मेरी माँ कामिनी 2.0 - अध्याय-8
रात 9:00 बजे | कमला काकी का घर
कमला काकी के छोटे से मिट्टी के घर में पीली रोशनी वाला एक बल्ब जल रहा था। ज़मीन पर टाट की बोरियाँ बिछी थीं, जहाँ बंटी और फागुन आमने-सामने बैठे थे। हवा में चूल्हे की ताज़ा रोटियों और देसी तड़के की सोंधी महक फैली थी।
प्रमिला आज कुछ ज़्यादा ही चहक रही थी। उसने जानबूझकर एक बेहद तंग चोली पहनी थी, जिसके बटन जैसे-जैसे वो साँस लेती, टूटने को मचल रहे जाते।
वो रसोई से रोटियाँ लेकर आई और बंटी के ठीक सामने उकड़ूँ (घुटनों के बल) बैठकर खाना परोसने लगी।
उकड़ूँ बैठने की वजह से प्रमिला का भरा हुआ जिस्म और भी ज़्यादा कस गया। जैसे ही वो बंटी की थाली में साग डालने के लिए आगे झुकी, उसकी तंग चोली का गला पूरी तरह जवाब दे गया। उसके दोनों भारी और साँवले स्तन लगभग बाहर को झाँकने लगे।
चोली इतनी नीचे सरक गई थी कि उसके एक स्तन का ऊपरी हिस्सा और काले निप्पल का घेरा तक साफ़ झलकने लगा था।
"खोम्म्मखो.... खो....!!"
बंटी, जो अभी निवाला मुँह में डालने ही वाला था, उसकी नज़र सीधे उस 'नंगे खजाने' पर जा टिकी। नज़ारा इतना अचानक और जानलेवा था कि बंटी का निवाला उसके गले में ही अटक गया। वो बुरी तरह खाँसने लगा, उसका चेहरा लाल हो गया।
"अरे... अरे... आराम से छोटे बाबू!" फागुन ने हड़बड़ा कर पानी का गिलास बंटी की तरफ बढ़ाया और उसकी पीठ थपथपाने लगी।
लेकिन पानी पिलाते वक्त फागुन की नज़र प्रमिला पर पड़ी। प्रमिला उसी झुकी हुई हालत में बंटी को देखकर तिरछी मुस्कान दे रही थी, उसे बखूबी पता था कि उसकी जवानी का क्या असर हो रहा है। आज पहली बार, ना जाने क्यों, फागुन के सीने में एक तेज़ जलन (Jealousy) महसूस हुई। उसे प्रमिला पर भयंकर गुस्सा आ रहा था।
फागुन जानती थी कि प्रमिला एक नंबर की 'चुद्दाकड़' और आवारा किस्म की लड़की है, जो गाँव के कई लड़कों के साथ खेतों में मुँह मार चुकी है।
"प्रमिला! ठीक से बैठ ना... ये क्या तरीका है परोसने का?" फागुन ने अपनी चिढ़ दबाते हुए उसे झिड़का।
प्रमिला ने वहीं बैठे-बैठे अपनी कमर को एक झटका दिया और बड़ी ढिठाई से बोली, "मेरे बैठने में क्या समस्या है फागुन? मैं तो अपने घर में ऐसे ही बैठती हूँ। अब किसी को कुछ 'ज़्यादा' दिख रहा है तो इसमें मेरा क्या दोष?"
"अरे बिटिया... शहर के बाबू हैं, सादगी पसंद करते हैं। ऐसा रूखा-सूखा खाना और हम जैसे गरीबों का रहन-सहन उन्हें कहाँ भाता होगा," पास ही बैठे रामखिलावन (प्रमिला के पिता) ने अपनी लाचारी और गरीबी के भाव में कहा।
बंटी ने खुद को सँभाला और प्रमिला के उन उभरते हुए स्तनों से अपनी नज़रें हटाते हुए झेंप कर बोला, "नहीं-नहीं काका... ऐसी बात नहीं है। मुझे यहाँ का खाना और यहाँ के लोग, दोनों ही बहुत पसंद आ रहे हैं।"
बंटी का ये कहना था कि प्रमिला की आँखों में जीत की चमक आ गई।
"देखा! मैंने कहा था ना कि छोटे बाबू को मेरा हाथ का स्वाद पसंद आएगा," प्रमिला ने फागुन को चिढ़ाने वाले अंदाज़ में कहा। वो झटके से खड़ी हुई और अपनी भारी गांड को मटकाती हुई, बंटी को एक आख़िरी कातिलाना नज़र देकर रसोई की तरफ दूसरी रोटी लेने चल दी।
फागुन अंदर ही अंदर जल-भुन कर खाक हो गई। उसे बंटी की वो नज़रें याद आ रही थीं जो अभी प्रमिला की चोली में झाँक रही थीं। उसे लगा जैसे प्रमिला उसकी थाली का निवाला छीन रही हो। उस एक पल ने फागुन के जहन मे बहुत कुछ पिघला दिया था, उसे समझ आया प्रमिला सही ही कहती थी, सब लड़को को ये ही चाहिए.
