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कामिनी 2.0 भाग -15

मेरी माँ कामिनी 2.0 - अध्याय -15



रात के ढाई बज चुके थे। खेतों के बीच से गुज़रती उस कच्ची और सँकरी पगडंडी पर दूर-दूर तक सिर्फ झींगुरों की आवाज़ और सर्द हवा से सरसराते खेतों का शोर गूँज रहा था। बंटी और फागुन गाँव का मेला घूम कर वापस हवेली की तरफ लौट रहे थे। मेले की थकान के बावजूद, दोनों ने एक-दूसरे का हाथ कसकर पकड़ा हुआ था।

"फागुन..." बंटी ने चलते-चलते अचानक एक बहुत ही गंभीर और गहरी आवाज़ में पूछा, "ताईजी के कमरे की चाबी किसके पास रहती है?"
फागुन के कदमों की रफ़्तार थोड़ी धीमी हो गई। "क्यों...?" उसने हैरानी से बंटी की तरफ देखा।
"बता ना... काम है कुछ?" बंटी की आवाज़ में एक अजीब सी बेचैनी थी।
"अरे, ताईजी के पास ही रहती थी... रखी होगी घर में ही कहीं," फागुन ने बहुत लापरवाही से जवाब दिया, जैसे यह कोई पूछने वाली बात ही न हो।

"तुम्हें कभी कुछ अजीब नहीं लगा ताईजी के कमरे में?" बंटी की आँखों में एक गहरा शक था, वो कुछ ऐसा ढूँढ रहा था जो हवेली के बाकी लोगों की नज़रों से छिपा था।

"नहीं... मैं तो कई बार ताईजी के कमरे में ही सोती थी," फागुन ने कंधे उचकाए।
बंटी समझ गया कि फागुन इस हवेली के बारे मे ज्यादा कुछ नहीं मालूम।

"तुम भी क्या ये सब लेकर बैठ गए? इतना अच्छा मेला घूम कर आए हैं और तुम चाबी-ताले की बात कर रहे हो," फागुन थोड़ा चिढ़ते हुए बोली। उसका रोमांटिक मूड ख़राब हो रहा था।

बातें करते-करते दोनों हवेली के भारी दरवाज़े तक पहुँच गए। अंदर का नज़ारा एकदम सुन्न पड़ा था। बाहर आँगन में बिछी चारपाई पर रमेश मुँह बाए पड़ा था और उसके खर्राटे सन्नाटे को चीर रहे थे।
"लगता है माँ जी आ गईं..." फागुन ने रमेश को देखकर अंदाज़ा लगाया और हवेली के अंदर चली गई।
बंटी भी उसके पीछे अंदर जाने के लिए आगे बढ़ा ही था कि अचानक... उसकी नज़र आँगन के फर्श पर पड़ी किसी छोटी, चमकती हुई चीज़ पर जाकर टिक गई। चाँद की रोशनी में वो धातु किसी हीरे की तरह चमक रही थी।

बंटी ने झुक कर उसे उठाया... और जैसे ही उस चीज़ की बनावट को पहचाना, उसकी बाछें खिलती चली गईं। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक और चेहरे पर एक विजयी मुस्कान आ गई।
उसके सारे सवालों का जवाब इस वक़्त उसकी हथेली में था "ताईजी के कमरे की चाबी!" शायद जब कादर ने नशे में धुत्त रमेश को सँभाल कर इस चारपाई पर लिटाया होगा, तो उसी हड़बड़ाहट में ये चाबी रमेश की जेब से फिसल कर नीचे फर्श पर गिर पड़ी होगी।

"बंटी.... बंटी... माँ जी तो कमरे में नहीं हैं!" फागुन की घबराई हुई आवाज़ हवेली के अंदर से आई। वो वापस बाहर आँगन में आ गई थी।
"अरे, सो जाओ तुम। माँ कहीं बाथरूम-वाथरूम गई होंगी," बंटी ने फागुन की तरफ बिना देखे ही बात टाल दी।

हैरानी की बात थी कि बंटी को कामिनी के आधी रात को गायब होने की ज़रा भी चिंता नहीं हुई (जबकि कामिनी इसी वक़्त छत पर कादर के साथ चरम सुख में डूबी थी)। इस वक़्त बंटी का पूरा दिमाग़ और उसकी नज़रें सिर्फ अपनी हथेली में रखी उस पुरानी, भारी चाबी की चमक पर अटकी हुई थीं।

बंटी को इस तरह गुमसुम और गंभीर देख फागुन भी ज़्यादा कुछ नहीं बोली। वो मेले की थकान से चूर थी, इसलिए चुपचाप अपने कमरे में चली गई और बिस्तर पर गिरते ही गहरी नींद के आगोश में समा गई।

