जलन है," कामिनी ने नीचे झुककर अपनी उस सूजी हुई कली को देखा, जो पसीने और कामरस से गीली होकर चमक रही थी। उसने फैसला किया कि आज वह इसे कैद नहीं करेगी।
उसने पैंटी को किनारे फेंका और बिना कुछ पहने सीधे रेशमी पेटीकोट कमर पर लपेट लिया। पेटीकोट की ठंडी छुअन जब उसकी नंगी और प्यासी चुत से टकराई, तो उसे एक पल के लिए राहत मिली। अब वह नीचे से पूरी तरह आज़ाद थी, साड़ी के परदों के पीछे उसकी उत्तेजना नंगी खड़ी थी।
इसके बाद उसने गहरे लाल रंग का 'डीप नेक' ब्लाउज पहना। ब्लाउज इतना छोटा और तंग था कि उसकी पीठ का बड़ा हिस्सा और उसके स्तनों की गहरी घाटी (Cleavage) साफ नुमाया हो रही थी। कामिनी ने गहरे लाल रंग की साड़ी के लपेटे अपने जिस्म पर चढ़ाने शुरू किए। साड़ी का रेशम उसके कूल्हों और पेट की गोलाई से चिपकता चला गया।
उसने अपने गीले बालों को खुला छोड़ दिया और सुर्ख लाल लिपस्टिक लगाई। आईने में दिख रही औरत वो पुरानी दबी कुचली कामिनी नहीं साक्षात्व कामदेवी लग रही थी,
"तैयार हो कामिनी? देर हो रही है!" बाहर से रमेश की आवाज़ आई।
कमरे की दहलीज पार कर कामिनी जब बाहर आँगन में आई, तो मानो वक़्त ठहर गया। लाल साड़ी का वो रेशमी पल्लू, गहरे गले के ब्लाउज से झांकती गोरी पीठ और चेहरे पर खिंची वो हवस और दर्द की लकीरें... वह साक्षात कामदेवी का अवतार लग रही थी। उसे खुद भी अपनी सुंदरता का अहसास था, उसे पता था कि आज वह जिस रूप में है, पत्थर भी पिघल जाए।
कामिनी ने एक गहरी साँस ली और रमेश के करीब जाकर खड़ी हो गई। उसकी धड़कनें तेज़ थीं। उसे एक हल्की सी उम्मीद थी कि शायद आज, इस लाल साड़ी और श्रृंगार को देख रमेश का सोया हुआ मर्द जाग जाए। शायद वह उसकी आँखों में आँखें डालकर कह दे "कामिनी, आज तुम बिजली गिरा रही हो।"
लेकिन विडंबना देखिए...
रमेश अपनी कलाई घड़ी सेट करने में व्यस्त था। उसने एक सरसरी नज़र कामिनी पर डाली, ठीक वैसे ही जैसे कोई घर की किसी पुरानी दीवार या फर्नीचर को देखता है। उसकी आँखों में न तो चमक आई, न ही कोई प्रशंसा का भाव।
"चलें? देर हो रही है," रमेश ने रूखेपन से कहा और बिना मुड़े दरवाज़े की तरफ बढ़ गया।
कामिनी वहीं की वहीं जमी रह गई। उसके दिल पर जैसे किसी ने बर्फीला पानी डाल दिया हो। जो औरत दुनिया के लिए अप्सरा थी, वही औरत अपने पति के लिए एक बेजान वस्तु से ज्यादा कुछ नहीं थी।
कामिनी का मन मसोस कर रह गया।
***************
"आइये... आइये रमेश बाबू!"
भारी-भरकम सागवान का दरवाज़ा खुला और सामने एक ऊँचे-पूरे, हट्टे-कट्टे और रोबदार शख्सियत फौजा सिंह खड़े थे। उनकी उम्र साठ के पार थी, लेकिन उनका कसरती शरीर किसी पुराने और मज़बूत बरगद के पेड़ की तरह तना हुआ था। आँखों में एक अजीब सी चमक थी जो उनके सरपंच होने के रसूख को और बढ़ा रही थी।
कामिनी ने एक संस्कारी बहू की तरह अपना पल्लू थोड़ा सँभाला और घुटनों के बल झुककर फौजा सिंह के पैर छूने चाहे। लेकिन इससे पहले कि उसके हाथ उनके पैरों तक पहुँचते, फौजा सिंह के दो भारी, खुरदरे और मज़बूत हाथों ने कामिनी के स्लीवलेस ब्लाउज से बाहर निकले नंगे, गोरे कंधों को कसकर थाम लिया।
कामिनी इस अप्रत्याशित, ताकतवर और मर्दाने अहसास से सिहर उठी। फौजा सिंह की उँगलियों की वो कड़क पकड़ और उनके हाथों की तपिश इतनी गहरी थी कि कामिनी की रीढ़ की हड्डी में एक तेज़ सिहरन सी दौड़ गई।
"अरे... बहू! औरतों की जगह पैरों में नहीं होती, आओ अंदर," फौजा सिंह की आवाज़ में एक ऐसा गहरा, भारी और सम्मोहक रोब था कि कामिनी की धड़कनें बेतहाशा बढ़ गईं।
फौजा सिंह की पकड़ से छूटकर कामिनी जैसे ही झटके से सीधी खड़ी हुई, उसके लाल रेशमी साड़ी का पल्लू उस चिकने कंधे से फिसल गया। डीप-नेक और स्लीवलेस ब्लाउज में कैद कामिनी के भारी और उन्नत स्तन अचानक पूरी तरह से फौजा सिंह की पारखी आँखों के सामने उजागर हो गए। ब्लाउज का गला इतना गहरा था कि स्तनों की गोलाई और उनके बीच की वो गहरी घाटी (Cleavage) बिना किसी परदे के बाहर छलक आई।
पल्लू गिरते ही कामिनी बुरी तरह सकपका उठी। लाज के मारे उसने हड़बड़ी में झट से अपना पल्लू उठाया, लेकिन इस अचानक हुई तेज़ हरकत के कारण उसके बड़े और भारी स्तन ब्लाउज के अंदर से ज़ोर से उछल पड़े। एक बेहद ही कामुक कंपन सा हुआ, फौजा सिंह इस जादुई, मांसल दृश्य को बिना पलक झपकाए देखता रह गया।
फौजा सिंह की नज़रों ने कामिनी के जिस्म को ऐसे टटोला जैसे जोहरी हीरे को देखता है। उनके चेहरे पर एक अजीब सी लालसा और मादकता तैर गई.
"सुंदर लग रही हो बहू..." फौजा सिंह ने अपनी भारी आवाज़ में सीधे कामिनी की आँखों में देखते हुए कहा।
कामिनी सन्न रह गई। एक उम्रदराज़, ससुर समान आदमी के मुँह से सरेआम अपने हुस्न की ऐसी बेबाक तारीफ सुनकर उसके कान गरम हो गए।
उस एक छोटी सी तारीफ ने कामिनी के अंदर दबी वासना को हवा दे दी। उसे अहसास हुआ कि पेटीकोट के नीचे, सूजी हुई पंखुड़ियों के बीच से एक बार फिर गर्म और चिपचिपा रस रिसने लगा है।
"किस्मत वाले हो रमेश बाबू..." फौजा सिंह ने एक गहरी मुस्कान के साथ पलटते हुए कहा और हवेली के आँगन की तरफ बढ़ गए।
कामिनी ने सामने रमेश की तरफ देखा। रमेश तो पहले ही अंदर जाकर आँगन में बिछे शाही सोफे पर बेपरवाही से पसर चुका था। फ़ौजा सिंह कि बात का उसने कोई जवाब नहीं दिया, उसे परवाह ही कहा थी, कामिनी बेकार थी उसके लिए.
"बहू, बंटी नहीं आया?" फौजा सिंह ने अपनी भारी, रौबदार आवाज़ में पूछा और हाथ के शालीन इशारे से कामिनी को बैठने के लिए कहा।
बैठक का नज़ारा अजीब सी मनोवैज्ञानिक बिसात बिछा रहा था। सामने बिछे एक बड़े और मखमली सोफे के एक कोने पर रमेश पहले ही धँस चुका था। उसी बड़े सोफे के दूसरे सिरे पर फौजा सिंह अपनी पूरी चौड़ाई के साथ बैठ गया। कुदरत का निज़ाम देखिये कि रमेश के बाजु वाले सोफे पर घर का कुछ समान पड़ा हुआ था. कामिनी फौजा सिंह के ठीक बगल में रखे एक छोटे, सिंगल-सीटर सोफे पर टिक गई।
बीच में रखी शीशे की शानदार मेज़ पर एक बेहद महँगी विदेशी शराब की बोतल शान से खड़ी थी।
"मेला घूमने निकल गया वो तो," रमेश ने जवाब तो दिया, लेकिन उसकी ललचाई हुई नज़रें टेबल पर रखी उस महँगी शराब की बोतल पर गड़ी थीं।
रमेश की इस कमज़ोरी को फौजा सिंह की पारखी आँखों ने एक ही पल में भाँप लिया।
"माफ़ करना बहू..." फौजा सिंह ने अचानक अपनी आवाज़ में एक अजीब सी नरमी लाते हुए कहा, "वो रसोई से दो गिलास ले आती तो बड़ा उपकार होता...?"
"इसमें क्या सरपंच जी, अभी ले आती हूँ।" कामिनी उठी, लेकिन उसकी नज़रों में एक प्रश्न था क्योंकि वह हवेली के रास्तों से अनजान थी।
"वो वहाँ... सीधे हाथ की तरफ," फौजा सिंह ने कामिनी की उलझन समझते हुए रसोई की तरफ इशारा कर दिया, जो आँगन के खत्म होने पर ठीक कामिनी के सोफे के पीछे ही बनी थी।
कामिनी मुड़ी और रसोई की तरफ चल दी।
चुत में हो रही जलन और पैंटी न पहने होने की वजह से कामिनी के कूल्हे साड़ी के भीतर बिल्कुल आज़ाद थे। पेटीकोट के अंदर उसकी गदराई हुई मांसल गांड बिना किसी कसावट के अपनी ही एक मादक और बेशर्म मस्ती में हिचकोले खा रही थी।
हर कदम के साथ उसका भारी पिछवाड़ा एक कामुक लय में डोलता, जिससे लाल साड़ी का रेशम उन उभारों पर फिसलने लगता। फौजा सिंह की आँखें एक पल के लिए भी उस कातिलाना नज़ारे से हट नहीं पाईं। वह अपने होंठों पर जीभ फेरता हुआ उस आज़ाद और मटकते हुस्न को पी रहा था। उसे तजुर्बे से अंदाज़ा लग गया था कि साड़ी के इस पर्दे के पीछे आज कोई बंदिश नहीं है।
कामिनी रसोई से कांच के दो चमचमाते गिलास लेकर लौटी। मेज़ पर गिलास रखने के लिए उसे थोड़ा आगे की तरफ झुकना पड़ा। इस झुकाव से उसके डीप-नेक ब्लाउज से स्तनों की वो गहरी और पसीने से चमकती घाटी एक बार फिर फौजा सिंह की नज़रों के ठीक सामने आ गई।
"वो क्या है ना बहू, कि इस विशाल हवेली में मैं अकेला ही रहता हूँ," फौजा सिंह ने कामिनी की आँखों में झाँकते हुए एक गहरी सफाई देनी चाही।
"जवानी में कभी शादी नहीं की, तो औरत-बच्चे हैं नहीं। जो एक-दो नौकर-चाकर हैं, वो भी दिन ढलते ही अपने घर चले जाते हैं।"
"कोई बात नहीं सरपंच जी..." कामिनी ने एक नशीली मुस्कान के साथ कहा और अपने छोटे मखमली सोफे पर वापस धँस गई।
जैसे ही वह सोफे पर बैठी, मुलायम गद्दे का दबाव सीधे उसकी सूजी हुई, गीली चुत पर पड़ा। कामिनी की रगों में एक मीठी सी बिजली दौड़ गई और उसने अनजाने में ही अपनी जाँघों को कसकर आपस में रगड़ लिया।
फ़ौजा सिंह ने मेज़ पर रखी उस महँगी विदेशी शराब की बोतल को अपने भारी और मज़बूत हाथों में लिया। कांच के गिलासों में सुनहरे रंग की शराब गिरते ही एक तीखी खुशबू हवा में घुल गई। उसने नपे-तुले अंदाज़ में पानी मिलाया और दो पेग तैयार किए।
"चियर्स रमेश बाबू," फ़ौजा सिंह ने एक गिलास रमेश की तरफ बढ़ाया, लेकिन ऐसा करते वक़्त उसकी नज़रें रमेश पर नहीं, बल्कि कामिनी पर टिकी थीं। उन आँखों में एक अजीब सी नज़ाकत थी, जैसे वह शराब पीने से पहले कामिनी से इज़ाज़त माँग रहा हो।
कामिनी इस अदब को देखकर अंदर तक पिघल गई। रमेश ने आज तक उसे कभी यह रुतबा नहीं दिया था। कामिनी ने अपनी पलकों को हल्का सा ऊपर उठाया और एक मूक हामी भर दी। फ़ौजा सिंह का यह सलीका ग़ज़ब का था; वह कामिनी को पूरी इज़्ज़त बख्श रहा था,
फ़ौजा सिंह ने गिलास को अपने होंठों से लगाया और एक बहुत ही छोटा, शाही सिप लिया।
पर वहीं दूसरी तरफ... गट.. गटक... गटक....!
