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कामिनी 2.0, भाग -19

मेरी माँ कामिनी 2.0 - अध्याय-19


हवेली के अंदर कमरे में हवस का नंगा नाच चल रहा था, और बाहर आँगन में... सन्नाटे के बीच ताऊजी अपनी चारपाई पर लेटे बेचैनी से करवटें बदल रहे थे।
शाम को ऑटो में कामिनी के जिस्म की रगड़, उसके चौड़े कुल्हों का उछाल और उसके लाल ब्लाउज़ से बाहर झाँकते हुए गदराए, पसीने से भीगे स्तनों का नज़ारा... ताऊजी की आँखों के सामने बार-बार किसी फ़िल्म की तरह नाच रहा था। 
उम्र साठ पार थी, लेकिन उस भरे-पूरे हुस्न की याद ने ताऊजी की धोती के अंदर एक भारी तनाव पैदा कर दिया था। उनका मुरझाया हुआ लंड अब धोती के तंबू को खड़ा कर रहा था।

"ई बहू साली बहुत गरम है... इसका गोरा माँस तो दिमाग़ ख़राब किए दे रहा है। लौड़ा बैठ ही नहीं रहा है!" ताऊजी ने अपनी धोती के ऊपर से ही अपने कड़क होते लंड को सहलाते हुए मन ही मन सोचा। मौका हाथ ही नहीं लग रहा था, और ये अधूरी ठरक उन्हें तिलमिला रही थी।

"जाकर पिछवाड़े में मूत आता हूँ... शायद इस लौड़े को थोड़ा आराम मिले," यह सोचकर ताऊजी अपनी चारपाई से उठे और आँगन से नीचे उतर कर हवेली के पिछले हिस्से की तरफ़ चल दिए, जहाँ वो अक्सर रात के अँधेरे में पेशाब किया करते थे।
हवेली का पिछला हिस्सा बिल्कुल सुनसान और अँधेरा था। ताऊजी दीवार के पास पहुँचे। उन्होंने अपनी धोती को ऊपर उठाया और अपने कच्छे का नाड़ा खोला ही था कि... अचानक उनके कानों में किसी औरत के सिसकने, कराहने और चिल्लाने की भारी आवाज़ें पड़ने लगीं।
"आअह्ह्हम... उउउफ्फ्फ... चोद... रंडी...को "

ताऊजी के हाथ ठिठक गए। उन्होंने गर्दन घुमाकर देखा। थोड़ी ही दूरी पर रमेश के कमरे की पीछे वाली खिड़की हल्की सी खुली हुई थी और अंदर की पीली रोशनी छन कर बाहर अँधेरे में आ रही थी। आवाज़ें उसी खिड़की से आ रही थीं।
ताऊजी दबे पाँव, अपनी साँसों को रोककर किसी भूखे भेड़िए की तरह उस खिड़की के पास पहुँचे। उन्होंने झिर्री से अपनी एक आँख लगाई और अंदर झाँका।
और अंदर का जो नज़ारा उन्होंने देखा... उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उनके होश उड़ गए और साँस गले में ही अटक गई।

सामने पलंग पर रमेश नंगा पड़ा खर्राटे ले रहा था, और उसकी बीवी... हवेली की संस्कारी और शर्मीली बहू कामिनी, बिल्कुल नंगी हालत में पलंग के एक मोटे पाए पर अपनी चुत धँसाए पागलों की तरह उछल रही थी! वो चीख रही थी, गालियाँ दे रही थी, रमेश को 'नामर्द' और ख़ुद को 'रंडी' बोल रही थी।

ये नज़ारा इतना भयानक और इतना कामुक था कि ताऊजी का आधा खड़ा लंड एक झटके में लोहे की रॉड की तरह पूरा तन गया। वो अपनी धोती से बाहर आ गया। ताऊजी के खुरदरे, बूढ़े हाथ बेसाख़्ता अपने तने हुए लंड पर चले गए और उसे मुट्ठी में भींच कर सहलाने लगे।
"अअअअअ... बाप रे बाप!" ताऊजी के मुँह से हवस में डूबी फुसफुसाहट निकली। "बहू रानी तो पूरी तरह चुदने को तैयार बैठी है... एक रंडी की तरह सुलग रही है! और मैं चुतिया अब तक संकोच कर रहा था, बिना बात के डर रहा था!"
अंदर कामिनी का जिस्म पाए पर ऊपर-नीचे हो रहा था।
'फच... पच... धच्च...!'
उसके भारी, आज़ाद स्तन हवा में छलाँगें मार रहे थे, उसके चेहरे पर पसीने और हवस का पागलपन था, और चुत से कामरस की धार बहकर लकड़ी को भिगो रही थी... वो एक-एक बूँद ताऊजी की आँखों के रास्ते उनके दिमाग़ में छपती जा रही थी।
"हाय रे बहू... उस निर्जीव लकड़ी पर क्या उछल रही है? तेरी असली जगह तो ताऊजी के लौड़े पर है," ताऊजी ने बाहर अँधेरे में अपना लंड हिलाते हुए, दाँत पीस कर कहा।

उनका मन किया कि अभी दरवाज़ा तोड़ कर अंदर घुस जाएँ और सुलगती हुई कामिनी को वहीं बिस्तर पर पटक कर अपनी हवस का शिकार बना लें। लेकिन... ताऊजी एक पुराने और घाघ खिलाड़ी थे। उन्होंने अपना काँपता हुआ कदम पीछे खींच लिया।
"नहीं... अभी नहीं। ये वक़्त ठीक नहीं है। ये रंडी एक बार इस लंड कि दीवानी हो जाये तो ये सारा माल, जमीन सब मेरा हो सकता है, ताऊजी का दिमाग़ आगे कि कहानी बुनने लगा.
इसे तो अब अपने इशारों पर नचा कर चोदूँगा," ताऊजी ने अपनी इस भयानक कामुकता को दिमाग़ से काबू करते हुए सोचा।

अंदर कामिनी एक ख़ौफ़नाक झटके के साथ झड़ चुकी थी। वो रमेश के मरे हुए लंड पर अपना पानी गिराती हुई, निढाल होकर गद्दे पर गिर पड़ी थी।
ताऊजी खिड़की से पीछे हटे। उनका लंड अभी भी किसी फौलाद की तरह तना हुआ था। उसी कड़क और तने हुए लंड से ताऊजी ने हवेली की दीवार पर मूतना शुरू कर दिया।
पेशाब की धार दीवार से टकरा रही थी, लेकिन ताऊजी का 'वीर्य' (Semen) नहीं निकल रहा था। वो चाहे जितना लंड हिला लें, चाहे जितनी उत्तेजना आ जाए, उनका लंड खड़ा तो होता था, लेकिन उनके अंदर से 'पानी' नहीं छूटता था। और यही उनकी वो गुप्त, 'बीमारी' थी, जिसका ज़िक्र उन्होंने ऑटो में किया था। एक ऐसा मर्द, जिसका लंड पत्थर तो बन जाता है, लेकिन वो कभी झड़ नहीं सकता... घंटों तक बिना रुके सिर्फ चोद सकता है!
ताऊजी ने अपनी धोती बांधी। उनकी आँखों में अब एक वहशी, शैतानी और दरिंदगी से भरी मुस्कुराहट तैर रही थी।
"बहू रानी आज ऑटो में पूछ रही थी ना... कि क्या बीमारी है मुझे?" ताऊजी ने अँधेरे में उस खिड़की की तरफ़ देखते हुए ख़ुद से कहा।
"जल्द ही बताऊंगा इस रंडी को... कि मेरी बीमारी क्या है!"  ताऊजी की  काली परछाईं हवेली के सुनसान अँधेरे में विलीन हो गई। 
*******************

रात गहरा रही थी। गाँव की पगडंडियों पर सन्नाटा पसर चुका था और आसमान में खिला हुआ आधा चाँद अपनी ठंडी रोशनी बिखेर रहा था। बंटी और फागुन, कमला काकी के घर से खाना खाकर हवेली की तरफ़ लौट रहे थे।
हवा में एक अजीब सी खामोशी थी, जिसे फागुन ने तोड़ा।
"क्या बात है बंटी? कल से देख रही हूँ, तुमने ढंग से बात भी नहीं की मुझसे?" फागुन ने चलते-चलते अचानक बंटी का हाथ पकड़ लिया और उसे रोक दिया।

"कक्क... कोई बात नहीं फागुन, बस ये मृत्युभोज और टेंट-तंबू के काम-धाम में बिज़ी था," बंटी ने नज़रें चुराते हुए बात टालनी चाही। 

"मुझसे मत छुपाओ। कोई बात है तो बताओ मुझे," फागुन और क़रीब आ गई। उसकी साँसें बंटी के सीने से टकराने लगीं।
गाँव की सुनसान, चाँदनी रात में फागुन का खिला हुआ यौवन बंटी के एकदम सामने था। बंटी का दिमाग़ एक पल के लिए भटका। उसने मौक़ा देखा और अपने दोनों हाथ बढ़ाकर, एक ही झटके में फागुन के कुर्ती में कसे हुए स्तनों को कस के भींच दिया!