****************
हवेली के मुख्य आँगन से करीब पचास कदम नीचे, पगडंडी के किनारे वो पुराना लोहे का हैंडपंप खड़ा था। चारों तरफ ऊँची-ऊँची झाड़ियाँ और फसलें थीं, जो उस जगह को एक प्राकृतिक परदे (Privacy) की तरह घेरे हुए थीं। आसमान में खिला हुआ पूरा चाँद अपनी दूधिया रोशनी बिखेर रहा था, जिससे कामिनी का गोरा बदन उस अँधेरे में किसी संगमरमर की मूरत जैसा चमक रहा था।
"अबे वो देख... वही है कादर की महबूबा!" लकी ने बिट्टू की पसलियों में कोहनी मारते हुए फुसफुसाया।
"हाँ बे... वही है। साली क्या कयामत लगती है, देख क्या नागिन जैसी चाल है इसकी!" बिट्टू तो कामिनी के उस गदराए बदन और गोरे रंग को देखकर जैसे सुध-बुध खो बैठा था।
"चल, अभी दबोच लेते हैं..." लकी अपनी जगह से हिलने ही वाला था कि बिट्टू ने उसका कॉलर पकड़ लिया।
"तू ढक्कन ही रहेगा! सामने ही तो आ रही है, भाग के कहाँ जाएगी? देखने दे... ऐसा नज़ारा फिर कहाँ मिलेगा।" दोनों हैंडपम्प के पास ही पीपल के पेड़ की आड़ मे छुपे बैठे थे, अपनी हवस भरी आँखों से कामिनी के एक-एक कदम को नापने लगे।
कामिनी ने बाल्टी नीचे रखी और एक लंबी, सुकून भरी साँस ली। ठंडी हवा उसके पसीने से भीगे कपड़ो के अंदर सिहरन पैदा कर रही थी।
उसने इधर-उधर नज़र दौड़ाई दूर-दूर तक कोई परिंदा भी नहीं था। उस सन्नाटे ने कामिनी के अंदर एक अजीब सी 'बागी' आज़ादी भर दी।
उसने अपनी साड़ी के पल्लू को कंधे से सरकाया और साड़ी की तहें खोलकर उसे पास की एक ऊँची झाड़ी पर टांग दिया। अब वो सिर्फ अपने पतले सूती ब्लाउज़ और पेटीकोट में थी। चाँदनी रोशनी में उसके गोरे कन्धों और बाहों का निखार और भी मादक लग रहा था।
कामिनी ने झुक कर हैंडपंप का हत्था पकड़ा और उसे चलाना शुरू किया।
'कूँ... चप... कूँ... चप...'
लोहे के घिसने की आवाज़ उस सन्नाटे में गूंजी और अगले ही पल हैंडपंप के मुँह से ठंडे, बर्फीले पानी की एक मोटी धार फूट पड़ी। कामिनी ने आगे झुककर अपनी दोनों हथेलियाँ उस धार के नीचे कर दीं।
"आआआह्हः.... इस्स्स्स....." पानी इतना ठंडा था कि उसके मुँह से एक सिसकी निकल गई।
उसने पानी के कुल्ले किए और फिर उस ठंडी धार को सीधे अपने पैरों और तलवों पर डाला। वो हकीम के वीर्य की सूखी हुई पापड़ी पानी के स्पर्श से पिघलने लगी। कामिनी ने अपने पैरों को आपस में रगड़कर उस घिनौने एहसास को धो डाला।
पर असली तड़प तो अभी बाकी थी। हकीम की दी हुई उत्तेजना अभी भी उसकी नाभि के नीचे सुलग रही थी।
कामिनी ने फिर से हैंडपंप चला कर बाल्टी को भर लिया, और सामने घुटने गीले पत्थर पर टिका दिए, और एक मग्गा भर अपने कंधो पर डाल लिया.