रमेश ने गिलास पकड़ा और किसी जाहिल, प्यासे जानवर की तरह पूरा पेग एक ही झटके में अपने हलक के नीचे उतार दिया।
कामिनी यह नज़ारा देखकर बुरी तरह सकपका गई। शर्म और खीझ से उसका चेहरा तमतमा गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि असल में गँवार कौन है, यह गाँव में रहने वाला सरपंच, जिसके पास उठने-बैठने का ऐसा शाही अदब था, या उसका अपना शहर में रहने वाला पति, जो किसी भुक्खड़ की तरह शराब पर टूट पड़ा था।
"आराम से रमेश बाबू... बहुत है। रात अभी जवान है," फ़ौजा सिंह ने एक व्यंग्यात्मक ठंडी मुस्कान के साथ कहा।
"हेहेहेहे... वो क्या है ना सरपंच जी, प्यास बहुत ज़ोर की लगी थी," रमेश ने अपनी जाहिलियत का प्रदर्शन करते हुए बेशर्मी से दाँत निपोर दिए।
कामिनी जानती थी कि रमेश कितना बड़ा बेवड़ा है। दारू देखते ही उसका ज़मीर मर जाता था। उसने रमेश को इग्नोर करना ही ठीक समझा।
"अच्छा बहू... गाँव कैसा लग रहा है तुम्हें?" फ़ौजा सिंह ने गिलास से एक और छोटा घूँट भरते हुए पूछा सिप... सिप...। बात करते वक़्त उसकी गहरी नज़रें कामिनी के 'डीप-नेक' ब्लाउज में झलकती उस गोरी घाटी का मुआयना कर रही थीं।
"बहुत अच्छा है सरपंच जी... यहाँ की खुली हवा और यहाँ के लोग भी बहुत अच्छे हैं," कामिनी चहक उठी। 'लोग भी बहुत अच्छे हैं' कहते वक़्त उसकी आवाज़ में एक अजीब सी मादकता थी, जैसे वह फौजा सिंह के इस शाही अंदाज़ की तारीफ कर रही हो।
उधर रमेश से अब एक पल का भी सबर नहीं हो रहा था। फौजा सिंह और कामिनी की बातों से बेखबर, रमेश ने खुद से ही बोतल उठाई और बेताबी से अपने लिए एक और कड़क पेग बना लिया। उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था कि उसकी जवान और कामुक पत्नी भी वहाँ बैठी है। उसे तो बस अपने नशे से मतलब था।
"रमेश बाबू, शहर कब लौटना है?" फ़ौजा सिंह ने गिलास को हल्का सा घुमाते हुए बात को आगे बढ़ाया।
"परसों तक लौट जाएँगे सरपंच जी... वैसे भी अब तो यहाँ आना-जाना लगा ही रहेगा," रमेश ने अपना खाली गिलास मेज़ पर रखते हुए कहा। उसकी नज़रें अभी भी शराब की बोतल का ही तवाफ़ कर रही थीं।
"ठीक है रमेश बाबू... जैसा तुम्हें ठीक लगे।" सिप.. सिप... फ़ौजा सिंह ने अपनी शराब का एक और छोटा घूँट लिया और फिर कामिनी की ओर मुड़ा। "अच्छा बहू, तुम भी तो कुछ लो। खाली बैठना ठीक नहीं।"
"ननन.. नहीं सरपंच जी, मैं ये सब नहीं पीती," कामिनी ने अपने हाथों को साड़ी के पल्लू पर मलते हुए शालीनता से मना किया।
"अरे बहू... मैं शराब की थोड़ी कह रहा हूँ। रसोई से कोई कोल्ड ड्रिंक ही लेती आओ। शराबियों के साथ बैठने का उसूल है कि साथ देना पड़ता है... क्यों रमेश बाबू?"
फ़ौजा सिंह ने रमेश की तरफ़ एक नज़र डाली।
"आ... हाँ... हाँ... बिल्कुल," रमेश ने हड़बड़ाहट में हामी भरी, पर उसका ध्यान इन बातों में था ही नहीं। वह तो बस यह देख रहा था कि कब वह अपना अगला पेग बनाए।
"अभी लाती हूँ..." कामिनी हल्की सी मुस्कान के साथ सोफे से उठी और रसोई की तरफ चल दी।
जैसे ही कामिनी मुड़ी, साड़ी के रेशमी कपड़े के नीचे उसकी आज़ाद गदराई हुई गांड अपनी मादक लय में मटकने लगी। फ़ौजा सिंह की नज़रें किसी चुंबक की तरह उस भारी पिछवाड़े पर जा चिपकीं। उस गोलाई और चाल में ऐसा नशा था कि फ़ौजा सिंह अपने सीने में उठते हुए तूफ़ान को रोक नहीं पाया।
"उउउउफ्फ्फफ्फ्फ़......" एक गहरी, गर्म और हवस भरी साँस आखिरकार फ़ौजा सिंह के सीने से बाहर आ ही गई।
"मज़े हैं रमेश बाबू तुम्हारे..." फ़ौजा सिंह ने अपनी नज़रें कामिनी की मटकती गांड से हटाए बिना रमेश को शाबासी देते हुए कहा।
"हाँ... हनन... वो तो है," रमेश ने नशे में मुस्कुराते हुए जवाब दिया। उसे रत्ती भर भी अंदाज़ा नहीं था कि फौजा सिंह उसकी किस 'जागीर' के मज़े की तारीफ कर रहा है। कामिनी रसोई में पहुँची ही थी कि पीछे से रमेश ने बोतल उठाकर अपने लिए एक और कड़क पेग बना लिया।
कुछ ही पलों में कामिनी वापस लौटी। उसके हाथ में कांच के गिलास में झाग छोड़ती हुई कोका-कोला थी। उसने गिलास मेज़ पर रखा और वापस अपने छोटे सोफे पर बैठ गई।
"सरपंच जी, आपने दावत पर तो बुलाया है, लेकिन आपकी रसोई तो बिल्कुल खाली दिख रही है?" कामिनी ने हैरानी से पूछा।
"कुछ दिन पहले ही मैंने एक नया आदमी काम पर रखा है बहू। वो यहीं हवेली के पीछे वाले बगीचे में 'मटन' बना रहा है," फ़ौजा सिंह ने जवाब दिया।
'मटन'.. यह शब्द कानों में पड़ते ही कामिनी के रोंगटे खड़े हो गए। उसके दिमाग के किसी बंद तहखाने से अचानक कादर खान का वो सुतवा कामुक चेहरा निकलकर उसकी आँखों के सामने आ गया। कादर के साथ मटन बनाना, वो मिलन कि रात... सब कुछ एक झटके में ताज़ा हो गया।
"ना जाने कहाँ होगा अब वो..." कामिनी के दिल में एक अजीब सी टीस उठी। अतीत की याद ने उसके चेहरे की रंगत पल भर में उड़ा दी।
कामिनी का उतरा हुआ चेहरा देखकर फ़ौजा सिंह की आँखें सिकुड़ गईं। "क्या हुआ बहू? तुम्हें मटन पसंद नहीं क्या?"
यह पूछते हुए फ़ौजा सिंह ने अपना भारी, गर्म और कड़क हाथ आगे बढ़ाया और कामिनी की साड़ी से ढकी जाँघ पर रख दिया। उसने अपने खुरदरे अंगूठे से कामिनी की जाँघ को हल्के से सहलाया।
कामिनी अंदर तक बुरी तरह दहल गई। साड़ी के रेशम के आर-पार उस मर्दाने हाथ की तपिश सीधे उसकी नसों में उतर गई। बिना पैंटी के बैठी कामिनी की प्यासी चुत में एक ज़ोरदार करंट सा दौड़ा। वो स्पर्श इतना अचानक और इतना मज़बूत था कि कामिनी की साँसें गले में अटक गईं।
"आ... ऐसा नहीं है... पसंद है मुझे भी," कामिनी ने हड़बड़ाते हुए और अपनी कांपती आवाज़ को सँभालते हुए जवाब दिया।
जवाब मिलते ही फ़ौजा सिंह ने बड़ी ही नज़ाकत और शालीनता से अपना हाथ वहाँ से हटा लिया, जैसे कोई बड़ी बात हुई ही न हो।
लेकिन कामिनी का हाल बुरा था। वो कुछ पल का स्पर्श उसकी देह में आग लगा चुका था। उसका जिस्म चीख-चीख कर कह रहा था कि काश वो मज़बूत, कड़क हाथ वापस आए और उसकी नंगी जाँघों को कसकर अपनी मुट्ठी में भींच ले। रमेश की बेरुखी और ताऊजी के अधूरे खेल के बाद, फौजा सिंह का यह हल्का सा स्पर्श कामिनी के लिए किसी अफीम के नशे जैसा काम कर रहा था।
फ़ौजा सिंह ने अपना गिलास होंठों से लगाया और एक गहरी नज़र कामिनी के पसीने से चमकते चेहरे पर डाली।
"रमेश बाबू, ये ज़मीन और खेती का काम भी बड़ा अजीब होता है," फ़ौजा सिंह ने अपनी भारी और गूँजती हुई आवाज़ में शुरुआत की।
"हाँ सरपंच जी, वो तो है..." रमेश ने बिना कुछ समझे, नशे में झूमते हुए गर्दन हिलाई।
"ज़मीन चाहे कितनी भी उपजाऊ और सुंदर क्यों ना हो... अगर किसान कमज़ोर हो और उसका 'हल' गहराई तक ना चले... तो ज़मीन प्यासी ही रह जाती है।" फ़ौजा सिंह ने 'हल' और 'प्यासी' शब्द पर जानबूझकर ज़ोर दिया और अपनी गहरी आँखें कामिनी की आँखों में गाड़ दीं।
"ऐसी प्यासी ज़मीन को फिर किसी 'मज़बूत बैल' की ज़रूरत होती है, जो उसे अंदर तक चीर सके। क्यों रमेश बाबू, सही कहा ना?"