"आआआहहह.... उईई...!"  फागुन के मुँह से एक मीठी सी सिसकी निकल गई, "ये क्या कर रहे हो?"
"क्यों? अभी तो बोल रही थी कि उदास घूम रहा हूँ... अब क्या हुआ जब ख़ुशी मना रहा हूँ?" बंटी ने शरारत और हवस भरे लहज़े में कहा।

"हट बदमाश... मेरा वो मतलब नहीं था!" फागुन ने शर्माते हुए बंटी की छाती पर हल्का सा मुक्का मारा।
"तो क्या मतलब था...?" बंटी ने उसे अपनी बाहों में जकड़ लिया।
"कुछ नहीं..." कहते हुए फागुन ने अपने होंठ बंद कर लिए और ख़ुद को बंटी के गले से लगा लिया।
दोनों के कच्चे, जवाँ जिस्म एक-दूसरे से पूरी तरह चिपक गए। फागुन के स्तनों की नरमी बंटी के सीने में धँस रही थी। एक पल के लिए बंटी हवेली, कामिनी.. सब कुछ भूल गया। इस चाँदनी रात में सिर्फ़ उन दोनों की साँसों की गर्मी थी।

तभी फागुन की आवाज़ में एक उदासी छा गई।
"कल मृत्युभोज है बंटी... परसों तुम और कामिनी माँ वापस शहर चले जाओगे? फिर मेरा क्या होगा?" फागुन की आँखें भर आईं। उसे बंटी से एक गहरा लगाव हो चुका था।

"मैं कहीं नहीं जा रहा फागुन। अपनी ज़मीन-जायदाद छोड़ कर कहाँ जाऊँगा?" बंटी ने एक गहरी साँस ली।

"मतलब...? समझी नहीं," फागुन झटके से अलग हुई और बंटी की आँखों में देखने लगी।

"अरे बुद्धू! तुम ही तो हो ना मेरी सब कुछ... तुम्हें छोड़ के कहाँ जाऊँगा?" बंटी ने मुस्कुराते हुए अपनी भावनाओं और हक़ीक़त काबू में रखा। फागुन उस जवाब से संतुष्ट होकर फिर से मुस्कुरा दी।

लेकिन बंटी के दिमाग़ में कुछ और ही चल रहा था। उसने फागुन के कंधे पर हाथ रखा और गंभीर होते हुए पूछा
"अच्छा फागुन, एक बात पूछूँ? मैंने सुना है तुम्हारी सुगंधा ताईजी, एकदम हट्टी-कट्टी और जवान थीं। इस उम्र में भी उन्हें ना कोई बीमारी थी, ना कोई चिंता। फिर अचानक उस रात ऐसा क्या हुआ था?"

फागुन का चेहरा ताईजी की याद में उतर गया।
"ये बात तो मुझे ख़ुद भी समझ नहीं आती बंटी। उस रात हमने साथ में खाना खाया था। फ़ौजा काका शाम को ही ताईजी से हवेली में मिलने आए थे... कुछ ज़रूरी बात कर रहे थे। फिर ताईजी रात में अपने कमरे में सोने गईं... और सुबह उठी ही नहीं।"

फागुन ने जो बात इतने सीधेपन से बताई, उसने बंटी का दिमाग़ पूरी तरह चकरा कर रख दिया!

"कुछ बहुत बड़ी गड़बड़ है फागुन..." बंटी के मुँह से बेसाख़्ता निकल गया। उसकी पारखी नज़र इस 'संयोग' के पीछे छिपे मर्डर के खेल को भाँप रही थी।

"क्या गड़बड़ होगी? एक ना एक दिन तो लोगों को जाना ही होता है," फागुन जीवन की इस गूढ़ बात को कितनी आसानी से मान बैठी थी।
बंटी ने पगडंडी पर आगे कदम बढ़ाया और एक ठंडी आवाज़ में बोला, "जाना तो सबको होता है फागुन... लेकिन कोई 'कैसे' जाता है, वो बहुत मायने रखता है।"

"तुम भी ना, कुछ ज़्यादा ही सोचते हो," फागुन ने बात ख़त्म करनी चाही।
"सोचना पड़ता है... यहाँ हवेली में सब कुछ ठीक नहीं है," बंटी बुदबुदाया।

"छोड़ो, तुम भी क्या पुरानी बातें लेकर बैठ जाते हो। जल्दी हवेली चलो, कल सुबह से ही बहुत काम है... साँस लेने की फ़ुर्सत भी नहीं मिलेगी!" फागुन ने बंटी का हाथ पकड़ा और तेज़ क़दमों से आगे बढ़ गई।

बंटी और फागुन खामोशी से हवेली की तरफ़ चलने लगे। उस चाँदनी रात में उनकी परछाइयाँ लंबी होकर बहुत दूर तक जा रही थीं... 
********************

रात का हवस से भरा तूफ़ान गुज़र चुका था। खिड़की से छनकर आती सुबह के सूरज की पहली मद्धम किरण ने बंद कमरे के सन्नाटे पर दस्तक दी।
कामिनी की आँखें खुलीं। पलकें झपकते ही उसे अपने संपूर्ण नग्न और बिखरे हुए जिस्म का अहसास हुआ। वो गद्दे पर औंधे मुँह पड़ी थी। रात के जाहिलपन, वहशीपन और अंधी हवस की यादें दिमाग़ में किसी फ़िल्म की तरह घूमने लगीं।

 कामिनी ने कल रात जो हरकत की थी, जो गालियाँ बकी थीं और जिस तरह से एक बेजान लकड़ी के पाए पर ख़ुद को बेरहमी से चोदा था... वो किसी भी लिहाज़ से एक 'सभ्य' या 'संस्कारी' औरत की पहचान नहीं कहलाई जा सकती थी।
उसे ख़ुद के 'रंडी' वाले रूप पर एक पल के लिए शर्म आई, लेकिन जिस्म में अभी भी वो मादक टीस बाकी थी।
कामिनी ने भारी साँस ली और पलंग से उठ खड़ी हुई। लेकिन... जैसे ही उसने अपने पैर ज़मीन पर रखे, उसकी जाँघों के बीच से एक तेज़, मीठी सी जलन और दर्द की लहर सीधे उसके दिमाग़ तक दौड़ गई।
"उउउईईई... स्स्स्स..."

कामिनी के होंठों से एक सिसकी निकल गई। कल रात लकड़ी के सख़्त और खुरदरे पाए की बेतहाशा रगड़ अपना असर दिखा रही थी। उसकी चुत की नाज़ुक दीवारें छिल सी गई थीं और भारी घर्षण ने वहाँ एक अजीब सी जलन पैदा कर दी थी। ये जलन उसे हर कदम पर याद दिला रही थी कि वो अब अंदर से कितनी 'ढीठ' हो चुकी है।

कामिनी ने किसी तरह ख़ुद को सँभाला। उसने ज़मीन पर बिखरे हुए अपने कपड़े उठाए। काँपते हाथों से उसने अपना पेटीकोट बाँधा, वो बिना बटन वाला फटा हुआ लाल ब्लाउज़ पहना और उसके ऊपर अपनी साड़ी को बेतरतीबी से लपेट लिया।
कमरे से बाहर निकलने से ठीक पहले, कामिनी की नज़र पलंग पर पसरे रमेश के नंगे जिस्म पर पड़ी। वो अभी भी मुँह बाए, किसी सुअर की तरह खर्राटे ले रहा था।

 कामिनी की आँखों में अपने पति के लिए अब सिर्फ़ एक गहरी हीन भावना और नफ़रत तैर रही थी। उस नामर्द को देखकर उसे घिन आ रही थी। उसने एक हिकारत भरी नज़र उस पर डाली और बिना कुछ कहे, दबे पाँव कमरे से बाहर निकल गई।

आँगन पार करके कामिनी ने सीधा गुसलखाने (बाथरूम) में जाकर पनाह ली।
उसने अंदर से कुंडी लगाई और ठंडे पानी के मग्गे अपने तपते हुए जिस्म पर उँडेलने लगी। पानी की हर बूँद के साथ रात का पसीना और कामरस धुल रहा था,  कामिनी ने अपने सूजे हुए, लाल पड़े स्तनों को और अपनी छिली हुई चुत को सहलाते हुए देर तक नहाया।

नहाने के बाद कामिनी वापस अपने कमरे में आई। आज हवेली में मृत्युभोज का बड़ा दिन था। बाहर से लोगों और हलवाइयों के काम करने की आवाज़ें आने लगी थीं।
कामिनी ने अलमारी से एक बिल्कुल साधारण सी, हल्के क्रीम रंग की सूती साड़ी निकाली। आज के दिन के हिसाब से यही लिबास सबसे सही था। उसने अंदर एक सादा सा सफ़ेद ब्लाउज़ पहना और उसके ऊपर उस सूती साड़ी को सलीके से लपेट लिया।

आईने के सामने खड़ी कामिनी ख़ुद को देख रही थी।
माँग में सिंदूर, माथे पर एक छोटी सी बिंदी, और चेहरे पर एक शांत, संस्कारी बहू वाला भाव। बाहर से देखने में वो एक बेहद शरीफ़, घरेलू और दुखी औरत लग रही थी, जिस पर किसी की भी बुरी नज़र ना पड़े।

लेकिन आईने के उस पार का सच सिर्फ़ कामिनी जानती थी। उस सादी सी क्रीम साड़ी के पल्लू के नीचे उसके भारी, गदराए स्तन आज भी अंदर से सुलग रहे थे। चलने पर साड़ी के अंदर से जब उसकी चौड़ी जाँघें आपस में टकरातीं, तो चुत की जलन उसे फिर से कल रात के रंडीपने की याद दिला देती।

तैयार होकर, कामिनी ने एक लंबी साँस ली और कमरे का दरवाज़ा खोलकर... हवेली के आँगन की तरफ़ बढ़ गई.
कमला, प्रमिला, और गांव कि कुछ औरते आती दिखाई दे रही थी.
"नमस्ते बहु रानी " 
"नमस्ते काकी " जवाब मे कामिनी ने भी नमस्ते किया.
"अच्छा सुनो पहले आटा छान लेते है... फिर... ब्ला... ब्ला... ब्ला... कमला काकी सभी को काम समझाती चली गई, 
गांव मे मैन हलवाई एक होता है जो सिर्फ इतना भर देखता है क्या बन रहा है? कौन बना रहेगा है? कैसे बनाना है?
बाकि काम सब गांव कि औरते मिल कर ही कर देती है.
यही खूबसूरती होती है गांव कि, यहाँ सब अपने होते है, एक घर मतलब सब का घर.
कामिनी भी इस अपनेपन से गद गद थी.