"आआआहहहहह... उफ्फ्फ्फ्फ़...!" ठंडा पानी जैसे ही उसके गर्म और पसीने से लथपथ जिस्म से टकराया, कामिनी का पूरा वजूद कांप उठा। पानी की बूंदें उसके कामुक सुलगते जिस्म पर फिसलने लगी, गजब के सुकून ने उसे घेर लिया,
कामिनी ने मग्गा भर-भर कर अपने गले और सीने पर पानी डालना शुरू किया। देखते ही देखते उसका वो हल्का गुलाबी ब्लाउज़ पूरी तरह भीग कर पारदर्शी हो गया, भीगे हुए कपड़े ने कामिनी के उन भारी और उन्नत स्तनों को ऐसे जकड़ लिया जैसे वो कोई दूसरी खाल हो।
पानी के वजन और ठंडक से उसके सीने का कसाब और भी बढ़ गया था, और निप्पलों की नुकीली छाप उस भीगे ब्लाउज़ के आर-पार साफ़ छलकने लगी।
कामिनी अब बेसुध थी। उसने एक और मग्गा पानी भरा और उसे अपने सिर से उड़ेला। पानी उसके बालों से होता हुआ, उसके गोरे गालों और गर्दन से फिसलकर स्तनों की विशाल घाटी को पार करता हुआ नाभि के रास्ते पेटीकोट के अंदर उतरने लगा।
पेटीकोट भी भीग कर उसकी भारी और सुडौल जांघों से चिपक गया, जिससे उसके कामुक जिस्म का हर घुमाव उस चाँदनी रात में साफ़ दिखने लगा।
पानी की धार जब उसके भीगे बदन से टकराती, तो वो उत्तेजना और ठंडक के मिले-जुले अहसास में अपनी कमर मटकाने लगती। उसका हाथ अनजाने में ही अपनी भीगी जांघों और पेट पर फिरने लगा, जैसे वो उस पानी के ज़रिए अपनी अंदरूनी प्यास बुझाना चाह रही हो।
उधर, पेड़ के पीछे लकी और बिट्टू की आँखें फटी की फटी रह गई।
"अबे... ओए... बिट्टू... ये... ये क्या देख रहा हूँ मैं?" लकी का मुँह खुला रह गया और उसकी राल (लार) टपक कर उसकी कमीज़ पर गिर रही थी। "ये तो परी है बे... अप्सरा!"
"चुप कर साले... आवाज़ मत कर!" बिट्टू खुद अपनी साँसें रोके उस जादुई नज़ारे को देख रहा था।
"साला कादर ने इसे तो कस के चोदा होगा! देख कैसे पानी उसके बदन पर फिसल रहा है।"
लकी ने अपनी पैंट मे बने उभार को मसलते हुए कहाँ,
उसकी हवस अब उसके दिमाग पर चढ़ चुकी थी। "भाई... अब इंतज़ार नहीं होता। उठा लें क्या?"
"नहाने दे यार, साली को बड़ा भाई को सोपने से पहले कस के चोदेगे "
हैंडपंप से गिरते बर्फीले पानी ने कामिनी के बदन की आग बुझाने के बजाय उसे और भी भड़का दिया था। सन्नाटे और चाँदनी रात के उस जादुई असर में कामिनी पूरी तरह अपनी सुध-बुध खो चुकी थी। उसे बस उस टीस और उस भारीपन से आज़ादी चाहिए थी जो हकीम उसके रग-रग में भर गया था,
उसने एक बार फिर चारों तरफ देखा सन्नाटा इतना गहरा था कि खुद की साँसें भी साफ़ सुनाई दे रही थीं।
गिला ब्लाउज अब चुभने लगा था, कामिनी के कांपते हाथों ने अपने ब्लाउज के हुक पर पकड़ बनाई।
'टक... टक... टक...'