कामिनी का गला सूख गया। इन द्विअर्थी बातों का सीधा सा अर्थ उसे समझ आ रहा था। वह खुद वो 'प्यासी ज़मीन' थी और सामने बैठा रमेश वो कमज़ोर किसान। फ़ौजा सिंह अपनी आँखों से ही उसे नंगा कर रहा था।
असल मे फ़ौजा सिंह कामिनी को परख रहा था, देखना चाहता था कामिनी कब विरोध करती है.
रमेश ने एक और घूँट भरा और मूर्खों की तरह हँसते हुए बोला, "बिल्कुल सही कहा सरपंच जी! सौ टके की बात! मज़बूत बैल के बिना तो खेत बंजर ही रह जाता है... हेहेहे।"
रमेश की इस बेवकूफी पर कामिनी को जहाँ अपना सिर पीट लेने का मन कर रहा था, वहीं उसकी जाँघों के बीच एक अजीब सी फड़कन होने लगी।
"मैंने सुना बहु कि कुछ दिन पहले तुम्हारा पैर मुड़ गया था?"
"हहह... हाँ... हाँ... लल्ल.. लेकिन अब ठीक है " कामिनी हकला रही थी, शब्द उसके हलक मे फस रहे थे.
"दिखाओ तो... " फ़ौजा सिंह के शब्द किसी बम कि तरह फटे.
कामिनी का दिल धक से रह गया, उसे ये सब यही रोक देना चाहिए था, लेकिन ना जाने क्या आकर्षण था फ़ौजा सिंह मे या फिर कामिनी ही उत्तेजना मे विवश थी.
कामिनी ने सैंडल उतारी.......
कामिनी के दूध जैसे गोरे और चिकने पैर जैसे ही उस पारदर्शी शीशे की मेज़ पर रखे गए, तो पीले बल्ब की रोशनी में उसकी त्वचा किसी संगमरमर की तरह चमक उठी। लाल साड़ी का घेरा घुटनों से थोड़ा नीचे खिसक गया था, और उसकी सुडौल, मादक पिंडलियाँ पूरी तरह से फ़ौजा सिंह के सामने आज़ाद थीं।
फ़ौजा सिंह के भारी, मज़बूत और खुरदरे हाथों ने जैसे ही कामिनी की कोमल एड़ियों को अपनी गिरफ़्त में लिया, कामिनी के पूरे वजूद में एक बिजली सी दौड़ गई। उस बूढ़े लेकिन कसरती मर्द के हाथों की तपिश इतनी गहरी थी कि कामिनी की साँसें एक पल के लिए गले में ही अटक गईं।
फ़ौजा सिंह का खुरदरा अँगूठा कामिनी की एड़ी के उस लाल हिस्से को एक अजीब सी कामुक लय में दबा रहा था। दर्द के नाम पर यह सीधा-सीधा उसकी देह को टटोलने का खेल था।
"हम्म्म्म... बहू, लाल तो हो रहा है," फ़ौजा सिंह ने अपनी भारी आवाज़ में कहा, लेकिन उसकी नज़रें एड़ी पर नहीं, बल्कि मेज़ पर रखे कामिनी के पैरों से होती हुई उसकी साड़ी के अंदर के उस अंधेरे को भेदने की कोशिश कर रही थीं।
"अरे... ईच्च्च... सरपंच जी, ये तो इसके शहर के नखरे हैं। ज़रा सा पाँव क्या फिसला, हंगामा कर देती है... हिक!" रमेश ने अपने गिलास में बची हुई आखिरी घूँट हलक में उतारते हुए, नशे में झूमते हुए कहा। उसे अपनी पत्नी की इज़्ज़त नीलाम होने का कोई होश नहीं था।
"नखरे नहीं रमेश बाबू, औरतों का जिस्म बड़ी नज़ाकत वाला होता है। नस पे नस चढ़ जाए, तो दर्द सीधा ऊपर तक जाता है... इसे नीचे से ऊपर तक सहलाना पड़ता है," फ़ौजा सिंह ने एक और द्विअर्थी बाण छोड़ा।
यह कहते हुए फ़ौजा सिंह के दोनों हाथ कामिनी की एड़ी से फिसलते हुए ऊपर उसकी गोरी पिंडलियों (Calves) की तरफ बढ़ने लगे। वो मज़बूत उँगलियाँ कामिनी के माँसल पैरों को हल्के-हल्के दबा रही थीं।
"ईईईस्स्स्स......" कामिनी ने अपने निचले होंठ को दाँतों तले कसकर दबा लिया ताकि उसकी सिसकी बाहर ना निकले।
कामिनी का जिस्म भट्टी की तरह जलने लगा था। ठीक सामने उसका पति रमेश नशे में धुत्त आँखें मूँदने की कोशिश कर रहा था, और इधर उसी की आँखों के सामने, गाँव का सरपंच उसकी पत्नी के पैरों को अपनी उँगलियों से मथ रहा था।
फ़ौजा सिंह जैसे परखना चाह रहा था कि कितनी आग है, कामिनी विरोध करती है या नहीं,
'पाबंदी का यह रोमांच' कामिनी की सूजी हुई चुत पर कहर ढा रहा था। फ़ौजा सिंह के हाथों का ऊपर की ओर बढ़ता हुआ स्पर्श कामिनी की नाभि के नीचे एक ऐसा ज्वालामुखी भड़का रहा था, जिसका लावा अब बहने के लिए बेताब था।
उसकी जाँघों के बीच की वो दोनों पंखुड़ियाँ मर्दाने स्पर्श की गर्मी से फड़कने लगी थीं। चुत के अंदर से एक गाढ़ा, चिपचिपा रस रिसकर उसके पेटीकोट के रेशमी कपड़े को गीला करने लगा था।
फ़ौजा सिंह के हाथ अब कामिनी के घुटनों के ठीक नीचे पहुँच चुके थे। लाल साड़ी का किनारा उसके हाथों के पिछले हिस्से से रगड़ खा रहा था। फ़ौजा सिंह ने धीरे से अपनी आँखें उठाईं और कामिनी की आँखों में झाँका। उन आँखों में एक सीधा सवाल था "क्या मैं और ऊपर आऊँ?"
कामिनी की हालत खराब थी। उसका दिल सीने की पसलियाँ तोड़कर बाहर आना चाहता था। वह ना तो पैर पीछे खींच पा रही थी और ना ही रमेश को आवाज़ दे पा रही थी। फ़ौजा सिंह की उस वहशी और पारखी नज़र ने उसे पूरी तरह से अपने सम्मोहन में जकड़ लिया था।
उसे लग रहा था जैसे फ़ौजा सिंह के हाथ घुटनों को पार करके सीधे उसकी नंगी जाँघों के बीच घुस जाएँगे और उसकि चुत को वहीं, उसी सोफे पर निचोड़ देंगे।
"बहु..... अब तो कुछ भी नहीं है, सारी नसे बराबर है, फ़ौजा सिंह ने कामिनी की आँखों में देखते हुए, अपने हाथ हटा लिए.
कामिनी एक झटके से धरातल पर आई, उसे लगा था फ़ौजा सिंह का हाथ और ऊपर आएगा, लेकिन...ये क्या हाथ तो हट गया, एक खालीपन, एक अधूरापन वापस से छा गया.
कामिनी दोनों ही स्थति मे तड़प के रह जा रही थी.
छूने पर लगता कि रुक जाये... अभी नहीं, और रुक जाने पर लगता रुके क्यों?
गजब युद्ध चल रहा था कामिनी के भीतर.
"अच्छा बहू, मटन ले कर आता हूँ मैं," फ़ौजा सिंह अपनी जगह से उठा और आँगन को पार करता हुआ हवेली के पिछले दरवाज़े से बाहर अँधेरे बगीचे की तरफ निकल गया।
उसके जाते ही कामिनी ने राहत की एक बहुत गहरी साँस ली। उसका सीना धौंकनी की तरह चल रहा था और जाँघों के बीच की वो फड़कन अभी भी उसे चैन नहीं लेने दे रही थी। उसने अपनी साड़ी को थोड़ा सँभाला और सामने झूमते हुए रमेश की तरफ देखा।
"अजी... बस करो ना, इतनी तो पी ली है। कुछ तो होश रखो कि हम कहाँ बैठे हैं," कामिनी ने दबी हुई लेकिन चिढ़ी हुई आवाज़ में रमेश से कहा।
"चुप कर! मुझे मत सिखाया कर," रमेश ने नशे में धुत्त होकर कामिनी को बुरी तरह झिड़क दिया। उसकी आँखें लाल हो चुकी थीं और ज़ुबान लड़खड़ाने लगी थी। उसने कामिनी की बात को जूते की नोक पर रखते हुए बेशर्मी से एक और मोटा पेग बना लिया। दारू ने अब पूरी तरह से रमेश के दिमाग पर कब्ज़ा कर लिया था।
गट... गटक.... गाटक....! रमेश एक ही साँस में वह कड़वा ज़हर अपने हलक के नीचे उतार गया।
तभी हवेली के पिछले दरवाज़े से भारी कदमों की आहट हुई। "आइये रमेश बाबू," फ़ौजा सिंह अंदर दाखिल हुआ। उसके हाथों में एक बड़ा सा डोंगा था, जिसे उसने रसोई के पास मौजूद एक शानदार डाइनिंग टेबल के बीचों-बीच रख दिया।
ढक्कन हटते ही ताज़े पके मटन की सोंधी, तीखी और मसालों से भभकती खुशबू पूरे आँगन में फैल गई। वह खुशबू कामिनी के नथुनों से टकराई तो उसके ज़हन में एक तेज़ बिजली सी कौंधी।
"ऐसी खुशबू... मसालों का ऐसा ही तीखापन तो उस रात भी था..." कामिनी के जेहन में अचानक कादर खान के साथ बिताई गई वो हवस से भरी मटन की दावत ताज़ा हो गई। लेकिन उसने झटके से अपना सिर हिलाकर यह विचार त्याग दिया।
"सारे मटन ऐसे ही महकते होंगे," उसने खुद को तसल्ली दी।
"आओ रमेश बाबू," फ़ौजा सिंह ने इशारा किया।
रमेश लड़खड़ाता हुआ उठा और डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर धड़ाम से जा गिरा।
"बहू, रसोई से प्लेट-कटोरी लेती आना," फ़ौजा सिंह ने अपनी भारी आवाज़ में कहा। कामिनी रसोई में गई और कुछ ही पलों में टेबल सज गई।
फ़ौजा सिंह टेबल के सेंटर पर जो मुखिया की जगह होती है शान से बैठा था। रमेश उसके बाईं तरफ की कुर्सी पर पसर गया था। रमेश के ठीक बगल वाली कुर्सी खाली थी, लेकिन कामिनी वहाँ नहीं गई।
ना जाने उसके मन में रमेश के प्रति कौन सी घृणा भर गई थी, या फिर उसकी प्यासी देह ने रमेश के पास बैठने के बजाय खुद ही फ़ौजा सिंह के दाईं तरफ वाली कुर्सी चुन ली।
रमेश से दूरी और फ़ौजा सिंह से नज़दीकी यह कामिनी का एक ऐसा मौन और बागी फैसला था, जिसने फ़ौजा सिंह के चेहरे पर एक शैतानी और विजयी मुस्कान ला दी। कामिनी अब सीधे फ़ौजा सिंह की जद में आ चुकी थी।
फ़ौजा सिंह ने बहुत ही सलीके से अपने लिए दूसरा पेग बनाया। रमेश के कितने पेग हो गए थे, यह तो शायद उसे खुद भी याद नहीं था। वह नशे में झूम रहा था.
