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कामिनी 2.0, भाग -2


मेरी माँ कामिनी 2.0, भाग -2


बाहर आँगन में कड़ाके की ठंड थी और रमेश शराब के नशे में चारपाई पर बेसुध पड़ा था। लेकिन रसोई के अंदर... एक अलग ही किस्म की आग सुलगने वाली थी।

रसोई में सिर्फ मिट्टी के चूल्हे में जल रही लकड़ियों की धीमी-धीमी, लाल आंच चमक रही थी। उस पीली और कांपती हुई रौशनी में सुगंधा (ताईजी) एक छोटे से पीढ़े पर बैठी, अपने लिए सूखी रोटी और गुड़ का निवाला तोड़ रही थी। दिन भर की थकान से उसका भारी, गदराया हुआ बदन चूर था। सूती साड़ी का पल्लू उसकी भरी हुई छाती से थोड़ा सरक गया था, घाघरा जांघो के जोड़ तक सिमटा हुआ था, और चूल्हे की आंच में उसके गोरे जिस्म पर पसीने की हल्की-हल्की बूंदें चमक रही थीं।
वो सालों से बेसहारा थी। समाज ने उसे एक बाँझ और अभागी औरत मानकर त्याग दिया था। उसके जिस्म ने मुद्दतों से किसी मर्द की छुअन, किसी मर्द की वो गर्माहट महसूस नहीं की थी। बाहर से वो एक 'सीधी-सादी ताईजी' थी, लेकिन अंदर ही अंदर... एक औरत की वो स्वाभाविक प्यास उसे हर रात जलाती थी।
तभी... रसोई की चौखट पर एक भारी साया आकर खड़ा हो गया।

"क्या ताईजी... अकेले-अकेले खाएगी क्या?" एक भारी, खुरदरी और नशे में डूबी हुई आवाज़ रसोई के सन्नाटे में गूंजी।
सुगंधा ने चौंक कर अपना सिर ऊपर उठाया। उसके हाथ में रोटी का निवाला वहीं रुक गया।
दरवाज़े पर शमशेर खड़ा था।
उसने अपने बदन से वो पुलिस वाली खाकी शर्ट उतार कर फेंक दी थी। ऊपर के जिस्म पर एक भी कपड़ा नहीं था, वो सिर्फ अपनी पैंट में खड़ा था।

 चूल्हे की लाल रौशनी शमशेर के उस 26 साल के जवान, चौड़े और गठीले सीने पर पड़ रही थी। उसके डोले और सीने के बाल पसीने से हल्के-हल्के चमक रहे थे। उसकी लाल आँखों में एक भूखे भेड़िये जैसी चमक थी।
सुगंधा की साँसें अचानक भारी हो गईं।
उसकी नज़रें शमशेर के उस लोहे जैसे मज़बूत बदन पर जाकर अटक गईं। जो औरत सालों से एक मर्द की गर्माहट के लिए तरस रही थी, उसके सामने आज एक जवां और हट्टा-कट्टा मर्द आधा नंगा खड़ा था। सुगंधा के अंदर दबी हुई वो बरसों पुरानी आग अचानक ज्वालामुखी की तरह फटने को बेताब हो उठी। 


उसकी जांघों के बीच एक अजीब सी, गर्म झुरझुरी दौड़ गई... उसका जिस्म शमशेर की उस 'खूंखार मर्दानगी' को देखकर अंदर ही अंदर पिघलने लगा।
उसकी जांघो के बीच बना उभार बता रहा था, वो किस हद तक अंदर जा सकता है, 
वो चाह कर भी अपनी नज़रें शमशेर के उस नंगे सीने से नहीं हटा पा रही थी।
शमशेर ने मुस्कुराते हुए रसोई के अंदर कदम रखा। उसने वो चौखट पार नहीं की थी, बल्कि उसने सुगंधा की इज़्ज़त की वो आख़िरी लकीर पार कर ली थी।

वो धीरे-धीरे चलकर सुगंधा के बिल्कुल करीब आ गया। सुगंधा डरी हुई थी, लेकिन उस डर से कहीं ज़्यादा उसके अंदर एक 'पापी हवस' जाग चुकी थी।
शमशेर ने नीचे झुककर, सुगंधा के कांपते हुए हाथ से वो रोटी का टुकड़ा लिया और उसे दूर फेंक दिया।

"भूख तो मुझे भी बहुत ज़ोरों की लगी है ताईजी... लेकिन रोटी की नहीं।" शमशेर ने अपनी भारी आवाज़ में फुसफुसाते हुए कहा।
उसने अपना भारी, गरम और खुरदरा हाथ सुगंधा के उस गदराए, नंगे कंधे पर रख दिया। शमशेर की उस एक छुअन ने सुगंधा के पूरे जिस्म में 440 वोल्ट का करंट दौड़ा दिया। उसकी आँखें बंद हो गईं और मुँह से एक दबी हुई सिसकी निकल गई  "आह्ह्ह... श... शमशेर बाबू... क्या कर रहे हो... रमेश बाहर है..." लेकिन उसकी आवाज़ में कोई विरोध नहीं था, सिर्फ एक मीठा सा आमंत्रण था।

शमशेर ने अपने दूसरे हाथ से सुगंधा की चुन्नी को पकड़ा और उसे झटके से नीचे गिरा दिया। सुगंधा के वो भारी, उफनते हुए और पसीने से चमकते स्तन अब सिर्फ एक पतले से सूती ब्लाउज़ में कैद थे, जो उनके भार से फटने को तैयार था।

शमशेर की आँखें उस मांसल खज़ाने को देखकर चौड़ी हो गईं। उसने बिना कोई और बात किए, अपने दोनों मज़बूत हाथों से सुगंधा की उस चौड़ी और मांस से भरी कमर को दबोचा और उसे झटके से खींच कर अपने उस नंगे, गठीले सीने से चिपका लिया।

सुगंधा का पूरा बदन शमशेर की उस वहशी ताकत के आगे ढह गया। उसने अपने दोनों हाथ शमशेर की नंगी पीठ पर रख दिए और अपनी बरसों की वो प्यास बुझाने के लिए खुद को शमशेर के हवाले कर दिया।
*******************

दिसंबर की सर्द सुबह की गुनगुनी धूप खेतों पर बिछी हुई थी। रात भर रमेश की ताईजी (सुगंधा) की जिस्मानी आग बुझाने के बाद शमशेर एकदम तरोताज़ा था, और रमेश के दिमाग पर अभी भी सुगना की हवस का बुखार चढ़ा हुआ था।