महज़ पाँच सेकंड के अंदर ही उसका भीगा हुआ ब्लाउज उसके जिस्म से अलग होकर कीचड़ भरी ज़मीन चाटने लगा। चाँदनी रोशनी में कामिनी के वो विशाल, सुडौल और संगमरमर जैसे गोरे स्तन पूरी तरह से नंगे होकर आज़ाद हवा में सांस लेने लगे। ठंड और उत्तेजना के मारे उसके निप्पल किसी नुकीली कील की तरह तन गए थे।
कामिनी ने एक गहरी सिसकी भरी और उसके हाथ अनजाने में ही अपने ही स्तनों पर कस गए।
"आआआहहहह..... इसससससस....!" जैसे ही उसकी अपनी हथेलियों का स्पर्श उन सख़्त निप्पलों से हुआ, कामिनी के मुँह से एक मदहोश चीख निकल गई। वो इस वक्त होश में नहीं थी; उसे बस एक वहशी छुअन की तलाश थी। वो चाहती थी कि कोई उसके इन स्तनों को बेदर्दी से मसले, उन्हें नोच डाले। कामिनी खुद ही अपने स्तनों को दबाने और सहलाने लगी। उसके पेटीकोट के अंदर उसकी गोरी जांघें एक-दूसरे से बुरी तरह रगड़ खा रही थीं।
झाड़ियों के पीछे छिपे लकी और बिट्टू का संयम अब पूरी तरह जवाब दे चुका था। कामिनी का यह नग्न और कामुक रूप देखकर उनके अंदर का जानवर जाग उठा।
"साली तो भयंकर गरम है यार! चल पहले इसे ठंडा करते हैं," बिट्टू ने दाँत पीसते हुए कहा। दोनों ने मन बना लिया था कि बड़ा भाई के पास ले जाने से पहले आज इस अप्सरा को जी भर के पेलना है।
वही दूसरी तरफ, हवेली की छत पर रमेश नशे मे धुत्त था। "साला ये ताऊ कहाँ मर गया हरामी? पानी भी नहीं है!" रमेश शराब के नशे में लड़खड़ाता हुआ, हाथ में खाली बोतल लिए नीचे उतरा। प्यास और नशे के मेल ने उसे चिड़चिड़ा कर दिया था। वो बड़बड़ाता हुआ हवेली के आँगन से नीचे पगडंडी की ओर बढ़ चला।
कामिनी इन दोनों खतरों से बेखबर, आँखें बंद किए, चाँदनी रात में अपने ही बदन से खेल रही थी और कराही जा रही थी। वो उस प्राकृतिक माहौल और अपने जिस्म के उबाल को महसूस कर रही थी।
लकी और बिट्टू दबे पाँव, झाड़ियों की ओट लेकर कामिनी से महज़ चार कदम की दूरी पर पहुँच ही चुके थे कि तभी...
"मादरचोद.... कौन है वहाँ...?"
यकायक रमेश की दहाड़ उस सन्नाटे को चीरती हुई गूँज उठी। रमेश पगडंडी के मोड़ पर खड़ा था और उसकी नज़र अपनी नग्न पत्नी के पास रेंगते उन दो सायों पर पड़ चुकी थी।
रमेश की आवाज़ सुनते ही कामिनी जैसे आसमान से सीधे धरातल पर आ गिरी। उसने झटके से आँखें खोलीं तो देखा कि उसके सामने दो अजनबी आकृतियाँ सन्न खड़ी थीं। कामिनी के तो जैसे प्राण ही सूख गए। उसने आनन-फानन में अपने दोनों हाथों से अपने नंगे स्तनों को छुपाने की नाकाम कोशिश की।
लकी और बिट्टू को भी समझ नहीं आया कि ये अचानक कहाँ से यमराज टपक पड़ा। रमेश का खूंखार चेहरा और उसकी आवाज़ सुनकर दोनों ने एक-दूसरे को देखा और बिना एक पल गँवाए उल्टे पाँव खेतों की ओर सरपट दौड़ लगा दी।
रमेश शेर की तरह दहाड़ता हुआ पास आ पहुँचा। उसकी आँखों में शराब का नशा और वहशी गुस्सा एक साथ नाच रहा था।
"साली रंडी... यहाँ गाँव में भी यार पाल लिए तूने? चटाक....!"