रमेश ने प्लेट में अपना सिर झुकाया और मटन की बोटियों को दोनों हाथों से जानवरों की तरह मुँह में भर लिया। और सीधा होकर चपर... चपर... चबाक...' जाहिलों की तरह मांस को चबाने लगा। तीखे रसे की बूँदें उसके होंठों से बहकर उसकी ठोड़ी तक आ रही थीं।
एक तरफ रमेश की यह घिनौनी और जाहिल हरकत थी, और दूसरी तरफ फ़ौजा सिंह, जो बिल्कुल शांत बैठा था। फ़ौजा सिंह एक घूँट शराब पीता और उसकी पारखी नज़रें कामिनी के 'डीप-नेक' ब्लाउज में झलकती उस गोरी घाटी और उसके कांपते हुए होंठों को निहारने लगतीं।
"चखो बहू..." फ़ौजा सिंह ने बड़ी ही नज़ाकत से मटन का एक रसीला टुकड़ा कामिनी की प्लेट में परोसा।
कामिनी ने काँपते हाथों से जैसे ही मटन का वो टुकड़ा उठाना चाहा...
अचानक, डाइनिंग टेबल के नीचे एक भारी, कड़क और गर्म हाथ सीधे कामिनी की जाँघ पर आकर टिक गया। यह फ़ौजा सिंह का हाथ था, खुरदरा और पूरी तरह से अधिकार से भरा हुआ।
"अपने इस प्यासे खेत को कैसे पानी पिलाती हो बहू?" फ़ौजा सिंह ने अपनी गूँजती हुई रहस्यमयी आवाज़ में एक ऐसा सवाल दागा, जिसने कामिनी के दिमाग की नसें झकझोर दीं।
टेबल के नीचे हाथ की उस अचानक छुअन और सवाल की बेशर्मी से कामिनी के हाथ में थमा मटन का टुकड़ा वापस प्लेट में 'छपाक' से जा गिरा। उसका दिल पसलियों से टकराने लगा, "धक... धक... धक!
"मममम... मतलब?" कामिनी सब कुछ समझ रही थी, लेकिन फिर भी उसने अनजान बनने का एक कमज़ोर सा नाटक किया।
"मेरा मतलब है... तुम्हारा ये 'बैल' तो रोज़ ऐसे ही दम तोड़ देता होगा शराब पीकर। फिर रात को उस सूखी ज़मीन का क्या करती हो?" फ़ौजा सिंह ने आँखों ही आँखों में सामने नशे में झूमते रमेश की ओर इशारा किया, और मेज़ के नीचे उसका मज़बूत हाथ कामिनी की जाँघों को ज़ोर से सहलाने लगा।
"ईईईस्स्स्स...."
कामिनी के होंठों से एक बारीक सिसकी निकल गई। सुबह से दबी उसकी वासना और पति के सामने होने के अहसास ने उसके जिस्म में आग लगा दी। घबराहट और हवस के मारे उसने झटके से अपनी जाँघों को आपस में भींच लिया, जिससे फ़ौजा सिंह का हाथ उसकी दोनों जाँघों के बीच कसकर दब गया।
"कककक... कुछ भी नहीं," जैसे-तैसे कामिनी के सूखे हलक से ये शब्द निकले।
"मतलब खेत पूरी तरह बंजर पड़ा है," फ़ौजा सिंह की आँखों में एक वहशी चमक आ गई। उसका हाथ कामिनी की जाँघों पर ऊपर की तरफ़ सरकने लगा।
कामिनी ने घबराकर एक नज़र रमेश की तरफ़ देखा, वो जाहिल इंसान नशे में चूर बोटीया तोड़ने मे मशगूल था,
"पप्प.... पता नहीं," कामिनी की ज़ुबान बुरी तरह लड़खड़ा गई।
"खेत की जुताई बहुत ज़रूरी होती है बहू, वरना ज़मीन बेकार हो जाती है," फ़ौजा सिंह ने कामिनी की लाल साड़ी और पेटीकोट के किनारे को अपनी खुरदरी उँगलियों में फँसाया और उसे धीरे-धीरे ऊपर की तरफ उठाने लगा।
कामिनी की धड़कनें बेकाबू हो गईं। उसने अपनी बची-खुची मर्यादा और संस्कारों को समेटते हुए अपना काँपता हुआ गोरा हाथ टेबल के नीचे ले जाकर फ़ौजा सिंह की भारी हथेली पर रख दिया और 'ना... ना...' में अपनी गर्दन हिलाने लगी। कामिनी का चेहरा पसीने से भीग गया था, और उसकी आँखों में एक अजीब सी बेबसी थी।
"देखना तो पड़ेगा ना बहू, कि खेत की असली हालत क्या है," फ़ौजा सिंह ने कामिनी के कमज़ोर हाथ को बेपरवाही से हटाते हुए साड़ी को एक ही झटके में और ऊपर कर दिया।
कामिनी का पेटीकोट अब उसकी कमर तक पहुँच चुका था। टेबल के नीचे कामिनी की दोनों गोरी, माँसल और सुडौल जाँघें पूरी तरह नंगी हो चुकी थीं। चूँकि उसने पैंटी नहीं पहनी थी, इसलिए वो जगह अब बिल्कुल बेपर्दा थी। फ़ौजा सिंह ने हल्का सा नीचे झुककर मेज़ के अंदर उस अँधेरे में झाँका।
"आअह्ह्ह.... उउफ्फ्फ..." फ़ौजा सिंह के मुँह से एक कामुक कराह निकली। "कितनी सुंदर हो तुम बहू। इस बेवकूफ़ को तुम्हारी कद्र ही नहीं है।"
फ़ौजा सिंह ने तिरछी नज़र से रमेश को देखा, जो अपनी प्लेट छोड़कर अब बोतल उठाकर नया पेग बनाने में जुटा था।
कामिनी ने भी उसी पल रमेश को देखा। एक पति जो दारू के नशे में अपनी पत्नी के जिस्म और इज़्ज़त की कीमत नहीं समझता। रमेश की इस जाहिलियत ने कामिनी के अंदर के आखिरी संकोच को मार दिया।
उसका सारा विरोध पानी के बुलबुले की तरह फूट गया।
कामिनी के हाथ जो टेबल के नीचे फ़ौजा सिंह को रोक रहे थे, वो हार मानकर वापस टेबल के ऊपर आ गए। उसने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और मेज़पोश को अपनी मुट्ठी में भींच लिया।
उसने अपनी भींची हुई जाँघों को धीरे-धीरे खोल दिया। एक दूसरे से दूर...
जैसे ही जाँघें खुलीं, कामिनी की सूजी हुई, रस टपकाती नंगी चुत पर बाहर की ठंडी हवा का एक झोंका लगा। हवा के उस स्पर्श से उसकी गीली चुत की पंखुड़ियाँ कुलबुला उठीं।
कामिनी ने महसूस किया कि फ़ौजा सिंह की खुरदरी और चौड़ी उँगलियाँ अब ठीक उसकी चुत के मुहाने के पास रेंग रही हैं। वो उँगलियाँ कभी उसकी जाँघ के अंदरूनी हिस्से को छूतीं, तो कभी उस गीली घाटी के बिल्कुल करीब से गुज़र जातीं, जिससे कामिनी के पूरे जिस्म में करंट दौड़ जाता।
कामिनी से रहा नहीं गया। उसने मदहोशी में अपना सिर हल्का सा नीचे झुकाया।
मेज़ के नीचे का नज़ारा देख उसकी साँसें अटक गईं। साफ़ दिख रहा था कि कैसे एक पराए, उम्रदराज़ मर्द की खुरदरी उँगलियाँ उसकी नंगी और प्यासी चुत के ठीक बाहर मँडरा रही हैं।
कामिनी की नंगी जाँघों के बीच की वो छिपी हुई दुनिया अब पूरी तरह फ़ौजा सिंह की खुरदरी उँगलियों के रहम-ओ-करम पर थी। मेज़ के नीचे का अँधेरा उस खौफ़नाक और मदहोश कर देने वाले खेल का इकलौता गवाह था।
फ़ौजा सिंह ने कोई जल्दबाज़ी नहीं की। एक मँजे हुए खिलाडी की तरह, उसकी बीच वाली उँगली ने कामिनी की रसभरी और सूजी हुई चुत की लकीर (Slit) को आहिस्ता से छुआ। उँगली के उस पहले सीधे स्पर्श ने कामिनी के जिस्म में हज़ारों वॉट की बिजली दौड़ा दी।
फ़ौजा सिंह की उँगली उस गीली और चिपचिपी लकीर पर ऊपर से नीचे तक बहुत ही धीमी और कामुक लय में रेंगने लगी। कामरस की वजह से उसकी उँगली बिना किसी रुकावट के फिसल रही थी।
"अरे बहु खेत मे तो बहुत पानी जमा है," फ़ौजा सिंह कि उंगलियां लकीर मे ऊपर नीचे रेंगने लगी.
"ईईस्स्स्स..... उउउउफ्फ्फ्फ़... हमफ्फ्फ्फफ्फ्फ़....
कामिनी का पूरा जिस्म झनझना उठा। उसने झटके से अपने मुँह को कसकर बंद कर लिया और अपने निचले होंठ को दाँतों तले इतनी ज़ोर से दबा लिया कि खून छलकने को हो गया। वह किसी भी हाल में अपनी सिसकी को बाहर नहीं आने देना चाहती थी।
लकीर को दो-चार बार सहलाने के बाद, फ़ौजा सिंह की उँगली उस मांसल घाटी के सबसे ऊपर, सबसे नाज़ुक और फड़कते हुए हिस्से दाने' (Clitoris) पर जा रुकी।
जैसे ही उस खुरदरी उँगली ने उस दाने को महसूस किया, फ़ौजा सिंह के चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान आ गई। उसने उस दाने को अपनी उँगली के पोर से हल्का सा दबाया और फिर उसे गोल-गोल मसलने लगा।
"उउउउम्म्म्म्म..... ईईईस्स्स्स..." कामिनी के हलक में एक घोंटू सी आवाज़ अटक कर रह गई। दाने पर हो रहे उस सीधे वार ने कामिनी की हवस को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया। उसका जिस्म पसीने से नहा गया था। माथे से पसीने की बूँदें फिसलकर उसकी आँखों तक आ रही थीं, और डीप-नेक ब्लाउज के अंदर कैद उसके भारी स्तन तेज़ साँसों के कारण धौंकनी की तरह ऊपर-नीचे हो रहे थे। स्तनों की घाटी पसीने से पूरी तरह भीग कर चमक उठी थी।
कामिनी की मनोदशा एक पेंडुलम की तरह झूल रही थी। वह मदहोशी और डर के मारे कभी अपना सिर ऊपर उठाती और मेज़ के उस पार देखती, जहाँ उसका पति रमेश बैठा था। रमेश की आँखें नशे से आधी बंद थीं, वह झूमते हुए प्लेट में मुँह गड़ाए मटन की हड्डियाँ चबाने में मस्त था। उसे रत्ती भर भी अहसास नहीं था कि मेज़ के नीचे उसकी पत्नी की इज़्ज़त की किस तरह 'जुताई' हो रही है।
और फिर... कामिनी की आँखें रमेश के उस जाहिल चेहरे को देखकर नफ़रत से भर जातीं, और उसका सिर अपने आप नीचे की तरफ झुक जाता।
सिर झुकाकर वह मेज़ के नीचे का वो नज़ारा देखती जो उसे पागल कर रहा था। साफ़ दिख रहा था कि कैसे एक पराए मर्द का भारी हाथ उसकी नंगी जाँघों के बीच घुसा हुआ है और उसकी उँगलियाँ उसकी गीली चुत के दाने को बेदर्दी से मसल रही हैं। अपनी ही चुत के साथ हो रही इस छेड़छाड़ को अपनी आँखों से देखना, कामिनी के लिए एक ऐसा नशा बन गया था जिसे वह चाहकर भी रोक नहीं पा रही थी।
जब फ़ौजा सिंह उँगली की रफ़्तार बढ़ाता, तो कामिनी की जाँघें हवा में हल्की सी काँप उठतीं और उसकी आँखें पीछे की तरफ पलट जाने को होतीं। वह एक ही वक़्त में दर्द, शर्म, हवस औr बेबसी के रोमांच' के बीच फँसकर तड़प रही थी।
"क्या हुआ बहू? मटन में मिर्च ज़्यादा है क्या? पसीना बहुत आ रहा है तुम्हें," फ़ौजा सिंह ने मटन का एक टुकड़ा चबाते हुए, बहुत ही सामान्य और गंभीर आवाज़ में पूछा। लेकिन मेज़ के नीचे उसकी उँगली कामिनी के दाने को और ज़ोर से रगड़ रही थी।
"हहह... हाँ... थोड़ी गर्मी है," कामिनी ने काँपती आवाज़ में हाँफते हुए जवाब दिया। उसकी उँगलियाँ डाइनिंग टेबल के किनारे को इतनी ज़ोर से भींचे हुए थीं कि पोर सफ़ेद पड़ गए थे। अब बस कुछ ही पलों की बात थी, और कामिनी उसी कुर्सी पर बैठे-बैठे रमेश के सामने ही झड़ जाने वाली थी।
मेज़ के नीचे का अँधेरा अब कामिनी के लिए दुनिया की सबसे मादक जगह बन चुका था। फ़ौजा सिंह की खुरदरी उँगलियाँ किसी भूखे जानवर की तरह कामिनी की सूजी हुई चुत को लगातार कुरेद रही थीं। कामरस की बाढ़ इस कदर आ चुकी थी कि उस घर्षण से एक अजीब सी गीली आवाज़ आने लगी थी 'पच... पच... फच...'