खेत में राघव (रघु) फावड़ा चला रहा था। सर्दियों में भी मेहनत की वजह से उसका गठीला और मज़बूत बदन पसीने से तर-बतर था।
तभी... पगडंडी पर धूल उड़ाती हुई पुलिस की एक सरकारी जीप आकर रुकी। जीप से रमेश और शमशेर बाहर निकले और सीधे राघव की तरफ बढ़ने लगे।

"क्यों भाई राघव... कैसा चल रहा है सब?" रमेश ने पास आकर एक झूठी, मीठी मुस्कान के साथ पूछा। उसकी गिद्ध जैसी नज़रें आस-पास किसी और को ही ढूंढ रही थीं।
अपने सामने 'बड़े बाबू' (रमेश) और थानेदार को देखकर राघव ने जल्दी से फावड़ा नीचे रखा और हाथ जोड़ लिए।
"बड़े बाबू, सब आपकी ही कृपा है। फसल तो ठीक है, बस... बस वो मेरी ज़मीन के पैसे भी मिल जाते तो धन्य हो जाता मैं। घर में नया मेहमान आने वाला है..." राघव ने बहुत ही खुशामद और उम्मीद भरी नज़रों से कहा।
"मिल जाएंगे... तेरे पैसे भी आ जाएंगे।" शमशेर ने अपनी खाकी पैंट की बेल्ट कसते हुए कहा। "आ... यहाँ बैठ।" शमशेर ने मेड़ (खेत की मुंडेर) की तरफ इशारा करते हुए उसे वहीं अपने पास बैठा लिया।
रमेश ने अपनी जेब से सिगरेट निकाली और सुलगाते हुए बोला, "तेरी इस ज़मीन के 5 करोड़ मिलेंगे। तू जानता भी है साले... 5 करोड़ कितना होता है?"
राघव ठहरा एकदम अनपढ़, सीधा-सादा गाँव का किसान। उसे 5 हज़ार और 5 लाख का ही ठीक से अंदाज़ा नहीं था, 5 करोड़ तो उसके लिए किसी दूसरी दुनिया की बात थी। उसे क्या पता था कि ये कीमत रमेश अपनी जेब से नहीं दे रहा था। असल में राघव की वो 5 बीघा ज़मीन एक बड़े सरकारी प्रोजेक्ट के बीच में आ गई थी, जहाँ से एक 4-लेन हाईवे निकलना था, और सरकार उसका भारी मुवाअज़ा दे रही थी।
"साब... आप जो दे दें, वही सही है। हमें क्या पता ये सब," राघव ने मासूमियत से सिर खुजाते हुए कहा।
"अबे इतना है कि तेरी आने वाली सात पुश्तें भी बैठकर खाएं, तो पैसा कम नहीं पड़ेगा!" शमशेर ने धुएं का छल्ला छोड़ते हुए उसे समझाया।
"क्या... सच साब? इतना होता है 5 करोड़?" राघव की आँखें फटी की फटी रह गईं।
"अब समझा ना तू? लेकिन..." शमशेर ने अपनी आवाज़ को थोड़ा धीमा और ज़हरीला करते हुए कहा, "ऐसे ही ले लेगा क्या सूखा-सूखा? बाकी के किसानों को तो पैसा मिल भी गया है।"
"मतलब... कैसे लूँ? मुझे क्या करना होगा साब?" राघव कुछ समझ नहीं पा रहा था।
"अबे कुछ 'देना' पड़ता है, इतने रुपयों के लिए। बिना कुछ दिए सरकार पैसे थोड़े ही दे देगी?" शमशेर ने तिरछी नज़रों से रमेश की तरफ देखा।
"क्या दूँ साब? मेरे पास तो कुछ भी नहीं है सिवाय इस ज़मीन के..." राघव बेचैनी से बोला।
तभी... रमेश की लाल और भूखी आँखें अचानक चौड़ी हो गईं। उसके चेहरे पर एक वहशी मुस्कान तैर गई।
खेत की दूसरी पगडंडी से सुगना खाना लेकर आ रही थी।
8 महीने का वो निकला हुआ गोरा पेट, सूती ब्लाउज़ से झांकते हुए वो भारी, दूध से भरे स्तन, और उस लाल घाघरे के अंदर मटकती हुई वो बड़ी और गोल गांड... सुगना हर कदम के साथ रमेश के दिमाग की नसें फाड़ रही थी।
"साब को वो पसंद आ गई है..." शमशेर ने सीधा सुगना की तरफ इशारा करते हुए कहा।
राघव अभी भी नहीं समझा। "मतलब...?"
"अबे तू गधा है क्या?" शमशेर ने अपनी आवाज़ में कड़कपन लाते हुए सीधा बम फोड़ा, "तेरी बीवी साब को पसंद है। एक रात साब के क्वार्टर पर भेज दे, अगले दिन 5 करोड़ तेरे हाथ में!"
यह सुनते ही राघव के कानों में जैसे किसी ने खौलता हुआ सीसा डाल दिया। एक पल के लिए सब कुछ सुन्न हो गया।
"साब... ये कैसी बात कर रहे हैं आप? ठीक तो हो?" राघव ने अपने ग़ुस्से पर किसी तरह काबू रखा, हालांकि उसकी वो मज़बूत, किसान वाली बाजुएं फड़क उठी थीं। मुट्ठियां कस गई थीं।
उधर सुगना लचकती हुई चाल से पास आ रही थी।
"समझ यार राघव..." रमेश ने उसे ऐसे समझाया जैसे कोई बहुत मामूली बात हो, "ये औरत, बच्चे तो फिर भी वापस मिल जाएंगे। दूसरे आ जाएंगे... और सब तेरा ही तो है आख़िर में। बस एक रात की कीमत तुझे 5 करोड़ दे रहा हूँ। सौदा बुरा नहीं है।"
"ख़बरदार बड़े बाबू...!" राघव की आँखों में खून उतर आया। "वापस से मेरी बीवी का नाम अपनी उस गंदी ज़बान से लिया तो... आपकी गाँव में इतनी इज़्ज़त है और आप ऐसी नीच सोच रखते हैं?"
"साले... ग़ुस्सा किसे दिखा रहा है बे तू?" शमशेर अपने असली रौद्र और गुंडे वाले रूप में आ गया। उसने आगे बढ़कर एक ही झटके में राघव की गर्दन उसके कुर्ते से दबोच ली।
सुगना अब बस कुछ ही कदम की दूरी पर थी।
"छोड़ बे शमशेर... वो आ रही है," रमेश ने फुसफुसाते हुए कहा। उसे अपना खेल खराब नहीं करना था।
शमशेर ने ग़ुस्से से ज़मीन पर थूका और राघव की गर्दन छोड़ते हुए उसके कान में फुसफुसाया, "आज रात तक का वक़्त है तेरे पास... सोच लेना। वरना ये ज़मीन भी जाएगी, और तेरी लुगाई भी!" "नमस्ते बड़े बाबू... नमस्ते दारोगा जी..." सुगना की वो मीठी, मनमोहक आवाज़ गूंजी।
एक ही सेकंड में सब कुछ सामान्य हो गया। शमशेर और रमेश के चेहरों पर झूठी और शातिर मुस्कान आ गई। सुगना के हाथ में पानी का लोटा और एक पोटली में खाना था।
"क्या हुआ बड़े बाबू... कोई बात है क्या?" सुगना ने अपने भारी स्तनों को पल्लू से हल्का सा ढकते हुए पूछा।
रमेश तो सुगना की उस नशीली खुशबू और उसके रूप का दीवाना हो चुका था। साला एकदम बावरा हो गया।
"ज... जी... जी नहीं... वो कुछ नहीं। बस वो... पैसे कैसे देने हैं, वही बात करने आए थे।" रमेश की नज़रें सुगना के चेहरे से फिसल कर बार-बार उसके ब्लाउज़ के उस गहरे गले और उसके मटकते हुए कूल्हों को ताड़ रही थीं।
"चलें भाई..." शमशेर ने रमेश का हाथ पकड़ा और उसे लगभग ज़बरदस्ती खींचते हुए बोला। शमशेर जानता था कि अगर रमेश वहाँ एक पल और रुका, तो वो खुद पर काबू नहीं रख पाएगा।
रमेश तो वहाँ से हिलने को तैयार ही नहीं था। उसकी आँखें सुगना के जिस्म से फेवीकोल की तरह चिपकी थीं।
"बड़े बाबू, खाना तो खा कर जाते," सुगना ने अपनी मनमोहक आवाज़ में बड़ी मासूमियत से पूछा।
"खाएंगे... राघव के घर का खाना ही तो पसंद है बड़े बाबू को!" शमशेर ने एक गहरा 'डबल मीनिंग' डायलॉग मारा और रमेश को घसीटता हुआ जीप की तरफ ले गया।
सुगना शमशेर की इस बात का मतलब नहीं समझ सकी। लेकिन राघव समझ गया था। उसका खून खौल रहा था, लेकिन सिस्टम और पुलिस की इस ताकत के आगे वो अपने ही खेत में एक बेबस गुलाम की तरह खड़ा रह गया।
"घुर्रर... घुर्रर्ररर..." जीप स्टार्ट हुई और धूल उड़ाती हुई सड़क पर दौड़ पड़ी।
जीप में बैठे रमेश की साँसें लोहार की धौंकनी की तरह चल रही थीं। उसकी आँखों में एक पागलपन और खौफनाक चिंगारी साफ़ दिख रही थी।
उसने शमशेर की तरफ मुड़कर अपने दाँत पीसते हुए कहा—
"भाई शमशेर... सुगना मुझे चाहिए। अगर वो मुझे नहीं मिली ना... तो साला पूरा किशनगंज जला दूंगा मैं!" और ये कोई खोखली धमकी नहीं थी। रमेश के पास पैसा था, पावर थी, और शमशेर जैसा वर्दी वाला गुंडा दोस्त। राघव की बर्बादी की स्क्रिप्ट अब लिखी जा चुकी थी।
****************