इधर आँगन में, कुछ देर इंतज़ार करने के बाद, जब बंटी को यकीन हो गया कि फागुन सो चुकी है और रमेश पूरी तरह बेहोश है... तो वो दबे पाँव, एक चोर की तरह ताईजी के बंद कमरे की ओर बढ़ चला।
कमरे के भारी, पुराने लोहे के ताले तक पहुँचते-पहुँचते बंटी का दिल उसकी पसलियों में 'धड़... धड़... धड़...' करके किसी हथौड़े की तरह बज रहा था। उसके हाथ इस कदर काँप रहे थे कि उसे चाबी पकड़ने में भी मुश्किल हो रही थी।

उसके दिमाग़ में बस एक ही सवाल किसी तूफ़ान की तरह घूम रहा था "क्या होगा नीचे? "

बंटी ने एक गहरी साँस ली और अपने काँपते हाथों से पुरानी चाबी बड़े से ताले के छेद में फँसा दी। उसने हल्का सा ज़ोर लगाकर चाबी घुमाई...
"कटक... क्लिक...!!"
रात के सन्नाटे में ताले के खुलने की भारी आवाज़ गूंज उठी...

"चररररर.....!!" सालों पुराने जंग लगे कब्ज़ों की मनहूस और चीखती हुई आवाज़ रात के सन्नाटे में गूँज गई। ताईजी के कमरे का भारी लकड़ी का दरवाज़ा खुल चुका था।
अंदर एकदम घना अँधेरा और सीलन भरा सन्नाटा था। बंटी के पैर इस कदर काँप रहे थे कि उसे लग रहा था जैसे वो अभी ज़मीन पर गिर पड़ेगा। लेकिन उसे वो राज़ पता तो करना ही था, आखिर ताईजी है कौन? इसके कमरे मे ये तहखना क्यों है?

उसने एक गहरी साँस खींचकर अपनी पूरी हिम्मत जुटाई और उस अँधेरे कमरे के अंदर अपने कदम रख दिए।
उसकी असली मंज़िल कमरे के आख़िरी कोने में रखी भारी, आदमकद लकड़ी की अलमारी थी।
बंटी दबे कदमों से अलमारी तक पहुँचा। उसने जैसे-तैसे अपने काँपते हाथों से अलमारी का दरवाज़ा खोला। अंदर ताईजी के पुराने और भारी कपड़े टँगे हुए थे, जिनमें से कपूर और पुरानी बंदिशों की गंध आ रही थी। बंटी ने उन टँगे हुए कपड़ों को झटके से एक तरफ हटाया।
कपड़े हटते ही अलमारी के पिछले हिस्से की लकड़ी पर लगा लोहे का एक पुराना, जंग लगा 'लीवर' दिखने लगा।
बंटी ने बिना कोई पल गँवाए उस लीवर को दोनों हाथों से पकड़ा और अपनी पूरी ताक़त के साथ उसे नीचे की तरफ़ घुमा दिया।
'खटाक... खुर्रर्रर्रर्र...' लीवर के घूमते ही अलमारी के पीछे वाली लकड़ी की भारी दीवार किसी मशीन की तरह एक तरफ सरक गई।
दीवार के सरकते ही नीचे के अज्ञात अँधेरे से बर्फ़ सी ठंडी, कसैली और सीलन भरी हवा का एक तेज़ भभका सीधा बंटी के चेहरे से आ टकराया। उस हवा के झोंके में एक अजीब सी, बेहद पुरानी और 'नशीली गंध' घुली हुई थी। वो गंध इतनी अजीब और तेज़ थी कि एक पल के लिए बंटी का सिर चकरा गया और उसकी नसें सुन्न होने लगीं।
बंटी ने घबरा कर तुरंत पीछे मुड़ कर दरवाज़े की तरफ़ देखा।
पीछे सिर्फ़ कमरे का अँधेरा था, कोई नहीं था। उसने राहत की साँस ली। उसने हड़बड़ाहट में अपनी पैंट की जेब से अपना मोबाइल निकाला और काँपती उँगलियों से उसकी टॉर्च जला दी।
टॉर्च की तेज़ सफ़ेद रोशनी जैसे ही उस अँधेरे में पड़ी... अलमारी के पीछे से नीचे पाताल की तरफ़ जाती हुई पुरानी, धूल और जालों से भरी पत्थरों की सीढ़ियाँ चमक उठीं।
नीचे का घुप्प अँधेरा बंटी को डरा रहा था, उसका दिल किसी इंजन की तरह दहल रहा था। लेकिन उसे मालूम था कि अगर आज वो पीछे हट गया, तो फिर कभी ये मौका नहीं मिल पाएगा। यही सबसे सही और शायद आख़िरी मौका था।

उसने मोबाइल की रोशनी नीचे की और अपना पहला कदम सीढ़ी पर रख दिया।
'धप्प...!'
उस तहखाने के डरावने और गहरे सन्नाटे में, बंटी के पैर रखने की वो हल्की सी 'शांत धमक' भी दीवारों से टकराकर किसी बम के फटने जैसी खौफ़नाक आवाज़ में गूँज गई।
बंटी वहीं जम गया, उसकी साँसें रुक गईं। लेकिन जब कोई हलचल नहीं हुई, तो उसने अपना दिल मज़बूत किया और उस अजीब सी नशीली गंध को सूँघता हुआ, मोबाइल की रोशनी के सहारे उस खौफ़नाक तहखाने की सीढ़ियों से धीरे-धीरे नीचे गहराई में उतरता चला गया।