सुबह का सूरज पूरी तरह निकल चुका था और उसकी धूप के साथ ही हवेली में हलचल भी तेज़ हो गई थी। घर के सभी लोग जल्दी-जल्दी नाश्ता-पानी करके अपने-अपने कामों में जुट गए थे। हलवाइ ने कड़ाहियाँ चढ़ा दी थीं और मृत्युभोज की तैयारियाँ ज़ोरों पर थीं।
इन्हीं तैयारियों के बीच, भारी काम निपटाने के लिए ताऊजी और रमेश कुछ मज़दूर लेने गाँव के बाहर वाले मुख्य चौराहे पर गए हुए थे।

सुबह-सुबह चौराहे पर मज़दूरों की अच्छी-ख़ासी भीड़ होती है। रमेश और ताऊजी को देखते ही काम की तलाश में खड़े मज़दूरों ने उन्हें चारों तरफ़ से घेर लिया।

"हाँ भाई... ध्यान से सुन लो! दिन भर का काम है। शाम का खाना भी वहीं मिलेगा। मृत्युभोज का टेंट लगाना है, कुर्सी-टेबल उठाना है और कुछ इक्का-दुक्का भारी काम रहेंगे," रमेश ने सीना चौड़ा करते हुए एक मालिक के लहज़े में घोषणा की।
"5-6 हट्टे-कट्टे आदमी चाहिए बस," ताऊजी ने भीड़ को देखते हुए अपनी खुरदरी आवाज़ में जोड़ा।

"हाँ... साब कर लेंगे। किशनगंज में ही काम है ना अपनी हवेली पे?" आगे खड़े एक मज़दूर ने बीड़ी सुलगाते हुए पूछा।
"हाँ, वही किशनगंज वाली हवेली है," रमेश ने सिर हिलाते हुए जवाब दिया।
भीड़ से कुछ ही दूरी पर चाय की टपरी के पास एक बेहद ऊँचा-पूरा और भारी-भरकम शख़्स खड़ा था। जैसे ही उसके कानों में  'किशनगंज'  और 'हवेली'  का नाम पड़ा... उसके कान किसी शिकारी कुत्ते की तरह खड़े हो गए। वो अपने होंठों के बीच दबी बीड़ी को खींचता हुआ, लंबे और भारी क़दमों से तेज़ी से चलता हुआ उस भीड़ में आकर खड़ा हो गया।

"ठीक है, 400 रुपए दिहाड़ी मिलेगी एक आदमी को," रमेश ने पैसों का पत्ता खोला।
"क्या साब? मज़दूरी का रेट आजकल कम से कम 600 रुपए चल रहा है! दिन भर का कमर-तोड़ काम है, 400 में कौन करेगा?" एक-दो मज़दूरों ने भाव बढ़ाने के लिए नाटक करना शुरू कर दिया।
"साब... मैं कर लूँगा।"
अचानक पीछे से एक बेहद भारी, खौफ़नाक और गूँजती हुई आवाज़ आई। ये आवाज़ किसी इंसान की कम और किसी खँडहर से आती गूँज ज़्यादा लग रही थी।
सब लोग झटके से उस आवाज़ की तरफ़ पलटे।
उस भारी आवाज़ का मालिक भी किसी भयानक दानव जैसा ही था। साढ़े छह फ़ीट का हट्टा-कट्टा शरीर, चौड़ा सीना, आँखों में एक अजीब सी ख़ून की प्यास, और बदन पर एक काला कुरता-पाजामा। उसके सिर पर एक गोल जालीदार टोपी थी और होंठों पर अभी भी बीड़ी सुलग रही थी। उसे देखकर ही ऐसा लग रहा था जैसे वो कोई मज़दूर नहीं, बल्कि किसी अखाड़े का खूँखार पहलवान हो।

"ऐ... कौन है बे तू? आज से पहले तुझे यहाँ चौराहे पर कभी नहीं देखा," दो-तीन स्थानीय मज़दूर अपनी दिहाड़ी कटती देख उस पर चढ़ने के इरादे से आगे बढ़े।
"साला... हमारी रेट क्यों ख़राब कर रहा है बीच में आकर?" एक मज़दूर ने ग़ुस्से में तमतमाते हुए कहा।

"आज ही आया हूँ इधर... काम की तलाश में," उस खौफ़नाक शख़्स ने बिना कोई भाव बदले, एकदम ठंडी और शांत आवाज़ में कहा। उसकी आँखों में रत्ती भर भी ख़ौफ़ नहीं था।

"तो कहीं और जा के काम ढूँढ... ये हमारा इलाका है!" एक मज़दूर ने दादागिरी दिखाते हुए उस शख़्स के चौड़े सीने पर हाथ रखकर उसे पीछे धक्का देना चाहा।
लेकिन... हैरानी की बात!

उस मज़दूर ने अपनी पूरी ताक़त लगा दी, पर वो दानव अपनी जगह से एक इंच भी नहीं सरका। उल्टे, धक्का देने वाला मज़दूर ही किसी लोहे की दीवार से टकराने की तरह झटके से पीछे की तरफ़ हट गया। उसकी कलाई में दर्द की एक लहर दौड़ गई।

"ऐ... ऐ... लड़ना बंद करो यहाँ पर!" रमेश ने बीच-बचाव करते हुए चिल्लाया।
रमेश की नज़र उस नए शख़्स के चौड़े और फौलादी शरीर पर गई। रमेश लालची तो था ही, उसका लालची दिमाग़ तुरंत चहक उठा। उसने मन ही मन सोचा "साला हट्टा-कट्टा बैल जैसा आदमी है। चार मज़दूरों का काम अकेला कर देगा और पैसे भी सिर्फ़ 400 ले रहा है। इसे तो छोड़ना बेवकूफ़ी होगी।"

"आ जाओ भाई... तुम आ जाओ हमारे साथ!" रमेश ने उस शख़्स को इशारा किया, और फिर बाकी मज़दूरों को घुड़कते हुए बोला, "2-4 आदमी और चाहिए... इसी रेट पर आना है तो बोलो, वरना मैं इसे लेकर जा रहा हूँ।"
मरता क्या ना करता, 400 के रेट पर गाँव के 3-4 मज़दूर और राज़ी हो गए।

सब लोग ऑटो की तरफ़ बढ़ने लगे, तभी पीछे से ताऊजी ने अपनी सिकुड़ी हुई, शातिर आँखों से उस ऊँचे-पूरे आदमी को घूरते हुए पूछा,
"हाँ भाई पहलवान... क्या नाम है तुम्हारा?"

उस शख़्स ने चलते-चलते अपने होंठों से बीड़ी निकाली, अपनी खौफ़नाक लाल आँखों से सीधा ताऊजी को घूरा, और उसकी हलक से एक बेहद भारी आवाज़ निकली...
"सुलेमान।"

ताऊजी और रमेश को ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि वो चंद रुपयों के लालच में 'किशनगंज की हवेली' में किस मौत के साए को आज़ाद दावत दे रहे हैं। बड़ा भाई का खूँखार दरिंदा, जो कादर खान की मौत बनकर शहर से निकला था... अब सीधा उनके साथ उनके घर जा रहा था।

सुलेमान और बाकी 2-4 मज़दूर लोडिंग वाले बड़े ऑटो में पीछे बैठ गए। ताऊजी और रमेश आगे बैठ गए।
'भुर्रर्रर्र... धड़... धड़... धड़....'

ऑटो चालू हुआ और अपनी पूरी रफ़्तार से सुनसान पगडंडी को चीरता हुआ, हवेली की तरफ़ चल पड़ा,

सुलेमान और बाकी मज़दूर ऑटो से उतरकर हवेली पहुँच चुके थे। हवेली के बाहर वाले हिस्से में ताऊजी अपने चिर-परिचित मालिक वाले रुतबे में सबको काम समझा रहे थे।

"यहाँ टेंट के खम्बे गाड़ दो पहले... और यहाँ से वहाँ तक शामियाना तनेगा... फिर वो वाला हिस्सा खाली छोड़ना... ब्ला... ब्ला... ब्ला..." ताऊजी लगातार बके जा रहे थे।
लेकिन सुलेमान का ध्यान ताऊजी की उस बकवास पर कतई नहीं था। उसकी बाज़ जैसी लाल और शातिर आँखें आस-पास का जायज़ा ले रही थीं। तभी उसकी नज़र सीधे हवेली के आँगन में गई। वहाँ गाँव की कुछ औरतें गोल घेरा बनाकर बैठी सब्ज़ियाँ काट रही थीं।

उन तमाम गँवार और सांवली औरतों के बीच, एक औरत बिल्कुल अलग ही चमक रही थी। उसका गोरा, गदराया हुआ जिस्म सुबह की हल्की पीली धूप में किसी संगमरमर की मूरत की तरह खिल रहा था। क्रीम रंग की सादी सूती साड़ी में कसी हुई उसकी देह अपनी अलग ही मादक कहानी बयाँ कर रही थी।

"क्या यही है वो... जिसके बारे में लक्की और बिट्टू ने बताया था?"  सुलेमान ने अपनी आँखें सिकोड़ते हुए मन ही मन सोचा।
"ऐ... ऐ पहलवान! कहाँ ध्यान है तुम्हारा? समझ गए ना क्या कहा मैंने?" ताऊजी की खुरदरी, कड़क आवाज़ ने सुलेमान को ख्यालों से बाहर खींचा।

"हाँ... हाँ... साब, समझ गया," सुलेमान ने अपने चेहरे पर कोई भाव लाए बिना, बस हाँ में गर्दन हिलाई।
लेकिन उसका दिमाग़ और नज़रें अभी भी आँगन में बैठी उसी औरत पर अटकी थीं। "पक्का वही होगी... साली पूरे आँगन में सिर्फ़ वही एक सलीके की औरत दिख रही है।"