दिसंबर की सर्द शाम धीरे-धीरे काली और कंपा देने वाली रात में बदल रही थी।
घर के दालान (आँगन के पास वाला बरामदा) में एक पीला सा बल्ब टिमटिमा रहा था। एक पुरानी खटिया पर रमेश बैठा हुआ था और उसके हाथ में शराब का आधा भरा हुआ गिलास था। वहीं नीचे ज़मीन पर एक पीढ़े पर बैठी ताईजी (सुगंधा) सब्ज़ी छील रही थीं।
शराब के नशे में रमेश की ज़ुबान सिर्फ एक ही नाम रट रही थी।
"ताईजी... वो साली सुगना... बस एक बार वो मेरे नीचे आ जाए, तो साला इस गाँव में नौकरी करने का असली मज़ा आ जाए।" रमेश ने गिलास को होंठों से लगाते हुए एक गहरी और हवस भरी आह छोड़ी।

ताईजी सब्ज़ी छीलती रहीं और बिना सिर उठाए बस बीच-बीच में "हूँ... हाँ बिटवा... सही कह रहे हो," करती रहीं।
यहाँ ताईजी पूरी तरह से रमेश के एहसानों तले दबी हुई थीं। वो रमेश की सिर्फ एक रिश्तेदार नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी राजदार और वफादार थीं। उनकी नज़र में रमेश की हर बात, हर हवस जायज़ थी। और वो ऐसा करती भी क्यों नहीं? 'सही और गलत' के मायने उनके लिए बहुत पहले ही बदल चुके थे।

 जिस 'सही' समाज ने उन्हें सिर्फ इसलिए दुत्कार कर कूड़े में फेंक दिया था क्योंकि वो एक बाँझ औरत थीं और बच्चा पैदा नहीं कर सकती थीं... उसी समाज के बीच 'गलत ' रमेश ने छत, दो वक़्त की रोटी और 'ताईजी' का सम्मान दिया था। रमेश का वो एहसान ताईजी के लिए किसी भगवान के वरदान से कम नहीं था।

सब्ज़ी छीलते-छीलते ताईजी ने अचानक एक सवाल पूछ लिया।
"अच्छा बिटवा... एक बात बताऊँ। कामिनी बहु भी तो गर्भवती है। तुझे क्या चाहिए? लड़का या लड़की?"
यह सवाल सुनते ही रमेश के माथे पर सिलवटें पड़ गईं। उसने शराब का गिलास खटिया पर रखा और अपनी छाती चौड़ी करते हुए अकड़ कर बोला

"क्या-क्या होता है ताईजी? अरे रमेश का खून है... लड़का ही होगा! मैं कोई नामर्द थोड़े ही हूँ।" उसका पुरुष-अहंकार एकदम से फन काढ़ कर खड़ा हो गया।

ताईजी ने चाकू को टोकनी में रखा और बड़ी मासूमियत से पूछा, "हाँ बिटवा, वो तो है। पर मान ले... भगवान की मर्ज़ी... और नहीं हुआ लड़का तो?"
इतना सुनना था कि रमेश की आँखें लाल सुर्ख हो गईं। वो किसी पागल जानवर की तरह तमतमा उठा और आगबबूला होकर चिल्लाया
"ताईजी... अपनी ये मनहूस बकवास बंद करो!" ताईजी सहम कर पीछे खिसक गईं।
रमेश की आँखों में एक सनक सवार थी। "ये जो इतना पैसा कमाया है... ये काली कमाई, ये रुतबा, ये रसूख... मेरे बाद इस बाप की दौलत को कौन देखेगा? एक लड़की? मेरे घर में कोई लड़की पैदा नहीं होगी!"