जैसे-जैसे बंटी सीढ़ियों से नीचे पाताल की तरफ़ उतरता गया, हवा में मौजूद सीलन और अजीब सी नशीली गंध की तीव्रता दिमाग़ फाड़ने लगी। आख़िरकार सीढ़ियाँ ख़त्म हुईं। उसे अभी भी ठीक से आभास नहीं था कि वो हवेली के किस हिस्से के नीचे खड़ा है।
उसने काँपते हाथों से टॉर्च की सफ़ेद रोशनी आस-पास घुमाई। रोशनी दीवार के एक हिस्से पर पड़ी जहाँ एक पुराना सा इलेक्ट्रिक बोर्ड लगा हुआ था, जिस पर दो स्विच थे।
"टक... टक...!" बंटी ने बिना सोचे झटके से दोनों स्विच दबा दिए।
बटन का दबना ही था कि छत से लटकता एक 100 वाट का पीला बल्ब टिमटिमा कर जल उठा। बल्ब की उस पीली और मद्धम रोशनी में बंटी की नज़रें जैसे ही अपने आस-पास के नज़ारे पर पड़ीं, उसका मुँह खुला का खुला रह गया। आँखें फटी रह गईं।
वो कोई छोटा-मोटा तहखाना नहीं था, बल्कि एक बड़े से आँगन जितना विशाल कमरा था। वहाँ आस-पास 20 से 30 बड़ी-बड़ी बोरियाँ पड़ी हुई थीं। कुछ कसकर बँधी हुई थीं, तो कुछ का मुँह खुला हुआ था।
बंटी तेज़ कदमों से एक खुली बोरी के पास पहुँचा।
"अबे साला... ये क्या है बे?"
"शनिफ्फ्फ्फफ्फ्फ़... शनिफ्फफ्फ्फ़...' बंटी ने बोरी के अंदर मुँह डालकर एक गहरी साँस खींची।
वो गंध सीधे उसके दिमाग़ में चढ़ गई। बोरी में 'अफ़ीम के डोडे' (Poppy Husks) लबालब भरे पड़े थे। बंटी ने अपने बिगड़ैल दोस्त रवि से इन सब नशीली चीज़ों और अफीम के काले कारोबार के बारे में कई बार सुना हुआ था।

बंटी का तो पूरा वजूद ही हिल गया।
"तो क्या ताईजी इन सब का धंधा करती थीं? और मेरे पापा भी...? नहीं... नहीं... पापा रिश्वतखोर हैं, शराबी हैं, डरपोक हैं... लेकिन ये बड़े लेवल का नशा तस्करी का धंधा वो नहीं कर सकते।" बंटी को अपने बाप की असल औकात बहुत अच्छे से पता थी। रमेश इतना बड़ा खिलाड़ी नहीं था।

तहखाने की दीवारों पर कई लकड़ी के पुराने केबिनेट बने हुए थे। तभी बंटी की नज़र सामने रखी एक अलमारी पर गई। ये अलमारी तहखाने के बाकी सामान की तरह पुरानी या लकड़ी की नहीं थी, बल्कि एक मॉडर्न लोहे की सेफ़ (Safe) थी।
उसके कदम अलमारी की तरफ़ बढ़े। जैसे ही वो एकदम पास पहुँचा, उसने देखा कि अलमारी के ताले में चाबी वैसे ही लटकी हुई थी।
"साला शराबी... मेरा बाप!" बंटी अपने बाप की इस बेवकूफ़ी पर बुदबुदा कर हँस पड़ा। 
 पिछली बार जब उसने रमेश को नशे की हालत में इस तहखाने की तरफ़ आते देखा था, तो शायद उसी नशे और हड़बड़ाहट में रमेश ये चाबी यहीं लगी छोड़ गया था।
बंटी ने काँपते हाथों से अलमारी का भारी हैंडल घुमाया... 'कड़ड़ड़ड़... चरररर...!' जैसे ही अलमारी का दरवाज़ा खुला...
"ओह... भेनचोद...!" बंटी के मुँह से बेसाख़्ता एक भारी गाली निकल गई।
उसका दिल पसलियाँ तोड़कर बाहर आने को हो गया। उसने अपनी गांड कसकर भींच ली। पूरी की पूरी अलमारी ऊपर से नीचे तक 500 और 2000 के नोटों की गड्डियों से ठसाठस भरी पड़ी थी। इतना कैश बंटी ने अपनी पूरी ज़िंदगी में नहीं देखा था।

"ताईजी तो बहुत बड़ी खिलाड़ी निकलीं यार... इतना पैसा छोड़ के मरी हैं... गज़ब!" बंटी का दिमाग़ तेज़ी से दो और दो चार जोड़ रहा था।
"इसका मतलब... ये सब अब मेरे बाप का ही है! बताओ, साला दिन-रात पैसों का रोना रोता रहता है और यहाँ पूरी की पूरी अलमारी खज़ाने से भरी पड़ी है।" 