उस सन्नाटे में यह कामुक आवाज़ कामिनी के कानों में हथौड़े की तरह बज रही थी। वह बुरी तरह सहम गई। उसकी डरी हुई नज़रें झटके से सामने बैठे रमेश पर गईं "कहीं रमेश ये आवाज़ सुन ना ले!" लेकिन रमेश अब लगभग बेहोशी की हालत में था। उसका सिर धीरे-धीरे कुर्सी की बैकरेस्ट पर पीछे की तरफ झुकता जा रहा था और उसके हाथ में थमा आधा भरा शराब का गिलास हवा में बुरी तरह काँप रहा था।
"बहू.... कितना पानी भर के रखा है अंदर?" फ़ौजा सिंह ने एक वहशी और भारी फुसफुसाहट के साथ अपनी एक उँगली अचानक पूरी ताकत से कामिनी की उस तंग और गीली गुफा में धँसा दी "धच!'
"आआआआहहहह..... आउच!"
उस खुरदरी और मोटी उँगली के अंदर घुसते ही कामिनी दर्द और चरम सुख के मिले-जुले झटके से लगभग चीख ही पड़ी। उसकी आवाज़ सुनकर रमेश अपनी जगह से हल्का सा हिला। उसने भारी पलकों से आँखें खोलीं, धुंधली नज़रों से इधर-उधर देखा, लेकिन उसके जाहिल दिमाग को कुछ समझ नहीं आया। उसने बस अपने काँपते हाथ में थमा गिलास मुँह से लगाया और एक ही झटके में पूरी शराब गटक ली।
"ईईईस्स्स्स...." कामिनी की साँस में साँस आई। वह कभी सामने बैठे फ़ौजा सिंह के शांत और रोबदार चेहरे को देखती, तो कभी सिर झुकाकर मेज़ के नीचे अपनी चुत को भेदती हुई उँगली को।
"आअह्ह्ह... इस्स्स... इस्स्स...." कामिनी अब पूरी तरह से तड़प रही थी। उस एक उँगली के झटकों ने उसके भीतर की हवस को ज्वालामुखी बना दिया था। उसे अब और चाहिए था। उसने अपनी कमर को कुर्सी पर थोड़ा आगे की तरफ सरकाया, अपनी पीठ पीछे टिका दी और बेशर्मी की सारी हदें पार करते हुए अपनी जाँघें और ज़्यादा चौड़ी कर दीं।
फ़ौजा सिंह को आमंत्रण मिल चुका था। उसने बिना कोई रहम खाए अपनी दूसरी उँगली भी उस रस से भरी गुफा में उतार दी। 'चप... चाओ... पच... पच.....' अब दो उँगलियाँ कामिनी के अंदर-बाहर हो रही थीं। कामिनी का पूरा वजूद काँपने लगा। उसकी आँखें पलट रही थीं, और वह अपनी मंज़िल (झड़ने) के बिल्कुल करीब थी...
कि तभी "खो... खो... खोंक!"
रमेश अचानक ज़ोर से खाँस उठा। खाँसी की उस आवाज़ ने कामिनी के सम्मोहन को एक झटके में तोड़ दिया। वह हड़बड़ा कर झट से अपनी जगह से खड़ी हो गई। साड़ी और पेटीकोट नीचे गिरे, और उसने घबराहट में मेज़ पर रखा पानी का गिलास उठाया और काँपते हाथों से रमेश की तरफ बढ़ा दिया।
लेकिन रमेश को पानी की कोई ज़रूरत नहीं थी। खाँसने के बाद उसका सिर कुर्सी पर आगे की तरफ लटक गया और वह मुँह खोलकर ऊँघने लगा। वह पूरी तरह से 'आउट' हो चुका था।
कामिनी ने एक गहरी साँस छोड़ी और वापस अपनी कुर्सी पर आकर बैठ गई। उसकी धड़कनें अभी भी बेकाबू थीं।
"बहू... ये वाला मटन खाओगी?"
कामिनी अभी कुर्सी पर संभल कर बैठी ही थी कि फ़ौजा सिंह की इस भारी आवाज़ ने उसका ध्यान खींचा। कामिनी ने जैसे ही सामने नज़र उठाई, वह सन्न रह गई। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
फ़ौजा सिंह ने ना जाने कब अपनी धोती खोल दी थी, कामिनी को पता ही नहीं चला! डाइनिंग टेबल के नीचे, फ़ौजा सिंह की खुली हुई जाँघों के बीच उसका मोटा, काला और मूसल जैसा भीमकाय लंड पूरी शान से हवा में लहरा रहा था। वह अंग इतना विशाल और खौफ़नाक था कि कामिनी ने ज़िंदगी में ऐसा कुछ नहीं देखा था।
उस 'असली मटन' को सामने खड़ा देखकर कामिनी की रस टपकाती चुत एक बार फिर से बुरी तरह कुलबुला उठी। उसके सोचने-समझने की रही-सही क्षमता भी राख हो चुकी थी। एक बड़े घर की बहू की मर्यादा, उसकी शर्म, उसका संकोच... सब कुछ आज उसकी जाँघों के बीच से बहते हुए उस कामरस के साथ बह गया था।
सामने पति बेहोश पड़ा था, और पत्नी की आँखों में सिर्फ़ उस मूसल को पाने की दीवानगी थी।
कामिनी के काँपते हुए गोरे हाथ अनजाने में ही आगे बढ़े और उस काले, गर्म 'अजूबे' को टटोलने के लिए मेज़ के नीचे पहुँच गए। वहीं दूसरी तरफ, फ़ौजा सिंह ने बड़ी ही शांति और रसूख के साथ मेज़ पर रखी शराब की बोतल को थाम लिया,
कामिनी के काँपते हुए, दूध जैसे गोरे हाथ जब उस भीमकाय, काले और नसदार लंड पर पड़े, तो वह पूरी तरह से किसी सम्मोहन में बँध गई। कामिनी बड़ी ही नज़ाकत और हैरानी से फ़ौजा सिंह के उस भारी लंड को अलट-पलट कर महसूस कर रही थी। लंड की गर्मी और सख़्ती कामिनी की हथेलियों को झुलसा रही थी।
धीरे-धीरे कामिनी की नरम मुट्ठी उस कड़क गोश्त के टुकड़े पर कसती चली गई। जैसे ही उसने अपने हाथ की पकड़ को नीचे की तरफ सरकाया, लंड की मोटी चमड़ी पीछे हटती चली गई और अगले ही पल, वह सख़्त, चमकता हुआ गुलाबी सुपाड़ा पूरी तरह से बेपर्दा होकर बाहर आ गया।
कामिनी का दिल पसलियों में किसी नगाड़े की तरह बजने लगा। एक हट्टे-कट्टे, रोबदार मर्द का ऐसा खौफ़नाक और विशाल लंड यही तो कामिनी की सबसे बड़ी कमज़ोरी थी। और आज वह कमज़ोरी साक्षात उसकी मुट्ठी में कैद होकर फड़क रही थी। लंड की हर फड़कन कामिनी की जाँघों के बीच की गीली चुत में करंट पैदा कर रही थी।
"तेरा ही है बहू... जी भर के टटोल ले," फ़ौजा सिंह ने बहुत ही इत्मीनान से मेज़ पर रखा गिलास उठाया और शराब का एक घूँट हलक में उतारते हुए फुसफुसाया। "ऐसा मज़बूत हल ही गहराई तक जाकर प्यासी ज़मीन को अच्छे से सींच पाता है।"
फ़ौजा सिंह के इन शब्दों ने कामिनी के अंदर की रही-सही शर्म को भी भस्म कर दिया। कामिनी के गोरे हाथ उस काले मूसल पर एक लय में ऊपर-नीचे चलने लगे।
वह अब एक मादक खेल में खो चुकी थी, कभी लंड की चमड़ी को ऊपर खींचकर उस गुलाबी सुपाड़े को मुट्ठी में कैद कर देती, और कभी झटके से नीचे खींचकर उसे पूरी तरह से नंगा कर देती।
वह अब एक मादक खेल में खो चुकी थी, कभी लंड की चमड़ी को ऊपर खींचकर उस गुलाबी सुपाड़े को मुट्ठी में कैद कर देती, और कभी झटके से नीचे खींचकर उसे पूरी तरह से नंगा कर देती।इस घर्षण से उस सख़्त अंग से उठती हुई पसीने और मर्दानगी की एक तीखी, मादक गंध सीधे कामिनी के नथुनों से टकरा रही थी। यह कोई इत्र नहीं था, यह एक असली मर्द की गंध थी जो कामिनी के दिमाग की नसों में अफ़ीम की तरह चढ़ रही थी।
टेबल के ऊपर का नज़ारा दुनिया की नज़रों के लिए कितना सामान्य था! सामने कुर्सी पर कामिनी का अपना पति रमेश बेसुध पड़ा ऊँघ रहा था। और वहीं दूसरी तरफ फ़ौजा सिंह अपनी जाँघें पूरी तरह फैलाए, बड़े ही रसूख और बेपरवाही से बैठा था। एक हाथ से वह शराब पी रहा था, और दूसरे हाथ से प्लेट में रखे मटन के टुकड़े को दाँतों से बेरहमी से चबा रहा था।
कामिनी के पेट में भी भूख की तेज़ आग सुलग रही थी। सुबह से जो बवंडर उसके जिस्म में उठा था, उसने उसे अंदर तक खोखला कर दिया था। लेकिन उसकी यह भूख टेबल पर रखे उस मसालेदार मटन के लिए बिल्कुल नहीं थी।
कामिनी का 'मटन' तो कुछ और ही था। वह दूसरों से बिल्कुल अलग था काला, गर्म, नसदार और धड़कता हुआ गोश्त का वो भीमकाय टुकड़ा, जो इस वक़्त उसकी मुट्ठी में तड़प रहा था। कामिनी की आँखें उस गुलाबी सुपाड़े पर गड़ी थीं और उसके होंठ सूख रहे थे। उसका मन अब उस 'असली मटन' के स्वाद को अपनी जीभ पर महसूस करने के लिए बुरी तरह मचलने लगा था।
फ़ौजा सिंह ने अपनी प्लेट में रखे मटन का आख़िरी टुकड़ा चबाया और गिलास में बची शराब की आख़िरी बूँद को अपने हलक के नीचे उतार लिया।
वह अपनी कुर्सी से एक झटके में खड़ा हो गया।
"अब खेत की असली सिंचाई की बारी है बहू," फ़ौजा सिंह की भारी आवाज़ में अब कोई पर्दा नहीं था। उसने अपने कुर्ते के बटन खोले और उसे झटके से उतार कर दूर फेंक दिया।
कामिनी की आँखें फटी की फटी रह गईं। साठ साल की उम्र में भी फ़ौजा सिंह का कसरती और गठीला जिस्म किसी जवान पहलवान को मात दे रहा था। सफ़ेद बालों से भरी उसकी चौड़ी छाती, सपाट कड़क पेट और उन मज़बूत जाँघों के बीच लटकता हुआ 10 इंच का नसों से भरा, काला और मोटा लंड, ये सब कुछ कामिनी की बर्दाश्त और कल्पना से बाहर था।
इससे पहले कि कामिनी कुछ समझ पाती, फ़ौजा सिंह ने आगे बढ़कर अपने मज़बूत हाथों से कामिनी को बाहों में भर लिया और उसे ऐसे हवा में उठा लिया जैसे उसमें कोई वज़न ही ना हो। उसने कामिनी को सीधे डाइनिंग टेबल के कोने पर बैठा दिया।
कामिनी अभी खुद को सँभालती कि फ़ौजा सिंह ने उसकी दोनों नंगी जाँघों को पकड़ा और पूरी तरह से खोल दिया।
कमरे की उस पीली रोशनी में कामिनी की गीली, सूजी हुई और रस टपकाती चुत पूरी बेशर्मी के साथ फ़ौजा सिंह के सामने जगमगा उठी।
"आआहहहह.... बहू.... कितनी सुन्दर चुत है तेरी!" पहली बार फ़ौजा सिंह ने बातों का घुमाव छोड़कर सीधे और नंगे शब्दों का इस्तेमाल किया था।
ये शब्द सुनकर कामिनी की रूह काँप उठी। उसने एक बार डरते हुए अपनी गर्दन घुमाकर पीछे की तरफ देखा रमेश अभी भी कुर्सी पर बेसुध पड़ा ऊँघ रहा था। अपने पति को इस कदर बेखबर देखकर कामिनी ने आने वाले उस भयानक और सुखद पल के इंतज़ार में अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं।
उसे पूरी उम्मीद थी कि अब उसकी तड़प खत्म हो जाएगी। उसे लग रहा था कि फ़ौजा सिंह का वो फौलादी मूसल अब एक ही झटके में उसकी गुफा को चीरता हुआ अंदर घुसेगा और उसकी सारी आग बुझा देगा...