रमेश का नशा और उसका पागलपन अब उसके सिर चढ़ कर बोल रहा था। उसने अपने दाँत पीसते हुए एक ऐसी खौफनाक बात कही जिसने ताईजी की रूह कंपा दी

"और सुन लो कान खोलकर... अगर धोखे से भी उस कामिनी के पेट से लड़की हुई ना... तो पैदा होते ही उस साली कामिनी और उसकी उस मनहूस औलाद को इसी आँगन की ज़मीन में ज़िंदा गाड़ दूंगा!" रमेश के इस खौफनाक पागलपन और बेटे की उस सनकी चाहत को देखकर ताईजी अंदर तक सिहर गईं। उन्हें समझ आ गया कि रमेश किसी के सगे बाप का नहीं है।


ताईजी तुरंत नरम पड़ गईं। उन्होंने हड़बड़ाहट में रमेश की बोतल उठाई और जल्दी से गिलास में शराब डालते हुए बोलीं
"अरे शांत हो जा बिटवा... शांत हो जा। मैंने तो बस ऐसे ही पूछ लिया था। रमेश बाबू के घर तो शेर ही पैदा होगा। ले, एक घूंट और मार ले।"
रमेश हाँफ रहा था। उसने ताईजी के हाथ से गिलास लिया और एक ही साँस में गटक गया।
अभी दालान में सन्नाटा पसरा ही था कि तभी... बाहर की कच्ची सड़क से एक भारी और जानी-पहचानी आवाज़ गूंजी।
"धड़... धड़... धड़... धाड़..."
रमेश के क्वार्टर के आँगन में पुलिस की एक बुलेट आकर रुकी। इंजन बंद हुआ और भारी जूतों की आवाज़ दालान की तरफ बढ़ने लगी।
वो शमशेर था।
शमशेर ने अपनी पुलिस वाली जैकेट उतारी और दालान में कदम रखा। रमेश की तरफ देखने से पहले, शमशेर की वो ठरकी और शिकारी नज़रें सीधे ज़मीन पर बैठी ताईजी (सुगंधा) पर जाकर टिक गईं।

ताईजी ने भी नज़रें उठाईं। कल रात रसोई की उस मद्धम आंच में शमशेर के नंगे सीने और उसकी उसकी मर्दानगी के जो नज़ारे उन्होंने देखे थे और जो दर्द भरा मीठा सुख महसूस किया था... वो याद आते ही ताईजी की जांघें फिर से कस गईं।

 उनके होंठों पर एक बहुत ही दबी हुई, कामुक और 'राजदार' वाली मुस्कान तैर गई।
सुगंधा ने अपना साड़ी का पल्लू हल्का सा ठीक किया और घुटनों पर हाथ रखकर उठते हुए अपनी नशीली आवाज़ में बोली

"मैं... मैं शमशेर बाबू के लिए पानी लाती हूँ..."
और वो अपनी भारी, मटकती हुई गांड को लचकाते हुए वापस उसी रसोई की तरफ चल दीं, जहाँ कल रात उनका जिस्म शमशेर की हवस का शिकार हुआ था।

 शमशेर की नज़रें तब तक ताईजी की उस कमर को घूरती रहीं जब तक वो अँधेरे में ओझल नहीं हो गईं।
फिर शमशेर मुड़ा और रमेश के पास खटिया पर बैठ गया।

ताईजी पानी का गिलास रखकर अपनी उस मटकती हुई चाल से वापस रसोई के अँधेरे में गुम हो चुकी थीं। अब उस दालान में सिर्फ रमेश का गुरूर और शमशेर की गुंडागर्दी बची थी।
शमशेर ने अपनी भारी पुलिस वाली बेल्ट ढीली की, खटिया पर रमेश के बगल में बैठा और खुद ही बोतल उठाकर अपने लिए एक कड़क पेग बना लिया। 

उसने रमेश की तरफ एक तिरछी और ठंडी नज़र डाली।
"भाई... दूसरा प्लान आज़माना पड़ेगा।" शमशेर ने बर्फ के टुकड़ों को गिलास में घुमाते हुए कहा। "साला वो राघव सीधी उंगली से घी निकालने नहीं दे रहा... वो नहीं मान रहा, साले देहाती को पता ही नहीं है 5 करोड़ कितना होता है।"
वरना इतने रुपये के लिए तो आदमी अपना खानदान चुदवा लेता है " 

यह सुनते ही रमेश के अंदर का वो घमंडी भेड़िया तिलमिला उठा। उसका पुरुष-अहंकार और सुगना को पाने की वो अंधी हवस दोनों एक साथ भड़क उठे।

"तो... क्या?" रमेश ने अपनी लाल सुर्ख आँखें फाड़कर शमशेर को घूरा। उसकी कनपटी की नसें तन गई थीं। "याद रखना साले शमशेर... अगर वो सुगना मुझे नहीं मिली, तो इस पूरे गाँव में आग लगा दूँगा मैं!" गुस्से में पागल रमेश ने अपना खाली गिलास ज़मीन पर दे मारा और सीधे शराब की बोतल को ही मुँह से लगा लिया।

"गट... गट... गट..." कच्ची शराब सीधे उसके हलक से नीचे उतरने लगी।
शमशेर ने अपना गिलास होंठों से लगाया और एक भयानक, कमीना ठहाका मार कर हँस पड़ा।

"हाहाहाहा... अरे रमेश बाबू! मुझे तो अपने खबरी से यह भी सुनने में आया है कि वो राघव हमारी शिकायत करने कल सुबह शहर जाने वाला है... बड़े अफसरों के पास! हाहाहा..." शमशेर अपनी ही बात पर शैतानों की तरह हँस रहा था।

रमेश ने झटके से बोतल मुँह से हटाई। शराब की कुछ बूंदें उसकी ठुड्डी से टपक कर उसके सीने पर गिर रही थीं।
"साले... मादरचोद! शिकार हमारे हाथ से निकल रहा है, तेरी वर्दी और मेरे इस रुतबे पर बात आ रही है, और तू यहाँ दाँत फाड़ कर हँस रहा है?" रमेश घबराहट और गुस्से के मिक्सचर में गुर्राया।

शमशेर ने अपना गिलास नीचे रखा। उसकी आँखों की वो हँसी एक ही सेकंड में गायब हो गई और वहाँ एक खूंखार, मौत का सन्नाटा छा गया। उसने रमेश के कंधे पर अपना भारी हाथ रखा और एक ऐसी बर्फीली आवाज़ में बोला जिसने रमेश के नशे को भी एक पल के लिए उतार दिया