रमेश ने बिना कुछ सोचे-समझे कामिनी के गोरे गाल पर एक ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया। कामिनी का सिर घूम गया और वो गीले पत्थरों पर गिरते-गिरते बची।
"साली रांड! कौन थे वो? किसे दिखा रही थी अपनी ये नुमाइश? किसके लिए खोल रखे हैं ये थन?" रमेश ने कामिनी के नंगे स्तनों की ओर इशारा करते हुए दहाड़ा।
"वो.. वो... मैं तो बस नहाने आई थी... पानी नहीं था..." कामिनी थर-थर कांप रही थी। उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या सफाई दे।
"बहुत गर्मी चढ़ी है ना तुझे? शहर में तो बहुत सती सावित्री बनती है, यहाँ खुले में नंगी हो रही है? चल, तेरी ये गर्मी आज मैं ही उतारता हूँ!" रमेश ने कामिनी का वो भीगा, अर्धनग्न और बेपनाह खूबसूरत जिस्म देखा तो उसकी नसों में भी हवस का उबाल आ गया।
रमेश ने आव देखा ना ताव, कामिनी को उसके लम्बे भीगे बालों से पकड़ा और उसे लगभग घसीटता हुआ हवेली की तरफ ले जाने लगा। कामिनी बेसुध सी, अपने हाथों से अपनी लाज ढंकने की कोशिश करती हुई, रमेश के पीछे खिंची चली जा रही थी। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि महज़ चन्द मिनटों में उसकी चाँदनी रात के सुकून ने इस खौफनाक दुःस्वप्न का रूप ले लिया था।
हवेली का दरवाज़ा रमेश ने पैर मार के खोला और कमरे में रमेश ने कामिनी को बिस्तर पर एक ज़ोरदार धक्का दिया।
कामिनी का भीगा हुआ बदन गीले बिस्तर पर चित्त जा गिरा। उसके शरीर से चिपका वो पेटीकोट और ब्लाउज़ से आज़ाद उसके वो सुडौल, भारी स्तन चाँदनी रात की हल्की रोशनी में किसी जादुई मंज़र की तरह चमक रहे थे।
पेटीकोट कामिनी की जाँघों और उसकी सुलगती हुई चुत से इस कदर चिपक गया था कि उसकी उत्तेजना की हर एक लकीर रमेश के सामने बेपर्दा थी।
"साली... बता किसे दिखा रही थी ये नुमाइश!" रमेश की आवाज़ में शराब की कड़वाहट और वहशीपन था। उसने अपनी मज़बूत हथेलियों में कामिनी के कोमल स्तनों को दबोच लिया और उन्हें इतनी बेदर्दी से भींचा कि उँगलियों के निशान गोरी त्वचा पर उभर आए।
"आआआआहहहह...... इससससससस....!"
कमरे के सन्नाटे में कामिनी की एक लंबी कराह गूंजी। लेकिन ये कराह दर्द की नहीं, बल्कि एक अजीब से सुकून की थी। जिस जिस्म को हकीम ने भट्टी बना दिया था, उसे रमेश की इस बेदर्दी में एक राहत मिलने लगी।
रमेश कामिनी के स्तनों को किसी आटे की लोई की तरह बुरी तरह मसल रहा था, उन्हें गूँथ रहा था।
"आअह्ह्ह....... इसससससस.... उउउफ्फफ्फ्फ़...!"
कामिनी ने कोई विरोध नहीं किया। ताज्जुब की बात थी कि वही कामिनी, जो पहले रमेश की ज़रा सी ज़ोर-ज़बरदस्ती पर रोने लगती थी, गिड़गिड़ाने लगती थी, आज वो उस 'मीठे दर्द' को गले लगा रही थी। औरत के मन और शरीर की परतें भी कितनी पेचीदा होती हैं—कभी-कभी वो उस दर्द में ही अपना सुख ढूँढ लेती है जिसे दुनिया ज़ुल्म कहती है।
रमेश को जब कामिनी की तरफ से कोई मिन्नत या रोना सुनाई नहीं दिया, तो उसे अपनी मर्दानगी पर चोट महसूस हुई। उसे लगा जैसे वो कामिनी को झुका नहीं पा रहा।
"साली... मज़ा आ रहा है तुझे? रंडी...!" रमेश का गुस्सा और भड़क गया। उसने अपने भारी हाथ उठाए और " चटाक... चट... चटाक...' एक के बाद एक कई थप्पड़ कामिनी के उन उभरे हुए स्तनों पर जड़ दिए।
कामिनी का पूरा जिस्म उस तेज़ जलन और दर्द से थरथरा उठा।
"आआहहब..... आउच.... ऊफ्फफ्फ्फ़....!" उसकी सिसकियाँ तेज़ हो गईं, लेकिन जाँघों के बीच का उबलता लावा और भी तेज़ बहने लगा।
"साली बहुत गर्मी चढ़ी है ना तुझे " रमेश ने झटके से कामिनी की दोनों जाँघों को पकड़कर बाहर की तरफ फैला दिया। भीगा हुआ पेटीकोट सिमटकर उसकी कमर पर इकट्ठा हो गया। पिली रोशनी में कामिनी की चुत फूलकर कुप्पा हो चुकी थी, रमेश की नज़रों के सामने थी।
"इतनी गीली किसके लिए कर रखी है तूने... बोल!" रमेश से अब और सब्र नहीं हुआ। उसने अपनी दो उँगलियाँ पूरी ताकत से कामिनी की रसीली चुत की गहराई में दे मारीं।
"पच... पचक....