बंटी ने अलमारी का दरवाज़ा वैसे ही बंद कर दिया जैसे वो था। इस वक़्त बंटी की दिमाग़ी स्थिति बहुत अजीब थी। वो अपने बाप को समझने में नाकाम हो रहा था। सामने करोड़ों रुपये देखने के बावजूद उसके दिल में वो ख़ुशी नहीं थी जो होनी चाहिए थी। शायद उसे उम्मीद थी यही सब कुछ होगा यहाँ.
या फिर वो किसी और चीज कि उम्मीद कर के नीचे आया था.
पैसों से उसका मन उचट गया। वो भारी कदमों से मुड़कर वापस सीढ़ियों की तरफ जाने को हुआ कि...
"ये क्या है?"
अचानक टॉर्च की रोशनी दूर दीवार के कोने में रखे एक पुराने, दीमक लगे लकड़ी के 'संदूक' (Trunk) पर पड़ी।
बंटी ने पास जाकर देखा। उस संदूक पर कोई ताला नहीं था, कोई सुरक्षा नहीं थी। वो बस ऐसे ही बंद पड़ा था। इंसान की फितरत होती है कि जिस चीज़ पर कोई ताला या कड़ी सुरक्षा ना हो, उसे वो बेमतलब और फालतू की चीज़ मान लेता है।

बंटी ने भी उसे इग्नोर किया और आगे बढ़ गया। वो वापस सीढ़ियों तक पहुँच गया। उसके हाथ स्विच बोर्ड तक पहुँचे, ताकि वो पीला बल्ब बंद करके वापस ऊपर अपने कमरे में चला जाए...
तभी... बंटी के अंतर्मन से एक बहुत ही गहरी और तेज़ आवाज़ आई:
"अबे, बेवकूफ जब  यहाँ तक आ ही गया है... तो देख ही ले ना?"  बंटी के हाथ स्विच पर ही रुक गए। एक अजीब सी कशिश और बेचैनी ने उसे जकड़ लिया। वो धीरे से पलटा और उस बिना ताले वाले पुराने, रहस्यमयी लकड़ी के संदूक को घूरने लगा। 
ना जाने क्यों उसका सिक्स्थ सेन्स बोल रहा था "इसे मत खोल "
लेकिन इंसान सुनता कहाँ है 
बंटी ने उसका हैंडल पकड़ ऊपर उठा दिया.

ना जाने क्यों, उस घुप्प अँधेरे और सीलन भरे तहखाने में बंटी का सिक्स्थ सेंस (Sixth Sense) चीख-चीख कर उससे कह रहा था "इसे मत खोल बंटी... लौट जा!"

 लेकिन इंसान की फितरत ही यही है, जहाँ राज़ दफ़न होते हैं, उसकी उँगलियाँ वहीं सबसे पहले पहुँचती हैं। बंटी ने अपने दिल की धड़कनों को काबू में किया और उस पुराने संदूक के जंग लगे हैंडल को पकड़कर ऊपर उठा दिया।
"चररररर... खट...!'
संदूक का ढक्कन खुला और सदियों पुरानी धूल का एक गुबार बंटी के चेहरे पर आ लगा।
"हम्म्मफ्फ्फ्फफ्फ्फ़... धत्त साला! कागज़ ही कागज़ भरे पड़े हैं," बंटी ने मुँह बनाते हुए कहा।
संदूक में कोई खज़ाना या हथियार नहीं था, बस पुराने, पीले पड़ चुके कागज़ों के बंडल थे। कागज़ों के किनारों पर दीमक लगी हुई थी और उनसे एक अजीब सी बंद और सड़ी हुई महक आ रही थी। फिर भी बंटी ने अपनी जासूसी की धुन में सबसे ऊपर रखा एक कागज़ उठा लिया।
टॉर्च की रोशनी उस कागज़ पर डाली।
"1989... पापा की पहली नौकरी का जॉइनिंग लेटर..." बंटी ने उसे एक तरफ रखा और दूसरा लिफ़ाफ़ा उठाया। उसमें से ताईजी (सुगंधा) की कुछ पुरानी ब्लैक एंड वाइट तस्वीरें निकलीं, साथ में उसके दादाजी की कुछ पुरानी तस्वीरें थीं। रिश्ते में सुगंधा बंटी के दादा की मौसेरी बहन ही तो लगती थी।