"ये लो कुदाल और फावड़ा!" ताऊजी ने झनझनाते हुए लोहे के भारी औज़ार सुलेमान और बाकी मज़दूरों के सामने ज़मीन पर पटक दिए। फिर वो दो मज़दूरों को अपने साथ लेकर अंदर का कुछ और काम सँभालने के लिए चल दिए।

आँगन के नीचे, टेंट वाली साइड पर अब सिर्फ़ तीन लोग बचे थे— सुलेमान और दो अन्य लौंडे। वो दोनों मज़दूर कोई 19-20 साल के ही थे, लेकिन गाँव की आबोहवा और मज़दूरी के कारण काफ़ी हट्टे-कट्टे लग रहे थे।
"ऐ... क्या नाम है तुम्हारा?" सुलेमान ने औज़ार उठाते हुए उनसे ऐसे रौब में पूछा जैसे वो कोई दिहाड़ी मज़दूर नहीं, बल्कि उनका का बॉस हो।

"बबबब.... वो... वो... मेरा काला... और इसका कांडी!" दोनों लड़कों ने सुलेमान के दानवाकार शरीर को देखकर घबराते हुए एक साथ जवाब दिया।

"ये क्या अतरंगी नाम हुआ?" सुलेमान के खुरदरे होंठों पर एक अजीब सी हँसी तैर गई।
"भाई... वो मैं पैदा ही कोयले जैसा काला हुआ था, तो लोगों ने नाम ही 'काला' रख दिया," काले ने झेंपते हुए कहा।

"और मैं जहाँ भी जाता हूँ, वहाँ कोई ना कोई लफड़ा या कांड हो ही जाता है... इसलिए मेरा नाम ही 'कांडी' पड़ गया," दूसरे ने अपनी छाती ठोकते हुए कहा।

"गाँव के लोग भी ना... गज़ब नाम रख देते हैं," सुलेमान के मुँह से अचानक एक साफ़ और शहरी लहज़े में निकल गया।
"क्यों भाई? तुम गाँव के नहीं हो क्या?" काला को तुरंत शक हुआ।
"हाँ, तुम हमारे जैसी देहाती बोली भी नहीं बोल रहे हो," कांडी ने भी अपनी आँखें छोटी करते हुए अपना शक ज़ाहिर किया।

सुलेमान को तुरंत अहसास हुआ कि वो अभी शहर का खूँखार डॉन नहीं, बल्कि 400 रुपए का एक मज़दूर है। उसे अपनी पहचान छुपानी थी।

"अरे... हूँ तो यहीं पास के गाँव का ही। वो क्या है ना, सालों से दिल्ली में रहकर मज़दूरी कर रहा था, तो वहाँ की हवा लग गई और ज़बान थोड़ी साफ़ हो गई," सुलेमान ने बड़ी ही चालाकी से बात सँभाल ली। "चलो, बातें छोड़ो। तुम दोनों जाकर टेंट की बल्ली उठा लाओ, तब तक मैं यहाँ खड्डा करता हूँ।"

जैसे ही वो दोनों मुड़े, सुलेमान ने भारी कुदाल उठाई और ज़मीन पर ताबड़तोड़ वार करने शुरू कर दिए।
"धच्च... धच... हंफ़... हमफ़्फ़्फ़... हमफ़्फ़्फ़... धच्च...!'
सुलेमान की फौलादी बाँहों में इतनी ताक़त थी कि सूखी और सख़्त ज़मीन भी मक्खन की तरह कट रही थी। वो कुदाल को किसी खिलौने की तरह चला रहा था।
काला और कांडी भारी बल्ली लेकर मुश्किल से एक मिनट बाद ही मुड़कर वापस आए थे। पर जैसे ही उन्होंने ज़मीन की तरफ़ देखा... उनके होश उड़ गए। खड्डा पूरी तरह से तैयार था!
"भेनचोद... इतनी जल्दी खड्डा खोद भी दिया?" काला अपना मुँह फाड़े, सुलेमान को किसी अजूबे की तरह देख रहा था।
"वो भी इतना गहरा? मान गए भाई तुम्हें, तुम्हारे हाथों में तो मशीन लगी है," कांडी ने अचरज से वो लकड़ी की बल्ली उस गड्ढे में डाल दी और काला उसे मिट्टी से दबाने लगा।

"मुझे अपना काम... बहुत जल्दी ख़त्म करने की आदत है," सुलेमान ने कुदाल नीचे रखते हुए, एक गहरी साँस छोड़कर कहा।
लेकिन सुलेमान की नज़रें उस खड्डे पर नहीं थीं। उसकी लाल आँखें सीधा हवेली के आँगन पर टिकी थीं। कामिनी सब्ज़ियाँ काटकर उठ चुकी थी और अंदर की तरफ़ जा रही थी। कसी हुई साड़ी में कामिनी की चाल किसी नागिन जैसी थी। चलते वक़्त उसकी भारी, चौड़ी गांड साड़ी के अंदर बुरी तरह मटक रही थी और उसकी कमर में एक गज़ब की मादक लचक थी।

 मदमस्त चाल को देखकर सुलेमान ने अपनी आँखें सिकोड़ीं और मन ही मन बुदबुदाया
"वही है... पक्का वही है!"
******************

हवेली के आँगन में औरतों के बीच बैठकर सब्ज़ियाँ काटते-काटते कामिनी का बुरा हाल हो रहा था। उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसकी चुत के अंदर कोई चींटी लगातार काट रही हो। कल रात लकड़ी के सख़्त पाए पर अपनी हवस मे चूर हो कर कामिनी ने जो हरकत कि थी, उसका नतीजा अब सामने आ रहा था।

उसकी चुत की भीतरी दीवारें और बाहरी होंठ (Labia) छिल कर सूज गए थे। ऊपर से गाँव की ये उमस भरी गर्मी! कामिनी की सूती पैंटी पसीने से पूरी तरह भीग चुकी थी और उसकी सूजी हुई चुत की फाँकों के बीच बुरी तरह चिपक गई थी। हर एक हरकत के साथ वो गीला कपड़ा उसके छिले हुए माँस पर रगड़ खा रहा था।
कामिनी को इतना असहज महसूस हो रहा था कि वो रह-रह कर कभी इस करवट बैठती, तो कभी दूसरी करवट।

"मैं... मैं आती हूँ अभी," कामिनी ने आख़िरकार बर्दाश्त की हद पार होने पर चाकू और कद्दू वहीं छोड़ा और आँगन से उठकर तेज़ी से हवेली के अंदर अपने कमरे की तरफ़ बढ़ गई।
कमरे के अंदर आते ही उसने झट से कुंडी लगाई। बिना एक पल गँवाए उसने अपनी साड़ी को ऊपर उठाया और अपनी पसीने से लथपथ, चिपचिपी पैंटी को जाँघों से नीचे खींच कर ऐसे उतार फेंका जैसे वो कोई कपड़ा नहीं... बल्कि कोई ख़ून पीने वाली 'जोंक' (Leech) हो!
"उउउउफ्फ्फ्फ़..... हम्मम्म्फ़फ़फ़फ़......"

पैंटी के उतरते ही कामिनी के मुँह से एक गहरी, काँपती हुई साँस निकली। पैंटी का कसाव हटते ही उसके कलेजे में एक अजीब सी ठंडक आ गई। उसने अपनी भारी जाँघों को थोड़ा और चौड़ा कर लिया ताकि उस सूजी हुई, छटपटाती जगह पर थोड़ी खुली हवा लग सके।
लेकिन पैंटी उतारने के बाद भी... वो चुभन पूरी तरह नहीं गई थी। जाँघों के बीच अभी भी ऐसा लग रहा था जैसे चींटियाँ काट रही हों। सूजन और जलन अपनी जगह पर कायम थी।

तभी... अचानक से कामिनी के ज़हन में बूढ़े हकीम लकड़द्दीन के वो खुरदरे शब्द किसी गूँज की तरह टकराए
"ये दवा हर तरह के दर्द, जकड़न और औरतों की अंदरूनी तकलीफ को दूर करती है... !"
कामिनी को तुरंत याद आया कि वो हकीम के दवाखाने से 'पीली दवा' की शीशी लेकर आई थी।

बिना कुछ और सोचे, उसने झट से कमरे की अलमारी खोली और कपड़ों के नीचे छुपाकर रखी हुई 'पीली दवा' से भरी शीशी निकाल ली। शीशी के अंदर का पीला, गाढ़ा अर्क कमरे की रोशनी में चमक रहा था।
उस शीशी को देखते ही कामिनी के कानों में हकीम के शब्द फिर गूँजे "ख़ास औरतों के लिए ही बनी है ये दवाई... शरीर में ऐसी ठंडक और ताक़त देगी कि सारा दर्द भूल जाओगी।"

"आज मृत्युभोज का दिन है, दिन भर काम ही काम रहेगा... दर्द और सूजन बढ़ सकती है," कामिनी ने ख़ुद को समझाते हुए पास रखी पानी की ग्लास उठाई और उसमें उस दवा की ठीक 5 बूँदें टपका दीं।
शीशी बंद करने ही वाली थी कि उसका दिमाग़ फिर चला।
"आज दिन भर बहुत मेहनत का काम है, कहीं 5 बूँदों से दर्द ना मिटा तो?"
इसी मासूम सी लगने वाली चिंता में कामिनी ने एक बहुत बड़ी और ख़ौफ़नाक भूल कर दी। उसने शीशी को वापस ग्लास के ऊपर किया और 5 बूँदें और डाल दीं!
मतलब सीधा... डबल डोज़!(Double Dose)
हकीम की वो दवा जो एक सामान्य औरत के जिस्म में हवस की आग लगा देने के लिए काफ़ी थी, आज कामिनी ने दर्द मिटाने के लालच में उसका दोगुना डोज़ बना लिया था।
उसने ग्लास होंठों से लगाया...
गट... गट... गटॉक...'