"आअह्ह्हम्म्म्म.... आउच....!" अति उत्तेजना मे कामिनी ने अपने होंठों को दाँतों तले दबा लिया।
रमेश एक हाथ से कामिनी के स्तनों को थप्पड़ मार रहा था, उन्हें मसल रहा था और दूसरे हाथ की उँगलियों से उसकी चुत को मसला रहा था, अंदर तक बेदर्दी से कुरेद रहा था। कामिनी का जिस्म उस वहशीपन और मीठे दर्द के संगम में ऐंठने लगा। उसे जो सुकून चाहिए था, वो मिल तो रहा था, लेकिन ज़ुल्म के रास्ते। उसने अपनी कमर को रमेश की उन उँगलियों के दबाव की तरफ और धकेल दिया।
रमेश आग बबूला हो गया। उसे लगा कि उसकी पत्नी उसे 'कंट्रोल' करने की कोशिश कर रही है।
"रुक... तेरी ये गर्मी आज लंड से ही मिटाता हूँ!" रमेश ने एक झटके में अपनी पैंट के बटन खोले और उसे नीचे गिरा दिया।
कामिनी की आँखों में एक उम्मीद जागी। उसे लगा कि शायद अब वो ज्वालामुखी शांत होगा जो उसे अंदर ही अंदर जला रहा है। लेकिन जैसे ही रमेश की पैंट घुटनों तक पहुँची, कामिनी का दिल धक से बैठ गया। उसकी सारी वासना एक पल में मर गई।
रमेश, जो खुद को मर्द समझ रहा था, उसकी जाँघों के बीच महज़ 2 इंच का एक मुरझाया हुआ, मांस का लोथड़ा बेजान पड़ा था। नशे और नामर्दानगी के मेल ने उसे पूरी तरह खोखला कर दिया था।
रमेश ने आव देखा ना ताव, और कामिनी की जाँघों के बीच आकर उस बेजान लंड को कामिनी की दहकती चुत पर रगड़ने लगा। वो नशे के सुरूर में खुद को बहुत बड़ा 'तिस मार खाँ' समझकर उछल रहा था, लेकिन हकीकत में वो सिर्फ उस बंद दरवाज़े पर अपना सिर पटक रहा था।
मुश्किल से दो मिनट भी नहीं बीते होंगे कि रमेश हाँफने लगा।
"आअह्ह्ह.... साली... रंडी... ले... ले मेरा बीज... आह्हब...!" रमेश के उस मुरझाए हुए लंड से महज़ दो चिपचिपी, पानी जैसी बूँदें निकलीं और कामिनी की उस गहरी घाटी के मुहाने पर ही कहीं खो गईं।
"हट रंडी...!" रमेश हड़बड़ाकर बिस्तर से उठा। उसने पास पड़ी खाली पानी की बोतल संभाली और लड़खड़ाते हुए, बिना पीछे मुड़े कमरे के बाहर निकल गया।
पीछे बिस्तर पर कामिनी वैसी ही नग्न हालत में, जाँघें फैलाए छत के शून्य को निहारती रह गई। कमरे के सन्नाटे में उसकी आँखों के किनारों से आँसुओं की दो मोटी धारें बह निकलीं और उसके कानों तक जा पहुँचीं।
ये आँसू अपमान के नहीं थे, क्योंकि उसे तो रमेश की इन गालियों और थप्पड़ों की आदत हो चुकी थी।
ये आँसू थे "अधूरी कामवासना "के, भयंकर बेबसी के और अपनी उस किस्मत के, जिसने उसे एक ऐसे प्यासे रेगिस्तान में ला खड़ा किया था जहाँ पानी की एक बूँद भी नसीब नहीं थी। उसका जिस्म अभी भी उसी आग में जल रहा था, और अब ये आग पहले से कहीं ज़्यादा खौफनाक और उग्र रूप ले चुकी थी।