बंटी एक के बाद एक कागज़ टटोलता गया... ये ज़मीन के कागज़... ये हवेली के पुराने दस्तावेज़... ये गाँव में किसी मरम्मत के काम की रसीद...
"साला... सब बेकार!" बंटी की सारी एक्साइटमेंट (Excitement) एक झटके में ख़त्म हो गई। जासूस के हाथ कुछ पुख़्ता सबूत ना लगे, तो वो किस बात का जासूस?
बंटी को लगा कि वो कुछ ज़्यादा ही सोच रहा था। उसका बाप रमेश सिर्फ एक लालची, डरपोक और शराबी इंसान है, जो शायद ताईजी के पैसों के लालच में यहाँ आता होगा। इसमें कोई बहुत बड़ी साज़िश या खौफ़नाक राज़ नहीं था।
निराश होकर बंटी ने वो सारे कागज़ समेटे और उन्हें वापस संदूक में पटकने को हुआ कि तभी... उसकी नज़र ज़मीन पर गिरे एक छोटे से, पीले पड़ चुके और दीमक लगे लिफ़ाफ़े पर पड़ी। शायद कागज़ों को उलटते-पलटते वक़्त वो नीचे गिर गया था।
उसने बाकी सारे कागज़ संदूक में डाले और उस पीले लिफ़ाफ़े को उठा लिया। लिफ़ाफ़े का गोंद सूख कर पहले ही खुल चुका था। बंटी ने उँगलियाँ डालकर अंदर से एक मोड़ा हुआ, खुरदरा कागज़ निकाला।
टॉर्च की रोशनी में बंटी ने झट से वो कागज़ खोला।
कागज़ पर नीली स्याही से कुछ लिखा था।
"ये... ये हैंडराइटिंग... ये तो दादाजी की है!" बंटी ने एक ही नज़र में अपने स्वर्गवासी दादा की उस पुरानी और सधी हुई लिखाई को पहचान लिया था।
बंटी ने अपनी टॉर्च को कागज़ के और करीब किया और वो पुरानी चिट्ठी पढ़ने लगा:
"मेरी प्यारी बहन सुगंधा....
तूने रमेश का बहुत ध्यान रखा। उसे हर मुसीबत, हर साये से बचाया। तू रमेश के अहसानों तले दबी हुई थी, ये मैं जानता हूँ। लेकिन मैं... मैं ऐसा कैसे कर गया? मैंने ये खौफ़नाक पाप कैसे किया? मेरी रूह काँपती है सुगंधा... मेरा अंतिम समय अब आ गया है, मौत मेरे सिरहाने खड़ी है, इसलिए तुझे ये आख़िरी चिट्ठी लिख रहा हूँ... ताकि मेरे सीने का ये बोझ..."

बंटी की आँखें जैसे-जैसे उस चिट्ठी की अगली लाइनों पर दौड़ती गईं... उसके चेहरे का रंग सफ़ेद पड़ता गया। उसके हाथ किसी सूखे पत्ते की तरह बुरी तरह काँपने लगे।
"धप्प...!"
बंटी के पैरों की सारी ताक़त ख़त्म हो गई और वो घुटनों के बल उस ठंडे, सीलन भरे फर्श पर आ गिरा। उसकी साँसें गले में किसी काँटे की तरह चुभने लगीं। जो सच्चाई उस कागज़ पर लिखी थी, उसने बंटी के पूरे वजूद, उसकी पूरी दुनिया को ताश के महल की तरह ढहा दिया था।
बंटी की आँखों से आँसुओं का एक सैलाब फूट पड़ा। वो गर्म आँसू टपक-टपक कर उस सीलन भरी ज़मीन और उस पुरानी चिट्ठी को गीला करने लगे। उसके हाथों में दादाजी की वो चिट्ठी अभी भी काँप रही थी, लेकिन वो अपनी डबडबाई आँखों से उसे पढ़ता जा रहा था... और रोता जा रहा था।
बंटी... जो बचपन से अपनी माँ को मार खाते देखता था, रमेश कि जाहिलियत, उसके शराबी होने के बर्ताव को झेलता था, अपनी माँ के लिए चट्टान की तरह मज़बूती से टिका रहता था, 
मस्त मौला मज़ाक पसंद बंटी आज इस तहखाने की ज़मीन पर एक बेबस, लाचार और अनाथ बच्चे की तरह गिरा हुआ सिसक रहा था। उस एक चिट्ठी ने उसकी रगों में बहते खून को ही सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया था।
***************

बंटी के हाथ में वो पीला लिफ़ाफ़ा और उसके दादाजी की चिट्ठी किसी ज़िंदा साँप की तरह काँप रही थी। उस कागज़ पर लिखे हर एक लफ़्ज़ के साथ साल 1990 की उस मनहूस रात का पूरा खौफ़नाक मंज़र बंटी की आँखों के सामने एक फिल्म की तरह चलने लगा...