"वो शहर तो तब जाएगा ना रमेश... जब उसके लिए कल की सुबह होगी!"
रमेश की आँखें फटी की फटी रह गईं।
शमशेर थोड़ा आगे झुका और रमेश के कान के एकदम पास अपना मुँह ले गया।

"फुस... फुस... फुस..." अँधेरे दालान में सिर्फ उन दो भेड़ियों की फुसफुसाहट गूंज रही थी। शमशेर उसे राघव को रास्ते से हटाने का वो खौफनाक और अचूक जाल समझा रहा था।

जैसे-जैसे शमशेर अपना वो काला प्लान रमेश के दिमाग में उतार रहा था, दालान के उस पीले बल्ब की रौशनी में दोनों के चेहरों के रंग बदल रहे थे।

शमशेर के चेहरे पर एक शुद्ध, रूह कंपा देने वाली हैवानियत (Pure Evil) नाच रही थी। वो एक ऐसा कसाई लग रहा था जो किसी बकरे की गर्दन पर छुरी रखने से पहले मुस्कुराता है।

वहीं दूसरी तरफ रमेश... उसका चेहरा उस खौफनाक 'मौत' के प्लान को सुनकर भी सिर्फ एक ही चीज़ से चमक रहा था, सुगना के उस भारी, 8 महीने के गर्भवती जिस्म को अपने बिस्तर पर पटकने की वो अंधी और पागल हवस (Pure Lust)!

 रमेश के चेहरे पर हवस का वो गंदा रस टपक रहा था। उसे राघव की जान जाने से कोई मतलब नहीं था, उसे बस सुगना की वो 'कच्ची खुशबू' चाहिए थी।
प्लान पूरा होते ही रमेश के चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान फैल गई। उसने अपनी बोतल आगे बढ़ाई।
शमशेर ने अपना गिलास उठाया और रमेश की बोतल से ज़ोर से टकराया।
"सुगना के नाम..."
"चियर्स!"
कांच टकराने की उस "क्लिंक" आवाज़ के साथ ही, उस अभागे किसान राघव की मौत और सुगना की बर्बादी के परवाने पर हमेशा के लिए मोहर लग गई।
दोनों आदमखोर जानवर अपनी-अपनी जीत के नशे में चूर होकर अपना जाम पीने में बिजी हो गए। और अंदर रसोई में बैठी ताईजी, इस पूरी साजिश की एक खामोश और अंधी गवाह बन गई।
********************


(रात 11:45 बजे | शहर में रमेश का पुश्तैनी घर)

रात का सन्नाटा गहरा हो चुका था। जहाँ एक तरफ किशनगंज गाँव में मौत का जाल बुना जा रहा था, वहीं शहर के उस पुश्तैनी घर में भी 'कालचक्र' ने अपना खेल शुरू कर दिया था।
8 महीने की गर्भवती कामिनी को अचानक ज़ोरों की प्यास लगी थी। उसका कमज़ोर, पीला पड़ चुका शरीर थकान से चूर था। वो बहुत ही आहिस्ता से, दीवार का सहारा लेते हुए सीढ़ियां उतर रही थी। घर में एकदम अँधेरा था।

अचानक... कामिनी का पैर एक सीढ़ी से फिसला।
"आआआह्ह्ह...!!" कामिनी के मुँह से एक दर्दनाक चीख निकली और उसका कमज़ोर शरीर सीढ़ियों पर लुढ़क गया।
वो सीधे पेट के बल तो नहीं गिरी, लेकिन सीढ़ियों से टकराने के उस ज़ोरदार झटके ने उसके पेट में एक भयंकर, जानलेवा दर्द पैदा कर दिया। सर पर ऐसी चोट लगी की कामिनी वहीं फर्श पर गिरकर तड़पने लगी। उसकी जांघों के बीच से एक गर्म तरल पदार्थ रिसने लगा।

कामिनी की वो चीख सुनकर रमेश के बाबूजी (कामिनी के ससुर) हड़बड़ा कर नींद से जाग गए। उन्होंने भागकर बत्ती जलाई और जब सीढ़ियों के नीचे अपनी गर्भवती बहू को खून और दर्द से तड़पते हुए देखा, तो उनके होश उड़ गए।

"अरे बहू... हे भगवान! कोई है... गाड़ी निकालो जल्दी!"
बाबूजी ने घबराहट में कांपते हाथों से अपनी तड़पती हुई बहू को उठाया। रमेश का अपना खून, उसका अपना वारिस इस वक़्त खतरे में था और मौत से लड़ रहा था, लेकिन उस जाहिल रमेश को इसकी कोई खबर नहीं थी। बाबूजी तुरंत कामिनी को लेकर शहर के अस्पताल की तरफ भाग खड़े हुए।

ठीक उसी वक़्त... रात के 12:00 बजे | किशनगंज, रमेश का क्वार्टर
"धड़... धड़... धड़... धाड़...!!"
सरकारी क्वार्टर के सन्नाटे को चीरते हुए शमशेर की पुलिस वाली बुलेट का इंजन किसी भूखे जानवर की तरह गरजा।
अलाव बुझ चुका था, लेकिन उन दोनों आदमखोरों के अंदर की हवस और हैवानियत पूरी तरह से भड़क चुकी थी। शराब ने उनके दिमाग से इंसानियत का आख़िरी कतरा भी धो डाला था।

"चल बे शमशेर...!" रमेश ने बुलेट के पीछे बैठते हुए एक शैतानी और नशे में डूबी हुई आवाज़ में कहा, "आज शिकार किया जाए! आज की रात सुगना मेरी है!" शमशेर ने एक कमीनी मुस्कान के साथ एक्सीलेटर मरोड़ा। बुलेट के पिछले टायर ने धूल उड़ाई और वो भारी मशीन उस घने अँधेरे में गाँव की कच्ची सड़क की तरफ दौड़ पड़ी।

बुलेट के साइलेंसर की उस कानफोड़ू आवाज़ से अंदर रसोई के पास सो रही ताईजी (सुगंधा) की नींद अचानक टूट गई।

वो हड़बड़ा कर उठ बैठीं। बाहर बुलेट दूर जा चुकी थी, लेकिन ताईजी के दिल की धड़कनें बेतहाशा तेज़ हो गई थीं। एक अनजानी सी घबराहट, किसी बहुत बड़ी और मनहूस अनहोनी का खौफनाक अंदेशा उनके सीने को निचोड़ने लगा।