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रात अब अपने पूरे शबाब पर थी। आसमान में लटका चाँद अपनी शीतल चाँदनी से पूरी पगडंडी को नहला रहा था। ठंडी हवा के झोंके खेतों में खड़ी फसलों से टकराकर एक धीमी 'सरसराहट' पैदा कर रहे थे। इसी खामोश रास्ते पर बंटी और फागुन, कमला काकी के घर से खाना खाकर हवेली की तरफ लौट रहे थे।
बंटी के हाथ में एक स्टील का टिफिन था, जिसमें प्रमिला ने बड़े जतन से कामिनी के लिए खाना पैक करके दिया था।
फागुन की चाल में आज वो सादगी नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी अकड़ थी। वो बंटी से दो कदम आगे-आगे तेज़ कदमों से चल रही थी।
"अरे फागुन... रुको तो सही! क्या हुआ, ये मुँह क्यों फुला रखा है?" बंटी ने साथ चलते हुए फागुन की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए पूछा।
"कहाँ फुला रखा है? मैं तो ठीक हूँ," फागुन ने बिना रुके जवाब दिया, लेकिन उसकी आँखों में चमकता गुस्सा और तिरछी नज़र कुछ और ही कहानी बयां कर रही थी।
"दिख रहा है सब... क्या हुआ? बोल ना?" बंटी ने फुर्ती से आगे बढ़कर फागुन की कलाई थाम ली।
फागुन झटके से रुकी। उसने अपनी गुस्से से लाल आँखें बंटी के चेहरे पर गड़ाईं और अपना हाथ छुड़ाते हुए बोली, "क्या बोलूँ... हाँ? क्या बोलूँ मैं? सब लड़के एक जैसे ही होते हैं। जहाँ कुछ दिखा, वहीं राल टपकाने लगते हैं!" इतना कहकर वो फिर से तेज़ कदमों से आगे बढ़ गई।
बंटी अब असमंजस में था। "अरे, पर मैंने किया क्या है?"
फागुन फिर रुकी, इस बार उसने अपनी कमर पर हाथ रखा और दूसरे हाथ की उंगलियों को हवा में नचाते हुए बोली, "ओह्ह्हो... बताओ! इन्हें तो पता ही नहीं है कि इन्होंने क्या कर दिया। बड़े शरीफ बने फिरते हैं!"
"हाँ, तो बताओगी तब ना मालूम पड़ेगा?" बंटी अभी भी नासमझी का नाटक कर रहा था।
"अच्छा! बड़े भोले बनते हो... क्या देख रहे थे आँखें फाड़-फाड़ कर प्रमिला के घर पे?" फागुन की त्योरियां और चढ़ गईं, "वाह भोलू लाल! प्रमिला के 'दूध' देख रहे थे ना, घूर-घूर कर?"
बोल तो वो गुस्से में गई थी, लेकिन जैसे ही शब्द हवा में गूंजे, फागुन को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने शर्म के मारे अपने दाँतों तले होंठ काट लिए। चाँदनी रोशनी में उसका चेहरा शर्म से और भी गहरा लाल हो गया।
बंटी ने अपनी गर्दन खुजाई और मुस्कुराते हुए सारा दोष प्रमिला पर मढ़ दिया, "अरे पागल... अब वो खुद ही सामने वैसे उकड़ूँ होकर बैठ गई, तो क्या मैं अपनी आँखें फोड़ लेता?"