और एक ही साँस में वो पूरा पीला पानी पी गई।
दवा हलक से नीचे उतरते ही एक बहुत ही ठंडी और सुहानी सी लहर उसके गले से होती हुई सीधे पेट में उतर गई। ऐसा लगा जैसे जलते हुए जिस्म पर किसी ने बर्फ़ रख दी हो। पूरा जिस्म अचानक से ठंडा और हल्का हो गया। चुत की वो जलन और चींटियों के काटने का वो अहसास पल भर में गायब हो गया।
सुकून की इस पहली लहर को कामिनी ने बहुत गहराई से महसूस किया। उसे लगा कि हकीम ने सचमुच कोई चमत्कारी 'दर्द निवारक' (Painkiller) दिया है।

उसने तुरंत दवा की शीशी वापस अलमारी में छुपाकर रखी और बिना पैंटी के, उसी सादी क्रीम साड़ी में तेज़ कदमों से कमरे से बाहर आँगन की तरफ़ आ गई।
वो जानती थी कि गाँव की ये औरतें ताने मारने में माहिर होती हैं। वो बिल्कुल नहीं चाहती थी कि कोई उसे 'कामचोर' या 'शहर की नाज़ुक मेमसाब' समझे, इसलिए वो जितना हो सके हवेली के काम में अपना हाथ बँटाना चाहती थी।

कामिनी वापस आकर औरतों के बीच सब्ज़ियाँ काटने बैठ गई। उसके चेहरे पर अब एक ताज़गी और सुकून था।
लेकिन बेचारी कामिनी को इस बात का रत्ती भर भी अंदाज़ा नहीं था कि वो 'ठंडक'... तूफ़ान से पहले की शांति थी। ये ठंडक कब उसके जिस्म मे पिघले हुए लावे कि तरह बहने लगेगी उसे जरा भी इल्म नहीं था.
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टेंट के लिए सारे भारी खम्बे गाड़े जा चुके थे। अब सिर्फ़ ऊपर का शामियाना बाँधना बाकी रह गया था।
"भाई... अब ये मामूली काम तुम दोनों कर लो," सुलेमान ने काला - कांडी को आदेश दिया और ख़ुद अपनी बीड़ी जलाकर पास ही एक नीम के पेड़ की छाँव में जाकर बैठ गया।
पेड़ की ओट से वो लगातार कामिनी को ही देखे जा रहा था, और बीच-बीच में हवेली की ज़मीन-जायदाद का मुआयना भी कर रहा था।
"साला... बहुत मालदार पार्टी है ये तो," सुलेमान अक्लमंद आदमी की तरह हर एक परिस्थिति को तराज़ू में तौल रहा था। 
"लेकिन इतनी ख़ूबसूरत, शरीफ़ और मालदार औरत इस कादर के चक्कर में कैसे फँस गई? इसका क्या लेना-देना अंडरवर्ल्ड और इन सब लफ़ड़ों से? इसे कुछ पता भी है या नहीं?"

सुलेमान हर एक संभावना को तलाश रहा था। उसे अब पूरी तरह यक़ीन हो चला था कि यही वो औरत है जिसकी तलाश में वो शहर से इस गाँव में आया है, क्योंकि इतनी देर में उसे हवेली में कोई दूसरी शहरी और इतनी सलीकेदार औरत नहीं दिखी थी।

देखते ही देखते एक-दो घंटे बीत चुके थे। सूरज अब धीरे-धीरे सिर पर आने लगा था और धूप तेज़ हो गई थी। आँगन में बैठी औरतों ने सब्ज़ियाँ काटने का काम लगभग पूरा कर लिया था।
"ओ भैया... ओ टोपी वाले भैया!"
सामने आँगन से कमला काकी हाथ हिलाते हुए सुलेमान को ही आवाज़ दे रही थी।
"हाँ... क्या हुआ?" सुलेमान अपनी उसी अकड़ और ठसक में बैठा रहा। उसने उठने की कोई ज़हमत नहीं उठाई।
"इधर आओ... काम है!" कमला ने फिर से पुकारा।
'काम' का नाम सुनते ही सुलेमान को अचानक झटके से होश आया कि वो यहाँ 400 रुपए का दिहाड़ी मज़दूर है।

"हट साला... बार-बार भूल जाता हूँ," सुलेमान ने मन ही मन ख़ुद को कोसा और बीड़ी फेंककर दौड़ता हुआ आँगन के पास पहुँचा।
"ये कटी हुई सब्ज़ियों का टोकरा उठाओ और पीछे हलवाई को दे आओ जा कर," कमला ने हुक्म दिया।
सुलेमान आगे बढ़ा। ठीक उसी वक़्त सामने कामिनी झुकी हुई टोकरी में कटी हुई सब्ज़ियाँ समेट कर भर रही थी। कामिनी के इस तरह आगे की तरफ़ झुकने से उसकी क्रीम रंग की साड़ी का पल्लू थोड़ा सा खिसक गया था। सफ़ेद सूती ब्लाउज़ के अंदर क़ैद उसके गोरे, भारी स्तनों की गहरी घाटी सुलेमान की आँखों के बिल्कुल सामने साफ़-साफ़ छलक रही थी।

सुलेमान पहली बार इतने क़रीब से कामिनी को देख रहा था। उसका वो निखरा हुआ गोरा रंग, पसीने से भीगा चेहरा और वो सुडौल, कड़क जिस्म... सुलेमान जैसा पत्थरदिल और खूँखार क्रिमिनल भी मन ही मन उस औरत की मादकता की तारीफ़ कर उठा।

"सुलेमान नाम है मेरा... 'भैया' नहीं," सुलेमान ने अपनी भारी और खुरदरी आवाज़ में कमला को घूरते हुए कहा।
उसकी  गूँजती हुई, मर्दानगी से भरी कड़क आवाज़ जैसे ही कामिनी के कानों में पड़ी... कामिनी के पेट के निचले हिस्से में अचानक एक झुरझुरी सी दौड़ गई!

कुछ देर पहले ही कामिनी ने जो गलती कि थी दवा' का डबल डोज़ पिया था। वो दवा अब उसके ख़ून में घुलने लगी थी।
 दवा ने कामिनी की सोई हुई चाहतों और कामुकता को इस क़दर जगा दिया था कि उस 'मर्दाना' आवाज़ ने उसे अपना सिर उठाने पर मजबूर कर दिया। "कौन है इस आवाज़ का मालिक?"

कामिनी ने धीरे से अपना सिर ऊपर उठाया।
सामने एक दैत्याकार, छह-साढ़े छह फ़ीट का हट्टा-कट्टा आदमी खड़ा था। उसका सीना इतना चौड़ा था कि कुरता फटने को हो रहा था। मुँह में बीड़ी दबी थी, और आँखों में एक ऐसा ख़ौफ़नाक और बेबाक नशा था जो सीधे कामिनी के जिस्म के आर-पार हो रहा था।

"हाँ... हाँ भाई सुलेमान! बस... अब उठाओ इसे और ले जाओ," कमला ने टोकरा दिखाते हुए कहा।

"वो... माँ-बाप ने बड़े प्यार से नाम रखा है ना मेरा सुलेमान, इसलिए बोला," सुलेमान ने कामिनी को अपने सामने खड़ा देख, बड़ी चालाकी से अपनी आवाज़ को थोड़ा कंट्रोल किया और अपना लहज़ा नरम कर लिया।

सुलेमान झुका और उसने सब्ज़ियों से भरा वो भारी-भरकम टोकरा, जिसे उठाने के लिए तीन चार औरतों की ज़रूरत पड़ती... उसे अपने एक ही हाथ से ऐसे उठा लिया जैसे वो फूलों से भरा हुआ कोई हल्का सा डिब्बा हो!
 टोकरा कंधे पर रखा और सीना चौड़ा किए आँगन से उतर कर पीछे हलवाइयों की तरफ़ चल दिया।
"बताओ... 400-500 रुपए का दिहाड़ी मज़दूर है, और इसकी अकड़ तो देखो! कह रहा है 'भैया' मत बोलो!" कमला ने सुलेमान के जाते ही औरतों के बीच ताना मारते हुए कहा।
कमला की बात सुनकर सभी औरतें हँसने लगीं।
लेकिन... कामिनी नहीं हँसी।
उसके गोरे चेहरे पर बस एक बेहद रहस्यमयी और नशीली सी मुस्कुराहट तैर रही थी। वो वहीं खड़ी-खड़ी, जाते हुए सुलेमान की चौड़ी और मज़बूत पीठ को घूरे जा रही थी। कामिनी की नज़रों में वो कोई मज़दूर नहीं, बल्कि ताक़त और पौरुष से भरपूर एक असली 'मर्द' था!