 कल रात की अपनी उस पापी हवस को बुझाने के बाद, आज वो शमशेर और रमेश का असली, खूंखार रूप समझ चुकी थीं। शाम को दालान में रमेश का वो पागलपन और शमशेर के साथ उसका वो 'चियर्स' करना...
ताईजी को समझ आ गया था कि ये दोनों खून के प्यासे भेड़िये अब किस दिशा में निकले हैं।

"हे राम... अनर्थ हो जाएगा आज..." ताईजी के मुँह से बरबस ही निकल पड़ा।
उन्होंने बिना एक भी पल गँवाए, कांपते हाथों से अपनी सूती साड़ी को समेटा। अपने भारी पल्लू को खींचकर कसकर अपनी कमर में खोंसा और बिना चप्पल पहने, नंगे पैर ही उस कड़ाके की ठंड में क्वार्टर से बाहर भाग खड़ी हुईं।

हवा में कोहरा था और रास्ता एकदम सुनसान। ताईजी का भारी, गदराया हुआ शरीर तेज़ चलने के कारण हाँफने लगा था, लेकिन उनके कदम रुके नहीं। वो उस घने अँधेरे में गाँव की उसी पगडंडी पर भाग रही थीं जिस पर कुछ मिनट पहले वो बुलेट गई थी।
आज की रात किशनगंज के इतिहास की सबसे खौफनाक रात होने वाली थी... क्योंकि नशे में धुत उन दो शैतानों की बुलेट और पीछे-पीछे नंगे पैर भागती ताईजी...
दोनों की मंज़िल एक ही थी— राघव का घर!
*****************


रात 12:00 बजे | किशनगंज, राघव का घर

घने अँधेरे में डूबे राघव के मिट्टी के घर में सब कुछ शांत था। अंदर चारपाई पर राघव और सुगना एक-दूसरे की बाहों में इत्मीनान से सो रहे थे। सुगना का सिर राघव के चौड़े सीने पर टिका था और वो अपने आने वाले बच्चे के सुनहरे सपने देख रहे थे।
तभी... उस सन्नाटे को चीरती हुई मौत उनके दरवाज़े पर आ पहुँची।
"धड़... धाड़... धाड़.....!!"
लकड़ी का दरवाज़ा इतनी ज़ोर से पीटा गया कि पूरा घर कांप उठा।
"खोल बे दरवाज़ा... तेरे बाप आए हैं!" बाहर से शमशेर की वो नशे में डूबी, खुरदरी और हैवानों जैसी आवाज़ गूंजी।
इस भयानक आवाज़ से सुगना बुरी तरह सिहर उठी। वो घबराकर राघव से चिपक गई। लेकिन राघव... वो एक सच्चा और बहादुर किसान था। उसकी आँखों में नींद की जगह अब एक खूंखार गुस्सा आ गया था। उसने सुगना को पीछे किया और बिना किसी खौफ के आगे बढ़कर दरवाज़े की सिटकनी खोल दी।

दरवाज़ा खुला ही था कि अँधेरे को चीरता हुआ लोहे का एक भारी रॉड हवा में लहराया...
"भननननन.... धड़ाक्क....!!"
राघव के सिर पर एक बहुत ही ज़ोरदार और जानलेवा वार हुआ।
राघव का मज़बूत शरीर एक ही झटके में लड़खड़ा गया। उसकी आँखों के सामने सैकड़ों तारे चमक उठे और दुनिया गोल घूमने लगी। सिर से खून का एक गर्म फव्वारा फूटा और उसकी आँखों को लाल कर गया। वो घुटनों के बल ज़मीन पर आ गिरा... लेकिन उसने अपना होश पूरी तरह से नहीं खोया।

"सालों... आ गए ना अपनी असली औकात पर!" खून से लथपथ राघव ने ज़मीन से ही गुर्राते हुए कहा।
लेकिन इससे पहले कि वो उठ पाता, शमशेर ने अपने भारी पुलिस वाले जूते से उसकी छाती पर वार किया और एक हाथ से उसकी गर्दन दबोच कर उसे ज़मीन पर दबा दिया।

इसी बीच... पीछे खड़ा रमेश किसी भूखे और पागल कुत्ते की तरह घर के अंदर घुसा।
उसने चीखती हुई सुगना के बाल पकड़े और उसे बेदर्दी से घसीटता हुआ घर के बाहर आँगन की उस ठंडी ज़मीन पर ला कर पटक दिया.

सुगना दर्द और खौफ से रो रही थी। उसका वो 8 महीने का गदराया हुआ जिस्म पसीने और डर से कांप रहा था। वो इस वक़्त सिर्फ एक लाल घाघरे और एक छोटी सी सूती चोली में थी। चाँद की मद्धम रौशनी में सुगना के उस भारी और उफनते हुए बदन को देखकर रमेश के अंदर का वो शैतान पूरी तरह से आज़ाद हो गया।

"साला इंसानियत नाम की चीज़ ही नहीं है तुम जैसों में! कहा था ना मान जा... 5 करोड़ कोई कम नहीं होते इस चुत के बदले!" रमेश पागलों की तरह चिल्लाते हुए सुगना के ऊपर टूट पड़ा।
एक ही झटके में रमेश ने सुगना को ज़मीन पर पटक दिया।
सामने ज़मीन पर पड़ा राघव अपनी खून से सनी आँखें कभी खोल रहा था, तो कभी दर्द से बंद कर रहा था। उसकी आँखों के सामने सब कुछ धुंधला हो रहा था। वो चाह कर भी अपनी चीखती हुई बीवी को उन दरिंदों से नहीं बचा पा रहा था।

सुगना ने अपनी पूरी ताकत से चीखना चाहा, "बचाओ... कोई बचाओ...!" लेकिन रमेश ने अपना भारी, खुरदरा हाथ सुगना के मुँह पर कसकर दबा दिया। उसकी लाल आँखों में एक भयानक हवस नाच रही थी।

"साली हरामज़ादी... ये चीखें बचा कर रख! जब मैं आज तेरी चुत मे लंड डालूंगा, तब जी भर कर चीखना!" 

रमेश ने अपने दाँत पीसते हुए कहा और अपने दूसरे हाथ से अपनी पैंट की बेल्ट खोल दी।
राघव की आँखों से खून और आंसू एक साथ बह रहे थे...


राघव के आँगन में चाँद भी डर के मारे छुप गया था।  
सुगना ज़मीन पर पड़ी चीख रही थी। उसका 8 महीने का गर्भवती पेट ऊपर-नीचे हिल रहा था। लाल घाघरा फटा हुआ, चोली के बटन टूट चुके थे। दोनों भारी, दूध से भरे स्तन बाहर झूल रहे थे।

रमेश उसके ऊपर चढ़ गया। उसकी आँखें शराब और हवस से लाल।  
"साली… आज तुझे चोद के ही मानूँगा!"  