"सब समझती हूँ मैं... तुम शहर वालों की नियत कैसी होती है," फागुन ने मुँह फेर लिया, लेकिन उसके गुस्से की धार अब थोड़ी कम होने लगी थी।
"अच्छा बाबा, गलती हो गई! अब से अगर ऐसा कुछ सामने आया, तो अपनी आँखें ही फोड़ लूँगा। अब तो खुश?" बंटी ने मज़ाक किया।
बंटी की 'आँखें फोड़ लेने' वाली बात पर फागुन के होंठों पर एक मंद सी मुस्कान तैर गई। वो फिर से आगे चलने लगी और बंटी उसके पीछे-पीछे। चाँदनी रात का जादू और ठंडी हवा का झोंका फागुन के मन की जलन को धीरे-धीरे ठंडा कर रहा था।
तभी बंटी ने माहौल का फायदा उठाकर अपने मन की वो बात बोल दी, जो उसे कब से अंदर ही अंदर कचोट रही थी।
"वैसे... तुम ही दिखा देती, तो किसी और की तरफ देखने की ज़रूरत ही क्या थी?"
बंटी के ये शब्द फागुन के कानों में किसी बम की तरह फटे। "कककक... क्या? क्या कहा तुमने?"
फागुन की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने हड़बड़ाहट में आस-पास देखा और ज़मीन से एक मिट्टी का बड़ा सा ढेला (पत्थर) उठा लिया। "रुक जाओ! आज तुम्हारा सिर ना फोड़ा तो मेरा नाम फागुन नहीं!"
बंटी ने खिलखिलाकर हँसते हुए हवेली की तरफ दौड़ लगा दी। भागते-भागते उसने पीछे मुड़कर ज़ोर से आवाज़ लगाई, "दिखाने का मन हो... तो कल आ जाना उसी स्विमिंग पूल में! हाहाहाहा!"
बंटी चाँदनी रात के धुंधलके में हवेली की पगडंडी पर ओझल हो गया। पीछे फागुन हाथ में ढेला लिए बीच रास्ते में सन्न खड़ी रह गई। उसके कान गर्म हो रहे थे और दिल की धड़कनें तेज़। लेकिन धीरे-धीरे, उस गुस्से की जगह उसके चेहरे पर एक बहुत ही प्यारी और शर्मीली मुस्कान फैल गई।
यह प्यार और आकर्षण की वो पहली अनुभूति थी, जो हर किसी को नसीब नहीं होती। उसे बंटी की वो 'बेशर्म' बात बुरी लगने के बजाय, अंदर ही अंदर गुदगुदा रही थी। फागुन ने हाथ से वो ढेला नीचे फेंक दिया और अपने दुपट्टे को ठीक करती हुई, मुस्कुराते हुए हवेली की तरफ बढ़ गई।
क्रमशः......

6 Comments
Uff kamini ek bar phir pyasi reh gayi uski aag ko bujhane ke bajay ramesh ne aur bhadka diya waise pehli bar ramesh ka mojudgi kuch kamini ke kaam aya jisse wo kidnap hote2 bach gayi warna uska aaj r@p tha koi na ab lagta hai tau kamini ki pyaas bujhayega
ReplyDeleteAapne fagun ke andar panap rahe pyar ko kya khubsurti se dhikya hai
ReplyDeleteYeh sirf wahi samaj sakta hai jisne saccha pyaar kiya ho
Jealousy pyar ka sabse pehla padaav hota hai
Kal swimming pool me ho jaye dono ka milan
Fagun pyar se saup degi apna jism bunty ko.
Kamini ko ab paraye mardo ke lund lene ki lat lag chuki hai
Wo ab kisi bhi mard ke chuvan bhar se tadap uthati hai
Aise hi uski vasna ki intensity bhadate raho
Taki hame kamini ka wo kamuk roop dekhne ko mile jo pati se bezzat hoke jine wali har aurat ke andar kahi chupa hota hai
Kamini ko apne apmaan ka badla lena hoga
Is baar jo bhi use noch dale chir faad dale wo hasi Khushi apna badan samarpit kar de
Ye sala bewda Ramesh hi kamini ke barbadi ka karan hai
ReplyDeleteRamesh ko jara bara andaza nahi kitne mardo ne uski biwi noch dala hai
Ye jitna kamini ko nicha dikhata hai,
Usko bezzat karta hai utni wo
apna ugra roop dikhati hai paraye mard ke saamne
Aise hi update dete raho👍
Ramesh bahut madrchod aadmi hai
ReplyDeleteJo mard kamini jaisi garam aurat ko nahi masal sakta
ReplyDelete2 min me dher ho jata hai
Par sapne ekdam kacchi kali fagun ko tod ke rakh dene ka dekta hai
Use se bada madarchod koi nahi ho sakta
Uff kya likha hai bhai
ReplyDeleteMaja aa gaya