 साल 1990
धाड़... धड़.... धड़ाम...!!
सुगंधा पागलों की तरह बदहवास होकर फ़ौजा सिंह की हवेली का भारी दरवाज़ा पीट रही थी। उसकी साँसें उखड़ी हुई थीं और माथे से पसीना टपक रहा था। फ़ौजा सिंह ने जैसे ही दरवाज़ा खोला, सामने सुगंधा की हालत देखकर वो सन्न रह गया।
"रमेश बाबू को बचाना होगा फ़ौजा! भैया (रमेश का बाप ) को सारी बात बतानी होगी, जल्दी चलो... अनर्थ हो गया है!" सुगंधा ने हाँफते हुए और रोते हुए उस रात की सारी खौफ़नाक सच्चाई फ़ौजा सिंह के सामने उगल दी।

फ़ौजा सिंह ने एक पल की भी देर नहीं की। उसने झटके से अपनी पुरानी बुलेट निकाली और उसे किक मारी।
"धाड़... धाड़.... ड़ड़ड़ह्ह्ह्हड़ड़ड़ड़...!"
रात के सन्नाटे का सीना चीरती हुई वो भारी बुलेट शहर की तरफ़ दौड़ पड़ी। पीछे बैठी सुगंधा के हाथों में कपड़े में लिपटा हुआ एक नवजात बच्चा था, जिसे वो सीने से चिपकाए हुए थी। सुगंधा डरी हुई नज़रों से आसमान को देखे जा रही थी, जहाँ चाँद कभी काले बादलों में छुप जाता, तो कभी बाहर निकल आता... 

वहीं दूसरी तरफ़, शहर के एक सरकारी अस्पताल के नीरस और बदबूदार कॉरिडोर में रमेश का बाप (ज़मींदार) बेचैनी से चहलकदमी कर रहा था। उसके चेहरे पर चिंता की गहरी लकीरें थीं।
अंदर लेबर रूम में कामिनी असहनीय प्रसव पीड़ा (Labor Pain) से जूझ रही थी। उसकी चीखें बाहर तक आ रही थीं। वो किसी भी वक़्त बच्चे को जन्म दे सकती थी।
तभी लेबर रूम का दरवाज़ा खुला और एक नर्स ने बाहर आकर कहा, "मुबारक हो ज़मींदार साब... बहू को लड़की हुई है।"
"कककक.... क्या... लड़की?" ज़मींदार के कदम वहीं जम गए। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। खुशी की जगह उसके चेहरे पर एक भयंकर क्रोध और निराशा तमतमा उठी।
"साला रमेश सही कहता था... ये औरत किसी काम की नहीं है। एक कुलदीपक, एक लड़का तक पैदा ना कर सकी!" ज़मींदार का पुरुषवादी और जाहिल अहंकार चकनाचूर हो गया था। वो गुस्से में पैर पटकता हुआ अस्पताल के बाहर उस अँधेरी सड़क पर आ खड़ा हुआ। उसे समझ नहीं आ रहा था कि रमेश को जाकर क्या मुँह दिखाएगा।
तभी दूर सड़क से  धड़... धड़... धड़... करती हुई फ़ौजा सिंह की बुलेट तेज़ी से चली आई और ज़मींदार के ठीक सामने आकर रुकी।
"भैया... भैया....." सुगंधा बुलेट से लगभग कूदती हुई ज़मींदार के पास पहुँची।
"सुगंधा... त.. त... तुम यहाँ कैसे? और इस वक़्त... इस हालात में?" ज़मींदार अपनी बहन को यूँ बदहवास देखकर ख़ुद हैरान था।
"ररर... रमेश... भैया, रमेश को बचा लो... खून... खून कर दिया है उसने!" सुगंधा फफक-फफक कर रो पड़ी। उसने सुगना के मर्डर की पूरी कहानी ज़मींदार को कह सुनाई।
यह सुनकर ज़मींदार का मुँह कड़वा हो गया। माथे पर पसीना आ गया। "हे भगवान! अब बुढ़ापे में क्या-क्या दिन देखने पड़ेंगे मुझे!" उसने अपना सिर पकड़ लिया।

"मैं... मैं करता हूँ कुछ इंतज़ाम," ज़मींदार ने गहरी साँस ली, और तभी उसकी नज़र सुगंधा के हाथों में लिपटे उस नवजात बच्चे पर पड़ी। "ये... ये किसका बच्चा ले कर आई है तू?"
"भैया ये... राघव और सुगना का लड़का है। रमेश ने जिस सुगना को मार दिया, ये उसी का बच्चा है," सुगंधा खौफ़ और चिंता से मरी जा रही थी।
लेकिन 'लड़का' शब्द सुनते ही ज़मींदार की आँखों में एक शैतानी और स्वार्थी चमक आ गई। उसके चेहरे पर एक अजीब सी, खौफ़नाक मुस्कान तैर गई।

"वाह रे ऊपर वाले... तेरी लीला भी अपरम्पार है," ज़मींदार मन ही मन बुदबुदाया। एक तरफ़ उसकी बहू ने लड़की पैदा की थी, और दूसरी तरफ़ किस्मत ने एक 'लड़का' खुद उसके पैरों में लाकर डाल दिया था।
"ला... इसे इधर दे मुझे। मैं अभी आता हूँ," ज़मींदार ने बिना कोई सवाल किए वो बच्चा सुगंधा के हाथों से झपट लिया और तेज़ कदमों से वापस अस्पताल के अंदर चला गया।
बाहर फ़ौजा सिंह और सुगंधा एक-दूसरे का मुँह देख रहे थे। फ़ौजा सिंह ने अपनी जेब से बीड़ी निकाली और उसे सुलगा कर खामोशी से धुआँ उड़ाने लगा।
कोई 10-15 मिनट बाद ज़मींदार वापस बाहर लौटा। उसके हाथों में अभी भी एक बच्चा था, लेकिन ये वो बच्चा नहीं था जिसे वो अंदर ले गया था।
"ये ले सुगंधा... मेरी प्यारी बहन, क्या सही मौके पर आई है तू," ज़मींदार ने वो कपड़े में लिपटा बच्चा सुगंधा के हाथों में थमा दिया और अपनी जेब से कुछ पैसों की गड्डी निकालकर सुगंधा की मुट्ठी में दबा दी।