उसने दोनों हाथों से सुगना के स्तनों को नोच लिया। उँगलियाँ दबाकर मांस में धंस गईं। दूधिया गोरा मांस उँगलियों के बीच से फूट पड़ा।  
रमेश के दबाव इतना तेज़ था की सुगना के स्तनो से दूध की धार फुट पड़ी...
"आअह्ह्ह.... साली दूध छोड़ने लगी बे ये तो.. " चुप... चप... सरलप.... स्सदररर... करता रमेश ने अपना मुँह सुगना के निप्पल पर दे मारा, उसे चूसने लगा, उसके बच्चे के हिस्से का दूध वो पीने लगा.

"आआआह्ह्ह्ह… दर्द हो रहा है… छोड़ दो… हे राम!" सुगना चीखी।  

रमेश ने पुरे स्तन को सक कर मुँह में भर लिया और इतना जोर से काटा की दाँत त चूचुक में घुस गए। खून की एक पतली धार निकल आई।  
लाल एयर सफ़ेद रंग एक होने लगा.
 

सुगना तड़प रही थी। उसकी जांघें काँप रही थीं। रमेश ने एक हाथ नीचे ले जाकर अपने लंड को टाटोला, आश्चर्य घर से निकलते वक़्त उसका लंड खड़ा था लेकिन अब **बिल्कुल ढीला**। शराब की अधिकता ने उसके लंड से उसकी शक्ति छीन ली थी,  

रमेश ने उसे सहलाया, थूका, रगड़ा… लेकिन लंड खड़ा ही नहीं हो रहा था।  
"मादरचोद… खड़ा हो साले!" वो चिल्लाया।  

सुगना रोते हुए बोली, "बड़े बाबू… रहम करो… बच्चा है पेट में…"  

रमेश का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया।  
"हरामज़ादी! ठंडी औरत… मेरा लंड भी नहीं खड़ा कर सकती!"  

उसने पूरा जोर लगाकर सुगना के गाल पर दो जोरदार थप्पड़ मारे।  
थाड्… थाड्!
सुगना का सिर घूम गया।  
रमेश अपनी नामर्दानगी का गुस्सा सुगना पर उतार रहा था, 
फिर उसने मुट्ठी भींचकर सुगना के 8 महीने के निकले हुए पेट पर एक भयानक घूँसा मार दिया।  
धमाक्का..धममम...

"आआआआह्ह्ह्ह्ह्ह…!!" सुगना की चीख आसमान फाड़ गई। पेट के अंदर बच्चा हिल उठा। दर्द से उसकी आँखें उलट गईं।  

राघव ज़मीन पर पड़ा था। सिर से खून बह रहा था। वो कुछ बोलना चाहता था, हाथ उठाना चाहता था… लेकिन चोट बहुत गहरी थी। दिमाग में सब कुछ घूम रहा था। आँखों के सामने धुंधला हो रहा था। सिर्फ फुसफुसाहट निकली 
"सु… सुगना… बचा… लो…"  

रमेश अब पूरी तरह हैवान बन चुका था। उसे सुगना की चुत मे कुछ तो घुसाना ही था,लंड ने तो साथ दिया नहीं...
उसने आस-पास देखा। आँगन में पड़ी एक मोटी लोहे की रॉड नज़र आई, शायद वही थी जिस से रघु पर वार किया गया था.

"मादरचोद देहाती… खुद को क्या समझती है!"  

वो रॉड उठा ली।  

शमशेर चौंक गया।  
"नहीं रमेश… ये प्लान नहीं था… रुक!"  
शमशेर ने राघव को छोड़ा और रमेश को पकड़ने दौड़ा।  

लेकिन देर हो चुकी थी।  

रमेश ने सुगना की जांघें ज़ोर से फैलाईं। उसकी फूली हुई, गर्भवती चूत पूरी तरह खुली थी। रमेश ने रॉड का मोटा सिरा चूत के मुहाने पर रखा… और  धह्ह्ह्हह्ह... धच...पूरे जोर से अंदर धकेल दिया।  

धड्ड… धप्पप्प… फच… फााााचक्!!!

लोहे का सरिया सुगना की चूत में 8-9 इंच तक घुस गया। पेट के अंदर तक।  

"अअअअअअआआआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह…!!!"  

सुगना की आँखें बाहर निकल आईं। मुँह से खून का फव्वारा निकला। उसका पूरा शरीर एक बार जोर से काँपा… फिर ढीला पड़ गया।  

रमेश हाँफ रहा था। "हंफ… हंफ… ले साली… अब चीख!"  

सुगना की चूत से खून और पानी का मिश्रण फूट रहा था। पेट फट चुका था।  

राघव ये हृदय-विदारक दृश्य देख नहीं पाया। उसकी आँखें उलट गईं और वो बेसुध ज़मीन पर लुढ़क गया।  

शमशेर ने रमेश के गाल पर दो जोरदार थप्पड़ जड़ दिए..
थाड्… थाड्!
"होश में आ मादरचोद! ये क्या कर दिया?!"  

रमेश जैसे नींद से जागा। सामने का नजारा देखकर उसका चेहरा सफेद पड़ गया।  
खून… खून… खून चारों तरफ खून। सुगना का पेट फटा हुआ था, आँखें खुली हुई उसे ही देख रही थी,

"अ… अबे… ये… ये क्या हुआ?" रमेश काँपते हुए पीछे हटा।  

शमशेर का दिमाग अभी भी तेज चल रहा था।  
"चल… अभी निकल यहाँ से! मैं सब संभालता हूँ। मादरचोद… तू नशे में सब भूल जाता है!"  

उसने रमेश को घसीटकर बुलेट पर बिठाया। बुलेट की आवाज़ दोबारा गूँजी और दोनों अँधेरे में गायब हो गए।  
**************************

रात के 1:30 बजे | शहर का अस्पताल

​अस्पताल के उस ठंडे और शांत गलियारे में सिर्फ एक पुरानी घड़ी की 'टिक-टिक' गूंज रही थी। रमेश के बाबूजी (कामिनी के ससुर) हताश और परेशान से बाहर बेंच पर बैठे थे।
​ऑपरेशन थियेटर की लाल बत्ती बुझी और डॉक्टर बाहर आया।
बाबूजी तुरंत अपनी जगह से उठ खड़े हुए। "डॉक्टर साहब... क्या हुआ? मेरी बहू और पोता ठीक तो हैं ना?"
​डॉक्टर ने मास्क नीचे किया और एक हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, "मुबारक हो ज़मींदार बाबू... आपकी बहू ने एक बच्ची को जन्म दिया है। घर में लक्ष्मी आई है। सीढ़ियों से गिरने की वजह से माँ के सिर पर गहरी चोट है और उन्हें अभी होश नहीं है, इसलिए हमें तुरंत ऑपरेशन करके बच्ची को बाहर निकालना पड़ा। लेकिन दोनों सुरक्षित हैं।"