लेकिन... अगले ही पल उसे अपनी चुत की उन सूजी हुई पंखुड़ियों पर कुछ गीला, गर्म और खुरदरा सा रेंगता हुआ महसूस हुआ।
"आआआआहहहह....... माँ.... ईईईस्स्स्स....!"
कामिनी बिजली के झटके की तरह मेज़ पर उछल पड़ी। उसने हड़बड़ाहट में अपनी आँखें खोलीं।
सामने का नज़ारा देख उसका दिमाग सुन्न हो गया। फ़ौजा सिंह का सिर उसकी दोनों जाँघों के बीच पूरी तरह धँसा हुआ था। वो बूढ़ा, रोबदार सरपंच अब एक प्यासे जानवर की तरह कामिनी की गीली चुत पर मुँह मारे हुए था और उसकी गर्म, खुरदरी ज़बान कामिनी की पंखुड़ियों और दाने को बुरी तरह से चाट रही थी।
'ससससल्लप्प्पप्प... चट... चट...'
"आअह्ह्ह..... उउफ्फ्फ... सरपंच जी..." कामिनी का पूरा जिस्म ऐंठने लगा। उसके दोनों काँपते हुए हाथ अनजाने में ही फ़ौजा सिंह के सफ़ेद बालों में जा फँसे और उन्हें कसकर भींच लिया।
आनंद के उस चरम और अप्रत्याशित झटके से कामिनी की गर्दन पीछे की तरफ लटक गई। उसका एक हाथ अपने आप लाल डीप-नेक ब्लाउज के ऊपर से ही अपने भारी स्तनों पर रेंगने लगा और उन्हें बेदर्दी से मसलने लगा। दोपहर झोपड़ी से शुरू हुई वो गर्मी, हवस और उत्तेजना अब कामिनी की बर्दाश्त के बिल्कुल बाहर हो चुकी थी।
फ़ौजा सिंह की खुरदरी और कड़क ज़बान किसी भूखे भेड़िये की तरह कामिनी की गीली चुत की गहराइयों को बेदर्दी से नाप रही थी। 'ससससल्लप्प्पप्प... चट... चट...चप...' की कामुक आवाज़ें उस सन्नाटे को चीर रही थीं। फ़ौजा सिंह का पूरा सिर कामिनी की नंगी जाँघों के बीच धँसा हुआ था, और उसकी ज़बान उस नाज़ुक दाने (Clitoris) के चारों ओर एक पागलपन के साथ घूम रही थी।
कामिनी मेज़ पर तड़प रही थी, मछली की तरह मचल रही थी। चरम सुख की उस लहर को सँभालना उसके लिए नामुमकिन हो रहा था। वह अपने हाथों से डीप-नेक ब्लाउज के ऊपर से ही अपने भारी स्तनों को कस-कस कर मसल रही थी, लेकिन उसके नाज़ुक हाथों में भला वो बात कहाँ जो उस उफनते हुए दर्द और पीड़ा को शांत कर सके! उसे तो किसी मर्दाने, खुरदरे और ज़ालिम स्पर्श की ज़रूरत थी।
इस बेकाबू हवस में कामिनी ने अपनी बची-खुची शर्म भी उतार फेंकी। उसने अपने हाथ पीछे किए और 'टक... टक... टक...' करके अपने लाल ब्लाउज के सारे हुक खोल दिए। रेशमी ब्लाउज खिसक कर मेज़ पर गिर गया। कामिनी अपने बेसुध पति के ठीक सामने, डाइनिंग टेबल पर महज़ एक काली जालीदार ब्रा में बैठी अपनी चुत चटवा रही थी।
फ़ौजा सिंह ने कुछ देर पहले ही वह मसालेदार मटन खाया था। उसकी ज़बान पर लगे वो तीखे गर्म मसाले अब कामिनी की नाज़ुक और सूजी हुई पंखुड़ियों पर लगकर एक अजीब सी मीठी जलन और झनझनाहट पैदा कर रहे थे। वो सुलगती हुई जलन और ज़बान का वो घर्षण कामिनी के लिए बर्दाश्त से बाहर हो गया.
"अअअअ.....आअह्ह्ह... सरपंच जी... बस.... आह्ह... अब नहीं... प्लीज़..." कामिनी तड़पते हुए मिन्नत कर उठी। उसकी साँसें उखड़ रही थीं और जिस्म पसीने से भीग कर चमक रहा था।
कामिनी की इस तड़प को देखकर फ़ौजा सिंह ने अपना सिर जाँघों के बीच से निकाला और सीधा खड़ा हो गया। उसका पूरा रोबदार और कड़क चेहरा कामिनी के कामरस (चूतरस) से सना हुआ था। उसकी दाढ़ी के सफ़ेद बालों से कामिनी के रस की बूँदें टपक रही थीं।
"वाह बहू... तेरी चुत का स्वाद तो कमाल का है," फ़ौजा सिंह ने अपने होंठों पर जीभ फेरते हुए कहा, जैसे किसी बहुत ही स्वादिष्ट दावत का लुत्फ़ उठाया हो।
फ़ौजा सिंह की वहशी नज़रें जैसे ही कामिनी के उस काली ब्रा में कैद उफनते हुए सीने पर पड़ी, "दूध का स्वाद कैसा है, वो भी तो देखना पड़ेगा..." कहते हुए फ़ौजा सिंह ने अपने दोनों मज़बूत हाथ कामिनी के स्तनों पर रख दिए। अगले ही पल, उसने एक ज़ोरदार झटके से ब्रा को तड़ाक.......नोच कर उसके जिस्म से दूर फेंक दिया।
ब्रा के हटते ही कामिनी के भारी, दूध जैसे गोरे स्तन हवा में आज़ाद होकर झूल गए। वो एकदम कड़क और तने हुए थे। उनके गहरे गुलाबी निप्पल किसी लोहे की कील की तरह सख़्त होकर गर्व से ऐसे तने हुए थे, जैसे अपनी जवानी के घमंड में इतरा रहे हों। कामिनी अब ऊपर से पूरी तरह नंगी थी। उसके जिस्म पर सिर्फ़ कमर से नीचे महँगी लाल साड़ी का वो घेरा बचा था, जो पहले ही ऊपर सरक चुका था।
"आआआआह्हः.... आउच...." कामिनी दर्द और सुख के मारे चीख पड़ी जब फ़ौजा सिंह के लोहे जैसे हाथों ने उसके उन आज़ाद स्तनों को पूरी बेदर्दी से अपनी मुट्ठी में भर लिया और उन्हें बुरी तरह मसल दिया।
फ़ौजा सिंह की उँगलियाँ तने हुए निप्पलों को मरोड़ रही थीं, और कामिनी का सिर पीछे की तरफ लटक गया।
"आआहहहह.... सरपंच... जी... और कस के..." कामिनी सिहर उठी।
अब कोई पाबंदी नहीं थी, कोई पर्दा नहीं था। कामिनी शर्म की हर दहलीज़ को लाँघकर अब पूरी तरह से हवस के गहरे दरिया में उतर चुकी थी,
फ़ौजा सिंह के लोहे जैसे कड़क हाथ कामिनी के आज़ाद और दूधिया स्तनों पर कहर ढा रहे थे। कामिनी की आँखें मुँदी थीं और मुँह से लगातार सिसकियाँ निकल रही थीं। वो पूरी तरह से हवस के समंदर में डूब चुकी थी।
तभी फ़ौजा सिंह ने कामिनी की कमर को अपने मज़बूत हाथों में पकड़ा और उसे खींचकर डाइनिंग टेबल के बिल्कुल किनारे तक ले आया। साड़ी का घेरा अब और भी ऊपर जा चुका था, और कामिनी की नंगी जाँघें मेज़ के किनारे से नीचे हवा में झूल रही थीं।
फ़ौजा सिंह आगे बढ़ा और कामिनी की खुली जाँघों के ठीक बीचो-बीच खड़ा हो गया। उसका काला, भीमकाय और नसों से भरा हुआ वह '10 इंच का मूसल लंड अब ठीक कामिनी की गीली, सूजी हुई और रस से लबालब चुत के मुहाने पर दस्तक दे रहा था। उस मोटे और गर्म गुलाबी सुपाड़े की तपिश जब कामिनी की नाज़ुक पंखुड़ियों से टकराई, तो कामिनी का पूरा शरीर किसी खिंचे हुए धनुष की तरह तन गया।
उसने घबराहट में अपनी आँखें खोलीं और नीचे देखा।
वह अंग इतना विशाल और खौफ़नाक था कि कामिनी का दिल एक पल के लिए बैठ गया। उसे लगा कि उसका जिस्म इसे बर्दाश्त नहीं कर पाएगी, वो बीच से ही फट जाएगी।
"ससस... सरपंच जी... ये... ये बहुत बड़ा है... मैं फट जाऊँगी... आआह्ह्ह!" कामिनी के मुँह से डर और बेतहाशा हवस में डूबी एक काँपती हुई आवाज़ निकली। उसने अपने हाथ पीछे ले जाकर मेज़ के किनारों को कसकर पकड़ लिया।
"खेत बंजर हो तो हल को गहराई तक उतारना ही पड़ता है बहू, तभी ज़मीन आबाद होती है," फ़ौजा सिंह ने अपनी भारी और वहशी आवाज़ में कहा। उसने कोई रहम नहीं दिखाया। उसने अपने मोटे सुपाड़े को कामिनी की चुत के उस तंग और गीले छेद पर सेट किया और अपनी कमर को पीछे खींचकर एक ज़ोरदार धक्का मारा
पच.... करता हुआ लंड फिसल कर कामिनी के दाने से टकरा गया, जो उत्तेजना मे चुत कि लकीर से बहार निकल आया था.