सुगंधा ने हैरानी से बच्चे का चेहरा देखा और फिर ज़मींदार की तरफ़ घूमी।
"किसी को कुछ मत बोलना सुगंधा! रमेश को अगर मालूम पड़ गया कि कामिनी को लड़की हुई है, तो वो नशे में किसी दिन अपनी ही इस औलाद को भी मार देगा। मेरी मज़बूरी है सुगंधा... तेरा बहुत बड़ा अहसान है हम पर," ज़मींदार की आवाज़ में एक गिड़गिड़ाहट थी। 

"अब तू जा यहाँ से... मैं सुबह तक रमेश को बचाने का सब इंतज़ाम कर लूँगा। कुछ नहीं होगा रमेश को।"
ज़मींदार पलटा, लेकिन फिर कुछ सोचकर वापस मुड़ा। उसकी आँखों में एक अजीब सी नमी थी। आख़िर वो लड़की उसी की पोती थी, उसी का वंश थी, लेकिन इस जाहिल समाज और रमेश के डर की मज़बूरी ने उसे ये पाप करने पर मजबूर कर दिया था।
"और हाँ..." ज़मींदार का गला रुँध गया, "इसे दुलार से... बहुत प्यार से पालना। इसका नाम... फागुन रखना।"

सुगंधा सब कुछ समझ चुकी थी। वो एक औरत थी, और एक औरत से बेहतर इस दर्द को कौन समझ सकता था? इस समाज की सोच औरत और लड़की के लिए कभी नहीं बदलेगी। वो कभी मज़बूरी रहेगी, तो कभी किसी की ज़रूरत। लेकिन रहेगी वो हमेशा 'बोझ' ही।

 और इसके अलावा सुगंधा कर भी क्या सकती थी? उसे रमेश के अहसानों का कर्ज़ भी तो चुकाना था।
"ठीक है भैया..." सुगंधा भारी कदमों से वापस बुलेट की तरफ़ चल दी। उसकी आँखों में आँसू थे। उसने खुद अपनी ज़िंदगी में इस समाज की आग को झेला था, लेकिन आज उस नवजात बच्ची को सीने से लगाते हुए उसने एक कसम खाई "फागुन को वो कभी ये सब नहीं झेलने देगी"


बंटी की बंद आँखों के सामने अब वो खौफ़नाक मंज़र किसी पुरानी रील की तरह चलने लगा था... अगले ही दिन किशनगंज में जो सनसनी फैली होगी, बंटी आज उसकी एक-एक तस्वीर की कल्पना कर पा रहा था।
किसी को यकीन नहीं हो रहा होगा, लेकिन समाज और पुलिस के सामने एक झूठा सच परोसा जा चुका था।

शमशेर राघव को कॉलर से पकड़कर सरेआम सड़क पर घसीटता हुआ ले जा रहा था।
"चल साले! नशे में धुत होकर अपनी ही बीवी को मार दिया... बताओ, कैसा नीच और जानवर आदमी है ये!" शमशेर की आवाज़ में एक बनावटी और खौफ़नाक गुस्सा था।
"नहीं... नहीं... मैंने कुछ नहीं किया! मेरी सुगना... मेरी सुगना को मार दिया .. मुझे छोड़ दो!" राघव पागलों की तरह चीख रहा था, गिड़गिड़ा रहा था, लेकिन उसकी आवाज़ सुनने वाला उस ज़ालिम दुनिया में कोई नहीं था।
रघु मानसिक विक्षिप्त सा लग रहा था 


"सुबुक... सुबुक... आआआह्ह्ह!"
तहखाने के धूल भरे फर्श पर पड़ा बंटी ज़ार-ज़ार रो रहा था। उसके मुँह से लार टपक कर ज़मीन की धूल में सन रही थी, लेकिन उसे कोई होश नहीं था। उसका दिमाग़ सुन्न पड़ चुका था और सीना दर्द से फटा जा रहा था।

"मतलब... मेरा असली बाप रघु है? वही रघु जो इतने समय तक हमारे ही घर के एक अंधेरे स्टोर रूम में किसी लावारिस कुत्ते की तरह पड़ा रहा? एक नौकर की तरह हमारी जूठन खाता रहा? वो सड़क का शराबी भिखारी... वो मेरा बाप है?"