​"लड़की...?"
ये शब्द सुनते ही बाबूजी का चेहरा ऐसे लटक गया जैसे किसी ने उनकी सारी दौलत छीन ली हो। उनकी आँखों में खुशी की एक किरण भी नहीं थी, सिर्फ एक गहरी हताशा और निराशा थी।
​"साला... रमेश एक लड़का भी पैदा ना कर सका!" बाबूजी बड़बड़ाए और वहीं उस ठंडे फर्श पर धम्म से बैठ गए। रमेश के उस खानदान में जहाँ बेटों का गुरूर आसमान पर था, वहाँ कामिनी ने एक लड़की को जन्म दिया,  उसका भविष्य पैदा होते ही अंधकार में डूब गया था।

​(ठीक उसी वक़्त... किशनगंज, राघव का घर)

​गाँव के उस कच्चे घर में अब मौत का सन्नाटा पसरा हुआ था। शमशेर और रमेश अपना खौफनाक काम करके और राघव की ज़िंदगी तबाह करके अपनी बुलेट से वहाँ से फरार हो चुके थे।
​तभी... हाँफती और कांपती हुई ताईजी (सुगंधा) उस घर के आँगन तक पहुँचीं।
वहाँ का नज़ारा डरावना था। अँधेरा इतना था कि कुछ साफ दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन ताईजी को उस हवा में किसी अनहोनी और खौफ की गंध आ रही थी।

​उनकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि वो चौखट के अंदर कदम रखें।
फिर भी... एक औरत का भारी कलेजा था। उनके कदम धीरे-धीरे आगे बढ़े। जैसे ही उन्होंने अंदर झांका...
"हे भगवान...!" ताईजी के मुँह से एक दबी हुई चीख निकल गई।

​ज़मीन पर राघव और सुगना बेसुध पड़े थे। ताईजी का कलेजा कांप गया। उन्हें लगा कि यहाँ अब कुछ नहीं बचा है। वो डर के मारे वापस बाहर की तरफ पलटने ही वाली थीं कि तभी...
​"उंवा... उंवा... उंवा..."
सन्नाटे को चीरती हुई एक बहुत ही धीमी, लेकिन स्पष्ट नवजात बच्चे के रोने की आवाज़ ने ताईजी के कदमों को ज़मीन पर जकड़ लिया।
​ताईजी तुरंत पलटीं और भागते हुए उस अँधेरे कोने तक पहुँचीं।
वहाँ ज़मीन पर, उस खौफनाक मंज़र के बीच... एक नवजात बच्चा रो रहा था। ताईजी ने अपने कांपते हाथों से उस बच्चे को उठाया और अपनी सूती साड़ी के पल्लू में लपेट लिया।

​उन्होंने अँधेरे में टटोल कर देखा... वो एक लड़का था!
​उसी एक पल में, ताईजी के अंदर की वो बरसों पुरानी, सूखी हुई ममता ज्वालामुखी की तरह फूट पड़ी। एक औलाद पाने का सुख, जिसके लिए समाज ने उन्हें ताने मारे थे, जिसके लिए उन्होंने रमेश की हर ज़्यादती बर्दाश्त की थी... आज नियति ने वो औलाद खुद उनके हाथों में सौंप दी थी।
​उन्होंने उस नवजात लड़के को अपने सीने से लगा लिया। उनकी आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली।
इस एक पल में रमेश का खौफ, दुनिया का डर, सब पीछे छूट गया। ममता ने अपना असर दिखाया और एक 'राजदार' के अंदर की 'माँ' जीत गई।

​"जाको राखे साइयां... मार सके ना कोय..." ताईजी ने बुदबुदाते हुए उस बच्चे को अपने गले से और कसकर लगा लिया।

​ताईजी जानती थीं कि अगर रमेश को इस बच्चे के ज़िंदा होने की भनक भी लग गई, तो वो इसे भी नहीं छोड़ेगा। उन्होंने एक आखिरी बार उस वीरान घर को देखा और फिर उस बच्चे को अपनी साड़ी में छुपाकर, घने अँधेरे में विलीन हो गईं।
​कालचक्र ने अपना खेल खेल दिया था।

शहर में रमेश की असली औलाद (बेटी) जन्म ले चुकी थी,
और गाँव में, राघव का खून (बेटा) ताईजी की ममता की छाँव में इस अँधेरी रात मे चला जा रहा था,
**************


"साब किशनगंज आ गया, किधर मुड़ना है अब " टैक्सी ड्राइवर की आवाज़ से रमेश एक दम से चौंक गया...
किशनगंज के रास्तो ने उसकी याद को ताज़ा कर दिया था.

"वो सामने से लो, गांव के  बहार बहार से, गांव के अंदर जाने की जरुरत नहीं नहीं.."
जैसे जैसे टैक्सी आगे बढ़ रही रही, बंटी और कामिनी की आंखे चका चौघ होती जा रही थी.
सामने एक बड़ा सा खुला दरवाजा था, अंदर खेत खलिहान पसरे हुए रहे, इसके कली 1km दूर एक सफ़ेद सी ईमारत दिख रही थी.
"बेटा ये फार्म हाउस पुरे 5बीघा जमीन पर फैला गए है, जहाँ तक नजर जाये समझो तुम्हारा ही है " रमेश गर्व से बोल उठा
टैक्सी आगे बढ़ती गई....
​(क्रमशः)

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4 Comments

  1. Kahani me ab kamini banti aur tai je ke uper rakho jyada past me jaonge to kahani bor ho jayengi

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  2. Gao me aate hi kafi dabe hue raaz khul rahe hai
    Kamini ke beti kya sath hua
    Kaha hai ab wo
    Ye to raghav hi Raghu hai par wo ramesh Ghar kaise aaya Ramesh ki hawas ki kimat to kamini chuka rahi hai
    Kamini to shahar me sirf Ghar me aur store room me chudati thi
    Yaha gaon me to pura 5 bhiga pada hai
    Kya uske tauji ke sath sath sasur bhi mauke ka fayda uthayenge
    Kamini ka gao me sabse pehle shikaar kaun karega
    Ye kahani dilchasb mod le rahi hai
    Keep writing

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  3. Lord haram bro achanak se app kaha chale gaye
    Kya apke nizi jeevan me kuch problem aa gayi hai ya busy ho
    Forum ne fir se aapko block to nahi kar diya
    Kuch to reply do

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  4. Bhai yaar kya huaa apdate to de do ya fir koi problem h to batao hum milkar solv karenge

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