आआआहहहहम....... इस्स्स्स.... कामिनी का जिस्म इस टकराव से दहल गया.
इस बार सरपंच ने अपने लंड को कामिनी कि चुत से बिल्कुल चिपका दिया, निशाना पक्का था.
अब और नहीं... अब रुकना नहीं था.
'धच्चच्च....!'
"आआआआआहहहहहहह.... माँआआआआ... मर गई ईईईस्स्स्स!" कामिनी के मुँह से एक दिल दहला देने वाली चीख निकली, जिसे उसने तुरंत अपना होंठ दाँतों तले दबाकर रोकने की कोशिश की।
फ़ौजा सिंह का आधा लंड कामिनी की उस तंग गुफा की दीवारों को चीरता हुआ अंदर घुस चुका था। कामिनी की आँखें झटके से ऊपर पलट गईं और उसकी आँखों से दर्द और सुख के मिले-जुले आँसू छलक पड़े। उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने धधकता हुआ गर्म लोहे का खंभा उसके जिस्म में गाड़ दिया हो।
बरसों से जिस प्यास को वह मारती आ रही थी, आज वो प्यास इस खौफ़नाक दर्द के साथ बुझनी शुरू हुई थी।
उसी वक़्त, सामने कुर्सी पर ऊँघ रहा रमेश खाँसता हुआ अपनी जगह पर हल्का सा हिला। कामिनी की चीख सुनकर शायद उसकी नींद में कुछ खलल पड़ा था।
कामिनी की साँसें अटक गईं, पर रमेश बस से को दूसरी दिशा मे बदलकर, मुँह से राल टपकाता हुआ फिर से बेहोशी की नींद सो गया। पति के सामने गैर बूढ़े मर्द के लंड का उसकी चुत मे होने के अहसास ने उसके अंदर के दर्द को एक अजीब सी कामुकता में बदल दिया।
"अब देख बहू... असली जुताई किसे कहते हैं!"
फ़ौजा सिंह ने कामिनी की दोनों टाँगों को मजबूती से पकड़ और चौड़ा कर दिया। कामिनी की चुत अब पूरी तरह से बेपर्दा और चौड़ी होकर फ़ौजा सिंह के सामने थी। फ़ौजा ने अपनी कमर को एक बार फिर पीछे किया और इस बार अपनी पूरी ताकत झोंकते हुए एक भयानक और गहरा धक्का मारा
'थपपाक्क.....!'
"आअअअअअह्ह्ह्ह्ह..... उउउउफ्फ्फफ्फ्फ़...."
फ़ौजा सिंह का पूरा का पूरा 10 इंच का मोटा लंड जड़ तक कामिनी की बच्चेदानी से जा टकराया। कामिनी का शरीर हवा में उछल गया। उसे लगा उसकी साँसें हमेशा के लिए रुक गई हैं।
लेकिन फ़ौजा सिंह इस हक़ीक़त से वाकिफ था कि औरतों कि चुत लंड के लिए ही बनी है.
उसने बिना परवाह के लंड को पीछे खींचना शुरू किया, कामिनी का मुँह खुला रहा गया, उसने नीचे झुक कर देखा, फ़ौजा सिंह काअंडर उसकी चुतरस से साना बहार आ रहा था, use लगा जैसे उसकी चुत भी साथ ही बहार आ जाएगी.
लंड अभी थोड़ा बहार आया ही था कि धप्प्पपम... धाअद.... फ़ौजा सिंह ने वापस अंदर धकेल दिया.
आअह्ह्हभ.....
थप...
आआहहहह.
थप....
आआहहहह....
थप....
आआहहहहह
चुदाई का दौर शुरू हो गया था, फ़ौजा सिंह लंड बहार निकलता और पूरी रफ़्तार से वापस अंदर दे मारता, हर बार लंड कामिनी कि बच्चेदानी से टकरा जाता,
कामिनी कि नस नस दहल उठती, जिस्म का पोर पोर उत्तेजित हो चूका था.
'थप... चपाक... थप... चपाक...'
डाइनिंग टेबल की वो सागवान की लकड़ी अब फ़ौजा सिंह के हर वहशी धक्के के साथ चरमरा रही थी। "चर्र... चूँ... चर्र... चूँ...' पीले बल्ब की रोशनी में एक खौफ़नाक लेकिन बेहद कामुक तांडव चल रहा था। फ़ौजा सिंह का विशाल, पसीने से नहाया हुआ कसरती जिस्म कामिनी की नाज़ुक देह पर किसी पहाड़ की तरह टूट पड़ा था।
हर बार जब फ़ौजा सिंह अपनी मज़बूत कमर को पीछे ले जाकर एक ज़ोरदार धक्का मारता, तो कामिनी का पूरा शरीर झटके से पीछे की तरफ खिसक जाता।
'थपाक्क... चपाक... थपाक्क...!' माँस से माँस के टकराने की वो गूँज हवेली के आँगन में किसी नगाड़े की तरह बज रही थी। शुरुआती जो खौफ़नाक दर्द कामिनी की बच्चेदानी को चीर रहा था, वो अब धीरे-धीरे एक सुन्न कर देने वाले, मीठे और मदहोश कर देने वाले नशे में तब्दील होने लगा। सालों से रमेश के ठंडेपन और अधूरी रातों की मारी कामिनी को आज पहली बार एहसास हो रहा था कि एक असली मर्दाने लंड की ताकत क्या होती है।
"आअअअअअह्ह्ह्ह्ह..... सर... सरपंच जी... मैं... मैं मर जाऊँगी... ईईईस्स्स्स!" कामिनी के मुँह से लार टपकने लगी थी। उसका सिर डाइनिंग टेबल के किनारे पर पीछे की तरफ लटक गया था और उसके घने, काले बाल हवा में झूल रहे थे।
कामिनी के दोनों आज़ाद, भारी स्तन फ़ौजा सिंह के हर धक्के के साथ हवा में बेकाबू होकर उछल रहे थे। पसीने से तर-बतर वो दूधिया उभार जब फ़ौजा सिंह की खुरदरी, बालों से भरी चौड़ी छाती से टकराते, तो कामिनी की रगों में बिजली सी दौड़ जाती।
"मरने नहीं दूँगा बहू... आज तो तुझे ज़िंदा किया है मैंने!" फ़ौजा सिंह ने एक भयानक धक्का मारते हुए कामिनी की कमर को अपने लोहे जैसे हाथों में और कस लिया। उसकी उँगलियों के निशान कामिनी की गोरी कमर पर लाल होकर छपने लगे थे।
हवस और पागलपन की इस आग में कामिनी ने अपनी आँखें खोलीं। ठीक उसकी पीठ के पीछे , चंद फासलों की दूरी पर उसका पति रमेश कुर्सी पर गर्दन लटकाए, मुँह फाड़े सो रहा था।
रमेश के मुँह से अजीब सी खर्राटे की आवाज़ आ रही थी 'खुरर्र... फुरर्र...'
एक पति का अपनी पत्नी के जिस्म के छिनने पर यूँ बेखबर सोते रहना! इस दृश्य ने कामिनी के अंदर की रही-सही 'संस्कारी औरत' का भी गला घोंट दिया। उसे रमेश पर घिन आ रही थी और फ़ौजा सिंह के उस खौफ़नाक मर्दानेपन पर प्यार।
इस मनोवैज्ञानिक बवंडर ने कामिनी की हवस को एक अलग ही स्तर पर पहुँचा दिया।
"आआआह्ह्ह्ह.... और ज़ोर से... फाड़ दो मुझे आज!" कामिनी ने अचानक अपनी दोनों नंगी टाँगें उठाईं और उन्हें फ़ौजा सिंह की चौड़ी कमर के चारों ओर कसकर लपेट लिया।
फ़ौजा सिंह ने कामिनी का ये रंडीपना और बेशर्मी देखी, तो उसकी आँखों में खून उतर आया। "ये हुई ना बात, मेरी कुतिया !"
ले... आअह्ह्हम.... और ले... धाड़... धाड़.... चप... चप....
कामिनी के शब्दों ने फ़ौजा सिंह को जानवर बना दिया था.
फ़ौजा सिंह ने कामिनी की गर्दन के पीछे हाथ लगाया, उसे अपनी ओर खींचा और उसके पसीने से भीगे, काँपते होंठों को अपने खुरदरे होंठों में जकड़ लिया। मटन के मसालों और महँगी शराब की वो तीखी गंध कामिनी के मुँह में भर गई।
फ़ौजा सिंह की ज़बान कामिनी के मुँह के अंदर घुसकर उसके जिस्म का सारा रस चूस रही थी।
और नीचे... नीचे वो 10 इंच का गरम लोहे जैसा मूसल अब अपनी पूरी बेरहमी के साथ अंदर-बाहर हो रहा था।
कामिनी के नाज़ुक हाथ फ़ौजा सिंह की पसीने से भीगी पीठ पर पागलों की तरह खरोंचें मार रहे थे।
उसके नाखून फ़ौजा की खाल में धँसते जा रहे थे, लेकिन उस बूढ़े सांड को दर्द की कोई परवाह नहीं थी। कामिनी की चुत से इतना रस बहने लगा था कि फ़ौजा सिंह की जाँघें और डाइनिंग टेबल का कोना पूरी तरह से गीला हो चुका था।
कामिनी का दिमाग अब काम करना बंद कर चुका था। उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा रहा था, और नाभि के नीचे एक ऐसा ज्वालामुखी फटने को तैयार था,
डाइनिंग टेबल की सागवान की लकड़ी अब फ़ौजा सिंह के हर वहशी धक्के के साथ दर्द से चरमरा रही थी। फ़ौजा सिंह का 10 इंच का फौलादी मूसल कामिनी की बच्चेदानी पर ऐसे हथौड़े मार रहा था, जैसे आज ही उस बंजर खेत की सारी कसर निकाल लेनी हो।
"आआआआह्ह्ह्ह्ह..... माँआआआ.... सरपंच जी.... मैं... मैं गईईईईस्स्स्स!"