औरतें वैसे भी एक आदमी की शारीरिक ताक़त और उसकी मर्दानगी से बहुत जल्दी प्रभावित होती हैं। और कामिनी? वो तो अब पूरी तरह से बदल चुकी थी। कामिनी के अंदर एक ऐसी 'रंडी'  जन्म ले चुकी थी जिसे हर एक ताकतवर मर्द अच्छा लगने लगा था.
सुलेमान जैसा विशाल और फौलादी मर्द उसे मदहोश ना करे... अब ये कामिनी के लिए संभव ही नहीं था। उसकी बिना पैंटी की चुत में ठंडक खत्म हो रही थी, 

घर कि दहलीज लांघी हुई औरत कितना ही पल्लू ढक ले, अपने जज़्बात, अपनी हवस, अपनी वासना नहीं छुपा सकती.
प्यार उसके लिए सिर्फ शारीरिक संतुष्टठी बन के रह जाता है, वैसे भी मोहब्बत और हवस मे सिर्फ एक बारीक़ सी लाइन का ही फर्क है, 
शायद कामिनी इसके बीच खड़ी है. जहाँ सब कुछ एक है.
"औरत को तो स्वम भगवान भी नहीं समझ सकता "
******************************

सुलेमान सब्ज़ियों से भरा वो भारी टोकरा अपने चौड़े कंधे पर टिकाए हवेली के पिछले हिस्से में पहुँचा, जहाँ हलवाइ की बड़ी-बड़ी भट्टियाँ धधक रही थीं। वहीं पास में एक खटिया पर रमेश और ताऊजी मठाधीशों की तरह बैठे हुए थे।
सुलेमान को अकेले ही इतना भारी बोझ उठाकर इतनी आसानी से लाते देख रमेश का लालची मन ख़ुशी से नाच उठा।
"साला गँवार बैल! 400 रुपए में अकेले ही 4 आदमियों का काम कर रहा है," रमेश ने अपनी कुटिल मुस्कान के साथ मन ही मन सोचा।

"हाँ भाई... यहाँ रख दो इसे," मुख्य हलवाई ने पास ही पड़ी एक लकड़ी के तख़्त (चारपाई) की तरफ़ इशारा करते हुए कहा।
सुलेमान ने सब्ज़ियों का टोकरा बिना कोई आवाज़ किए आराम से तख़्त पर रख दिया। वो मुड़ने ही वाला था कि हलवाई फिर बोला,
"सुनो भाई... ये चावल के दो कट्टे भी ले जाओ और आँगन में औरतों को दे देना। कहना कि इन्हें अच्छे से बीन कर साफ़ कर दें, पुलाव चढ़ाना है।"

"जी... जी.... साब," सुलेमान ने दाँत पीसते हुए, किसी तरह अपने ख़ौफ़नाक ग़ुस्से को पीकर हाँ भरी।
तभी हलवाई ने ताऊजी की तरफ़ मुड़कर कहा, "ताऊजी, कुछ बड़े भगोने (पतीले) मँगवा लेते तो ठीक रहता, सब्ज़ी भी उबालनी है।"

"हाँ-हाँ, अभी मँगवाता हूँ," ताऊजी ने अपना सिर हिलाया और फिर चावल के कट्टे उठाते हुए सुलेमान को आदेश दिया, "सुनो भाई सुलेमान... ये चावल दे कर सीधा बहू रानी से बोलना कि घर के अंदर स्टोर रूम में ऊपर वाले छज्जे पर दो बड़े-बड़े भगोने रखे हैं, वो उतार दे। तुम वही लेते आना।"

"साला... इन गँवारों ने दिहाड़ी मज़दूर बना के रख दिया!" सुलेमान अंदर ही अंदर गालियाँ बकता हुआ, चावल के कट्टों को दोनों हाथों में उठाकर आँगन की तरफ़ चल दिया।
आँगन में पहुँचते ही सुलेमान का वो 'डॉन' वाला रवैया अचानक बाहर आ गया। उसने चावल के भारी कट्टों को औरतों के बीच 'धड़ाम' से ज़मीन पर पटका और एक बेहद कड़क, हुक्म चलाने वाली आवाज़ में बोला "इसे जल्दी साफ़ कर दो!"

सुलेमान का वो भारी और रौबदार लहज़ा सुनकर आँगन में बैठी सारी औरतें सहम कर उसकी तरफ़ देखने लगीं। एक पल के लिए वहाँ सन्नाटा छा गया।
औरतों की वो डरी हुई नज़रें देखकर सुलेमान का अंतर्मन उसे झकझोरने लगा "साले सुलेमान... तू यहाँ मज़दूर है, अपनी औकात में आ जा!" सुलेमान ने आज तक लोगों को सिर्फ़ ऑर्डर दिया था, किसी का हुक्म मानना उसकी फ़ितरत में नहीं था।

ख़ुद को सँभालते हुए सुलेमान ने झट से अपनी आवाज़ को नरम किया और गले को साफ़ करते हुए बोला, "ममम... मेरा मतलब है... हलवाई ने ऐसा कहा है कि इन्हें जल्दी साफ़ कर दो।"
औरतें फिर से अपने काम में लग गईं।
"वो... आप लोगों में से... 'बहू रानी' कौन है?" सुलेमान ने अपनी लाल आँखों से सभी औरतों को घूरते हुए पूछा।
उसकी नज़रें उसी गोरी, क्रीम साड़ी वाली औरत को ढूँढ रही थीं, पर कामिनी वहाँ नहीं थी.

"अरे बहू... ओ बहूरानी! ज़रा बाहर आना," कमला काकी ने हवेली के अंदर मुँह करके आवाज़ लगाई।
'छम... छम...'
कुछ ही पलों में हवेली के अंदरुनी हिस्से से कामिनी बाहर आँगन में आती दिखाई दी। 
 उसके गोरे चेहरे पर एक अजीब सी कामुक लाली छाई हुई थी।

"क्या काकी?"
कामिनी आकर वापस से उसी फौलादी सुलेमान के ठीक सामने खड़ी हो गई। सुलेमान की उस दैत्याकार काया को इतने पास से देखकर कामिनी के पेट में फिर से गुदगुदी होने लगी।

"वो... हलवाई ने सब्ज़ी उबालने के लिए बड़े भगोने मँगवाए हैं," सुलेमान ने कामिनी की नशीली आँखों में सीधे देखते हुए कहा, "ताऊजी ने कहा है कि स्टोर रूम में ऊपर छज्जे पर रखे हैं... वो चाहिए।"

"अच्छा... लाती हूँ," कामिनी ने एक बेहद धीमी लेकिन मजबूत आवाज़ मे कहाँ।
और फिर कामिनी मुड़ी और हवेली के अंदर अँधेरे स्टोर रूम की तरफ़ चल दी।

कामिनी अंदर गई और लगभग तुरंत ही वापस बाहर आ गई। "काकी... वो तो बहुत भारी हैं और ऊपर छज्जे पर रखे हैं, मेरे हाथ नहीं पहुँच रहे।"

"तो इस सुलेमान को बोलो उतार के लाएगा! ये इतना बड़ा राक्षस जैसा खड़ा तो है," कमला काकी सुलेमान की उस अकड़ से अभी तक बुरी तरह चिढ़ी हुई थी।

"आ... आप आइए अंदर," कामिनी ने अपने काँपते होंठों से सुलेमान को अंदर आने का इशारा किया।
सुलेमान का दिल तेज़ धड़क रहा था और साथ ही कामिनी का भी। कामिनी आगे-आगे चल रही थी। वो पूरी कोशिश कर रही थी कि उसकी गांड ज़्यादा ना हिले, लेकिन इस कोशिश में उसकी चाल में और भी ज़्यादा लचक आ गई थी। पीछे चलते सुलेमान की भूखी नज़रें कामिनी की उसी विशाल गांड पर गड़ी थीं। 

एक-दूसरे से टकराते हुए उसके चौड़े कूल्हों के दोनों पाट साड़ी के अंदर बुरी तरह मचल रहे थे। सुलेमान के फौलादी जिस्म में एक ख़तरनाक हलचल शुरू हो गई थी।
कामिनी गलियारे से होती हुई एक छोटे से स्टोर रूम के दरवाज़े पर जाकर रुकी। अंदर सिर्फ़ एक मद्धम सी पीली रोशनी का बल्ब जल रहा था, ना ठीक से उजाला था, ना ही पूरी तरह अंधेरा.

"ये... अंदर ऊपर छज्जे पर रखे हैं।"
सुलेमान आगे बढ़ा। दरवाज़े पर जगह कम थी और सुलेमान का शरीर किसी दानव जितना विशाल और चौड़ा।
जैसे ही सुलेमान अंदर घुसा, उसकी सख़्त, खुरदरी और पहाड़ जैसी बाजू कामिनी के सीने से होती हुई, उसके सुडौल और तने हुए स्तनों से बुरी तरह रगड़ खाती हुई सरकती चली गई।
"ईईईस्स्स्स...."कामिनी ने बेसाख़्ता एक गहरी, काँपती हुई साँस ली।

उसके पूरे बदन के रोंगटे खड़े हो गए। सुलेमान के भारी बदन से उठने वाली पसीने की वो तीखी, 'मर्दाना गंध' (Male Musk) एक ही पल में कामिनी के नथुनों से होती हुई सीधे उसके दिमाग़ तक पहुँच गई। कामिनी का गोरा जिस्म उस अनजान छुअन और ख़ौफ़नाक महक से पसीजने लगा। वासना की वो पहली और सबसे ख़तरनाक चिंगारी उसे छू कर निकल गई थी।

"ये तो बहुत ऊपर है मैडम... कुछ स्टूल है क्या जिस पर चढ़ कर उतार सकूँ?" सुलेमान की भारी, गूँजती आवाज़ ने कमरे का सन्नाटा तोड़ा।
"लल्ल... लाई..." कामिनी हकलाती हुई, लगभग दौड़ती हुई बाहर गई और एक लकड़ी का पुराना स्टूल उठा लाई।
अंदर आकर उसने स्टूल रखा और सुलेमान को घूरते हुए अचानक पूछा— "त... त... त... तुम पक्का मज़दूर ही हो?"
कामिनी के इस अचूक और सीधे सवाल ने एक पल को उस खूँखार डॉन सुलेमान को भी अंदर तक दहला दिया। उसका दिमाग़ ठनक गया।
"हहह... हाँ... हाँ मैडम। क्यों, क्या हुआ?" सुलेमान ने अपनी शातिर आँखों को बचाते हुए पूछा।

"वो... इस गाँव में पहली बार किसी मज़दूर के मुँह से अपने लिए 'मैडम' सुना," कामिनी की आँखों में एक अजीब सा नशा और शक दोनों तैर रहे थे।

"वो.. वो क्या है ना... मैं इधर का नहीं हूँ... मतलब, पास के गाँव का ही हूँ, पर दिल्ली में मज़दूरी करता रहा हूँ सालों तक। तो वहाँ शहर में औरतों को 'मैडम' कहने की आदत पड़ गई है," सुलेमान ने किसी तरह बात सँभाली और स्टूल लेकर उसे ज़मीन पर टिका दिया।
और जैसे ही सुलेमान ने अपना भारी-भरकम पैर उस स्टूल पर रखा...
'चररर्रर्र... चरररररर.... खट...!'