बंटी की उँगलियाँ ज़मीन की मिट्टी को खुरच रही थीं।
"और मेरी माँ (सुगना) का कातिल... ये रमेश है! जिसे मैं अब तक अपना बाप मानता आया... वो एक हत्यारा है! हे भगवान... ये क्या हुआ? दादाजी, ये क्या कर दिया आपने अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए?"

"कामिनी... कामिनी मेरी माँ नहीं है!" यह अहसास बंटी के दिल पर किसी भारी हथौड़े की तरह लगा। जिसके लिए वो पूरी दुनिया से लड़ सकता था, उसके हर किये को सही ठहरा रहा था,  वो उसकी सगी माँ थी ही नहीं!

अचानक बंटी की रगों में बहता खून खौलने लगा। आँसुओं की जगह उसकी आँखों में एक खूँखार लाल रंग उतर आया। एक भयानक नफ़रत और इंतकाम की आग उसके सीने में धधक उठी।

"मैं मार डालूँगा साले को... अभी ऊपर जाकर साले शराबी का गला काट दूँगा!"
बंटी ने अपने दाँत पीसे और रमेश की जान लेने के खूँखार इरादे से उठने की कोशिश की। लेकिन जैसे ही वो अपने पैरों पर खड़ा हुआ... उसके घुटने लड़खड़ा गए। इस भयानक सच ने उसके जिस्म की सारी ताक़त, सारी रूह निचोड़ ली थी। उसके पैरों में एक कदम बढ़ाने की भी जान नहीं बची थी।
'धड़ाम...!'
वो वापस उसी धूल भरे और सीलन वाले फर्श पर मुँह के बल गिर पड़ा और बेतहाशा सिसकने लगा।
ज़मीन पर पड़े-पड़े उसे अब अतीत के सारे बिखरे हुए पन्ने किसी पहेली की तरह समझ आने लगे थे।
रघु का वो शराब के नशे में बड़बड़ाना, वो आधी-अधूरी सुनाई हुई कहानी... और सबसे बड़ी बात, फागुन का चेहरा! क्यों फागुन के चेहरे और उसके जिस्म की बनावट में बंटी को अक्सर कामिनी की झलक दिखाई देती थी?
 क्योंकि फागुन ही कामिनी और रमेश का असली खून है!

बंटी ने काँपते हाथों से उस चिट्ठी का आख़िरी हिस्सा वापस पढ़ा। दादाजी के वो आख़िरी शब्द उनके जमीर का बोझ और एक गहरा पश्चाताप बयान कर रहे थे:
"मेरे दिल पर बहुत बड़ा बोझ है सुगंधा... मैंने अपने स्वार्थ के लिए एक अच्छे खुशहाल परिवार के साथ पाप किया है। शायद मैं अपनी पोती फागुन से जीते जी कभी नहीं मिल पाऊँगा, यही मेरे गुनाह की सज़ा है। 

मरते वक़्त मुझे मेरे ही पाप धिक्कार रहे हैं। मैं अपनी सारी ज़मीन और अपनी पूरी जायदाद फागुन के नाम कर रहा हूँ... उसका ध्यान रखना सुगंधा... मुझे माफ़ कर देना।"

बंटी के हाथ से वो चिट्ठी छूट गई। आज उस तहखाने की अलमारी में रखे करोड़ों रुपये, ये आलीशान हवेली, जमीन जायदाद सब कुछ बंटी के लिए मिट्टी के बराबर थे। आज उसने अपना बाप, अपनी माँ और अपना वजूद... सब कुछ एक ही झटके में खो दिया था। कमरे के उस पीले बल्ब की रोशनी में वो सिर्फ एक लाचार और अनाथ लड़का था, जिसकी पूरी ज़िंदगी एक झूठ की बुनियाद पर खड़ी थी।

समय का खेल अजीब होता है, बंटी पाताल मे बैठा आपने वजूद से लड़ रहा है, वही कामिनी छत पर अपने जिस्मानी चरमसुख को प्राप्त कर रही है.
 इस आसमान और पाताल के बीच आंगन मे बेफिक्र रमेश सो रहा है.

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8 Comments

  1. Us chitti ke jariye aaj sare dabe hue raaj ujagar ho gaya
    Jo bhi brahm patako ke man me tha wo dur ho gaya hoga.
    Ab dekhna hoga bunty apna badla ramesh se kaise leta hai.
    Kahani ne dilchasp mod le liya hai.
    Kuch bhi ho jaye kamini ki hawas kam nahi honi chahiye.

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  2. Next update...?

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  3. Bhai ab to update de do

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  4. 10 din ho gaye bhai update kab aayega?

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  5. Bhai ab to de de updat ya fir kisi ki jaan lekar hi manoge

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    1. भाई कुछ डोनेशन मिल जाये तो कहानी लिखने मे मजा आता है.
      मेहनत तो लगती ही है, टाइम निकलना पड़ता है

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  6. Xforum par bhi yahi halat thi writer ki aur yaha bhi 😁😁😂

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    1. कामुक वाइनMay 11, 2026 at 12:26 AM

      Sir कुछ डोनेशन मिल जाता तो....

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