अचानक कामिनी का पूरा शरीर किसी कसी हुई कमान की तरह तन गया। उसके पैरों की उँगलियाँ मुड़कर ऐंठ गईं और उसकी गर्दन पीछे की तरफ लटक गई। एक पल के लिए कामिनी की साँसें जैसे रुक सी गईं, और अगले ही पल उसके नाभि के नीचे खौलता हुआ वो ज्वालामुखी भयंकर वेग से फट पड़ा।
चरम सुख की उस लहर ने कामिनी के दिमाग़ की नसें सुन्न कर दीं। उसकी सूजी हुई चुत के अंदर से कामरस और उत्तेजना में निकले पेशाब का एक गर्म, तेज़ फव्वारा सा फूट पड़ा। वो धार इतनी तेज़ और इतनी ज़्यादा थी कि उसने फ़ौजा सिंह के काले लंड, उसकी जाँघों और मेज़ के किनारे को पूरी तरह से नहला दिया। कामिनी के जिस्म का सारा पानी, जो बरसों से रमेश की नामर्दी के कारण सूखा पड़ा था, आज एक बाढ़ की तरह बाहर बह निकला था।
इतने भयंकर स्खलन के बाद कामिनी का जिस्म एकदम से टूट गया। वो डाइनिंग टेबल पर एक बेजान लाश की तरह पसर गई। उसकी आँखें अधखुली थीं, पुतलियाँ पीछे पलट गई थीं, और मुँह से लार की एक महीन तार लटक रही थी। उसके जो पैर फ़ौजा सिंह की कमर से लिपटे थे, वो हार मानकर नीचे झूल गए।
लेकिन वो साठ साल का खूँखार सांड अभी कहाँ रुकने वाला था! कामिनी की देह भले ही निढाल हो गई थी, पर फ़ौजा सिंह की हवस का तांडव अभी चरम पर था।
'थपाक्क... पच्च... चपाक... फच्च...!'
गीली और कामरस से लथपथ चुत में अब धक्कों की आवाज़ और भी अश्लील हो गई थी। फ़ौजा सिंह कामिनी के उस बेजान, पसीने से भीगे जिस्म को मेज़ पर आगे-पीछे घसीटते हुए बेतहाशा धक्के मार रहा था। कामिनी बस निर्जीव सी झटके खा रही थी, उसके भारी स्तन हर धक्के पर हवा में उछलकर वापस उसकी छाती पर गिर रहे थे।
और फिर... कुछ ही पलों के उस वहशी तांडव के बाद, फ़ौजा सिंह का कसरती शरीर भी अकड़ने लगा। उसकी नसें तन गईं और साँसें उखड़ने लगीं।
"हम्मफ़्फ़्फ़.... बहू... आअह्ह्ह.... साली रंडी कुतिया....!" फ़ौजा सिंह ने अपने दाँत पीसते हुए एक आख़िरी, सबसे गहरा और ज़ोरदार धक्का मारा। उसका पूरा का पूरा लंड कामिनी की गहराई को चीरता हुआ बच्चेदानी के मुहाने पर जाकर गड़ गया। "ऐसा मज़ा... ऐसा मज़ा आज से पहले कभी नहीं मिला.... आआहहब्ब!"
फ़ौजा सिंह का शरीर एक तेज़ झटके के साथ कांपा, और अगले ही पल उसके उस भारी मूसल से खौलते हुए गर्म वीर्य की मोटी धारें कामिनी की बच्चेदानी से टकराने लगीं।
जैसे ही वो गाढ़ा, गर्म और खौलता हुआ मर्दाना लावा कामिनी के अंदर गिरा, कामिनी के उस बेजान और निढाल जिस्म में करंट सा दौड़ गया। वीर्य की वो तपिश इतनी ज़्यादा थी कि कामिनी का शरीर डाइनिंग टेबल पर पड़े-पड़े ही झटके खाने लगा।
वो पूरी तरह नंगी, पसीने से नहाई हुई हाँफ रही थी, और उसका जिस्म उन गर्म धारों के अपने अंदर भरने का साक्षात अनुभव कर रहा था। फ़ौजा सिंह अपना सारा बरसों का जमा गाढ़ा वीर्य उसकी गहराई में उड़ेलता जा रहा था।
"साली रंडी कुतिया..."
फ़ौजा सिंह के मुँह से निकले ये गंदे, अश्लील और अपमानजनक शब्द जब कामिनी के कानों में पड़े, तो उसे कोई ग़ुस्सा नहीं आया। इसके विपरीत, इस भयंकर हवस और नंगेपन के बीच अपने लिए 'रंडी कुतिया' सुनकर कामिनी के काँपते होंठों पर एक नशीली, मदहोश मुस्कान तैर गई।
सामने बेहोश पड़े पति के होते हुए, एक दूसरे मर्द से खुद को कुतिया कहलवाने का यह सुख उसे दिमाग़ी तौर पर और भी ज़्यादा पागल कर रहा था।
फ़ौजा सिंह का लंड अभी भी कामिनी के अंदर पूरी गहराई तक धँसा हुआ था। और तभी, कुदरत का एक अजीब खेल शुरू हुआ। कामिनी की चुत की दीवारें अब अपने आप, बिना कामिनी के चाहे, उस लंड को चारों तरफ से कसने लगीं। अंदर की माँसपेशियां इस कदर फड़क रही थीं और सिकुड़ रही थीं, जैसे कामिनी की चुत के अंदर कोई अपना ही मुँह बन गया हो, जो उस लंड को चूस रहा हो। वो चुत उस फौलादी लंड की एक-एक बूँद को निचोड़ लेना चाहती थी।
कामिनी की चुत की वो फड़कन फ़ौजा सिंह को भी अपने लंड पर साफ़ महसूस हो रही थी। उस सख़्त माँस को अपनी चुत में कसते हुए कामिनी की उखड़ी साँसें अब धीरे-धीरे शांत होने लगीं।
पसीने और कामरस की गंध में डूबी कामिनी के होठों पर वो नशीली मुस्कान अभी भी चिपकी थी। उस अकल्पनीय सुख और थकावट के बोझ तले, कामिनी की भारी आँखें धीरे-धीरे बंद होती चली गईं।
कामिनी अपनी आँखें बंद किए उस अकल्पनीय चरम सुख की गहराइयों में गोते लगा रही थी। उसके ठीक सामने उसका अपना पति रमेश मुँह फाड़े, दुनिया से बेखबर खर्राटे भर रहा था, खुरर्र... फुरर्र...
"हमगफ.... हमफ़्फ़्फ़... हमफ़्फ़्फ़..." कामिनी की साँसें अब धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। उसके पसीने से तर-बतर चेहरे पर एक अजीब सा, थका हुआ सुकून था। उसका पूरा जिस्म मेज़ पर बिल्कुल निढाल पड़ा था, जैसे देह का सारा बोझ और सालों की सारी तड़प बहकर निकल गई हो।
फ़ौजा सिंह का वो फौलादी लंड अभी भी कामिनी की सूजी हुई चुत के अंदर पूरी गहराई तक धँसा हुआ था। कामिनी की अंदरूनी दीवारें रह-रह कर फड़कतीं और उस लंड से रिसती हुई वीर्य की आख़िरी बूँदों को किसी प्यासे रेगिस्तान की तरह पी रही थीं।
उस मादक सन्नाटे में सब कुछ जैसे ठहर सा गया था।
कि तभी....
धाड़...... छानक.... छन छना छन.......!
अचानक हवेली के उस खामोश आँगन में कांच के चकनाचूर होने की तेज़ आवाज़ गूँजी।
"अअअअअअअह्ह्हहह्म्....!" शराब की भारी विदेशी बोतल टूटने की आवाज़ के साथ ही फ़ौजा सिंह के मुँह से एक दर्द भरी, भयानक चीख निकली।
कामिनी की तंद्रा एक झटके में टूट गई। वह एकदम से सकपका कर मेज़ पर हिली। उसने घबराहट में अपनी आँखें खोलीं तो सामने का नज़ारा देखकर उसकी रूह काँप गई।
सामने एक हट्टा-कट्टा आदमी खड़ा था, जिसने अपने मुँह पर एक मैला सा रूमाल बाँध रखा था। उसी नकाबपोश ने डाइनिंग टेबल पर रखी वो महँगी कांच की बोतल पूरी ताकत से फ़ौजा सिंह के सिर पर दे मारी थी।
फ़ौजा सिंह का वो रोबदार और कसरती शरीर एक ही वार में ढेर हो गया। उसके होश फाख्ता हो गए और सिर से खून का फव्वारा फूट पड़ा। वो बिना कुछ समझे, अपनी आँखें पलटते हुए सीधा ज़मीन की तरफ गिरता चला गया।
जैसे ही फ़ौजा सिंह का भारी शरीर पीछे की तरफ गिरा 'पच... फाचक....!' की एक भद्दी सी आवाज़ के साथ उसका वो मोटा लंड कामिनी की चुत से झटके से बाहर आ गया।
लंड के बाहर निकलते ही कामिनी की उस चौड़ी और सूजी हुई चुत से पेशाब, कामरस और फ़ौजा सिंह के गर्म वीर्य का एक गाढ़ा मिश्रण छलक कर ज़मीन पर टपकने लगा।
कामिनी डर के मारे सुन्न हो गई। वह चीखना चाहती थी, डाइनिंग टेबल से उठकर भागना चाहती थी, लेकिन उस भयंकर चरम सुख और इस अचानक हुए हमले ने उसके जिस्म की सारी जान निचोड़ ली थी। उसकी टाँगों में इतनी भी ताकत नहीं बची थी कि वह मेज़ से नीचे उतर सके।
तभी उस नकाबपोश के पीछे से एक और आदमी आगे आया।
"साली रंडी... बहुत चुद ली, अब चल हमारे साथ!" एक जोड़ी मज़बूत और खुरदरे हाथों ने कामिनी के बिखरे हुए बालों को पूरी बेरहमी से पकड़ा और एक ज़ोरदार झटके के साथ उसे मेज़ से खींच लिया। कामिनी दर्द से कराह उठी। उन जालिम हाथों ने उसे हवा में घसीटते हुए अपने पैरों पर खड़ा कर दिया।
"साली... अब आई ना हाथ में!" दूसरे नकाबपोश ने फुसफुसाते हुए कहा।
इससे पहले कि कामिनी कुछ समझ पाती या अपने बचाव में हाथ-पैर मार पाती, सामने वाले शख्स ने एक मोटा और बदबूदार काला कपड़ा कामिनी के चेहरे पर डाल दिया। कामिनी की आँखों के सामने पूरा अँधेरा छा गया।
रमेश अभी भी कुर्सी पर उसी तरह बेहोश पड़ा था। और वो दोनों हमलावर उस निढाल, खौफ़ज़दा और पूरी तरह से नंगी कामिनी को बालों से पकड़कर, हवेली के पिछले दरवाज़े से उस घने अँधेरे बगीचे की तरफ घसीटते हुए ले गए। ज़मीन पर कामिनी के पैरों के निशान और उसके जिस्म से टपकते उस वीर्य की बूँदें पीछे छूटती जा रही थीं।
क्रमशः
Buy me a wine
kamukwine@ptyes
andywine@ptyes


3 Comments
Gajab ka update diya hai bhai kya chudai hui hai maza agaya aur wo land aur chut lock wala scene bhi jabardast tha... Waise je harmkhor lucky aur uska sathi jaise subha kutte kuttiya ko chudai ke time pareshan kiye waise hi yaha bhi is kamini kuttiya ki chudai mai haddi ki tarha agaye jisse ab ye kutte kuttiya marege bas ye sarpanch na mar jaye waise ye to tau se bhi lucky nikla sidha dusre mulakat mai pel diya
ReplyDeleteMast update
ReplyDeleteBhai maan gaye aapko kya likhte ho ab kadar bachayega kamni ko in gundo se
ReplyDelete