पुरानी लकड़ी का वो स्टूल सुलेमान के उस राक्षसी वज़न से बुरी तरह चरमराने लगा।
"ये... ये तो टूट जाएगा मैडम! आप थोड़ा इसे कस के पकड़ के रखो, मैं बस भगोने उतार कर जल्दी से नीचे उतरता हूँ।"
कामिनी भी पूरी तरह से उस छोटे और घुटन भरे कमरे के अंदर आ गई। दरवाज़े से बाहर की रोशनी लगभग छुप गई थी।
अंदर आते ही कामिनी के जिस्म से उठने वाली भीनी-भीनी, नशीली और 'मादक गंध' ने कमरे को महका दिया। सुलेमान के पसीने की मर्दाना गंध वहाँ पहले से ही मौजूद थी। एक सुलगती हुई औरत के कामरस की महक और एक ताक़तवर मर्द के पसीने की गंध... दोनों आपस में मिलकर उस बंद, छोटे से कमरे में एक ऐसा मादक और कामुक (Erotic) माहौल बना रहे थे कि दोनों के लिए ही साँस लेना भारी हो रहा था।

कामिनी की हालत अब बुरी तरह बिगड़ने लगी थी। अभी तक उसके पेट में जो बर्फ जैसी ठंडक पैदा थी, वो अब पूरी तरह से ख़त्म हो चुकी थी।
इस मर्दाना अहसास और कमरे की इस दमघोंटू नज़दीकी ने कामिनी की बिना पैंटी वाली चुत को एक ऐसा भयंकर झटका दिया था कि अब वहाँ कोई ठंडक नहीं... बल्कि एक उबलता हुआ ज्वालामुखी और 'पिघलता हुआ लावा' जन्म लेने लगा था। 


सुलेमान जैसे-तैसे उस पुरानी लकड़ी के स्टूल पर चढ़ा। कामिनी ने उसे सपोर्ट देने के लिए स्टूल के दोनों पायों को अपने हाथों से कस कर पकड़ लिया। कमरा बहुत ही सँकरा था, इसलिए कामिनी को स्टूल पकड़ने के लिए आगे की तरफ़ काफ़ी झुकना पड़ा।
सुलेमान का दानवाकार जिस्म इतना भारी और चौड़ा था कि चरमराती लकड़ी की आवाज़ से लग रहा था कि स्टूल किसी भी वक़्त टूट कर बिखर जाएगा। लेकिन फिर भी सुलेमान किसी तरह सीधा खड़ा हो गया। उसे ऊपर छज्जे पर रखे दो बड़े भगोने साफ़ दिखाई दे रहे थे।
लेकिन नीचे कामिनी की हालत ख़राब हो रही थी। उस अँधेरे और घुटन भरे कमरे में कामिनी का गोरा जिस्म पसीने से पूरी तरह भीग चुका था। और सबसे ख़तरनाक बात ये थी कि झुकने की वजह से... कामिनी का सिर ठीक सुलेमान की जाँघों के बिल्कुल बीचों-बीच था!
सुलेमान जैसे ही छज्जे की तरफ़ हाथ बढ़ाने के लिए हिला, उसके पाजामे के अंदर मौजूद वो बेहद भारी 'वज़न' बार-बार कामिनी के सिर और बालों से टकराने लगा। उसके हिलने-डुलने से वो माँसल हिस्सा कामिनी के सिर पर किसी पेंडुलम की तरह नाच रहा था।
"ईईस्स्स..."

कामिनी के होंठों से एक अनियंत्रित सिसकी निकल गई। उसे साफ़ अहसास हो रहा था कि जो चीज़ उसके सिर पर दस्तक दे रही है... वो क्या है! सुलेमान के वो बड़े, भारी टट्टे और वो माँस का लोथड़ा कामिनी के बालों से रगड़ खा रहा था। 
एक असली ताक़तवर मर्द के इस विशाल 'हथियार' के अहसास मात्र से ही कामिनी की बिना पैंटी वाली चुत ने बेतहाशा पानी छोड़ना शुरू कर दिया। उसकी आँखें नशे में डूबने लगीं.

"बस... हो गया... कस के पकड़े रहिएगा मैडम!" सुलेमान ने ऊपर देखते हुए ज़ोर लगाया और भारी भगोने को अपनी तरफ़ खींचना चाहा।
लेकिन सुलेमान के उस भयानक ज़ोर और वज़न को वो पुरानी लकड़ी सह नहीं पाई।
'चरररररर...... खट्ट... खट... धड़ाम...!!'

स्टूल के पाए एक ही झटके में टूट कर बिखर गए। सुलेमान का बैलेंस बुरी तरह बिगड़ा और वो सीधा पीछे की तरफ़ गिरकर दीवार से जा टकराया।
इधर स्टूल के टूटते ही, जो कामिनी स्टूल के सहारे अपना वज़न टिकाए झुकी हुई थी, उसका सारा बैलेंस ख़त्म हो गया। वो औंधे मुँह सीधे आगे की तरफ़ गिरी। और इस गिरने में... कामिनी का चेहरा और साड़ी के अंदर आज़ाद उसके भारी, गदराए हुए स्तन सीधे सुलेमान की जाँघों के बीच जाकर धँस गए!

"आअह्ह्हम.... उईई... आउच!" कामिनी दहशत में चिल्लाई। गिरने से बचने के लिए उसके काँपते हाथों ने हवा में कुछ ढूँढा और एक बेहद मज़बूत चीज़ को अपनी मुट्ठी में कस के जकड़ लिया।

"आप... ठीक तो हैं ना मैडम?" दीवार के सहारे अपनी कमर टिकाए सुलेमान ने तुरंत अपने फौलादी हाथों से कामिनी की गोरी बाजुओं को जकड़ कर उसे गिरने से बचा लिया।
ऐसा करते हुए सुलेमान की लोहे जैसी मोटी उँगलियाँ कामिनी के ब्लाउज़ के साइड से होते हुए... उसके नरम स्तनों के माँस में गहरे तक धँस गईं।

कामिनी बुरी तरह सकपका गई। लेकिन अगले ही पल... जैसे ही उसे हक़ीक़त का अहसास हुआ, उसकी साँसें उसके गले में ही अटक कर रह गईं।
कामिनी ने गिरने से बचने के लिए जो चीज़ पूरी मज़बूती से अपनी मुट्ठी में जकड़ रखी थी... वो सुलेमान की कलाई या घुटना नहीं था! उसके हाथों में सुलेमान का लंड था!

वो लंड अभी खड़ा या कड़क नहीं था, वो बिल्कुल नरम (Flaccid) था... लेकिन फिर भी उसकी मोटाई और गोलाई इतनी भयंकर थी कि वो कामिनी की पूरी मुट्ठी में भी ठीक से नहीं समा पा रहा था। कामिनी को लगा था कि उसने कलाई पकड़ी है, लेकिन ये तो किसी घोड़े के हथियार जैसा विशाल था।

कामिनी का पूरा जिस्म बिजली के झटके से झनझना उठा! सुलेमान के बदन में भी एक तेज़ सिहरन दौड़ गई। उसका वो भारी लंड पूरी तरह से कामिनी की मुट्ठी में क़ैद था। डर, हवस और अकल्पनीय मोटाई के अहसास ने कामिनी को इस क़दर सुन्न कर दिया था कि वो उसे छोड़ने के बजाय अपनी मुट्ठी में और कसने लगी थी!

"लगी तो नहीं मैडम?" सुलेमान ने अपनी बाहों का ज़ोर लगाकर कामिनी को ऊपर उठाना चाहा। सुलेमान की नज़रें ठीक नीचे थीं, जहाँ कामिनी के उभरे हुए, भारी और पसीने से भीगे स्तन बिल्कुल उसकी लाल आँखों के सामने बेपर्दा थे।

"न... न... न... नहीं... मैं ठीक हूँ..." कामिनी ने हाँफते हुए, हकलाते हुए कहा।
"तो फिर इसे छोड़िए... कितना कस के पकड़ रखा है,"
 सुलेमान ने एक मर्दाना मुस्कान के साथ अपने पाजामे के ऊपर कामिनी की मुट्ठी में क़ैद अपने लंड की तरफ़ इशारा किया।
"ओह.... हे भगवान... वो... मैं... I am sorry!" कामिनी शर्म और बेतहाशा हवस के मारे बुरी तरह सकपका गई। उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने 440 वोल्ट के नंगे तार पर उसका हाथ रख दिया हो।

वो झटके से पीछे हटी और खड़ी हो गई। अपने पसीने से भीगे चेहरे और अस्त-व्यस्त साड़ी को सँभालते हुए वो लड़खड़ाई।
"मैं... मैं कुछ दूसरी चीज़ लाती हूँ... कोई ऊँची चीज़..."

कामिनी मुड़ी और इस अँधेरे कमरे से बाहर जाने को हुई ही थी कि पीछे से सुलेमान की भारी आवाज़ गूँजी...
"रुकिए मैडम, उसकी ज़रूरत नहीं है। भगोने बिल्कुल बाहर किनारे पर ही रखे हैं, बस आप उन्हें थोड़ा सा आगे सरका दो ... फिर मैं नीचे से उतार लूँगा।"
कामिनी दरवाज़े की चौखट पर ही ठिठक कर रुक गई।
"ममम... मतलब...?" कामिनी को समझ नहीं आया कि बिना स्टूल के वो ऊपर छज्जे तक कैसे पहुँचेगी।

"मतलब... मैं आपको कमर से पकड़ कर हल्का सा ऊपर उठा देता हूँ, आप बस भगोने आगे की तरफ़ सरका दीजिए। बाकी मैं उतार लूँगा," सुलेमान ने बिल्कुल सपाट लहज़े में कहा।

सुलेमान का ये आईडिया अगर किसी नॉर्मल और संस्कारी स्त्री के लिए होता, तो वो तुरंत मना कर देती, झिड़क देती कि 'भला ये भी कोई तरीका हुआ? एक गैर-मर्द मुझे कैसे छू सकता है?'

लेकिन... ये कामिनी थी। और इस वक़्त उसके जिस्म मे हवस का लावा धीरे धीरे सुलग रहा था,  उसकी चुत में वासना की एक ऐसी भट्टी सुलग रही थी जो सब कुछ जलाकर ख़ाक करने पर आमादा थी। उसे अभी भी अपनी हथेली की रेखाओं में सुलेमान के विशाल और मोटे लंड का अहसास हो रहा था। 
उसकी नसों में ख़ून किसी उबलते हुए लावे की तरह दौड़ रहा था।
उसका दिमाग़ बार-बार कह रहा था कि मना कर दे, बाहर निकल जाए... लेकिन सुलेमान शायद औरतों की इस 'ना' में छुपी 'हाँ' को बहुत अच्छे से समझता था।
कामिनी बाहर नहीं गई। उसके काँपते हुए पैर ख़ुद-ब-ख़ुद पलट कर वापस कमरे के अंदर आ गए।

"कैसे....?" कामिनी हकलाते हुए बस इतना ही पूछ पाई। वो समझ नहीं पा रही थी कि सुलेमान उसे कैसे उठाएगा।
सुलेमान बिना कुछ बोले धीरे से कामिनी के बिल्कुल पीछे जाकर खड़ा हो गया। कामिनी कुछ समझ पाती या ख़ुद को तैयार कर पाती... उससे पहले ही सुलेमान के दोनों विशाल और फौलादी हाथों ने कामिनी की नंगी, गोरी कमर को पीछे से कस के जकड़ लिया!

और अगले ही पल... कामिनी का वो पूरा भारी-भरकम, गदराया हुआ जिस्म हवा में उड़ गया!
सुलेमान ने कामिनी के विशाल वज़न को अपनी लोहे जैसी बाहों से हवा में ऐसे उठा लिया था, जैसे उसमें कोई वज़न ही ना हो... जैसे वो कोई कागज़ की गुड़िया हो।
कामिनी उसकी इस अकल्पनीय ताक़त से हक्की-बक्की रह गई। ऐसा ताक़तवर, ऐसा फौलादी इंसान उसने आजतक अपनी पूरी ज़िंदगी में नहीं देखा था। कादर खान भी इस दरिंदे की ताक़त के सामने एक छोटा सा चूहा मालूम हो रहा था।
"आउच... आअहह्म्म... ईईईस्स्स...!"

सुलेमान के सख़्त, खुरदरे और मर्दाना हाथों की कड़क पकड़ जैसे ही कामिनी की नंगी कमर के माँस में धँसी... कामिनी के होंठों से एक जानलेवा सिसकी निकल गई। उसका रोम-रोम खड़ा हो गया। लेकिन उसने छटपटाने या विरोध करने की कोई कोशिश नहीं की।

इस उठा-पटक में एक बेहद कामुक नज़ारा बन गया। सुलेमान ने कामिनी को उठाया हुआ था, और कामिनी की भारी, चौड़ी गांड सीधे सुलेमान के चेहरे के बिल्कुल सामने... उसकी नाक और मुँह के ठीक ऊपर आकर टिक गई थी!

सुलेमान की भारी और गर्म साँसें कामिनी की साड़ी के सूती कपड़े को चीरती हुई, सीधा उसकी गांड की गहरी दरार और चुत के मुहाने पर टकराने लगीं।
सुलेमान को भी उसी पल एक बेहद कसैली, मीठी और मादक गंध का अहसास हुआ। ये वो गंध थी जो सिर्फ़ तब आती है जब एक औरत अपनी हवस की चरम सीमा पर सुलग रही हो।
"पच... पच...' एक माध्यम सी आवाज़ हुई, शायद कामिनी ने अपनी गांड या चुत को कस के सिकोड लिया हो.
गर्म साँसों के  लगातार स्पर्श और सुलेमान की ताक़त के अहसास ने कामिनी की चुत के बाँध तोड़ दिए। चुत से कामरस का एक रेला बह निकला। एक अनजान, राक्षस जैसे इंसान ने उसे अपनी बाहों में जकड़ कर हवा में लटका रखा था... इस ख़याल मात्र ने कामिनी को पागल कर दिया।

सुलेमान कोई कच्चा खिलाड़ी नहीं था। उसके चेहरे पर रगड़ खाती हुई कामिनी की गांड और साड़ी के उस खिसकते हुए कपड़े ने उसे तुरंत ये अहसास करा दिया कि  कामिनी ने साड़ी के अंदर पैंटी नहीं पहनी है!

सुलेमान की उँगलियाँ पूरी तरह से कामिनी की गोरी, पसीने से भीगी और गदराई कमर के माँस में गहरे तक धँस गई थीं।

"गग... गिराना मत... मैं... मैं खिसकाती हूँ," कामिनी ने अपनी लड़खड़ाती आवाज़ और उखड़ती साँसों को काबू करते हुए कहा।
सुलेमान का सिर ठीक कामिनी की बड़ी गांड के नीचे था। वो जब भी साँस अंदर लेता और बाहर छोड़ता, तो उसकी गर्म-गर्म साँसों का तूफ़ानी झोंका कामिनी की गीली, बिना पैंटी वाली चुत से टकराता। और हर साँस के साथ कामिनी की भट्टी और ज़्यादा उबलने लगती।
'घरररर.... घिस.... घस.... गररररर....'

कामिनी ने अपने काँपते हाथों से ऊपर छज्जे पर रखे भगोनों को आगे की तरफ़ सरका दिया।
"सरका दिया...." कामिनी ने हाँफते हुए कहा।

लेकिन शायद सुलेमान ने सुना ही नहीं। सुलेमान उस पल में पूरी तरह खो चुका था। कामिनी की गांड का भारीपन, नरमी और नशीली ख़ुशबू सुलेमान के चेहरे से रगड़ खा रही थी। वो उसे नीचे उतारना ही नहीं चाहता था।

"ससससस.... सुलेमान.... नीचे उतारो... हो गया!"
इस बार कामिनी ज़रा ज़ोर से बोली। उसकी आवाज़ में एक हल्की सी कड़क थी।

सुलेमान जैसे किसी अफ़ीम के नशे से बाहर आया। उसने धीरे से कामिनी को वापस ज़मीन पर खड़ा कर दिया।
ज़मीन पर पैर रखते ही कामिनी की साँसें धौंकनी की तरह तेज़-तेज़ चल रही थीं। उसकी छाती बुरी तरह ऊपर-नीचे हो रही थी। दोनों एक-दूसरे के बिल्कुल क़रीब खड़े थे। पीली रोशनी में दोनों की भूखी नज़रें आपस में टकराईं। उस एक पल के 'आई-कॉन्टेक्ट' (Eye-Contact) में हवस की अनकही दास्तान पढ़ी जा सकती थी।

"थैंक यू मैडम," सुलेमान ने अपनी भारी आवाज़ में कहा।
"अब उतार के बाहर ले आओ इन्हें," कामिनी ने आख़िरकार ख़ुद पर काबू पा लिया। ये बहकने का सही वक़्त नहीं था। हवेली के बाहर सैकड़ों लोग थे और एक छोटी सी ग़लती सबकुछ ख़त्म कर सकती थी।

गज़ब की हिम्मत थी कामिनी में! इतनी भयानक हवस, बेहिसाब उत्तेजना के बावजूद, उसने अपने दिमाग़ और जिस्म पर एक मज़बूत लगाम कस ली थी।

कामिनी दरवाज़े तक पहुँची। उसकी साँसें अभी भी फूली हुई थीं। दरवाज़े से बाहर निकलने से ठीक पहले वो एक बार पीछे पलटी।
उसकी नशीली आँखों में एक रहस्यमयी, जादुई और दावत देती हुई चमक थी। उसने सुलेमान को सीधे देखते हुए, अपने रसीले होंठों पर एक कातिलाना मुस्कान बिखेरी और बोली
"मेरा नाम कामिनी है... 'मैडम' नहीं।"
और ये बोलकर वो अपनी गांड मटकाती हुई कमरे से बाहर आँगन की तरफ़ निकल गई।

"इतिहास गवाह है, एक औरत हमेशा ताकतवर पुरुष कि ओर ही आकर्षित होती है, "
कल तक उसे कादर खान ताकतवर लगता था, लेकिन आज, आज ने उसका कल धुंधला कर दिया था.
असल मे कामिनी बेहया होती जा रही थी,वो स्त्री जो कभी एक पुरुष कि नहीं होती.

"वैसे भी सुंदर स्त्री किसी एक कि हो भी नहीं सकती."

सुलेमान वहीं कमरे में बुत बनकर खड़ा रह गया। अंडरवर्ल्ड, ड्रग माफिया पहली बार ये सब महसूस कर रहा था। ऐसी बेबाक मादकता, ऐसी मादक ख़ुशबू, और ऐसा गदराया हुआ निडर जिस्म!

"क्या औरत है साली यार..." सुलेमान के होंठों से ख़ुद-ब-ख़ुद तारीफ़ निकल गई। उसने दोनों भारी भगोने एक ही झटके में छज्जे से खींचे और कामिनी की उसी नशीली याद को दिमाग़ में लिए, बाहर हलवाइयों की तरफ़ चल दिया।

क्रमशः 


Buy me a wine 


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1 Comments

  1. Kamini ne jo double dose liya hai uska pura fayda suleman aur tauji utha le
    Suleman kamini ko pura ragad dale
    Suleman ka har ek dakka kamini ke wajood ko hila kar rakh de
    Hawas ka aisa tandav chaye ki suleman kadar par havi ho jaye
    Haweli ki aakhri raat agar tauji ko mil jaye to tauji bhi apni bimar fayda utha kar kamini ko subhah tak chod sakte hai

    Asha karta hu ke ye chota sa daan aapko daan age aise hi likhne ko prerit karega

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